>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


कश्मीरियत के नाम पर कश्मीर आंदोलन की वास्तविकता

Posted: 23 Oct 2010 09:29 AM PDT

शीतल राजपूत

क्या है कश्मीरियत जिसके नाम पर कश्मीर के अलगावादी आंदोलन चला रहे हैं ? क्या कश्मीरियत वास्तव में कश्मीरी आज़ादी आंदोलन के लिए है ?

किसी आंदोलन का आधार क्या है? पहचान की एक संयुक्त बुनियाद, सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषायी या पारंपरिक समता की नींव। लेकिन, अगर कोई जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के बीच इन्हीं आधारों पर (जैसा अलगाववादी कहते हैं-कश्मीर आंदोलन) समानता की बात करता हैं,तो लोगों को बहुत सी गलत सूचनाएं मिलेंगी। दरअसल, ‘कश्मीर’ में अलगाववादी (कश्मीर का मतलब सिर्फ कश्मीर,जिसमें जम्मू,लद्दाख का हिस्सा शामिल नहीं होता) कश्मीरियत की बात करते हैं,और इसे ही अपने आजादी के आंदोलन का आधार बताते हैं।

लेकिन,इस मसले पर आगे बात करने से पहले यह जानना जरुरी है कि कश्मीरियत का मतलब क्या है? दरअसल, महाराष्ट्रवाद,पंजाबवाद और तमिलवाद की तरह कश्मीरियत भी एक छोटे से हिस्से के लोगों की साझी सामाजिक जागरुकता और साझा सांस्कृतिक मूल्य है। अलगाववादियों और कश्मीर के स्वंयभू रक्षकों के मुताबिक कश्मीर घाटी में रहने वाले हिन्दू और मुसलमानों की यह साझा विरासत है। लेकिन, सचाई ये है कि जम्मू,लद्दाख और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के पूरे हिस्से और घाटी के बीच कोई सांस्कृतिक समानता नहीं है। तर्क के आधार पर फिर यह कश्मीरियत से मेल नहीं खाता। दरअसल, सचाई ये है कि जम्मू और कश्मीर की संस्कृति में कई भाषाओं और पंरपराओं को मेल है, और कश्मीरियत इसकी विशाल सांस्कृतिक धरोहर का छोटा सा हिस्सा है।

अक्सर, खासकर हाल के वक्त में, अलगाववादी नेता या महबूबा मुफ्ती को हमने कई बार मुजफ्फराबाद, दूसरे शब्दों में सीमा पार के कश्मीर, की तरफ मार्च का आह्वान करते सुना है। लेकिन, हकीकत ये है कि इस पार और उस पार के कश्मीर में कोई सांस्कृतिक, भाषायी और पारंपरिक समानता नहीं है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में रहने वाले मुस्लिम समुदाय का बड़ा तबका रिवाज और संस्कृति के हिसाब से उत्तरी पंजाब और जम्मू के लोगों के ज्यादा निकट है। जिनमें अब्बासी, मलिक, अंसारी, मुगल, गुज्जर, जाट, राजपूत, कुरैशी और पश्तून जैसी जातियां शामिल हैं। संयोगवश में इनमें से कई जातियां पीओके में भी हैं। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के अधिकृत भाषा उर्दु है, लेकिन ये केवल कुछ लोग ही बोलते हैं। वहां ज्यादातर लोग पहाड़ी बोलते हैं,जिसका कश्मीर से वास्ता नहीं है। पहाड़ी वास्तव में डोगरी से काफी मिलती जुलती है। पहाड़ी और डोगरी भाषाएं जम्मू के कई हिस्से में बोली जाती है।

हकीकत में, दोनों तरफ के कश्मीर में सिर्फ एक समानता है। वो है धर्म की। दोनों तरफ बड़ी तादाद में मुस्लिम रहते हैं। तो क्या यह पूरी कवायद, पूरा उबाल धार्मिक वजह से है? इसका मतलब कश्मीरियत की आवाज,जो अक्सर कश्मीर की आज़ादी का नारा बुलंद करने वाले लगाते हैं,वो महज एक सांप्रदायिक आंदोलन का छद्म आवरण यानी ढकने के लिए है। और अगर ये सांप्रदायिक नहीं है, तो क्यों कश्मीरियत की साझा विरासत का अहम हिस्सा पांच लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडित इस विचार के साथ नहीं हैं, और दर दर की ठोकर खा रहे हैं। विडंबना ये है कि भाषा,रहन-सहन-खान पान और सांस्कृतिक नज़रिए से कश्मीरियत की विचारधारा में जो लोग साझा रुप में भागीदार हैं,वो कश्मीरी पंडित ही अब घाटी से दूर हैं।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर हैं )

कश्मीर की आवाज , मादरे-वतन हिन्दुस्तान जिंदाबाद ! जिंदाबाद !

Posted: 23 Oct 2010 08:33 AM PDT

कश्मीर समस्या पर जब कहीं भी चर्चा होती है तो आम तौर पर कुछ देशद्रोही तत्व इसे इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं मानों यह इस्लाम से जुडा हुआ मुद्दा है और देश के मुसलमान कश्मीर को एक पृथक राज्य के रूप में देखना चाहते हैं | यही नहीं ऐसे लोग खुलेआम अपनी बातों में कश्मीर को एक अलग देश के रूप में पेश करते हैं | हालिया महीनों में कश्मीर की धरती पर जो अराजकता और देशद्रोही गतिविधियाँ चल रही हैं वहां के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की गैर -जिम्मेदाराना बयान से अलगाववादियों की ताकत और बढ़ गयी है | बावजूद इसके कि इन मुट्ठीभर लोगों को पाकिस्तान -चीन समेत भारतवर्ष के अंदरूनी गद्दारों का समर्थन हासिल है , कश्मीर में लाखों लोग इनकी मुखालफत को तैयार हैं | देश भर के तमाम मुस्लिम संगठनों का राष्ट्रहित में बयान आ रहा है | हल ही में भारत के सबसे प्रभावशाली इस्लामिक संगठन दारुल उलूम ने कश्मीर को देश का अभिन्न अंग बताया था | प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान अब्दुल रहीम बस्तावी ने कहा ” भारत एक फूलों का गुलदस्ता है और हम अपने गुलदस्ते में से एक भी फूल को अलग करने का सोच भी नहीं सकते हैं ” इसी कड़ी को आगे बढाते हुए अनेक मुस्लिम संगठनों की ओर से देश भर में कश्मीर की सही आवाज़ पहुंचाने का काम किया जा रहा है ताकि बाजारू मीडिया के द्वारा फैलाए गये भ्रम का सच आम जनता तक पहुँच सके |

शुक्रवार 22 अक्तूबर को दिल्ली के मालवंकर हॉल में ” कश्मीर की आवाज ” नाम से एक परिचर्चा का आयोजन फोरम फॉर नेशनल सिक्युरिटी , मुस्लिम राष्ट्रीय मंच , जम्मू कश्मीर पीपल्स फोरम ,जम्मू-कश्मीर विचार मंच ,भारतीय ग्रामीण परिषद् ,दिल्ली स्टडी ग्रुप और हिमालयन बुद्धिस्ट कल्चरल एसोसिएसन ने मिलकर किया | कश्मीर की आवाज़ देश के हुक्मरानों तक पहुँचाने के लिए कश्मीर से सैकड़ों युवाओं को साथ लेकर दर्जन भर कश्मीरी नेता , बुद्धिजीवी और पत्रकार आये हुए थे |

सभा को सबसे पहले संबोधित करते हुए जम्मू -कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने कहा ” मैं पूछता हूँ कि यदि जम्मू-कश्मीर में सुप्रीम कोर्ट का न्याय नहीं रहेगा तो वहां के आवाम को ज्यादा अच्छा इन्साफ मिलेगा या बुरा इन्साफ ? अगर चुनाव आयोग वहां नहीं होगा तो क्या आप अपने मत से अपनी सरकार चुन पाएंगे ? “

गुर्जर यूनाईटेड काउन्सिल के अध्यक्ष चौधरी कमर रब्बानी ने कहा कि ” कश्मीर में भाईचारा पसंद लोग रहते हैं और इसका उदाहरण है पिछले लोकसभा चुनाव में दौसा से मुझे तीन लाख वोट मिलना जबकि वहां 90 प्रतिशत गैर-मुस्लिम आबादी हैं | लेकिन संसार के स्वर्ग को चंद पाकिस्तानी टुकड़ों पर पलने वाले लोग इस्लाम के नाम पर ,मुसलमान के नाम पर , जहन्नुम बनाया जा रहा है | कश्मीर में गुर्जरों की आबादी पैंतीस लाख है , ये गुर्जर हिन्दू भी हैं ,सिख भी हैं , और मुसलमान भी अगर ये एक हो गये तो कश्मीर में लाख दो लाख देशद्रोहियों की साजिश कुचल दी जाएगी | मेरे भाई ने देश की राह में अपने जान की क़ुरबानी दी है और हम भी मरते दम तक मादरेवतन हिन्दुस्तान के लिए लड़ेंगे | अमर अब्दुल्ला का बयान बेहद गैरजिम्मेदाराना है | हम मर जायेंगे मिट जायेंगे , भारत के साथ जिए हैं और भारत के साथ मरेंगे | “

सभा में बीच-बीच में मादरे वतन हिन्दुस्तान जिंदाबाद के नारे लगते रहे | सभा को कश्मीर की आवाज़सुनते हुए डोडा विचार मंच के अध्यक्ष और युवा नेता इश्तियाक अहमद वानी ने अपने भाषण का आरम्भ करते हुए कहा कि मैं फक्र महसूस करता हूँ कि मैं मजबूत हिन्दुस्तान का बाशिंदा हूँ | वो जमाना भी आया था जब कश्मीर में नारे लगे थे और हमने सुना था – पाकिस्तान से रिश्ता क्या है ला इलाही लिल्लाह | मैं उन लोगों से पूछता हूँ कि मजबूत भारत में नहीं तो क्या नागे मुलुक पाकिस्तान में रहोगे ? जहाँ कल तक मस्जिदों में कुरआन लेकर जाते थे आज बम लेकर जाते हैं | सारे संसार को यह बताना चाहता हूँ कि अगर सबसे ज्यादा अमन-चैन से मुसलमान कहीं जी रहा है तो हमारे मुल्क हिन्दुस्तान में | अगर दुनिया में सबसे ज्यादा मस्जिद है तो वो हमारे मुल्क हिन्दुस्तान में | अगर सबसे ज्यादा अमन पसंद लोग मिलेंगे तो वो हमारे हिन्दू भाई हैं फ़िर क्यों जाना पाकिस्तान ? उमर अब्दुल्ला जब ये कहता है कि साहब कश्मीर अभी तक हिन्दुस्तान का नहीं है तो मैं पूछता हूँ तुम्हारी तीन पीढियां गुजर गयी देश बेच कर खाते -खाते | पूरे देश से सैकड़ों जवानों की शहादत इस कश्मीर को बचाने में हुई है | और अब कह रहे हो कि कश्मीर भारत का नहीं है ! आज भी पूरा खानदान भारत सरकार के पैसों पर ऐश कर रहा है | और ये सैयद शाह गिलानी हमारे बुजुर्ग हैं लेकिन इनकी कारिस्तानी कौन नहीं जानता ? इन्हें आज़ादी चाहिए , इनको पाकिस्तान जाना है , लेकिन आज तलक भारत सरकार के पेंशन से जी रहे हैं | गौरतलब है कि ये पेंशन इनको जम्मू-कश्मीर विधानसभा के सदस्य रहने के आवाज में दिया जा रहा हैं |

सभा में कई वक्ताओं ने कश्मीर और कश्मीरियत की सही तस्वीर देश के सामने रखी और उम्मीद जताई कि ये आवाज़ देश के हुक्मरानों तलक एक दिन सांसद में भी गूंजेगी | कश्मीर घाटी से लेकर जम्मू , लेह-लद्दाख तक फैले अनेक जाति-पंथ-भाषा के दर्जनों भारतीय बुद्धिजीवी और नेता जम्मू कश्मीर का प्रतिनधि स्वर ” कश्मीर भारत का था है और रहेगा ” सभा के अंत में गूंजा |

सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्षा दरख्शां आन्द्राबी ने कश्मीर के हालात के लिए केंद्र की सरकार को आड़े हाथों लिया |  आन्द्राबी ने कहा कि जब केंद्र से प्रतिनिधिमंडल भेजा गया तो वो भी उन ह्गिलानी जैसे देशद्रोहियों और नेताओं के तलवे चाटने गये | कोई भी कश्मीर की आम आवाम से मिलने क्यों नहीं गया ? किसने कश्मीर की जनता का प्रतिनिधि इन गिलानी जैसे लोगों को बनाया इसी केंद्र सरकार ने जो इनको आज दिल्ली में खुलेआम सभा करने की अनुमति देती है और उस सभा में भारत विरोधी नारे लगाये जाते हैं | आज कश्मीर का बेटा बेकार ,बेरोजगार हैं उन्हें काम चाहिए , उन्हें रोटी चाहिए | ये केंद्र और अब्दुल्ला सरकार की नाकामी है कि चंद पाकिस्तान्परस्त मुसलमानों के बहकावे में कश्मीर के कुछ गुमराह नौजवान पत्थरबाजी को तैयार हैं |

इस कार्यक्रम में जम्मू – कश्मीर गुज्जर बकरवाल सोसाइटी के अध्यक्ष श्री खालिद भट्टी, नेशनल एसटी डेवलपमेंट कोंसिल के श्री गुलाम अली, शिया सो. ऑफ कश्मीर के अध्यक्ष मकबूल अहमद मलिक, अरुण कुमार खोचर, वरिष्ट पत्रकार श्री सतीश विमल, के अलावा श्रीमती दरखशा आन्द्रबी, जस्टिस विनोद कुमार गुप्ता, श्री जगमोहन जी, चौ. कमर रब्बानी अली, श्री सईद मक़सूद पत्रकार, श्रीमती खालिदा बेगम, हाजी सरदार मो. खटाना, श्री इश्तियाक अहमद वाणी, श्री फैयज अहमद भट्ट, श्री नजीर अहमद मीर, श्रीमती नजमा हेपतुल्ला, श्री आरिफ मोहम्मद खां, के अलावा कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे.

क्‍या हुकूमत ए हिंदुस्‍तान संजीदा है कश्‍मीर पर

Posted: 22 Oct 2010 11:21 PM PDT

सर्वविदित है कि कश्‍मीर के सियासी और सामाजिक हालात विगत कुछ महीनों से बेहद खराब बने रहे। हॉंलाकि अब वादी ए कश्‍मीर में स्‍कूल-कॉलिज खुल चुके हैं और दहकती हुई कश्‍मीर घाटी में सर्द शीतल हवा के पुरसुकून झोंके बहने लगे हैं। ये स्थिति केवल ऐसे कश्‍मीरी आवाम की पहल पर कायम हो सकी है, जिनके बच्‍चों के स्‍कूल कालिजों की पढाई लिखाई महीनों से तबाह बरबाद होती रही। कश्‍मीर में बेहतर स्थिति के निमार्ण के लिए उमर अब्‍दुल्‍ला हुकूमत का प्रयास किंचित भी कामयाब नहीं हो सका। ऐसी नाका़रा जालिम हुकूमत जो युवाओं की पथ्‍थरबाजी का जवाब महीनों तक गोली बारी से देती रही। और कश्‍मीर की हुकूमत में साझीदार और केंद्रीय हुकूमत में विराजमान कॉंग्रेस पार्टी उमर अब्‍दुल्‍ला की नौजवानों से निपटने की बर्बर वहशियाना रणनीति की हिमायत करती रही। जेहादी आतंकवादियों के समकक्ष वतनपरस्‍त किंतु सत्‍ता व्‍यस्‍था से नाराज युवाओं को रखने की समझ को वहशियाना बर्बरता नहीं तो और फिर क्‍या कहा जाए। गोली का जवाब यकी़नन गोली ही है किंतु गुस्‍से में फेंके गए पथ्‍‍थरों का समुचित शासकीय उत्‍तर ऑंसू गैस, लाठी चार्ज और हवाई फायरिंग होता है न कि किसी नौजवानों के सीने में गोली ठोंक देना। तकरीबन 110 नौजवान सुरक्षा बलों की फा‍यरिंग में हलाक़ कर दिए गए। कश्‍मीर बेहद क्रोधित हो उठा है। यह शांति तूफान आने से पहले की शांति प्रतीत होती है। तमाम घटना क्रम को देखते हुए यही प्रतीत होता है कि केंद्रीय सरकार का कश्‍मीर के प्रश्‍न को हल करने के कतई गंभीर नहीं है।
कश्‍मीर के प्रश्‍न को हल करने की खातिर हुकूमत ए हिंदुस्‍तान ने एक वार्ताकारों के दल के गठन किया गया। कश्‍मीर वार्ताकारों का यह दल एक वर्ष त‍क कश्‍मीर के विभिन्‍न संगठनों के साथ बातचीत करके कश्‍मीर समस्‍या कोई सर्वमान्‍य हल निकालने का कोशिश करेगा। इस दल में प्रख्‍यात पत्रकार दिलीप पंडगांवकर, जामिया मीलिया की प्रोफेसर मैडम राधा कुमार एवं सूचना आयुक्‍त एम एम अंसारी को शामिल किया गया है । इस प्रकार एक पत्रकार, एक प्राफेसर और एक ब्‍यूरोक्रेट की वार्ताकार त्रिमूर्ति तशकील की गई। ऐतिहासिक तौर पर नज़र डाले तो पं0 जवाहरलाल नेहरू ने कश्‍मीर के लिए वार्ताकार के रूप में लाल बहादुर शास्‍त्री जैसे शख्‍स का इंतखाब किया। नरसिम्‍मा राव ने राजेश पायलट और जार्ज फर्नाडीज़ सरीखे असरदार राजनेताओं को कश्‍मीर मसअले के हल के लिए वार्ताकार मुकर्रर किया। कश्‍मीर के सवाल पर फौरी तौर पर सकारात्‍मक हल निकाले गए। अब जो वार्ताकार चुने गए गए है वे राजनीतिक तौर पर ताकतवर नहीं है उनको लेकर कश्‍मीर के लोग संजीदा नहीं है।
इससे पहले भी सन् 2007 कश्‍मीर में ऑटानामी के प्रश्‍न पर एक प्राइम मिनिस्‍टर कोर कमेटी का गठन किया गया, जिसकी सदारत जस्टिस सगीर अहमद को दी गई थी। इस कमेटी में कश्‍मीर में विद्यमान प्राय: सभी दलों के प्रतिनिधियों को शा‍मिल किया गया। कश्‍मीर ऑटोनामी के प्रश्‍न पर पीएम कोर कमेटी का जो हश्र हुआ यह तथ्‍य तो अब जग जाहिर हो चुका है। पीएम कोर कमेटी की केवल तीन बैठक आयेजित की गई और कमेटी किसी आम रॉय पर पॅहुचने में नाकाम रही। आखिर में जस्टिस सगीर अहमद ने मनमाने तौर पर कमेटी सदस्‍यों के दस्‍तख़त के बिना ही अपनी रिर्पोट प्रधानमंत्री महोदय को सौंपने के स्‍थान पर वजीर ए आला कश्‍मीर जनाब उमर अब्‍दुल्‍ला को सौंप दी।
जस्टिस सगीर अहमद की ऑटानोमी रिर्पोट पर क्‍या कार्यवाही अंजाम दी गई, सरकारी तौर कुछ अभी तक बताया नहीं गया। जहॉ तक अनुमान है इसे भी सरकारी कमीशनों की रिर्पोट्स की तर्ज पर सरकार के ठंडे बस्‍ते में डाल दिया गया।
कश्‍मीर के प्रश्‍न पर अब एक नई सरकारी वार्ताकार कमेटी अस्‍तीत्‍व में आ गई, जिसे हुकूमत ए हिंदुस्‍तान के गृहमंत्री महोदय ने तशकील किया। सभी जानते हैं कि एक सासंदों का एक सर्वदलीय दल कश्‍मीर के दौरे पर गया था जिसने अपनी रिर्पोट्स सरकार को पेश कर दी। हॉंलाकि यह कोई सर्वसम्‍मत रिर्पोट नहीं हो सकती थी, क्‍योंकि विभिन्‍न दलों की कश्‍मीर मसअले पर मुखतलिफ राय रही है। अत: वही सब अंतरविरोध सांसदों की रिर्पोट्स में भी प्रतिबिंबित हुए। कश्‍मीर के प्रश्‍न पर रणनीतिक तौर पर देश के सभी दलों में विभिन्‍न विचार रहे, किंतु सभी राष्‍ट्रीय दल इस बात पर पूर्णत: सहमत हैं कि संपूर्ण कश्‍मीर भारत का अटूट अंग है। कश्‍मीर को लेकर वर्तमान केंद्रीय सरकार कितनी कम संजीदा है, यह तो इस कटु तथ्‍य से साबित हो जाता है कि वजीर ए आला उमर अब्‍दुल्‍ला के खतरनाक भटके हुए बयान के बावजूद कि जम्‍मू-कश्‍मीर का भारत में मर्जर नहीं एक्‍सैशन हुआ है, केंद्रीय सरकार ने उसे कंडम नहीं किया, वरन् बहुत बेशर्मी के साथ उसके नेता बचाव में उतर आए। कश्‍मीर में सेना से स्‍पेशल पावर छीनने के प्रश्‍न पर भी केंद्र सरकार उहापोह में प्रतीत होती है। जबकि केंद्र सरकार के बडे़ ओहदेदार इस तथ्‍य से भली भॉंति परिचित हैं कि कश्‍मीर को जेहादी आतंकवाद से निजा़त दिलाने का दुरूह कार्य भारतीय सेना के अफसरों और जवानों के असीम बलिदानों से ही मुमकिन हुआ है। कश्‍मीर में कथित जे़हाद अपनी आखिरी सॉंसें ले रहा है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ सेना के कारण ही। कश्‍मीर के गद्दार पृथकतावादी तत्‍व पेट्रोडालर के बलबूते पर अफरातफरी के हालत को तशकील करने की जोरदार कोशिश अंजाम दे रहे हैं। ऐसे सभी तत्‍वों पर लगाम कसने के विषय पर नेशनल कॉंफ्रेंस और नेशनल कॉंग्रेस की संविद सरकार दृढ़प्रतिज्ञ नहीं रही, वरन् इन तत्‍वों को कश्‍मीर के नौजवानों को बरगलाने और पथ्‍थर बाजी के लिए उत्‍तेजित करने का भरपूर अवसर प्रदान किया। इस तमाम निरंतर बिगड़ते हुए हालत पर केंद्र सरकार महज़ तमाशबीन बनी रही। विगत चार माह से कश्‍मीर में अकसर कर्फ्यू नाफ़ीज़ रहा । कश्‍मीर घाटी में ऐसा नजा़रा विगत दस वर्षो से कभी नहीं दिखाई दिया। गुलामनबी सरकार के अमरनाथ श्राइन को जमीन प्रदान करने के विरूद्ध हुए आंदोलन में कदाचित ऐसे बदतर हालात पेश नहीं आए। केंद्र सरकार का निकम्‍मापन हर कदम पर जाहिर होता रहा है। कश्‍मीर ऐसा राज्‍य कदाचित नहीं है कि केंद्र सरकार कानून व्‍यवस्‍था का सारा मामला राज्‍य सरकार के जिम्‍मे छोड़कर निश्चिंत हो जाए। जैसा रवैया मनमोहन सरकार ने कश्‍मीर पर अपनाया है वह देश की अखंडता और एकता के लिए अत्‍यंत दुर्भाग्‍यपूर्ण है। इसे तत्‍काल बदला जाना चाहिए।
केंद्र सरकार का पाकिस्‍तान के हुकमरानों की नीयत पर अधिक भरोसा करके चलना कश्‍मीर के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है। उच्‍चस्‍थ खुफि़या सूत्रों के अनुसार पाक अधिकृत कश्‍मीर में जेहादी आतंकादी प्रशिक्षण शिवरों को बाकायदा आईएसआई संचालित कर रही है। अमेरिका की कूटनीति भारत के लिए छलावा सिद्ध हो सकती है। अफ़ग़ान युद्ध के कारण अमेरिका के पास पाकिस्‍तान पर भरोसा करने और उसको सहयोगी बनाने के अतिरिक्‍त कोई चारा नहीं है, अत: वह पाकि़स्‍तान की हिमायत के लिए विवश है। जे़हादी आतंकवादियों ने अभी कश्‍मीर में पराजय स्‍वीकार नहीं की है, वे एक और बडे़ आक्रमण की जोरदार तैयारियों में जुटे हैं। केंद्रीय सरकार को अपने कश्‍मीर को संभालना है और संवारना है। संपूर्ण जम्‍मू-कश्‍मीर की तरक्‍की में, कश्‍मीरी नौजवानों के रोजगार में और कश्‍मीरी दस्‍तकारों की खुशहाली में तथा सरकारी अमले की ईमानदारी में ही जेहादी आतंकवाद की मुकम्‍मल शिकस्‍त निहित है। भारतीय सुरक्षा बलों को अपनी गोलियां जे‍हादियों पर बरसानी हैं। केंद्रीय हुकूमत में यदि जरा सी संजीदगी शेष है तो युवाओं पर गोली बारी का प्रहार करने वाली गद्दाराना बयानबाजी करने वाले वजीर ए आला उमर सरकार को तुरंत बर्खास्‍त करके, वह अपनी सदाशयता का परिचय दे, अन्‍यथा केंद्रीय हुकूमत द्वारा चाहे जितनी भी सरकारी कमेटियां क्‍यों ना बना दी जाएं, वे सभी नाका़म बेकार साबित होगीं।
प्रभात कुमार रॉय
पूर्व प्रशासनिक अधिकारी

”कविता का दौर खत्म हुआ लेकिन आज भी कविता सबसे अधिक लिखी जा रही है ”-युवा उपन्यासकार अशोक जमनानी

Posted: 22 Oct 2010 09:22 PM PDT

लोग कहते हैं कविता का दौर  खत्म  हो गया है,कथा की तूती बोलती है,उपन्यास गढ़ने और पढ़ने का वक्त कम ही मिलता है.आप क्या कहेंगे?
अशोक
आपने एक प्रश्न में कई प्रश्न पूछ लिए चलिए सबसे पहले बात करते हैं कविता की। मेरे विचार से कविता का दौर खत्म हुआ ये कहना ठीक नहीं होगा। अच्छी कविता  आयेगी तो वो पढ़ी भी जायेगी और सराही भी जायेगी। एक  बात यह भी है कि हम कहते तो हैं कि कविता का दौर खत्म  हुआ लेकिन आज भी कविता सबसे अधिक लिखी जा रही है  और वो लोग भी लिख रहे हैं जो साहित्य की दूसरी विधाओं  से जुड़े हुए हैं। मेरी छवि उपन्यासकार की है पर मैं भी कविता लिखने से स्वयं को रोक नहीं पाता। दूसरी बात है कथा की तूती बोलने की तो मेरा मानना यह है कि अब भी कहानियां  कविताओं से कम ही लिखी जा रही हैं। हां! ये बात ज़रूर है  कि कहानियां साहित्यिक बिरादरी और एक हद तक पाठकों  का ध्यान आकर्षित करने में अधिक सफल रही हैं। फिर आपने पूछा है उपन्यास के बारे में। जहां तक उपन्यास पढ़े जाने की बात है तो मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूँ कि उपन्यास आज भी पढ़े जा रहे हैं। मेरे पहले उपन्यास ‘को अहम्’ के चार संस्करण आ चुके हैं। बात वही है चाहे कविता हो या उपन्यास यदि वे कुछ दे सकते हैं तो स्वीकार किए जाएंगे अन्यथा तो जो हश्र हो रहा है वो आपके सामने ही है। रही बात उपन्यास गढ़ने की तो यह बात पूर्णतया सत्य है कि उपन्यास लेखन बहुत अधिक समर्पण की मांग करता है और उपन्यास लेखन में समर्पण की कमी कृति को बहुत अधिक नुकसान पहुंचाती हैं।

साहित्य संस्कृति के क्षेत्र में राजनीति और धड़ेबाजी को लेकर आपके विचार
आपका यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। पहले बात राजनीति की। बहुचर्चित व्यंग्यकार स्व. हरिशंकर परसाई ने कहा कि वो राजनीति पर इतना अधिक इसलिए लिखते हैं क्योंकि राजनीति अब हर क्षेत्र में निर्णायक ताकत हो गयी है। आप ही देखिए अब इस बात तक का निर्धारण राजनीति कर रही है कि हमारी चाय में शक्कर होगी भी या नहीं ऐसी स्थिति में यह कहना कि साहित्य और संस्कृति राजनीति से अछूते रह जाएंगे शायद अपने आप को धोखा देने वाली बात होगी। जब तक राजनीति हर क्षेत्र की निर्णायक ताकत है तब तक वो साहित्य और संस्कृति को भी प्रभावित करती ही रहेगी। और विसंगति भी तो यही है कि कहने को जनतंत्र है पर निर्णायक शक्ति आज भी जन के पास न होकर राजनीति के पास है। दूसरी बात है धड़ेबाजी की यह भी एक विसंगति ही है कि हमने एक ऐसी व्यवस्था विकसित की है जो व्यक्ति से अधिक समूह को स्वीकृत करती है। एक व्यक्ति अपना ज़ायज काम लेकर व्यवस्था से जुड़े किसी व्यक्ति के पास जाये तो उसकी बात षायद न सुनी जाये लेकिन वही बात जब समूह लेकर जाता है तो व्यवस्था सक्रिय हो जाती है। इसीलिए समाज के हर वर्ग ने अपने समूह बना रक्खे हैं। साहित्य में भी कई समूह या धड़े हैं जो अपने विचारों और हितों को लेकर टकराते रहते हैं। वैसे मैं समूहों का विरोधी नहीं हूँ पर जब समूह गिरोह बन जाते हैं तो खतरनाक हो जाते हैं।

समाज  में आज भी साहित्य बदलाव लाने का बड़ा साधन बन सकता है,मध्य प्रदेश के परिदृश्य में ये कितना सही लगता है?
जो स्थिति पूरे देश की है थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ वही स्थिति मध्य प्रदेश की भी है। साहित्य बदलाव के लिए प्रेरक शक्ति बन सकता है पर क्या समाज भी वो बदलाव चाहता है? हकीकत तो यह है कि आप जिस बदलाव की बात कर रहे हैं वो समाज को ऊंचा उठाने वाला होगा परंतु हमारा समाज तो अपने हित के लिए ऊपर नहीं वरन् नीचे देख रहा है।

साहित्य को लेकर पाठकीयता के ग्राफ पर आप क्या सोचते हैं?,वैसे अभी तक आपके भी तीन उपन्यास व्यास गादी ,बूढ़ी डायरी और को अहम् बाजार में आये,क्या अनुभव रहा ?
यदि हम पुराने दौर से तुलना करेंगे जब टी.वी. जैसे साधन नहीं थे तो हमें लगेगा कि पाठक बहुत कम हो गए हैं। लेकिन आज भी कृति की सामर्थ्य ही पाठक संख्या का निर्धारण करती है। मैं आपको बता ही चुका हूं कि मेरी कृतियों को बहुत पाठक मिले और मेरे पहले ही उपन्यास के चार संस्करण आ चुके हैं।

साहित्य-संस्कृति के झमेले में अपनी शुरुआत से आज तक के सफर पर कुछ कहना चाहेंगे ?
आप साहित्य और संस्कृति को झमेला कह सकते हैं। पर अब तो यह झमेला ही मुझे वो ऊर्जा प्रदान करता है जो न केवल मेरी रचनात्मकता के लिए आवश्यक है बल्कि जीवन के शेष संघर्ष के लिए भी बहुत ज़रूरी है।

देशभर में छपने छपाने का दौर है,पढ़ने की आदत बुढ़ा रही है,मगर लोगों का लेखन जवान हो रहा है,बहुत  ज्यादा और अपरिपक्व ……..क्या लगता है ?
आपने प्रश्न में उत्तर मिला दिये। अपरिपक्व और अधिक लेखन शायद रचनाधर्मिता में बाधक हो सकता है। स्पिक मैके के संस्थापक डॉ. किरण सेठ से एक बार मैंने कहा था कि आप नए कलाकारों को कम अवसर क्यों देते हैं। तब उन्होंने कहा था कि हमें नयी पीढ़ी को शास्त्रीय संगीत से जोड़ना है। यदि हमने उनके सामने कच्चे फल परोस दिए तो शास्त्रीय संगीत से जुड़ने के स्थान पर वो उससे और अधिक दूर हो जायेंगे। हमें तो ऐसे फल परोसने हैं जिनमें अधिकतम रस हो और वो रस अपने श्रोताओं को देने की सामर्थ्य भी हो। यदि नए कलाकारों में यह सामर्थ्य है तो उन्हें अवश्य अवसर मिलना चाहिए। यही बात साहित्य पर भी लागू होती है अपरिपक्व लेखन कई बार पाठकों को साहित्य से दूर भी कर देता है। वैसे मैं चाहता हूं कि युवा लेखक सामने आयें पर यह भी चाहता हूं कि वे अपना निष्पक्ष मूल्यांकन भी करें।

मीडिया के बढ़ते हुए  मनमानीकरण और ठीक ठाक स्तर पर आ जाने से लघु पत्रिकाओं और ब्लॉगिंग जगत से क्या आस लगाई जा सकती  हैं ?
मीडिया की मनमानी मीडिया की साख को बहुत नीचे गिरा ही चुकी है। कहां तो लगता था कि मीडिया के कारण बहुत बड़ा बदलाव आयेगा और कहां यह स्थिति जिसमें ऐसी ताकत की तलाश है जो मीडिया की कमियों को दूर कर सके। लघु पत्रिकाएं और ब्लागिंग तेजी से बढ़ तो रही हैं पर अब भी इनकी पहुंच सीमित है। मुझे लगता है कि इनका प्रसार भी बढे़गा और निश्चित रूप से ये उनकी भी बात करेंगी जो मीडिया की टी. आर. पी. से भिन्न हैं।

सत्य,भावना,आदर्श,ईमानदारी,सादगी अहिंसा और स्वाभिमान जैसे गुणों की बात अब बेमानी लगती है….गहराते उपभोक्तावादी दृष्टिकोण पर क्या अनुभव करते हैं ?
ये हमारे शाश्वत् मूल्य हैं ये कभी बेमानी नहीं होंगे। वैसे कई ताकतें हैं जो चाहतीं हैं कि ये सब कुछ बेमानी हो जाये तो मनुष्य के मनुष्य बने रहने की संभावना भी समाप्त हो जाये।
दूसरी बात है उपभोक्तावाद की। ये बहुत बड़ी बीमारी है और सारी ताकतों को इस बीमारी को और बड़ा करने में ही अपनी सार्थकता नजर आ रही है। क्या हमने सोचा है कि हम कहां पहुंचना चाहते हैं। एक अमेरिकी चौदह भारतीय लोगों के बराबर उपभोग करता है अर्थात जब हम पांच सौ करोड़ की आबादी पर पहुंचेंगे तब जितना उपभोग हम करेंगे उतना उपभोग आज के मात्र पैंतीस करोड़ अमेरिकी कर रहे हैं। क्या हमने सोचा है कि उस स्तर का क्या मूल्य हमें और हमारी प्रकृति को चुकाना पड़ेगा।
उपभोक्तावादी अपसंस्कृति ने हमें बहुत नुकसान पहुंचाया है। भारतीय समाज का सदियों से स्थापित प्रकृति से रिश्ता तो टूट ही रहा है मनुष्य के मनुष्य से  रिश्ते का आधार भी स्वार्थ होता जा रहा है।
पं. माखनलाल चतुर्वेदी की बात याद आती है उन्होंने कहा था- ”कितने संकट के दिन हैं ये। व्यक्ति ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां भूख की बाजार दर बढ़ गयी है, पायी हुई स्वतंत्रता की बाजार दर घट गयी है। पेट के ऊपर हृदय और सिर रखकर चलने वाला भारतीय मानव मानो हृदय और सिर के ऊपर पेट रखकर चल रहा है। खाद्य पदार्थों की बाजार दर बढ़ी हुई है और चरित्र की बाजार दर गिर गयी है।”

आपकी कौनसी रचनाएँ पाठकों के लिए आने वाली हैं ?
मेरा नया उपन्यास छपाक-छपाक संभवतः अगले महीने प्रकाशित हो जायेगा।

कोई ऐसी बात जो छूट गई हो और आप उस पर कुछ कहना चाहते हों.
माणिक काफी कुछ कह चुका हूँ बस एक बात कहना चाहता हूं । सकारात्मक ताकतों की यह ज़िम्मेदारी होती है कि वो नकारात्मक ताकतों को परास्त करें , परंतु अभी तो नकारात्मक ताकतें निश्चिंत हैं क्योंकि वो जानती हैं कि उन्हें परास्त करने वाली सकारात्मक ताकतें आजकल अपनी स्वार्थ सिद्धि और आपसी सिर फुटौवल में मशगूल हैं। मेरा एक शेर है-

अब रहता नहीं है परेशान वो मेरे वज़ूद से
वो जानता है खुद को हूँ मैं कत्ल कर रहा

पता:-अशोकजमनानी,होटलहजूरी होशंगाबाद,मध्यप्रदेश,मो.09425310588

(होशंगाबाद,मध्यप्रदेश के युवा उपन्यासकार अशोक जमनानी जो पिछले सालों अपने तीन उपन्यासों के जरिये साहित्य जगत में चर्चित रहे, से हाल ही में की गई बातचीत )

आपन डफली आपन राग (बिहार विधानसभा चुनाव)

Posted: 22 Oct 2010 06:28 AM PDT

बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार में सभी पार्टियों के नेता अपने-अपने तरीके से अपने पार्टी की बाते जनता के सामने रखी है। आरजेडी सुप्रीमो श्री लालू प्रसाद…. जनता कि सरकार जनता के लिए बनाने कि बात करते है तथा पिछले पंद्रह सालों में जो विकास का काम बिहार में नहीं किये थे वो चुनाव में जितने के बाद विकास करने की बात करते है इसीलिए अपने भाषण में यह बार-बार कह रहे है …. जैसे मैंने भारतीय रेल को चमकाया और दुनियाँ देखती रह गई उसी तरह मै बिहार को चमकाउंगा। शायद लालू जी अपने पिछली गलतियों से तौबा कर लिए है इसीलिए बिहार में विकाश कि बात करते है। “अब पछताना क्या जब चिड़ियाँ चुंग गई खेत” ।

लोजपा सुप्रीमो श्री रामविलास पासवान …. ये भी बिहार में विकाश करने कि बात कहते है साथ ही जनता के बीच अपने दिए गए भाषणों में बहुत सारी उम्मीदे दे रहे है जैसे – पच्चास हजार रुपया हर गरीब व्यक्ति को दिया जायेगा जिसका सूद नहीं लगेगा, हर गरीब व्यक्ति को घर बनाने के लिए आधा डिसमिल जमीन मुफ्त में दिया जायेगा तथा बी ए तक कि पढाई और पुस्तक मुफ्त में दिया जायेगा। इनके भाषण में केवल आश्वाशन ही आश्वाशन है।

जनता दल यू के श्री नितीश कुमार (वर्तमान मुख्यमंत्री बिहार) …. ये केवल बिहार के विकाश कि बात कर रहे है। जनता के बीच अपने दिए भाषणों में पांच साल तक अपने द्वारा किये हुए कामो का मजदूरी (वोट) मांग रहे है। हाँ यह सही है कि ये मजदूरी (वोट) पाने के हकदार है, क्यों कि पूरी तरह बर्बाद बिहार को इन्हों ने आबाद किया है, विकाश कि गाड़ी को पटरी पर ला दिए है अब इसका दौड़ने का समय है और वह अगला पांच साल होगा जिसमे विकाश कि गाड़ी दौड़ेगी। इसलिए अगर विकाश कि गाड़ी को दौड़ना है तो नितीश कुमार को मजदूरी (वोट) देनी ही होगी।

भाजपा के श्री सुशिल कुमार मोदी (वर्तमान उप-मुख्यमंत्री बिहार) ……. ये भी बिहार में विकाश कि बात कर रहे है या भजपा के जितने भी नेता बिहार आ रहे है वो जनता के बीच अपने भाषण में केवल विकाश कि बात कहते है, क्यों कि जे डी यू और बीजेपी ने मिल कर इस विकाश कि गाड़ी को आगे बढाया है। इसलिए बीजेपी और जे डी यू ये दोनों पार्टियाँ मजदूरी (वोट) पाने का हक रखती है। इसलिए विकाश कि गाड़ी को दौड़ाने के लिए इनको मजदूरी (वोट) देना ही पड़ेगा।

कांग्रेस पार्टी (वर्तमान में केंद्र कि सत्ता पर आशिन) ….. यह पार्टी भारत कि सबसे पुरानी राजनितिक पार्टी है भारत के बहुत से राज्यों में इसकी सरकार है तथा केंद्र में भी इसी पार्टी का शासन है। इस पार्टी के बड़े से बड़ा नेता अपने भाषणों में विकाश कि कोई बात नहीं कर रहे है ना ही जनता के बीच कोई आश्वाशन दे रहे है ना ही यह बता रहे है कि बिहार कि सत्ता में आने के बाद वह बिहार को किस रास्ते पर ले जायेंगा , चाहे वो कांग्रेस अध्यच्छ श्री मति सोनिया गाँधी हो या उनके पुत्र राहुल गाँधी, प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह या दिल्ली कि मुख्यमंत्री शिला दीक्षित, सचिन पायलट, जायसवाल साहब ये सभी राजनेता मुद्दा विहीन भाषण दे रहे है, अगर इनके पास कोई मुद्दा है तो बस एक मुद्दा है ….. केंद्र के पैसे से बिहार का विकाश हुआ, केंद्र के पैसे को नितीश कुमार अपना पैसा बता रहे है।

लगता है केंद्र अलग है और बिहार अलग है या बिहार भारत का अंग नहीं है। या बिहार का पैसा टैक्स के रूप में केंद्र को नहीं जाता है जो हाय तौबा ये लोग मचाये है। कही यह तो नहीं ….. केंद्र द्वारा दिए हुए पैसे को कांग्रेस अपना पैसा तो नहीं समझ रही है जो कांग्रेस के हर नेता अपने भाषण में पैसे का ही जिक्र कर रहा है।

खैर कुछ भी हो बिहार में विकास तो हुआ है चाहे वह बिहार के पैसे से हुआ हो या केंद्र के पैसे से हुआ हो, क्यों कि आज हर पार्टी के नेता यह स्वीकार कर लिए है कि बिहार में विकास हुआ है। तो क्यों नहीं सभी पार्टियाँ एक साथ मिल कर बिहार में विकास की गाड़ी को और तेज रफ़्तार देने में मदद करे। एक दुसरे का टांग खीचने से राज्य का या देश का विकास नहीं हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है तो उसे और बढ़ावा देना चाहिए ताकि वो और अच्छा काम करे।

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