>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


अब विकास की लहर चलने वाली है

Posted: 22 Oct 2010 12:23 AM PDT

बिहार का चुनाव क्या हो रहा है सभी छोटे बड़े राजनेताओं कि जुबान पर बस विकाश का ही मुद्दा छाया हुआ है। अब हर नेता अपनी जनसभा में केवल विकास  कि बात कर रहा है। चाहे वह कांग्रेस हो, आर.जे.डी हो, लोजपा हो, बीजेपी हो, जे.डी.यू हो या कमनिष्ट पार्टी हो, सभी एक ही राग अलाप रहे है और वह है “विकास “।

देर से ही सही अब राजनीतिक पार्टियों को यह लगने लगा है कि भारत कि जनता को बहुत दिनों तक बेवकूफ बना लिया है चाहे वह जाती के नाम हो, धर्म के नाम पर हो या गरीबी के नाम पर हो, लेकिन अब भारतीय जनता को ये राज नेता और बेवकूफ नहीं बना सकते क्यों कि आज कि ७० फीसदी नौजवान पीढ़ी पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई है यह २१ वीं शदी कि पीढ़ी है। यह जाती, धर्म से ऊपर उढ़ कर सोंचती है। आज कि युवा पीढ़ी दिल का नहीं दिमाग का इस्तेमाल करती है। अब पढ़े लिखे मुसलमान नौजवान पीढ़ी अपने को अल्प-संख्यक कहलाना पसंद नहीं करते है क्यों कि अल्प-संख्यक शब्द उनको गाली लगता है, वो भी भारतीय है तो अल्प-संख्यक क्यों कहा जाता है। यह चेतना पढ़े-लिखे नौजवान पीढ़ियों में आई है। यह पीढ़ी अपने राज्य अपने सूबे में विकाश चाहती है, अब यह पीढ़ी राजनेतावों के चिकनी-चुपड़ी बातो में नहीं आने वाली है, आज कि युवा पीढ़ी समझदार पीढ़ी है। इसीलिए अब सभी राजनीतिक पार्टियाँ भी अपना स्टैंड बदलने लगी है और विकाश कि बाते करने लगी है क्यों कि अब उन्हें भी यह समझ आने लगा है कि बात बनाने से वोट नहीं मिलने वाला है, काम के बदले ही वोट मिलेगा, इसलिए विकाश कि बाते करने लगे है।
राज्य के विकाश के मुद्दे कि शुरुआत भी बिहार से ही हुआ जैसे कि देश कि आज़ादी कि शुरुआत गाँधी जी ने बिहार कि धरती से ही किये थे, एक बिहारी ने पुरे भारत से कांग्रेस कि सत्ता को उखाड़ फेंका था वह जयप्रकाश नारायण बिहार से ही थे और राज्य के विकाश का मुद्दा एक बिहारी ने ही उठाया है। वह बिहार के वर्तमान मुख्य-मंत्री नितीश कुमार है। विकाश कि बाते अभी बिहार में हो रही है लेकिन जैसे-जैसे भारत के और राज्यों में चुनाव आएगा वहां कि जनता भी विकाश कि ही बात करेगी तथा विकाश ही चुनावी मुद्दा बनेगा। अभी तो यह शुरुआत है आगे-आगे देखिये होता है क्या ? विकाश कि लहर चल पड़ी है अब इसके आंधी में पूरा देश, देश कि पूरी जनता कि एक ही आवाज़ होगी और वह आवाज़ होगी ……”विकाश” केवल विकाश । हर सूबे में विकाश हर राज्य में विकाश पुरे देश में विकाश, अब आम जनता अपने सरकार से सिर्फ विकाश चाहेगी। अब राजनेतावों कि कि चिकनी-चुपड़ी बाते जनता को दिग्भ्रमित नहीं कर पायेगी। अब राजनेतावों को जनता काम के बदले अपना वोट देगी। समय रहते राजनेतावों को सम्हल जाना चाहिए क्यों कि अब पढ़े-लिखे वोटरों से राजनेतावों का पाला पड़ने वाला है। अब राजनेतावों के दिन बदलने वाले है काँटों भरे रास्ते से इनको गुजरना होगा क्यों कि २१वीं शदी कि पीढ़ी पढ़ी-लिखी पीढ़ी है। यह अपने एक एक पैसे का हिसाब राजनेतावों से लेगी।
बिहार के चुनाव में विकाश मुख्य मुद्दा उभर कर सामने आया है …. नितीश कुमार विकाश कि बाते करते है तो बात समझ में आती है क्यों कि उन्हों ने सूबे में थोडा ही सही विकाश कि गाड़ी को पटरी पर ला तो दिए है अगर लालू जी विकाश कि बात करते है तो बेमानी लगता है क्यों कि उन्हों ने पंद्रह साल में बिहार में कोई विकाश नहीं किये और पासवान जी ये तो केवल केंद्र में मंत्री रहे है इनके लिए तो पूरा भारत एक है तो फिर बिहार जैसे एक राज्य को ये क्या अहमियत देंगे, अब रही कांग्रेस पार्टी ये विकाश कि बात तो कर ही नहीं रही है इसके सभी बड़े नेता केवल एक ही राग अलाप रहे है …. केंद्र के पैसे से बिहार का विकाश हुआ है।

कारवाँ टू फ़िलीस्तीन : सेकुलर बुद्धिजीवियों का एक और पाखण्ड…

Posted: 21 Oct 2010 09:14 PM PDT

जैसा कि अब सभी जान चुके हैं, भारत में सेकुलरों और मानवाधिकारवादियों की एक विशिष्ट जमात है, जिन्हें मुस्लिमों का विरोध करने वाला व्यक्ति अथवा देश हमेशा से “साम्प्रदायिक” और “फ़ासीवादी” नज़र आते हैं, जबकि इन्हीं सेकुलरों को सभी आतंकवादी “मानवता के मसीहा” और “मासूमियत के पुतले नज़र आते हैं। कुछ ऐसे ही ढोंगी और नकली सेकुलरों द्वारा इज़राइल की गाज़ा पट्टी नीतियों के खिलाफ़ भारत से फ़िलीस्तीन तक रैली निकालने की योजना है। 17 एशियाई देशों के “जमूरे” दिसम्बर 2010 में फ़िलीस्तीन की गाज़ा पट्टी में एकत्रित होंगे।

इज़राइल के ज़ुल्मों(?) से त्रस्त और अमेरिका के पक्षपात(?) से ग्रस्त “मासूम” फ़िलीस्तीनियों के साथ एकजुटता दिखाने के लिये इस कारवां का आयोजन रखा गया है। गाज़ा पट्टी में इज़राइल ने जो नाकेबन्दी कर रखी है, उसके विरोध में यह लोग 2 दिसम्बर से 26 दिसम्बर तक भारत, पाकिस्तान, ईरान, जोर्डन, सीरिया, लेबनान और तुर्की होते हुए गाज़ा पट्टी पहुँचेंगे और इज़राइल का विरोध करेंगे। इस दौरान ये सभी लोग प्रेस कांफ़्रेंस करेंगे, विभिन्न राजनैतिक व्यक्तित्वों से मिलेंगे, रोड शो करेंगे और भी तमाम नौटंकियाँ करेंगे…

इस “कारवाँ टू फ़िलीस्तीन” कार्यक्रम को अब तक भारत से 51 संगठनों और कुछ “छँटे हुए” सेकुलरों का समर्थन हासिल हो चुका है जो इनके साथ जायेंगे। इनकी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि ये लोग सताये हुए फ़िलीस्तीनियों के लिये नैतिक समर्थन के साथ-साथ, आर्थिक, कूटनीतिक और “सैनिक”(?) समर्थन के लिये प्रयास करेंगे। हालांकि फ़िलहाल इन्होंने अपने कारवां के अन्तिम चरण की घोषणा नहीं की है कि ये किस बन्दरगाह से गाज़ा की ओर कूच करेंगे, क्योंकि इन्हें आशंका है कि इज़राइल उन्हें वहीं पर जबरन रोक सकता है। इज़राइल ने फ़िलीस्तीन में जिस प्रकार का “जातीय सफ़ाया अभियान” चला रखा है उसे देखते हुए स्थिति बहुत नाज़ुक है… (“जातीय सफ़ाया”, यह शब्द सेकुलरों को बहुत प्रिय है, लेकिन सिर्फ़ मासूम मुस्लिमों के लिये, यह शब्द कश्मीर, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि में हिन्दुओं के लिये उपयोग करना वर्जित है)। एक अन्य सेकुलर गौतम मोदी कहते हैं कि “इस अभियान के लिये पैसों का प्रबन्ध कोई बड़ी समस्या नहीं है…” (होगी भी कैसे, जब खाड़ी से और मानवाधिकार संगठनों से भारी पैसा मिला हो)। आगे कहते हैं, “इस गाज़ा कारवां में प्रति व्यक्ति 40,000 रुपये खर्च आयेगा” और जो विभिन्न संगठन इस कारवां को “प्रायोजित” कर रहे हैं वे यह खर्च उठायेंगे… (सेकुलरिज़्म की तरह का एक और सफ़ेद झूठ… लगभग एक माह का समय और 5-6 देशों से गुज़रने वाले कारवां में प्रति व्यक्ति खर्च सिर्फ़ 40,000 ???)। कुछ ऐसे ही “अज्ञात विदेशी प्रायोजक” अरुंधती रॉय और गिलानी जैसे देशद्रोहियों की प्रेस कांफ़्रेंस दिल्ली में करवाते हैं, और “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता”(?) के नाम पर भारत जैसे पिलपिले नेताओं से भरे देश में सरेआम केन्द्र सरकार को चाँटे मारकर चलते बनते हैं। वामपंथ और कट्टर इस्लाम हाथ में हाथ मिलाकर चल रहे हैं यह बात अब तेजी से उजागर होती जा रही है। वह तो भला हो कुछ वीर पुरुषों का, जो कभी संसद हमले के आरोपी जिलानी के मुँह पर थूकते हैं और कभी गिलानी पर जूता फ़ेंकते हैं, वरना अधिसंख्य हिन्दू तो कब के “गाँधीवादी नपुंसकता” के शिकार हो चुके हैं।

कारवाँ-ए-फ़िलीस्तीन के समर्थक, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना अब्दुल वहाब खिलजी कहते हैं कि “भारत के लोग फ़िलीस्तीन की आज़ादी के पक्ष में हैं और उनके संघर्ष के साथ हैं…” (इन मौलाना साहब की हिम्मत नहीं है कि कश्मीर जाकर अब्दुल गनी लोन और यासीन मलिक से कह सकें कि पंडितों को ससम्मान वापस बुलाओ और उनका जो माल लूटा है उसे वापस करो, अलगाववादी राग अलापना बन्द करो)। फ़िलीस्तीन जा रहे पाखण्डी कारवां में से एक की भी हिम्मत नहीं है कि पाकिस्तान के कबीलाई इलाके में जाकर वहाँ दर-दर की ठोकरें खा रहे प्रताड़ित हिन्दुओं के पक्ष में बोलें। सिमी के शाहनवाज़ अली रेहान और “सामाजिक कार्यकर्ता”(?) संदीप पाण्डे ने इस कारवां को अपना नैतिक समर्थन दिया है, ये दोनों ही बांग्लादेश और मलेशिया जाकर यह कहने का जिगर नहीं रखते कि “वहाँ हिन्दुओं पर जो अत्याचार हो रहा है उसे बन्द करो…”।

“गाज़ा कारवां” चलाने वाले फ़र्जी लोग इस बात से परेशान हैं कि रक्षा क्षेत्र में भारत की इज़राइल से नज़दीकियाँ क्यों बढ़ रही हैं (क्या ये चाहते हैं कि हम चीन पर निर्भर हों? या फ़िर सऊदी अरब जैसे देशों से मित्रता बढ़ायें जो खुद अपनी रक्षा अमेरिकी सेनाओं से करवाता है?)। 26/11 हमले के बाद ताज समूह ने अपने सुरक्षाकर्मियों को प्रशिक्षण के लिये इज़राइल भेजा, तो सेकुलर्स दुखी हो जाते हैं, भारत ने इज़राइल से आधुनिक विमान खरीद लिये, तो सेकुलर्स कपड़े फ़ाड़ने लगते हैं। मुस्लिम पोलिटिकल काउंसिल के डॉ तसलीम रहमानी ने कहा – “हमें फ़िलीस्तीनियों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करना चाहिये और उनके साथ खड़े होना चाहिये…” (यानी भारत की तमाम समस्याएं खत्म हो चुकी हैं… चलो विदेश में टाँग अड़ाई जाये?)।

गाज़ा कारवां के “झुण्ड” मे कई सेकुलर हस्तियाँ और संगठन शामिल हैं जिनमें से कुछ नाम बड़े दिलचस्प हैं जैसे –

“अमन भारत”

“आशा फ़ाउण्डेशन”

“अयोध्या की आवाज़”(इनका फ़िलीस्तीन में क्या काम?)

“बांग्ला मानवाधिकार मंच” (पश्चिम बंगाल में मानवाधिकार हनन नहीं होता क्या? जो फ़िलीस्तीन जा रहे हो…)

“छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा” (नक्सली समस्या खत्म हो गई क्या?)

“इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियन” (मजदूरों के लिये लड़ने वाले फ़िलीस्तीन में काहे टाँग फ़ँसा रहे हैं?)

“जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द” (हाँ… ये तो जायेंगे ही)

“तीसरा स्वाधीनता आंदोलन” (फ़िलीस्तीन में जाकर?)

“ऑल इंडिया मजलिस-ए-मुशवारत” (हाँ… ये भी जरुर जायेंगे)

अब कुछ “छँटे हुए” लोगों के नाम भी देख लीजिये जो इस कारवां में शामिल हैं –

आनन्द पटवर्धन, एहतिशाम अंसारी, जावेद नकवी, सन्दीप पाण्डे (इनमें से कोई भी सज्जन गोधरा ट्रेन हादसे के बाद कारवां लेकर गुजरात नहीं गया)

सईदा हमीद, थॉमस मैथ्यू (जब ईसाई प्रोफ़ेसर का हाथ कट्टर मुस्लिमों द्वारा काटा गया, तब ये सज्जन कारवां लेकर केरल नहीं गये)

शबनम हाशमी, शाहिद सिद्दीकी (धर्मान्तरण के विरुद्ध जंगलों में काम कर रहे वयोवृद्ध स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या होने पर भी ये साहब लोग कारवाँ लेकर उड़ीसा नहीं गये)… कश्मीर तो खैर इनमें से कोई भी जाने वाला नहीं है… लेकिन ये सभी फ़िलीस्तीन जरुर जायेंगे।

तात्पर्य यह है कि अपने “असली मालिकों” को खुश करने के लिये सेकुलरों की यह गैंग, जिसने कभी भी विश्व भर में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार और जातीय सफ़ाये के खिलाफ़ कभी आवाज़ नहीं उठाई… अब फ़िलीस्तीन के प्रति भाईचारा दिखाने को बेताब हो उठा है। इन्हीं के “भाईबन्द” दिल्ली-लाहौर के बीच “अमन की आशा” जैसा फ़ूहड़ कार्यक्रम चलाते हैं जबकि पाकिस्तान के सत्ता संस्थान और आतंकवादियों के बीच खुल्लमखुल्ला साँठगाँठ चलती है…। कश्मीर समस्या पर बात करने के लिये पहले मंत्रिमण्डल का समूह गिलानी के सामने गिड़गिड़ाकर आया था परन्तु उससे मन नहीं भरा, तो अब तीन विशेषज्ञों(?) को बात करने(?) भेज रहे हैं, लेकिन पिलपिले हो चुके किसी भी नेता में दो टूक पूछने / कहने की हिम्मत नहीं है कि “भारत के साथ नहीं रहना हो तो भाड़ में जाओ… कश्मीर तो हमारा ही रहेगा चाहे जो कर लो…”।

(सिर्फ़ हिन्दुओं को) उपदेश बघारने में सेकुलर लोग हमेशा आगे-आगे रहे हैं, खुद की फ़टी हुई चड्डी सिलने की बजाय, दूसरे की धोने में सेकुलरों को ज्यादा मजा आता है…और इसे वे अपनी शान भी समझते हैं। कारवाँ-ए-फ़िलीस्तीन भी कुछ-कुछ ऐसी ही “फ़ोकटिया कवायद” है, इस कारवाँ के जरिये कुछ लोग अपनी औकात बढ़ा-चढ़ाकर बताने लगेंगे, कुछ लोग सरकार और मुस्लिमों की “गुड-बुक” में आने की कोशिश करेंगे, तो कुछ लोग एकाध अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार की जुगाड़ में लग जायेंगे… न तो फ़िलीस्तीन में कुछ बदलेगा, न ही कश्मीर में…। ये फ़र्जी कारवाँ वाले, इज़राइल का तो कुछ उखाड़ ही नहीं पायेंगे, जबकि गिलानी-मलिक-शब्बीर-लोन को समझाने कभी जायेंगे नहीं… मतलब “फ़ोकटिया-फ़ुरसती” ही हुए ना?

“अपने” लोगों को लतियाकर, दूसरे के घर पोंछा लगाने जाने वालों की साइट का पता यह है : http://www.asiatogaza.net/

माटी में आँचल में अँकुआता बीज

Posted: 21 Oct 2010 06:47 PM PDT

कौन गति .

एक नन्हीं

-सी ज्योति !

माटी में आँचल में अँकुआता बीज

!

काल

-धारा में बहे जा रहे जीवन को

निरंतरता की रज्जु में बाँधता

,

भंगुर

-से तन में सँजोए नवनिर्माण कण

काल से आँख मिलाती जीवन रचती

धरती या नारी

?

उस अंतर्निहित ज्योति का स्फोट

दर्पण पर प्रतिवर्तित असह्य प्रकाश

!

स्तबध काल

-भुजंग अँधिया जाये

अपना दाँव न चल सके

तो तुम सहानुभूत या भय

-भीत से

बोल दिए

नारी की छाया परत

अंधा होत भुजंग

!’

*

निःस्व समर्पण के क्षणों में

बहुत भाती है न बहुरिया

?

फिर मस्ती में डूबा मन

,और आहत अहं

बिठा नहीं पाता संगति

व्यवहार

-जगत की वास्तविकताओं से

दामन बचा बचते

-भागते

उसी पर दोष धरते

, गरियाते ,

बन जाते हो ख़ुद

राम की बहुरिया

!

*

सोचते रहते हो

तिनकी कौन गति

जे नित नारी संग

?’

कबीर

,

जिसमें सामर्थ्र्य होगी

, भागेगा नहीं,

अर्धांग में धारण कर

बन जाएगा पूर्ण

-पुरुष !

निर्भय

-निर्द्वंद्व !

वैज्ञानिक और वैश्विक भारतीय कालगणना

Posted: 21 Oct 2010 06:24 PM PDT

कालगणना का विचार मन में आते ही प्रश्न उत्पन्न होता है कि काल क्या है? काल की अवधारणा का विचार प्रकृति में कब उत्पन्न हुआ? काल का आरंभ और अंत कब होता है? हिंदू ऋषियों ने इसके बारे में बड़ी गहराई से विचार किया है। उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के साधनभूत द्रव्यों में काल को भी द्रव्य के रूप् में सम्मिलित कर लिया है। इस विषय में महर्षि कणाद कहते हैं : –

पृथ्वीव्यापस्ते जो वायुराकाश कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि।

अर्थात पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिग्, आत्मा, मन ये द्रव्य हैं। निश्रेयस प्राप्ति हेतु इनका तत्वज्ञान अनिवार्य है।

व्याकरण की दृष्टि से काल शब्द गत्यर्थक, गणनार्थक अथवा प्रेरणार्थक कल घातु से ‘धण’ प्रत्यय करने से बनता है। यास्क इसको गत्यर्थक (कल्) धातु से व्युत्पन्न मानते है। अतः इस प्रकार काल का अस्तित्व गति में निहित है। महर्षि पतंजलि के अनुसार जिस से वस्तुओं का उपचय अथवा अपचय होता है, वह काल है।

कल का पूर्ण चिंतन वेदों में वर्णित है। इसके अनुसार काल आकाश, द्युलोक, पृथ्वी और अन्य सब पदार्थाे एवं भूतों का जन्मदाता है। काल में मन, प्राण और नाम समाहित है। सृष्टि का आदि और अंत काल ही है। काल सारे ब्रह्माण्ड को व्याप्त करता है।

पाश्चात्य जगत और काल

पश्चिम की संस्कृति में काल की अवधारणा कभी भी स्पष्ट नहीं थी। गत 100-150 वर्षों के वैज्ञानिक अविष्कारों और अनुसंधानों के पश्चात भी अभी तक पश्चिम को काल की महानता स्पष्ट नहीं हो सकी है। 14वीं शताब्दी तक यूरोप को गिनती करनी नहीं आती थी। जब भारत के गणित ने यूरोप की यात्रा की तब हम हिन्दुओं ने उनको गिनती करनी सिखाई। 17वीं शती तक पश्चिम में भूत क्या है? उसका वर्तमान और भविष्य से क्या संबंध है? यह जानकारी उनको नहीं थी, परन्तु जब भारतीय विद्याओं ने वहां की विद्यापीठों में प्रवेश किया, तब उनको यह जानकारी प्राप्त हुई।

काल के दो रूप

अ. मूर्त काल- मूर्त काल वह है जो लव, निमेष, युग, मन्वन्तर, कल्प आदि के रूप में हमारे सामने आता है।

ब. अमूर्त काल- काल के दूसरे रूप् अर्थात अमूर्त को समझने के लिए घड़ी का उदाहरण लेना चाहिए। घड़ी की सूई से जो मिनट, घंटे बनते है वह काल की प्रगति का फल है, परन्तु उनके पीछे की प्रेरक शक्ति अमूर्त अव्यक्त काल ही है।

3. कालोप्ति

हिरण्यगर्भ के विस्फोटित विश्व द्रव्य का प्रथम पदार्थ जब गतिमान होता है तो सर्वप्रथम काल की स्थापना होती है। लाखों वर्षों के बाद जब मनुष्य जीवन की सारी साधनभूत आवश्यकताएं पूर्ण हो जाती है, तब मानवोत्पति होती है। उसके बाद प्रकृति का विकास बंद हो जाता है।

काल और इतिहास

भारतीय चिंतन दर्शन में काल और इतिहास में बिम्ब और प्रतिबिम्ब का भाव है। जो वहां काल है। वही इतिहास है और जो इतिहास है, वहीं काल है। इनका अंगांगिभाव संबंध है। बिना काल के इतिहास हो ही नहीं सकता।

मन्वन्तर विज्ञान

इस पृथ्वी के संपूर्ण इतिहास की कुंजी मन्वन्तर विज्ञान मंे है। इस ग्रह के संपूर्ण इतिहास को 14 भागों अर्थात मन्वन्तरों में बांटा है। एक मन्वन्तर की आयु 30 करोड़ 67 लाख और 20 हजार वर्ष होती है। इस पृथ्वी का संपूर्ण इतिहास 4 अरब 32 करोड़ वर्ष का है। इस पृथ्वी का संपूर्ण इतिहास 4 अरब 32 करोड़ वर्ष का है। इस के 6 मन्वन्तर बीत चुके है और सातवां वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है। हमारी वर्तमान नवीन सृष्टि 12 करोड़ 5 लाख 33 हजार 1 सौ 4 वर्ष की हे। ऐसा युगों की भारतीय कालगणना बताती है।

पृथ्वी पर जैव विकास का संपूर्ण काल 4,32,00,00,00 वर्ष है। इसमें बीते 1 अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार 1 सौर 5 वर्षों के दीर्घ काल में 6 मन्वन्तर प्रलय, 447 महायुगी खंड प्रलय, तथा 134 लघु युग प्रलय हो चुके है।

पृथ्वी का शेष जैव काल 2 अरब 36 करोड 41 लाख 14 हजार 9 सौ वर्ष

पृथ्वी की शेष आयु 4 अरब 50 करोड़ 70 लाख 50 हजार 9 सौ वर्ष है।

पृथ्वी की संपूण्र आयु 8 अरब 64 करोड़ वर्ष।

सूर्य की शेष आयु 6 अरब 66 करोड़, 70 लाख 50 हजार 9 सौ 14 वर्ष

सूर्य की संपूर्ण आयु 12 अरब वर्ष 96 करोड़ वर्ष।

ब्रह्मा की बीती आयु 15 नील 55 खरब 20 अरब वर्ष है।

(6) प्राचीनता

विश्व में प्रचलित सभी कालगणनाओं में भारतीय कालगणना प्राचीनतम है। इसका प्रारंभ इस पृथ्वी पर आज से प्रायः 197 करोड़ वर्ष पूर्व वर्तमान श्वेत वराह कल्प से होता है। अतः यह कालगणना इस पृथ्वी पर प्रथम मानवोत्पति से लेकर आज तक के इतिहास को युगात्मक पद्धति से प्रस्तुत करती है।

(7) नो प्रकार

प््राचीन काल से भारतवर्ष में 9 प्रकार की कालगणनायें प्रचलित है। सदैव से इनका प्रयोग भारतीय पंचागों में होता चला आया है। यदि इनमें से एक भी लुप्त हो जाये तो भारतीय काल गणना की गाथा ही समाप्त हो जायेगी। यह कालगणना के 9 प्रकार इस प्रकार हैः-

(1) ब्राह्म (2) दिव्य (3) पैन्नय (4) प्रजापत्य (5) गौरव (6) सौर (7) सावन (8) चांद्र (9) आक्र्ष

(8) युगमान

काल की इकाईयों की उत्तरोत्तर वृद्धि और विकास के लिए कालगणना के हिन्दू विशेषज्ञों ने अंतरिक्ष के ग्रहों की गति को आधार मानकर पंचवर्षीय, 12 वर्षीय और 60 वर्षीय युगों की प्रारंभिक इकाईयों का निर्माण किया।

(9) चतुर्युगमान

पृथ्वी को प्रभावित करने वाले सातों ग्रह कल्प के प्रारंभ मंेे एक साथ एक ही अश्विनी नक्षत्र में स्थित थे। अतः उनकी पहली युति जो 4,32,000 वर्ष के बाद हुई उसे कलियुग कहा गया।

दूसरी युति द्वापर – 8,64,000 वर्ष।

तीसरी युति त्रेता – 12,96,000 वर्ष।

चैथी युति सतयुग – 17,28,000 वर्ष।

एक चतुयुगी – 43,20,000 वर्ष।

(10) मन्वन्तरमान

1 मन्वन्तर = 71 चतुर्युगियांः 43,20,000 = 71 – 30,67,20,000 वर्ष।

(11) कल्पमान

14 मन्वन्तर = 15 सन्धिकालः 30,67,20,000 14 17,28,000 15 – 4,32,00,00,000

(12) ब्राह्म मान

ब्रह्म का एक अहोरात्र = 2 कल्प- = 8,64,00,00,000 वर्ष

ब्रह्मा का एक मास = 8,64,00,00,000 गुणा 30= 2,59,20,00,00,000 वर्ष

ब्रह्मा का एक वर्ष = 2,59,20,00,00,000 गुणा 12 = 31,10,40,00,00,000 वर्ष

ब्रह्मा की कुल आयु -= 100 वर्ष

यानि सारे ब्रह्माण्ड की आयु = 31,10,40,00,00,00,000 वर्ष (31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष)

(13) सूक्ष्मतम इकाई

भारतीय कालगणना का आरंभ सूक्ष्मतम इकाई त्रुटि से होता है। इसके परिमाप के बारे में कहा गया है कि सूई से कमल के पत्ते को छेद करने में जितना समय लगता है, वह त्रुटि है। यह परिमाप एक सैकंेड का 33750 वां भाग है। इस प्रकार भारतीय कालगणना परमाणु की सूक्ष्मतम इकाई से शुरू होकर काल की महानतम इकाई महाकल्प तक पहुंचती है।

भारतीय कालगणना की लघुतम एवं दीर्घतम इकाइयों का वर्णन निम्नलिखित हैः-

(1) त्रुटि काल की लघुत्तम ईकाइ है। एक त्रुटि का परिमाप एक सैकंेड का 33750 वां भाग है।

(2) 100 त्रुटि – 1 वेध

(3) 3 वेध – 1 लव

(4) 3 लव – 1 निमेष

(5) 3 निमेष – 1 क्षण

(6) 5 क्षण – 1 काष्ठा

(7) 15 काष्ठा – 1 लघु

(8) 15 लघु – 1 नाडिका

(9) 6 नडिका – 1 प्रहर

(10) 8 प्रहर – 1 अहोरत्र-दिन रात

(11) 15 दिन – 1 पक्ष (शुक्ल और कृष्ण इसके दो भेद है।)

(12) 2 पक्ष – 1 मास

(13) 2 मास – 1 ऋतु

(14) 6 मास – 1 अयन (उत्तरायण और दक्षिणायन इसके दो भेद है।)

(15) 2 अयन – 1 वर्ष

(14) विशेषताएं

भारतीय कालगणना का वैशिष्टय यह है कि यह उस काल तत्व पर आधारित है जो सारे ब्रहमाण्ड को व्याप्त करता है। इस कारण यह विश्व की अन्य कालगणनाओं की भांति किसी घटना विशेष, व्यक्ति विशेष, पर आधारित किसी देश विशेष की कालगणना नहीं है। अपितु नक्षत्रों की कालगणना पर आधारित यह कालगणना समस्त ब्रहमाण्ड की उत्पत्ति एवं पृथ्वी पर सृष्टि चक्र के प्रारंभ को इंगित करती है और इसी कारण यह कालगणना वैज्ञानिक एवं वैश्विक है। अतः व्यक्ति विशेष, घटना विशेष, जाति विशेष अथव देश विशेष से संबंधित ने होने के कारण इसे सृष्ट्य्ाब्द या कल्पाब्द के नाम से जाना जाता है।

साभार- अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना

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