>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


नये लिक्खाड़ बंधुओं का आगमन

Posted: 27 Nov 2010 08:55 AM PST

जब से ब्लोगवाणी गया चिट्ठाजगत में सनसनी का माहौल ख़त्म हो गया है | चारों तरफ चिर शांति का माहौल है हिंदी ब्लॉग संकलक ” चिट्ठाजगत ” के मेल प्राप्त कर्ताओं के अतिरिक्त हिंदी के पाठकों को नये-नये हिंदी चिट्ठों की जानकारी ना के बराबर मिल पाती है | चलिए आज जानते हैं कि ब्लॉगजगत में क्या हलचल चल रही है | कौन-कौन से नये लिक्खाड़ बंधुओं का आगमन हुआ है ?
1. MY~LIFE~SCAN (http://mylifescan.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: डॉ. नूतन – नीति

2. RAJIV DWIWEDI (http://dwiwedi.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: BHARAT

3. manubhartia (http://manubhartia.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: manu

4. Amit Pathe Pawar (http://amitpathe.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Amit Pathe

5. jharkhand ki aitihasik kahaniyan (http://jharkhanditihas.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: dilip kumar tetarbe

6. Bollywood News Gossip (http://bollywoodnewsgossip.wordpress.com)
चिट्ठाकार: bollywoodnewsgosip

7. आपके ब्लॉग का शीर्षक (http://oshoamritvachan11.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: chetna

8. ANILCHANDRA THAKUR (http://acthakur.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: APOORVA

9. जिन्दगी के रंग (http://jindagikerang.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: सुशील बाकलीवाल

10. उभरता ‘साहिल’ (http://saahilspoetry.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: ‘साहिल’

11. KAVYA SANGAM (http://kavyasangam.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Kavya Sangam

12. The Heritage (http://pryag-ek-khoj.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Pryag Anveshan

13. news7 xpress (http://news7xpress.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: HINDI MUNCH

14. Thakur Islam (http://thakurislam.blogspot.com/) समाज
चिट्ठाकार: Thakur M.Islam Vinay

15. पूर्वाभास (http://poorvabhas.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: अवनीश सिंह चौहान

16. Bajrang Dal (http://bajrangdalsahibabad.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: bajrang dal

17. aayam (http://salil-aayam.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: aayam

18. प्रकाशित ब्लॉग पर (http://oshoamritvachan12.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: John

अन्य पढने योग्य चिकित्सा से सम्बंधित ब्लाग हैं–

बिहार का जनादेश

Posted: 27 Nov 2010 08:26 AM PST

बिहार का जनादेश क्या कहता है। सबके जेहन में यही बात है। क्या बिहारी अवाम ने जातिवाद को नकारकर सिर्फ और सिर्फ विकास के नाम पर वोट दिया है। या बिहार की जनता के पास एनडीए गठबंधन के अलावा कोई विकल्प नही था। या फिर लोगों को नीतीश में वह क्षमता दिखाई दी जो बिहार में विकास की नई कहानी लिखने का माददा रखता है। इस चुनाव में जो प्रचण्ड जनादेश एनडीए गठबंधन के पक्ष में आया उसने यह साफ कर दिया की भारतीय मतदाता के लिए विकास अब सबसे बड़ा मुददा है। यही कारण है कि लालू पासवान की जोड़ी को जनता ने आइना दिखा दिया। इस चुनाव ने एक बार फिर परिवारवाद को भी तमाचा मारा है। इसका जीता जागता उदाहरण राबड़ी देवी का दोनों विधानसभाओं राघोपुर और सोनपुर ने बुरी तरह आ गई। यह दोनों इलाके यादव बहुल और लालू के गड़ माने जाते हैं। मगर वोट को अपनी जागीर समझने वाले नेताओं को कौन समझाये कि जनता को ज्यादा दिन तक अंधेरे में नही रखा जा सकता। यह दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण है। इससे पहले मुलायम सिंह की बहू को फिरोजाबाद से जनता नकार चुकी है। यह इलाका भी मुलायम सिंह का गड़ माना जाता है। सवाल यह कि क्या यह उन नेताओं के लिए सन्देश है जो परिवारवाद को बड़ावा दे रहे है। सबसे बुरी दशा कांग्रेस की हुई है। वह कांग्रेस जो केन्द्र में है जिसके पास सोनिया और राहुल है। दरअसल कांग्रेसी हमेशा इस गलत फहमी में रहते है की यह दोनों नेता उनकी जीत को हार में बदल देंगे। नतीजा यह रहा कि राहुल गांधी ने जिन 17 जगहों पर बिहार में प्रचार किया वहां एक दो जगह छोड़कर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। आजादी के इन 6 दशकों में बिहार में कांग्रेस राजद और एनडीए गठबंधन ने राज किया। इनमें लालू राज में बिहार की हालत बद से बदतर हो गई। कानून व्यवस्था को लेकर बिहार सुर्खियों में रहने लगा। नीतीश ने इसी नब्ज को दबाया और 50 हजार से ज्यादा अपराधियों को जेल में डाल दिया। नतीजा लोग अब देर सबेर कहीं भी आ जा सकते है। दूसरा काम सड़कों के निर्माण का। तीसरा दलितों और अकलियतों में अति दलितों का पहचान कर उनके विकास के लिए कार्यक्रम चलाना। महिलाओं को पंचायत और शहरी निकाय में 50 फीसदी आरक्षण प्रदान करना। आज बिहार में लोग प्राथमिक चिकित्सालय में इलाज के लिए आ रहे हैं। लोगों में विकास की एक नयी ललक जगी है। जरूरत है इस ललक को बनाये रखना। नीतीश कुमार 2015 में बिहार को विकसीत राज्या बनाने की बात कर रहें है। मगर इसके लिए उन्हें निवेश के लिए उद्योगपतियों को बिहार में बुलाना पड़ेगा। अपने वादे के मुताबिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बेहतर बनाना होगा। पलायन रोकने के लिए कुछ बड़े कदम उठाने होंगे।

युवाओं से आह्वान

Posted: 27 Nov 2010 08:19 AM PST

हम युवाओं से आह्वान करते हैं की वे हमारी पार्टी में शामिल होंअंग्रेजों के ज़माने की पार्टी है, केवलअंग्रेजों के ज़माने की पार्टी है; अपितु अंग्रेजों के नक़्शेकदम पर ही चलने वाली भी एक ही पार्टी है

हमें ऐसे युवाओं की जरुरत है जो पढ़ेलिखे हों पर अक्ल(मंद) हो उन्हें जीहजूरी, चमचागिरी, पार्टी के नेताओं की जयजयकार करने में गर्व का अनुभव होजो नरमादा में अंतर समझें, लिव इन …. के समर्थक होंजो बिना रीढ़ वाले हों, जो हमेशा हमारी (खानदानी) जय बोल सकें, जिनमे भारतभारतीयता के प्रति कोई भाव हों,
जो कोई काम नहीं करना चाहते, जो बिना मेहनत के खाना चाहते हैं, जो तिकड़म लगा सकते हैं, जो आम जनता को मूर्ख बना सकते हैं, जो लड़नेमरने में भी कम हों, बदमाश और दबंग प्रकार के युवा हमें अपनी पार्टी के लिए चाहिए

कमाई ! कमाई की चिंता करें इस मामले में हमारी पार्टी का इतिहास देख लेंहमारे पूर्वजों ने आजादी के कई वर्षों बाद तक उन्हें भी स्वतंत्रता सेनानी बना दिया था जो केवल हमारे कार्यकर्त्ता थेउनके वंशज आज तक बिना कुछ किये कराये ही पेंशन ले रहे हैंऔर जो हमारी पार्टी में नहीं था वह चाहे कैसा ही क्रन्तिकारी था उसके वंशज आज भी छोटेमोटे काम करके जीवन गुजार रहे हैंये तो केवल एक उदहारण था कमाई काइसी आधार पर हम आज भी अपने कार्य कर्ताओं का ध्यान रखते हैंहमारा ग्राम स्तर का कार्यकर्त्ता भी चुनावों में अच्छाखासा कमा लेता हैकुछ वर्षों में ठेकेदारी और अन्य कार्य, ‘जो गोपनीय होते हैं और आम जनता को नहीं पता लगने चाहिएउसे करने जाते हैं । जिससे वह अपनी जिंदगी अय्याशी से गुजार सकता है

वैसे तो कमोबेश आज की सभी पार्टियों में अपने कार्यकर्ताओं का इसी तरह ध्यान रखा जाता है, पर हमारी पार्टी इन सबसे अलग है इन्होने ये सब हमसे सीखा है इसलिए हम गुरु हैं ये चेले हैंहमारा विश्वास करो कि हम अगर सत्ता में न भी आये तो इतना कमा कर जमा कर रखा है कि तुम्हें भूखे नहीं मरने देंगे | इसलिए केवल हमारी पार्टी में ही शामिल हों |

अल्प विराम,पूर्ण विराम

Posted: 27 Nov 2010 08:18 AM PST

पिछले दो दिनों से मैं कम्प्यूटर से दूर था.मेरे जीवन में अल्पविराम आ गया था.वजह यह थी कि विधाता ने मेरे सबसे छोटे चाचा की जिंदगी में पूर्णविराम लगा दिया.यूं तो भाषा और व्याकरण में पूर्णविराम के बाद भी वास्तविक पूर्णविराम नहीं होता और फ़िर से नया वाक्य शुरू हो जाता है.लेकिन जिंदगी में पूर्णविराम लग गया हो तो!दुनिया के सारे धर्म इस रहस्य का पता लगाने का प्रयास करते रहे हैं.बहुत-सी अटकलें लगाई गई हैं दार्शनिकों द्वारा.लेकिन चूंकि सिद्ध कुछ भी नहीं किया जा सकता है इसलिए नहीं किया जा सका है.ईसाई और इस्लाम इसे पूर्णविराम मानते हैं तो सनातन धर्म का मानना है कि मृत्यु के बाद फ़िर से नया जीवन शुरू हो जाता है और यह सिलसिला लगातार चलता रहता है.जिंदगी में हम कदम-कदम पर किन्तु-परन्तु का प्रयोग करते हैं लेकिन मृत्यु कोई किन्तु-परन्तु नहीं जानती.कब,किसे और कहाँ से उठाना है को लेकर उसके दिमाग में कभी कोई संशय नहीं होता.वह यह नहीं जानती कि मरनेवाला १०० साल का है या ५० का या फ़िर १ साल का.जिंदगी का वाक्य अभी अधूरा ही होता है और वह पूर्ण विराम लगा देती है.उसका निर्णय अंतिम होता है.ऑर्डर इज ऑर्डर.मेरे चाचा की उम्र अभी मात्र ४५ साल थी.बेटी की शादी करनी थी.तिलकोत्सव भी संपन्न हो चुका था.लेकिन अचानक जिंदगी समाप्त हो गई,बिना कोई पूर्व सूचना दिए जिंदगी के नाटक से भूमिका समाप्त.मुट्ठी से सारा का सारा रेत फिसल गया.चचेरा भाई अभी ६ठी जमात में पढ़ रहा है.उसे अभी मौत के मायने भी पता नहीं हैं.दाह संस्कार के दौरान भी वह निरपेक्ष बना रहा.हमने जो भी करने को कहा करता गया.नाजुक और नासमझ कन्धों पर परिवार का बोझ.गाँव की गन्दी राजनीति से संघर्ष.उसे असमय बड़ा बनना पड़ेगा.मुझसे भी बड़ा.हालांकि वह मुझसे २२-२३ साल छोटा है फ़िर भी.इस पूर्णविराम ने उसके मार्ग में न जाने कितने अल्पविराम खड़े कर दिए हैं.वैसे अंधाधुध विक्रय के बावजूद इतनी पैतृक संपत्ति अभी शेष है कि खाने-पीने की दिक्कत नहीं आनेवाली.लेकिन ऊपरी व्यय?बहन की शादी तो सिर पर ही है.खेती की गांवों में जो हालत है उसमें तो बड़े-बड़े जमींदारों की माली हालत ठीक नहीं.वैसे मैं भी मदद करूँगा जब भी वह मेरे पास आएगा.लेकिन गाँव के लोग क्या उसे मेरे पास आने से रोकेंगे नहीं?बैठे-निठल्ले लोगों के पास सिवाय पेंच लड़ाने के और कोई काम भी तो नहीं होता.मेरे अन्य जीवित चाचा लोग जिनके वे मुझसे ज्यादा नजदीकी थे,ने उनके परिवार से किनारा करना भी शुरू कर दिया है.मैंने अनगिनत लोगों के दाह-संस्कार में भाग लिया है.लेकिन हर बार प्रत्येक मरनेवाले के परिवार के साथ सहानुभूति रही है,स्वानुभूति नहीं.पहली बार दिल में किसी के मरने के बाद दर्द हो रहा है.आखिर मरनेवाला मेरे घर का जो था.अनगिनत अच्छी बुरी यादें हैं उनसे जुड़ी हुई.लोग जब मृतक-दहन चल रहा था तब चुनाव परिणाम का विश्लेषण करने में लगे थे.कुछ लोग अभद्र मजाक में मशगूल थे.परन्तु मैं वहीँ पर सबसे अलग बैठा गंगा किनारे की रेतीली मिट्टी में चाचा के पदचिन्ह तलाश रहा था.अंतिम यात्रा के पदचिन्ह!!!

छात्रसंघ की बहाली लोकतान्त्रिक अधिकार

Posted: 27 Nov 2010 06:50 AM PST

भारतीय राजनीति आज समाजसेवा का माध्यम न रहकर सत्ता प्राप्ति और सुनियोजित तरीके से जनता की मेहनत की कमाई को लूटने का जरिया बन गई है।लोकसभा चुनावों में,विधानसभा चुनावों में,पंचायती चुनावों में प्रत्याशियों के द्वारा चुनाव में विजयी होने के लिए अपनाये जाने वाले अनैतिक एवं असंवैधानिक कृत्यों को सभी जानते भी हैं और स्वीकारते भी हैं।समस्त राजनैतिक दल पूरे जोशो-खरोश से युवा वर्ग को आकर्षित करने के लिए नाना प्रकार के लोक-लुभावन वायदे करते नजर आते हैं।अधेड़ हो चुके अपने अनुभव हीन पुत्रों को तमाम राजनेता युवा नेता के रूप् में प्रस्तुत करके किसी साज-सज्जा की,उपभोग की वस्तु की तरह प्रचारित-प्रसारित करने में करोड़ों रूपया खर्च कर चुके हैं।आज 18वर्ष की उम्र का कोई भी युवा अपना मत चुनावों में अपना जनप्रतिनिधि निर्वाचित करने में दे सकता है।

लोकतंत्र का दुर्भाग्य कहें या वंशानुगत राजनीति का प्रभाव कहें कि भारत में प्रधान से लेकर सांसद तक के निर्वाचन में अपना मत देने वाला युवा वर्ग अपने शिक्षण संस्थान में अपना छात्र-संघ का प्रतिनिधि नहीं निर्वाचित कर सकता है।कारण है छात्र संघों का निर्वाचन बन्द होना।छात्र राजनीति लोकतांत्रिक राजनीति की प्रयोगात्मक,शिक्षात्मक व प्राथमिक पाठशाला होती है और इस राजनीति पर प्रतिबन्ध लगाकर अपने क्षमता के बूते छात्र-छात्राओं के हितों के लिए संघर्ष करके राजनीति में आये गैर राजनैतिक पृष्ठभूमि के होनहारों को राजनीति में अपना स्थान बनाने से रोकने के लिए यह दुष्चक्र रचा गया है।यह दुष्चक्र युवा वर्ग ही तोडेगा,इसमें तनिक भी सन्देह की गुंजाइश नही है।क्या सिर्फ इस दौरान आम युवा वर्ग को राजनीति में आने से रोकने का दुष्चक्र रचा गया है?नहीं…..छात्र-संघ पर प्रतिबन्ध लगाना,युवा वर्ग राजनीति में प्रवेश न करे इसका प्रयास पूर्व में भी किया गया है।लेकिन घ्यान रखना चाहिए कि भारत ही नहीं समूचे विश्व के इतिहास में जब भी तरूणाई ने अव्यवस्था के खिलाफ अंगड़ाई मात्र ही ली तो परिणामस्वरूप बड़ी-बड़ी सल्तनतें धूल चाटने लगी।क्रांति व युद्ध का सेहरा सदैव नौजवानों के ही माथे रहा है।छात्र-संघ बहाली की लड़ाई ने अब जोर पकड़ना प्रारम्भ कर दिया है।केन्द्र सरकार की सर्वेसर्वा सोनिया गाँधी को इलाहाबाद यात्रा के दौरान छात्रों विशेषकर समाजवादी पार्टी के युवाओं ने भ्रष्टाचार-महॅंगाई आदि मुद्दों पर अपने विरोध प्रदर्शन से लोहिया के अन्याय के खिलाफ संघर्ष के सिद्धान्त को कर्म में उतार कर खुद को साबित किया है।अब छात्र-छात्राओं,युवा वर्ग को अपने जनतांत्रिक अधिकार की लड़ाई लड़कर अधिकार हासिल करके खामोश नहीं बैठना है वरन् सतत् संघर्ष का रास्ता अख्तियार करके वंशानुगत राजनीति की यह जो विष बेल बड़ी तेजी से भारतीय लोकतंत्र में फैल रही है,इसकी जड़ में मठ्ठा डालने का काम भी करना है।छात्र-संघों का चुनाव न कराना एक बड़ा ही सुनियोजित षड़यंत्र है-आम जन के युवाओं को राजनीति में संघर्ष के रास्ते से आने की।

इसी प्रकार से जंग-ए-आजादी के दौरान तमाम् नेता विद्यार्थियों को राजनीति में,क्रांति के कामों में हिस्सा न लेने की सलाहें देते थे,जिसके जवाब में क्रांतिकारियों के बौद्धिक नेता भगत सिेह ने किरती के जुलाई,1928 के अंक में सम्पादकीय विचार में एक लेख लिखा था।इस लेख में भगत सिंह ने लिखा था,-”दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है?महात्मा गाँधी,जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति,पर कमीशन या वाइसराय का स्वागत करना क्या हुआ?क्या वह पोलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं?सरकारों और देशों के प्रबन्ध से सम्बन्धित कोई भी बात पोलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जायेगी,तो फिर यह भी पोलिटिक्स हुई कि नहीं?कहा जायेगा कि इससे सरकार खुश होती है और दूसरी से नाराज?फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराजगी का हुआ।क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही खुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए?हम तो समझते हैं कि जब तक हिन्दुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफादारी करने वाले वफादार नहीं,बल्कि गद्दार हैं,इन्सान नहीं,पशु हैं,पेट के गुलाम हैं।तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफादारी का पाठ पढ़ें।”

आज भगत सिंह के इस लेख के 82 वर्ष एवं भारत की ब्रितानिया दासता से मुक्ति के 63वर्ष बाद भी युवा वर्ग को मानसिक गुलामी का पाठ पढ़ाने का,वंशानुगत राजनैतिक चाकरी करवाने का दुष्चक्र रचा गया है।छात्र-संघ को बहाल न करना तथा अपने दल में छात्र व युवा संगठन रखना राजनैतिक दास बनाने के समान नहीं तो ओर क्या है?क्रांतिकारियों के बौद्धिक नेता भगत सिंह ने अपने इसी लेख में आगे लिखा,-”सभी मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की जरूरत है,जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी के लिए न्यौछावर कर दें।लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे?क्या परिवार और दुनियादारी के झंझटों में फॅंसे सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल सकेंगे?यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फॅंसे हों और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो।”

आज आजाद भारत में छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हरण किया जा रहा है।सत्ताधारी दलों की निरंकुशता का चाबुक छात्र हितों व छात्र राजनीति पर बारम्बार प्रहार करके राजनीति के प्राथमिक स्तर को नष्ट करने पर आमादा है।इन छात्र-युवा जन विरोधी सरकारों को छात्र-संघ बहाली का ज्ञापन देना,इनसे अपने अधिकारों की बहाली की मांग करना अन्धे के आगे रोना,अपना दीदा खेाना के समान है।सन् 1960-62 में डा0राम मनोहर लोहिया ने नारा दिया था-देश गरमाओं।जिसका अर्थ है,-”आदमी को अन्याय और अत्याचार पूर्ण रूतबे से लड़ने के लिए हमेशा तैयार करना।दरअसल अन्याय का विरोघ करने की अीदत बन जानी चाहिए।आज ऐसा नहीं है।आदमी लम्बे अर्से तक गद्दी की गुलामी और बहुत थोडें अर्से के लिए उससे नाराजगी के बीच एक अन्तर करता रहता है।”वर्तमान समय में छात्र संघ की बहाली व छात्र हितों की आवाज उठाने वाले लोगों को शासन-सत्ता व भाड़े के गुलामों के दम पर कुचलने का प्रयास किया जा रहा है।छात्र संघ बहाली के लिए आंदोलित सभी छात्र-युवा संगठनों को एक साथ आकर अनवरत् सत्याग्रह व हर सम्भव संघर्ष का रास्ता अख्तियार करना चाहिए।

काम को इनाम (बिहार चुनाव परिणाम)

Posted: 27 Nov 2010 06:20 AM PST

बिहार विधान सभा चुनाव परिणाम में एनडीए को तीन चौथाई बहुमत का मिलना यह जताता है कि “जो सरकार काम करेगी वही राज करेगी”। पिचले पांच सालों में एनडीए कि सरकार ने बिहार में जो काम किया उसके एवज में बिहार के लोगों ने जातिवाद की रेखा को पार कर अपने मताधिकार का प्रयोग कर एक ऐसे गठबंधन पार्टी को पूर्ण जनादेश दिया जो पिचले पांच वर्षो में काम कर बिहार को जंगल राज से उबार एक ऐसे रास्ते पर अग्रसर किया जहाँ से बिहार की अपनी पहचान बनानी शुरू हुई। आज बिहार की जो गरिमा बनी है वह पिछले एनडीए सरकार की देन है।
अगर हम पिछले पांच वर्षों को छोड़ दें और उसके पीछे के पंद्रह वर्षों के अतीत में झांके तो एक बदहाल बिहार नज़र आता है। जहाँ उंच-नीच का वेदभाव, जाति-जाति में टकराव, नक्सलवाद का बोलबाला, फलता-फूलता अपहरण उद्योग, अपराधिक एवं राजनितिक सांठ-गाँठ, अपराधिक तत्वों का बोलबाला, ला एंड आडर का बुरा हाल, जर्जर सड़कें, सरकारी हस्पतालों का बुरा हाल, शिच्छा के स्तर का मटियामेट होना, बंद पड़े उद्योग धंधे, जीने का आधार ख़त्म (तभी तो हर तबके का पलायन हुआ बिहार से) यानि पूरी तरह बर्बाद बिहार नज़र आता है।
फिर आता है २००५ का बिहार विधान सभा चुनाव। धन्य हो चुनाव आयोग की टीम धन्य हो श्री के.जे.राव जिनकी सक्रियता के चलते बिहार में निष्पच्छ चुनाव हो सका और एनडीए की सरकार सत्ता में आ सकी। अगर चुनाव आयोग के पहल में कही भी थोड़ी सी भी त्रुटी होती तो फिर से आरजेडी की सरकार सत्ता पर काबिज़ होती और बिहार में फिर वही सब होता जो पिछले पंद्रह सालों तक होता रहा था।
बिहार विधान सभा चुनाव २००५ में एनडीए की सरकार श्री नितीश कुमार की अगुवाई में बनी। पूरी तरह से बर्बाद बिहार को एक नया आयाम देने के लिए नितीश कुमार ने कमर कस ली। उन्होंने बिहार के लिए कुछ सपने पाल रखे थे और फिर उन सपनो को साकार करने में जुट गए। वह पिछली सरकार की नीतियों पर न चल कर खुद की बनाई नीतियों पर चलना शुरू किया। जिसमे शामिल था बिहार में कानून का राज, ताकि लोग अमन चैन से जीवन बसर कर सके, सड़कें जो पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी उसे ठीक करना, सरकारी हस्पतालों की जर्जर स्थिति से ऊपर उठाना, आधी आबादी (महिला) को उनका हक देना, शिच्छा के स्तर को ऊपर उठाना, बिहार में बाहरी उद्योगपतियों को आकर्षित करने के लिए एक अच्छा माहौल बनाना, बिजली उत्पादन को बढ़ाना तथा आत्म निर्भर बनना, बिहार के लोगों को रोज़गार धंधे मुहैया करना (ताकि बिहारियों का पलायन रुक सके), उच्च शिच्छा के लिए बिहार में ज्यादा से ज्यादा कालेज एवं यूनिवर्सिटी का खुलवाना ताकि उच्च शिच्छा प्राप्त करने के लिए बिहार से बिहारी लड़कों का पलायन रुक सके।
श्री नितीश कुमार ने पिछले पांच वर्षो में अपने बनाये सभी नीतियों पर पूरी तरह अमल करते हुए एक पिछड़े राज्य को अग्रसर राज्य कि श्रेणी में लाये और बिहार विकाश के राह पर पूरी तरह दौड़ने के लिए तैयार हो गया है। इसीलिए बिहार कि जनता ने भी उम्मीद से ज्यादा जनादेश (विश्वाश) देकर श्री नितीश कुमार के हाथो में बिहार कि बाग डोर थमा दी क्यों कि अपने से ज्यादा उसे नितीश कुमार पर विश्वाश है।
अब मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार अपने गढ़े हुए सपनो का बिहार बनाने के लिए स्वतंत्र है क्यों कि उनके राह में अब विपच्छ भी नहीं है।

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