>सपेरों का ब्लाग संसार

>

फिरते कितने खेलबाज, यहां झोले रंगाकार लिए।

द्वेषों के है सांप छाब में, क्रोधों की फुफकार लिए।
हाथ उनके टिपण-पात्र है, सिक्कों की झनकार लिए।
परपीड़न का मनोरंजन है, बैचेनी बदकार लिए॥
महाभयंकर नागराज अब, मानव के अनुकूल हुए।
एक नई फुफकार के खातिर, दर्शक भी व्याकुल हुए।
सम्वेदना के फ़ूल ही क्या, भाव सभी बस शूल हुए।
क्या राही क्या दुकानदार सब, खेल में मशगूल हुए॥

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नोट:-प्रस्तूत रचनाएँ मेरे ‘सुज्ञ’ ब्लाग से पुनः प्रकाशित की जा रही है, इसिलिये कि अभी ब्लाग-संसद में कोई प्रस्ताव नहिं आ रहे, विद्वान सदस्य जो भी, जब भी चाहें प्रस्ताव पोस्ट डाल सकते है।

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5 Comments

  1. October 28, 2010 at 7:40 am

    >मैं भी सोच रहा हूं क्‍या कहूं।

  2. October 28, 2010 at 11:54 am

    >सुज्ञ जी नमस्ते—–बर्तमान भारतीय ब्यवस्था पर बहुत सुन्दर ब्यंग विद्द्वाता पूर्ण कबिता केलिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

  3. October 28, 2010 at 12:39 pm

    >बहुत बढ़िया ……

  4. corbett blog said,

    October 29, 2010 at 5:03 am

    >बहुत सुंदर प्रस्तुति……………………

  5. October 30, 2010 at 2:31 pm

    >बहुत सुंदर !


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