>सर्वोच्च न्यायालय के कुछ जजों की संदिग्ध करतूतें… (भाग-2)… Corruption in Indian Judiciary System (Part-2)

>(भाग-1 में हमने सर्वोच्च न्यायालय के कुछ जजों के संदिग्ध आचरण के बारे में देखा था (यहाँ क्लिक करके पढ़ें), पेश है उसी की दूसरी और अन्तिम कड़ी…)

5) जस्टिस एएस आनन्द (10.10.1998 – 01.11.2001)

जस्टिस पुंछी महाशय की तरह ही जस्टिस आनन्द का कार्यकाल भी विवादों और विभिन्न संदिग्ध निर्णयों से भरा रहा। इन साहब के खिलाफ़ भी राष्ट्रपति से महाभियोग चलाने की अनुमाति ली गई थी और विभिन्न आरोप तय किये गये थे।

(अ) जब ये सज्जन जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे उस समय कृष्ण कुमार आमला नामक उद्योगपति के केस की सुनवाई करते रहे और उसके पक्ष में निर्णय भी दिया, जबकि गांदरबल में नहर के किनारे ज़मीन के दो बड़े-बड़े प्लॉट आमला ने जस्टिस आनन्द के नाम कर दिये थे।

(ब) जस्टिस आनन्द ने जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश रहते काफ़ी बड़ी कृषि भूमि पर कब्जा जमाये रखा, जबकि यह ज़मीन जम्मू-कश्मीर कृषि सुधार कानून 1976 के अनुसार राज्य सरकार के कब्जे में होनी चाहिए थी।

जस्टिस आनन्द के खिलाफ़ कई पक्के सबूत होने के बावजूद महाभियोग अपील पर हस्ताक्षर करने लायक सांसदों की पर्याप्त संख्या नहीं मिल पाई, क्योंकि लगभग सभी पार्टियों के नेता इस बात से भयभीत थे कि जस्टिस आनन्द की अदालत में चल रहे उनके और उनकी पार्टियों से सम्बन्धित मुकदमों का क्या होगा, जब आनन्द को पता चलेगा कि उनके खिलाफ़ किस-किस सांसद ने हस्ताक्षर किये हैं। सो आनन्द साहब का कुछ नहीं बिगड़ा…

6) जस्टिस वायके सभरवाल (01.11.2005 – 14.01.2007)

दिल्ली में “सीलिंग एक्ट” के सम्बन्ध में धड़ाधड़ आदेश और निर्देश जारी करने वाले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सभरवाल के खिलाफ़ भी न्यायिक जिम्मेदारी समिति ने कई गम्भीर आरोप लगाये हैं जिनकी जाँच होना आवश्यक है। दिल्ली के रिहायशी इलाकों में चल रहे व्यावसायिक संस्थानों को बन्द करके सील लगाने सम्बन्धी इनके आदेश बहुचर्चित हुए। इस आदेश की वजह से छोटे दुकानदारों और एक-दो कमरों में अपने दफ़्तर चलाने वाले छोटे संस्थानों पर रातोंरात ताले डलवा दिये गये और उन्हें सील कर दिया गया। इस वजह से इन लोगों को अपना धंधा सुचारु रुप से जारी रखने के लिये बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स और व्यावसायिक कॉम्पलेक्स में अपनी दुकानें और ऑफ़िस खरीदने या किराये पर लेने पड़े, जिसके कारण दिल्ली के बड़े-बड़े डेवलपर्स और बिल्डर्स के भाव ताबड़तोड़ बढ़ गए तथा मुख्य बाज़ारों में व्यावसायिक प्रापर्टी की कीमतें आसमान छूने लगीं। इसके पीछे की कहानी का खुलासा बाद में तब हुआ जब पता चला कि सभरवाल साहब के दोनों बेटे (चेतन और नितिन सभरवाल) शॉपिंग मॉल्स और कमर्शियल कॉम्पलेक्स के बड़े निर्माताओं के न सिर्फ़ सम्पर्क में थे, बल्कि कुछ बिल्डर फ़र्मों में उनकी पार्टनरशिप भी थी… (यहाँ देखें…)। जिन व्यापारियों का टर्नओवर 2 करोड़ से कम था उन्हें सभरवाल साहब ने अपने आदेशों से मजबूर कर दिया कि वे महारानीबाग और सिकन्दर रोड पर 15-20 करोड़ की प्रापर्टी खरीदें। इस तरह उन्होंने कुछ ही महीनों में उनके बेटों ने करोड़ों रुपये की सम्पत्ति खड़ी कर ली। बेशर्मी की इन्तेहा यह भी थी कि उनके बेटों की फ़र्मों के ऑफ़िस का पता भी सभरवाल साहब का सरकारी आवास ही दर्शाया जाता रहा। इसी प्रकार अमर सिंह टेप काण्ड की सुनवाई के समय ही अचानक उनके पुत्रों को उतरप्रदेश सरकार द्वारा नोएडा में बेशकीमती ज़मीन अलॉट की गई। “विशेषाधिकार प्राप्त” वीवीआईपी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश महोदय के खिलाफ़ अभी तक प्रशासनिक मशीनरी में एक पत्ता भी नहीं खड़का है…

यह तो हुई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की बात, जिसे प्रशान्त भूषण जैसे धुन के पक्के व्यक्ति ने उजागर करने और उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत की, लेकिन इससे पहले भी कई मामले ऐसे सामने आ चुके हैं जिसमें “माननीय”(?) न्यायाधीश महोदय के पद पर बैठे महानुभावों ने अपना हाथ “काला-पीला” किया है…

1) बच्चों को नकल नहीं करने की नसीहत देने वाले और नकल के केस बनने पर जुर्माना और रेस्टीकेशन करने वाले जज महोदय खुद परीक्षा में नकल करते पकड़ाये गये… http://www.dailypioneer.com/278780/5-AP-judges-suspended-for-cheating-exams.html

2) जस्टिस सेन द्वारा अपने बंगले के रखरखाव और फ़र्नीचर पर 33 लाख रुपये का बेतुका खर्चा किया गया… http://www.dailypioneer.com/270092/Justice-Sen-misappropriated-funds-RS-probe-panel-told.html
(ताज़ा खबर यह है कि जस्टिस सेन के खिलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव को उपराष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है)

3) कई न्यायाधीश ऐसे “भाग्यशाली” रहे हैं कि सरकारी नौकरी से रिटायर होने के “अगले दिन ही” उन्हें बेहद महत्वपूर्ण पद मिल गया (ज़ाहिर है कि उनकी “प्रतिभा” के बल पर) – जैसे कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस एचके सेमा ने अपने कार्यकाल के अन्तिम दिनों में अम्बेडकर पार्क के निर्माण कार्य पर लगी रोक हटाने में मायावती की “मदद” की तो वे तड़ से उप्र राज्य के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष बना दिये गये। फ़िर इन माननीय को ज्यादा तकलीफ़ न हो इसलिये मानवाधिकार आयोग का कार्यालय भी उठाकर नोएडा में खोल दिया गया, क्योंकि “माननीय” दिल्ली में रहते हैं।


4) जस्टिस यूसी बनर्जी जिन्हें NDA सरकार ने अप्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष पद पर बैठाने से मना कर दिया था, उन्हें UPA सरकार के “मैनेजमेंट के धनी और सबसे प्रतिभाशाली”(?) मंत्री लालू यादव ने गोधरा काण्ड की जाँच आयोग का अध्यक्ष बना दिया। इस “अहसान” का बदला बनर्जी साहब ने लालूप्रसाद यादव की मनमर्जी की रिपोर्ट बनाकर दिया, यानी कि गोधरा में आग डिब्बे के अन्दर से लगाई गई थी, न कि बाहर से।

5) जस्टिस अरिजीत पसायत जिन्होंने अहसान जाफ़री केस दोबारा खोलने और मोदी को फ़ाँसने वाले SIT की तारीफ़ करने का काम किया था उन्हें “अपीलेट अथॉरिटी” के पद से नवाज़ा गया।

6) सोहराबुद्दीन केस में गुजरात सरकार की खिंचाई करने वाले जस्टिस तरुण चटर्जी साहब को रिटायरमेण्ट के अगले दिन अरुणाचल/असम के सीमा प्रदेशों के विवाद में मध्यस्थ हेतु नियुक्त किया गया। हालांकि तरुण चटर्जी साहब PF घोटाले में उनकी संदिग्ध भूमिका के लिये अभी भी जाँच के घेरे में हैं।

7) जस्टिस एआर लक्षमणन जिन्होंने मुलायम सिंह को सीबीआई के घेरे में लिया, सेवानिवृत्ति के बाद तड़ से लॉ कमीशन के चेयरमैन बना दिये गये।

8) चेन्नई के जस्टिस दिनाकरन तो मानो “भूमिपुत्र” ही हैं, उन्हें ज़मीन से विशेष प्रेम है… चेन्नई कलेक्टर ने उनकी ज़मीनों की एक पूरी लिस्ट जारी की है… यहाँ देखें…http://www.hindu.com/2009/11/13/stories/2009111355421300.htm

लेकिन न तो आज तक किसी भी मुख्य न्यायाधीश और उनके परिजनों की सम्पत्ति की जाँच कभी भी केन्द्रीय सतर्कता आयोग या सीबीआई द्वारा नहीं की गई… ज़ाहिर है कि इन महानुभावों के पास आलोचकों के लिये “न्यायालय की अवमानना” नामक घातक हथियार तथा सरकार और राष्ट्रपति का विशेष कानून रुपी रक्षा-कवच मौजूद है।

किसी राजनैतिक भ्रष्ट को आप और हम मिलकर कभीकभार वोट के जरिये 5 साल में ही बाहर का रास्ता दिखा देते हैं, लेकिन IAS-IPS-IFS जैसे उच्चाधिकारी और न्यायिक सेवा के इन “माननीय महानुभावों” का आप क्या कीजियेगा… वरिष्ठ वकील प्रशान्त भूषण जी द्वारा दायर हलफ़नामे में सरकार से इन भ्रष्ट जजों के खिलाफ़ जाँच शुरु करने की माँग की गई है।

जजों की सम्पत्ति घोषित करना इस लड़ाई में छोटी सी, लेकिन पहली जीत है… न्यायाधीशों को सूचना के अधिकार कानून में शामिल करने को लेकर हीलेहवाले और टालमटोल किये जा रहे हैं, लेकिन यह भी होकर रहेगा… फ़िर सबसे अन्त में नम्बर आयेगा “माननीयों” के खिलाफ़ मुकदमे दायर करने का…। जिस तरह से सेना में भ्रष्टाचार को “राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर अधिक दिनों तक छिपाया नहीं जा सकता उसी तरह न्यायिक क्षेत्र को भी “अवमानना” और “विशेषाधिकार” के नाम पर अधिक दिनों तक परदे के पीछे नहीं रखा जा सकेगा…। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा हाल ही में जारी भ्रष्ट देशों की सूची में भारत और नीचे खिसक गया है… पर हमें शर्म नहीं आती।

यह लेख आम जनता की जानकारी हेतु जनहित में प्रस्तुत किया गया –

(डिस्क्लेमर – प्रस्तुत जानकारियाँ विभिन्न वेबसाईटों एवं प्रशान्त भूषण/शान्ति भूषण जी के एफ़िडेविट पर आधारित हैं, यदि इनसे किसी भी “माननीय” न्यायालय की अवमानना होती हो, तो “आधिकारिक आपत्ति” दर्ज करवायें… सामग्री हटा ली जायेगी…)

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23 Comments

  1. November 11, 2010 at 7:10 am

    >सही बात है, हम भले ही यह कहते रहे कि हमारी न्याय व्यवस्था सुदृढ़ है, मगर हकीकत यह है कि आज इस देश में जितनी भी बुराइयां पनप गई है सभी की जड़ में यह घुन लगी न्याय व्यवस्था है ! आज जो इस देश की राजनीति जो गन्दगी के चर्मोत्कार्स पर पहुँच गई है , इसे यहाँ तक पहुंचाने में ९०% हाथ हमारी judiciary का है!

  2. November 11, 2010 at 7:42 am

    >……….जब रक्षक ही भक्षक हो तो देश का भला न होकर भाला ही होगा । देश के आम जन की सबसे ज्यादा आस्था न्यायपालिका नामक स्तंभ से है, लेकिन यदि न्यायपालिका के करतार ऐसे होने लगें तो फिर वह दिन दूर नहीं जब ऐसे (अ)न्यायमूर्तियों को भी इन गंदे और नाजायज राजनेताओं से तुलना करते हुए इनकी सामाजिक भर्त्सना और थू-थू होने लगे । अवमानना की छड़ी दिखाकर ऐसे भ्रष्ट जज कब तक अपने को छुपा कर रख पाएँगे….अस्तु, बिहार राज्य के राजकीय पर्व के रूप में ख्यात सूर्य-षष्ठीव्रत (छठमहापर्व) की लेखक व सभी टिप्पणीकारों को कोटिशः हार्दिक शुभकामनाएँ…………..

  3. November 11, 2010 at 9:06 am

    >andhernagri chaupat raja

  4. November 11, 2010 at 9:37 am

    >इन सब सालों को चौराहे पे लाकर जलते हुए सलाखों पे टांग दिया जाना चाहिए क्योकि इनके अन्याय ने पता नहीं कितने इमानदार और बेकसूर लोगों की जिन्दगी को नरक बनाने के साथ-साथ इस देश और समाज को भी नरक बनाया है ….जितने भी कड़ोरपति जज हैं वो सभी इंसानियत और न्याय को बेचकर धनवान बने हैं …….इस देश में अम्बानी ने जो छः हजार कड़ोर का आवास बनाया है वह भी इस देश,समाज,कानून तथा इंसानियत के साथ गद्दारी किये बिना नहीं बनाया जा सकता और अम्बानी जैसों की मदद ऐसे जज करते हैं और खुद भी अरबपति बनतें हैं …….ये सब शर्मनाक स्तर के भ्रष्टाचारी हैं इन लोगों ने इंसानियत को कब्र में पहुंचा दिया है ….

  5. November 11, 2010 at 9:47 am

    >आपने साक्ष्य के साथ ये सिद्ध कर दिया है की भ्रष्टाचार हमारे रगों में खून बन कर दौड़ रहा है और ये किस प्रकार हमें खता जा रहा है सर्वप्रथम इस भ्रष्टाचार को समाप्त करने हेतु हम सभी हिन्दुस्तानी भाइयों को प्रतिबद्ध होना चाहिए dabirnews.blogspot.com

  6. November 11, 2010 at 9:58 am

    >in bhukhe kutto ko bhagwan kaha jata hai, inhe bhagawan nahi saitan kaha jana chahiye. agar isha se bhi koi ganda sabbd ho to ushkabi ishtemal karna chahiye, ye kanun ke raxak ke nam par kanun ki devi ka apman karne wale bikaau log hai. lekin inko palne ka kam to hamare rajneta hi kar reahe hai, aur vo to sabse bade chor hai. phir to chor chor maushere bhai wali kahavat sach hai………..

  7. November 11, 2010 at 12:08 pm

    >भ्रष्टाचार के कारनामो के पुस्तक मे, ये मोटे मोटे पन्ने पलटना सबके बस मे नही है. फिर भी हमे कोशीशें जारी रखने की जरूरत है, कभी तो इन मोटे मोटे दोषियों को भारी भारी सजा मिले.

  8. man said,

    November 11, 2010 at 12:21 pm

    >वन्दे मातरम सर सर जिस तरह आप ने मय सबूत इन बड़े मगरो को पानी में नंगा दिखाया हे ,वाकई लाजवाब हे ,मुख्य पेचीदगी ये ही की इन को बाहर कोन निकाले |http://jaishariram-man.blogspot.com/2010/11/blog-post_11.html………………………….new पोस्ट हे जरूर पधारे |

  9. November 11, 2010 at 12:56 pm

    >शर्मनाक!

  10. November 11, 2010 at 1:15 pm

    >ऐसे लोगो को सिर्फ दस दिन का समय अपने बचाव के लिए दिया जाना चाहिए | दस दिन बाद संतुष्ट न होने पर फांसी दे देनी चाहिए | कितने बेशर्म है ये सब कि जो देश के कानून को पढ़ कर देश के लोगो को न्याय देते है और और दूसरी तरफ धन के लिए पद का दुरुपयोग कर रहे है| इससे सिद्ध होता है कि हमारे देश कि न्याय के आदेश बिकी हुई हो सकती |

  11. November 11, 2010 at 1:39 pm

    >इस लेख से किसी बेशर्म माननीय की अवमानना हुई हो तो मैं लेखक की ओर से क्षमा माँगता हूँ. जनता को न्यायालय पर नेताओं से ज्यादा भरोसा था, वह भी खड्डे में गया है.

  12. November 11, 2010 at 3:47 pm

    >अवमानना कानून में संशोधन अवश्यम्भावी है…एक जस्टिस के निर्णय के विरुद्ध मिड-डे के पत्रकार ने कुछ लिखा और उस पत्रकार को नतीजतन कुछ दिन जेल में बिताने पड़े…

  13. November 11, 2010 at 4:15 pm

    >हैरत में हूं कि इतना सब होने के बावजूद भी न्यायपालिका ये कहती है कि भ्रष्टाचारियों को खुलेआम खंबे पर लटका देना चाहिए …हद है । इस लेख से जिनका मान सम्मान कम होता हो ..कायदे के हिसाब से तो उन्हें स्वंय ही अपनी इहलीला समाप्त कर लेनी चाहिए ..वे यकीन रखें किसी को अफ़सोस नहीं होगा इसका

  14. November 11, 2010 at 4:24 pm

    >जय कुमार जी ने सही कहा है …जब हमारी न्याय व्यवस्था में ही यह सब कुछ होता है तो ..फिर न्याय कहाँ …विचारणीय पोस्ट

  15. RDS said,

    November 12, 2010 at 3:32 am

    >चिपलूणकर जी,न्याय शब्द का अर्थ क्या है ? मठाधीश, सत्ताधीश की ही तरह न्यायाधीश शब्द भी पाखंड का मुलम्मा साबित हुआ जा रहा है । ज़ुल्म की सताई हुई 'मदर इंडिया' किस न्याय की गुहार करे ? किससे करे ? ज़ुल्मी और जज के बीच कोई भरोसेमन्द ब्रिज कहीं बचा है क्या ? जजों में कोई सच्चा बचा हो तो बोले और बताए ! ईश्वर इस देश का भला करे ! शुभेच्छु,- RDS

  16. DeepShekhar said,

    November 12, 2010 at 6:02 am

    >सोनिया पर मोहन भागवत के बयान पर संघ और भाजपा ने भी उनसे किनारा कर लिया है. सुरेशजी इसका कारण क्या है? मुझे तो संघ और भाजपा भी माइनो कांग्रेस और सीआईए के गड़बड़झाले मे मिले हुए लगते हैं.

  17. Alok Nandan said,

    November 12, 2010 at 12:05 pm

    >नीचली अदालतों में जजों की स्थिति और भी खतरनाक है….बेजोड़ करप्शन है यहां पर…और दूर दूर तक इसका कोई इलाज होता नहीं दिख रहा है…भयावह स्थिति है

  18. November 12, 2010 at 2:54 pm

    >दिल्ली में सीलिंग मामले में माननीय की हरकतों के पर्दाफास करते कार्टून बनाने पर कार्टूनिस्ट को कितना सहना व भुगतना पड़ रहा है ये बात कार्टूनिस्ट इरफ़ान पठान से पूछी जा सकती है |

  19. DShekhar said,

    November 12, 2010 at 4:44 pm

    >ऐसा क्यों लग रहा है की मोहन भागवत के सार्वजानिक बयान के बाद विपक्ष को सांप सूंघ गया है, सब चुप हैं. कांग्रेस ने दो दिन बाद सोच समझकर कार्यकर्ताओं द्वारा पुतले फूंक कार्यक्रम आयोजित कर रही है.बात खुल ही चुकी है तो ऐसे मौके पर सब चुप क्यों हैं? अपनी तो बुद्धि काम नहीं कर रही है, आप शायद कारण जानते होंगे.

  20. November 12, 2010 at 5:38 pm

    >पहले भाग में दिया एक कमेन्ट विचारणीय है Umesh said…ये वही वकील साहब हें जिन्होने टीवी पर खुलेआम अरुंधति रॉय की वकालत की है और कश्मीर की आजादी का समर्थन किया है31 OCTOBER 2010 7:26 PM

  21. November 12, 2010 at 9:28 pm

    >वाकई शर्मनाक स्थति है… कोई जगह नहीं बची साफ़ सुथरी……

  22. November 13, 2010 at 4:53 am

    >कितनी आसानी से सब लोगों ने न्यायाधीशों को फांसी पर लटका दिया| ऐसा लगता है जैसे हम सब कहीं किसी और इंडिया में रहते हों , और जिनकी हम आलोचना करते हों वो कहीं और इंडिया में| अपने बारे में कोई नहीं सोचेगा, बस जो जहाँ फंसा वहीँ उसे लटका दो | सुरेश कलमाड़ी जो कॉमनवेल्थ में करके आया है , वही गाँव के स्टेडियम के लिए पैसा स्वीकृत करते हुए मैं करता हूँ| राजू सत्यम को जैसे चला रहा था , मौका नहीं मिला वरना वैसे ही पैसे मैं भी बनाता | तेलगी को भूल गए, नकली पेपर या नकली साइन , मुहर तो हम कहीं न कहीं पे तो रोज़ मारते हैं| अगर कैडबरी में कीड़ा निकलता है तो हो हल्ला मचाते हैं , वहीँ दूध को सिंथेटिक तो मेरे ही चाचा ताऊ बनाते हैं| सच बताऊँ तो आम आदमी ही सबसे बड़ा भ्रष्ट होता है, जितना ज्यादा जो आम होगा वो मिनिस्कैल पे उतना ही बड़ा भ्रष्ट होगा| अब मैं इस पूरे देश को तो फांसी पे नहीं चढ़ा सकता, लीवर कौन दबाएगा, एक फंदा तो मेरे गले में भी होगा|

  23. November 13, 2010 at 6:48 am

    >मुल्लों को बाद मे ! पहले ये सुनिए कैसा षड्यंत्र रचा जा रहा है हिन्दुओ के खिलाफ गाँव कस्बो से भोली भली हिन्दू लड़कियों को फसाया जा रहा है ! और तो और ये सब बॉलीवुड मे सभी खानो के द्वारा भी हो रहा है http://www.shreshthbharat.in/2010/11/blog-post_12.html


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