>उठ जाग रे मुसाफ़िर, गंतव्य दूर तेरा॥

>

॥गंतव्य दूर तेरा॥
उठ जाग रे मुसाफ़िर, अब हो गया सवेरा।
पल पलक खोल प्यारे, अब मिट गया अंधेरा॥ उठ जाग……
प्राची में पो फ़टी है, पर फ़डफ़डाए पंखी।
चह चहचहा रहे है, निशि भर यहाँ बसेरा॥ उठ जाग……
लाली लिए खडी है, उषा तुझे जगाने।
सृष्टी सज़ी क्षणिक सी, अब उठने को है डेरा॥ उठ जाग……
वे उड चले विहंग गण, निज लक्ष साधना से।
आंखों में क्यूं ये तेरी, देती है नींद घेरा॥ उठ जाग……
साथी चले गये है, तूं सो रहा अभी भी।
झट चेत चेत चेतन, प्रमाद बना लूटेरा॥ उठ जाग……
सूरज चढा है साधक, प्रतिबोध दे रहा है।
पाथेय बांध संबल, गंतव्य दूर तेरा॥ उठ जाग……
                               रचनाकार: अज्ञात
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8 Comments

  1. October 25, 2010 at 9:01 am

    >सुंदर प्रस्तुति

  2. arvind said,

    October 25, 2010 at 9:41 am

    >bahut sundar kavita…

  3. Mahak said,

    October 25, 2010 at 11:19 am

    >साथी चले गये है, तूं सो रहा अभी भी।झट चेत चेत चेतन, प्रमाद बना लूटेरा॥बहुत बढ़िया कविता सुज्ञ जी

  4. October 25, 2010 at 12:07 pm

    >नवीन जी,अरविंद जी,महक जी,आभार आपका प्रस्तूति की सराहना के लिए।

  5. October 26, 2010 at 6:57 am

    >बहुत अच्छा !

  6. October 26, 2010 at 8:05 am

    >उर्जा का संचार करती …. लाजवाब गीत …

  7. October 26, 2010 at 12:04 pm

    >very nice post badhai

  8. October 26, 2010 at 12:20 pm

    >योगेंद्र नाथ जी,दिगम्बर नासवा जी,जयकृष्ण राय तुषार जीआभार आप सभी का!


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