>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


आपने पुलिस के लिये क्या किया है?

Posted: 10 Nov 2010 07:30 AM PST

मैं जहाँ कहीं भी लोगों के बीच जाता हूँ और भ्रष्टाचार, अत्याचार या किसी भी प्रकार की नाइंसाफी की बात करता हूँ, तो सबसे पहले सभी का एक ही सवाल होता है कि हमारे देश की पुलिस तो किसी की सुनती ही नहीं। पुलिस इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि अब तो पुलिस से किसी प्रकार के न्याय की या संरक्षण की आशा करना ही बेकार है। और भी बहुत सारी बातें कही जाती हैं।

मैं यह नहीं कहता कि लोगों की शिकायतें गलत हैं या गैर-बाजिब हैं! मेरा यह भी कहना नहीं है कि पुलिस भ्रष्ट नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि हम में से जो लोग इस प्रकार की बातें करते हैं, वे कितने ईमानदार हैं? उनमें से ऐसे कितने हैं, जिन्होने कभी जून के महिने में चौराहे पर खडे यातायात हवलदार या सिवाही से पूछा हो कि भाई तबियत तो ठीक है ना, पानी पिया है या नहीं?

हम से कितने हैं, जिन्होंने कभी थाने में जाकर थाना प्रभारी को कहा हो कि मैं आप लोगों की क्या मदद कर सकता हूँ? आप कहेंगे कि पुलिस को हमारी मदद की क्या जरूरत है? पुलिसवाला भी एक इंसान ही है। जब हम समाज में जबरदस्त हुडदंग मचाते हैं, तो पुलिसवालों की लगातर कई-कई दिन की ड्यूटियाँ लगती हैं, उन्हें नहाने और कपडे बदलने तक की फुर्सत नहीं मिलती है। ऐसे में उनके परिवार के लोगों की जरूरतें कैसे पूरी हो रही होती हैं, कभी हम इस बात पर विचार करते हैं? ऐसे समय में हमारा यह दायित्व नहीं बनता है कि हम उनके परिवार को भी संभालें? उनके बच्चे को, अपने बच्चे के साथ-साथ स्कूल तक ले जाने और वापस घर तक छोडने की जिम्मेदारी निभाकर देखें?

यात्रा करते समय गर्मी के मौसम में चौराहे पर खडे पुलिसवाले को अपने पास उपलब्ध ठण्डे पानी में से गाडी रोककर पानी पिलाकर देखें? पुलिसवालों के आसपास जाकर पूछें कि उन्हें अपने गाँव, अपने माता-पिता के पास गये कितना समय हो गया है? पुलिस वालों से पूछें कि दंगों में या आतंक/नक्सल घटनाओं में लोगों की जान बचाते वक्त मारे गये पुलिसवालों के बच्चों के जीवन के लिये हम क्या कर सकते हैं? केवल पुलिस को हिकारत से देखने भर से कुछ नहीं हो सकता? हमेशा ही नकारत्मक सोच रखना ही दूसरों को नकारात्मक बनाता है।

हम तो किसी कानून का या नियम का या व्यवस्था का पालन नहीं करें और चाहें कि देश की पुलिस सारे कानूनों का पालन करे, लेकिन यदि हम कानून का उल्लंघन करते हुए भी पकडे जायें तो पुलिस हमें कुछ नहीं कहे? यह दौहरा चरित्र है, हमारा अपने आपके बारे में और अपने देश की पुलिस के बारे में।

कई वर्ष पहले की बात है, मुझे सूचना मिली कि मेरे एक परिचित का एक्सीडेण्ट हो गया है। मैं तेजी से गाडी चलाता हुआ जा रहा था, मुझे इतना तनाव हो गया था कि मैं सिग्नल भी नहीं देख पाया और लाल बत्ती में ही घुस गया। स्वाभाविक रूप से पुलिस वाले ने रोका, तब जाकर मेरी तन्द्रा टूटी।

मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। मैंने पुलिसवाले के एक शब्द भी बोलने से पहले पर्स निकाला और कहा भाई जल्दी से बताओ कितने रुपये देने होंगे। पुलिसवाला आश्चर्यचकित होकर मुझे देखने लगा और बोला आप कौन हैं? मैंने अपना लाईसेंस दिखाया। उसने जानना चाहा कि “आप इतनी आसानी से जुर्माना क्यों भर रहे हैं।” मैंने कहा गलती की है तो जुर्माना तो भरना ही होगा।

अन्त में सारी बात जानने के बाद उन्होनें मुझसे जुर्माना तो लिया ही नहीं, साथ ही साथ कहा कि आप तनाव में हैं। अपनी गाडी यहीं रख दें और उन्होनें मेरे साथ अपने एक जवान को पुलिस की गाडी लेकर मेरे साथ अस्पताल तक भेजा। ताकि रास्ते में मेरे साथ कोई दुर्घटना नहीं हो जाये?

हमेशा याद रखें कि पुलिस की वर्दी में भी हम जैसे ही इंसान होते हैं, आप उनको सच्ची बात बतायें, उनमें रुचि लें और उनको अपने बीच का इंसान समझें। उन्हें स्नेह और सम्मान दें, फिर आप देखें कि आपके साथ कैसा बर्ताव किया जाता है। आगे से जब भी कोई पुलिस के बारे में नकारात्मक टिप्पणी करे तो आप उससे सीधा सवाल करें कि-”आपने पुलिस के लिये क्या किया है?”

चुप मत बैठ कबीर

Posted: 10 Nov 2010 07:23 AM PST

अपनों के बीच वर्ष 1974 ईं. में सत्यं-शिवम्-सुन्दरम् कविता संग्रह लेकर पहुंचा था अपनों के बीच।उस कविता संग्रह को आर्शवाणी कहा गया था। उस कृति में मेरी एक रचना:-

यश से हूं मैं दूर ,नहीं सम्मेलन जाता।

बिन देखे गढ़ लंका की न बात बताता।।

अपनी आहों के पर्वत ,झरने सा बहता।

जिसको देखो वही मुझे पागल है कहता।।

मेरे स्वभाव को घोषित करती थी-मेरे स्वभाव का प्रतिबिम्ब थी।आज भी वही हूं।जीवित हूं-पत्थर में ऊगने वाले बेलनुमा पौधे पथरचटा की तरह।उस संग्रह की अन्तिम रचना-

अगर तुम चाहते हो कि

सदा जियो

तो एक नुस्खा लिख रहा हूं

हथौड़ों का कष्ट सहो

लिंग बनो मस्त रहो

और सरल शब्दों में समझो

समुद्र मथ अमृत मत ढूंढो

शिव बनो,गरल पियो,सदा जियो

मुझे हथौड़ों की मार सहने को प्रेरित करती रहती है । आगे की कड़ियों में ‘चुप मत बैठ कबीर ‘ संग्रह में प्रकाशित रचनाएँ जनोक्ति पर प्रकाशित की जाएगी |

ज़िन्दगी क्या है?

Posted: 10 Nov 2010 05:22 AM PST

ज़िंदगी क्या है
एक अनबुझी प्यास
उम्र की सहरा में
तलाशती हुई उन सुराबों को
जो सूरज की किरणों
के सिमटाव के बाद
उसे इस भ्रम से बाहर निकाल पाए
कि हर सुराब प्यास नहीं बुझाता

दिन के उजाले में
तलाश के जुनून में
भटकना मुमकिन है
मगर
दिन ढले, हाँ! दिन ढले
एक और तलाश मन को
छटपटाहट का वरदान देती है
उस ठहराव को तलाशती है जो
सहरा के सुराबों से कम नहीं.

और शायद यहीं, हाँ शायद!
यहीं सारी काइनात सिमटकर
एक बिंदू पर ठहराना चाहती है
अंधेरे के बीच
एक रौशन सुराब से
वो अम्रत पीना चाहती है
जो प्यास को बुझाने के बजाय
प्यास बढ़ाता रहे
और के बाद और की चाहत
एक आरज़ू पागलपन की हद तक
उस तलाश का पीछा करते हुए
अस्ल में ज़िन्दगी को जी पाए
सच में जी पाए.
देवी नागरानी

नक्सलियों के आय के प्रमुख स्रोत

Posted: 10 Nov 2010 05:16 AM PST

निशा दास की रिपोर्ट रांची से

झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों ने भी प्रयास किया ,पर अबतक कोई खास सफलता इसमें उन्हें नहीं मिल पाई है। आईए एक नजर डालते हैं नक्सलियों के आय के मुख्य श्रोतों पर।

नक्सलियों के दिन प्रतिदिन मजबूती से उभरने का सबसे बड़ा कारण है यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों के बीच कमजोर इच्छा शक्ति का होना। क्योंकि कोई चाहता है इसका सफाया तो कोई नक्सलियों के सफाये के नाम पर सिर्फ राजनीति करते हैं ना कि काम। किसी भी अपराधी गिरोह या और भी कोई दूसरा संगठन चलाने के लिए धन की काफी अहम भूमिका होती है। नक्सलियों को भी संगठन को मजबूती देने के लिए मोटे धन की आवश्यकता होती है। और ये धन झारखंड में चलने वाले सरकारी योजनाओं में काम करनेवाले ठेकेदारों और विभागों से मिलते हैं हालांकि इसका कोई रिकोर्ड नहीं है क्योंकि हर कोई चाहता है कि काम हो जाय और जान भी बच जाय। यानि की सुरक्षा के नाम पर हमारी पुलिस बौनी साबित हो रही है नक्सलियों के सामने तभी तो नक्सलियों के सामने ठेकेदार और विभागीय कर्मचारी घुटने टेकते हुए नजर आते हैं। और इसी का फायदा उठाते हैं नक्सली। झारखं डमें चलने वाले खानों से भी नक्सली लेवी वसूलते हैं इसके साथ -साथ विस्फोटक पदार्थ भी वहंीं से लेते हैं। जाहिर सी बात है कि जब सरकारी योजनाओं और खानों से नक्सलियों को सहज ही लेवी और धन उपलब्ध हो जाय तो वे मजबूती से उभरेंगे ही। हमारे ही हथियार और हमारे ही पैसे से हमारे ही लोगों को नक्सली मारते हैं और इस बात की तस्दीक करते हैं कि गरीबों और पीड़ितों के लिए नक्सलवाद का निर्माण किया गया। ये कैसा मरहम लगाने का तरीका है गरीबों पर ,जो आम इंसानों के खून से अपने हाथों को रंगता हो। और भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर गरीब लोगों के आंखों में धूल झोंकता हो। सवाल ये भी उठता है कि आखिर खानों से निकलने वाले विस्फोटक और पैसे का हिसाब कहां जाता है। क्योंकि जब इतने अधिक मात्रा में लेवी और सामानों की निकासी होती है तो इसका हिसाब किसी के पास क्यूं नहीं रहता है। मामला साफ है कि सबके सब इसमें आकंठ डूबे हुए हैं। ये अलग बात है कि नक्सलियों का डर ही इन्हें ऐसा करने पर मजबूर करता होगा पर सवाल ये भी उठता है कि आखिर हमारी पुलिसिया तंत्र क्या करती है जो अपने ही विभागों की रक्षा नहीं कर पाती है। एक कहावत है कि अगर सांप को मारना हो तो पहले उसके कमर पर वार करो उसके बाद कहीं दूसरे जगह। ठीक इसी तरह से नक्सलियों के उपर भी वार करना होगा तभी नक्सलियों के आतंक से मुक्ति मिल सकती है। क्योंकि जबतक वे पैसे से कमजोर नहीं होंगे तब तक ऐसे ही वे भी लड़ेंगे और हमारी पुलिस नक्सलियों से मुकाबला करती रहेगी।

झारखंड में ट्रांस्फर -पोस्टींग का खेल

Posted: 10 Nov 2010 05:06 AM PST

झारखंड में जब -जब नई सरकार बनीं तब-तब अधिकारियों के ट्रांस्फर -पोस्टींग का खेल चरम पर रहा। यहां के हुक्मरानों ने अधिकारियों को अपने मन मर्जी से ही चलाया। उनके उपर अपनी मनमानी का डंडा चलाया। उनके बेसकीमती दिमाग का इस्तेमाल अगर किया तो सिर्फ भ्रष्टाचार के मामले में विकास के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया।

झारखंड की भी गजब की फितरत रही है। इसका इतिहास ही रहा है इसने देश के मानचित्र पर जब भी किया औरों से अलग हटकर। ये अलग बात है कि इसमें ज्यादातर मामले भ्रष्टाचार के ही रहे। बात करते हैं झारखंड में अधिकारियों के ट्रांस्फर पोस्टींग की। किसी भी राज्य के विकास में अधिकारियों के इच्छाशक्ति की भूमिका काफी अहम मानी जाती है। और ये यहां भी लागू होती है। यहां तो गर्म कपड़े की ही तरह सरकार बदलती है। अगर अधिकारियों की बात की जाय तो यहां वही अधिकारी मलाईदार पोस्ट पर जमे रहते हैं जो यहां के हुक्मरानों के इशारे पर नाचते हों जिसने भी थोड़ी सी आनाकानी की या तो उनका ट्रांस्फर हो गया या फिर उन्हें इस कदर परेशान किया जाता है कि वे खुद ही पनाह मांगने लगते हैं। हाल ही के घटना में सत्ता दल के एक मंत्री ने एक डीसी से चमड़ी उधेड़ लेने की बात कह दी थी । हालांकि ये मामला दो-चार दिनों तक चर्चा में रहा पर उसके बाद ऐसे गायब हो गया जैसे गाय के सिर से सींग गायब हो गया हो। नतीजा वहां का विकास कुछ दिनों के लिए रूक गया। ट्रांस्फर पोस्टींग भी पूरी तरह से यहां के हुक्मरानों के साथ -साथ बिचैलियों की जेबें गर्म करता है। राज्य में कई ऐसे बिचैलिये आए जिसने सिर्फ अधिकारियों ओर हुक्मरानों के बीच तालमेल बैठाने के नाम पर करोड़ों रू0 के वारे न्यारे किए। ये अलग बात है कि जनता का पैसा जनता के नाम पर बिचौलिये और हुक्मरानों की ही झोली में जाता रहा है ,विकास के नाम पर विकास की कोरी बातें हीं होकर रह जाती है ,नतीजा गरीबी और बेबसी ही जनता की झोली में आती है। स्थानीय लोगों की मानें तो वे भी यहां के हुक्मरानों को ही दोषी मानते हैं।

विकास करने के लिए अधिकारियों को तो पहले इलाके का ज्ञान होना चाहिए और ये ज्ञान तभी संभव हो सकता है जब वे इलाके का अवलोकन करेंगे। लेकिन यहां ना तो अवलोकन होता है और न हीं इलाके का निरीक्षण। ज्यादातर योजनाएं कागजों पर ही सिमट कर रह जाती है। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि अधिकारियों को हुक्मरानों का व्रदहस्त प्राप्त रहता है। और एक कहावत है कि जब सैंयां भए कोतवाल तो फिर डर काहे। ठीक यही कहावत यहां फिट बैठती है। क्योंकि जिस अधिकारी की यहां के मंत्रियों से सेटिंग हो गई उनकी तो पौ बारह रही और जो सेटिंग-गेटिंग के फारमूले में पीछे पड़ गए उनकी खटिया खड़ी हो गई। और जब वे खुद ही अपने आप से आश्वस्त नहीं होंगे तो वे विकास की रेखा को खींचने में कैसे कामयाब हो सकते हैं।

बात चाहे जो भी हो अगर सही मायने में विकास करना है तो ट्रांस्फर -पोस्टींग जैसे बीमारी को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा तभी हम कह सकते हैं कि वाकई में हम विकास की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

बच्चों का पलायन और उत्पीड़न

Posted: 10 Nov 2010 04:36 AM PST

इन दिनों बच्चों का पलायन तेजी से बढ़ रहा है और उसी अनुपात में उनके साथ उत्पीड़न की घटनाएं और आकड़े भी. खास तौर से मजदूरी के लिए बच्चों को एक राज्य से दूसरे राज्य में आदान-प्रदान किए जाने का सिलसिला जोर पकड़ता जा रहा है. विभिन्न शोध-सर्वेक्षणों और रपटों से यह जाहिर भी हो रहा है कि मुख्य तौर पर बिहार, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश से महाराष्ट्र और गुजरात सहित पूरे देश भर में मजदूरी के लिए बच्चों की पूर्ति की जा रही है. इन बच्चों में ज्यादातर की उम्र 10 से 16 के बीच है. इनमें भी ज्यादातर लड़के ही हैं. कई सर्वेक्षणों और तजुर्बे यह भी बता रहे हैं कि मजदूरी में लगे ज्यादातर बच्चे स्कूल जरूर गए हैं, मगर वह नियमित नहीं हो सके हैं. बच्चों के बारम्बार पलायन होने के पीछे की मुख्य वजहों में बच्चों ने अपने घर की गरीबी, मारपीट, डर और दबाव को जिम्मेदार ठहराया है तो कभी मुंबई और सूरत जैसे बड़े शहरों की तड़क-भड़क को देखने की दबी चाहत को भी बाहर निकला है. इस दिशा में जो सर्वेक्षणों के आधार पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई कदम उठाए जाने की बात कही जाती रही है, मगर अभी तक इन मामलों के न रुकने से यथार्थ की गंभीरता को भलीभांति समझा जा सकता है.

दूसरी तरफ बालगृहों से लगातार बच्चों के भागने की घटनाएं बयान करती हैं कि मुंबई सहित देश भर के सरकारी बालगृहों में बच्चों की सही देखभाल की असलियत क्या है. बीते समय मुंबई के एक बालगृह से कुछ बच्चों के भागने और उनमें से एक के हादसे में मारे जाने घटना उजागर हुई थी. आम तौर पर देखा गया है कि ज्यादातर बालगृहों द्वारा भागने वाले बच्चों के बारे में पता लगाने जरुरत भी महसूस नहीं की जाती हैं. ऐसे बच्चों को ढूंढने की भी तमाम कोशिशें तो दूर महज एक रिपोर्ट तक नहीं लिखवाई जाती है. तजुर्बों से यह जाहिर हुआ है कि हफ्तों-हफ्तों बच्चों के गायब रहने के बावजूद बालगृहों की तरफ से चुप्पी साध ली जाती है. जबकि नियमानुसार इस तरह की घटनाओं की जानकारी फौरन थाने में और उच्च अधिकारियों को देना जरूरी है. यहां तक कि महिला और बाल कल्याण विभाग को भी इस तरह की ज्यादातर घटनाओं की प्राथमिक सूचना किसी अखबार या गैर-सरकारी संस्था के जरिए ही मिलती है. भागने वाले कुछ बच्चों के बारे में जब हमने खैर-खबर जाननी चाही तो पता लगा कि सामान्यत: बालगृहों की तरफ से इन बच्चों की गुमशुदगी के बारे में न तो पुलिस को ही सूचना दी जाती है और न ही विभाग को इस बारे में बताया जाता है. कई बार तो बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाएं और अपराधिक मामले प्रकाश में आने के बाद ही बच्चों के भागने की रिपोर्ट दर्ज की जाती है. बच्चों के इस तरह से गायब होने की तुरंत रिपोर्ट न लिखवाना महज एक लापरवाही ही नहीं बड़ा अपराध भी है. मुंबई के सरकारी बालगृहों से बीते 6 सालों में तकरीबन तीन सौ से ज्यादा बच्चे भागे हैं, मगर इतना होने के बावजूद लापरवाही का आलम ज्यों का त्यों है. समाज कल्याण विभाग से मिली गैर-औपचारिक जानकारियों के मुताबिक बालगृहों में कर्मचारियों की कमी है. एक कर्मचारी पर सैकड़ों बच्चों को संभालने की जवाबदारी होती है. काम के दबाव में कई बार कर्मचारियों द्वारा जब बच्चों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता है तो बच्चे भाग जाते हैं. उन्हें ठीक-ठाक खाना तक नहीं मिलता है. इस तरह से सरकार द्वारा ऐसे बच्चों के देखभाल उचित के लिए संचालित बालगृह बुरे बर्ताव और उत्पीड़न का केंद्र बन जाते हैं.

हर साल मुंबई जैसे महानगर पहुंचने वाले हजारों बच्चे काम की तलाश में या काम की जगहों से भीख मंगवाने वाले नेटवर्क के हत्थे भी चढ़ जाते हैं. खास तौर से रेल्वे स्टेशनों के प्लेटफार्म और चौराहों पर ऐसे नेटवर्क से जुड़े दलालों की सरगर्मियों को समझा जा सकता है. यही बहुत सारे बच्चे बहुत ही गंदे माहौल में महज खाने-पीने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं. इसके अलावा बहुत से बच्चे नशे के आदी हो जाते हैं तो बहुत से जुर्म की दुनिया में भी दाखिल हो जाते हैं.

भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो हर लिहाज से बाल- शोषण और उत्पीड़न को रोकने में मददगार हो. दूसरी तरफ कुछ जानकारों की राय में समस्या को दूर करने के लिए उसकी जड़ में पहुंचकर कानून के समानांतर गरीबी, विस्थापन, पलायन और विघटन से निपटने के प्रयास किए जाने की जरुरत है. साथ की जो प्रावधान लागू हैं उन्हें क्रियान्वित करने वाली एजेंसियों के सक्रिय और धनराशि के सही इस्तेमाल करने की जरुरत है और इसी के साथ बच्चों के यौन-उत्पीड़न सहित सभी तरह के उत्पीड़नों को ठीक से परिभाषित किए जाने की भी जरुरत है. दूसरी तरफ राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो में बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े केवल ऐसे मामले शामिल रहते हैं, जिनकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज मिलती है. मगर असलियत जगजाहिर है कि ज्यादातर मामले तो पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं. हालांकि सरकार की तरफ से ‘बाल अपराध निरोधक बिल’ संसद में लाने की बात की जाती रही है. बच्चों की सुरक्षा पर कुल बजट में से 0.03% की बढ़ोत्तरी और महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा एकीकृत बाल सुरक्षा योजना शुरू करने जैसी घोषणाएं की भी की जाती रही हैं. इन सबके बावजूद इस तरह की नीतियां बनाने और इन नीतियों पर विमर्श का दौर तो खूब चलता है. नहीं चलता है तो उन्हें गर्मजोशी से लागू किए जाने की कोशिशों का दौर.

गन्दा है पर धंधा है ये !

Posted: 10 Nov 2010 04:35 AM PST

दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में किसी भी राजनेता के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है उसकी सार्वजनिक छवि.लेकिन जब समाज का ही नैतिक पतन हो जाए तो इसका महत्त्व अपने आप ही समाप्त हो जाता है.कहते हैं कि राजनीति काजल की कोठरी होती है और जो भी इसमें आता है उसका दागी हो जाना स्वाभाविक है.लेकिन यह भी सच है कि जहाँ आग होती है धुआं भी वहीँ होता है.आज के दौर में भी कई ऐसे राजनेता मौजूद हैं जिनका दामन पाक साफ़ है.कोई भी तंत्र तकनीक के समान निर्दोष होता है.यह उसे संचालित करनेवाले पर निर्भर करता है कि उसकी सोंच क्या है,उसकी मनोवृत्ति क्या है?आज का सच यह है कि राजनीति अब जनसेवा का माध्यम नहीं रह गई है बल्कि इसने धंधे का स्वरुप अख्तियार कर लिया है.और धंधा है तो गन्दा भी हो सकता है.क्योंकि धंधे का तो कोई उसूल होता ही नहीं.वह तो सिर्फ लाभ के लिए किया जाता है.कहते हैं कि सत्ता व्यक्ति को भ्रष्ट कर देती है.चूंकि कांग्रेस ने देश पर सबसे ज्यादा समय तक शासन किया है इसलिए यह स्वाभाविक है कि भ्रष्टाचार के सबसे ज्यादा आरोप समय-समय पर इसी पार्टी के नेताओं पर लगे हैं.आदर्श सोसाईटी घोटाले में बुरी तरह फंस चुके अशोक चौहान से कांग्रेस ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिलवा दिया है.लेकिन क्या इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लग जाएगी?क्या भ्रष्टाचार के आरोपी नेता को केवल पद से हटा देना ही पर्याप्त है?नहीं कदापि नहीं!यह जहर अब वट वृक्ष रूपी भारतवर्ष के नस-नस में फ़ैल चुका है और सिर्फ फुनगी काट देने से इसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला.आदर्श घोटाले में तो सेना भी फंसी हुई है.अभी कुछ ही दिनों पहले हुई वर्धा रैली के समय कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर भी मुख्यमंत्री अशोक चौहान से २ करोड़ रूपये बस के भाड़े के लिए देने के लिए कहने का आरोप स्वयं प्रदेश अध्यक्ष मानिक राव ठाकरे की गलती से सामने आया था और अब बात आई-गई भी हो गई है.यानी भ्रष्टाचार की गन्दगी राजनीति की गंगा में स्वयं शीर्ष नेतृत्व यानी गंगोत्री से ही आ रही है.जब किंग मेकर ही भ्रष्ट होगा तो किंग तो भ्रष्ट होगा ही.पार्टी फंड भी देश में भ्रष्टाचार का माध्यम बन गया है.इसलिए इन इक्के-दुक्के लोगों पर कार्रवाई करने से भ्रष्टाचार न तो कम होने जा रहा है और न ही मिटने जा रहा है.महाराष्ट्र का क्षत्रप चाहे कोई भी हो उसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पेशवा (केंद्रीय नेतृत्व)को सरदेशमुखी तो देना ही होगा.हमारे राजनीतिज्ञों के नैतिक स्तर में लगातार गिरावट आ रही है.अब तो घपले-घोटालों से सीधा सम्बन्ध होने का सबूत होने के बावजूद भी मंत्री-मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री इस्तीफा नहीं देता.राष्ट्रमंडल खेलों में करोड़ों की हेराफेरी का आरोपी होने पर भी कलमाड़ी अंग्रेजी हैट पहने माथा गर्वोन्नत किए घूम रहे हैं.हालांकी कांग्रेस ने उन्हें अपनी कार्यसमिति से हटाकर खुद को पाकसाफ सिद्ध करने का प्रयास किया है.लेकिन क्या इतनी कार्रवाई ही काफी है?क्या उन पर निष्पक्षता से मुकदमा चलाकर उन्हें इसके लिए दण्डित नहीं किया जाना चाहिए?लेकिन यक़ीनन ऐसा नहीं होने जा रहा है.पिछले ५०-६० सालों में सत्ता में रहते हुए कांग्रेस इस तरह के न जाने कितने ही मामलों की लीपा-पोती कर चुकी है.अभी भी भ्रष्टाचार का राजा ए.राजा केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा है और कांग्रेस देशहित पर सत्ता को वरीयता देने के कारण उसे हटा भी नहीं सकता,जेल भेजना तो दूर की कौड़ी है.ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ कांग्रेस में ही गलत लोग हैं.ऐसे लोग सभी पार्टियों में हैं.हमारी विधायिका में एक तिहाई से भी ज्यादा जनप्रतिनिधि दागी हैं.स्थिति संतोषजनक भले ही नहीं हो,सुधार की गुंजाईश समाप्त नहीं हुई है.सबसे पहले तो सभी पार्टियों को निजी स्वार्थों से ऊपर उठना पड़ेगा और सत्ता पर देशहित को प्राथमिकता देनी होगी.लोकतंत्र में नैतिकता का महत्व अन्य शासन प्रणालियों से कहीं ज्यादा होता है.बिहार विधानसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने लगभग ४७ % दागियों को टिकट दिया है.किसी-किसी सीट पर तो सारे उम्मीदवार ही दागी हैं.जनता किसको वोट दे और क्यों वोट दे?इसलिए जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव करते हुए जनता को उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए.साथ ही अगर नकारात्मक वोट सबसे ज्यादा हो जाएँ तो नए उम्मीदवारों के साथ दोबारा मतदान होना चाहिए.तीसरा सुधार हमारी न्यायिक व्यवस्था में होना चाहिए और इस तरह की व्यवस्था की जानी चाहिए कि कानून के जाल में आने से छोटी ही नहीं बड़ी मछलियाँ भी नहीं बच पाए.

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