>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


कश्मीर की कहानी

Posted: 25 Oct 2010 09:40 AM PDT

सालों से कश्मीर की धरती भारत माँ के सपूतों के खून से लाल होती आई है | लाशों की ढेर में ढँक गया है धरती का स्वर्ग | घाटी से करीबन 4 लाख कश्मीरी हिन्दू जिनमें पंडित -सिख-डोगरा आदि समुदाय शामिल हैं , मार-मार कर भगाए जा चुके हैं | अपनी ही जमीं से बेदखल ये भारतवासी अपने ही देश में विस्थापितों का जीवन जी रहे हैं | कभी जम्मू के केम्पों में जाकर देखिये आपकी रूह काँप उठेगी | किस तरह ये लोग किराये की कोठरियों में , सरकारी टीन की छतों वाले दरबों में कबूतरों की भांति जीवन बिता रहे हैं | आज जो कुछ टेलीविजन आप सभी देख रहे हैं वो ऐसे सिक्के का पहलु है जो सिक्का है हीं नहीं | कहने का मतलब है कि जिस प्रकार से मीडिया में कश्मीरी अलगावादियों की आवाज़ को दिखया जा रहा है मानों पूरे कश्मीर की आवाम यही चाहती हो , ये बिलकुल गलत है | कश्मीर घाटी , ” जम्मू और कश्मीर” प्रदेश का एक अत्यंत छोटा सा भाग है जिसकी जनसँख्या तक़रीबन 30 लाख के आस-पास है और उनमें से केवल २-३ लाख लोग हैं जो गिलानी जैसे नेताओं के बहकावे में आकर देश से गद्दारी कर रहे हैं |

आज जब कश्मीर के हालात फिर से सन 90 जैसे हो गये हैं | कश्मीर की घाटियों में आतंकियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि आम नागरिक को छोडिये भारतीय सेना के जवानों पर भी हमले-पर हमले हो रहे हैं | पाकिस्तान से बार-बार सीमा पर गोलीबारी के जरिये आतंकियों को कश्मीर भेजा जाता है ताकि कश्मीर में मौत का तांडव चलता रहे और उसे अमेरिका और अरब से उसको पैसों का पुलिंदा मिलता रहे |

ऐसे में कश्मीर की समस्या को महज आतंरिक मामला समझना भारी भूल होगी | इस समस्या को अच्छे से समझने के लिए और इसकी जद तक जाने के लिए पाकिस्तान के मंसूबों को और उसके इतिहास पर रौशनी डालना जरुरी है |

पाकिस्तान की पैदाइश सन 1947 में भारी खून-खराबे के बीच हुआ है | उस दौर में पाकिस्तानी नेताओं का एक भड़काऊ नारा बहुत मशहूर हुआ था – ” हंस कर लिए है पाकिस्तान , लड़ कर लेंगे हिन्दुस्तान ” | अब ये नारा समय के साथ बदल कर हो गया है – “कश्मीर को आज़ाद करो , भारत को बर्बाद करो “| पाकिस्तान के इस काले मनसूबे में अमेरिकी और खाड़ी देशों के धन और ख़ुफ़िया एजेंसियों ने भरपूर मदद की है | शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए अमेरिकी राजनयिक फिल्प एड्मंस ,स्टीवनसन्स और डॉ फ्रेंक ब्रुकमेन के साथ मिलकर षड्यंत्र किया और कश्मीर में परमिट सिस्टम ,कस्टम ,अलग प्रधान ,अलग निशान और अलग संविधान तथा धारा 370 लागू करवाया | तत्कालीन समय में ऐसे हालात पैदा हो गये कि भारत का एक और विभाजन होने का पाकिस्तानी ख्वाब पूरा होता दिखने लगा | लेकिन देशभक्तों ने कश्मीर में आंदोलन शुरू कर दिया | 5 हजार से अधिक देशभक्तों को अब्दुल्ला सरकार ने जेलों में बंद कर भयंकर यातनाएं दी | 22लोग तिरंगे की रक्षा करते हुए शहीद हो गये | परमिट कानून को तोड़ने का दृढ निश्चय कर जब शहीद श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर की सीमा में प्रवेश किया तो उनको तुरंत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया | श्यामा प्रसाद मुखर्जी के भारत के पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेई भी थे जिनको गिरफ्तारी से पहले ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने वापस भेजते हुए कहा था – जाओ और दुनिया को जाकर बता दो कि मैंने परमिट कानून को तोड़ कर कश्मीर में प्रवेश कर लिया है | देश के दुर्भाग्य से परमिट कानून को तोड़ने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जेल में हीं साजिश के तहत मार दिया गया | इस घटना ने देश भर को झकझोर कर रख दिया तब कहीं जाकर नेहरु सरकार की नींद टूटी और सन ५३ में शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया गया | कश्मीर में नया सवेरा हुआ ,परमिट सिस्टम टूटा ,भारतीय संविधान लागू हुआ और जम्मू-कश्मीर में तिरंगा लहराने लगा | हालाँकि तब भी नेहरु सरकार ने मूर्खता करते हुए जम्मू-कश्मीर में दो संविधान ,दो निशान और धारा 370 जैसे प्रावधान को रहने दिया जो आज भारत के नाम का नासूर बन गया है |

इस घटना से मुंह की खाई पाकिस्तानी और कश्मीर के चंद अलगाववादी नेताओं ने अलग तरीके से साजिश की तैयारी शुरू कर दी | ३३ सालों की तैयारी के बाद कह्स्मिर की घाटी में एक बार फ़िर पाकिस्तान समर्थित अलगाववादियों ने इस्लाम के नाम पर कहर बरपाना शुरू कर दिया | घाटी में मंदिरों को तोड़ दिया गया ,हिन्दुओं के घर जलाए गये जिससे लोगों में आतंक का माहौल पैदा हो गया | और तभी से आतंकवाद की शुरुआत जम्मू-कश्मीर में हो गया | कश्मीर में इतना कुछ हो जाने पर भी जब केंद्र की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तब आतंकियों को यह लगने लगा कि अब कह्स्मिर में इस्लाम के नाम पर हिंसा फैला कर भारत को तोड़ा जा सकता है | पाकिस्तानी हुकूमत तो यहाँ तक सपने देखने लगी कि कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाकर अपनी सामरिक स्थिति मजबूत की जा सकती है और भारत की गर्दन पर चढ़ कर एक दिन भारत को गुलाम बनाया जा सकता है | सन 89 तक आते-आते कश्मीर घाटी से कश्मीरी हिन्दुओं को मार भगाया गया | कश्मीर में ना तो एक हिन्दू बचा और ना हीं कोई मंदिर | देशभर में इस घटना को लेकर राष्ट्रवादी तत्वों का दबाव सरकार पर बढ़ने लगा तब तत्कालीन राज्यपाल कृष्णराव को वापस बुला लिया गया और उनकी जगह जगमोहन को राज्यपाल बना कर भेजा गया | जगमोहन ने सख्ती से कश्मीर में चल रहे कुचक्र को कुचल दिया | हालाँकि अलगाववादियों ने यह सोचा था कि घाटी को हिन्दुविहीं कर इस्लाम के नाम पर सारे कश्मीरियों को पाकिस्तान में मिलने के लिए राजी कर लिया जायेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं | कश्मीर की बहुसंख्यक आवाम तब भी और आज भी भारत के साथ जीना और मरना चाहती है |

(सभी तथ्य कश्मीर पर मेरी मित्र मंडली की परिचर्चा पर आधारित हैं)

बेवफा

Posted: 25 Oct 2010 08:27 AM PDT

बेवफा

एकता, जो कल तक तक आकाश के साथ अक्सर दिखाई देती थी, आज वह बिल्कुल अकेली और उदास नज़र आती है. कारण भी तो बहुत ख़ास और दुखद है, कुछ दिनों पहले आकाश की  एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी… भरी जवानी में बेचारे की मौत का सदमा बर्दाश्त करना एकता के बस में ना था.. एकता और आकाश एक दूसरे को दिलो-जाँ से चाहते थे.. प्यार की हद तक दोनों ने एक दुसरे को चाहा, साथ जीने मरने की कसमें तक खाईं दोनों ने, पर होनी को कौन टाल सकता है…

वो चला गया मुझको यूँ तन्हा छोड़ कर

के क्या होगा अब मेरा बस उसके बगैर…

मेरी जिंदगी का हर लम्हा उसके प्यार में था जी रहा,

अब क्या क्या मिलेगा मुझे, यूँ तन्हा जी कर…

शायद कुछ ऐसा ही कह रही थी अब एकता की आँखें… आज एकता पूरी तरह से टूट चुकी थी, के जैसे किसी फूलदार डाली के सारे फूल हवा के किसी तेज झोंके ने बिखेर दिए (तोड़ दिए) हों..

कल तक एकता को अपने आकाश पर बहुत नाज़ था, और क्यों ना हो क्योंकि आकाश था भी इसका हकदार… अगर कोई लड़की एक आदर्श प्रेमी की चाहत करे तो आकाश का नाम सबसे ऊपर गिना जायेगा… और इसी कारण एकता – आकाश की जोड़ी भी आदर्श जोड़ी कही जाती थी पूरे कॉलेज में… पर ये समय न कभी किसी का हुआ है और न ही कभी किसी का होगा…”, – कुछ ऐसा ही फ़साना बयाँ कर रही थी आज अनीता की आँखें मयूर से.

मयूरअनीता का Best Friend है और अनीताएकता की Best Friend.. एकता एक 19 साल की सुन्दर लड़की थी… कमर तक आते उसके बाल, सुन्दर कद – काठी, देखते ही सब का मन मोह ले… इधर अनीता भी दिखने में बिल्कुल एकता की ही तरह, पर थोड़ी मोटी पर सुन्दर लड़की थी… और मयूर सीधा साधा, दुबला पतला, सांवला सा, पर उच्च विचारों वाला लड़का था…

आज अनीता और मयूर, एकता को जब भी देखते तो उनका मन भी उसके दुःख में रो पड़ते थे. मयूर, जो दिल ही दिल में एकता को पसंद करता था, से एकता का दर्द नहीं सहा जाता था… वो चाहता था की एकता की जिंदगी में फिर से रंग भरने चाहिए पर कैसे वो ये नहीं जानता था… वो ये बात उससे कहना चाहता था  पर कभी कह न सका, क्योंकि उसके मन में एक शंका थी कि “वो एक खुद्दार लड़का है, और ये बात एकता भी अच्छी तरह से जानती है, तो कहीं अगर उसने एकता या अनीता से इस बारे में बोला तो वो ये ना सोचे कि मयूर उस पर बस दया कर रहा है…” बस इसी शंका के कारण वो कभी एकता से अपने प्यार का इज़हार न कर सका.. मयूरएकता को किसी और की बाहों में तो देख सकता था, पर कभी उसे किसी गलत इंसान की बाहों में नहीं देख सकता था… और न ही वो उसे खुद को ठुकराते हुए देख सकता था, इसी कारण वो हमेशा ही चुप रहा… बस वो इतना चाहता था की एकता की जिंदगी फिर से रंगीन हो जाए और कोई आकाश की ही तरह का लड़का फिर उसकी जिंदगी में आ जाए, ताकि उसे आकाश की कमी कभी महसूस ही न हो…

बस इसी इंतज़ार में पूरा एक साल गुजर गया…

रंजीत जो कि दिखने में Handsome और Nature wise बहुत ही अच्छा लड़का था, पर उसमे बहुत सी खामियां भी थी, जैसे कि Cigarette, शराब इत्यादि, वो भी एकता को पसंद करता था… उसकी बुरी आदतों के बारे में एकता क्या सारे कॉलेज को पता था.  और एक दिन कॉलेज के 2nd year ख़त्म होने के कुछ दिन पहले, रंजीत ने एकता से अपने प्यार का इज़हार कर दिया…

ये वही दिन था जिस दिन “आकाश” की मौत को पूरा एक साल हो गया था… इससे भी बड़ी आश्चर्य की बात तो तब हुई जब एकता ने सब कुछ जानते हुए भी रंजीत को “हाँ” कह दिया… और उसी दिन एकता और रंजीत दोनों अपने प्यार का जश्न मनाने long drive पर गए…

ये बात तब मयूर को पता ही न थी, पर जब पता चला तो उसे बिल्कुल विश्वास भी ना हुआ.. यूँ ही कॉलेज का 2nd year भी गुजर गया… मयूरएकता का रंजीत को “हाँ” कहना सह ना सका, सारी गर्मी कि छुट्टियाँ उन्ही दोनों के बारे में सोचता रहा… आखिर गर्मी की छुट्टियाँ जब ख़त्म हुईं, तब सभी दोस्त एक बार फिर कॉलेज में मिले… तब एक दिन दोस्तों कि महफ़िल में मयूर के मुँह से निकल ही गया – “आखिर वही हुआ जो मैंने सुना था पर कभी विश्वास ही ना किया, कि लड़कियाँ कभी किसी का इंतज़ार नहीं करतीं औरएकता ने भी वही किया..”

इस पर अनीता ने गुस्से में मयूर से कहा, “तो क्या हुआ मयूर ? आखिर कब तक वो उसका इंतज़ार करती जो कभी लौट के आ ही नहीं सकता ?”                   तब मयूर ने कहा, “मैंने कब कहा कि वो इंतज़ार करे, पर जो भी करे कम से कम सही तो करे, मैं ये नहीं कहता कि उसने कुछ गलत किया, पर कुछ सही भी नहीं किया उसने…”

अनीता – “तो तुम्हारी नज़र में क्या सही है ?”

मयूर – “उसने कुछ गलत नहीं किया, पर उसका चुनाव गलत था.”

अनीता – “OK मयूर, तो तुमको क्या लगता है कि वो तुमको चुनती ?”

मयूर (हँसते हुए) – “अपनी ऐसी किस्मत कहाँ ? अरे हम तो बस वो हैं जिसे किसी ने देखा ही नहीं और जिसने देखा उसने पहचाना ही नहीं…”

इस पर सारे दोस्त हंस पड़े.

थोड़ी देर बाद अनीता ने फिर मयूर से कहा, “देखो मयूर, लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं. कोई किसी का इंतज़ार नहीं करती… क्योंकि तुमको भी पता है कि एकता को सहारे कि जरूरत थी, अब जब रंजीत ने आगे बढ़कर उसे सहारा दिया तो तुम एकता को गलत क्यों कह रहे हो ?”

तब मयूर ने कुछ न कहा, और चुपचाप सुनता रहा… तभी Claas room में कोई Teacher आ गए, और उनकी महफ़िल यूँ ही ख़त्म हो गई… पर उस दिन घर जाने से पहले अनीता ने मयूर से फिर पुछा, “तुमने कोई जवाब क्यों नहीं दिया ?”, तब मयूर बोला, “इसका जवाब मैं कॉलेज के last में दूँगा, I mean आखिरी exam के दिन…” ये कह कर वो वहाँ से चल दिया…

यूँ ही कॉलेज का ये साल भी गुजर गया पर मयूर ने आखिरी exam के दिन भी अनीता से कुछ न कहा… उसे याद था पर वो कह न सका… उसने अनीता के पूछने पर बस इतना ही कहा, “अनीता, मेरी ये बात हमेशा याद रखना कि मैं नहीं जानता कि एकता कैसी लड़की है, पर मैं बस इतना जनता हूँ कि जो आकाश की ना हो सकी वो किसी की नहीं हो सकती”. ये बात पहले तो अनीता की समझ में न आई और वो सोचती रही की मयूर उससे क्या कह गया.. और उसने वो मयूर से इस पर कुछ बोलना चाहा तो उसने देखा कि मयूर वहाँ से जा चूका है…

अब कॉलेज बंद हो चुके थे… करीब एक महीने बाद, रंजीत ने, जो कि एकता के प्यार में पूरी तरह से सुधर चूका था और अपनी सारी बुरी आदतें छोड़ चूका था, अनीता को call किया और उसे बताया कि एकता ने उसे किसी दुसरे लड़के के लिए छोड़ दिया… शुरू में तो अनीता को भी विश्वास न हुआ, पर बाद में जब उसे सच्चाई पता चली तो उसे मयूर की वही बात याद आई जो उसने उससे कॉलेज के आखिरी दिन कही थी… और मयूर के द्वारा कही गयी एक कविता भी याद आई उसे, जिसके बोल थे –

मैंने तुमको क्या समझा और क्या निकले तुम ?

दुनिया ने माँगी थी तुमसे वफ़ा, पर बेवफा निकले तुम…

किसी ने प्यार में दे दी तुम्हारे जाँ,

और उससे सच्चा प्यार भी ना कर सके तुम…

किसी ने बदल के खुद को हो गया तुम पर कुर्बान,

और किसी पे एतबार भी ना कर सके तुम…

मैंने तुमको क्या समझा, और क्या निकले तुम ?

जिसने की तुमसे वफ़ा, बस उसी के लिए बेवफा निकले तुम…

बदलाव

Posted: 25 Oct 2010 08:22 AM PDT

सदियों से चला आ रहा चलन अब चाल बदल रहा है. औरत और मर्द जो घर की गाड़ी खींचने वाले दो पहिये है, जहां मर्द की जिम्मेवारी बाहर जाकर कमा कर लाना और औरत घर के अंदर अपने परिवार की देखरेख में लगी रहती है, यह सिर्फ किस्सों की हकीकत बनता जा रहा है. अब वक्त ने चाल बदली है और पासे भी पलट रहे हैं. घर की गैरत अब चौखट के बाहर अपना पांव फैलाकर अपने अस्तित्व की पहचान पा रही है.

पश्चिम देशों में आम चलन है, सभी औरतें मर्दों जैसे कपड़े पहने, सुबह सवेरे घर से निकल कर काम पर चली जाती है और कइयों के मर्द जो रात की ड्यूटी से घर लौटते हैं दिन तमाम घर की चारदीवारी में बस जाते हैं. ज़माना बदला है और साथ उसके बदले हैं रँग, ढंग और सोच भी. जो औरत एक ज़माने में घूँघट ओढ़े मर्द के पीछे पीछे पर्दा पोश होकर चलती थी, वही आज कंधे से कंधा मिलाकर चल पड़ी है, अक्सर ऐसा भी भी होता है कि वह अपनी रफ्तार बढ़ाकर आगे निकल जाती है.

काम करना, अपने व्यक्तित्व को उजगार करना, इसमें कोई बुराई नहीं है. बुराई तब उपजती है जब औरत हो या मर्द अपनी मर्यादा को लाँघकर दायरों को पार कर जाते है, जिनके कारण रिश्तों के बँधन ढीले हो जाते है. विश्वास अविश्वास में बदलने लगता है, तो लर्जिश घरों तक महसूस होती है.

रिश्ते तो विश्वास में पलते हैं दौलत से नहीं

किसलिये दिल टूटते, क्यों टूटती फिर शादियां.

यहां मैं घर को बांधने में, उसको बनाये रखने में, उसे एक आदर्श मुकाम पर लाने की जिम्मेदारी एक औरत पर होनी चाहिये ऐसा मानती हूं. यह असान काम नहीं और न ही किसी अग्नी‍‍..परीक्षा से कम. सहयोग मर्द का बहुत जरूरी भी है और लाज़िमी भी. पर जिम्मेदारी का बोझ औरत के ममतामयी काँधों पर होता है और होना भी चाहिये. औरत एक माँ भी है, बहन, बीवी, सख़ा सहेली भी. हर रिश्ते को बखूबी निभा पाती है वह, हर रूप में सर्व शक्तीमान है और सबल भी, यही अहसास इस शेर में व्यक्त हुए हैं.

ये है पहचान एक औरत की

मां, बहन, बीवी, बेटी या देवी.

इस बदलते हुए ज़माने में बदलाव को आना है, आये, तब्दीलियों आती हैं आयें, दुश्वारियां बढ़ती है, बेशक बढ़े, पर हौसलों को कमज़ोर न पढ़ने दें, और उन्हीं मज़बूत इरादों से दुश्वारियों की चट्टानों को चीरकर, आसानियों की राह पर कदम रखें, बदलाव को आलिंगन में भरकर अपने जीवन का हिस्सा बनालें.  इमारत का स्वरूप बदले कोई ग़म नहीं, रँग रौगन से उसे सुंदर जामा पहनायें कुछ गलत नहीं, पर उस इमारत की नींव की जड़ों के साथ छेड़ा खानी न करें.  निस्वार्थ सच से उन्हें सींचते रहें.फिर देखिये हरी भरी नन्हीं पत्तियों के अंकुर फिज़ाओं में कैसे ताज़गी फैलायेंगे, अंधेरों को चीरकर उजाले की नई किरण जीवन को एक नया मतलब अता करेगी. यही बदलाव है.

देवी नागरानी, १५ जून २००9

शायद डर गए हैं राहुल गाँधी ?

Posted: 25 Oct 2010 08:12 AM PDT

आखिर राहुल- महिमामंडन में कांग्रेस पार्टी इस प्रकार क्यूँ जुटी है ?  क्या कांग्रेस को यह डर हो गया है कि राहुल कि लोकप्रियता में जबरदस्त कमी आयी है | मिशन 2014  कि तैयारी  को लेकर कांग्रेस के लिए इसे एक गहरा झटका माना जा सकता है|  जिस राहुल को देश के अगले भविष्य के रूप में कांग्रेस पार्टी प्रचारित कर रही है, उसके लिए यह एक सदमे वाली बात हो सकती है| दिल्ली विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविदयालय और हिमाचल विश्वविदालय के चुनाव में मिली हर से कांग्रेस पार्टी तिलमिला उठी| जिस राहुल को युवाओं के सम्राट के तौर पे मीडिया और कांग्रेस पार्टी खुद आगे दिखा रही थी उसके लिए ये हार एक तमाचे कि तरह थी| राहुल कि स्थिति सिर्फ भीड़ खीचने तक ही सीमित रहने लगी युवाओं का भी मोहभंग उनसे होता जा रहा है | युवा कांग्रेस में किस प्रकार भ्रष्टाचार हो रहा है यह किसी से छुपा नहीं है| अब कांग्रेस के ही एक प्रवक्ता ने राहुल कि तुलना जयप्रकाश नारायण से कर दी और कह डाला कि राहुल में वह सारे गुण हैं जो जेपी में थे | अजीब ही हास्यास्पद बात है कि एक ऐसे व्यक्ति से साथ ऐसे कि तुलना कि जा रही है जिसमे कोई तालमेल ही नहीं है| जेपी तो देश कि जनता के नब्ज़ को पहचानते  थे , जमीन से जुड़े हुए लोग थे, जन-जन के नायक थे वे| क्या राहुल को यह सारे सम्मान प्राप्त हैं, क्या राहुल को देश कि आम जनता से सरोकार है, क्या राहुल जनता के नब्ज़ को पहचानते हैं| यह राहुल को शायद ही प्राप्त हो, जेपी ने अपने लिए नहीं बल्कि आम लोगों के लिए संघर्ष  किया था , लेकिन राहुल तो खुद का रास्ता तलाशने कि कोशिश कर रहे हैं| आखिर ऐसे किसी से तुलना करने के पहले सोचने कि एक अदब जरूरत है| राहुल गाँधी को प्रचारित और प्रसारित करने का एक ही पहलु मुझे नजर आता है कि कांग्रेस अपने युवराज को लेकर चिंतित है| गुजरातमें डर से ही राहुल कि सभा नहीं कराई जाती कि हार का ठीका किसके सर फोड़ेंगे, क्यूंकि जनता वहां कि समझदार है और कांग्रेस को मौका ही नहीं दे रही, विकास  को मौका दे रही है| मुझे राहुल गाँधी से कोई चिड नहीं है लेकिन मुझे उनके दो तरह के चेहरे से नफरत है | वो छात्रों को राजनीति में आने  को कह रहे हैं, लेकिन क्या वे उनकी रोजी रोटी कि भी कोई बात करते हैं| इस मुद्ददे पे वे गौण हो जाते हैं, जब उनसे देश में व्याप्त स्थिति पे प्रश्न किया जाता है तो वो अपनी सरकार का बखूबी बचाव करते हैं लेकिन अपनी चोरी को नहीं छिपा पाते| सिर्फ गोल  मटोल  जवाब देने से और आह्वाहन करने से जनता कि समस्या नहीं दूर हो सकती| लेकिन अब कौन समझाए ऐसे लोगों को जिनको अपनी महिमंदन ही प्रिय है| शायद राहुल को आभाष हो गया है कि मेरी बात अब सिर्फ मीडिया में जगह पाती है जनता तो कभी गौर से सुनती ही नहीं थी| राहुल को लगे हाथ एक बात कहना चाहूँगा कि दो मुह वाली सांप कि तरह व्यवाहंर न करें और सही भारत को पहचाने|

पूर्ण-विलय के उपरांत जनमत संग्रह का औचित्य

Posted: 25 Oct 2010 07:31 AM PDT

जम्मू-कश्मीर में आत्मनिर्णय या जनमत संग्रह कराने की मांग का कहीं कोई औचित्य नहीं है। ये मांगें किसी भी प्रकार से न तो संवैधानिक हैं और न ही मानवाधिकार की परिधि में ही कहे जाएंगे। अलगाववादियों द्वारा इस विषय को मानवाधिकार से जोड़ना केवल एक नाटक भर है। क्योंकि इससे विश्व बिरादरी का ध्यान ज्यादा आसानी से आकृष्ट किया जा सकेगा। यह सारा वितंडावाद विशुद्ध रूप से कश्मीर को हड़पने के लिए पाकिस्तानी नीति का ही एक हिस्सा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत आगमन से पूर्व पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गतिविधियों में यकायक बढ़ोतरी हुई है। यहाँ तक कि कश्मीर घाटी के अलगाववादी संगठन और उसके नेता भी ज्यादा सक्रिय दिखने लगे हैं। अलगाववादी हुर्रियत नेता गिलानी का नई दिल्ली में “आजादी ही एक मात्र रास्ता” विषयक सेमीनार में शिरकत करना विश्व बिरादरी का ध्यान आकृष्ट कराने के अभियान का ही एक हिस्सा है। सेमीनार की खास बात यह रही कि इसमें कश्मीरी अलगाववाद के समर्थक कई जाने-माने बुद्धिजीवी भी भारत के खिलाफ जहर उगलने के लिए उपस्थित थे। सेमीनार में गिलानी के बोलने से पहले ही उनके सामने कुछ राष्ट्रवादी युवकों ने जूता उछाल दिया। इससे भारी शोर-शराबा हुआ, जिसको देखते हुए सेमीनार बीच में ही रोकना पड़ा। इस कारण से अलगाववादियों की सारी सोची-समझी रणनीति धरी की धरी रह गई।

ओबामा की भारत यात्रा के मद्देनजर पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी रणनीतिक दृष्टि से अमेरिका में थे। यहां पर कुरैशी ने अमेरिका से कश्मीर मसले के समाधान के लिए भारत-पाकिस्तान के बीच दखल देने का अनुरोध किया। लेकिन अमेरिका ने पाकिस्तान के अनुरोध को सुनने से ही इन्कार कर दिया। अमेरिका का कहना है कि कश्मीर मसला दो देशों के बीच का मामला है। इसलिए दोनों देशों के बीच में दखल देना या मध्यस्थता करना उसके लिए संभव नहीं है। इस तरह से अमेरिका ने कश्मीर मसले पर भारत के रुख का ही समर्थन किया है।

जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में पाकिस्तान समर्थित अलगाववादियों की मांगे विशुद्ध रूप से भारत के एक और विभाजन की पक्षधर हैं। आत्मनिर्णय के अधिकार या जनमत संग्रह और मानवाधिकार की बड़ी-बड़ी बातें तो अलगाववादियों का महज मुखौटा भर है। क्योंकि जम्मू-कश्मीर का “सशर्त विलय” नहीं बल्कि “पूर्ण विलय” हुआ है। जम्मू-कश्मीर रियासत के तत्कालीन महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को एक विलय पत्र पर हस्ताक्षर करके उसे भारत सरकार के पास भेज दिया था। 27 अक्टूबर 1947 को भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन द्वारा इस विलय पत्र को उसी रूप में तुरन्त स्वीकार कर लिया गया था। यहाँ इस बात का विशेष महत्व है कि महाराजा हरिसिंह का यह विलय पत्र भारत की शेष 560 रियासतों से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं था और इसमें कोई पूर्व शर्त भी नहीं रखी गई थी।

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देशहित को अनदेखा करते हुए इस विलय को राज्य की जनता के निर्णय के साथ जोड़ने की घोषणा करके अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की। इस हेतु 26 नवंबर 1949 को संविधानसभा में अनुच्छेद-370 का प्रावधान रखा गया, जिसके कारण इस राज्य को विशेष दर्जा प्राप्त हुआ। विशेष बात यह है कि राज्य को अपना संविधान रखने की अनुमति दी गई। भारतीय संसद के कानून लागू करने वाले अधिकारों को इस राज्य के प्रति सीमित किया गया, जिसके अनुसार, भारतीय संसद द्वारा पारित कोई भी कानून राज्य की विधानसभा की पुष्टि के बिना यहां लागू नहीं किया जा सकता। इन्हीं सब कारणों से उस दौर के केंद्रीय विधि मंत्री डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने इस अनुच्छेद को देशहित में न मानते हुए इसके प्रति अपनी असहमति जताई थी। संविधान सभा के कई वरिष्ठ सदस्यों के विरोध के बावजूद नेहरू जी ने हस्तक्षेप कर इसे अस्थाई बताते हुए और शीघ्र समाप्त करने का आश्वासन देकर पारित करा लिया।

हम सब जानते हैं कि भारत का संविधान केवल एक नागरिकता को मान्यता प्रदान करता है लेकिन जम्मू-कश्मीर के नागरिकों की नागरिकता दोहरी है। वे भारत के नागरिक हैं और जम्मू-कश्मीर के भी। इस देश में दो विधान व दो निशान होने का प्रमुख कारण यह कथित अनुच्छेद है। सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि 17 नवबंर 1956 को जम्मू-कश्मीर की जनता द्वारा विधिवत चुनी गई संविधान सभा ने इस विलय की पुष्टि कर दी। इसके बावजूद भी यह विवाद आज तक समाप्त नहीं हो सका है।

तत्कालीन कांग्रेस नेताओं की अदूरदर्शिता का परिणाम आज हमारे सामने है कि महाराजा द्वारा किए गए बिना किसी पूर्व शर्त के विलय को भी शेख की हठधर्मिता के आगे झुकते हुए केन्द्र सरकार द्वारा ‘जनमत संग्रह’ या ‘आत्मनिर्णय’ जैसे उपक्रमों की घोषणा से महाराजा के विलय पत्र का अपमान तो किया ही साथ-साथ स्वतंत्रता अधिनियम का भी खुलकर उल्लघंन हुआ है। इस स्वतंत्रता अधिनियम के अनुसार, राज्यों की जनता को आत्मनिर्णय का अधिकार न देते हुए केवल राज्यों के राजाओं को ही विलय के अधिकार दिए गए थे।

ये बातें एकदम सिद्ध हो चुकी हैं कि 63 वर्षों बाद भी यदि जम्मू-कश्मीर राज्य की समस्या का समाधान नहीं हो सका है तो इसके जिम्मेदार कांग्रेसी राजनेता हैं। नेहरू का कश्मीर से विशेष लगाव होना, शेख अब्दुल्ला के प्रति अत्यधिक प्रेम और महाराजा हरिसिंह के प्रति द्वेषपूर्ण व्यवहार ही ऐसे बिंदु थे, जिसके कारण कश्मीर समस्या एक नासूर बनकर समय-समय पर अत्यधिक पीड़ा देती रही है, उसी तरह समस्या के समाधान में अनुच्छेद-370 भी जनाक्रोश का विषय बनती रही है।

इस विघटनकारी अनुच्छेद को समाप्त करने की मांग देश के बुद्धिजीवियों और राष्ट्रवादियों द्वारा बराबर की जाती रही है। दूसरी ओर पंथनिरपेक्षता की आड़ में मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले इसे हटाए जाने का विरोध करते रहे हैं। अस्थाई रूप से जोड़ा गया यह अनुच्छेद-370 गत 61 वर्षों में अपनी जड़ें गहरी जमा चुकी है। इसे समाप्त करना ही देशहित में होगा, नहीं तो देश का एक और विभाजन तय है।

अलगाववाद को शह दे रही है कांग्रेस

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में अलगाववाद का समर्थन करते हुए जो बयान दिया था, वास्तव में उस बयान के बाद उनको मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का कोई लोकतांत्रिक और नैतिक अधिकार नहीं रह गया है। उमर ने कहा था- “जम्मू-कश्मीर का पूर्ण विलय नहीं बल्कि सशर्त विलय हुआ है। इसलिए इस क्षेत्र को भारत का अविभाज्य अंग कहना उचित नहीं है। यह मसला बिना पाकिस्तान के हल नहीं किया जा सकता है।”

उमर के इस प्रकार के बयान से वहां की सरकार और अलगाववादियों में कोई अंतर नहीं रह गया है। जो मांगे अलगाववादी कर रहे हैं, उन्हीं मांगों को राज्य सरकार के मुखिया उमर भी दुहरा रहे हैं। आखिर, सैयद अली शाह गिलानी व मीरवाइज उमर फारूख सहित अन्य अलगाववादी नेताओं और राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला में क्या फर्क बचा है ?

यदि उमर अब्दुल्ला अलगाववादी भाषा बोलने के बाद भी राज्य के मुख्यमंत्री बने हुए हैं, तो इसकी प्रत्यक्ष जिम्मेदार कांग्रेस है। क्योंकि कांग्रेस के समर्थन से ही अब्दुल्ला सरकार टिकी हुई है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि जम्मू-कश्मीर मसले पर बातचीत के लिए केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त वार्ताकार भी उमर अब्दुल्ला की ही तरह अलगाववादी भाषा बोल रहे हैं। यानी उमर अब्दुल्ला, कांग्रेस, वार्ताकारों और राज्य के अलगाववादियों के विचार एक हैं। चारो अलगाववाद के समर्थन में हैं।

कांग्रेस भी अलगाववादियों के सुर में सुर मिला रही है। यह चिन्तनीय है। अब यह प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस भी पंडित नेहरू के ही नक्शे-कदम पर चल पड़ी है ? सभी जानते हैं कि स्वतंत्रता के तत्काल बाद कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी आक्रमण के दौरान कश्मीर की जीती हुई लड़ाई को संयुक्त राष्ट्र में ले जाकर पंडित नेहरू ने ऐतिहासिक भूल की थी। ठीक उसी प्रकार की भूल कांग्रेस भी कर रही है। इतिहास गवाह है कि यदि पंडित नेहरू कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में नहीं ले गए होते तो आज अपने पूरे जम्मू-कश्मीर पर भारत का ध्वज फहराता और ‘पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर’ का कहीं कोई नामोनिशान नहीं होता।

कौन हूँ मैं!

Posted: 24 Oct 2010 09:44 PM PDT

कोकिल जितना घायल होता

उतनी मधुर कुहुक देता है

जितना धुंधवाता है चंदन

उतनी अधिक महक देता है

मैने खुद को ना जाना था,ना पहचाना था,

कौन हूँ ,क्या हूँ कैसी हूँ ,कहाँ हूँ ………

प़र तेरे प्रेम ने बताया कौन हूँ मैं!

तूने ही तो तराशे अंग-प्रत्यंग

तूने ही सुनी मेरी मधुर धुन

जगाया मेरा सौन्दर्य अपार

साधारण नार से एक दैवीय अप्सरा

पांवों की थिरकन में भर दिया जादू

नैनो कि चितवन जो कर दे बेकाबू

मैं तो केवल तन ही तन थी

जब तक ना मन को जाना था

मैं तो केवल बांस ही रहती

जो होठो से तेरे बंसी बन ना लगती

मैं तो बस एक तरु ही होती ,

जो तू चन्दन सा ना महकाता

डॉ.शालिनिअगम

मैं तो केवल तन ही तन था मुझमें जागे मन के पहले

जैसे सिर्फ बांस का टुकड़ा है बंसी-वादन के पहले

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