>ब्लोगीय आभासी खिडकी का उठाना गिराना।

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आभासी खिडकी
बचपन में एक चुटकला सुना था, लोग रेल यात्रा कर रहे थे। एक व्यक्ति खडा हुआ और खिडकी खोलदी, थोडी ही देर में दूसरा उठा और उसने खिडकी बंद कर दी। पहले को यह बंद करना नागवार गुजरा और उठ कर पुनः खोलदी। एक बंद करता दूसरा खोल देता। नाटक शुरु हो गया। यात्रियों का मनोरंजन हो रहा था लेकिन अंततः सभी तंग आ गये। टी टी को बुलाया गया, टी टी ने पुछा, महाशय ! यह क्या कर रहे हो? क्यों बार बार खोल-बंद कर रहे हो? पहला यात्री बोला क्यों न खोलूं मैं गर्मी से परेशान हूं खिडकी खुली ही रहनी चाहिए। टी टी ने दूसरे यात्री को कहा भाई आपको क्या आपत्ति है, अगर खिडकी खुली रहे। उस दूसरे यात्री ने कहा मुझे ठंड लग रही है, मुझे ठंड सहन नहिं होती। टी टी बिचारा परेशान, एक को गर्मी लग रही है तो दूसरे को ठंड। टी टी यह सोचकर खिडकी के पास गया कि कोई मध्यमार्ग निकल आए,उसने देखा और मुस्करा दिया। खिडकी में शीशा ही नहिं था। मात्र फ़्रेम थी। वह बोला कैसी गर्मी या कैसी ठंडी? यहां तो शीशा ही गायब है, आप दोनो तो मात्र फ़्रेम को ही उपर नीचे कर रहे हो। दोनों यात्री न तो गर्मी और न ही ठंडी से परेशान नहिं थे। बल्कि वे परेशान थे तो मात्र अपने अहंकार से।
अधिकांश कलह इसलिये होते है कि अहंकार को चोट पहुँचती है। आदमी को सबसे ज्यादा आनंद दूसरे के अहंकार को चोट पहुँचाने में आता है और सबसे ज्यादा क्रोध अपने अहंकार पर चोट लगने से होता है। 
एक दूसरे के ब्लोग, लेख आदि को अच्छा बुरा बताकर, इस  आभासी खिडकी को उठाने गिराने का कार्य तो नहिं कर रहे?…
आपका क्या मत है?

6 Comments

  1. November 17, 2010 at 2:22 pm

    >अभी अभी तो कहीं पढ़ा इसे ….

  2. November 17, 2010 at 2:38 pm

    >सुन्‍दर विवरण

  3. November 18, 2010 at 8:09 am

    >जी, बिल्कुल नही हम ऐसा कोई कार्य नही करते बस सिर्फ़ टिप्पणी करते हैं जैसे यहाँ कर रहे हैं अब आप ही निर्णय लीजिये ये अच्छा है या बुरा।

  4. November 18, 2010 at 9:30 am

    >आपकी टिप्पणी तो वह उज्जवल प्रकाश है, शीशा लगी खिडकी से भी आ गुजरती है। उठाने गिराने का प्रश्न ही नहिं उठता।

  5. November 18, 2010 at 1:18 pm

    >हम तो केवल अच्छे को ही अच्छा बताते हैं बुरे को कुछ कहना ही क्यों ? पर ! उस पर बहस कर सकते हैं | बुरे को बुरा कहना मतलब ! अपने लिए भी उससे कुछ कहलवाना | इसलिए तौबा-तौबा |

  6. November 18, 2010 at 3:27 pm

    >Bahut hi manbhavan post.main to khidki khol kar hi rakhta hun.Dhanyavad.Main aapko apne blog par amantrit karata hun.


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