>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


एलियंस की डायरी में लालू

Posted: 29 Nov 2010 07:40 AM PST

एलियंस की एक डायरी किसी वैज्ञानिक को मिली थी, जिसे पढकर वह हैरान रह गया कि प्रथ्वी के बारे में वे लोग वही सोचते हैं, जो हम लोग खुद अपने बारे में मन करते हुए भी कभी सोचना नहीं चाहते. किसी अखब़ार के हवाले से आज जो भी पता चला है, वह उस डायरी के बारे में ज़्यादा है, जो हिंदी में अपने पटना-प्रवास के दौरान एलियंस द्वारा लिखी गयी थी और जब वह वैज्ञानिक अपनी पालतू भैंस को चारा डालने गया था तो उसकी सहचरी भैंस ने सिर्फ़ इसलिए वह डायरी चबा ली कि उसे पहले चारा क्यों नहीं डाला गया ? बहरहाल, डायरी तो भैंस के इस दुनिया में ना होने की अहम् वजह से आज इस दुनिया में नहीं है, मगर वह वैज्ञानिक से ज़्यादा अखब़ार वालों के सामने कुछ सवाल खड़े कर रही हैं.

भैंस द्वारा चबा ली गयी उस डायरी के कुछ अंश आज भी उस वैज्ञानिक को याद हैं. उसकी शुरूआत में ही लिखा है कि हम प्रमाणित करते हैं कि हम सब जो धोखे से अपनी यह डायरी यहां छोड़े जा रहे हैं, यह हमारी ही है और इसमें हमारी कोई ऐसी मंशा नहीं है कि हम पृथ्वी वासियों को जलील करें या उन्हें उनकी औक़ात दिखा दें कि फिलहाल क्या है और अगर वे चाहते तो क्या हो सकती थी ? हम लोग शान्ति के साथ अपने ग्रह पर ही रहने में खुश हैं. पहले हमने सोचा था कि पृथ्वी पर चलकर कोई सरकारी ज़मीन ले लेंगे, मगर यहां आकर पता चला कि वह ज़मीन, जो हमने पसंद की थी, वह नेताओं ने कब्ज़ा रखी है और इस जन्म में हमें नहीं मिल सकती, लिहाज़ा हमने फैसला कर लिया कि हम अपने ग्रह पर ही घिचपिच में रह लेंगे, मगर इस ग्रह पर मीडिया कि सुर्खियां बनने के लिए कभी भी नहीं आयेंगे.

एलियंस की इस चबा ली गयी डायरी में साफ़-साफ़ लिखा है कि हम जाना तो कहीं और चाहते थे, मगर किसी इंडिया नामक मुल्क के पटना नामक शहर में हमारे यान का ईंधन ख़त्म हो गया और हमें वहीँ उतरना पड़ा. यहां ईंधन तो हमें ‘ब्लैक’ नामक किसी ख़ास व्यवस्था की वजह से नहीं मिला, मगर यह जानकारी ज़रूर मिली कि यहां पर हमसे मिलते-जुलते कुछ ऐसे प्राणी ज़रूर रहते हैं, जो नेतागिरी के अलावा और कोई काम नहीं करते. ज़्यादा जानकारी करने पर हमें बताया गया कि यहां पर खुद से गयी-गुज़री समझी जाने वाली भैंसों का चारा खाने वाले लोग भी रहते हैं और अगर ज़्यादा दिन तक हम यहां पर रुके तो हमारा बचा-खुचा चारा, जिसे हम लोग ‘खाना’ कहते हैं, भी खा लिया जाएगा और फिर डकार भी नहीं ली जायेगी कि कोई सबूत भी रहे.

डायरी में आगे लिखा था कि यहां के चिड़ियाघर को देखने की इच्छा ज़ाहिर करने पर हमें किसी लालू प्रसाद यादव नामक प्राणी के घर पर छोड़ दिया गया कि यहां पर सभी किस्म के प्राणी आते-जाते मिल जायेंगे. हमने उक्त प्राणी के घर के दरवाज़े पर जब दस्तक दी तो दातून नामक कोई चीज चबाते हुए कोई प्राणी आया और हमसे अजीब किस्म की भाषालापी शैली में पूछने लगा कि ” क्या हमारी ससुराल से आये हो ? ” हमारे ख़ामोश रहने पर फिर हमसे पूछा गया कि ” भाई, बोलते काहे नहीं हो कि हमारी पार्टीवा ज्वाइन करने आये हो ? ” इस दौरान हमने देखा कि सवाल पूछने वाले के कानों के पास इतने बाल उग आये थे, जितने उसके पूरे सिर पर भी नहीं रहे होंगे. हमने वहां की ज़मीन के नमूने लिए और किसी तरह ईंधन का जुगाड़ करके अपने ग्रह की तरफ निकल लिए, ताकि इस पर हम रिसर्च करके यह अंदाजा लगा सकें कि चारा खाकर भी कोई आदमी कैसे ज़िन्दा रह सकता है ? डायरी के अंत में नीतीश कुमार नाम के किसी एलियंस के हस्ताक्षर साफ़ दिखाई दे रहे थे.

(अतुल मिश्रा, ब्लोगर हैं !)

आम लोगों की एकजुटता से झुकेगी सत्ता

Posted: 29 Nov 2010 06:37 AM PST

आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित भविष्य के लिये तो हम अपने वर्तमान जीवन को सुधारें। यदि हम सब लोग केवल अपने वर्तमान को सुधारने का ही दृढ निश्चय कर लें तो आने वाले कल का अच्छा होना तय है, लेकिन हमारे आज अर्थात् वर्तमान के हालात तो दिन-प्रतिदिन बिगडते ही जा रहे हैं। हम चुपचाप सबकुछ देखते और झेलते रहते हैं। जिसका दुष्परिणाम यह है कि आज हमारे देश में जिन लोगों के हाथों में सत्ता की ताकत हैं, उनमें से अधिकतर का सच्चाई, ईमानदारी एवं इंसाफ से दूर-दूर का भी नाता नहीं रह गया है। अधिकतर भ्रष्टाचार के दलदल में अन्दर तक धंसे हुए हैं और अब तो ये लोग अपराधियों को संरक्षण भी दे रहे हैं। ताकतवर लोग जब चाहें, जैसे चाहें देश के मान-सम्मान, कानून, व्यवस्था और संविधान के साथ बलात्कार करके चलते बनते हैं और सजा होना तो दूर इनके खिलाफ मुकदमे तक दर्ज नहीं होते! जबकि बच्चे की भूख मिटाने हेतु रोटी चुराने वाली अनेक माताएँ जेलों में बन्द हैं। इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों के खिलाफ यदि कोई आम व्यक्ति या ईमानदार अफसर या कर्मचारी आवाज उठाना चाहे, तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित एवं अपमानित करने का प्रयास किया जाता है और सबसे दु:खद तो ये है कि पूरी की पूरी व्यवस्था अंधी, बहरी और गूंगी बनी देखती रहती है।

अब तो हालात इतने बिगडते चुके हैं कि मसाले, घी, तेल और दवाइयों तक में धडल्ले से मिलावट की जा रही है। ऐसे में कितनी माताओं की कोख मिलावट के कारण उजड जाती है और कितनी नव-प्रसूताओं की मांग का सिन्दूर नकली दवाईयों के चलते युवावस्था में ही धुल जाता है, कितने पिताओं को कन्धा देने वाले तक नहीं बचते, इस बात का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। इस सबके उपरान्त भी इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों का एकजुट होकर सामना करने के बजाय हम चुप्पी साधकर, अपने कानूनी हकों तक के लिये भी गिडगिडाते रहते हैं।

अधिकतर लोग तो इस डर से ही चुप्पी साध लेते हैं कि यदि वे किसी के खिलाफ बोलेंगे तो उन्हें भी फंसाया जा सकता है। इसलिये वे अपने घरों में दुबके रहते हैं! ऐसे लोगों से मेरा सीधा-सीधा सवाल है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में हमारे आसपास की गंदगी को साफ करने वाले यह कहकर सफाई करना बन्द कर देंगे, कि गन्दगी साफ करेंगे तो गन्दगी से बीमारी होने का खतरा है? खानों में होने वाली दुर्घटनाओं से भयभीत होकर खनन मजदूर यह कहकर कि खान गिरने से जीवन को खतरा है, खान में काम करना बंद कर दे, तो क्या हमें खनिज उपलब्ध हो पायेंगे? इलाज करते समय मरीजों से रोगाणुओं से ग्रसित होने के भय से डॉक्टर रोगियों का उपचार करना बन्द कर दें, तो बीमारों को कैसे बचाया जा सकेगा? आतंकियों, नक्सलियों एवं गुण्डों के हाथों आये दिन पुलिसवालों के मारे जाने के कारण यदि पुलिस यह सोचकर इनके खिलाफ कार्यवाही करना बन्द कर दें कि उनको और उनके परिवार को नुकसान पहुँचा सकता हैं, तो क्या सामाज की कानून व्यवस्था नियन्त्रित रह सकती है? पुलिस के बिना क्या हमारी जानमाल की सुरक्षा सम्भव है? आतंकियों तथा दुश्मनों के हाथों मारे जाने वाले फौजियों के शवों को देखकर, फौजी सरहद पर पहरा देना बंद कर दें, तो क्या हम अपने घरों में चैन की नींद सो पाएंगे?

यदि नाइंसाफी के खिलाफ हमने अब भी अपनी चुप्पी नहीं तोडी और यदि आगे भी ऐसा ही चलता रहा तो आज नहीं तो कल जो कुछ भी शेष बचा है, वह सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाने वाला है। आज आम व्यक्ति को लगता है कि उसकी रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है! क्या इसका कारण ये नहीं है, कि आम व्यक्ति स्वयं ही अपने आप पर विश्वास खोता जा रहा है? ऐसे हालात में दो ही रास्ते हैं-या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें। क्योंकि लोकतन्त्र में समर्पित, संगठित एवं सच्चे लोगों की एकजुट ताकत के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी है और सत्ता वो धुरी है, जिसके आगे सभी प्रशासनिक निकाय और बडे-बडे अफसर आदेश की मुद्रा में मौन खडे रहते हैं।

दगाबाज़ निकले लोकतंत्र के प्रहरी

Posted: 29 Nov 2010 05:47 AM PST

हजारों साल पहले की बात है.किसी राज्य का राजा बड़ा जालिम था.उसके शासन में चारों तरफ लूटमार का वातावरण कायम हो गया.कुछ लोगों ने उसे वस्तुस्थिति से अवगत कराने की कोशिश भी की.लेकिन उन सबको अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.उसी राज्य में एक वृद्ध और बुद्धिमान व्यक्ति रहता था.एक दिन जा पहुंचा राजा के दरबार में और कहा कि मैं एक सच्ची कहानी आपको सुनना चाहता हूँ.राजा को कहानियां बहुत पसंद थी.बूढ़े ने कहना शुरू किया कि महाराज जब आपके दादाजी का राज था तब मैं नौजवान हुआ करता था और बैलगाड़ी चलाता था.एक दिन जब शहर से लौट रहा था तब जंगल में ऊपर से नीचे तक सोने के गहनों से लदी नवयौवना मिली.डाकुओं ने उसके कारवां को लूट लिया था और पति और पति के परिवार के लोगों की हत्या कर दी थी.वह किसी तरह बच निकली थी.उसका दुखड़ा सुनकर मुझे दया आई और मैंने उसे गाड़ी में बिठाकर सही-सलामत उसके पिता के घर पहुंचा दिया.बाद में जब आपके पिता का राज आया तब मेरे मन में ख्याल आया कि अच्छा होता कि मैं उसे घर पहुँचाने के ऐवज में उसके गहने ले लेता.अब आपका राज है तो सोंचता हूँ कि अगर जबरन उसे पत्नी बनाकर अपने घर में रख लेता तो कितना अच्छा होता.राजा ने वृद्ध की कहानी में छिपे हुए सन्देश को समझा और पूरी मेहनत से स्थिति को सुधारने में जुट गया.मैं जब भी इस कहानी के बारे में सोंचता था तो मुझे लगता कि भला ऐसा कैसे संभव है कि कोई ईमानदार व्यक्ति समय बदलने पर बेईमान हो जाए.खुद मेरे पिताजी का उदाहरण मेरे सामने था जो सारे सामाजिक प्रतिमानों के बदल जाने पर भी सच्चाई के पथ पर अटल रहे.लेकिन जब प्रसिद्ध पत्रकार और कारगिल फेम बरखा दत्ता को दलाली करते देखा-सुना तो यकीन हो गया कि यह कहानी सिर्फ एक कहानी नहीं है बल्कि हकीकत भी है.ज्यादातर लोग समय के दबाव को नहीं झेल पाते और समयानुसार बदलते रहते हैं.कारगिल युद्ध के समय हिमालय की सबकुछ जमा देनेवाली अग्रिम और दुर्गम मोर्चों पर जाकर रिपोर्टिंग कर पूरे देश में देशभक्ति का ज्वार पैदा कर देने वाली बरखा कैसे भ्रष्ट हो सकती है?लेकिन सच्चाई चाहे कितनी कडवी क्यों न हो सच्चाई तो सच्चाई है.नीचे ग्रामीण और कस्बाई पत्रकारों ने पैसे लेकर खबरें छापकर और दलाली करके पहले से ही लोकतंत्र के कथित प्रहरी इस कौम को इतना बदनाम कर रखा है कि मैं कहीं भी शर्म के मारे खुद को पत्रकार बताने में हिचकता हूँ.अब ऊपर के पत्रकार भी जब भ्रष्ट होने लगे हैं तो नीचे के तो और भी ज्यादा हो जाएँगे.वो कहते हैं न कि महाजनो येन गतः स पन्थाः.यानी समाज के जानेमाने लोग जिस मार्ग पर चलें वही अनुकरणीय है.मैंने नोएडा में देखा है कि वहां की हरेक गली के एक अख़बार है जिनका उद्देश्य किसी भी तरह समाज या देश की सेवा या उद्धार करना नहीं है.बल्कि इनके मालिक प्रेस के बल पर शासन-प्रशासन पर दबाव बनाते हैं और उसके बल पर दलाली करते हैं,ठेके प्राप्त करते हैं.दुर्भाग्यवश बड़े अख़बारों और चैनलों का भी यही हाल है.दिवंगत प्रभाष जोशी ने पेड न्यूज के खिलाफ अभियान भी चलाया था.लेकिन उनकी असामयिक मृत्यु के चलते यह अभियान अधूरा ही रह गया.कई बार अख़बार या चैनल के मालिक लोभवश सत्ता के हाथों का खिलौना बन जाते हैं और पत्रकारिता की हत्या हो जाती है.अभी दो दिन पहले ही पटना के एक प्रमुख अख़बार दैनिक जागरण के ब्यूरो प्रमुख का तबादला राज्य सरकार के कहने पर लखनऊ कर दिया गया है.खबर आप भड़ास ४ मीडिया पर देख सकते हैं.वैसे भी हम इन बनियों से क्या उम्मीद कर सकते हैं?जो अख़बार मालिक जन्मना बनिया नहीं है वह भी कर्मणा बनिया है.व्यवसायी तो पहले भी होते थे लेकिन उनमें भी नैतिकता होती थे.जब चारों ओर हवा में नैतिक पतन की दुर्गन्ध तैर रही हो तो पत्रकारिता का क्षेत्र कैसे इससे निरपेक्ष रह सकता है?क्या ऐसा युग या समय के भ्रष्ट हो जाने से हो रहा है.मैं ऐसा नहीं मानता.समय तो निरपेक्ष है.समय का ख़राब या अच्छा होना हमारे नैतिक स्तर पर निर्भर करता है.जब अच्छे लोग ज्यादा होंगे तो समय अच्छा (सतयुग) होगा और जब बुरे लोग ज्यादा संख्या में होंगे तो समय बुरा (कलियुग) होता है.मैं या मेरा परिवार तो आज भी ईमानदार है.परेशानियाँ हैं-हमें किराये के मकान में रहना पड़ता है,कोई गाड़ी हमारे पास नहीं है,हम अच्छा खा या पहन नहीं पाते लेकिन हमें इसका कोई गम नहीं है.इन दिनों टी.वी चैनलों में टी.आर.पी. के चक्कर में अश्लील कार्यक्रम परोसने की होड़ लगी हुई है.समाज और देश गया बूंट लादने इन्हें तो बस पैसा चाहिए.कहाँ तो संविधान में अभिव्यक्ति का अधिकार देकर उम्मीद की गई थी कि प्रेस लोकतंत्र का प्रहरी सिद्ध होगा और कहाँ प्रेस पहरेदारी करने के बजाय खुद ही दलाली और घूसखोरी में लिप्त हो गया है.नीरा राडिया जैसे जनसंपर्क व्यवसायी अब खुलेआम पत्रकारों को निर्देश देने लगे हैं कि आपको क्या और किस तरह लिखना है और क्या नहीं लिखना है.शीर्ष पर बैठे पत्रकार जिन पर सभी पत्रकारों को गर्व हो सकता है पैसे के लिए व्यापारिक घरानों के लिए लिखने और दलाली करने में लगे हैं.जब पहरेदार ही चोरी करने लगे और डाका डालने लगे तो घर को कौन बचाएगा?उसे तो लुटना है ही.कुछ ऐसा ही हाल आज भारतीय लोकतंत्र का हो रहा है.

औरतें भी करती हैं मर्दों का शोषण

Posted: 29 Nov 2010 05:40 AM PST

अविनाश राय

कल टी.वी. देखते हुए अचानक ही नजर एक खबर पर जाकर टिक गई और याद आ गई वर्तिका नंदा की लाईन कि “औरतें भी करती हैं मर्दों का शोषण”।खबर थी कि गुडगांव मेट्रो स्टेशन पर महिलाओं ने पुरुषों को जमकर पीटा।उनका कसूर मात्र इतना भर था कि वो महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे में यात्रा कर रहे थे।

क्या इस छोटे से कसूर के लिए पुरुष ऐसी सजा के हकदार थे।हालांकि विभिन्न चैनलों की बाइट ने इस सजा को मुकम्मल तौर पर जायज ठहराया लेकिन चैनलों की दृष्टि उस ओर कभी नहीं गई जब महिलाएं पुरुषों का शोषण कर रही होती हैं।मेट्रो ट्रेन की ही बात करें तो सामान्य डिब्बे में महिलाओं के लिए आरक्षित सीट पर यदि कोई वृद्ध पुरुष बैठा होता है तो एक युवती के आ जाने पर भी उसे अपनी सीट खाली करनी पडती है।वह युवती उस वृद्ध पुरुष की अशक्तता को दरकिनार कर देती है और युवती की आरक्षित सीट के लिए उस वृद्ध को खडे होकर यात्रा करनी पडती है।बसों में भी पुरुषों को कमोबेश ऐसी ही स्थिति से दो-चार होना पडता है।

महिलाएं आरक्षण को अपने लिए एक मजबूत हथियार के तौर पर इस्तेमाल करती हैं लेकिन गैर जरुरी ढंग से और बेजा इस्तेमाल ज्यादा करती हैं।मैं महिला सशक्तिकरण के बिल्कुल भी खिलाफ नहीं हूं परन्तु अधिकारों का दुरुपयोग करके सशक्तिकरण का राग अलापना अतार्किक और गैरजरुरी है।

यदि भारतीय परिदृश्य की ही बात करें तो प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक जितनी भी महिलाओं का नाम उल्लेखनीय है उनमें से किसी ने भी आरक्षण रुपी बैसाखी का सहारा नहीं लिया है। विद्योतमा हो या गार्गी,रानी लक्ष्मीबाई हो या रानी दुर्गावती,इंदिरा गांधी हो या सोनिया गांधी या प्रतिभा पाटिल,किरण बेदी हो या इंदिरा नूई,मन्नू भंडारी हो या प्रभा खेतान,महाश्वेता देवी हो या मेधा पाटकर या फिर अरुंधती राय,ये महिलाएं अपने-अपने क्षेत्र में श्रेष्ठतम स्थान रखती हैं परन्तु यह मुकाम हासिल करने के लिए उनके पास आरक्षण की बैसाखी नहीं थी।

आरक्षण से सफलता मिलने के बाद किसी भी महिला ने कोई भी उल्लेखनीय कार्य किया हो ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है हां अधिकारों के दुरुपयोग के हजारों उदाहरण रोज देखने को मिल जाते हैं।इसलिए आरक्षण को अपना अधिकार समझने की बजाय उसके मूल उद्देश्य को समझना ज्यादा बेहतर होगा।ग्रामीण महिलाओं के लिए आरक्षण बेहद जरुरी है परन्तु इसके दुरुपयोग को नजरन्दाज नहीं किया जा सकता है।

पंचायत में महिलाओं की भूमिका

Posted: 29 Nov 2010 01:23 AM PST

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव समाप्त हुआ है और झारखण्ड में पंचायत चुनाव चल रहे हैं । ऐसा देखने में आया है कि पंचायत चुनावों में महिलाओं की भूमिका तेजी से बढ़ रही है । महिलाओं की भागीदारी पर चर्चा कर रहे हैं लोकेन्द्रसिंह कोट

लोकतंत्र की सबसे छोटी लेकिन महत्वपूर्ण इकाई हैं पंचायत। यह लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है। पंचायत की बात प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सदियों से होती रही है। वर्ष 1955 में पंचायती राज व्यवस्था तो की गई पर कई कारणों से यह असफल सिद्ध हुई। एक बड़े अंतराल के बाद 1993 में 73वें एवं 74वें संशोधन में अभी तक हाशिए पर रही महिलाओं को पंचायतों में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया।

इस उल्लेखनीय आरक्षण का परिणाम यह रहा कि देश भर की पंचायतों में लगभग 163000 महिलाएं विभिन्न पदों पर नियुक्त हुईं तथा सरपंच के तौर पर लगभग 10000 महिलाएं आगे आईं। एक पुरुष प्रधान समाज में इतना बड़ा बदलाव एक बारगी तो खुश होने के लिये पर्याप्त था लेकिन बदलाव की इस प्रक्रिया में सिक्के का दूसरा पहलू भी विद्यमान रहा। कागजी आंकड़ों और व्यवहारिक सत्य में ज़मीन-आसमान का अंतर पाया गया।

सच तो यह है कि महिला जनप्रतिधियों के पुरुष रिश्तेदार ही अधिकांश जगहों पर शासन करते रहे और महिलाओं को पर्दे के पीछे रखा गया। ताजा अध्ययन बताते हैं कि लगभग आधे से ज्यादा जगहों पर ऐसा खुले तौर पर हो रहा है। ग्रामीण समाज ने भी इसे मौन स्वीकृति दे रखी है। महिला जनप्रतिनिधियों के कंधों पर बंदूकें रख कर उनके पुरुश रिश्तेदार भ्रश्टाचार में लीन हैं और इल्जाम महिला जनप्रतिनिधियों के सर लग रहे हैं। इससे ग्रामीण महिला को लोकतंत्र की इस निचली पाठशाला से यही सीखने को मिल रहा है कि पंचायत या सत्ता धन कमाने का एक स्रोत भर हैं। वास्तव में ग्रामीण महिलाओं की पंचायतों में भागीदारी को तो अपना लिया गया लेकिन उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के मूल में जाकर नहीं देखा गया। महिलाओं को एक पूर्व निर्धारित ढ़ांचे में फिट कर दिया गया, बगैर यह देखे कि अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियां क्या हैं। जबकि होना यह था कि इन ग्रामीण महिलाओं के ढांचे में व्यवस्था को फिट करना था। इसके पष्चात् कई शिकायतें जो हम कर पर रहे है, वे नहीं होती।

शिक्षा का ही उदाहरण लें। शिक्षा की कमी उनके आत्म-विकास और आत्म-सम्मान में सबसे बाधक रही है। यद्यपि पिछले पांच दशकों में महिला साक्षरता कई गुना बढ़ी है फिर भी उनमें शिक्षा का स्तर निम्न है। इसके अलावा सिर्फ साक्षर होने भर से ही महिलाओं को जागरूक होना आ जाएगा, ऐसा सोचना सही नहीं है। साक्षर महिला जनप्रतिनिधियों को लेकर किये गये एक अध्ययन के अनुसार अभी भी वे ‘महिला समस्या’ को नहीं समझ पाई हैं उनमें महिला विकास जैसा कोई चिंतन ही नही हैं।

ग्रामीण महिलाओं के संदर्भ में यह तथ्य भी चैंकाने वाला है कि लगभग पचपन से साठ प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हैं। इसका सीधा अर्थ यही है कि महिलाएं अपने घर में ही दमन चक्र झेलने को मजबूर हैं। ऐसे में इनसे आशा करना कि वे पंचायत के कार्यों एवं उनकी समस्याओं के लिए लड़ें तो यह सर्वथा बेमानी ही होगा।

इसे विडम्बना ही कहेंगे कि जहां हम महिला उत्थान और उनकी सत्ता में भागीदारी के लिए लड़ते रहे, वहीं उसी के समानान्तर पुरूश और महिलाओं के अनुपात में देशव्यापी गिरावट आती रही। 972 प्रति हजार पुरुष से घटकर आज यह 934 प्रति हजार पुरुष तक पहुँच चुकी है। ऐसे में कभी-कभी लगता है कि दबाव के चलते सब कुछ अपना रहे हैं परन्तु मन से महिलाओं को आगे बढ़ाना हम नहीं चाहते। कुछ जागरूक महिला सरपंचों द्वारा लिए गए निर्णयों (चाहे वे कितने ही अच्छे क्यों न हो) को सरेआम पुरूश साथियों द्वारा नकारने की घटनाएं भी सामने आई हैं। कई स्थानों पर महिलाओं को तरह-तरह से अपमानित किया जाना हमारी उसी पुरूश आधारित मानसिकता का परिचायक है।

वैसे देखा जाए तो ग्रामीण महिलाएं जब अपने घरेलू कार्यों के साथ-साथ कृषि कार्यों को भी सही प्रबंधन कर निपटा लेती हैं तथा अपने बच्चों का भी पालन-पोषण कर लेती हैं तो ऐसी कुशल प्रबंधक को पंचायत का पोषण करने में कहाँ समस्या आ सकती है। वे अपने उद्देश्यों के प्रति अपने संस्कारों की वजह से अधिक प्रतिबद्ध, ईमानदार और उत्साही रहती हैं। जरूरत इस बात की है कि संपूर्ण व्यवस्था उनके पक्ष को लेकर पुनर्व्यवस्थित हो और उन्हें पारिवारिक सहमति प्राप्त हो। हमें पंचायती राज में महिलाओं की भागीदारी के बारह-तेरह वर्षों बाद अनुभवों को महत्व देते हुए प्रत्येक पहलू की पुर्नव्यवस्था करना होगी।

चरखा

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