>अमेरिका है, भैया ने कहा था

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खुलासों और खुल्लमखुल्ला का दौर है, भैया ने कहा था, जो करो वो करो और उसका समर्थन इसलिए मत करो क्योंकि आपने किया है, बल्कि इसलिए करो ्कयोंकि आपके मन ने कहा वो सही है। विकीलीक्स के खुलासे और बिग बॉस में पॉमेला के कपड़े सबकुछ ऊपर दोनों लाइनों से ही उपजा है। भैया ने यह भी कहा था, बेटा शहर के लोग तेजी से बढ़ रहे हैं, थोड़ा अपने आसपास के लोगों की उंगलियां भा थामने की कोशिश करना। क्योंकि वो लोग बड़े उंगलीबाज होते हैं। विकीलीक्स ने खुलासा किया, अरे या यूं कहिए कुछ कही हुई बात को कहा, कुछ सुनी हुई घटनाओं को कंप्यूटर के माथे पर चिपकाया है। लेकिन मुझे इस बात की बड़ी खुशी हुई कि अबतक छुपकर लादेन, जैश ए मुहम्मद, ही अफगानी यानी पाकिस्तानी पहाडिय़ों से दुनिया को ललकारते थे, चंबल के बीहड़ों में छुपकर डाकू अमीरों को धमकाते थे, सत्यम के जंगलों से लंबी, घनी, काली मूंछों वाले दुनियाभर के लोगों को चंदन लगाते थे, सचमुच के शेर को नोंच कर उसकी खाल संसार में बेंचते थे। छत्तीसगढ़, प.बंगाल के हरियर को सिस्टम बदलने की तपोभूमि बनाते थे। सबके सब निगेटिव एफट्र्स लगा रहे है और निगेटिव नतीजे चाहते हैं। मगर पहली बार कोई ऐसा भी है, जो छुपकर कहीं से अपना सबसे बड़ा पॉजिटिव नेटवर्क चला रहा है। वो है विकीलीक्स। भैया ने कहा था ईमानदारी के लिए किए गए हरेक एफट्र्स स्वर्ग की ओर जाते हैं। हां लेकिन उन्होंने यह भी कहा था, कि भीख देने के लिए की गई चोरी ठीक नहीं है, क्योंकि भीख देना किसी संविधान की अनुसूची छठवीं के आर्टिकिल 345 क के च के अनुसार जरूरी है कहीं नहीं लिखा। संविधान और कानून की लंब-लंबी बतियां और इस तरह की पेचीदगियां भला किसी को समझ में आ सकती हैं। और फिर अगर जो समझ में आ गया और आपको पता चल गया तो आपको कोई अपराधी ही साबित नहीं कर पाएगा। भैया विकीलीक्स ने अच्छे काम के लिए ऐसा किया है, तो क्या अच्छा है। पहली बार कोई ऐसा नेटवर्क कम से कम मेरी जानकारी में तो पहली ही बार आया है, जो वाकई अच्छा काम कर रहा है। इसके मालिक को मानना पड़ेगा, उसे रॉबिन हुड कहें या फिर तथाकथित बुद्धिजीवियों की नजरों में नक्सली जो भी कहिए कह दीजिए। लेकिन प्लीज विकीलीक्स से कहिए अपनी सूचनाएं कमर्शियली बाउंड न ही करे। यहां एक बात का जिक्र करना बेहद जरूरी है, कि अखबार, टीवी, इंटरनेट इन्हें तब तक नहीं चलाया जा सकता जबतक कि विज्ञापन का भूसा न भरा जाए। तब यह सभी माध्यम कहां ईमानदार रह जाएंगे। आप सब तो समझदार हैं, मैं तो अपने आपको अपडेट करने के लिए ऐसा कह रहा था। अजी क्यों न कहें विचारों की अभिव्यक्ति का जो मामला है। जनाब कुछ दिनों से मीडिया के चालचलन पर कई किस्से कहानियां और बात बतंगियां बाजार में प्रचलन में हैं, उनमें कभी महंगाई की तरह हाई राइजिंग स्पीड आ जाती है, तो कभी शेयरों के सूचकांक बनकर नीचे लुढकते जाती हंैं। लेकिन विकीलीक्स ने नई राह दिखाई है। हां कम से कम उनके लिए तो है ही जो सियासत के जरिए हिताहित की बात तो करते हैं, लेकिन रोटी के चारों ओर ऐसे घूमते हैं, जैसे कोई चखरी हो। हां याद आया वो चखरी जो बच्चों को दीवाली के वक्त और बुजुर्गों को बच्चों के मैरिड होने के बाद याद आती है। वो चखरी जो बिटिया के बाप को बिटिया के पीले रंग से हाथ रंगने के वक्त याद आती है। वही चखरी जो गांधी जी ने घुमाई की सूत कत गया और उस सूत में सबके सब बंध गए, वही चखरी जिसे तिरंगे ने बीच में लगाकर चौबीसों घंटे जागते रहने की दलील दी है। वही चखरी तो है यहंा जो कभी मेले ठेले में घूमती थी और अम्मा पापा के दिए पैसों में अपने ऊपर बैठने नहीं देती थी, कहती थी इसमें बैठने के लिए तीन बार मेले का इंतजार करना होगा। चलोअच्छा हुआ कोई तो कहीं से अच्छे काम कर रहा है, विकीलीक्स को सलाम करते हैं, उसके साथ आम आदमी तो रहेगा, लेकिन पूरा सिस्टम समूह नहीं चलेगा। अमेरिका है, भैया ने कहा था अमीरों के चोचले होते हैं, वे कभी भी अपनी कुछ भी करतूत की दलील नहीं देते बल्कि उसे समाज में स्टेटस सिंबल के तौर पर परोस देते हैं, और हम और हमारा समाज अंधभक्त होकर स्वीकारता जाता है। भैया ने इस बार फिर कहा चलो कोई तो है जो भूमिगत किसी अच्छे कारण से हुआ है। हां लेकिन इस बार भैया ने यह सीधे सामने बैठकर नहीं कहा बल्कि मोबाइल पर समस करके कहा है, यानी अखबार, फिल्म, न्यूज चैनल्स, वेब जर्नलिज्म, नारदिज्म, मंथराइज्म, हुनमानिज्म आदि के बाद अब आ रहा है, ऐसा मीडिया जो पत्रकारों को जर्नलिस्ट, संपादक आदि के पारंपरिक तमगों और खोलों से बाहर निकालकर सीधा सच्चा भूमिगत भू-सुधारक वेबिस्ट बना देगा। जय हो विकीलीक्स।।।।।।।।
सादर आमंत्रित हैं, भैया चाहें तो अंग्रेजी में या हिंदी में मेल (पुरुष) कर सकते हैं। समस के लिए भी नंबर दे रहा हूं, आगे तो आपकी ही मर्जी चलेगी न, क्योंकि गोविंदा अंकल ने कहा है मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं मेरी मर्जी। जी सर्जी।।।।.
वरुण के सखाजी, ०९००९९८६१७९. ह्यड्डद्मद्मद्धड्डद्भद्गद्गञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व

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>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


एलियंस की डायरी में लालू

Posted: 29 Nov 2010 07:40 AM PST

एलियंस की एक डायरी किसी वैज्ञानिक को मिली थी, जिसे पढकर वह हैरान रह गया कि प्रथ्वी के बारे में वे लोग वही सोचते हैं, जो हम लोग खुद अपने बारे में मन करते हुए भी कभी सोचना नहीं चाहते. किसी अखब़ार के हवाले से आज जो भी पता चला है, वह उस डायरी के बारे में ज़्यादा है, जो हिंदी में अपने पटना-प्रवास के दौरान एलियंस द्वारा लिखी गयी थी और जब वह वैज्ञानिक अपनी पालतू भैंस को चारा डालने गया था तो उसकी सहचरी भैंस ने सिर्फ़ इसलिए वह डायरी चबा ली कि उसे पहले चारा क्यों नहीं डाला गया ? बहरहाल, डायरी तो भैंस के इस दुनिया में ना होने की अहम् वजह से आज इस दुनिया में नहीं है, मगर वह वैज्ञानिक से ज़्यादा अखब़ार वालों के सामने कुछ सवाल खड़े कर रही हैं.

भैंस द्वारा चबा ली गयी उस डायरी के कुछ अंश आज भी उस वैज्ञानिक को याद हैं. उसकी शुरूआत में ही लिखा है कि हम प्रमाणित करते हैं कि हम सब जो धोखे से अपनी यह डायरी यहां छोड़े जा रहे हैं, यह हमारी ही है और इसमें हमारी कोई ऐसी मंशा नहीं है कि हम पृथ्वी वासियों को जलील करें या उन्हें उनकी औक़ात दिखा दें कि फिलहाल क्या है और अगर वे चाहते तो क्या हो सकती थी ? हम लोग शान्ति के साथ अपने ग्रह पर ही रहने में खुश हैं. पहले हमने सोचा था कि पृथ्वी पर चलकर कोई सरकारी ज़मीन ले लेंगे, मगर यहां आकर पता चला कि वह ज़मीन, जो हमने पसंद की थी, वह नेताओं ने कब्ज़ा रखी है और इस जन्म में हमें नहीं मिल सकती, लिहाज़ा हमने फैसला कर लिया कि हम अपने ग्रह पर ही घिचपिच में रह लेंगे, मगर इस ग्रह पर मीडिया कि सुर्खियां बनने के लिए कभी भी नहीं आयेंगे.

एलियंस की इस चबा ली गयी डायरी में साफ़-साफ़ लिखा है कि हम जाना तो कहीं और चाहते थे, मगर किसी इंडिया नामक मुल्क के पटना नामक शहर में हमारे यान का ईंधन ख़त्म हो गया और हमें वहीँ उतरना पड़ा. यहां ईंधन तो हमें ‘ब्लैक’ नामक किसी ख़ास व्यवस्था की वजह से नहीं मिला, मगर यह जानकारी ज़रूर मिली कि यहां पर हमसे मिलते-जुलते कुछ ऐसे प्राणी ज़रूर रहते हैं, जो नेतागिरी के अलावा और कोई काम नहीं करते. ज़्यादा जानकारी करने पर हमें बताया गया कि यहां पर खुद से गयी-गुज़री समझी जाने वाली भैंसों का चारा खाने वाले लोग भी रहते हैं और अगर ज़्यादा दिन तक हम यहां पर रुके तो हमारा बचा-खुचा चारा, जिसे हम लोग ‘खाना’ कहते हैं, भी खा लिया जाएगा और फिर डकार भी नहीं ली जायेगी कि कोई सबूत भी रहे.

डायरी में आगे लिखा था कि यहां के चिड़ियाघर को देखने की इच्छा ज़ाहिर करने पर हमें किसी लालू प्रसाद यादव नामक प्राणी के घर पर छोड़ दिया गया कि यहां पर सभी किस्म के प्राणी आते-जाते मिल जायेंगे. हमने उक्त प्राणी के घर के दरवाज़े पर जब दस्तक दी तो दातून नामक कोई चीज चबाते हुए कोई प्राणी आया और हमसे अजीब किस्म की भाषालापी शैली में पूछने लगा कि ” क्या हमारी ससुराल से आये हो ? ” हमारे ख़ामोश रहने पर फिर हमसे पूछा गया कि ” भाई, बोलते काहे नहीं हो कि हमारी पार्टीवा ज्वाइन करने आये हो ? ” इस दौरान हमने देखा कि सवाल पूछने वाले के कानों के पास इतने बाल उग आये थे, जितने उसके पूरे सिर पर भी नहीं रहे होंगे. हमने वहां की ज़मीन के नमूने लिए और किसी तरह ईंधन का जुगाड़ करके अपने ग्रह की तरफ निकल लिए, ताकि इस पर हम रिसर्च करके यह अंदाजा लगा सकें कि चारा खाकर भी कोई आदमी कैसे ज़िन्दा रह सकता है ? डायरी के अंत में नीतीश कुमार नाम के किसी एलियंस के हस्ताक्षर साफ़ दिखाई दे रहे थे.

(अतुल मिश्रा, ब्लोगर हैं !)

आम लोगों की एकजुटता से झुकेगी सत्ता

Posted: 29 Nov 2010 06:37 AM PST

आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित भविष्य के लिये तो हम अपने वर्तमान जीवन को सुधारें। यदि हम सब लोग केवल अपने वर्तमान को सुधारने का ही दृढ निश्चय कर लें तो आने वाले कल का अच्छा होना तय है, लेकिन हमारे आज अर्थात् वर्तमान के हालात तो दिन-प्रतिदिन बिगडते ही जा रहे हैं। हम चुपचाप सबकुछ देखते और झेलते रहते हैं। जिसका दुष्परिणाम यह है कि आज हमारे देश में जिन लोगों के हाथों में सत्ता की ताकत हैं, उनमें से अधिकतर का सच्चाई, ईमानदारी एवं इंसाफ से दूर-दूर का भी नाता नहीं रह गया है। अधिकतर भ्रष्टाचार के दलदल में अन्दर तक धंसे हुए हैं और अब तो ये लोग अपराधियों को संरक्षण भी दे रहे हैं। ताकतवर लोग जब चाहें, जैसे चाहें देश के मान-सम्मान, कानून, व्यवस्था और संविधान के साथ बलात्कार करके चलते बनते हैं और सजा होना तो दूर इनके खिलाफ मुकदमे तक दर्ज नहीं होते! जबकि बच्चे की भूख मिटाने हेतु रोटी चुराने वाली अनेक माताएँ जेलों में बन्द हैं। इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों के खिलाफ यदि कोई आम व्यक्ति या ईमानदार अफसर या कर्मचारी आवाज उठाना चाहे, तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित एवं अपमानित करने का प्रयास किया जाता है और सबसे दु:खद तो ये है कि पूरी की पूरी व्यवस्था अंधी, बहरी और गूंगी बनी देखती रहती है।

अब तो हालात इतने बिगडते चुके हैं कि मसाले, घी, तेल और दवाइयों तक में धडल्ले से मिलावट की जा रही है। ऐसे में कितनी माताओं की कोख मिलावट के कारण उजड जाती है और कितनी नव-प्रसूताओं की मांग का सिन्दूर नकली दवाईयों के चलते युवावस्था में ही धुल जाता है, कितने पिताओं को कन्धा देने वाले तक नहीं बचते, इस बात का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। इस सबके उपरान्त भी इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों का एकजुट होकर सामना करने के बजाय हम चुप्पी साधकर, अपने कानूनी हकों तक के लिये भी गिडगिडाते रहते हैं।

अधिकतर लोग तो इस डर से ही चुप्पी साध लेते हैं कि यदि वे किसी के खिलाफ बोलेंगे तो उन्हें भी फंसाया जा सकता है। इसलिये वे अपने घरों में दुबके रहते हैं! ऐसे लोगों से मेरा सीधा-सीधा सवाल है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में हमारे आसपास की गंदगी को साफ करने वाले यह कहकर सफाई करना बन्द कर देंगे, कि गन्दगी साफ करेंगे तो गन्दगी से बीमारी होने का खतरा है? खानों में होने वाली दुर्घटनाओं से भयभीत होकर खनन मजदूर यह कहकर कि खान गिरने से जीवन को खतरा है, खान में काम करना बंद कर दे, तो क्या हमें खनिज उपलब्ध हो पायेंगे? इलाज करते समय मरीजों से रोगाणुओं से ग्रसित होने के भय से डॉक्टर रोगियों का उपचार करना बन्द कर दें, तो बीमारों को कैसे बचाया जा सकेगा? आतंकियों, नक्सलियों एवं गुण्डों के हाथों आये दिन पुलिसवालों के मारे जाने के कारण यदि पुलिस यह सोचकर इनके खिलाफ कार्यवाही करना बन्द कर दें कि उनको और उनके परिवार को नुकसान पहुँचा सकता हैं, तो क्या सामाज की कानून व्यवस्था नियन्त्रित रह सकती है? पुलिस के बिना क्या हमारी जानमाल की सुरक्षा सम्भव है? आतंकियों तथा दुश्मनों के हाथों मारे जाने वाले फौजियों के शवों को देखकर, फौजी सरहद पर पहरा देना बंद कर दें, तो क्या हम अपने घरों में चैन की नींद सो पाएंगे?

यदि नाइंसाफी के खिलाफ हमने अब भी अपनी चुप्पी नहीं तोडी और यदि आगे भी ऐसा ही चलता रहा तो आज नहीं तो कल जो कुछ भी शेष बचा है, वह सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाने वाला है। आज आम व्यक्ति को लगता है कि उसकी रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है! क्या इसका कारण ये नहीं है, कि आम व्यक्ति स्वयं ही अपने आप पर विश्वास खोता जा रहा है? ऐसे हालात में दो ही रास्ते हैं-या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें। क्योंकि लोकतन्त्र में समर्पित, संगठित एवं सच्चे लोगों की एकजुट ताकत के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी है और सत्ता वो धुरी है, जिसके आगे सभी प्रशासनिक निकाय और बडे-बडे अफसर आदेश की मुद्रा में मौन खडे रहते हैं।

दगाबाज़ निकले लोकतंत्र के प्रहरी

Posted: 29 Nov 2010 05:47 AM PST

हजारों साल पहले की बात है.किसी राज्य का राजा बड़ा जालिम था.उसके शासन में चारों तरफ लूटमार का वातावरण कायम हो गया.कुछ लोगों ने उसे वस्तुस्थिति से अवगत कराने की कोशिश भी की.लेकिन उन सबको अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.उसी राज्य में एक वृद्ध और बुद्धिमान व्यक्ति रहता था.एक दिन जा पहुंचा राजा के दरबार में और कहा कि मैं एक सच्ची कहानी आपको सुनना चाहता हूँ.राजा को कहानियां बहुत पसंद थी.बूढ़े ने कहना शुरू किया कि महाराज जब आपके दादाजी का राज था तब मैं नौजवान हुआ करता था और बैलगाड़ी चलाता था.एक दिन जब शहर से लौट रहा था तब जंगल में ऊपर से नीचे तक सोने के गहनों से लदी नवयौवना मिली.डाकुओं ने उसके कारवां को लूट लिया था और पति और पति के परिवार के लोगों की हत्या कर दी थी.वह किसी तरह बच निकली थी.उसका दुखड़ा सुनकर मुझे दया आई और मैंने उसे गाड़ी में बिठाकर सही-सलामत उसके पिता के घर पहुंचा दिया.बाद में जब आपके पिता का राज आया तब मेरे मन में ख्याल आया कि अच्छा होता कि मैं उसे घर पहुँचाने के ऐवज में उसके गहने ले लेता.अब आपका राज है तो सोंचता हूँ कि अगर जबरन उसे पत्नी बनाकर अपने घर में रख लेता तो कितना अच्छा होता.राजा ने वृद्ध की कहानी में छिपे हुए सन्देश को समझा और पूरी मेहनत से स्थिति को सुधारने में जुट गया.मैं जब भी इस कहानी के बारे में सोंचता था तो मुझे लगता कि भला ऐसा कैसे संभव है कि कोई ईमानदार व्यक्ति समय बदलने पर बेईमान हो जाए.खुद मेरे पिताजी का उदाहरण मेरे सामने था जो सारे सामाजिक प्रतिमानों के बदल जाने पर भी सच्चाई के पथ पर अटल रहे.लेकिन जब प्रसिद्ध पत्रकार और कारगिल फेम बरखा दत्ता को दलाली करते देखा-सुना तो यकीन हो गया कि यह कहानी सिर्फ एक कहानी नहीं है बल्कि हकीकत भी है.ज्यादातर लोग समय के दबाव को नहीं झेल पाते और समयानुसार बदलते रहते हैं.कारगिल युद्ध के समय हिमालय की सबकुछ जमा देनेवाली अग्रिम और दुर्गम मोर्चों पर जाकर रिपोर्टिंग कर पूरे देश में देशभक्ति का ज्वार पैदा कर देने वाली बरखा कैसे भ्रष्ट हो सकती है?लेकिन सच्चाई चाहे कितनी कडवी क्यों न हो सच्चाई तो सच्चाई है.नीचे ग्रामीण और कस्बाई पत्रकारों ने पैसे लेकर खबरें छापकर और दलाली करके पहले से ही लोकतंत्र के कथित प्रहरी इस कौम को इतना बदनाम कर रखा है कि मैं कहीं भी शर्म के मारे खुद को पत्रकार बताने में हिचकता हूँ.अब ऊपर के पत्रकार भी जब भ्रष्ट होने लगे हैं तो नीचे के तो और भी ज्यादा हो जाएँगे.वो कहते हैं न कि महाजनो येन गतः स पन्थाः.यानी समाज के जानेमाने लोग जिस मार्ग पर चलें वही अनुकरणीय है.मैंने नोएडा में देखा है कि वहां की हरेक गली के एक अख़बार है जिनका उद्देश्य किसी भी तरह समाज या देश की सेवा या उद्धार करना नहीं है.बल्कि इनके मालिक प्रेस के बल पर शासन-प्रशासन पर दबाव बनाते हैं और उसके बल पर दलाली करते हैं,ठेके प्राप्त करते हैं.दुर्भाग्यवश बड़े अख़बारों और चैनलों का भी यही हाल है.दिवंगत प्रभाष जोशी ने पेड न्यूज के खिलाफ अभियान भी चलाया था.लेकिन उनकी असामयिक मृत्यु के चलते यह अभियान अधूरा ही रह गया.कई बार अख़बार या चैनल के मालिक लोभवश सत्ता के हाथों का खिलौना बन जाते हैं और पत्रकारिता की हत्या हो जाती है.अभी दो दिन पहले ही पटना के एक प्रमुख अख़बार दैनिक जागरण के ब्यूरो प्रमुख का तबादला राज्य सरकार के कहने पर लखनऊ कर दिया गया है.खबर आप भड़ास ४ मीडिया पर देख सकते हैं.वैसे भी हम इन बनियों से क्या उम्मीद कर सकते हैं?जो अख़बार मालिक जन्मना बनिया नहीं है वह भी कर्मणा बनिया है.व्यवसायी तो पहले भी होते थे लेकिन उनमें भी नैतिकता होती थे.जब चारों ओर हवा में नैतिक पतन की दुर्गन्ध तैर रही हो तो पत्रकारिता का क्षेत्र कैसे इससे निरपेक्ष रह सकता है?क्या ऐसा युग या समय के भ्रष्ट हो जाने से हो रहा है.मैं ऐसा नहीं मानता.समय तो निरपेक्ष है.समय का ख़राब या अच्छा होना हमारे नैतिक स्तर पर निर्भर करता है.जब अच्छे लोग ज्यादा होंगे तो समय अच्छा (सतयुग) होगा और जब बुरे लोग ज्यादा संख्या में होंगे तो समय बुरा (कलियुग) होता है.मैं या मेरा परिवार तो आज भी ईमानदार है.परेशानियाँ हैं-हमें किराये के मकान में रहना पड़ता है,कोई गाड़ी हमारे पास नहीं है,हम अच्छा खा या पहन नहीं पाते लेकिन हमें इसका कोई गम नहीं है.इन दिनों टी.वी चैनलों में टी.आर.पी. के चक्कर में अश्लील कार्यक्रम परोसने की होड़ लगी हुई है.समाज और देश गया बूंट लादने इन्हें तो बस पैसा चाहिए.कहाँ तो संविधान में अभिव्यक्ति का अधिकार देकर उम्मीद की गई थी कि प्रेस लोकतंत्र का प्रहरी सिद्ध होगा और कहाँ प्रेस पहरेदारी करने के बजाय खुद ही दलाली और घूसखोरी में लिप्त हो गया है.नीरा राडिया जैसे जनसंपर्क व्यवसायी अब खुलेआम पत्रकारों को निर्देश देने लगे हैं कि आपको क्या और किस तरह लिखना है और क्या नहीं लिखना है.शीर्ष पर बैठे पत्रकार जिन पर सभी पत्रकारों को गर्व हो सकता है पैसे के लिए व्यापारिक घरानों के लिए लिखने और दलाली करने में लगे हैं.जब पहरेदार ही चोरी करने लगे और डाका डालने लगे तो घर को कौन बचाएगा?उसे तो लुटना है ही.कुछ ऐसा ही हाल आज भारतीय लोकतंत्र का हो रहा है.

औरतें भी करती हैं मर्दों का शोषण

Posted: 29 Nov 2010 05:40 AM PST

अविनाश राय

कल टी.वी. देखते हुए अचानक ही नजर एक खबर पर जाकर टिक गई और याद आ गई वर्तिका नंदा की लाईन कि “औरतें भी करती हैं मर्दों का शोषण”।खबर थी कि गुडगांव मेट्रो स्टेशन पर महिलाओं ने पुरुषों को जमकर पीटा।उनका कसूर मात्र इतना भर था कि वो महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे में यात्रा कर रहे थे।

क्या इस छोटे से कसूर के लिए पुरुष ऐसी सजा के हकदार थे।हालांकि विभिन्न चैनलों की बाइट ने इस सजा को मुकम्मल तौर पर जायज ठहराया लेकिन चैनलों की दृष्टि उस ओर कभी नहीं गई जब महिलाएं पुरुषों का शोषण कर रही होती हैं।मेट्रो ट्रेन की ही बात करें तो सामान्य डिब्बे में महिलाओं के लिए आरक्षित सीट पर यदि कोई वृद्ध पुरुष बैठा होता है तो एक युवती के आ जाने पर भी उसे अपनी सीट खाली करनी पडती है।वह युवती उस वृद्ध पुरुष की अशक्तता को दरकिनार कर देती है और युवती की आरक्षित सीट के लिए उस वृद्ध को खडे होकर यात्रा करनी पडती है।बसों में भी पुरुषों को कमोबेश ऐसी ही स्थिति से दो-चार होना पडता है।

महिलाएं आरक्षण को अपने लिए एक मजबूत हथियार के तौर पर इस्तेमाल करती हैं लेकिन गैर जरुरी ढंग से और बेजा इस्तेमाल ज्यादा करती हैं।मैं महिला सशक्तिकरण के बिल्कुल भी खिलाफ नहीं हूं परन्तु अधिकारों का दुरुपयोग करके सशक्तिकरण का राग अलापना अतार्किक और गैरजरुरी है।

यदि भारतीय परिदृश्य की ही बात करें तो प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक जितनी भी महिलाओं का नाम उल्लेखनीय है उनमें से किसी ने भी आरक्षण रुपी बैसाखी का सहारा नहीं लिया है। विद्योतमा हो या गार्गी,रानी लक्ष्मीबाई हो या रानी दुर्गावती,इंदिरा गांधी हो या सोनिया गांधी या प्रतिभा पाटिल,किरण बेदी हो या इंदिरा नूई,मन्नू भंडारी हो या प्रभा खेतान,महाश्वेता देवी हो या मेधा पाटकर या फिर अरुंधती राय,ये महिलाएं अपने-अपने क्षेत्र में श्रेष्ठतम स्थान रखती हैं परन्तु यह मुकाम हासिल करने के लिए उनके पास आरक्षण की बैसाखी नहीं थी।

आरक्षण से सफलता मिलने के बाद किसी भी महिला ने कोई भी उल्लेखनीय कार्य किया हो ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है हां अधिकारों के दुरुपयोग के हजारों उदाहरण रोज देखने को मिल जाते हैं।इसलिए आरक्षण को अपना अधिकार समझने की बजाय उसके मूल उद्देश्य को समझना ज्यादा बेहतर होगा।ग्रामीण महिलाओं के लिए आरक्षण बेहद जरुरी है परन्तु इसके दुरुपयोग को नजरन्दाज नहीं किया जा सकता है।

पंचायत में महिलाओं की भूमिका

Posted: 29 Nov 2010 01:23 AM PST

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव समाप्त हुआ है और झारखण्ड में पंचायत चुनाव चल रहे हैं । ऐसा देखने में आया है कि पंचायत चुनावों में महिलाओं की भूमिका तेजी से बढ़ रही है । महिलाओं की भागीदारी पर चर्चा कर रहे हैं लोकेन्द्रसिंह कोट

लोकतंत्र की सबसे छोटी लेकिन महत्वपूर्ण इकाई हैं पंचायत। यह लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है। पंचायत की बात प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सदियों से होती रही है। वर्ष 1955 में पंचायती राज व्यवस्था तो की गई पर कई कारणों से यह असफल सिद्ध हुई। एक बड़े अंतराल के बाद 1993 में 73वें एवं 74वें संशोधन में अभी तक हाशिए पर रही महिलाओं को पंचायतों में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया।

इस उल्लेखनीय आरक्षण का परिणाम यह रहा कि देश भर की पंचायतों में लगभग 163000 महिलाएं विभिन्न पदों पर नियुक्त हुईं तथा सरपंच के तौर पर लगभग 10000 महिलाएं आगे आईं। एक पुरुष प्रधान समाज में इतना बड़ा बदलाव एक बारगी तो खुश होने के लिये पर्याप्त था लेकिन बदलाव की इस प्रक्रिया में सिक्के का दूसरा पहलू भी विद्यमान रहा। कागजी आंकड़ों और व्यवहारिक सत्य में ज़मीन-आसमान का अंतर पाया गया।

सच तो यह है कि महिला जनप्रतिधियों के पुरुष रिश्तेदार ही अधिकांश जगहों पर शासन करते रहे और महिलाओं को पर्दे के पीछे रखा गया। ताजा अध्ययन बताते हैं कि लगभग आधे से ज्यादा जगहों पर ऐसा खुले तौर पर हो रहा है। ग्रामीण समाज ने भी इसे मौन स्वीकृति दे रखी है। महिला जनप्रतिनिधियों के कंधों पर बंदूकें रख कर उनके पुरुश रिश्तेदार भ्रश्टाचार में लीन हैं और इल्जाम महिला जनप्रतिनिधियों के सर लग रहे हैं। इससे ग्रामीण महिला को लोकतंत्र की इस निचली पाठशाला से यही सीखने को मिल रहा है कि पंचायत या सत्ता धन कमाने का एक स्रोत भर हैं। वास्तव में ग्रामीण महिलाओं की पंचायतों में भागीदारी को तो अपना लिया गया लेकिन उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के मूल में जाकर नहीं देखा गया। महिलाओं को एक पूर्व निर्धारित ढ़ांचे में फिट कर दिया गया, बगैर यह देखे कि अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियां क्या हैं। जबकि होना यह था कि इन ग्रामीण महिलाओं के ढांचे में व्यवस्था को फिट करना था। इसके पष्चात् कई शिकायतें जो हम कर पर रहे है, वे नहीं होती।

शिक्षा का ही उदाहरण लें। शिक्षा की कमी उनके आत्म-विकास और आत्म-सम्मान में सबसे बाधक रही है। यद्यपि पिछले पांच दशकों में महिला साक्षरता कई गुना बढ़ी है फिर भी उनमें शिक्षा का स्तर निम्न है। इसके अलावा सिर्फ साक्षर होने भर से ही महिलाओं को जागरूक होना आ जाएगा, ऐसा सोचना सही नहीं है। साक्षर महिला जनप्रतिनिधियों को लेकर किये गये एक अध्ययन के अनुसार अभी भी वे ‘महिला समस्या’ को नहीं समझ पाई हैं उनमें महिला विकास जैसा कोई चिंतन ही नही हैं।

ग्रामीण महिलाओं के संदर्भ में यह तथ्य भी चैंकाने वाला है कि लगभग पचपन से साठ प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हैं। इसका सीधा अर्थ यही है कि महिलाएं अपने घर में ही दमन चक्र झेलने को मजबूर हैं। ऐसे में इनसे आशा करना कि वे पंचायत के कार्यों एवं उनकी समस्याओं के लिए लड़ें तो यह सर्वथा बेमानी ही होगा।

इसे विडम्बना ही कहेंगे कि जहां हम महिला उत्थान और उनकी सत्ता में भागीदारी के लिए लड़ते रहे, वहीं उसी के समानान्तर पुरूश और महिलाओं के अनुपात में देशव्यापी गिरावट आती रही। 972 प्रति हजार पुरुष से घटकर आज यह 934 प्रति हजार पुरुष तक पहुँच चुकी है। ऐसे में कभी-कभी लगता है कि दबाव के चलते सब कुछ अपना रहे हैं परन्तु मन से महिलाओं को आगे बढ़ाना हम नहीं चाहते। कुछ जागरूक महिला सरपंचों द्वारा लिए गए निर्णयों (चाहे वे कितने ही अच्छे क्यों न हो) को सरेआम पुरूश साथियों द्वारा नकारने की घटनाएं भी सामने आई हैं। कई स्थानों पर महिलाओं को तरह-तरह से अपमानित किया जाना हमारी उसी पुरूश आधारित मानसिकता का परिचायक है।

वैसे देखा जाए तो ग्रामीण महिलाएं जब अपने घरेलू कार्यों के साथ-साथ कृषि कार्यों को भी सही प्रबंधन कर निपटा लेती हैं तथा अपने बच्चों का भी पालन-पोषण कर लेती हैं तो ऐसी कुशल प्रबंधक को पंचायत का पोषण करने में कहाँ समस्या आ सकती है। वे अपने उद्देश्यों के प्रति अपने संस्कारों की वजह से अधिक प्रतिबद्ध, ईमानदार और उत्साही रहती हैं। जरूरत इस बात की है कि संपूर्ण व्यवस्था उनके पक्ष को लेकर पुनर्व्यवस्थित हो और उन्हें पारिवारिक सहमति प्राप्त हो। हमें पंचायती राज में महिलाओं की भागीदारी के बारह-तेरह वर्षों बाद अनुभवों को महत्व देते हुए प्रत्येक पहलू की पुर्नव्यवस्था करना होगी।

चरखा

>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


सेनापति पांडुरंग महादेव बापट का जीवन संघर्ष

Posted: 28 Nov 2010 07:56 AM PST

किसी भी देश की पहचान उसके गौरवशाली,संघर्षमय इतिहास से होती है।हजारों वर्षों की दासता और दासता की बेड़ियों को तोड़ने में लगे मातृभूमि के लाड़लों की एक बृहद् समृद्धिशाली,त्यागमयी गौरवपूर्ण गाथा है,जो पीढ़ी दर पीढ़ी देश के युवाओं को प्रगति व आत्मसम्मान के पथ पर ले जाने हेतु पथ-प्रदर्शक का कार्य करती रहेगी।भारत-भूमि देवभूमि यूँ  ही नही कही जाती है।यह धरा अपना बचपन,अपनी जवानी,अपना सर्वस्व धरती माता के चरणों में,सेवा में,रक्षा में अर्पित कर देने वाले सपूतों की जन्मदात्री है। ऐसे  ही एक भारत के लाल पांडुरंग बापट का जन्म 12नवम्बर,1880 को महादेव व गंगाबाई के घर पारनेर-महाराष्ट में हुआ था।

प्रारम्भ में ही आपको बताते चलें कि इनके विषय में साने गुरू जी ने कहा था-सेनापति में मुझे छत्रपति शिवाजी महाराज,समर्थ गुरू रामदास तथा सन्त तुकाराम की त्रिमूर्ति दिखायी पड़ती है।साने गुरू जी बापट को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक,महात्मा गांधी  तथा वीर सावरकर का अपूर्व व मधुर मिश्रण भी कहते थे।बापट को भक्ति,ज्ञान व सेवा की निर्मल गायत्री की संज्ञा देते थे-साने गुरू जी।बापट ने पारनेर में प्राथमिक शिक्षा के बाद बारह वर्ष की अवस्था में न्यू इंग्लिश हाईस्कूल-पूणे में शिक्षा ग्रहण की।पूणे में फैले प्लेग के कारण बापट को पारनेर वापस लौटना पड़ा।गृहस्थ जीवन में आपका प्रवेश 18वर्ष की आयु में हुआ।अपनी मौसी के घर अहमदनगर में मैटिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर आपने 5 वा स्थान तथा जगन्नाथ सेठ की छात्रवृत्ति प्राप्त की।कचेहरी में दस्तावेज-नवीस का कार्य आपने इसी दौरान किया।उस समय 12रू प्रति माह की छात्रवृत्ति आपने संस्कृत विषय में हासिल की।उच्च शिक्षा हेतु 3जनवरी,1900 को 20वर्ष की उम्र में डेक्कन काॅलेज,पूणे में दाखिला लिया।छात्रावास में टोपी लगाकर बाहर जाने के नियम का असावधानी पूर्वक उल्लंघन करने के कारण आपको 6महीने छात्रावास से बाहर रहने का दण्ड़ मिला।इस अवसर पर सतारा के नाना साहब मुतालिक ने बापट को अपने कमरे में रख कर सहारा दिया।अपनी उच्च शिक्षा को जारी रखने के उद्देश्य से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् बापट ने बम्बई पहुँच  कर स्कूल में अस्थायी अध्यापन का कार्य प्रारम्भ किया।सौभाग्य से बापट को मंगलदास नाथूभाई की छात्रवृत्ति मिल गई।अब बापट मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने स्काटलैण्ड पहुँच गये।यहां के कवीन्स रायफल क्लब में आपने निशानेबाजी सीखी।
भारतीय क्रान्ति के प्रेरणाश्रोत श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा,जिन्होंने लन्दन में क्रान्तिकारियों के लिए इण्डिया हाउस की स्थापना की थी,इण्डियन सोशलाजिस्ट नामक अखबार से क्रांति का प्रचार-प्रसार किया था,उस महान विभूति से यहीं पर पांडुरंग महादेव बापट की मुलाकात हुई।ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन भारत की परिस्थिति विषय शेफर्ड सभागृह में निबन्ध-वाचन के अवसर पर श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा उपलब्ध करायी गयी सामग्री के आधार पर आपने भाषण दिया,आपका निबन्ध छपा।तत्काल मुम्बई विद्यापीठ सिफारिश पर बापट की छात्रवृत्ति समाप्त हो गई।अपनी मातृभूमि की दशा को बखान करने की कीमत चुकायी बापट ने।अब बापट ने क्रान्ति की शिक्षा ग्रहण करना प्रारम्भ कर दिया।इण्डिया हाउस में रहने के दौरान बापट,वीर सावरकर के सम्पर्क में आये।आपको पेरिस बम कौशल सीखने भेजा गया।अपनी विद्वता का इस्तेमाल आपने अपने देश की सेवा व लेखन में किया।दादा भाई नौरोजी की अध्यक्षता में होने वाले 1906 के कांग्रेस अधिवेशन में वाॅट शैल अवर कांग्रेस डू तथा 1907 में सौ वर्ष बाद का भारत आपके कालजयी लेख हैं।
मजदूरों-मेहनतकशों-आम जनों को एकता के सूत्र में बांघने तथा क्रांति की ज्वाला को तेज करने के उद्देश्य से श्यामजी कृष्ण वर्मा व सावरकर की सलाह पर बापट भारत वापस आये।शीव बन्दरगाह पर उतरने के पश्चात् धुले-भुसावल होते हुए कलकत्ता के हेमचन्द्र दास के घर माणिकतल्ला में पहुॅंचे।यहां कई क्रांतिकारियों के साथ आपकी बैठक हुई।इन्ही क्रान्तिकारियों में से एक क्रान्तिकारी बम प्रकरण में दो माह बाद गिरफतार हो गया,जो मुखबिर बन गया।बापट की भी तलाश प्रारम्भ हो गई।साढ़े चार वर्ष बाद इन्दौर में पुलिस के हाथों बापट की गिारफतारी हुई।इसी बीच मुखबिर बने नरेन्द्र गोस्वामी को क्रान्तिकारी चारू चन्द्र गुहा ने मार गिराया फलतःबापट पर कोई अभियोग सिद्ध नहीं हो सका।पांच हजार की जमानत पर छूटकर बापट पारनेर घर आकर सामाजिक सेवा,स्वच्छता जागरूकता,महारों के बच्चों की शिक्षा,धार्मिक प्रवचन आदि कार्यों में जुट गये।पुलिस व गुप्तचर बापट के पीछे पड़े रहे।1नवम्बर,1914 को पुत्र रत्न की प्राप्ति के पश्चात् नामकरण के अवसर पर प्रथम भोजन हरिजनों को कराने का साहसिक कार्य किया था-बापट ने।अप्रैल1915 में पूना के वासु काका जोशी के चित्रमय जगत नामक अखबार में फिर 5माह बाद तिलक के मराठी पत्र में बापट ने कार्य किया।पूणे में भी सामाजिक कार्य व रास्ते की साफ-सफाई करते रहते थे-बापट।बापट ने मराठा पत्र छोड़ने के बाद पराड़कर के लोक-संग्रह दैनिक में विदेश राजनीति पर लेखन करने के साथ-साथ डाॅ0श्रीधर व्यंकटेश केलकर के ज्ञानकोश कार्यालय में भी काम किया।आपकी पत्नी की मृत्यु 4अगस्त,1920 को हो गई।इस समय बापट 2अगस्त,1920 से चल रही श्रमिक मेहतरों की मुम्बई में चल रही हड़ताल का नेतृत्व कर रहे थे।झाडू-कामगार मित्रमण्डल का गठन कर सन्देश नामक समाचार पत्र में विवरण छपवाया।मानवता की शिक्षा देते हुए,मुम्बई वासियों को जागृत करने हेतु,गले में पट्टी लटका कर भजन करते हुए 1सितम्बर,1920 को आप चैपाटी पहॅंुचे।यह हड़ताल सफल हुई।
इसके पश्चात् अण्ड़मान में कालेपानी की सजा भोग रहे क्रान्तिकारियों की मुक्ति के लिए डा0नारायण दामोदर सावरकर के साथ मिलकर आपने हस्ताक्षर अभियान चलवाया,घर-घर भ्रमण किया,लेख लिखे,सभायें आयोजित की।बापट ने राजबन्दी मुक्ता मण्डल की भी स्थापना की।कालेपानी की कठोर यातना से इन्द्रभूषण सेन आत्महत्या कर चुके थे तथा उल्लासकर दत्त पागल हो गये थे।महाराष्ट में सह्याद्रि पर्वत की विभिन्न चोटियों पर बाँध बांधने  की योजना टाटा कम्पनी ने की।मुलशी के निकट मुला व निला नदियों के संगम पर प्रस्तावित बाॅंध से 54गाॅंव और खेती डूब रही थी।विनायक राव भुस्कुटे ने इस के विरोध में सत्याग्रह चला रखा था।1मई,1922 को दूसरे सत्याग्रह की शुरूआत होते ही बापट को गिरफतार कर 6माह के लिए येरवड़ा जेल भेज दिया गया।छूटने के बाद बापट मुलशी के विषय में घूम-घूम कर कविता पाठ करते,प्रचार फेरियां निकलवाते।नागपुर में बेलगावं  तक भ्रमण किया बापट ने।अब बापट सभाओं में कहते,-अब गप्प मारने के दिन खत्म हुए,बम मारने के दिन आ गये हैं।मुलशी प्रकरण में 23अकतूबर,1923 को बापट तीसरी बार गिरफतार हो गये।रिहाई के बाद रेल पटरी पर गाड़ी रोकने के लिए पत्थर बिछाकर,हाथ में तलवार,कमर में हथियार और दूसरे हाथ में पिस्तौल लेकर बापट धोती की काॅंख बाॅंधे अपने 5साथियों के साथ खड़े थे।इस रेल रोको आन्दोलन में गिरफतारी के बाद 7वर्ष तक सिंध प्रांत की हैदराबाद जेल में बापट अकेले कैद रहे।मुलसी आन्दोलन से ही बापट को सेनापति का खिताब मिला।रिहाई के बाद 28जून,1931को महाराष्ट कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये।विदेशी बहिष्कार का आन्दोलन चला।अपने भाषणों के कारण बापट फिर जेल पहुँच  गये।सिर्फ 5माह बाद ही गिरफतार हुए बापट ने वकील करने से मना कर दिया।7वर्ष के काले पानी तथा 3वर्ष की दूसरे कारावास में रहने की दूसरी सजा मिली।जेल में रहने के ही दौरान बापट के माता-पिता की मृत्यु हो गई।बाहर कांग्रेस ने सार्वजनिक हड़ताल व सभायें की।येरवड़ा जेल में बन्द गाॅंधी जी के अनशन के समर्थन में बापट ने जेल में ही अनशन किया।सूत कातने,कविता लिखने,साफ-सफाई करने में वे जेल में अपना समय बिताते।अनशन में स्वास्थ्य खराब होने पर उन्हें बेलगांव भेज दिया गया।23जुलाई,1937 को रिहा कर दिये गये सेनापति बापट के रिहाई के अवसर पर स्वागत हेतु बहुत विशाल सभा हुई।
सुभाष चन्द्र बोस के द्वारा फारवर्ड ब्लाक की स्थापना करने पर बापट को महाराष्ट शाखा का अध्यक्ष बनाया गया।द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को शामिल करने का किया -फारवर्ड ब्लाक ने।भाषण दिये गये।कोल्हापुर रियासत में धारा144 लागू थी,वहां  भाषण देने के कारण आपको गिरफतार की कराड़ लाकर छोड़ दिया गया।आपने फिर कोल्हापुर में सभा कर विचार रखे।5अप्रैल,1940 को मुम्बई स्टेशन पर आपको गिरफतार कर कल्याण छोड़ा गया तथा मुम्बई प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।नजरबन्दी के बावजूद आपने चैपाटी में पुलिस कमिशनर स्मिथ की मौजूदगी में उर्दू में भाषण दिया,इस अवसर पर अंग्रेज का पुतला तथा यूनियन जैक भी जलाया गया।बापट को गिरफतार कर नासिक जेल में रखा गया।यहां पर बापट का वीर पुत्र वामनराव भी द्वितीय विश्व युद्ध के विरोध की सजा में बन्द थे।20मई,1944को आपकी पुत्री का देहान्त हो गया तथा सात माह की नातिन की जिम्मेदारी भी आप पर आ गई।
नवम्बर,1944 में विद्यार्थी परिषद का आयोजन हुआ।चन्द्रपुर,अकोला की सभाओं के बाद बापट अमरावती की सभा के पहले गिरफतार हो गये।एक वर्ष की सजा हो गई।1946 में दुर्भिक्ष पड़ा।इस अवसर पर मजदूरों का साथ दिया सेनापति बापट ने तथा सहायता निधि जमा करके मजदूरों की मदद की।मातृभूमि की सेवा करने की जो शपथ 1902 में छात्र जीवन में बापट ने ली थी,अक्षरशःपालन किया।देश के लिए पूरा जीवन व्यतीत कर देने वाले इस सेनापति का अधिकांश समय जेल में ही बीता।संयुक्त महाराष्ट की स्थापना व गोवा मुक्ति आन्दोलन के योद्धा बापट सदैव हमारे मध्य सदैव प्रेरणा बन करके रहेंगे।आजादी के दिन 15अगस्त,1947 को बापट ने पुणे शहर में तिरंगा फहराने का गौरव हासिल किया।सेनापति बापट की देहावसान 28नवम्बर,1967 को हुआ था।पुणे-मुम्बई में सेनापति बापट के सम्मान में एक प्रसिद्ध सड़क का नामकरण किया गया है।

पुण्य तिथि है आज

बस! बहुत हो गया क्रिकेट क्रिकेट

Posted: 28 Nov 2010 07:37 AM PST

राष्ट्रमंडल खेलों के बाद अब एशियाड भी समाप्त हो गया। भारत को इस बार छठा स्थान प्राप्त हुआ। इस बार भी कई ऐसे खिलाडिय़ों ने भारत को गौरवांवित कराया, जिन्हें देश तो क्या उनके मोहल्ले के लोग ही नहीं जानते थे। अब साबित हो गया है कि राष्ट्रमंडल खेलों में मिली सफलता कोई तुक्का नहीं थी और न ही यह इसलिए मिली कि खिलाड़ी अपनी जमीन पर खेल रहे थे। कुल मिलाकर उन्होंने कड़ी मेहनत की और अच्छा प्रदर्शन किया जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें सफलता मिली।

राष्टमंडल खेलों की समाप्ति पर कई विशेषज्ञ इस बात पर चिंता जाहिर कर रहे थे कि क्या इतनी जल्दी हमारे खिलाड़ी फिर से अपने आप को तैयार करके वैसा ही प्रदर्शन दोहरा पाएंगे जैसा उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में किया। खिलाडिय़ों ने हाल के दिनों में अपने आप को मिले दो मौकों पर साबित कर दिया है और आगे भी अगर मौका मिलेगा तो वे किसी से पीछे नहीं रहेंगे और साबित कर देंगे। अब सरकार की बारी है कि वह इन नये सितारों को दिश दे जिससे यह और ऊंचाईयों को छू सकें।

मुझे लगता है अब क्रिकेट क्रिकेट का शोर बंद होना चाहिए। क्रिकेट के अलावा और भी खेल हैं। खास बात यह है कि ये खेल क्रिकेट जितना समय भी नहीं लेते और खिलाड़ी जीतकर भी दिखाते हैं। अब क्रिकेट के लिए पूरा दिन बर्बाद करने से कोई लाभ नहीं। हमें चीन की ओर देखना चाहिए, जो दो सौ स्वर्ण जीतने के करीब था। वह क्रिकेट नहीं खेलता। हम क्रिकेट में विश्व विजेता रहे लेकिन अन्य खेलों में कुछ नहीं कर पाए। अब जबकि नई पीढ़ी क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में रुचि ले रही है तो हमें उनका उत्साहवद्र्धन करना चाहिए। अगले कुछ समय में जनसंख्या के मामले में हम चीन को पीछे छोड़ देंगे। क्या यही एक क्षेत्र है जिसमें हम चीन को पछाड़ सकते हैं। हमारे युवा खिलाडिय़ों ने साबित कर दिया है कि बिना किसी खास टे्रनिंग के भी वे पदक जीत सकते हैं अगर उन्हें थोड़ा सा संबल मिल जाए तो वे और भी कमाल कर सकते हैं। हालांकि, हम लोग दिल्ली और दोहा को पीछे छोड़कर खुश हैं पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी तो यह आगाज है अब भारत सबकी निगाहों में आ गया है और अब असल परीक्षा शुरू होगी। शिखर पर पहुंचना आसान है लेकिन उसे कायम रखना मुश्किल होता है। अब यही मुश्किल काम हमें करना होगा।

मीडिया को भी इसमें अहम रोल अदा करना है। राष्ट्रमंडल खेल चूंकि दिल्ली में ही हो रहे थे, सो पदक जीतते ही मीडिया उन्हें अपने स्टूडियो में बुला रहा था। एक बारगी तो ऐसा लगा कि हर चैनल में होड़ सी है कि कौन सा चैनल पहले विजेताओं से बात करे। अब जबकि एशियन गेम्स के चैम्पियन आएंगे तो उनका स्वागत कैसे होता है। कौन चैनल विजेता के घर तक की स्थिति का जायजा लेता है। यह देखना होगा।

अक्सर क्रिकेट के अलावा किसी खेल में जीत के बाद कुछ देर तो हम उसे याद रखते हैं और फिर देखने लगते हैं क्रिकेट। अब इसमें बदलाव आना चाहिए। १९८३ का विश्वकप जीतने के बाद देश में क्रिकेट क्रांति आई थी। हर बच्चा क्रिकेटर बनना चाहता था। उसी का परिणाम है कि आज क्रिकेट में हम नम्बर वन हैं। अब जबकि जिमनास्टिक में भी देश का नाम रोशन हो चुका है तो बच्चों और युवाओं के साथ-साथ उनके अभिभावकों को भी सोचना चाहिए कि उनका बच्चा क्रिकेट में १३वां खिलाड़ी बन कर रहे या रेस में सबसे आगे आए। अब उन क्रिकेटरों से दूरी जरूरी है जो आराम करने के लिए समय तब मांगते हैं जब न्यूजीलैंड जैसी टीम हमारे घर में ही खेल रही है। उन्हें तब आराम की दरकार नहीं होती जब आईपीएल चल रहा होता है। आईपीएल में आराम न करने की वजह सब जानते हैं। अगर कोई क्रिकेटर वाकई देश के लिए खेलता है तो फिर आईपीएल से आराम ले ना कि किसी एक दिवसीय या टेस्ट शृंखला में। यह बदलाव का दौर है और मुझे यकीन है कि बदलाव खेल में भी आएगा…

हमें अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी

Posted: 28 Nov 2010 07:27 AM PST

भ्रष्टाचार के खिलाफ इस समय संसद में विपक्ष की एकजुटता देखते ही बनती है.विपक्ष अब भी जे.पी.सी. से कम पर मानने को तैयार नहीं है.लेकिन क्या विपक्ष वास्तव में भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करना चाहता है?नहीं,हरगिज नहीं.उसका मकसद इस मुद्दे पर सिर्फ हल्ला मचाना है.अगर ऐसा नहीं होता तो फ़िर मुख्य विपक्षी दल भाजपा भ्रष्टाचार के दर्जनों आरोपों से घिरे कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा को अभयदान नहीं दे देती.भ्रष्टाचार के विरुद्ध यह उसका कैसा जेहाद है कि तुम्हारा भ्रष्टाचार गलत और मेरा सही.भाजपा के इस पक्षपात ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रहे अभियान के रथ को किसी परिणति तक पहुँचने से पहले ही रोक दिया है.अब यह निश्चित हो गया है कि देश को निगल रहे इस महादानव के खिलाफ तत्काल कुछ भी नहीं होने जा रहा.पिछले १५-२० दिनों से विपक्ष ने जिस प्रकार से संसद में गतिरोध पैदा कर रखा है उससे जनता में इस लड़ाई के किसी सार्थक परिणाम तक पहुँचने की उम्मीद बंध गई थी.उम्मीद बंधाने में सबसे बड़ा हाथ रहा है मीडिया का.हालांकि मैं इसमें मीडिया की कोई गलती नहीं मानता.विपक्ष इस मुद्दे पर कुछ इस प्रकार से आक्रामक हो ही रहा था कि कोई भी भ्रम में आ जाए.लेकिन अब भाजपा ने कर्नाटक में येदुरप्पा को अपदस्थ नहीं करने का निर्णय लेकर मोर्चे को ही कमजोर कर दिया है.जाहिर है हम इस लड़ाई में किसी भी राजनैतिक पार्टी पर भरोसा नहीं कर सकते.ये दल खुद ही भ्रष्ट हैं,फ़िर क्यों ये हमारी लड़ाई लड़ने लगे?जिस तरह अमेरिका भारत के लिए आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ सकता उसी तरह ये राजनैतिक दल भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारे लिए नहीं लड़ने वाले.यह लड़ाई हमारी लड़ाई है और हमें खुद ही लड़नी पड़ेगी.उधार के कन्धों से लड़ाई जीती नहीं जाती बल्कि हारी जाती है.अब यह हम पर निर्भर करता है कि इस लड़ाई को हम कब शुरू करते हैं.अलग-अलग होकर लड़ते हैं या एकजुट होकर.अलग-अलग होकर हमारी केवल और केवल हार ही संभव है.एकसाथ होकर लड़ेंगे तो निश्चित रूप से जीत हमारी होगी और भ्रष्टाचार की हार होगी.देश में वर्तमान किसी भी राजनैतिक दल या राजनेता में वह नैतिक बल नहीं कि वह देश के लिए आतंकवाद और वामपंथी उग्रवाद से भी बड़ा खतरा बन चुके देश के सबसे बड़े दुश्मन भ्रष्टाचार के विरुद्ध होने वाली इस अवश्यम्भावी और अपरिहार्य बन चुकी लड़ाई में जनमत का नेतृत्व कर सकें.इसके लिए हमें नया और पूरी तरह से नया नेतृत्व तलाशना होगा.लेकिन यह भी कडवी सच्चाई है कि सिर्फ नेतृत्व के बल पर आन्दोलन खड़ा नहीं किया जा सकता.इसके अलावा लाखों की संख्या में तृणमूल स्तर पर जनता को प्रेरित करने वाले कार्यकर्ताओं की भी आवश्यकता होगी.कब उठेगा गाँव-गाँव और शहर-शहर के जर्रे-जर्रे से भ्रष्टाचार के खिलाफ गुब्बार मैं नहीं जानता.कैसे संभव होगा यह यह भी मैं नहीं जानता.मैं तो बस इतना जानता हूँ कि ऐसा गुब्बार बहुत जल्द ही दूर रक्तिम क्षितिज से उठेगा और देखते ही देखते पूरे देश को अपनी जद में ले लेगा.फ़िर भारत के राजनैतिक आसमान पर जो सूरज उगेगा वह निर्दोष और निर्मल होगा,ईमानदार होगा और अमीर-गरीब सब पर बराबर की रोशनी डालने वाला होगा.

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JANOKTI : जनोक्ति


नये लिक्खाड़ बंधुओं का आगमन

Posted: 27 Nov 2010 08:55 AM PST

जब से ब्लोगवाणी गया चिट्ठाजगत में सनसनी का माहौल ख़त्म हो गया है | चारों तरफ चिर शांति का माहौल है हिंदी ब्लॉग संकलक ” चिट्ठाजगत ” के मेल प्राप्त कर्ताओं के अतिरिक्त हिंदी के पाठकों को नये-नये हिंदी चिट्ठों की जानकारी ना के बराबर मिल पाती है | चलिए आज जानते हैं कि ब्लॉगजगत में क्या हलचल चल रही है | कौन-कौन से नये लिक्खाड़ बंधुओं का आगमन हुआ है ?
1. MY~LIFE~SCAN (http://mylifescan.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: डॉ. नूतन – नीति

2. RAJIV DWIWEDI (http://dwiwedi.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: BHARAT

3. manubhartia (http://manubhartia.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: manu

4. Amit Pathe Pawar (http://amitpathe.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Amit Pathe

5. jharkhand ki aitihasik kahaniyan (http://jharkhanditihas.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: dilip kumar tetarbe

6. Bollywood News Gossip (http://bollywoodnewsgossip.wordpress.com)
चिट्ठाकार: bollywoodnewsgosip

7. आपके ब्लॉग का शीर्षक (http://oshoamritvachan11.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: chetna

8. ANILCHANDRA THAKUR (http://acthakur.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: APOORVA

9. जिन्दगी के रंग (http://jindagikerang.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: सुशील बाकलीवाल

10. उभरता ‘साहिल’ (http://saahilspoetry.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: ‘साहिल’

11. KAVYA SANGAM (http://kavyasangam.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Kavya Sangam

12. The Heritage (http://pryag-ek-khoj.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Pryag Anveshan

13. news7 xpress (http://news7xpress.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: HINDI MUNCH

14. Thakur Islam (http://thakurislam.blogspot.com/) समाज
चिट्ठाकार: Thakur M.Islam Vinay

15. पूर्वाभास (http://poorvabhas.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: अवनीश सिंह चौहान

16. Bajrang Dal (http://bajrangdalsahibabad.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: bajrang dal

17. aayam (http://salil-aayam.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: aayam

18. प्रकाशित ब्लॉग पर (http://oshoamritvachan12.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: John

अन्य पढने योग्य चिकित्सा से सम्बंधित ब्लाग हैं–

बिहार का जनादेश

Posted: 27 Nov 2010 08:26 AM PST

बिहार का जनादेश क्या कहता है। सबके जेहन में यही बात है। क्या बिहारी अवाम ने जातिवाद को नकारकर सिर्फ और सिर्फ विकास के नाम पर वोट दिया है। या बिहार की जनता के पास एनडीए गठबंधन के अलावा कोई विकल्प नही था। या फिर लोगों को नीतीश में वह क्षमता दिखाई दी जो बिहार में विकास की नई कहानी लिखने का माददा रखता है। इस चुनाव में जो प्रचण्ड जनादेश एनडीए गठबंधन के पक्ष में आया उसने यह साफ कर दिया की भारतीय मतदाता के लिए विकास अब सबसे बड़ा मुददा है। यही कारण है कि लालू पासवान की जोड़ी को जनता ने आइना दिखा दिया। इस चुनाव ने एक बार फिर परिवारवाद को भी तमाचा मारा है। इसका जीता जागता उदाहरण राबड़ी देवी का दोनों विधानसभाओं राघोपुर और सोनपुर ने बुरी तरह आ गई। यह दोनों इलाके यादव बहुल और लालू के गड़ माने जाते हैं। मगर वोट को अपनी जागीर समझने वाले नेताओं को कौन समझाये कि जनता को ज्यादा दिन तक अंधेरे में नही रखा जा सकता। यह दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण है। इससे पहले मुलायम सिंह की बहू को फिरोजाबाद से जनता नकार चुकी है। यह इलाका भी मुलायम सिंह का गड़ माना जाता है। सवाल यह कि क्या यह उन नेताओं के लिए सन्देश है जो परिवारवाद को बड़ावा दे रहे है। सबसे बुरी दशा कांग्रेस की हुई है। वह कांग्रेस जो केन्द्र में है जिसके पास सोनिया और राहुल है। दरअसल कांग्रेसी हमेशा इस गलत फहमी में रहते है की यह दोनों नेता उनकी जीत को हार में बदल देंगे। नतीजा यह रहा कि राहुल गांधी ने जिन 17 जगहों पर बिहार में प्रचार किया वहां एक दो जगह छोड़कर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। आजादी के इन 6 दशकों में बिहार में कांग्रेस राजद और एनडीए गठबंधन ने राज किया। इनमें लालू राज में बिहार की हालत बद से बदतर हो गई। कानून व्यवस्था को लेकर बिहार सुर्खियों में रहने लगा। नीतीश ने इसी नब्ज को दबाया और 50 हजार से ज्यादा अपराधियों को जेल में डाल दिया। नतीजा लोग अब देर सबेर कहीं भी आ जा सकते है। दूसरा काम सड़कों के निर्माण का। तीसरा दलितों और अकलियतों में अति दलितों का पहचान कर उनके विकास के लिए कार्यक्रम चलाना। महिलाओं को पंचायत और शहरी निकाय में 50 फीसदी आरक्षण प्रदान करना। आज बिहार में लोग प्राथमिक चिकित्सालय में इलाज के लिए आ रहे हैं। लोगों में विकास की एक नयी ललक जगी है। जरूरत है इस ललक को बनाये रखना। नीतीश कुमार 2015 में बिहार को विकसीत राज्या बनाने की बात कर रहें है। मगर इसके लिए उन्हें निवेश के लिए उद्योगपतियों को बिहार में बुलाना पड़ेगा। अपने वादे के मुताबिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बेहतर बनाना होगा। पलायन रोकने के लिए कुछ बड़े कदम उठाने होंगे।

युवाओं से आह्वान

Posted: 27 Nov 2010 08:19 AM PST

हम युवाओं से आह्वान करते हैं की वे हमारी पार्टी में शामिल होंअंग्रेजों के ज़माने की पार्टी है, केवलअंग्रेजों के ज़माने की पार्टी है; अपितु अंग्रेजों के नक़्शेकदम पर ही चलने वाली भी एक ही पार्टी है

हमें ऐसे युवाओं की जरुरत है जो पढ़ेलिखे हों पर अक्ल(मंद) हो उन्हें जीहजूरी, चमचागिरी, पार्टी के नेताओं की जयजयकार करने में गर्व का अनुभव होजो नरमादा में अंतर समझें, लिव इन …. के समर्थक होंजो बिना रीढ़ वाले हों, जो हमेशा हमारी (खानदानी) जय बोल सकें, जिनमे भारतभारतीयता के प्रति कोई भाव हों,
जो कोई काम नहीं करना चाहते, जो बिना मेहनत के खाना चाहते हैं, जो तिकड़म लगा सकते हैं, जो आम जनता को मूर्ख बना सकते हैं, जो लड़नेमरने में भी कम हों, बदमाश और दबंग प्रकार के युवा हमें अपनी पार्टी के लिए चाहिए

कमाई ! कमाई की चिंता करें इस मामले में हमारी पार्टी का इतिहास देख लेंहमारे पूर्वजों ने आजादी के कई वर्षों बाद तक उन्हें भी स्वतंत्रता सेनानी बना दिया था जो केवल हमारे कार्यकर्त्ता थेउनके वंशज आज तक बिना कुछ किये कराये ही पेंशन ले रहे हैंऔर जो हमारी पार्टी में नहीं था वह चाहे कैसा ही क्रन्तिकारी था उसके वंशज आज भी छोटेमोटे काम करके जीवन गुजार रहे हैंये तो केवल एक उदहारण था कमाई काइसी आधार पर हम आज भी अपने कार्य कर्ताओं का ध्यान रखते हैंहमारा ग्राम स्तर का कार्यकर्त्ता भी चुनावों में अच्छाखासा कमा लेता हैकुछ वर्षों में ठेकेदारी और अन्य कार्य, ‘जो गोपनीय होते हैं और आम जनता को नहीं पता लगने चाहिएउसे करने जाते हैं । जिससे वह अपनी जिंदगी अय्याशी से गुजार सकता है

वैसे तो कमोबेश आज की सभी पार्टियों में अपने कार्यकर्ताओं का इसी तरह ध्यान रखा जाता है, पर हमारी पार्टी इन सबसे अलग है इन्होने ये सब हमसे सीखा है इसलिए हम गुरु हैं ये चेले हैंहमारा विश्वास करो कि हम अगर सत्ता में न भी आये तो इतना कमा कर जमा कर रखा है कि तुम्हें भूखे नहीं मरने देंगे | इसलिए केवल हमारी पार्टी में ही शामिल हों |

अल्प विराम,पूर्ण विराम

Posted: 27 Nov 2010 08:18 AM PST

पिछले दो दिनों से मैं कम्प्यूटर से दूर था.मेरे जीवन में अल्पविराम आ गया था.वजह यह थी कि विधाता ने मेरे सबसे छोटे चाचा की जिंदगी में पूर्णविराम लगा दिया.यूं तो भाषा और व्याकरण में पूर्णविराम के बाद भी वास्तविक पूर्णविराम नहीं होता और फ़िर से नया वाक्य शुरू हो जाता है.लेकिन जिंदगी में पूर्णविराम लग गया हो तो!दुनिया के सारे धर्म इस रहस्य का पता लगाने का प्रयास करते रहे हैं.बहुत-सी अटकलें लगाई गई हैं दार्शनिकों द्वारा.लेकिन चूंकि सिद्ध कुछ भी नहीं किया जा सकता है इसलिए नहीं किया जा सका है.ईसाई और इस्लाम इसे पूर्णविराम मानते हैं तो सनातन धर्म का मानना है कि मृत्यु के बाद फ़िर से नया जीवन शुरू हो जाता है और यह सिलसिला लगातार चलता रहता है.जिंदगी में हम कदम-कदम पर किन्तु-परन्तु का प्रयोग करते हैं लेकिन मृत्यु कोई किन्तु-परन्तु नहीं जानती.कब,किसे और कहाँ से उठाना है को लेकर उसके दिमाग में कभी कोई संशय नहीं होता.वह यह नहीं जानती कि मरनेवाला १०० साल का है या ५० का या फ़िर १ साल का.जिंदगी का वाक्य अभी अधूरा ही होता है और वह पूर्ण विराम लगा देती है.उसका निर्णय अंतिम होता है.ऑर्डर इज ऑर्डर.मेरे चाचा की उम्र अभी मात्र ४५ साल थी.बेटी की शादी करनी थी.तिलकोत्सव भी संपन्न हो चुका था.लेकिन अचानक जिंदगी समाप्त हो गई,बिना कोई पूर्व सूचना दिए जिंदगी के नाटक से भूमिका समाप्त.मुट्ठी से सारा का सारा रेत फिसल गया.चचेरा भाई अभी ६ठी जमात में पढ़ रहा है.उसे अभी मौत के मायने भी पता नहीं हैं.दाह संस्कार के दौरान भी वह निरपेक्ष बना रहा.हमने जो भी करने को कहा करता गया.नाजुक और नासमझ कन्धों पर परिवार का बोझ.गाँव की गन्दी राजनीति से संघर्ष.उसे असमय बड़ा बनना पड़ेगा.मुझसे भी बड़ा.हालांकि वह मुझसे २२-२३ साल छोटा है फ़िर भी.इस पूर्णविराम ने उसके मार्ग में न जाने कितने अल्पविराम खड़े कर दिए हैं.वैसे अंधाधुध विक्रय के बावजूद इतनी पैतृक संपत्ति अभी शेष है कि खाने-पीने की दिक्कत नहीं आनेवाली.लेकिन ऊपरी व्यय?बहन की शादी तो सिर पर ही है.खेती की गांवों में जो हालत है उसमें तो बड़े-बड़े जमींदारों की माली हालत ठीक नहीं.वैसे मैं भी मदद करूँगा जब भी वह मेरे पास आएगा.लेकिन गाँव के लोग क्या उसे मेरे पास आने से रोकेंगे नहीं?बैठे-निठल्ले लोगों के पास सिवाय पेंच लड़ाने के और कोई काम भी तो नहीं होता.मेरे अन्य जीवित चाचा लोग जिनके वे मुझसे ज्यादा नजदीकी थे,ने उनके परिवार से किनारा करना भी शुरू कर दिया है.मैंने अनगिनत लोगों के दाह-संस्कार में भाग लिया है.लेकिन हर बार प्रत्येक मरनेवाले के परिवार के साथ सहानुभूति रही है,स्वानुभूति नहीं.पहली बार दिल में किसी के मरने के बाद दर्द हो रहा है.आखिर मरनेवाला मेरे घर का जो था.अनगिनत अच्छी बुरी यादें हैं उनसे जुड़ी हुई.लोग जब मृतक-दहन चल रहा था तब चुनाव परिणाम का विश्लेषण करने में लगे थे.कुछ लोग अभद्र मजाक में मशगूल थे.परन्तु मैं वहीँ पर सबसे अलग बैठा गंगा किनारे की रेतीली मिट्टी में चाचा के पदचिन्ह तलाश रहा था.अंतिम यात्रा के पदचिन्ह!!!

छात्रसंघ की बहाली लोकतान्त्रिक अधिकार

Posted: 27 Nov 2010 06:50 AM PST

भारतीय राजनीति आज समाजसेवा का माध्यम न रहकर सत्ता प्राप्ति और सुनियोजित तरीके से जनता की मेहनत की कमाई को लूटने का जरिया बन गई है।लोकसभा चुनावों में,विधानसभा चुनावों में,पंचायती चुनावों में प्रत्याशियों के द्वारा चुनाव में विजयी होने के लिए अपनाये जाने वाले अनैतिक एवं असंवैधानिक कृत्यों को सभी जानते भी हैं और स्वीकारते भी हैं।समस्त राजनैतिक दल पूरे जोशो-खरोश से युवा वर्ग को आकर्षित करने के लिए नाना प्रकार के लोक-लुभावन वायदे करते नजर आते हैं।अधेड़ हो चुके अपने अनुभव हीन पुत्रों को तमाम राजनेता युवा नेता के रूप् में प्रस्तुत करके किसी साज-सज्जा की,उपभोग की वस्तु की तरह प्रचारित-प्रसारित करने में करोड़ों रूपया खर्च कर चुके हैं।आज 18वर्ष की उम्र का कोई भी युवा अपना मत चुनावों में अपना जनप्रतिनिधि निर्वाचित करने में दे सकता है।

लोकतंत्र का दुर्भाग्य कहें या वंशानुगत राजनीति का प्रभाव कहें कि भारत में प्रधान से लेकर सांसद तक के निर्वाचन में अपना मत देने वाला युवा वर्ग अपने शिक्षण संस्थान में अपना छात्र-संघ का प्रतिनिधि नहीं निर्वाचित कर सकता है।कारण है छात्र संघों का निर्वाचन बन्द होना।छात्र राजनीति लोकतांत्रिक राजनीति की प्रयोगात्मक,शिक्षात्मक व प्राथमिक पाठशाला होती है और इस राजनीति पर प्रतिबन्ध लगाकर अपने क्षमता के बूते छात्र-छात्राओं के हितों के लिए संघर्ष करके राजनीति में आये गैर राजनैतिक पृष्ठभूमि के होनहारों को राजनीति में अपना स्थान बनाने से रोकने के लिए यह दुष्चक्र रचा गया है।यह दुष्चक्र युवा वर्ग ही तोडेगा,इसमें तनिक भी सन्देह की गुंजाइश नही है।क्या सिर्फ इस दौरान आम युवा वर्ग को राजनीति में आने से रोकने का दुष्चक्र रचा गया है?नहीं…..छात्र-संघ पर प्रतिबन्ध लगाना,युवा वर्ग राजनीति में प्रवेश न करे इसका प्रयास पूर्व में भी किया गया है।लेकिन घ्यान रखना चाहिए कि भारत ही नहीं समूचे विश्व के इतिहास में जब भी तरूणाई ने अव्यवस्था के खिलाफ अंगड़ाई मात्र ही ली तो परिणामस्वरूप बड़ी-बड़ी सल्तनतें धूल चाटने लगी।क्रांति व युद्ध का सेहरा सदैव नौजवानों के ही माथे रहा है।छात्र-संघ बहाली की लड़ाई ने अब जोर पकड़ना प्रारम्भ कर दिया है।केन्द्र सरकार की सर्वेसर्वा सोनिया गाँधी को इलाहाबाद यात्रा के दौरान छात्रों विशेषकर समाजवादी पार्टी के युवाओं ने भ्रष्टाचार-महॅंगाई आदि मुद्दों पर अपने विरोध प्रदर्शन से लोहिया के अन्याय के खिलाफ संघर्ष के सिद्धान्त को कर्म में उतार कर खुद को साबित किया है।अब छात्र-छात्राओं,युवा वर्ग को अपने जनतांत्रिक अधिकार की लड़ाई लड़कर अधिकार हासिल करके खामोश नहीं बैठना है वरन् सतत् संघर्ष का रास्ता अख्तियार करके वंशानुगत राजनीति की यह जो विष बेल बड़ी तेजी से भारतीय लोकतंत्र में फैल रही है,इसकी जड़ में मठ्ठा डालने का काम भी करना है।छात्र-संघों का चुनाव न कराना एक बड़ा ही सुनियोजित षड़यंत्र है-आम जन के युवाओं को राजनीति में संघर्ष के रास्ते से आने की।

इसी प्रकार से जंग-ए-आजादी के दौरान तमाम् नेता विद्यार्थियों को राजनीति में,क्रांति के कामों में हिस्सा न लेने की सलाहें देते थे,जिसके जवाब में क्रांतिकारियों के बौद्धिक नेता भगत सिेह ने किरती के जुलाई,1928 के अंक में सम्पादकीय विचार में एक लेख लिखा था।इस लेख में भगत सिंह ने लिखा था,-”दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है?महात्मा गाँधी,जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति,पर कमीशन या वाइसराय का स्वागत करना क्या हुआ?क्या वह पोलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं?सरकारों और देशों के प्रबन्ध से सम्बन्धित कोई भी बात पोलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जायेगी,तो फिर यह भी पोलिटिक्स हुई कि नहीं?कहा जायेगा कि इससे सरकार खुश होती है और दूसरी से नाराज?फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराजगी का हुआ।क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही खुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए?हम तो समझते हैं कि जब तक हिन्दुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफादारी करने वाले वफादार नहीं,बल्कि गद्दार हैं,इन्सान नहीं,पशु हैं,पेट के गुलाम हैं।तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफादारी का पाठ पढ़ें।”

आज भगत सिंह के इस लेख के 82 वर्ष एवं भारत की ब्रितानिया दासता से मुक्ति के 63वर्ष बाद भी युवा वर्ग को मानसिक गुलामी का पाठ पढ़ाने का,वंशानुगत राजनैतिक चाकरी करवाने का दुष्चक्र रचा गया है।छात्र-संघ को बहाल न करना तथा अपने दल में छात्र व युवा संगठन रखना राजनैतिक दास बनाने के समान नहीं तो ओर क्या है?क्रांतिकारियों के बौद्धिक नेता भगत सिंह ने अपने इसी लेख में आगे लिखा,-”सभी मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की जरूरत है,जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी के लिए न्यौछावर कर दें।लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे?क्या परिवार और दुनियादारी के झंझटों में फॅंसे सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल सकेंगे?यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फॅंसे हों और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो।”

आज आजाद भारत में छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हरण किया जा रहा है।सत्ताधारी दलों की निरंकुशता का चाबुक छात्र हितों व छात्र राजनीति पर बारम्बार प्रहार करके राजनीति के प्राथमिक स्तर को नष्ट करने पर आमादा है।इन छात्र-युवा जन विरोधी सरकारों को छात्र-संघ बहाली का ज्ञापन देना,इनसे अपने अधिकारों की बहाली की मांग करना अन्धे के आगे रोना,अपना दीदा खेाना के समान है।सन् 1960-62 में डा0राम मनोहर लोहिया ने नारा दिया था-देश गरमाओं।जिसका अर्थ है,-”आदमी को अन्याय और अत्याचार पूर्ण रूतबे से लड़ने के लिए हमेशा तैयार करना।दरअसल अन्याय का विरोघ करने की अीदत बन जानी चाहिए।आज ऐसा नहीं है।आदमी लम्बे अर्से तक गद्दी की गुलामी और बहुत थोडें अर्से के लिए उससे नाराजगी के बीच एक अन्तर करता रहता है।”वर्तमान समय में छात्र संघ की बहाली व छात्र हितों की आवाज उठाने वाले लोगों को शासन-सत्ता व भाड़े के गुलामों के दम पर कुचलने का प्रयास किया जा रहा है।छात्र संघ बहाली के लिए आंदोलित सभी छात्र-युवा संगठनों को एक साथ आकर अनवरत् सत्याग्रह व हर सम्भव संघर्ष का रास्ता अख्तियार करना चाहिए।

काम को इनाम (बिहार चुनाव परिणाम)

Posted: 27 Nov 2010 06:20 AM PST

बिहार विधान सभा चुनाव परिणाम में एनडीए को तीन चौथाई बहुमत का मिलना यह जताता है कि “जो सरकार काम करेगी वही राज करेगी”। पिचले पांच सालों में एनडीए कि सरकार ने बिहार में जो काम किया उसके एवज में बिहार के लोगों ने जातिवाद की रेखा को पार कर अपने मताधिकार का प्रयोग कर एक ऐसे गठबंधन पार्टी को पूर्ण जनादेश दिया जो पिचले पांच वर्षो में काम कर बिहार को जंगल राज से उबार एक ऐसे रास्ते पर अग्रसर किया जहाँ से बिहार की अपनी पहचान बनानी शुरू हुई। आज बिहार की जो गरिमा बनी है वह पिछले एनडीए सरकार की देन है।
अगर हम पिछले पांच वर्षों को छोड़ दें और उसके पीछे के पंद्रह वर्षों के अतीत में झांके तो एक बदहाल बिहार नज़र आता है। जहाँ उंच-नीच का वेदभाव, जाति-जाति में टकराव, नक्सलवाद का बोलबाला, फलता-फूलता अपहरण उद्योग, अपराधिक एवं राजनितिक सांठ-गाँठ, अपराधिक तत्वों का बोलबाला, ला एंड आडर का बुरा हाल, जर्जर सड़कें, सरकारी हस्पतालों का बुरा हाल, शिच्छा के स्तर का मटियामेट होना, बंद पड़े उद्योग धंधे, जीने का आधार ख़त्म (तभी तो हर तबके का पलायन हुआ बिहार से) यानि पूरी तरह बर्बाद बिहार नज़र आता है।
फिर आता है २००५ का बिहार विधान सभा चुनाव। धन्य हो चुनाव आयोग की टीम धन्य हो श्री के.जे.राव जिनकी सक्रियता के चलते बिहार में निष्पच्छ चुनाव हो सका और एनडीए की सरकार सत्ता में आ सकी। अगर चुनाव आयोग के पहल में कही भी थोड़ी सी भी त्रुटी होती तो फिर से आरजेडी की सरकार सत्ता पर काबिज़ होती और बिहार में फिर वही सब होता जो पिछले पंद्रह सालों तक होता रहा था।
बिहार विधान सभा चुनाव २००५ में एनडीए की सरकार श्री नितीश कुमार की अगुवाई में बनी। पूरी तरह से बर्बाद बिहार को एक नया आयाम देने के लिए नितीश कुमार ने कमर कस ली। उन्होंने बिहार के लिए कुछ सपने पाल रखे थे और फिर उन सपनो को साकार करने में जुट गए। वह पिछली सरकार की नीतियों पर न चल कर खुद की बनाई नीतियों पर चलना शुरू किया। जिसमे शामिल था बिहार में कानून का राज, ताकि लोग अमन चैन से जीवन बसर कर सके, सड़कें जो पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी उसे ठीक करना, सरकारी हस्पतालों की जर्जर स्थिति से ऊपर उठाना, आधी आबादी (महिला) को उनका हक देना, शिच्छा के स्तर को ऊपर उठाना, बिहार में बाहरी उद्योगपतियों को आकर्षित करने के लिए एक अच्छा माहौल बनाना, बिजली उत्पादन को बढ़ाना तथा आत्म निर्भर बनना, बिहार के लोगों को रोज़गार धंधे मुहैया करना (ताकि बिहारियों का पलायन रुक सके), उच्च शिच्छा के लिए बिहार में ज्यादा से ज्यादा कालेज एवं यूनिवर्सिटी का खुलवाना ताकि उच्च शिच्छा प्राप्त करने के लिए बिहार से बिहारी लड़कों का पलायन रुक सके।
श्री नितीश कुमार ने पिछले पांच वर्षो में अपने बनाये सभी नीतियों पर पूरी तरह अमल करते हुए एक पिछड़े राज्य को अग्रसर राज्य कि श्रेणी में लाये और बिहार विकाश के राह पर पूरी तरह दौड़ने के लिए तैयार हो गया है। इसीलिए बिहार कि जनता ने भी उम्मीद से ज्यादा जनादेश (विश्वाश) देकर श्री नितीश कुमार के हाथो में बिहार कि बाग डोर थमा दी क्यों कि अपने से ज्यादा उसे नितीश कुमार पर विश्वाश है।
अब मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार अपने गढ़े हुए सपनो का बिहार बनाने के लिए स्वतंत्र है क्यों कि उनके राह में अब विपच्छ भी नहीं है।

>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


1 लाख 76 हजार करोड़ का घोटाला|

Posted: 26 Nov 2010 02:41 AM PST

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देश के विकास में इंजन की भूमिका निभा सकता है बिहार

Posted: 26 Nov 2010 12:40 AM PST

बिहार की जनता ने अभूतपूर्व और ऐतिहासिक जनादेश देकर राजग गठबंधन को बिहार के विकास की जिम्मेदारी सौंपी है | सर्वप्रथम मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी को इस विकास आधारित विजय पर हार्दिक शुभकामनायें !

बिहार की जनता ने आखिरकार जातिवाद की जकड़न को तोड़ते हुए विकास की राजनीति पर मुहर लगा हीं दिया | बिहार में एक नया सवेरा है , जहाँ आम आदमी के सपने हैं बिहार को पुनः विश्व गौरव बनाने का , और इन सपनों को पूरा करने की बड़ी जिम्मेवारी नीतीश कुमार के कन्धों पर है |

लोकतंत्र में सरकार का पहला काम कानून का शासन सुनिश्चित करना है | राज्य सत्ता की अपनी पहली पारी में नीतीश कुमार ने कानून -व्यवस्था को दुरुस्त किया है | आज पीढ़ियों से अराजकता से पीड़ित आम आदमी फिर से सड़कों पर सुरक्षित रूप से चल सकता है | चुनाव परिणाम वाले दिन टेलीविजन पर बहस के दौरान कई लोग बिहार में विकास की बात को नकार रहे थे | लेकिन वो भूल रहे थे कि नीतीश को जो बिहार शासन के लिए मिला था वह बिहार पंद्रह सालों के जंगलराज से ग्रसित था | तत्कालीन बिहार में विकास के लिए प्रदेश में कानून -व्यवस्था का सुचारू रूप से संचालन पहली प्राथमिकता थी जिसे नीतीश ने बखूबी निभाया | राज्य के छोटे-बड़े माफियाओं को सलाखों के पीछे पहुँचाया | पुलिस -प्रशासन में व्याप्त कुव्यवस्था को दुरुस्त करते हुए राज्य में अधिकारियों को और अधिक कुशल बनाया | हर थाने से लेकर डीएम ऑफिस में जनता दरबार का प्रचलन शुरू किया ताकि आम आदमी को न्याय-व्यवस्था में सुविधा मिल सके | भ्रष्टाचार के विरुद्ध बंद पड़ी राज्य की जांच एजेंसियों को पुनर्जीवित किया |

राज्य में नई-पुरानी सडकों का निर्माण राजग सरकार की एक महत्पूर्ण उपलब्धि है जिसको लेकर भी जनता का विश्वास नीतीश के ऊपर बना हुआ है | नीतीश सरकार ने प्रदेश में गड्ढों वाली सडकों को चलने लायक बनाया और सालों से अटके पड़े फ्लाईओवरों का काम पूरा किया | नीतीश राज में प्रदेश की स्थिति आश्चर्यजनक रूप से सुधरी है | यह सच है कि एक नागरिक को जो चाहिए, वह अभी वहां प्राप्त नहीं है | लेकिन एक आदर्श राज्य का महल खड़ा करने के लिए पिछले कार्यकाल में राजग सरकार ने सुशासन की नींव रखी है |

लोगों के रहने के लिए आज बिहार एक सुरक्षित स्थान के रूप में अपनी स्वीकार्यता हासिल कर रहा है | अब ऐसी स्थिति पैदा हो गयी है जब सरकार राज्य के आर्थिक पुनरुत्थान पर ध्यान केंद्रित कर सकती है | राज्य में बुनियादी ढांचों के निर्माण की दिशा में राजमार्गों और फ़्लाइओवरोन से शुरुआत की जा चुकी है | राज्य में बाहरी निवेश के साथ-साथ पारंपरिक कृषि और कुटीर उद्योगों तथा नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्रों में नई परियोजनाएँ शुरू करने के लिए उद्योगपतियों को आमंत्रित किया गया है , हालांकि ज्यादातर परियोजनाएं मंजूर के स्तर पर बनी हुई है | और सरकार की नई पारी में तमाम विकास परियोजनाओं को फाइलों से निकाल कर जमीनी रूप देने का कार्य करना नीतीश सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए |

अगले पांच वर्षों में नीतीश सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती शैक्षिक क्षेत्र में बिहार को आत्मनिर्भर बनाने की होगी | देखा जाए तो देश के किसी अन्य राज्य की अपेक्षा बिहार की जनता की प्राथमिकताओं में शिक्षा सबसे ऊपर रहती है | अभिवावक अपने जरूरतों की अनदेखी करके भी अपने बच्चों के लिए शिक्षा सुनिश्चित करते हैं | दुर्भाग्य से, राज्य में अनिश्चित माहौल और स्थानीय शिक्षण संस्थानों की निराशाजनक स्थिति के कारण, वे अपने बच्चों को भेजने के लिए विवश हैं | राज्य से पलायन में कामगारों से अधिक विद्यार्थी वर्ग का योगदान है जो उच्च शिक्षा के लिए और तदनुपरांत उपयुक्त नौकरी के लिए राज्य से बाहर जाते हैं | एक अध्ययन के मुताबिक राज्य के मेधावी युवा राज्य से बाहर अध्यनरत हैं और जो आर्थिक तंगी की वजह से बाहर नहीं जा सकते वैसे छात्र अक्सर दसवीं या बारहवीं के बाद अपनी पढाई छोड़ कर छोटे-मोटे धन्धों में लग जाते हैं या बेरोजगार हैं |

केवल बौद्धिक पलायन हीं नहीं अपितु बिहार के लोगों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा राज्य से हर वर्ष बाहर जाता है | अनुमानतः एक छात्र साल भर में औसतन दो लाख रुपये अपनी पढाई पर बाहर रहकर खर्च करता है और ये पैसा कुल मिलाकर चालीस हजार करोड़ रूपये से भी ज्यादा है | अगर राज्य में प्राथमिक शिक्षा के साथ-साथ दिल्ली और बंगलौर की तरह उच्च शिक्षा की उपयुक्त और गुणवत्ता वाली व्यवस्था की जाए तो यह रकम वापस बिहार में लौटेगी | जो शुरुआत प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में , परिवहन के बुनियादी और सुविधाजनक मोड, अर्थात् साइकिल से लैस छात्रा के रूप में दिखाई पड़ती है | अब उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक पुनर्जागरण लाने का समय आ गया है | शैक्षिक उत्कृष्टता के नए केंद्रों को सीमित भूमि और पूंजीगत व्यय की तुलना की आवश्यकता होगी | बिहार में इस तरह के नए संस्थानों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों की उपलब्धता प्रचुर मात्र में है | यह अनुमान है कि राजधानी पटना में उच्च शिक्षा के कम से कम पांच इंजीनियरिंग या चिकित्सा या कम्प्यूटर संस्थानों का निर्माण और संचालन सुचारू रूप से किया जा सकता है | राज्य के अन्य छोटे शहरों और कस्बों में भी ऐसे दो संस्थान बनाये जाने चाहिए |

उच्च शिक्षा में पुनर्जागरण नये बिहार की नींव रखने के साथ-साथ भविष्य की आर्थिक समृद्धि को सुनिश्चित करते हुए अगले पांच सालों में अग्रणी राज्यों की कतार में सबसे आगे खड़ा होगा | हमें पूरी उम्मीद है कि इस प्रकार बिहार देश में विकास के लिए इंजन के रूप में उभर सकता है |

समाजवादी आंदोलन – 2

Posted: 25 Nov 2010 10:31 PM PST

संघर्ष से आएगा समाजवाद

समाजवाद और समाजवादी आन्दोलन ही किसानों,मजदूरों,छात्र-छात्राओं,महिलाओं एवं आम जनों के अधिकार बहाली का एकमात्र रास्ता है। पूंजीवाद का राक्षस समाज के प्रत्येक अंग को निगल चुका है।भ्रष्टाचारियों का काकस समाज व देश का रक्त चूसता ही चला जा रहा है। पूंजीवाद के राक्षस और भ्रष्टाचार के दानव का मुकाबला आम जन में सदाचरण,नैतिकता,सामूहिकता,सामाजिक एकता व देश-प्रेम के बीज रोपित,अंकुरित,पोषित व पल्लवित करके ही किये जा सकते हैं।शासन सत्ता के जिम्मेदार लोग भ्रष्टाचार में सराबोर होकर बेशर्मी का लबादा पहने हुए भारत के लोकतन्त्र को भीड़तन्त्र में तब्दील करके एक कुशल चरवाहे की तरह भारतीय जनमानस को जानवरों की मानिन्द हांक रहें हैं।

जनता के प्रतिनिधि आज अव्वल दर्जे के स्वार्थी हो गये हैं।राजनीति में सत्ता प्राप्ति और सत्ता प्राप्ति के पश्चात् जनता के द्वारा दिये गये विभिन्न राजस्व करों से अर्जित धन से बने विकास कार्यों के प्रचुर धन की लूट व बन्दर-बाँट ही इनकी राजनीति का प्रमुख उद्देश्य बन चुका है।आज महामानव महात्मा गाँधी के ग्राम्य स्वराज्य की कल्पना अनियंत्रित व अनियोजित औद्योगीकरण के चलते दम तोड़ चुकी है।क्रांतिकारियों के बौद्धिक नेता भगत सिंह के अनुसार-क्रांति की वास्तविक सेनायें किसान व मजदूर हैं,और आज भी भारत का किसान अपनी कृषि गत् समसयाओं से परेशान है,किसान अपनी कृषि योग्य बेशकीमती भूमि के मनमाने अधिग्रहण से भयाक्रांत है।किसान को खाद,बीज,सिंचाई,बिजली,शिक्षा,स्वास्थ्य परक सुविधा कुछ भी समय पर पूर्णतःमयस्सर नहीं है।मजदूर कल-कारखानों के मालिकान की शोषक नीति के शिकार हो कर दयनीय जीवन जीने को मजबूर हैं।

डा0राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि लोग मेरी बात सुनेंगें जरूर,लेकिन मेरे मरने के बात।डा0लोहिया की बातें मात्र 12वर्ष की उम्र में ही आत्मसात् कर चुके,आज 72वर्ष की उम्र के मुलायम सिंह यादव ने डा0लोहिया के विचारों व समाजवाद की अग्नि को प्रज्जवलित करे रहने का बहुत ही बड़ा, नेक,सराहनीय व अनुकरणीय काम किया है।संघर्षों की ज्वाला में तपकर व समाजवादी मूल्यों की बदौलत मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनैतिक जीवन में अपना लोहा समस्त राजनैतिक दलों व नेताओं को मनवाया।मुलायम सिंह यादव की राजनैतिक-मानसिक दृढ़ता का कारण उनकी महात्मा गाँधी ,भगत सिंह,डा0लोहिया,चौधरी चरण सिंह जैसी महीन विभूतियों के आदर्शों,विचारों पर पकड़ और अनवरत् चलते रहने का संकल्प ही है,एैसा मेरा अपना मानना है।अब समाजवादी आन्दोलन,लोहिया के लोगों,समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं,मुलायम सिंह यादव के अनुयायियों को समाजवाद के मायने व समाजवादी आन्दोलन व कार्यक्रम पुनःपढ़ना चाहिए।डा0लोहिया के द्वारा प्रदत्त कार्यक्रम समाजवादी विचारधारा व आन्दोलन के प्राण हैं।डा0लोहिया के कार्यक्रमों पर चले बगैर,जनता को साथ लिए बगैर,सामाजिक चेतना का काम किए बगैर कोई भी पक्का समाजवादी कार्यकर्ता नहीं हो सकता है।अपने को समाजवादी कहने मात्र से,किसी समाजवादी संगठन में पदाधिकारी हो जाने मात्र से कोई समाजवादी नही हो जाता है।समाजवादी तो वही है जिसने समाजवाद के सिद्धान्तों को आत्मसात् किया हो,उन सिद्धान्तों पर चला हो,अड़िग रहा हो,जिसके लिए राजनीति सत्ता साधन मात्र हो-साध्य नही।समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव समाजवाद की कसौटियों पर खरे साबित हो चुके हैं।13मार्च,2003 को समाजवादी पार्टी के विशेष राष्टीय सम्मेलन में मुलायम सिंह यादव ने कहा,”क्या याद है,4-5नवम्बर1992 को जिस बेगम हजरत महल पार्क के ऐतिहासिक मैदान में फैसला लिया था,संकल्प किया था,क्या वह संकल्प याद है?क्या आप उस संकल्प पर चलने के लिए तैयार हैं?इसीलिए हम कहते हैं कि किस खेत की मूली है यह सरकार,चाहे वह दिल्ली की हो,चाहे उत्तर-प्रदेश की हो।हम लोग वे लोग हैं जो देश के गरीब लोगों के लिए इस देश के नौजवान विद्यार्थियों के लिए,इस देश के किसानों के लिए,झुग्गी-झोपड़ी वाले लोगों के लिए जिन्होंने 56साल की आजादी के बाद भी पक्की छत नहीं देखी,उनको छत दिलाने के लिए,नौजवानों को रोजगार दिलाने के लिए,किसानों की लूट बचाने के लिए,वैट द्वारा व्यापारियों को आतंकित करके उनका पूरा धंधा बर्बाद करने के खिलाफ,मॅंहगाई बढ़ाने के खिलाफ,इस देश के विकास के लिए,उत्तर प्रदेश के विकास के लिए,सारे हिन्दुस्तान के विकास के लिए,चाहे हम लोगों को खून नहीं,जीवन की आहुति भी देनी पड़ेगी तो देंगें,हम इस व्यवस्था को बदलेंगे।’

और आज नवम्बर,2010 में,वर्तमान परिस्थितियों में समाजवादी आन्दोलन से जुड़े लोगों विशेषकर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं,पदाधिकारियों को आम जनता के मुद्दों पर संघर्ष की तैयारी करके संगठन करना चाहिए।मुलायम सिंह यादव में यह क्षमता विद्यमान है कि वे जनता के हित के मुद्दों पर आन्दोलन खड़ा कर देते हैं।समाजवादी आन्दोलन को अब कर्म प्रधान कार्यकर्ताओं की पुनःआवश्यकता आन पड़ी है।देश की समस्याओं,जनता के बुनियादी अधिकार व समाज के प्रति कत्र्तव्यों पर मुखरित होकर ही समाजवादी आन्दोलन अपना विकास कर सकता है।राजनीति का व्यवसायीकरण व आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की राजनीति में प्रभावी कब्जेदारी के खिलाफ मोर्चा समाजवादियों को ही सम्भालना होगा।डा0लोहिया के कार्यक्रम क्रमशःसमान शिक्षा नीति,विशेष अवसर व समता के सिद्धान्त,चौखम्भा राज,पंचायती राज का अनुपालन,अल्पसंख्यकों की समस्याओं,न्यूनतम मजदूरी,कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण का विरोध,भारतीय संस्कृति का सर्व-धर्म समभाव प्रधान रूप,हिन्दी का प्रसार आदि वैचारिक क्रांति के रूप में हैं।इन कार्यक्रमों के जमीनी संचालन से एक लहर उत्पन्न होगी जो देश के समस्त समाजवादियों को जागृत करके देश को सशक्त-समृद्ध बनायेगी।प्रसिद्ध समाजवादी लेखक लक्ष्मीकांत वर्मा के कथनानुसार-कर्म और ज्ञान,बुद्धि और हाथ,चिन्तन और वाणी एक सजग प्रहरी के रूप में यदि समाजवादी आन्दोलन को दिशा देंगें और मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में निरन्तर धार पैदा होती रहेगी तो निश्चय ही समाजवादी आन्दोलन का भविष्य उज्जवल होगा।

समाजवादी आन्दोलन,डा0लोहिया की सोच,मुलायम सिंह यादव का समाजवादी राज्य स्थापना का प्रयास व संकल्प तभी साकार हो सकते हैं,जब समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता व पदाधिकारी कर्म के क्षेत्र में समाजवादी विचारों को आन्दोलन का स्वरूप प्रदान करें।

>महक जी, आपके बिना ब्लोग संसद में दिल नहिं लगता………

>महक जी, आपके बिना ब्लोग संसद में दिल नहिं लगता, कहाँ है आप?

यदि व्यस्त भी है तो एक बार दर्शन दिजिये………

आपके बिना ब्लोग संसद की कार्यवाही ठंडी पडी है।


सभी सदस्यों से अनुरोध सभी उनका पु्नरागमन आह्वान करे।



>भाजपा के लिये "जगीरा डाकू" का एक सामयिक संदेश…

>पहले कृपया यह वीडियो क्लिप देखिये, फ़िल्म का नाम है “चाइना गेट”, राजकुमार संतोषी की फ़िल्म है जिसमें विलेन अर्थात डाकू जगीरा के साथ एक गाँव वाले की लड़ाई का दृश्य है… जिसमें उस ग्रामीण को धोखे से मारने के बाद जागीरा कहता है… “मुझसे लड़ने की हिम्मत तो जुटा लोगे, लेकिन कमीनापन कहाँ से लाओगे…”… फ़िर वह आगे कहता है… “मुझे कुत्ता भाया तो मैं कुत्ता काट के खाया, लोमड़ी का दूध पीकर बड़ा हुआ है ये जगीरा…”… असल में डाकू जागीरा द्वारा यह संदेश भाजपा नेताओं और विपक्ष को दिया गया है, विश्वास न आता हो तो आगे पढ़िये –

डायरेक्ट लिंक – http://www.youtube.com/watch?v=KRyH0eexMpE

भाजपा से पूरी तरह निराश हो चुके लोगों से अक्सर आपने सुना-पढ़ा होगा कि भाजपा अब पूरी तरह कांग्रेस बन चुकी है और दोनों पार्टियों में कोई अन्तर नहीं रह गया है, मैं इस राय से “आंशिक” सहमत हूं, पूरी तरह नहीं हूं… जैसा कि ऊपर “भाई” डाकू जगीरा कह गये हैं, अभी भाजपा को कांग्रेस की बराबरी करने या उससे लड़ने के लिये, जिस “विशिष्ट कमीनेपन” की आवश्यकता होगी, वह उनमें नदारद है। 60 साल में कांग्रेस शासित राज्यों में कम से कम 200 दंगों में हजारों मुसलमान मारे गये और अकेले दिल्ली में 3000 से अधिक सिखों को मारने वाली कांग्रेस बड़ी सफ़ाई से “धर्मनिरपेक्ष” बनी हुई है, जबकि गुजरात में “न-मो नमः” के शासनकाल में सिर्फ़ एक बड़ा दंगा हुआ, लेकिन मोदी “साम्प्रदायिक” हैं, अरे भाजपाईयों, तुम क्या जानो ये कैसी ट्रिक है। अब देखो ना, गुजरात में तुमने “परजानिया” फ़िल्म को बैन कर दिया तो तुम लोग साम्प्रदायिक हो गये, लेकिन कांग्रेस ने “दा विंसी कोड”, “मी नाथूराम गोडसे बोलतोय” और “जो बोले सो निहाल” को बैन कर दिया, फ़िर भी वे धर्मनिरपेक्ष बने हुए हैं…, “सोहराबुद्दीन” के एनकाउंटर पर कपड़े फ़ाड़-फ़ाड़कर आसमान सिर पर उठा लिया लेकिन महाराष्ट्र में “ख्वाज़ा यूनुस” के एनकाउंटर को “पुलिस की गलती” बताकर पल्ला झाड़ लिया…। महाराष्ट्र में तो “मकोका” कानून लागू करवा दिया, लेकिन गुजरात में “गुजकोका” कानून को मंजूरी नहीं होने दी… है ना स्टाइलिश कमीनापन!!!

इनके “पुरखों” ने कश्मीर को देश की छाती पर नासूर बनाकर रख दिया, देश में लोकतन्त्र को कुचलने के लिये “आपातकाल” लगा दिया, लेकिन फ़िर भी तुम लोग “फ़ासिस्ट” कहलाते हो, कांग्रेस नहीं… बोलो, बराबरी कर सकते हो कांग्रेस की? नहीं कर सकते… अब देखो ना, कारगिल की लड़ाई को “भाजपा सरकार की असफ़लता” बताते हैं और एक “चेन स्मोकर” द्वारा पंचशील-पंचशील का भजन गाते-गाते जब चीन ने धुलाई कर डाली, तो कहते हैं “यह तो धोखेबाजी थी, सरकार की असफ़लता नहीं”…। चलो छोड़ो, अन्तर्राष्ट्रीय नहीं, देश की ही बात कर लो, संसद पर हमला हुआ तो भाजपा की असफ़लता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद अफ़ज़ल को फ़ाँसी नहीं दी तो इसे “मानवता” बता दिया…। एक बात बताओ भाजपाईयों, तुम्हारे बंगारू और जूदेव कहाँ हैं किसी को पता नहीं, लेकिन उधर देखो… 26/11 हमले का निकम्मा विलासराव देशमुख केन्द्र में मंत्री पद की मलाई खा रहा है, CWG में देश की इज्जत लुटवाने वाला कलमाडी चीन में एशियाई खेलों में ऐश कर रहा है, जल्दी ही अशोक चव्हाण की गोटी भी कहीं फ़िट हो ही जायेगी… तुम लोग क्या खाकर कांग्रेस से लड़ोगे? ज्यादा पुरानी बात नहीं करें तो हाल ही में अरुंधती ने भारत माता का अपमान कर दिया, कोई कांग्रेसी सड़क पर नहीं निकला… पर जब सुदर्शन ने सोनिया माता के खिलाफ़ बोल दिया तो सब सड़क पर आ गये, बोलो “भारत माता” बड़ी कि “सोनिया माता”?  

हजारों मौतों के जिम्मेदार वॉरेन एण्डरसन को देश से भगा दिया, कोई जवाब नहीं… देश के पहले सबसे चर्चित बोफ़ोर्स घोटाले के आरोपी क्वात्रोची को छुड़वा दिया, फ़िर भी माथे पर कोई शिकन नहीं…। अब देखो ना, जब करोड़ों-अरबों-खरबों के घोटाले सामने आये, जमकर लानत-मलामत हुई तब कहीं जाकर कलमाडी-चव्हाण-राजा के इस्तीफ़े लिये, और तुरन्त बाद बैलेंस बनाने के लिये येदियुरप्पा के इस्तीफ़े की मांग रख दी… अरे छोड़ो, भाजपा वालों, तुम क्या बराबरी करोगे कमीनेपन की…। क्या तुम लोगों ने कभी केन्द्र सरकार में सत्ता होते हुए “अपने” राज्यपाल द्वारा कांग्रेस की राज्य सरकारों के “कान में उंगली” की है? नहीं की ना? जरा कांग्रेस से सीखो, देखो रोमेश भण्डारी, बूटा सिंह, सिब्ते रजी, हंसराज भारद्वाज जैसे राज्यपाल कैसे विपक्षी राज्य सरकारों की “कान में उंगली” करते हैं, अरे भाजपाईयों, तुम क्या जानो कांग्रेसी किस मिट्टी के बने हैं।

एक चुनाव आयुक्त को रिटायर होते ही “ईनाम” में मंत्री बनवा दिया, फ़िर दूसरे चमचे को चुनाव आयुक्त बनवा लिया, वोटिंग मशीनों में हेराफ़ेरी की, जागरुक नागरिक ने आवाज़ उठाई तो उसे ही अन्दर कर दिया… भ्रष्टाचार की इतनी आदत पड़ गई है कि एक भ्रष्ट अफ़सर को ही केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त बना दिया… कई-कई “माननीय” जजों को “ईनाम” के तौर पर रिटायर होते ही किसी आयोग का अध्यक्ष वगैरह बनवा दिया…।  भाजपा वालों तुम्हारी औकात नहीं है इतना कमीनापन करने की, कांग्रेस की तुम क्या बराबरी करोगे।

डाकू जगीरा सही कहता है, “लड़ने की हिम्मत तो जुटा लोगे, लेकिन कमीनापन कहाँ से लाओगे…?” गाय का दूध पीने वालों, तुम लोमड़ी का दूध पीने वालों से मुकाबला कैसे करोगे? अभी तो तुम्हें कांग्रेस से बहुत कुछ सीखना है…

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>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


सोमरस के विषय में कुछ निराकरण

Posted: 25 Nov 2010 04:23 AM PST

बहुत दिनों के पहले हमने सोमरस पर एक लेख लिखा था जिसमें कई वैदेशिक विद्वानों के मतों का उल्‍लेख तथा यथाशक्‍य उनका दुराग्रह खण्‍डन किया गया था  ।  किन्‍तु पर्याप्‍त अध्‍ययन के अभाव में लेख पूर्णता को प्राप्‍त नहीं हुआ  ।  किन्‍तु अब जब कि ईश्‍वर की कृपा से शोध के सन्‍दर्भ में वेद भगवान के अध्‍ययन का सौभाग्य प्राप्‍त हुआ तो कई बातें स्‍पष्‍ट होती जा रही हैं  ।

इसी क्रम में सोम के विषय में प्रचलित कुछ अपवादों का निराकरण निम्‍नोक्‍त मन्‍त्रों के द्वारा करने का प्रयास कर रहा हूँ  ।

मन्‍त्र: –  सुतपात्रे …………………………………………..  दध्‍याशिर: ।। (ऋग्‍वेद-1/5/5)

मन्‍त्रार्थ: –  यह निचोडा हुआ शुद्ध दधिमिश्रित सोमरस , सोमपान की प्रबल इच्‍छा रखने वाले इन्‍द्र देव को प्राप्‍त हो  ।।

मन्‍त्र: –  तीव्रा: सोमास…………………………………….. तान्पिब ।। (ऋग्‍वेद-1/23/1)

मन्‍त्रार्थ: – हे वायुदव यह निचोडा हुआ सोमरस तीखा होने के कारण दुग्‍ध में मिश्रित करके तैयार किया गया है  ।  आइये और इसका पान कीजिये  ।।

मन्‍त्र: – शतं वा य: शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्  ।  एदु निम्‍नं न रीयते  ।। (ऋग्‍वेद-1/30/2)

मन्‍त्रार्थ: – नीचे की ओर बहते हुए जल के समान प्रवाहित होते सैकडो घडे सोमरस में मिले हुए हजारों घडे दुग्‍ध मिल करके इन्‍द्र देव को प्राप्‍त हों ।।

उपर्युक्‍त मन्‍त्रों में सोम में दधि और दुग्‍ध मिश्रण की बात कही गयी है  ।  आजतक मैने किसी भी व्‍यक्ति को शराब में दूध या दही मिलाते हुए नहीं देखा है अत: इस बात का तो सीधा निराकरण हो जाता है कि सोम शराब है  ।  कुछ विद्वानों ने सोम को एक विशेष प्रकार का कुकुरमुत्‍ता माना है  । किन्‍तु क्‍या आपने कुकुरमुत्‍ते की सब्‍जी में दूध या दही मिलाये जाते देखा है  ।  मैने तो नहीं देखा  ।  खैर कदाचित् ऐसा कहीं होता भी तो कुकुरमुत्‍ते की सब्‍जी तो सुनी थी पर किसी ने कुकुरमुत्‍ते को निचोड कर पिया हो ऐसा तो कभी नहीं सुना  है और उूपर साफ वर्णित है कि सोम को ताजा निचोडा जाता है  ।

ऋग्‍वेद में आगे सोम का और भी वर्णन है , एक जगह पर सोम की इतनी उपलब्‍धता और प्रचलन दिखाया गया है कि मनुष्‍यों के साथ गायों तक को सोमरस भरपेट खिलाये और पिलाये जाने की बात कही गई है  ।  कुकुरमुत्‍ता तो पशु खाते ही नहीं फिर तो समस्‍या स्‍वयं ही और भी निराकृत हो जाती है  ।

विचार करने पर सोम आज के चाय की तरह ही कोई सामान्‍य प्रचलित पेय पदार्थ लगता है, जिसे सामान्‍य जन भी प्रतिदिन पान किया करते थे  ।।

क्रमश: ……….

भवदीय:- आनन्‍द:

हकीम की दुकान पर राहुल-लालू-पासवान

Posted: 25 Nov 2010 03:59 AM PST

हकीम लुकमान ने दुकान खोली, तो आज हर दिन की अपेक्षा अधिक रोगी दिखाई दिये। इतना ही नहीं, कई अति विशिष्ट जन (वी.आई.पी) भी उनकी प्रतीक्षा में था। हकीम साहब ने पहले उन्हें निबटाना ठीक समझा। पहला नंबर लालू जी का था।

लालू – हकीम साहब, क्या बताऊं; दिल टांग टूटी भैंस जैसा बैठ गया है। आवाज नहीं निकल रही है। आंखें लालटेन की रोशनी में भी ठीक नहीं देख पा रहीं। सब ओर अंधेरा सा लगता है। माई समीकरण उड़न फ्लाई हो गया।

हकीम – सुबह नंगे पांव हरी घास में टहलिये; पर इससे आगे न बढ़ें। सुना है घास देखते ही आपकी पूर्वजन्म की आदतें जाग जाती हैं। मैं नुस्खा देता हूं। राबड़ी जी इसे बनाकर प्यार से खिलाएंगी, तो कुछ दिन में ठीक लगने लगेगा।

लालू – उसकी बात न कहें। खाना बनाने को कहते ही वह खाने को दौड़ती है। दोनों सीटों से क्या हारीं, दोनों हाथ और पांव सुन्न हो गये हैं। दोनों भाई भी हार गये। जनता ने मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। मुझसे भी घूंघट की ओट से बात करने लगी है।

अगला नंबर पासवान जी का था – मेरी हालत तो और भी खराब है हकीम साहब ! मुंह कुएं सा सूख रहा है। मुसलमानों के लिए मैंने क्या नहीं किया ? पिछले चुनाव में ओसामा बिन लादेन जैसा आदमी साथ लेकर घूमा; पर तब की तरह इस बार भी वे दगा दे गये। मेरे भाई, भतीजे, दामाद सब हार गये। फोन करता हूं, तो काट देते हैं। मेरी मेल गाड़ी तो पैसेंजर से भी पीछे चल रही है। जनता ने घर से बेघर कर दिया।

हकीम – मैं दवा देता हूं; पर इसके साथ आपको अगले पांच साल आगे की बजाय, पीछे की ओर मुंह कर टहलना होगा।

पासवान – पर यह देखकर लोग क्या कहेंगे ?

हकीम – लोगों की तुम चिन्ता न करो। यदि लोग तुम्हारे साथ होते, तो तुम्हारी यह हालत क्यों होती ?

तभी गाड़ियों के शोर के बीच राहुल बाबा का प्रवेश हुआ।

राहुल – हकीम साहब ! कुछ दवा मुझे भी दें। मेरा तो सारा भविष्य ही बिहार ने चैपट कर दिया। जहां-जहां मैंने प्रचार किया, वहां जीत तो दूर, कांगे्रस चैथे नंबर पर पहुंच गयी। लोग मुझे देखते ही ‘जहां-जहां चरण पड़े राहुल के, वहां-वहां बंटाधार’ गाने लगते हैं। मम्मी ने बिहार में शून्य से शुरू करने की बात कही थी, तो जनता ने उसके पास ही पहुंच दिया। पैरों पर खड़े होने के लालच में हाथ भी गंवा बैठे। युवक और युवतियों के चक्कर में क१लिजों में धक्के खाये; पर अब वे मुझे देखते ही ऐसे मुंह फेर लेते हैं, मानो मैं कोई बूढ़ा हूं। जिस विदेशी लड़की से बात चल रही थी, उसने भी कई दिन से फोन नहीं किया।

हकीम – आप युवा है, जल्दी ठीक हो जाएंगे। टहलना आपको भी जरूरी है; पर पैर की बजाय हाथ के बल चलने से लाभ जल्दी होगा। इससे आपके हाथ मजबूत होंगे। सोचिये, यदि आपके हाथ ताकतवर होते, तो आपको राजा, कलमाड़ी या अशोक चव्हाण को हटाने की जरूरत नहीं पड़ती।

राहुल – क्या मम्मी के लिए भी कोई नुस्खा है ? उनके चेहरे की तो प१लिश ही उतर गयी है।

हकीम – बिना देखे मैं दवा नहीं देता, चूंकि ऐसे रोगों का इलाज लम्बा चलता है। वैसे उनका इलाज भारत की बजाय इटली में हो, तो अधिक अच्छा रहेगा। तब तक बाजार में उपलब्ध किसी भी प१लिश से काम चला लें। मैं तो सदा बिल्ली शू प१लिश इस्तेमाल करता हूं। चाहे तो उसे ही आजमा लें।

तभी हकीम साहब के पुत्र ने आकर कहा कि नीतीश जी आपसे फोन पर बात करना चाहते हैं।

हकीम – उन्हें क्या परेशानी हो सकती है। वे तो खुद इन सबकी परेशानी का कारण हैं। फिर भी बात कराओ।

नीतीश – हकीम साहब ! इतनी भारी जीत, बधाई और मिठाई के बावजूद दिल में धुकधुकी सी हो रही है। मेरी इच्छा थी कि भाजपा का ग्राफ कुछ गिरे, जिससे वे काबू में रहें। इसके लिए नरेन्द्र मोदी तक का अपमान किया; पर उन्होंने तो 90 प्रतिशत सीट जीतकर मुझे भी पछाड़ दिया। उनके वोट भी खूब बढ़े हैं। अब तो तीर की चुभन औरों के साथ मुझे भी महसूस हो रही है।

हकीम – देखो भाई, भारत और भारतीय जनता के मूड का कुछ पता नहीं लगता। धूल भी लात खाकर दाढ़ी में उलझ जाती है। भाजपा वालों ने दिल बड़ा रखकर जो पाठ पढ़ाया है, इसे समझने का प्रयास करो।

नीतीश – पर इसकी दवा.. ?

हकीम – इसके लिए दवा की जरूरत नहीं है। एक शेर सुनो, इसे हर दिन सुबह-शाम दोहराना ही काफी है।

मोहब्बत में सियासत की गंदगी न मिला

गर गले मिल नहीं सकता, तो हाथ भी न मिला।।

जानिये नये-नये ब्लॉग पते

Posted: 25 Nov 2010 01:31 AM PST

हर रोज नये -नये ब्लॉग अवतरित हो रहे हैं | एक ब्लोगवाणी था जो ब्लॉग पाठकों को इन नवागंतुकों की जानकारी देता रहता था अब थोड़ा बहुत काम चिट्ठाजगत कर रहा है | जनोक्ति पर “ब्लॉग-हलचल” स्तम्भ में हर रोज जानिये नये-नये ब्लॉग पते |

1. ANJANA SAMAJ (http://aanjana.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Sanwal Ram Choudhary

2. इतिहास और अपना समय (http://brajkishorprasad.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Dr. Braj Kishor

3. dillidhadkan (http://dillidhadkan.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: pratibha

4. Sarasvat-Niketanam सारस्वत-निकेतनम् (http://sarasvat-niketanam-varshankjvinisa.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Sarasvat-Niketanam

5. ओशो अमृत (http://oshoamritvachan0.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Ajay

6. RAHMDEEN (http://rahmdeen.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: RAHMDEEN

7. अग्निशिखा (http://sanyalsduniya2.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: shantanu sanyal

8. Dr. DAVI SAHAY PANDEY ”DEEP” (http://davisahaypandeydeep.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: davisahaypandeydeep

9. Media Rachna (http://media-rachna.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Media Rachna

10. manojnekaha (http://manojnekaha.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Manoj Kumar

11. for a change (http://nishasjourney.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: nisha

12. HEADLINES PUNJAB (http://headlinespunjab.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Headline Punjb

13. मेरी दोस्‍ती मेरा प्‍यार (http://omylove-muskan.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: muskan

14. जांजगीर- प्रहार (http://janjgir-prahar.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: प्रशांत सिंह ठाकुर

15. ओशो अमृत वचन (http://mereosho123.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: raja

16 इसलाम धर्म (http://islamdharma.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: DR. ANWER JAMAL

17 समालोचन (http://samalochan.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: अरुण देव

18  मनकही (http://navneetbedar.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: नवनीत बेदार

19 Akharikalam (http://akharikalam.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Krishan Kumar

20 MAYANK RAJ मयंक राज (http://rajmayank007.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: 明光 मयंक राज

21 9 xm (http://9xmjok.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: VISH

22. EMPTY SPACE (http://cyberspacez.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Rahul…

23. Dhananjay Pathak (http://dhananjaypathak.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Dhananjay Pathak

24. Kavita Kosh (http://freekavita.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Kavita Kosh

25. Youth Media (http://youth-media.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: MAK

26. gaurav the pride (http://gauravshrma.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: gauravsharma

27. Aaj Samaj (http://aaj-samaj.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Aaj Samaj

28. bluemango (http://virginisland-andaman.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: blue mango

गुजरात की तरह बिहार ने विकास को चुना |

Posted: 24 Nov 2010 11:41 PM PST

डॉ. अतुल कुमार

ऐसा लगता था कि सदियों से राजा रानी वाली राजतंत्र की प्रशासन व्यवस्था में रह चुकी जनता ने लगभग साठ साल के गणतंात्रिक देश हिन्दुस्तान में ने हाल तक भी सभी भारतीयों की मानसिकता लोकतंत्र के लिए परिपक्व नहीं हो पायी है तभी तो सता पर पकड़ बनाये रखने के लिए नेहरू के वारिसों ने कांग्रेस के नाम से छद्म लोकतंत्र पर पूरे देश में अपने परिवार तंत्र का राज किया। जनता से राजगदृदी अपनाने के लिए राजनीति में जाति धर्म का कार्ड खेला। यह खेल इतने शातिर तरीके से खेला गया कि दूर दूर तक की सोच रखने वालों से भी कभी यह पकड़ नहीं जा सका।

हाल के चुनाव पर अगर सर्वो के खबर को यकीन माने तो यह लगभग सच है कि मूल रूप से मुसलमानों ने वंशवाली कांग्रेस और राजद को वोट दिया क्योंकि कई कारणें के अलावा वो हिन्दु विरोधी भाषणों से खुश किये जाते रहे। सुन्नी मुसलमानों को आज तक देश के नागरिक के कर्तव्य और अधिकार दोनों को इमामों के हवाले कर दिया गया। मानों उपर वाला ने हिन्दुस्तान के इमामों को स्पेशल पोस्टींग करके भेजा है। लम्बें समय तक इमामों के फतवे पर सुन्नी मताधिकार का प्रयोग करते थे। पर इसमें कोई शक नहीं कि मदरसे की पढ़ाई और विज्ञान की भूमिका धीमे धीमे इमामों के मकडजाल से डॉ अब्दुल कलाम जैसे पढ़ लिखे कईयों को बाहर कर चुकी। अगर आस्था के नाम पर मूर्ख बनाये जाने वाले लोग जरा सी सोच और तर्क से दिमाग का इस्तेमाल करें तांे वे समझ सकते है कि जहाँ बनाने वाले खुदा के लिए इबादतगाह के नाम पर दकियानुसी सोच का जाल फैलाना क्यों जारी रहा? जलन और नफरत का माहौल फैला, फूट डाल कर सता कब्जायी गयी ताकि देश की गरीब जनता की दौलत को लूट कर विदेशों में केवल अपनी औलादों के ऐशो आराम के लिए रकम जमा करा दी जाए। आज आधे से कम को समझ आया है कल सबको आ जाएगा कि राज चलाने की जगह राज पर काबिज रहने के काम बडी ही सूझबूझ से किये जाते रहे। भ्रष्टाचार जब तक सौ करोड़ के खून में ना आ जाए तब तक काम नहीं किया जाता। जब तक हवलदार और सिपाही घूस ना लेने लगे तब तक तंख्वाह ना बढ़ाई। गरीबों को गरीबी हटाने के नाम पर लूटा गया। नियम कानून ऐसे बनाये कि एक ईस्ट इंडिया कंपनी की जगह हजार विदेशी कंपनीयों आज हमारे देश में आ कर मजदूर और किसान का खून चूस रही है। ईमानदार व्यवसायी को तंग कर करके मिट्टी में मिला दिया गया। हालात ऐसी बनायी गयी कि लोग कहें आजादी से अच्छी गुलामी।

आरक्षण के कार्ड को खेल कर सता पर पकड के लिए दलित मुसलमान, दलित इसाई जैसे शब्दो को जन्म देने वाली कांगे्रस सरकार का बस चला तो कल राजपूत मुसलमान और ब्राहमण ईसाई शब्दों की भी रचना कर देगी। वैसे इन दिनों दिख रहा है समाज खत्म कर चुकी कांग्रेस सरकार अब परिवार खत्म करने के लिए सात जन्म के रिस्तों को महज समझौता बना कर छोड देगी।

हद तो तब है जब दो दिन के राजनैतिक कद वाले युवराज कहे जाते जनाब मीडीया के सामने दलितों के यहां नहाने खाने का नाटक करेगें जबकि अगर कोई दलित 10 जनपथ पर आ जाऐ तो डंडे खाये। नमाजी टोपी पहने नाटक बस अपने लिए वोट लेने तक के लिए है। चार बीबी और चालीस बच्चे की छूट इसीलिये तो है कि वो बस कैटल क्लास वाला वोटर बन कर जिन्दा रहे फिर गटर में या किनारे घिसट घिसट कर जीते हुए गरीब ने मर ही तो जाना है। लेकिन वो दिन दूर नहीं जब एक एक करके मुसलमान जान लेगा कि एक बीबी एक बच्चा करके ही वो अपनी औलाद को आदमी की जिन्दगी देगा तब हिन्दुओं का वोट पूरी तरह खो चुकी कांग्रेस को एक वोट भी नहीं मिलेगा। बापू के सम्मान पर जब पटेल जी की जगह नेहरू को प्रधानमंत्री बना देना ही इतिहास की एक गलती हो गयी लेकिन सुधार की जिम्मेदारी आज के नौजवानों की है और बिहार के चुनाव के नतीजों ने विकास के वास्ते बदलाव का बिगुल बजा दिया। लालू को परिवार वाली कांग्रेस के विरूद्ध सता लाने के बाद जब लालू भी परिवार तंत्र का राज करने लगे तो कांग्रेस के साथ वह भी आज हाशिये पर चले गये। जनता जनार्दन ने माना तो भगवान भी बन सका भगवान है। किसी तंत्र के प्रशासन सफलता जनता के स्वीकारने पर है। यही सच है। फिर नेताओं की बिसात क्या है। जनता के हित में काम करने के लिए अगर चुना है तो उसे जिम्मेदारी से करना होगा। वर्ना अंजाम के कई उदाहरणों से दुनिया के इतिहास भरे है।

>गीत :

हम

संजीव ‘सलिल’
*
सारे जग को जान रहे हैं
खुद को भी पहचानें हम….
*
कंकर-कंकर में शंकर है
देख सकें तो देखें हम.
मानव-सेवा माधव-सेवा
मानें सच अवलेखें हम..
स्वहित जन्म से करते आये
परहित मंजिल जानें हम.
सारे जग को जान रहे हैं
खुद को भी पहचानें हम….
*
राष्ट्रदेव आराध्य हो सके
विश्वदेव तब साध्य बने.
ऐसे दृढ़-संकल्पजयी हों
नियति-दैव भी बाध्य बने.
रच पायें सत-शिव-सुंदर नित
अपने मन में ठानें हम.
सारे जग को जान रहे हैं
खुद को भी पहचानें हम….
*
बिंदु-बिंदु में सिन्धु समाया
आत्मा में परमात्मा है.
कभी किसी को हेय न मानें
जीव-जीव विश्वात्मा है.
हर नर में नारायण बैठा
‘सलिल’ सभी संतानें हम.
सारे जग को जान रहे हैं
खुद को भी पहचानें हम….
*

 

>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


बिहार मेँ राहुल का युवा फेक्टर फुस्स !

Posted: 24 Nov 2010 10:36 AM PST

34 साल में बिहार को 17 मुख्यमंत्री देने वाली कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा आज दहाई तक भी नहीं पहुंच सका है। कांग्रेस महज 5 सीटें ही जीत सकी हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 9 सीटें मिली थीं।बिहार चुनाव राहुल गांधी के इम्तहान माना जा रहा था बिहार की जनता पर पार्टी अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी की रैलियों का असर भी नहीं हुआ। राहुल गांधी ने 17 और सोनिया गांधी ने 5 सीटों परसभाएं की थीं। कांग्रेस को केवल कहलगांव और किशनगंज सीट पर जीत नसीब हुई। कहलगांव से सदानंद सिंह और किशनगंज से मोहम्मद जावेद चुनाव जीते हैं।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चौधरी महबूब अली कैसर भी सिमरी बख्तियारपुर से चुनाव हार गए हैं।

राहुल गांधी ने इन सीटों पर चुनावी रैलियां की-

केवल कहलगांव सीट पर कांग्रेस के सदानंद सिंह विजयी हुए हैं. पहले बरबीघा सीट पर कांग्रेस आगे चल रही थी लेकिन उसके उम्मीदवार अशोक चौधरी को निर्दलीय प्रत्याशी त्रिशूलधारी सिंह ने 3000वोटों से हरा दिया।

अपडेटेड – 4.30 PM

सीट /    कौन आगे है

  1. बछव़ाडा / अवधेश कुमार राय सीपीआई (कांग्रेस चौथे स्थान पर)
  2. जमालपुर / शैलेष कुमार जनता दल यूनाइटेड (कांग्रेस तीसरे पर)
  3. कहलगांव/ सदानंद सिंह- कांग्रेस -जीत गए।
  4. बेगुसराय/ सुरेंद्र मेहता- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस चौथे पर)
  5. सासाराम/ जवाहर प्रसाद – भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस छठें स्थान पर)
  6. औरंगाबाद/ रामाधार सिंह- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस पांचवें स्थान पर)
  7. शेखपुरा/ रणधीर कुमार सोनी- जनता दल यूनाइटेड (कांग्रेस की सुनिला देवी दूसरे स्थान पर रहीं)
  8. जहानाबाद/ अभिराम शर्मा- जनता दल यूनाइटेड (कांग्रेस के रामजतन सिन्हा तीसरे पर)
  9. बरबीघा/ अशोक चौधरी – कांग्रेस -हार गए (निर्दलीय त्रिशूलधारी सिंह 3000 वोट से जीते)
  10. हिसुआ/ अनिल सिंह- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस की नीतू कुमारी तीसरे स्थान पर)
  11. मुज़्ज़फ़रपुर/ सुरेश कुमार शर्मा – भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस चौथे स्थान पर)
  12. सीतामढ़ी/ सुनील कुमार पिंटू- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस की रूपम कुमारी पांचवें स्थान पर)
  13. समस्तीपुर/ इस्लाम सहीम – आरजेडी (कांग्रेस तीसरे स्थान पर)
  14. रामनगर/ भागीरथी देवी- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस के नरेश राम दूसरे स्थान पर)
  15. कुचईकोट/ अमरेन्द्र कुमार पांडे- जनता दल यूनाइटेड (कांग्रेस चौथे स्थान पर)
  16. मांझी/ गौतम सिंह – जेडीयू (कांग्रेस पांचवे स्थान पर)
  17. ओबेरा/ प्रमोद सिंह चंद्रवंशी- जनता दल यूनाइटेड (कांग्रेस पाचवें स्थान पर)

इन सीटों पर सोनिया गांधी ने रैलियां की-

  1. भभुआ/ डा. प्रमोद कुमार सिंह – एल जे पी  (कांग्रेस चौथा स्थान पर)
  2. बक्सर/ सुखड़ा पांडेय – बीजेपी – (कांग्रेस छठे स्थान पर)
  3. भागलपुर/अश्विनी कुमार चौबे – भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस के अजीत शर्मा दूसरे स्थान पर)
  4. बेगुसराय/ सुरेंद्र मेहता- भारतीय जनता पार्टी (कांग्रेस चौथे पर)
  5. किशनगंज/ मोहम्मद जावेद – कांग्रेस जीत गए (बीजेपी की स्वीटी सिंह हारीं)

सिमरी बख्तियारपुर सीट से बिहार कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष चौधरी महबूब अली कैसर जनता दल यूनाइटेड के डॉ. अरुण कुमार से हारे।

Source: http://eciresults.nic.in/

इसके अलावा मज़ेदार रिजल्ट यहां रहा.. केवल 31 वोटों से बीजेपी की जीत हुई.. केवटी सीट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री एम ए फ़ातमी के बेटे को अशोक यादव ने हराया। यहां ध्रुवीकरण विश्लेषण के लायक हो सकता है।
तभी लालू कह रहे हैं- नतीजे रहस्यपूर्ण है

Bihar – Keoti
Result Declared
Candidate Party Votes
ASHOK KUMAR YADAV Bharatiya Janata Party 45791
FARAZ FATMI Rashtriya Janata Dal 45762
MD. MOHASIN Indian National Congress 5679
SADRE ALAM Independent 2833
MADHURANJAN PRASAD Bahujan Samaj Party 1985
RAMBABU SAHU Communist Party of India (Marxist-Leninist) (Liberation) 1917
BALKRISHNA JHA Independent 1546
NESAR AHMAD Independent 991
MD.MOJAHIDUL ISLAM Janata Dal (Secular) 636
WASI AHMED KHAN Samajwadi Party 606
NAZRE ALAM Independent 584
MD.JUNAID SATTAR Muslim League Kerala State Committee 415

: Neeraj Diwan

बिहार में विकास जीता,जाति हारी

Posted: 24 Nov 2010 10:24 AM PST

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं.बिहार की जनता ने जातिवादी शक्तियों को एक सिरे से नकारते हुए एनडीए के विकास की राजनीति पर मुहर लगा दी है वो भी तीन चौथाई के आशातीत बहुमत के साथ.एक बात तो तय है कि राजग को सभी जातियों और धर्मों के लोगों का वोट मिला है अन्यथा उसे इतना प्रचंड बहुमत नहीं मिलता.जो लालू फ़िर से बिहार का राजा बनने का सपना देख रहे थे उनके विपक्ष का नेता बनने के भी लाले पड़ गए हैं.८ साल तक बिहार की मुख्यमंत्री रही उनकी पत्नी और भारत के इतिहास में एकमात्र अनपढ़ मुख्यमंत्री रही श्रीमती राबड़ी देवी कथित ससुराल और मायका यानी सोनपुर और राघोपुर दोनों जगहों से हार गई हैं.यह भारत के किसी भी राज्य में किसी भी गठबंधन की सबसे बड़ी जीत है.इतनी बड़ी जीत की उम्मीद न तो एन.डी.ए. के नेताओं को थी और न ही मीडिया को.बिहार भूतकाल में भी भारत की राजनीति को दिशा देता रहा है.१९७४ का आन्दोलन इसी पवित्र भूमि से उठा था जिसके परिणामस्वरूप इंदिरा गांधी की तानाशाही का अंत हुआ था.उसी पिछड़े और गरीब बिहार ने एक बार फ़िर देश को विकास की राजनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया है.साथ ही पूरे
भारत में जाति-धर्म के नाम पर जनता को मूर्ख बना रहे नेताओं को अपना एजेंडा बदल लेने की चेतावनी दे दी है.कोई ज्यादा समय नहीं हुआ यही कोई ५ साल पहले बिहार और बिहारी को बांकी भारत के लोग ही दृष्टि से देखते थे.आज बिहारी शब्द गाली का नहीं गर्व की अनुभूति देता है.नीतीश कुमार भले ही ५ साल के अपने शासन में बिहार को विकसित राज्यों की श्रेणी में शामिल नहीं करा पाए.लेकिन उन्होंने बिहार के लोगों की आँखों में विकास और विकसित बिहार के सपने जरूर पैदा कर दिया.यहाँ तक कि विपक्ष के लोग भी कहीं-न-कहीं सीमित सन्दर्भ में ही सही विकास के वादे करने के लिए बाध्य हो गए.उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि जो एक बिहारी होने के नाते मैं मानता हूँ वह रही है जंगल राज वाले राज्य में कानून के शासन की स्थापना.आधारभूत संरचना का भी बिहार में पर्याप्त विकास हुआ है.सड़कों से लेकर पुल निर्माण तक काम धरातल पर नज़र आ रहा है.बिहार की जो जनता ५ साल पहले अपने बच्चों को अपहरणकर्ता बना रही थी वही जनता अब अपने बेटे-बेटियों को डॉक्टर-इंजिनियर बनाने का सपना देखने लगी है.नीतीश सरकार ने उच्च विद्यालयों में पढनेवाले बच्चों को सरकार की तरफ से साईकिल उपलब्ध कराई जिससे लड़कियां भी दूर-दूर तक पढने के लिए जाने लगीं.हालांकि जवाब में लालू ने बच्चों को मोटरसाईकिल देने का वादा किया लेकिन लोगों ने इसे लालू का मजाक मान लिया.वैसे भी लालू इस बार के चुनाव प्रचार में भी कभी गंभीर होते नहीं दिखे.प्रत्येक जनसभा में लोगों को चुटकुले सुनाते रहे.उनकी सभाओं में लोगों की भीड़ जरूर जमा होती रही लेकिन उसका उद्देश्य लालू की हँसानेवाली बातों का मजा लेना मात्र था.कुल मिलाकर जो लोग राजग सरकार से खुश नहीं थे उनके सामने भी विकल्पहीनता की स्थिति थी.लालू को वे वोट दे नहीं सकते थे और लालू के अलावा राज्य में दूसरा कोई सशक्त विकल्प था ही नहीं.इसलिए थक-हारकर उन्होंने भी राजग को मत दे दिया.चुनाव प्रचार के समय राजग ने बड़ी ही चतुराई से लोजपा और राजद को दो परिवारों की पार्टी बताना शुरू कर दिया था.इसका परिणाम यह हुआ कि यादव और पासवान जाति के लोग भी इस बात को समझ गए कि ये लोग वोट बैंक के रूप में सिर्फ उनका इस्तेमाल कर रहे हैं.लगभग सभी चरणों में जिस तरह पिछले चुनावों से कहीं ज्यादा % मतदान हो रहा था इससे लोग कयास लगा रहे थे कि जैसा कि होता आया है इस स्थिति में जनता ने कहीं सरकार के खिलाफ तो वोट नहीं दिया है.लेकिन हुआ उल्टा.इसका सीधा मतलब यह है कि जो भी मत % बढ़ा वह मत सरकार के समर्थकों का था.हद तो यह हो गई कि राजग को मुस्लिम-यादव बहुल क्षेत्रों में भी अप्रत्याशित सफलता हाथ लगी और मई समीकरण का नामो-निशान मिट गया.चुनाव में जदयू और भाजपा दोनों को ही लगभग ३०-३० सीटों का लाभ हुआ है.अभी तक तो तमाम वैचारिक मतभेदों के बावजूद गठबंधन सफल रहा है.लेकिन जिस तरह जदयू को साधारण बहुमत से कुछ ही कम सीटें आई हैं उससे नीतीश कुमार के लिए भाजपा की जरुरत निश्चित रूप से कम हो जाएगी.इसलिए भाजपा के लिए नीतीश को संभालना अब और भी मुश्किल साबित होने जा रहा है.हालांकि इन चुनावों में राजग को मात्र ४१-४२ % जनता का वोट मिला है लेकिन इसी अल्पमत के बल पर उसने तीन चौथाई सीटें जीत ली हैं.यह शुरू से ही हमारे लोकतंत्र की बिडम्बना रही है कि देश में हमेशा अल्पमत क़ी सरकार बांटी रही है.देखना है कि सरकार जनता को किए गए वादों में से कितने को पूरा कर पाती है.प्रचार अभियान के दौरान राजग ने बिजली,रोजगार सृजन और भ्रष्टाचार सम्बन्धी नए कानून के क्रियान्वयन का वादा किया था.डगर आसान नहीं है.खासकर भ्रष्टाचार ने जिस तरह से शासन-प्रशासन के रग-रग में अपनी पैठ बना ली है.उससे ऐसा नहीं लगता कि नीतीश भ्रष्टाचारियों खासकर बड़ी मछलियों की संपत्ति पर आसानी से सरकारी कब्ज़ा कर उसमें स्कूल खोल पाएँगे जैसा कि उन्होंने अपने भाषणों में वादा किया था.पिछली बार से कहीं ज्यादा आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग राजग की तरफ से जीत कर विधानसभा में पहुंचे हैं.इन पर नियंत्रण रखना और इन पर मुकदमा चलाकर इन्हें सजा दिलवाना भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी.अगले साल बिहार में पंचायत चुनाव होनेवाले हैं.राजग सरकार इसे दलीय आधार पर करवाना चाहती है.अगर ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से इन चुनावों में भी राजग जीतेगा और सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाएगी.राज्य में पंचायत स्तर पर और जन वितरण प्रणाली में जो व्यापक भ्रष्टाचार है वह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है.हालांकि गांवों में शिक्षामित्रों की बहाली कर दी गई है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक में अभी भी गुणात्मक सुधार आना बांकी है.बिहार में १५ सालों के जंगल राज में उपजी हुई और भी बहुत-सी समस्याएं हैं जिनका समाधान नीतीश को अगले पांच सालों में ढूंढ निकालना होगा.बिहार की २१वीं सदी की जनता ज्यादा दिनों तक इंतज़ार करने के मूड में नहीं है.जनता को न तो उसको रीझते और न ही खीझते देर लगती है.राजग को यह समझते हुए राज्य को समस्याविहीन राज्य बनाने की दिशा में अग्रसर करना होगा.नहीं तो राजग का भी राज्य में वही हश्र होगा जो इस चुनाव में लालू-पासवान और कांग्रेस का हुआ है.

जदयू-भाजपा गठबंधन विशाल बहुमत की ओर

Posted: 24 Nov 2010 07:17 AM PST

नीतीश कुमार ने इस चुनाव में विकास का मुद्दा क्या बनाया जातिवाद और सम्प्रदायवाद से घिरा बिहार का नजारा ही बदल गया. आज पहली बार दिखा कि बिहार की जनता ने ना तो वंशवाद को चलाने वाले को बिहार की जमीन पर टिकने दिया ना ही भाई भतीजावाद करने वाले पार्टियों को बिहार की सत्ता पर काबिज होने का मौका दिया. इस बार महिलाओ ने बिहार के कमान संभाला है. ऐसा माना जा रहा है. इस बार नए समीकरण उभरकर सामने आये है. एमएमएम अर्थात महिला-मध्यम वर्ग-मुसलमान| इससे यही साफ हो गया है कि नितीश और सुशिल मोदी की गठबंधन सरकार बिहार के जनता की उम्मीदों पर खरे उतरे है.

बिहार विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का जदयू-भाजपा गठबंधन विशाल बहुमत से वापस सत्ता में लौट रहा है.

कुल 243 में से 206 सीटों पर जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन नए रिकॉर्ड जीत कायम करना तय हो चूका है.

लालू-पासवान के साथ कोंग्रेस के युवराज को भी करारा जवाब दिया है, बिहार की जनता ने इतने बड़े मतों में अंतर से जीताकर.

परमपिता को प्रणाम

Posted: 24 Nov 2010 06:52 AM PST

परमपिता  को प्रणाम

एक राजा था ! उसके राज्य में सब प्रकार से सुख शांति थी ! किसी प्रकार का कोई वैर-विरोध नहीं था ! जनता हर प्रकार से सुखी थी ! परंतु राजा को एक बहुत बडा दुख था कि उसकी कोई संतान न थी ! उसे अपना वंश चलाने की तथा अपने उत्तराधिकारी की चिंता खाए जा रही थी ! मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में जाकर माथा टेका ! कई तीर्थ स्थानों की यात्रा की ! परंतु कोई लाभ न हुआ ! संतान की कमी उसे दिन ब दिन खाए जा रही थी !

बहुत सोच विचार के पश्चात उसने अपने राज्य के सभी विद्वानों, पण्डितों को बुलवाया और उनसे संतान प्राप्ति का उपाय ढूंढने को कहा ! सभी विद्वानों ने विचार विमर्श किया ! राजा की जन्म कुंडली का गहन विश्लेषण किया ! अंत में वे सभी एक मत से एक निष्कर्ष पर पहुंचे !  उन्होंने राजा से कहा कि यदि कोई ब्राह्मण का बच्चा अपनी खुशी से देवता को बलि दे तो आपको संतान की प्राप्ति हो सकती है !

राजा ने विद्वानों की बात सुनी ! उसने सारे राज्य में मुनादी करा दी कि यदि कोई ब्राह्मण का बच्चा अपनी इच्छा से खुशी-खुशी बलि दे देगा तो उसके घर वालों को बहुत सा धन दिया जायगा !

राजा के राज्य में एक बहुत ही गरीब ब्राह्मण था ! कई दिन फाके में ही गुजर जाते थे ! उसके चार लडके थे ! बडे तीन लडके तो अपना काम धंधा करते थे और अपने परिवार को आर्थिक सहयोग देते थे ! परंतु जो सबसे छोटा लडका था वो कोई काम नहीं करता था ! उसका सारा ध्यान हमेशा भगवान भक्ति में लगा रहता था उसका सारा दिन सदकर्म करते हुए भगवान का सिमरण करते ही बीत जाता था ! उसके पिता ने भी मुनादी सुनी ! सोचा यह लडका निठल्ला है ! कोई काम-धंधा भी नहीं करता ! इसको बलि के लिए भेज देते है ! राजा से धन  मिल जायगा तो घर की हालत कुछ सुधर जायगी !

ब्राह्मण अपने चौथे सबसे छोटे लडके को लेकर राजा के पास पंहुचा ! राजा ने उस लडके से पूछा – “क्या तुम बिना किसी दबाव के, अपनी मर्जी से, अपनी खुशी से बलि देने को तैयार हो ?”

“जी महाराज !” लडके ने बडी विनम्रता से उत्तर दिया – “यदि मेरी बलि देने से आपको संतान की प्राप्ति होती है तो मैं खुशी से अपनी बलि देने को तैयार हूं !”

राजा उसका उत्तर सुन कर बहुत प्रसन्न हुआ ! सभी विद्वानों ने सलाह करके बलि देने के लिए शुभ मुहुर्त निकाला और राजा को बता दिया ! लडके के पिता को बहुत सारा धन आदि देकर विदा किया ! लडके को अतिथि ग्रह मे ठहराया गया ! हर प्रकार से उसका ख्याल रखा गया ! अंत में उसकी बलि देने का दिन भी आ गया !

राजा ने लडके को बुलाया और कहा – “आज तुम्हारी बलि दे दी जायगी ! अगर तुम्हारी कोई आखरी इच्छा हो तो बताओ हम उसे पूरी करेंगें !”

“मुझे कुछ भी नहीं चाहिए !” ब्राह्मण पुत्र ने कहा – ” बस मैं बलि देने से पहले नदी में स्नान करके पूजा करना चाहता हूं !”

राजा यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और बोला – “ठीक है ! हम भी तुम्हारे साथ नदी तक चलेंगें !”

उस लडके ने नदी में स्नान किया ! फिर नदी किनारे की रेत को इकट्ठा किया और उसकी चार ढेरियां बना दी !  उसने चारों ढेरिओं की ओर देखा ! फिर एक ढेरी को अपने पैर से गिरा दिया ! फिर उसी प्रकार से दूसरी ढेरी को भी गिरा दिया ! फिर तीसरी ढेरी को भी गिरा दिया अब वो चौथी ढेरी के पास गया ! उसके चारों ओर तीन बार चक्कर लगाया ! हाथ जोडकर उसको माथा टेका ! उसकी वन्दना की और राजा के पास बलि देने के लिए आ गया !

राजा उसका यह सारा करतब बडे ही कौतुहल से देख रहा था ! पहले तो राजा ने सोचा कि बालक है ! रेत से खेल रहा है ! परंतु जब राजा ने देखा कि उसने चौथी ढेरी को हाथ जोड कर प्रणाम किया है तो राजा को इसका रहस्य जानने की इच्छा हुई ! राजा ने बालक से पूछा  “बालक, तुमने रेत की चार ढेरियां बनाई ! फिर उनमें से तीन को तोड दिया और चौथी को प्रणाम किया ! इसका क्या रहस्य है ?”

पहले तो बच्चे ने कोई उत्तर नहीं दिया ! परंतु राजा के दोबारा पूछ्ने पर लडके ने कहा – “राजन, आपने बलि के लिए मुझे कहा है ! मैं बलि देने के लिए तैयार हूं ! आप अपना काम कीजिए ! आपने इस बात से क्या लेना कि मैंने रेत की वो ढेरियां क्यों तोडी हैं !”

राजा को बालक से ऐसे उत्तर की आशा न थी ! राजा ने उससे कहा – “बालक, हमने तुम्हारे पिता को तुम्हारी कीमत देकर तुम्हें खरीदा है ! तुम हमारे खरीदे हुए गुलाम हो ! इसलिए हमारे हर प्रश्न का उत्तर देना और हमारी हर बात को मानना तुम्हारा धर्म बनता है !”

“हे राजन, जब आप जिद कर रहे हैं तो सुनिए !” लडके ने उत्तर दिया  – “जब कोई बच्चा पैदा होता है तो सबसे पहले उसके माता-पिता उसकी रक्षा करते है ! अगर वो आग के पास जाने लगता है तो उसको उससे बचाते हैं  ! उसकी हर प्रकार से रक्षा करने की जिम्मेवारी उनकी होती है ! लेकिन यहां तो मेरे पिता ने ही धन के लालच में मुझे बलि देने के लिए आपके पास बेच दिया ! इसलिए पहली ढेरी जो उनके नाम की बनाई थी वह मैंने ढहा दी !”

लडके ने आगे कहा – “दूसरी जिम्मेदारी राजा पर होती है अपनी प्रजा की रक्षा करने की ! आप ने मुझे अपनी संतान प्राप्ति के लिए बलि देने के लिए खरीद लिया ! तब आपसे क्या प्रार्थना करता ! इसलिए दूसरी ढेरी जो मैंने आपके नाम की बनाई थी वो भी तोड दी !”

“तीसरा भार जीवों की रक्षा करने का देवी-देवताओं का होता है !” बालक ने तीसरी ढेरी का रहस्य बताते हुए कहा – “लेकिन यहां तो देवता स्वयं ही मेरी बलि लेने को तैयार बैठा है ! तो इससे क्या प्रार्थना करनी ? इसलिए मैंने तीसरी ढेरी भी तोड दी !”

“लेकिन चौथी ढेरी का क्या रहस्य है ?” राजा ने पूछा !

“और अंत में सहारा होता है ! भगवान का ! इश्वर का !” बच्चे ने रेत की ढेरियों का रहस्य खोलते हुए कहा – “मेरी बलि दी जानी थी ! सो मैंने अंत में इश्वर से प्रार्थना की ! प्रभु की पूजा अर्चना करके उनसे रक्षा करने के प्रार्थना की ! अब वो ही मेरी रक्षा करेंगें ! वही होगा जो इश्वर को मंजूर होगा ! मैं बलि देने के लिए तैयार हूं !” इतना कहकर वो बालक राजा के पास जाकर सिर झुका कर खडा हो गया !

राजा उस छोटे से बालक की इतनी ज्ञान की बातें सुनकर सन्न रह गया !  राजा ने सोचा मैं इस बालक की बलि दे दूंगा !  ब्राह्मण हत्या भी हो जायगी ! फिर पता नहीं मुझे जो संतान प्राप्त होगी वो कैसी होगी ! प्रजा का ख्याल रखने वाली होगी या नहीं ! कहीं मेरा और वंश का नाम ही न डुबो दे ! यह बालक गुणवान है ! इश्वर भक्त है ! सब प्रकार से मेरे लायक है ! क्यों न मैं इसे ही गोद ले लूं और इसे ही अपना पुत्र बना लूं ! इतना विचार करते ही उसने उस बालक की बलि देने का कार्यक्रम रद्द कर दिया और उस बालक को गोद ले लिया ! कहते हैं उस बालक में अच्छे गुण होने के कारण उसने कई सालों तक राज्य किया और हर प्रकार से प्रजा की रक्षा की ! उसके राज्य में किसी को किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं था !

[एक सतसंग में सुनी कथा के आधार पर ]

राम कृष्ण खुराना

लालू ने दी नीतीश को बधाई

Posted: 24 Nov 2010 06:46 AM PST

अन्य राजनीतिक पार्टियां जहां जात पांत की रोटी सेंकने में व्यस्त रहीं वहीं सोशल इंजीनियरिंग के जादूगर नीतीश कुमार एक सिरे से विकास का मुद्दा लेकर चुनाव मैदान में डटे रहे। विकास के मुद्दे के साथ बिहार में व्यावहारिक और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के अगुवा नीतीश कुमार ने एक बार फिर राजग को प्रदेश में भारी जीत दिलाई है और रिकार्ड बहुमत हासिल कर विरोधियों को धराशाई कर दिया।बहुमत के साथ जीत का करिश्मा एक बार फिर दुहराते हुए 54 वर्षीय नेता ने लालू प्रसाद के राजद और रामविलास पासवान के लोजपा गठबंधन, कांग्रेस और अन्य पार्टियों को पांच वर्ष के कार्यकाल के बाद एक बार फिर चारों खाने चित कर दिया है।

बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जद यू-भाजपा गठबंधन की जीत पर सवाल उठाते हुए राजद प्रमुख लालू प्रसाद और लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान ने कहा कि हम एक महीने में इस ‘जादुई परिणाम’ के रहस्य को उजागर करेंगे. विधानसभा चुनाव में अपने गठबंधन की पराजय को स्वीकार करते हुए लालू प्रसाद ने कहा, ‘हम जनता के मत को आदर के साथ स्वीकार करते हैं. हमारे मन में किसी के बारे में कोई कटुता नहीं है. लेकिन हम इस जादुई परिणाम के रहस्य का पता लगायेंगे और एक महीने में इसे उजागर करेंगे क्योंकि बिहार में कोई भी रहस्य कभी छिपा नहीं रहता है.’लालू प्रसाद ने चुनावी जीत के लिए नीतीश कुमार को तो बधाई दी लेकिन भाजपा को नहीं. उन्होंने कहा कि हम इस अप्रत्याशित पराजय से हतोत्साहित नहीं है क्योंकि बिहार की ही जनता ने हमें ऊंचाइयों तक पहुंचाया.

लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान ने कहा, ‘हम नीतीश कुमार सरकार के छल प्रपंच और भ्रष्टाचार को जनता के सामने रखने में विफल रहे. हम देखेंगे कि नीतीश कुमार भ्रष्टाचार का महल बनायेंगे या विकास का.’यह पूछे जाने पर कि क्या लालू प्रसाद बिहार की जनता की नब्ज को पहचानने में विफल रहे, राजद अध्यक्ष ने कहा, ‘किसी भी गलतफहमी में नहीं रहें, बिहार की जनता हमें समझती है और हम भी बिहार की जनता को समझते हैं.चुनाव में लालू बनाम नीतीश की बात को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि नीतीश ने बिहार की गरीबी, तरक्की, विकास की दुहाई देते हुए एक मौका और मांगा था. जनता ने नीतीश को एक और मौका दिया है. अब उन्हें जीत के उन्माद में बहने की बजाए काम करने की जरूरत है. वहीं, इस विषय पर पासवान ने कहा, ‘यह जनता है. इसी जनता ने आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी को धूल चटा दी थी लेकिन अगले ही चुनाव में उन्होंने दो तिहाई सीट प्राप्त कर वापसी की थी.’उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि हम भ्रष्टाचार के विषय पर जनता को समझा नहीं पाए या जनता इस विषय को समझ नहीं पायी. विकास के हौवे में भ्रष्टाचार का मुद्दा दब गया.’ उन्होंने कहा कि जिस कैग की रिपोर्ट को लेकर पिछले 10 दिनों से संसद में कामकाज बाधित है, उसी तरह की एक कैग रिपोर्ट नीतीश कुमार सरकार के खिलाफ भी है जिसे वह खारिज कर रहे हैं. पासवान ने कहा कि अब नीतीश कुमार के समक्ष लालू, पासवान को रोड़ा बताने का कोई मौका नहीं है अब उन्हें अति पिछड़ा, महादलित, बटाईदारी जैसे मुद्दों पर रुख स्पष्ट करना होगा और काम करना होगा.

बिहार चुनाव परिणाम

Posted: 24 Nov 2010 04:30 AM PST

बिहार विधानसभा के रूझानों के बाद स्पष्ट हो गया है कि मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का गठबंधन विशाल बहुमत से वापस सत्ता में लौट रहा है .कुल 243 में से 202 सीटों पर जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन आगे है.अब तक कुल 130 सीटों के परिणाम आ चुके हैं और नीतीश गठबंधन को इनमें से 112 सीट मिले हैं. आरजेडी को अबतक 10 सीट मिले हैं.मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने वर्तमान पद से इस्तीफ़ा दे दिया है और विधानसभा को विघटित कर दिया गया है.संभावना है कि नए मुख्यमंत्री के तौर पर वो शुक्रवार को शपथग्रहण करेंगे.

बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-जनता दल (युनाइटेड) गठबंधन की जबर्दस्त जीत की खूशी पटना शहर की सड़कों और गलियों में देखी जा सकती है। हर जगह जश्न का माहौल है। गली से लेकर चौराहें तक में लोग पटाखे फोड़ रहे हैं। पटना शहर क्षेत्र में विधानसभा की चार सीटें दीघा, कुम्हरार, पटना साहिब तथा बांकीपुर आते हैं। इन सभी सीटों पर राजग के प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है। पटना स्थित भाजपा और जद (यु) कार्यालय तथा मुख्यमंत्री आवास पर तो जश्न का माहौल है ही पटना के आम लोगों में इस जीत को लेकर उत्साह का माहौल है।

क्या होगी बिहार में नीतीश कि वापसी ?

Posted: 23 Nov 2010 09:32 PM PST

किसकी बनेगी बिहार में सरकार? नीतीश मारेंगे बाजी या लालू की होगी जयजयकार? रामविलास पासवान होंगे किंग मेकर या फिर बीजेपी के इशारों पर नाचेगी सरकार? न जनता को पता है और न नेताओं को खबर।बिहार विधानसभा चुनावों की मतगणना के आरंभिक दौर के बाद मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का गठबंधन स्पष्ट बढ़त बनाता हुआ नज़र आ रहा है.कुल 243 में से 177 सीटों पर जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन आगे है.लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल और लोकजनशक्ति पार्टी का गठबंधन काफ़ी पीछे दिखाई पड़ रहा है.कांग्रेस का प्रदर्शन काफ़ी निराशाजनक नज़र आ रहा है. पिछले चुनाव में उन्हें नौ सीटें मिली थीं लेकिन इस बार अभी तक के रूझान बता रहे हैं कि उन्हें कुल चार सीटों पर ही बढ़त हासिल है.

जहाँ सीएनएन आईबीएन द वीक के चुनाव पश्चात अध्ययन ने जदयू-भाजपा गठबंधन को 185 से 201 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया है, वहीं स्टार एसी नील्सन एक्जिट पोल ने नीतीश कुमार की अगुवाई वाले इस गठजोड़ को 150 सीटें दी हैं। वहीँ दूसरी तरफ सीएनएन-आईबीएन, द वीक पोस्ट पोल स्टडी के अनुसार लालू प्रसाद यादव की अगुवाई वाले राजद लोजपा गठबंधन को 22 से लेकर 32 सीटें मिल सकती हैं, जबकि कांग्रेस को छह से बारह तक सीटें मिलने की संभावना है। वामदलों और अन्य को 9 से 19 तक सीटें मिल सकती हैं।
सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि करीब 54 प्रतिशत मतदाता नीतीश कुमार को दूसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाह रहे हैं, जबकि केवल 28 फीसदी मतदाताओं ने लालू और राबड़ी को पसंद किया है।

बेईमानों की भी कराई जाए जनगणना

Posted: 23 Nov 2010 09:19 PM PST

आजादी के बाद से ही यह कौतुहल का विषय रहा है कि भारत में कितने % लोग बेईमान हैं.हर आदमी के पास अपने-अपने आंकड़े हैं.लेकिन कल तो हद ही हो गई.भारत सरकार के अटोर्नी जनरल ने खुद अपने मुखारविंद से सर्वोच्च न्यायालय में भारत के लोगों पर आरोप लगाया कि भारत की शत-प्रतिशत जनता बेईमान हो गई है.इसका तो सीधा मतलब जनता ने यह निकाला कि श्री वाहनवती भी बेईमान हैं.उनके इस आरोप ने इस बहस को और भी तेज कर दिया है.साथ ही एक नई दिशा भी दे दी है.चूंकि राजीव गांधी के काल में १०% ईमानदार लोग देश में बचे हुए थे इसलिए राजीव ने संसद में स्वीकार किया था कि दिल्ली से चले पैसे का मात्र १०% ही जनता तक पहुँच पाता है.यह भी एक अनुमान ही था क्योंकि इस सम्बन्ध में सरकार के पास कोई विश्वस्त आंकड़े नहीं थे.हालांकि फ़िर भी राजीव ने मेरा भारत महान का महान नारा दिया और पहले भूतपूर्व और बाद में अभूतपूर्व हो गए.लेकिन इसके कुछ ही समय बाद यशवंत फिल्म में भी नाना पाटेकर ने इसकी पुष्टि की कि १०० में ९० भारतीय बेईमान हैं फ़िर भी मेरा भारत महान है.अब वर्तमान काल में कितना पैसा जनता तक पहुँच पा रहा है यह पता करने का सरकार ने कोई प्रयास नहीं किया है और न ही प्रधानमंत्री ने लम्बे समय से इस सम्बन्ध में कोई बयान ही दिया है.अगर अटोर्नी जनरल के आरोप को सही मान लें तो फ़िर जनता तक एक भी पैसा नहीं पहुंचना चाहिए.लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पा रहा है.इसलिए सरकार को यह पता लगाने के लिए कि देश में कितने लोग बेईमान और कितने लोग ईमानदार हैं बेईमानी को भी चल रही जनगणना में शामिल करना चाहिए.इससे सबसे पहले तो यही फायदा होगा कि यह अनुमान लगाने में सुविधा होगी कि योजनाओं की कितनी राशि जनता तक पहुँच पा रही है.चूंकि ईमानदारों की संख्या का % जनता तक पहुंचे धन % के समानुपाती होता है इसलिए सरकार यह मालूम हो जाने के बाद अलग से घोटाले के लिए राशि का प्रावधान कर सकेगी.इस जनगणना में मैं बेईमानों की ग्रेडिंग की अनुशंसा करता हूँ ए,बी,सी,डी आदि में.इसका भी अपना लाभ होगा.जिस पद के लिए जिस श्रेणी का बेईमान चाहिए उस पद के लिए उसी श्रेणी के बेईमान की नियुक्ति की जा सकेगी.जैसे राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों के लिए,दूरसंचार मंत्री के पद के लिए आसानी से ए ग्रेड के बेईमान ढूंढें जा सकेंगे.इसके साथ ही होशियार और मूर्ख बेईमानों की भी अलग-अलग श्रेणी बनानी पड़ेगी.होशियार बेईमानों में उन्हें शामिल किया जाना चाहिए जो घोटाला करने के बावजूद मामले को उजागर नहीं होने देने में माहिर हैं.आज देश को ऐसे बेईमानों की सख्त जरुरत है.वैसे भी इसका सबसे ज्यादा लाभ स्वयं कांग्रेस पार्टी को ही होगा क्योंकि उसके शासन में ही सबसे ज्यादा घोटाले होते हैं.वर्तमान में भी मूर्ख बेईमानों के मंत्री बन जाने के चलते मामला प्रकाश में आ जा रहा है और सरकार की किरकिरी हो रही है.वैसे तो हमारी सरकारें सत्येन्द्र दूबे,अभयानंद और किरण बेदी सरीखे ईमानदारों को पहले से ही उनकी ईमानदारी के लिए दण्डित करती रही हैं.लेकिन जनगणना के बाद ईमानदारों को और भी आसानी से चिन्हित करके दण्डित किया जा सकेगा.इसके साथ ही सरकार को उत्कृष्ट कोटि के बेईमानों के लिए बेईमान रत्न और उच्च कोटि के बेईमानों के लिए बेईमान विभूषण,बेईमान भूषण,बेईमान श्री पुरस्कार देने की व्यवस्था करनी चाहिए.इससे लाभ यह होगा कि ईमानदार अपनी ईमानदारी भरी व्यवस्था विरोधी गतिविधियों के प्रति हतोत्साहित होंगे और भारत को पूरी दुनिया में प्रथम शत-प्रतिशत बेईमान देश बनने का गौरव प्राप्त हो सकेगा.इसके साथ ही ईमानदारों के लिए कठोर कानून बनाया जाना चाहिए जिससे कोई भूलकर भी इस गलत और अपने और अपने परिवार के लिए दुखदायी मार्ग पर चलने की भूल नहीं करे.इन्हीं चंद ईमानदारों के चलते भारत प्रसन्न देशों की सूची में लगातार नीचे खिसक रहा है.लोकतंत्र बहुमत से चलता है यह तो सरकार जानती ही है.हम बेईमानों को भी अपनी जनसंख्या के अनुपात में सत्ता में भागीदारी चाहिए.जिसकी जितनी हिस्सेदारी उतनी उसकी भागेदारी.मैं अंत में सरकार को चेतावनी देता हूँ कि अगर वह हमारी बेईमानों की जनगणना की मांग को नहीं मानती है तो हम न सिर्फ संसद बल्कि पूरे देश को ठप्प कर देंगे क्योंकि देश में प्रत्येक जगह हमारा बहुमत है और सरकार भी यह बात जानती है.

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