>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


बिहार चुनाव के दूसरे चरण में 53 फीसदी मतदान

Posted: 24 Oct 2010 09:49 AM PDT

बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे दौर में 45 सीटों पर लगभग 53 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया | रविवार 24अक्तूबर को दूसरे चरण में बिहार के छह जिले दरभंगा(10 सीटें), सीतामढी (आठ सीटें), समस्तीपुर(10 सीटें), मुज़फ़्फ़रपुर(आठ सीटें), पूर्वी चंपारण(आठ सीटें) और शिवहर(एक सीट) की कुल ४५ विधानसभा क्षेत्रों के लिए जनता ने अपना मत मशीन में बंद कर दिया है | बिहार चुनाव में इस बार भी मतदाताओं की संख्या और मतदान का प्रतिशत आशाजनक है | कहा जाता है कि बिहार राजनीति की सबसे उर्वर जमीन है और इस बात का सबूत यहाँ के मतदान केन्द्रों पर लगी लम्बी कतारों से मिलता है | दूसरे चरण के मतदान में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों सीतामढ़ी और शिवहर में भी मतदाताओं की लंबी क़तारें देखी गईं | एक बात आप सोच रहे होंगे कि जब इतना उत्साह रहता है तो फ़िर मतदान प्रतिशत और अधिक होना चाहिए तो इसका उत्तर पाने के लिए बिहार में रहने वाले मतदाताओं और बिहार से बाहर मतदाताओं के आंकड़ों को समझना होगा | दरअसल बिहार की मतदाता सूची में शामिल प्रवासी बिहारियों में से एक दो प्रतिशत ही मतदान के दौरान वहां जा पाते हैं |

दूसरे चरण में कुल मिलाकर 623 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसलाहोना है जिनमें से केवल 46 महिला उम्मीदवार हैं | जद (यू) ने 28, भाजपा ने 17, राजद ने 34, लोजपा ने 11 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं. वामदलों के कुल मिलाकर 28 उम्मीदवार मैदान में हैं| इस चरण में कई बड़े नेताओं के भाग्य का फ़ैसला हो रहा है | राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता और बिहार प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दीक़ी अलीनगर विधानसभा क्षेत्र से, जनता दल (यू) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी सरायरंजन विधानसभा सीट से, जद (यू) के मंत्री रामनाथ ठाकुर समस्तीपुर से और शाहिद अली ख़ान सुरसंड से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं | गौरतलब है कि प्रथम चरण में 47 सीटों पर हुए मतदान में लगभग 55 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया था। राज्य के 243 सीटों के लिए छह चरणों में 21, 24 और 28 अक्टूबर तथा 1, 9 और 20 नवंबर को मतदान होना है ।

कश्मीर समस्या के लिए मनमोहन और अब्दुल्ला दोषी

Posted: 24 Oct 2010 08:50 AM PDT

कश्मीर की थर्राने वाली सर्दी आ गयी है लेकिन इस बार कश्मीरियों के बदन पर न तो अमृतसरी टवीड के फिरन और न ही ब्लेजर के बने कोट दिखाई दे रहे हैं। क्योंकि पिछले कई महीनों से कश्मीर के हालात जो रहे हैं वैसे में पंजाब क्या देश के किसी कोने से किसी भी तरह का माल अन्दर नहीं आ सका है | समस्या इतनी गहरा गयी है कि अब माल को बनाने वाली ज्यादातर मशीनों की आवाज बंद हो चुकी है और इस वजह से कई बड़े घराने आर्थिक तंगी का शिकार बनते जा रहे हैं।

हर वर्ष करोड़ों रुपए के ट्वीड और बेल्जर के माल पंजाब से कश्मीर की वादी में उतारा जाता रहा है। और हर सितम्बर माह तक माल तैयार कर सप्लाई शुरू हो जाती है, लेकिन तीन महीने से बंद दुकानों के शटरों ने कारोबारियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।

कश्मीर की पाकिस्तान प्रायोजित पत्थरबाजी में 255 टैंकर तोड़े गए, पेट्रोल पम्प तोड़े गए, ड्राईवरों को पीटा गया और इस अफरातफरी में करीब 200 करोड़ रूपए से अधिक का नुक़सान हुआ है.

कश्मीर में कारोबार का ठप हो जाना यूँ हीं नहीं है | दरअसल पाकिस्तान के इशारों पर दहशतगर्दी का जाल बुनने वाले अलगाववादियों ने यह सब एक मनसूबे के तहत किया है | पत्थरबाजी और हिंसक हड़तालों के जरिये महीनों तक दुकाने बंद रहने से कारोबार बंद है | कश्मीर में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है और आवाम असुविधा के आलम में जी रही है | इस तरह के अराजक माहौल में देश तोड़क तत्वों के बहकावे में कश्मीरी नौजवानों के गुमराह होने का खतरा और बढ़ गया है | हालाँकि सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल के कश्मीर दौरे के बाद से हीं मीडिया में यह दिखाया जा रहा था कि अब सब कुछ शांत हो चला है | लेकिन ऐसा नहीं है सैयद शाह गिलानी के जगह-जगह भाषणों से माहौल एक बार फ़िर ख़राब होने लगा है | कश्मीर के युवाओं को हाथों में कलम या औजार थमाया जाए ताकि जो एकाध-लाख गुमराह नौजवान-बच्चे पैसों की लालच में पत्थर फेंकने पर अमादा हो गये हैं वो भारतवर्ष के काम आ सकें | लेकिन अफ़सोस तो ये है कि अलगाववादियों से अधिक कश्मीर की समस्या को वर्तमान में केंद्र और उमर अब्दुल्ला सरकार ने बढाया है | विकास और शिक्षा की बात ना तो अब्दुल्ला कर रहा है और ना हीं केंद्र का मध्यस्थ बना दलालों का प्रतिनिधिमंडल | एक ओर अब्दुल्ला जहाँ कश्मीर-विलय के मुद्दे को कुरेद कर अपनी नाकामियों को छिपाना चाहता है तो वहीँ भारत सरकार की ओर से मध्यस्तता करने गया दिलीप पडगाँवकर ये कह रहा है कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान साथ लेना जरुरी है | ऐसे पकिस्तान्परस्त लोग यदि मध्यस्त बनेंगे तो हो गया फैसले का समाधान ! केंद्र की सोनिया सरकार कश्मीर को पाकिस्तान और ओबामा के बीच का मुद्दा बनाकर फ़िर वही गलती दुहराने जा रही है जो उनके नाना नेहरु ने दशकों पूर्व कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र में ले जाकर किया था | कश्मीर की समस्या अंतर्राष्ट्रीय नहीं है बल्कि विकास के ना होने से उपजी निराशा का विषय है |

क्यों लौट आये अनवांटेड लोग दिल्ली में ?

Posted: 24 Oct 2010 06:19 AM PDT

कॉमनवेल्थ गेम्स खत्म हो गये हैं। दुनिया ने भारत की ताकत को जान लिया है। उन लोगों के मुंह पर ताले लग गये जो भारत को पिछड़ा या कमजोर देश मानते हैं। देश ने भारत की तरक्की के बारे में जान लिया है

ऐसे सैकड़ों नहीं हजारों की तादाद में समाचार पत्रों के हैडिंग्स आपकी निगाहों से गुजरें होंगे। देश के तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी खबरों की आंधी चल रही है। इसके बाद इसकी जांच की खबरों पर भी लोगों की निगाहें टिकी हुई है। लेकिन तथाकथित नेशनल मीडिया की हाल की दो खबरों पढ़ने के बाद लगा कि देश को लेकर आम आदमी और तथाकथित मीडिया के बीच किस तरह की खाई उभर आई है।

देश के सबसे ज्यादा बिकने का दावा करने वाले इन अखबारों में खबरें छपीं कि दिल्ली के अनवांटेड़ लोग लौट आएं हैं। अनवांटेड़ की श्रेणी में शामिल किये गये दिल्ली की सड़कों पर भीख मांगने वाले लाखों की तादाद में ट्रैफिक लाईटों पर सामान बेचकर अपना घर चलाने वाले या फिर ठेली और रोजमर्रा के काम करने वाले मजदूर। इन नेशनल अखबारों ने तो इस बारे में पुलिस को कोसते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस अब इन लोगों के आने पर न रोक लगा रही है न उन पर सख्ती दिखा रही है। दोनों खबरों को अलग-अलग अखबारों ने छापा साथ में रिपोर्टर के नाम भी छापे गये। कॉमनवेल्थ खेल के दौरान कई सौ करोड़ के विज्ञापन भी तथाकथित नेशनल मीडिया को मिले।

ऐसे में तथाकथित नेशनल मीडिया ने बाकी देश से आंखें बंद कर ली। और मीडिया से सच जानने के आदी हो चुके आम आदमी को इस बात का जरा भी अंदेशा नहीं हुआ कि कैसे मीडिया उसको खबरों की दुनिया से अलग कर रहा है। एनसीआर के शहरों में डेंगू के मरीजों के चलते अस्पतालों में भारी भीड़ जमा थी। लेकिन दिल्ली में भी काफी मंहगें प्राईवेट हास्पीटल्स में बेड दिलवाने के लिये सिफारिशों की जरूरत पड़ रही थी। दिल्ली में हर अस्पताल में डेंगू बुखार से पीड़ित मरीजों की भीड़ दिखाईं पड़ रही थीं। लेकिन देश के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे मीडिया को इससे कोई लेना-देना नहीं था। और जहां मीडिया की नजर नहीं है वहां सत्ता में बैठे लोगों की नजर क्यूं कर जाएं। मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद और नौएड़ा के सरकारी अस्पतालों की तो दूर प्राईवेट वार्डस में जाकर देखियें किस तरह से डेंगू एक महामारी में तब्दील हो चुका है। आंकड़ों पर नजर रखने वाले चाहे तो चैक कर सकते है कि कैसे अलग-अलग प्राईवेट अस्पताल ने करोड़ रूपये कमायें। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों की निगाहों में रतौंधी उतर आई थी। और तथाकथित नेशनल मीडिया एडवर्टाईजमेंट की मलाई काट रहा था लिहाजा इस खबर को ही खा गया। मुजफ्फरनगर में कुछ अखबारों में विज्ञापनों पर निगाह पड़ी तो हैरानी हुई कि बाकायदा डॉक्टरों ने एड दिया है कि मरीज अपने फोल्डिंग्स लेकर आएं। डाक्टरों ने मरीजों की भर्ती के लिए धर्मशाला ही बुक करा लीं। हर मरीज से बीस-बीस हजार रूपये पहले ही एडवांस के तौर पर जमा करा लिए गये। लेकिन किसी नेशनल चैनल और अखबार को दिल्ली में ये खबर नजर नहीं आई। कॉमनवेल्थ की विरूदावली गाने के बाद दिल्ली के अखबारों को खबर नजर कि किस तरह से भिखारी और दिहाड़ी मजदूर दिल्ली वापस आ रहे है।

किसी संपादक को ये नहीं लगा कि क्या ये लोग हिंदुस्तानी नहीं है। अगर ये लोग दिल्ली में अनवांटे़ड है तो लखनऊ, जयपुर या फिर इलाहाबाद में कैसे वांटे़ड़ हो सकते है। यदि इन लोगों को रोटी नहीं मिल पा रही है तो इसमें किसका दोष है। कौन सी व्यवस्था है जो लगातार अमीरों को अमीर बना रही है और ज्यादा से ज्यादा आबादी को भूखमरी और अकाल मौत की ओर धकेल रही है। लेकिन तथाकथित नेशनल मीडिया ने छाप दिया कि ये वापस लौट रहे है। क्या अखबार और उनके रिपोर्टर ये इशारा कर रहे है कि इन लोगों को पागलखाने या फिर गैस चैंबरों में भेज दिया जाएं। यदि अखबार और मीडिया ये कर रहा है तो मुझे और कुछ नहीं एक दूसरी चीज याद आ रही है।

बीसवी शताब्दी का नायक कौन है इस बारे में दुनिया सैकड़ों नाम नहीं तो दर्जनों नाम तो ले सकती है। लेकिन शताब्दी का खलनायक कौन है इस बारे में एक ही नाम सामने आयेगा। एडोल्फ हिटलर। जर्मनी के इस तानाशाह से भी दुनिया की नफरत की वजह युद्ध छेड़ना नहीं बल्कि दुनिया से यहूदियों की कौम का नामों-निशान मिटा देने की कोशिश के चलते ज्यादा है। साठ लाख के करीब यहूदियों को नये बने गैस चैंबरों से लेकर फायरिंग स्क्वाड जैसे पारंपरिक तरीकों से मौत के घाट उतार दिया गया। ये बातें इतिहास का हिस्सा हैं। लेकिन जिस बात पर जर्मनी या फिर यूरोप के बाहर की आम जनता ने ध्यान नहीं दिया था वो बात थीं किस तरह से हिटलर इतना ताकतवर हो गया कि एक पूरी कौम या फिर पूरा राष्ट्र उसके पीछे आंखें मूंद कर चलने लगा था। अगर आप लोग उस वक्त के जर्मनी के तथाकथित नेशनल मीडिया को देंखें तो वो जर्मन कौम के अहम को मजबूत करने में लगे थे। हिटलर के कदमों का विरोध करने वालों के गायब होने की खबरें भी मीडिया से गायब हो चुकी थीं।

अब के हालात में ये ही कह सकते है कि हिंदुस्तान में अभी कोई हिटलर तो नहीं है लेकिन उसके चाहने वालों की कमी नहीं है। देश का तथाकथित मीडिया उसके निर्माण में जुट गया है। देश के मौजूदा हालात को देखकर कोई भी सिर्फ यहीं कह सकता है कि ईश्वर ने इस देश को छोड़ दिया है

हाय रे! मनमोहन सरकार दिल्ली में दिया अलगाववादियों को अधिकार

Posted: 24 Oct 2010 04:20 AM PDT

पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों का मनोबल दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है। एक तरह जहां कई महिनों या कहे तो सालों से खुबसुरत कश्मीर की फिजा में जहर घोलने का काम करने वाले ये अलगाववादी नेताओं ने आज सारे हदों को पार करते हुए भारत की राजधानी दिल्ली में मौजूद होकर एक कार्यक्रम में न सिर्फ काश्मीर को भारत से अलग करने की बात कही साथ ही भारत मुर्दाबाद के नारे लगाए। और तो और देशहीत को सर्वोपरी बताने वाली दिल्ली पुलिस उनकी हौसला अफजाई करने में काफी मदद पंहुचा रही थी. साथ ही उनकी सुरक्षा में काफी मुस्तैदी से तैनात थी। हालांकि सुरक्षा में सेंध लग ही गया। कुछ काश्मीरी पंडीतों के बेटों को जब यह पता चला कि उन्हें विस्थापित करने वाले और निर्वास पर मजबूर करने वाले अलगाववादी तत्व दिल्ली की राजधानी में पहुंच चुके हैं। उन्होंने अपना जत्था बनाकर कार्यक्रम में पहले से मौजूद हो गए। कार्यक्रम शुरू हुआ। शैयद अली शाह गिलानी ने काश्मीर को भारत से अलगे करने की बात कही और मौजूद उनके अलगाववादी समर्थक और वामपंथी भारत मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे। फिर क्या था काश्मीरी युवाओं का सब्र का बांध टूट गया उन्होंने फौरन अपना चप्पल जूता निकाला और गिलानी पर फेकने लगे। देखते-देखते दोनों पक्षों में झड़प शुरू हो गई। फिर तो मौजूद शिला और मनमोहन के सिपाही फौरन अंदर आ गए और काश्मीरी युवाओं को घसीट कर बाहर करने लगे। तब एक युवा ने पुलिस वाले से कहां कि कुछ तो शर्म करों तुम सब एक तरफ तुम्हारे भाई जो काश्मीर में इन अलगाववादियों के कारण मारे जा रहे है। उन्हें पत्थरों और सुसाइड बाॅमों का इस्तेमाल कर लहुलुहान किया जा रहा हैं। वही तुम सब हमें इन देश के गद्दरों जो भारत मुर्दाबाद के नारे लगा रहे है को जब हम रोकने आए है तो हमें पीट रहे हो और यहां से घसीट कर बाहर ले जा रहे हो।

कुछ पुलिसवालों ने इसके लिए अपनी लाचारी और केन्द्र सरकार का दबाव बताया। जिससे यही साबित होता है कि यह कठपुतली मनमोहन सरकार किस कदर अलगाववादियों को शह दे रही है। एक तरफ जहां पाकिस्तान, चीन और अरब मुल्क इन्हें फंड और हथियार मुहैया करा रहे है वही दूसरी तरफ मौजूदों हिजड़ों की सरकार इन अलगाववादियों को दिल्ली में भारत का बहिष्कार करने के लिए सुरक्षा प्रदान कर रही है। जबकि मौजूदा सरकार ने कभी ये कोशिश नहीं कि की काश्मीरी पंडितों को वापस काश्मीर कैसे भेजा जाए। साथ ही अमन चैन का माहौल उन्हें प्रदान किया जाए। सरकार को तो इजाजत ही नहीं देनी चाहिए थी उन्हें ऐसे कार्यक्रम आयोजन करने के लिए खासतौर से दिल्ली में। जिससे देश का अपमान करने की बात हो। लेकिन वोट-नोट और मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाले कांग्रेसियों को तो लगता है कि अब देश प्रेम का अर्थ केवल काॅमनवेल्थ कराने मात्र से है। जिसे देश की इज्जत का सवाल बताकर करोड़ो, अरबो की सम्पत्ति बनाई जाती है। वहीं दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली में महत्वपूर्ण स्थान मण्डी हाउस को अलगाववादियों के लिए खुला छोड़ दिया गया जहां वो भारत मुर्दाबाद का नारा लगा सके।

अब ऐसे में सवाल उठता है कि इस झुलसती कश्मीर का क्या होगा। जिस प्रकार सरकार अलगाववादियों को खुली निमंत्रण दे रही है भारत के खिलाफ नारे लगाने के लिए हो सकता है आने वाले कुछ वर्षों में ये मनमोहन सरकार अलगाववादियों से वोट और नोट के लिए अलग कश्मीर देने की मांग स्वीकार कर ले। लेकिन ये सरकार अलगाववादियों को उनके इस जवाब का हिसाब देना ही नहीं चाहती। अगर देना चाहती तो नमूने के तौर पर अफजल-कसाब को कब का लटका दिया होता। कोई हल भी ढूंढने का प्रयास करती नहीं दिखाई देती। अगर चाहती तो कुछ न कुछ ऐसा अनोखा नूसखा निकालती जिससे अलगाववादी भी भाग खड़े होते और काश्मीर समस्या का हल भी सदा के लिए निकल आता। तब पाकिस्तान और चीन को करारा झटका लगता।

जहां तक काश्मीर समस्या का हल की बात करे तो धारा 370 इसमें एक बड़ी रूकावट साबित हो रही है। जिसे जल्द-से-जल्द हटाने का प्रयास किया जाना चाहिए। अगर यह संभव न हो तो केवल बिहार और यूपी के लोगों के लिए धारा 370 हटा दिया जाए। क्योंकि लोहा लोहे को काटता है। और बिहार और यूपी से बड़ा हल आज और कोई नहीं है। एक बार जहां बिहार और यूपी के बाहुबलियों ने काश्मीर में पैठ बनाना शुरू किया। इन अलगाववादी ही क्या पाकिस्तान भी दुम दबाकर भागता फिरता दिखाई देगा। चीन की तो ऐसी बीन बजेगी कि उसके हर घर से एक बिहारी-यूपी का जीन निकलता दिखाई देगा।

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