>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


इलेक्शन-विलेक्शन तो अब खत्म हो गया !

Posted: 09 Nov 2010 08:21 PM PST

कि भाई सुनो !  इलेक्शन-विलेक्शन तो अब खत्म हो गया !  अब तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं ! अब तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं क्योकि अब कारों की पों-पों और स्पीकरों की भौं-भौं तुम्हारे कानों के परदों में सूराख नहीं करेगी   मोटर गाडियों के पीछे उडते हुए धूल के गुब्बारों को आंधी समझ कर अब तुम्हे अपनी बिना दरवाजे की झोंपडी में धूल को घुसने से रोकने के लिए दरवाजे पर फटा हुआ टाट नहीं डालना पडेगा !  अब तुम्हारे नाक को चुनाव में खडे उम्मीदवारों के किराए के आदमियों द्वारा फैलाई मुर्दा नारों की सडी बदबू से राहत मिल जायगी !

कि भाई सुनो, चुनावों की हलचल में हमेशा ही तुम्हारा जीवन अस्त-व्यस्त हुआ है !  अतिथि सत्कार के बोझ तले दबे तुमने इन नेताओं की सेवा करने में अपने शरीर का कितना गोश्त बेचा है इसकी खबर शायद तुम्हें भी नहीं !  तुम तो सारा दिन अपनी रोज़ी छोड कर नेताओं के टेंट लगाकर और मंच सजा कर केवल उनका भाषण सुन कर अपना पेट भर लिया करते थे !  परंतु उन दिनों तुम्हारे काम पर न जाने से तुम्हारे नंगे घूमते बच्चों ने किस प्रकार अपनी भूखी अंतडियों को तसल्ली दी होगी यह तुम्हारे नेता जी क्या जानें ?  तेरह जगह से फटी साडी से अपने शरीर को ढकने मे असमर्थ तुम्हारी औरत ने चुनावों के चहल-पहल में नेताओं के चम्मचों की नज़रों से बचने के लिए झोंपडी में कैसे दिन गुजारे हैं इसकी खबर किसको है ?

कि भाई सुनो, तुम्हें तो सिर्फ काम की चिंता होनी चाहिए !  फल की चिंता करने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है !  यह गीता का वाक्य है !  भगवान कृष्ण का आदेश है !  जिसे तुम्हें मानना ही होगा !  अगर तुम नही मानोगे तो यह “कोप देवता” तुम्हें जला कर राख कर देंगें !  “अपहरण देवता” तुम्हारी जवान बहू-बेटियों को उठा कर ले जांयेंगे  !  “पुलिस देवता” तुम्हारी पत्नी का चीर-हरण करके तुम्हारी झोंपडी में आग लगा देंगे !  मेहनत मज़दूरी करना तुम्हारा फर्ज है !  तुम्हारा कर्तव्य है !  तुम्हारा धर्म है !  फिर पैसे किस बात के ?  मेहनत करने के बाद तुम पैसे मांगते हो इसी लिए तो तुम गरीब हो !  अमीर लोग तो बिना मेहनत किए ही पैसे छीन लिया करते हैं !  इसीलिए वो अमीर हैं !

कि भाई सुनो, जो नेता चुनाव जीत गए हैं उन्हें अपनी जीत की खुशी मनाने से फुरसत नहीं !  जो हार गए हैं उन्हें अपनी हार का गम मनाने से फुरसत नहीं !  वो जीत की खुशी में स्काच पी रहे हैं !  वो हार के गम में स्काच पी रहे हैं !  तुम उनके द्वारा उडाये जा रहे मांस की हड्डियों के इंतज़ार में क्यों बैठे हो ?  उन हड्डियों के हकदार तो सिर्फ उनके कुत्ते हैं !  तुम उनके कुत्ते नहीं हो !  तुम उठो और अपने पुराने ढर्रे पर लग जाओ !  अपना पुराना काम शुरू करो !  क्योंकि काम करना तुम्हारा फर्ज है फल की चिंता करने का तुम्हें कोई हक नहीं !


कष्ट की विषय-वस्तु है जीवन बीमा

Posted: 09 Nov 2010 08:15 AM PST

जीवन का कोई ठिकाना नहीं.कब क्या हो जाए कोई नहीं जानता.इसी अनिश्चितता ने जन्म दिया बीमा के व्यवसाय को.निश्चित रूप से बीमा कम्पनियों ने लाखों-करोड़ों घरों को उजड़ने से बचाया है.बीमा अच्छी चीज है इस पर तो विवाद हो भी नहीं सकता;लेकिन बीमा-एजेंटों की खुदगर्जी के चलते बीमा गले का फाँस भी बन सकती है.अचानक आपके घर कोई पूर्व परिचित व्यक्ति आ धमकता है.एक बड़ा-सा बैग लेकर और इतनी मीठी बातें करना शुरू करता है कि आप उसे अपना सबसे बड़ा शुभचिंतक मान बैठते हैं.आपके दिलों-दिमाग पर कब्ज़ा कर चुकने के बाद वह धीरे से आपके सामने बीमा करवाने का प्रस्ताव रख देता है.पहली बार में आप फँस गए तो ठीक नहीं तो वह आपसे विचार करने का आश्वासन लेकर चल देता है और जब दोबारा आता है तो १-२ किलोग्राम अपने खेत में उपजी गोभी,आलू या कोई अन्य खाद्य-सामग्री लेकर आता है.अब तो आपको फंसना ही है.आप कहते हैं कि मेरा बीमा कर दो तो वह आपको बच्चों का बीमा कराने से होनेवाले लाभों को गिनाने लगता है.आप भी मान लेते हैं कि इसी में आपका फायदा है लेकिन आपको यह पता नहीं होता कि इसमें आपसे ज्यादा उसका फायदा होने वाला है.बच्चा ज्यादा दिन तक जिएगा और एजेंट को ज्यादा दिनों तक बोनस/कमीशन प्राप्त होता रहेगा.यानी कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना.कभी-कभी एजेंट धार्मिक प्रवृत्ति का प्रदर्शन कर (बगुला भगत बनकर) भी आपको प्रभावित करने का प्रयास कर सकता है.जब तक तीन प्रीमियम जमा नहीं हो जाता तब तक हो सकता है वह पैसा जमा करने के लिए समय पर हाजिर हो जाए.तीन प्रीमियम तक उसे आपके द्वारा जमा राशि पर सीधे कमीशन प्राप्त होता है.कई बार हो सकता है कि एजेंट पहले प्रीमियम की राशि ही आपसे झटककर दुर्लभ हो जाए.अब आप आगे पैसा जमा करें या न करें आपकी बला से,उसे तो प्रथम जमा से १० से ४०% तक का कमीशन प्राप्त हो ही गया.एक बात और आप जब भी बीमा कराएँ सालाना ही कराएँ नहीं तो आपको प्रत्येक ३ या ६ महीने पर खुद एलआईसी कार्यालय जाने का दुर्भाग्य प्राप्त हो सकता है.कई बार ऐसा भी होता है कि जब तक आपसे और पॉलिसी मिलने की सम्भावना रहती है एजेंट आता रहता है और जैसे ही आपकी आर्थिक स्थिति ख़राब हुई गदहे की सिंग की तरह गायब हो जाता है.ये सिर्फ सुख के साथी होते हैं.दुःख की घड़ियों में कन्धा देने के बजाये पीठ दिखा जाते हैं.एक बार मेरा एक बीमा एजेंट कई बार समय देने के बाद ठीक ३१ मार्च को यानी वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन हाजिर हुआ और भीड़ का हवाला देते हुए मुझे साथ चलने को कहा.उसके बाद जो हुआ उसे मैं याद तो नहीं करना चाहता लेकिन व्यापक जनहित में बताये देता हूँ.माशाल्लाह तब मैंने सचमुच का किशोर हुआ करता था अब सिर्फ नाम का रह गया हूँ.मुझे अपनी ताकत पर स्वाभाविक तौर पर अभिमान था.एक पंक्ति में चिपक गया.अब पंक्ति खिसकने का नाम ही नहीं ले रही थी.मेरे अलावा पंक्ति में खड़े सारे लोग एजेंट थे और थोक में रसीद कटवा रहे थे.दिन तो रोज ही ढलता था और आज भी ढलता है लेकिन उस दिन वक़्त गुजरने का नाम ही नहीं ले रहा था.सूरज जब अपनी समस्त प्रकाशराशि  समेट कर जाने लगा तब जाकर मेरी बारी आई.घुटनों में जोश की जगह दर्द भर गया था और पेट में चूहे दंड पेलने लगे थे.किसी तरह जान बच सकी.कहाँ तो जीवन को जोखिम से बचाने के लिए बीमा कराया और कहाँ यही बीमा जान जाने का कारण बनते-बनते रह गई.तो श्रीमान अगर आपके घुटनों में दम हो तभी करवाईये बीमा.सरकार ने जनता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए जगह-जगह संग्रह केंद्र खोल दिए हैं.लेकिन यहाँ भी खुद जमा करने जाने में कम परेशानी नहीं.हो सकता है आप जिस संग्रह केंद्र पर जमा करने जाएँ वहां का लिंक फेल हो.बार-बार जाने पर भी कैडबरी के विज्ञापन के पप्पू की तरह फेल ही मिले.इन परिस्थियों में आपको सब कामकाज छोड़कर कई-कई बार संग्रह केंद्र के चक्कर काटने पड़ सकते हैं.तब आप अपने आपको अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में फँसा हुआ महसूस करेंगे,ठीक मेरी तरह.हाथ तो डाल दिया अब निकालें कैसे?चिंता करने से कोई लाभ नहीं आयु के साथ-साथ आपकी बुद्धि भी क्षीण होगी और खुदा न करे मर-मरा गए तो आपको कुछ नहीं मिलेगा,परिवार मालामाल जरूर हो जाएगा.जैसे हर समस्या का समाधान होता है उसी तरह इसका भी समाधान है और वह है सरकार यानी केंद्र के हाथों में.केंद्र को चाहिए कि वह संशोधन करके ऐसा प्रावधान कर दे कि जिससे पोस्ट ऑफिस एजेंटों की तरह बीमा एजेंटों को भी तभी कमीशन या बोनस का लाभ मिले जब वो खुद जमा कराने जाएँ अन्यथा यह राशि ग्राहक को ही दे दी जाए,आखिर वह बेवजह घुटनों का दर्द जो सहता है.अभी तो भैया सीधे माल महाराज के मिर्जा खेले होली वाली स्थिति है.और अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो उसे विज्ञापित कर यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि बीमा आग्रह की विषय-वस्तु है.बल्कि इसके बदले यह प्रसारित/प्रकाशित करना चाहिए कि बीमा कष्ट की विषय-वस्तु है.

मतगणना बाद बिहार कि किस्मत का फैसला

Posted: 09 Nov 2010 08:02 AM PST

मतगणना के बाद बिहार कि किस्मत का फैसला आने वाला चुनाव परिणाम तय करेगा। क्यों कि बिहार में दो ही पार्टियों के बीच सीधा संघर्ष है।
१- एन डी ए जिसमे जनता दल यु और बीजेपी का गटबंधन है।

२- आरजेडी और लोजपा का गटबंधन है।
कांग्रेस पार्टी तीसरे स्थान पर रहेगी और वह बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगी।

बिहार विधान सभा चुनाव २०१० विकाश बनाम जातिवाद का सीधा संघर्ष है। चुनाव परिणाम आने के बाद ही यह तय होगा कि बिहार में विकाश कि जीत हुई या जातिवाद कि।
अगर विकाश कि जीत होती है तो एन डी ए कि सरकार फिर से सत्ता में आएगी और पिछले पांच सालो में जो विकाश कार्य हुए है वह और आगे बढेगा तथा बाहरी उद्योगपतियों का आने का रास्ता प्रसस्त होगा। तब अगले पाँच साल में बिजली कि समस्या, रोजगार कि समस्या, विद्यालय एवं महाविद्यालय कि समस्या, सरकारी हस्पतालों कि समस्या, गाँव-गाँव तक सड़के पहुँचाने कि समस्या, ला एंड ऑडर और दुरुस्त करने कि समस्या तथा आवागमन के रास्ते को और सुचारू गति प्रदान करने कि समस्या से बिहार को पूरी तरह से न भी सही लेकिन निजाद मिलेगी।

अगर आरजेडी और लोजपा कि सरकार बनती है तो जातिवाद कि जीत होगी। शुरू के दौर में सब कुछ ढहर सा जायेगा और लोग सरकार कि नीतियों का आकलन करेंगे, शायद इस आकलन में डेढ़ या दो साल का समय लग जाये। अगर सरकार कि नीतियाँ जनता के प्रति, राज्य के प्रति, विकाश के प्रति माकूल रहा तो फिर जनता लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के प्रति अपने विश्वास को बना पायेगी। अगर लालू प्रसाद और रामविलास पासवान जनता को जो उम्मीदे दिए है उस पर सही नहीं उतरते है तो यह लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के लिए आंखरी चुनाव साबित होगा। पिछले पंद्रह साल तक आरजेडी कि सरकार बिहार कि सत्ता में रही है लेकिन बिहार को कोई दिशा नहीं दे पाई थी बल्कि इनके शासन-काल में बिहार कि दशा और ख़राब हुई। इस चुनाव में अगर लालू प्रसाद और रामविलास पासवान कि पार्टी बिहार कि सत्ता में आती है तो शायद अपने पिछले गलतियों से सबक लेते हुए आगे विकाश के कार्यों पर ध्यान देंगे तथा बिहार को एक सही दिशा देंगे।
आज़ादी के बाद से बिहार कि सत्ता चालीस वर्षो तक कांग्रेस के हाथ में रही लेकिन विकाश के नाम पर बिहार बाटम लाइन पर रहा और बिहार में जो विकाश होना चाहिए वह नहीं हुआ। कांग्रेस के शासन से त्रस्त होकर यहाँ कि जनता श्री लालू प्रसाद के पक्छ में अपना जनादेश दिया। लालू प्रसाद पंद्रह साल तक बिहार कि सत्ता में रहे लेकिन इन्हों ने भी बिहार के विकाश पर कोई ध्यान नहीं दिया, बल्कि इनके शासन काल में बिहार कि स्थिति और ख़राब हुई। लालू प्रसाद के शासन से त्रस्त होकर बिहार कि जनता एनडीए (जनता दल यु + बीजेपी) को अपना जनादेश दिया। बिहार में एनडीए कि सरकार सत्ता में आई और मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार बने। सत्ता में आने के साथ ही इन्हों ने बिहार के ला एंड ऑडर को दुरुस्त किया, कानून का राज कायम होने से यहाँ के वाशियों को सकून मिला। फिर उन्हों ने पूरी तरह बर्बाद हो गई बिहार कि सड़कों पर ध्यान दिया, सड़कें बहुत हद तक अच्छी हुई तथा कुछ नई सड़कें भी बनी। जजर हालत में पहुँच चुकी सरकारी हस्पतालों को बहुत हद तक ठीक किया तथा डाक्टरों कि उपस्थिति अनिवार्य हुई जिससे मरीजों कि तायदात में वृद्धि हुई साथ ही मुफ्त कि दवाएं भी मिलने लगी। बिहार के स्कूलों में लड़के लड़कियों कि संख्या में कुछ ज्यादा ही वृद्धि हुई क्यों कि सरकार के तरफ से मुफ्त में साईकिल एवं स्कुल यूनिफार्म बांटे गए।

सरकार किसी कि भी बने बिहार कि समस्याओं से उसे रु-बरु होना पड़ेगा और उसके लिए पहल करनी पड़ेगी :- ला-एंड- आडर का और दुरुस्त होना, विद्यालय, महाविद्यालय को बहुतायात में खोलना पड़ेगा ताकि बिहारी बच्चे उच्च शिक्झा के लिए दुसरे राज्यों में न जाएँ। बिजली कि समस्या से बिहार को उबारना पड़ेगा ताकि कल-कारखाने खुल सके और लोंगो को रोजगार मुहैया हो सके। कृषि को उद्योग का दर्जा देना पड़ेगा जिससे किसान संपन्न हो सके और मजदूरों का पलायन रुक सके। सड़कें गाँव-गाँव तक बनानी पड़ेगी ताकि लोंगों का आवा-गमन सुचारू रूप से हो सके। उत्तर बिहार में हर साल जो बाढ़ के रूप में कहर आता है और गाँव का गाँव उस बाढ़ में बह जाता है उस बाढ़ के पानी को रोकने के लिए डैम बनवाने पड़ेंगे जिससे पन-बिजली का उत्पादन भी होगा और बाढ़ का पानी खेंतो में सिचाई के काम भी आएगा। गाँव-गाँव तक सरकारी हस्पताल खोलने होंगे ताकि गाँव का कोई भी व्यक्ति बिना इलाज के न मर सके।
बिहार में जब रोजगार मिलने लगेगा तो लोंगो का पलायन अपने-आप रुक जायेगा, हर माह जो करोडो रुपये दुसरे राज्यों को चले जाते है उच्च शिझा के नाम पर वह पैसा बिहार में ही रहेगा, बिहार में सम्पन्नता आएगी, बिहार आत्म निर्भर बनेगा, मावोवाद भी धीरे-धीरे ख़त्म हो जायेगा तथा मावोवादी भी आम लोगों कि तरह जिंदगी बसर करने लगेंगे। यह सब संभव है बसरते कि इस राज्य के बनने वाले मुखिया इन बातो पर अमल करें।

लाईन चरित मानस

Posted: 09 Nov 2010 07:38 AM PST

वर्ष १८५९,दिन और समय मालूम नहीं,स्थान रंगून.भारत के निर्वासित शायर बादशाह बहादुर शाह ज़फर का मन व्याकुल है.वे अपनी जिंदगी का हिसाब-किताब करने में लगे हैं.धीरे-धीरे फिंजा में उनकी रेशमी आवाज गूंजती है-लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में, किसकी बनी है आलम-ए-नापायेदार में; उम्र-ए-दराज़ मांग के लाये थे चार दिन;दो आरजू में काट गए दो इंतज़ार में.कहते हैं इंतज़ार की घड़ियाँ लम्बी होती हैं.लेकिन हर किसी को कभी-न-कभी इंतज़ार करना पड़ता है.कभी ट्रेन के आने का तो कभी उसके जाने का,तो कभी पत्नी के चुप होने का,किसी को इंतज़ार रहता है माशूक की हामी का तो किसी को  क़यामत (सुहागरात) के आने का.कोई अगर बुद्धिजीवी हुआ और साथ में समझदार भी तो उसे इंतज़ार रहता है देश की जनसंख्या के नियंत्रित होने का और नेताओं के सच्चे हो जाने का.निश्चित रूप से इनके इंतजार में भी काफी सब्र रखना पड़ता है लेकिन इंतज़ार की घड़ियाँ सबसे ज्यादा लम्बी और कष्टकारी तब लगती हैं जब हम लाईन में लगे हों और काफी पीछे हों.अगर आप पैसे वाले हैं तो लाईन में खड़े हुए बिना भी आपका काम हो सकता है लेकिन हम तो ठहरे आम आदमी.वर्षों पहले जब मैं महनार के अमरदीप सिनेमाघर में सिनेमा देखने गया तब मुझे पहली बार लाईन में खड़ा होना पड़ा.लेकिन तब टिकट खिड़की खुलने के साथ ही लाईन समाप्त हो जाती थी और शारीरिक बल का प्रदर्शन करके मुझे टिकट लेना पड़ता था.उन्हीं दिनों अख़बार में पढ़ा और फिल्मों में भी देखा कि महानगर मुम्बई में बस में चढ़ने के लिए लाईन में लगना पड़ता है.हंसी भी आई यार ये कैसे लोग हैं जो बस में चढ़ने के लिए लाईन में लगे हैं.अपन तो बस की सीढ़ी,गेट कुछ भी पकड़कर लटक जाते हैं और वो भी मुफ्त में.एक और जगह भी उन दिनों मेरा साबका लाईन से पड़ता था और वह जगह थी रेलवे स्टेशन.लेकिन लाईन छोटी हुआ करती थी.तब मैं कम दूरी की यात्रा ही करता था.लेकिन अब तो अनारक्षित टिकट खिडकियों पर भी लाईन बड़ी होने लगी है.शायद यह जनसंख्या बढ़ने का असर है या फ़िर लोगों ने ज्यादा यात्रा करनी शुरू कर दी है,या फ़िर दोनों का संयुक्त प्रभाव है.अभी इसी गर्मी का वाकया है.मैं अपने मित्र धीरज के तिलकोत्सव से वापस आ रहा था.छपरा स्टेशन पर पाया कि तीन काउंटरों पर टिकट काटा जा रहा है और तीनों पर कम-से-कम ३००-३०० लोग लाईन में खड़े हैं.लाईन देखकर दिल बैठने लगा.फ़िर मन में अपना पुराना डायलाग दोहराया-सोंचना क्या जो भी होगा देखा जाएगा.लाईन में लग गया यह सोंचते हुए कि अगर टिकट लेने से पहले ट्रेन आ जाती है तो टिकट लिए बिना ही यात्रा कर ली जाएगी.लेकिन खुदा के फजल से ट्रेन आने से चंद मिनट पहले टिकट मिल गया, हालांकि मैं पसीने में नहा चुका था.ये तो हुई बात उन लाईनों  की जिनका लिंक से कुछ भी लेना-देना नहीं होता.असली परेशानी तो वहां होती है जहाँ आपका काम होने के लिए लिंक का होना आवश्यक होता है.मेरे साथ कई बार ऐसा हो चुका है और शायद आपका भी सामना हुआ हो.होता यूं है कि मैं किसी भी ए.टी.एम. पर २०-३० लोगों के पीछे लाईन में खड़ा हूँ.सूर्य देव पूरे गुस्से में हैं.लाईन में खड़े-खड़े एक घंटा या आधा घंटा बीत चुका है.भगवान की कृपा से मेरी बारी भी आ चुकी है लेकिन आलसी और लापरवाह बैंककर्मियों की कृपा से लिंक फेल हो जाता है.सारे किये धरे पर गरम पानी.कभी-कभी आप बैंक के भीतर ही लाईन में खड़े होते हैं और लिंक अंतर्धान हो जाता है और आपके पास सिवाय लाईन में खड़े होकर इंतजार करने के कोई उपाय नहीं होता.अभी कुछ ही महीने पहले महनार (वैशाली)में सेन्ट्रल बैंक को लिंक से जोड़ा गया.जनता खुश थी कि अब वह कहीं से भी पैसे की जमा-निकासी कर पाएगी.लेकिन १ महीने तक लिंक आँख मिचौली करता रहा.सैंकड़ों लोग रोजाना आते लाईन में खड़े होते और शाम ढलने के बाद खाली हाथ वापस चले जाते,सरकार और बैंक को मीठी-मीठी गालियाँ देते हुए.तब लाईन देखते ही उनके मन में लाचारी मिश्रित क्रोध उमड़ने-घुमरने लगता.कुछ ऐसा ही अनुभव प्राप्त करने का सुअवसर आपको तब प्राप्त हो सकता है जब आप रेलवे आरक्षण काउंटर पर घन्टे-भर लाईन में खड़े होते हैं और लिंक शरारत पर उतारू हो जाता है.मैंने अभी जिन संभावनाओं का जिक्र किया है उससे हम सबका सामना होता रहता है.वैसे आज के भारत में लाईन सर्वव्यापी सत्य है.आपको लाईन में लगने का सौभाग्य अस्पताल से श्मशान तक में कहीं भी प्राप्त हो सकता है.आपने शायद कभी हिसाब नहीं लगाया होगा कि आपका कितना समय लाईन में लगे-लगे गुजरता है यानी जन्म से मृत्यु तक हमारे जीवन का एक बड़ा भाग लाईन में लगे-लगे बीतता है.हम कभी नहीं चाहते कि लाईन में लगें लेकिन काम करवाने के लिए लगना ही पड़ता है.हम लाईन से भाग सकते हैं पर बच नहीं सकते.सिर्फ यमराज की कृपा आप पर हो जाए तभी आप लाईन से मुक्ति (मोक्ष) पा सकते हैं.आज अगर तुलसीदास होते तो क्या कर रहे होते कल्पना कीजिए.कहाँ खो गए?मैं बताता हूँ वे किसी लाईन में खड़े होकर या तो भगवान राम से लाईन से मुक्ति देने की प्रार्थना कर रहे होते या फ़िर लाईन चरित मानस लिख रहे होते.इस कमबख्त मोबाईल को भी अभी ही बजना था.पिछले एक घन्टे से ए.टी.एम.पर लाईन में हूँ और अब जब मेरी बारी आ गई है तब बॉस का फोन आ रहा है.समझ नहीं पा रहा फोन काटकर नौकरी जाने का खतरा उठाऊँ या फोन उठाकर फ़िर से एक घन्टे के लिए लाईन में खड़े होने की फजीहत झेलूं.लीजिये मैंने ये फोन कट कर दिया.

ग़लतफ़हमी नहीं पाले भारत

Posted: 09 Nov 2010 02:34 AM PST

ओबामा अपनी चार दिन की यात्रा पूरी कर पूर्वी एशिया के लिए रवाना हो चुके हैं.ओबामा जब तक भारत में रहे,भारत की स्तुति में लगे रहे.हम भारतीयों की यह पुरानी बीमारी है कि हम किसी भी तथ्य को तभी सत्य मानते हैं जब कोई विदेशी उसकी पुष्टि कर दे.चाहे वो वैज्ञानिक हो या कोई लेखक-कवि उसे अपने देश में तभी मान्यता मिलती है जब किसी पश्चिमी देश ने उसे पुरस्कृत कर दिया हो.ओबामा हमारी धरती पर खड़े होकर बार-बार हमें वैश्विक महाशक्ति कह रहे हैं और हम भी मस्त हुए जा रहे हैं.क्या उनके कहने से ही हम महाशक्ति होंगे या फ़िर नहीं होंगे?हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मानव विकास सूचकांक में हम काफी नीचे हैं.स्वच्छ शासन के मामले में भी हमारी स्थिति शर्मनाक है.हमारी जनसंख्या का बड़ा भाग २० रूपये प्रतिदिन से भी कम में गुजारा कर रहा है.सुरक्षा के क्षेत्र में हम पूरी तरह दूसरे देशों पर निर्भर हैं.हम अभी अपने पड़ोसियों से भी निबट पाने में सक्षम नहीं हैं.हमारी हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन पिछले ६०-६५ सालों से चीन और पाकिस्तान के कब्जे में है और हम आज भी उसे छुड़ा पाने की स्थिति में नहीं हैं.फ़िर हम किस तरह की महाशक्ति हैं?ओबामा इस समय याचक की भूमिका में हैं और ठकुरसोहाती करना उनकी जरुरत ही नहीं मजबूरी भी है.इसलिए हमें अतिरिक्त सावधान रहने की जरुरत है.हो सकता है हम भुलावे में आकर ऐसी गलती कर बैठें जिसका खामियाजा हमें लम्बे समय तक भुगतना पड़े.इंग्लैण्ड की तरह अमेरिका भी बनियों का देश है और बनिया कोई भी काम बेवजह नहीं करता.कल की एकमात्र महाशक्ति अमेरिका को एक अन्य महाशक्ति चीन ने सस्ते मालों से पाटकर उत्पादकों के बदले उपभोक्ताओं के देश में बदल दिया है.अमेरिका में एक तरफ उत्पादन में कमी आ रही है तो वहीँ दूसरी ओर आश्चर्यजनक तरीके से मुद्रा-स्फीति में भी कमी देखने को मिल रही है.जी.डी.पी. बढ़ने के बजाए कम हो रही है और बेरोजारी बढ़कर ९ प्रतिशत पर पहुँच गई है.दूसरी ओर चीन दिन-ब-दिन ताकतवर होने के साथ आक्रामक होता जा रहा है.उसकी शक्ति इतनी बढ़ चुकी है कि अकेले अमेरिका उससे नहीं निबट सकता.यह कारण भी है कि ओबामा भारत समेट चीन द्वारा प्रताड़ित अन्य देशों की यात्रा पर हैं.अमेरिका का इतिहास स्वार्थ का इतिहास रहा है.जब भी जैसे भी उसका मतलब साधा है उसने अन्य देशों से दोस्ती-दुश्मनी की है.सद्दाम हुसैन भी कभी उसके दोस्तों में थे.तालिबान भी उसी का मानस पुत्र है.उसने यह कभी नहीं देखा कि जिस देश से उसका हित सध रहा है वहां तानाशाही है या लोकशाही.आज जब उसका हित भारत से सध रहा है तो वह लोकतंत्र का पैरोकार बन गया है.क्या आज से पहले भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं था?ठीक एक साल पहले ओबामा चीन की धरती पर चीन का गुणगान करने और उसे अपना स्वाभाविक मित्र बताते थक नहीं रहे थे.तब क्या चीन में लोकतंत्र था?भारत को ओबामा के गुणगान में बह नहीं जाना चाहिए और वास्तविकताओं को समझना चाहिए.भारत निश्चित रूप से तेज गति से विकास कर रहा है लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि समय रहते अगर हमने बढ़ते भ्रष्टाचार और गरीबी को नियंत्रित नहीं किया तो यह गति कायम नहीं रहनेवाली.अगर ऐसा हुआ तो हमसे ज्यादा दुर्भाग्यशाली कोई और नहीं होगा.हमारे गाँव में एक मंदबुद्धि का युवक था.लोग उसे बराबर चढ़ा-बढ़ा देते-यार तुम तो जन्मजात बहादुर हो.तुम चाहो तो क्या नहीं कर सकते.तुम चाहो हो आसानी से मुक्का मारकर जलते लालटेन को भी फोड़ सकते हो और वह व्यक्ति बहकावे में आकर अक्सर लालटेन को फोड़ डालता.आर्थिक नुकसान तो होता ही था बाद में डांट और मार पड़ती सो अलग.आज भारत के साथ भी ओबामा यही कर रहे हैं.हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हमारी सरकार उनके बहकावे में नहीं आएगी और कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाएगी जिससे हमारा दीर्घकालीन हित प्रभावित होता हो.मैं इस लेख का अंत अपने एक संस्मरण से करना चाहूँगा.उन दिनों मैं विद्यार्थी था.मुझे हर सप्ताह साथ में पढनेवाली किसी-न-किसी लड़की से एकतरफा प्यार हो जाता था और लगता था कि वह लड़की भी मुझे प्यार करती है.जब मैं इस बात का जिक्र अपने सहपाठी अनुज सदृश संतोष उरांव से करता तो वह कहता-क्या भैया आप भी!अच्छा हो कि कुत्ता पाल लीजिए,बिल्ली पाल लीजिए अगर फ़िर भी मन नहीं माने तो सूअर पाल लीजिए लेकिन कभी ग़लतफ़हमी नहीं पालिए.

पराये ओबामा से क्या उम्मीद ?

Posted: 09 Nov 2010 02:23 AM PST

भारत सरकार और मीडिया दोनों ही ऐसा दिखा रही है कि ओबामा कपास ओटने नहीं बल्कि हरिभजन को आये थे ! ओबामा के भजन की हर चर्चा है कि ओबामा ने भारत को एक विश्वशक्ति बताया , ओबामा ने जय हिंद बोला ,भारत को सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता का समर्थन किया, पाकिस्तान को आतंकवाद ख़त्म करने की सलाह दिया , भारत को उच्च तकनीक प्रौद्योगिकी में सहयोग का वादा किया आदि-आदि | लेकिन उनके कपास ओटने की बात को दबाकर सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है मानो अमेरिकी राष्ट्रपति के इतना कह देने भर से भारत की सारी समस्या दूर हो गयी है और भारत अब विकासशील देशों की श्रेणी से निकाल कर विकसित देशों की कतार में अमेरिका और चीन से भी आगे खड़ा है ! तो अब जबकि हमारा भारत तथाकथित रूप से विकसित हो गया है तब हमारा कर्तव्य बनता है कि हम देश को छोड़कर वैश्विक स्तर पर सोचें ! शायद, ‘ वसुधैव कुटुम्बकम ‘ के सिद्धांत को याद रखते हुए प्रधानमंत्री ने अमेरिकी नौजवानों की बेरोजगारी दूर करने में भारतीय संसाधनों के दोहन की छूट ओबामा को दे दी | और सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता के आश्वासन के बदले में कृषि, रोज़गार, उद्योग,आदि क्षेत्रों में अमेरिका पर निर्भर हो जाने का निर्णय ले लिया है |

इस तथाकथित नये विश्वशक्ति को शिक्षा -स्वास्थ्य -रोजगार को छोड़कर रक्षा मसौदों पर अधिक से अधिक खर्च करने की योजना सुझाकर ओबामा ने एक ही तीर से अरबों का व्यापार तीन दिन में बना लिया | बात भी सही है , एक विश्वशक्ति का तो अपने साथ-साथ आस-पड़ोस के राज्यों में भी लोकतंत्र को जिंदा रखने का फर्ज बनता है और बगैर अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों के भारत , ओबामा के कहे अनुसार, वैश्विक लोकतंत्र की रक्षा और शांति के प्रयासों को किस तरह निभा पायेगा ! विश्वशक्ति की साख बचाने के लिए कभी पाकिस्तान ,कभी अफगानिस्तान , कभी इंडोनेशिया तो कभी अफ्रीका यहाँ तक की अमेरिका को भी करोड़ों डॉलर की आर्थिक सहायता करनी पड़ेगी , भले ही देश के आतंरिक हालात बांग्लादेश से भी बदतर हों !

खैर , अपने भाग्य पर क्या रोना ! जब हमारे द्वारा चुने प्रतिनिधि ही हमें नज़रअंदाज कर चंद अमीरों को और अमीर बनाने पर तुले हुए हैं | जब हमारे प्रधानमंत्री को हीं हम 80 करोड़ भारतीयों की नाली के कीड़े से बजबजाती जिन्दगी से कोई लेना-देना नहीं है तो पराये ओबामा से क्या उम्मीद ?

एक आम भारतीय

मैं अख़बार लाता हूँ…

Posted: 09 Nov 2010 12:16 AM PST

हाँ यह वही तो है जो 35 साल पहले मेरे नये घर का दरवाजा खटखटाकर, सवाली आँखों से, शिष्टाचार के साथ खड़ा था. दरवाजा खोलते ही मैंने भी सवाली आँखों से बिना कुछ कहे पूछा था.

“मैं अख़बार लाता हूँ ,पूरी कॉलोनी के लिये. आप को भी चाहिए तो बता दीजिए”

“अरे बहुत अच्छा किया! कल इतवार है और हर इतवार को हमारा सिंधी अख़बार ‘हिंदवासी’ आता है जो ज़रूर मुझे दीजिएगा”

“अच्छा” कहकर वह यह कहते हुए सीडियाँ उतरने लगा “पाँच रुपए का है वो” और अपनी तेज़ रफ़्तार से वह दो मज़िल उतर गया.  1973  की बात आयी आई गई हो गयी,  हर दिन, हर घर को, कई साल बीतने के बाद भी बिना नागे वह अख़बार पहुंचाता है, और मैं पढ़ती रही हूँ,  दूर दूर तक की ख़बरें आज, अभी तक. शायद अख़बार न होता तो हम कितने अनजान रह जाते समाचारों से, शायद इस ज़माने की भागती जिंदगी से उतना बेहतर न जुड़ पाते. अपने आस पास के हाल चाल से बखूबी वाकिफ़ करती है यह अख़बार.

पिछले दो साल मैं लगातार अपनी रसोई घर की खिड़की से सुबह सात बजे चाय बनाते हए देखती हूँ ‘मूर्ति’ को, यही नाम है उसका. बेटी C.A  करके बिदा हो गयी है, बेटा बैंक में नौकरी करता है, और मूर्ति साइकल पर अख़बार के बंडल लादे, उसे चलाता हुआ, एक घर से दूसरे घर तक पहुंचाता है. जाने, दिन में कितनी सीडि़या चढ़ता उतरता है. एक बात यकीनन है. अब उसकी रफ़्तार पहले सी नहीं. एक टाँग भी कुछ लड़खड़ाने लगी है. 35 साल कोई छोटा अरसा तो नहीं,  मशीन के पुर्ज़े भी ढीले पड़ जाते है, बदले जाते है, पर इंसानी मशीन उफ़! एक अनचाही पीड़ा की ल़हर सिहरन बन कर सीने से उतरती है और पूरे वेग से शरीर में फैल जाती है. वही ‘मूर्ति’ अब अख़बार के साथ, खुद को ढोने का आदी हो गया है, थोड़ी देर से ही, पर अख़बार पहुंचाता है, दरवाजे की कुण्डी में टाँग जाता है. जिस दौर से वह अख़बार वाला गुज़रा है, वह दौर हम पढ़ने वाले भी जीकर आए है उन अख़बारों को पढ़ते पढ़ते. पर पिछले दो साल से उस इंसान को, उसके चेहरे की जर्जराती लकीरों को, उसकी सुस्त चाल को पढ़ती हूँ तो लगता है यह तो आप बीती है, आईने के सामने रूबरू होते है पर कहाँ खुद को भी देख पाते हैं, पहचान पाते हैं? बस वक़्त मुस्कुराता रहता है हमारी जवानी को जाते हुए और बुढ़ापे को आते हुए देखकर.

और मैं वहीं चाय का कप हाथ में लेकर सोचती हूँ, क्या यही जिंदगी है्? हाँ अजब है यह जिंदगी, खुद तो जीती है, पर वो हुनर उस अख़बरवाले मूर्ति को न सिखा पाई. उससे आज भी बोझ उठवाती है, उसकी कंपकपाते हड्डयों पर ज़्यादा बोझ डलवाती है, घरों की मंज़िलों तक का सफर तय करवाती है और धीरे धीरे वह दिखाई देता है मेरी खिड़की के सामने वाली सीड़ी से उतरता हुआ अख़बार वाला मूर्ति, जिसकी जिंदगी को हम शायद पल दो पल रुककर अख़बार के पन्नों की तरह कभी पढ़ न पाए. मैने पीछे पलटते हुए देखा है

, इन अख़बारों को रद्दी में जाते हुए…लेकिन आदमी पुराना फिर भी रोज़ नया अख़बार ले आता है!

वेदों में विज्ञान

Posted: 09 Nov 2010 12:09 AM PST

।। मूल मन्‍त्र यहाँ देखें ।।

आज के युग में भारतीय मेधा के प्रथम प्रदर्शन ‘वेद’ विद्या के प्रसार प्रचार की बहुत ही आवश्‍यकता है । वेदों के विषयों में पाश्‍चात्‍य व प्रार्च्‍य कतिपय विद्वानों द्वारा इतने भ्रामक तथ्‍य फैला दिये गये हैं कि समाज में वेदों के सम्‍यक प्रचार की पुन: आवश्‍यकता प्रतीत होती है, ये वेद प्राचीनकाल से आज तक के आविष्‍कारों व खोजों की सूची हैं । यदि हम ठीक से इन्‍हे पढें तो ये देखेंगे कि विश्‍व का सर्वप्रथम आविष्‍कार कब और कहाँ हुआ था ।

वेदों में वैज्ञानिक तथ्‍यों की भरमार है । मेरे स्‍वयं के अध्‍ययन से मैने ये पाया कि वस्‍तुत: वेद हमारे आस पास की वस्‍तुओं में ही निमीलित वैज्ञानिक तथ्‍यों का ही अध्‍ययन है ।

वेदों के मन्‍त्र बडे ही सांकेतिक है जिनमें ऐसी ऐसी बातों का वर्णन है जिसे आज का विज्ञान अब ढूढ पाया है । इन्‍ही सूक्ष्‍म वैज्ञानिक तथ्‍यों का खुलासा करने हेतु ही वेदों में विज्ञान की यह श्रृंखला प्रारम्‍भ की जा रही है । आज सर्वप्रथम ऋग्‍वेद के प्रथम सूक्‍त के प्रथम मन्‍त्र का वर्णन करता हूँ , जिसमें विश्‍व की सर्वप्रथम और महानतम खोज हुई थी ।।

संकेत – ॐ अग्निमीले पुरोहितं…………………………………. रत्‍नधातमम् ।। (ऋग्‍वेद-1/1/1)

अर्थ – हम अग्निदेव की स्‍तुति करते हैं जो यज्ञ के पुरोहित, देवता, ऋत्विज, होता और याजकों को रत्नों से विभूषित करने वाले हैं ।।


विशेष – अग्नि विश्‍व की सर्वप्रथम खोज है , ये विश्‍व की सबसे महानतम खोज कही जा सकती है । इस मन्‍त्र में अग्नि की महत्‍ता का वर्णन है । ऋग्‍वेद का प्रथम मन्‍त्र किसी विशिष्‍ट देव को ही समर्पित किया जाना चाहिये । विशिष्‍ट में भी देवराज इन्‍द्र प्रधान हैं किन्‍तु फिर भी प्रथम मन्‍त्र उनको समर्पित न‍हीं किया गया । देवगुरू वृहस्‍पति तो इन्‍द्र के भी मार्गदर्शनकर्ता हैं पर प्रथम मन्‍त्र उनको भी समर्पित न होकर अग्नि को समर्पित किया गया इससे यह पता चलता है कि वैदिक काल में ही अग्नि की महत्‍ता का पता चल गया था । अग्नि याजकादि को समृद्धि प्रदान करने वाले हैं इससे भी अग्नि की महत्‍ता की ओर संकेत किया गया है । आगे के मन्‍त्रों में अग्नि की उत्‍पत्ति का भी वर्णन दिया गया है और अग्नि का विशेष महत्‍व भी बताया गया है । जो क्रमश: प्रस्‍तुत किया जायेगा ।


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