>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


जागिए मनमोहन जी !

Posted: 22 Nov 2010 08:41 AM PST

1990का स्वतंत्रता दिवस समारोह मुझे आज भी याद है.तब मैं हाई स्कूल में था और वैश्विक अर्थव्यवस्था को समझने लगा था.लाल किले के प्राचीर से भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह देश को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि वे जानते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था संकट में है और विदेशी मुद्रा भंडार समाप्त होने को है.लेकिन जिस तरह मधुमेह के रोगी को चीनी देने से बीमारी और बढ़ जाती है उसी तरह उनकी समझ से विदेशों से कर्ज लेने से अर्थव्यवस्था का संकट और बढ़ जाएगा.दरअसल उन दिनों भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार सोवियत संघ में उथल-पुथल का वातावरण तो था ही २ अगस्त,१९९० से २८ फरवरी,१९९१ तक चले खाड़ी युद्ध ने खनिज तेल के मूल्य में बेतहाशा वृद्धि कर दी थी.वी.पी. की जिद का परिणाम यह हुआ कि बाद में जब कुछ ही महीनों बाद चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो उन्हें देश का सोना विदेशों में गिरवी रखकर पैसों का इंतजाम करना पड़ा.लेकिन यह कोई स्थाई समाधान तो था नहीं.इसके कुछ ही महीने बाद जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने और वित्त मंत्री बने मनमोहन सिंह तो उन्होंने जब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से सहायता मांगी तो उसने इनकार तो नहीं किया लेकिन उनके समक्ष एक शर्त रख दी.वह शर्त यह थी कि भारत को उदारवाद को अपनाना होगा.हालांकि किसी भी देश में बिना पूर्व तैयारी के उदारवाद को अपनाना अच्छा नहीं माना जाता.इसके लिए नए तरह के प्रशासन जो पारदर्शिता सहित और भ्रष्टाचार रहित हो की आवश्यकता होती है.साथ ही जरुरी होती है मजबूत आधारभूत संरचना.जाहिर है कि उस समय की आपातकालीन स्थितियों में ऐसा कर पाने के लिए भारत के पास समय नहीं था.जबकि चीन ने पूरी तैयारी के साथ उदार अर्थव्यवस्था को अपनाया और दूसरे देशों को अपनी शर्तों पर ही पूँजी निवेश की ईजाजत दी थी.इसलिए भारत की तत्कालीन केंद्र सरकार ने आई.एम.एफ. की मांगें मान लीं और भारतीय अर्थव्यवस्था ने बंद और सरकार नियंत्रित अर्थव्यवस्था से उदार और मुक्त अर्थव्यवस्था में आँख मूंदकर हनुमान कूद लगा दी.उस समय सोंचा गया कि जो भी बदलाव जरुरी हैं बाद में कर लिए जाएँगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं.अचानक देश में इतना पैसा आने लगा कि राजनेता घूस खाने और विदेशी मुद्रा भंडार गिनने में खो गए.इस प्रकार सारे सुधार पीछे छूट गए.विदेशी और देशी कंपनियां जानती थीं कि भारत के राजनेता और नौकरशाह पैसों के कितने भूखे हैं.इसलिए उन्होंने निवेश के लिए निर्धारित रकम में रिश्वत को भी शामिल करना शुरू कर दिया.कई साल पहले एनरोन नामक अमेरिकी ऊर्जा कंपनी ने दावा किया था कि उसने भारत में अपनी इकाई स्थापित करने के लिए नीति निर्माताओं और संचालकों को करोड़ों रूपये दिए थे.सातवें-आठवें दशक में जहाँ नेताओं का गठजोड़ अपराधियों से हुआ करता था अब उसका स्थान एक नए गठजोड़ नेता-कंपनी गठजोड़ ने ले लिया.यह जोड़ी ज्यादा चालाक,आधुनिक,रणनीतिक,बेफिक्र और सुरक्षित थी.इसी गठजोड़ के दम पर हर्षद मेहता से लेकर २जी स्पेक्ट्रम तक अनगिनत घोटाले किए गए.जिनमें से न जाने कितनों के बारे में तो जनता को आज भी पता नहीं है और कभी पता चलेगा भी नहीं.लगता है जैसे अर्थव्यस्था के उदारीकरण के साथ ही भ्रष्टाचार का भी उदारीकरण कर दिया गया है.हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि देश में आज भी अंग्रेजो के ज़माने का प्रशासन है.सत्ता में आने से पहले वर्तमान यू.पी.ए. की सरकार ने भी प्रशासनिक सुधार का वादा किया था.लेकिन उसके सत्ता में आए हुए ७ साल होने को हैं और इस दिशा में प्रगति शून्य है.२००५ में लागू किए गए सूचना के अधिकार से कोई खास फायदा होता नजर नहीं आ रहा.सरकार ने प्रशासनिक सुधार पर विचार करने के लिए पहले कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक समिति बनाई और फ़िर वीरप्पा मोइली के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया.मोइली आयोग के मसौदे को अगर लागू कर दिया जाए तो निश्चित रूप से सरकारी कामकाज का ढर्रा बदल जाएगा और भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लग जाएगा.आयोग ने नौकरशाहों को सौंपे गए कार्यों के लिए जवाबदेह बनाने की बात कही है,लेकिन सरकार ने अब तक इसे ठन्डे बस्ते में डाल रखा है.नई आर्थिक नीतियों को लागू किए जाने के इतने वर्षों के बाद भी हम अभी तक अपने कामकाज के तौर-तरीके में बदलाव नहीं ला पाए हैं.देश की आजादी के कुछ ही वर्षों में परमिट-लाइसेंस-कोटा राज की जो लौह पकड़ देश की अर्थव्यवस्था पर हावी हो गई आज भी बनी हुई है.देश और अर्थव्यवस्था की आवश्यकतानुसार निर्णय कभी नहीं लिए जाते हैं.महीनों और कभी-कभी कई सालों तक हमारे अफसरशाह मामले को टालते रहते हैं.दरअसल वे अपने अधिकारों का प्रयोग ही अडंगा डालने के लिए करते हैं.उदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू करने के बावजूद हम अपने प्रशासन तंत्र को उदार नहीं बना पाए हैं.इसलिए उदारवादी नीतियों का देश को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है.उदारवाद का जो भी फायदा हुआ है दुर्भाग्यवश क्रीमी लेयर यानी केवल ऊपर के २ से ३ करोड़ लोगों को हुआ है.प्रधानमंत्री लगभग रोज ही कहते हैं कि विकास की रफ़्तार तेज है लेकिन यह वास्तविक वृद्धि नहीं कही जा सकती.प्रतिव्यक्ति आय में जो बढ़ोत्तरी हो रही है वह इसी क्रीमी लेयर की आय में बढ़ोत्तरी है.ऐसा लगता है कि सरकार प्रशासनिक सुधार करना चाहती ही नहीं है.प्रधानमंत्री नौकरशाही की कछुआ चाल पर चिंता तो व्यक्त करते हैं पर उसके सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाते.जबकि वैश्वीकरण के इस युग में प्रशासनिक सुधार में देरी देश के लिए बहुत घातक होगी.आज आवश्यकता इस बात की है कि मोइली आयोग की सिफारिशें शीघ्रातिशीघ्र लागू की जाएँ.सारी बिमारियों का ईलाज है इसमें.मोइली आयोग चाहता है कि हर विभाग के कामों का लक्ष्य और उसकी सीमा तय हो और इस प्रक्रिया में हर नौकरशाह से जो अपेक्षाएं हों वे सम्बंधित विभाग के मंत्री के साथ लिखित समझौते के रूप में दर्ज की जाए.इतना ही नहीं यह समझौता सार्वजनिक जानकारी में हो जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके.साथ ही किसी कार्य योजना के मामले में लाभार्थियों की प्रतिक्रियाएं इकट्ठी की जाए ताकि यह आकलन किया जा सके कि लक्ष्य की प्राप्ति वास्तव में हुई है अथवा कागजी या आधी अधूरी रही है.लेकिन सिर्फ कार्यपालिका में सुधार ही काफी नहीं होगा बल्कि न्यायपालिका में भी ठीक इसी तरह की जिम्मेदारी लानी पड़ेगी और इसमें भी ऐसे इंतजाम करने होंगे जिससे मुकदमों का निर्णय सालों के बजाए महीनों में हो सके.साथ ही जानबूझकर गलत निर्णय देने और भ्रष्टाचार में शामिल अधीनस्थ न्यायालयों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक के न्यायाधीशों को दण्डित किये जाने और जरुरत हो तो बाहर का दरवाजा दिखाने की व्यवस्था करनी होगी.इस सम्बन्ध में भी केंद्र सरकार के पास एक संशोधन प्रस्ताव लंबित है और भगवान जाने कब लागू की जाएगी? इसके साथ ही केंद्र को भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टोलरेंस की नीति अपनानी होगी और इसे रोकने के लिए बने निगरानी तंत्र को चुस्त-दुरुस्त करना होगा.यह सही है कि देश आज ८० के दशक के ४-५ % के बजाए ८-९ % की दर से विकास कर रहा है.लेकिन इसी दौर में कृषि क्षेत्र को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है.यही वह दौर है जब हरित क्रांति से भारत के ग्रामीण समाज में आई खुशहाली पर ग्रहण लग गया और प्रति घन्टे के हिसाब से किसान आत्महत्या करने लगे.इस दौर में आई सभी सरकारों ने कृषि,पशुपालन और ग्रामीण उद्योग-धंधों के प्रति उदासीनता दिखाई.नतीजतन आजादी के बाद पहली बार इन क्षेत्रों में नकारात्मक परिवर्तन दर्ज किया गया.इन्हीं नीतियों के चलते कृषि क्षेत्र से श्रम और पूँजी दोनों का पलायन बहुत तेजी से हुआ.आज तमिलनाडु से लेकर जम्मू-कश्मीर तक के किसानों में मातमपुर्सी छाई हुई है.उदारीकरण के कारण सिर्फ सूचना प्रौद्योगिकी जैसे सीमित रोजगार वाले कुछ क्षेत्रों में रोजगार के रोजगार बढे हैं.इसके साथ ही सेवा क्षेत्र का दायरा बढ़ा है जिसमें रोजगार की संभावनाएं नगण्य होती हैं.उद्योग क्षेत्र में कपड़ा,दवा,इमारती सामान जैसे धंधे पिटे हैं तो कंप्यूटर और इलेक्ट्रोनिक उपकरणों का कारोबार बढ़ा है.वास्तव में वर्तमान काल में देश का जो भी विकास हो रहा है वह रोजगारविहीन विकास है.सरकार को ऊपर बताए गए सुधारों के अलावे इस ओर भी समय रहते ध्यान देना पड़ेगा.अब यह कहने से काम नहीं चलने वाला कि मैं देर करता नहीं देर हो जाती है.यह सही है कि हम वैश्वीकरण अथवा उदारीकरण की प्रक्रिया से अलग नहीं हो सकते लेकिन हमें अपने देश की परिस्थितियों को समझकर अपनी शर्तों के मुताबिक नीतियों को लागू करना पड़ेगा ताकि उसके फायदे का व्यापक विस्तार आम जनता की जिंदगी में भी नजर आये.हाथ पर हाथ रखकर सोंच-विचार का समय समाप्त हो चुका है.सुधार के लिए पहले ही काफी देर हो चुकी है.यह समय अब शीघ्र प्रभावी कदम उठाने का समय है.जागिए मनमोहन जी.

“गरीब” मदरसा शिक्षकों को 2 रुपये किलो चावल – सेकुलर वामपंथ

Posted: 22 Nov 2010 12:46 AM PST

जैसा कि सभी जानते हैं वामपंथी भले ही सिद्धान्तों की कितनी भी दुहाई दे लें, कितनी ही शाब्दिक लफ़्फ़ाजियाँ हाँक लें परन्तु उनका “असली रंग” गाहे-बगाहे सामने आता ही रहता है, और वह असली रंग है वोटों की खातिर मुस्लिमों के सामने आये दिन नतमस्तक होने का…। वैसे तो देश के सौभाग्य से अब यह कौम सिर्फ़ दो ही राज्यों (केरल और पश्चिम बंगाल) में ही जीवित है, तथा अपने कैडर की गुण्डागर्दी और कांग्रेस द्वारा मुस्लिम वोटों के शिकार के बाद जो जूठन बच जाती है उस पर ये अपना गुज़र-बसर करते हैं। पश्चिम बंगाल और केरल के आगामी चुनावों को देखते हुए इन दोनों “सेकुलर चैम्पियनों” के बीच मुस्लिम वोटों को लेकर घमासान और भी तीखा होगा। पश्चिम बंगाल में देगंगा के दंगों में (यहाँ देखें…) हम यह देख चुके हैं… हाल ही में केरल से दो खबरें आई हैं जिसमें वामपंथियों का “सेकुलर नकाब” पूरी तरह फ़टा हुआ दिखता है…

1) मुस्लिम बच्चों को मुफ़्त कोचिंग क्लास सुविधा, स्कॉलरशिप एवं मुफ़्त होस्टल की सुविधा, मौलवियों को पेंशन तथा पाकिस्तान को पाँच करोड़ का दान देने जैसे “सत्कर्म” करने के बाद केरल की वामपंथी सरकार ने हाल ही में एक सर्कुलर जारी करके सभी राशन दुकानों को आदेश दिया है कि राज्य के सभी गरीब मदरसा शिक्षकों को दो रुपये किलो चावल दिया जाये। जैसा कि सभी जानते हैं केरल के कई इलाके लगभग 70% मुस्लिम जनसंख्या वाले हो चुके हैं और कई सीटों पर स्वाभाविक रुप से “जेहादी” निर्णायक भूमिका में हैं, हाल ही में ईसाई प्रोफ़ेसर का हाथ काटने वाली गैंग में शामिल एक अपराधी, जेल से पंचायत चुनाव जीत चुका है तथा कई नगर निगमों अथवा जिला पंचायतों में मुस्लिम लीग व PFI (पापुलर फ़्रण्ट ऑफ़ इंडिया) के उम्मीदवार निर्णायक स्थिति में आ गये हैं… तो अब हमें मान लेना चाहिये कि वामपंथियों ने प्रोफ़ेसर का हाथ काटने के “उपलक्ष्य” (यहाँ देखें…) में इनाम के बतौर मदरसा शिक्षकों को दो रुपये किलो चावल का तोहफ़ा दिया होगा।

उल्लेखनीय है कि केरल में “देवस्वम बोर्ड” के गठन में नास्तिक(?) वामपंथियों की घुसपैठ की वजह से मन्दिरों के पुजारियों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब चल रही है, जहाँ एक तरफ़ पुजारियों को यजमानों से दक्षिणा लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है, वहीं दूसरी तरफ़ पुजारियों की तनख्वाह मन्दिर के सफ़ाईकर्मियों के बराबर कर दी गई है।

2) दूसरी खबर वामपंथियों की “सेकुलर बेशर्मी” के बारे में है – पिछले कई साल से केरल के वामपंथी राज्य में “इस्लामिक बैंक” स्थापित करने के लिये जी-जान से जुटे हुए हैं, वह तो भला हो डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी का जिनकी याचिकाओं के कारण केरल हाईकोर्ट ने इस्लामिक बैंक पर रोक लगा दी है (यहाँ देखें…), वहीं दूसरी तरफ़ हाल ही में रिज़र्व बैंक ने एक आदेश जारी करके यह कहा कि केरल में किसी भी प्रकार के इस्लामिक बैंक को अनुमति प्रदान करने का सवाल ही नहीं पैदा होता, क्योंकि इस्लामिक बैंक की अवधारणा ही असंवैधानिक है।

इतनी लताड़ खाने के बावजूद, केरल राज्य औद्योगिक विकास निगम द्वारा प्रवर्तित अल-बराका इंटरनेशनल फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ ने बेशर्मी से दावा किया उसे “इस्लामिक बैंक” बनाने की मंजूरी मिल गई है। “अल-बराका” द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि प्रस्तावित बैंक पूर्णतः “शरीयत कानून” पर आधारित होगा। खाड़ी देशों में कार्यरत “कुछ खास गुट” ऐसी इस्लामिक बैंक बनवाने के लिये पूरा जोर लगा रहे हैं ताकि जो पैसा उन्हें हवाला अथवा अन्य गैरकानूनी रास्तों से भेजना पड़ता है, उसे एक “वैधानिकता” हासिल हो जाये। इसी में अपना सुर मिलाते हुए केरल सरकार ने कहा कि “इस्लामिक बैंक” पूरी तरह से सेकुलर है…। वामपंथ के लिये यह एक स्वाभाविक सी बात है कि जहाँ “इस्लामिक” शब्द आयेगा वह तो सेकुलर होगा ही और जहाँ “हिन्दू” शब्द आयेगा वह साम्प्रदायिक… जैसे कि मुस्लिम लीग सेकुलर है, विश्व हिन्दू परिषद साम्प्रदायिक… मजलिस-इत्तेहाद-ए-मुसलमीन सेकुलर है लेकिन शिवसेना साम्प्रदायिक… इत्यादि।

(चित्र में – वरिष्ठ वामपंथी नेता विजयन, कोयंबटूर बम विस्फ़ोट के आरोपी अब्दुल नासेर मदनी के साथ मंच शेयर करते हुए)

पहले भी एक बार वामपंथियों के पूज्य बुज़ुर्ग नम्बूदिरीपाद ने अब्दुल नासेर मदनी की तुलना महात्मा गाँधी से कर डाली थी, जो बाद में कड़े विरोध के कारण पलटी मार गये। तात्पर्य यह कि वामपंथियों के नारे “धर्म एक अफ़ीम है” का मतलब सिर्फ़ “हिन्दू धर्म” से होता है (यहाँ देखें…), मुस्लिम वोटों को खुश करने के लिये ये लोग “किसी भी हद तक” जा सकते हैं। शुक्र है कि ये सिर्फ़ दो ही राज्यों में बचे हैं, असली दिक्कत तो कांग्रेस है जिससे इन्होंने यह शर्मनिरपेक्ष सबक सीखा है।

चलते-चलते एक अन्य खबर महाराष्ट्र से – जवाहरलाल नेहरु अन्तर्राष्ट्रीय बन्दरगाह (ज़ाहिर है कि अन्तर्राष्ट्रीय है तो इसका नाम नेहरु या गाँधी पर ही होगा…) पर कुवैत के एक जहाज को सुरक्षा एजेंसियों ने जाँच के लिये रोका है। तफ़्तीश से यह साबित हुआ है कि जहाज के कर्मचारी बन्दरगाह पर इस्लाम के प्रचार सम्बन्धी पुस्तकें बाँट रहे थे। 12 पेज वाली इस पुस्तक का मुखपृष्ट “निमंत्रण पत्र” जैसा है जहाँ लिखा है “उन्हें एक बेहतर धर्म “इस्लाम” की तरफ़ बुलाओ, जो हिन्दू धर्म अपनाये हुए हैं…”। CGM एवरेस्ट नामक जहाज के कैप्टन हैं सैयद हैदर, जो कि कराची का निवासी है। 12 पेज की यह बुकलेट कुवैत के इस्लामिक दावा एण्ड गाइडेंस सेण्टर द्वारा प्रकाशित की गई है, तथा जहाज के सभी 33 कर्मचारियों के पास मुफ़्त में बाँटने के लिये बहुतायत में उपलब्ध पाई गई।

हालांकि पहले सुरक्षा एजेंसियों की निगाह से यह छूट गया था, लेकिन बन्दरगाह के ही एक भारतीय कर्मचारी द्वारा पुलिस को यह पुस्तिका दिखाने से उनका माथा ठनका और जहाज को वापस बुलाकर उसे विस्तृत जाँच के लिये रोका गया। जहाज महाराष्ट्र के कोंकण इलाके की तरफ़ बढ़ रहा था, यह वही इलाका है जहाँ दाऊद इब्राहीम का पैतृक गाँव भी है एवं मुम्बई में ट्रेन विस्फ़ोट के लिये इन्हीं सुनसान समुद्र तटों पर RDX उतारा गया था। जहाज के कैप्टन की सफ़ाई है कि वे भारतीय तट पर नहीं उतरे थे, बल्कि जो लोग जहाज में बाहर से (यानी भारत की ज़मीन से) आये थे उन्हें बाँट रहे थे। अधिकारियों ने जाँच में पाया कि अन्तर्राष्ट्रीय जल सीमा में “धार्मिक प्रचार” का यह पहला मामला पकड़ में आया है, तथा यह बुकलेट मजदूरों और कुलियों को निशाना बनाकर बाँटी जा रही थी तथा पूरी तरह हिन्दी में लिखी हुई हैं…

तात्पर्य यह कि हिन्दुओं पर “वैचारिक हमले” चौतरफ़ा हो रहे हैं, और हमलावरों का साथ देने के लिये कांग्रेस-वामपंथ जैसे जयचन्द भी इफ़रात में मौजूद हैं…

मीडिया द्वारा अपनी “सेकुलर इमेज” बनाये रखने के तरह ऐसी खबरों को जानबूझकर दबा दिया जाता है ताकि “कुम्भकर्णी हिन्दू” कभी असलियत न जान सकें, रही बात कई राज्यों में सत्ता की मलाई चख रहे भाजपाईयों की, तो उनमें से किसी में भी डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसी लगन और हिम्मत तो है ही नहीं… (उल्लेखनीय है कि डॉ स्वामी ने अकेले दम पर याचिकाएं और आपत्तियाँ लगा-लगा कर इस्लामिक बैंक की स्थापना में अड़ंगे लगाये, रामसेतु टूटने से बचाया, इटली की रानी के नाक में दम तो कब से किये ही हैं, अब राजा बाबू के बहाने “ईमानदार बाबू” पर भी निशाना साधा हुआ है…), शायद “थकेले” केन्द्रीय भाजपा नेताओं को डॉ स्वामी से कोई प्रेरणा मिले…

Source : http://www.financialexpress.com/news/ship-docked-in-mumbai-invites-hindus-to-convert-to-islam/710021/

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