>देशभक्ति का दावा और उसकी हकीक़त The patriot

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एक निवेदन ब्लाग जगत की लौहकन्या बहन दिव्या जी से A friendly request

 नफ़रत से भरे मीडियाकर्मियों का एक सांकेतिक मनोविश्लेषण Media, my business part 1

आदरणीया बहन दिव्या जी,

आपने अपनी पोस्ट पर मेरे एक कमेंट को प्रकाशित किया और उस पर अपना वक्तव्य भी दिया और फिर बाद में दो भाईयों के कमेंट भी आये जिनमें मेरी पोस्ट पर ऐतराज़ किया गया है। मैंने उन्हें सामने रखते हुए बिल्कुल नार्मल कमेंट आपके ब्लाग पर किए जिन्हें आपने ‘किसी वजह से‘ काफ़ी समय तक लटकाए रखा और उन्हें प्रकाशित होता न देखकर मैंने जनाब रोहित साहब के आरोप का उत्तर देने के लिए एक पोस्ट बनाई जिसका शीर्षक है
‘नफ़रत से भरे मीडियाकर्मियों का एक सांकेतिक मनोविश्लेषण’
और उसमें उन्हें आपकी पूरी पोस्ट दोबारा पढ़ने के लिए दी है और उनसे पूछा गया है कि इस पोस्ट में आखि़र ऐसा क्या है कि आप मेरी सोच और मेरी समझ को लानत के क़ाबिल ठहरा रहे हैं।
यही सवाल मैं ब्लाग जगत के हरेक अदना और आला ब्लागर से पूछना चाहता हूं कि जो लोग जगह जगह घूमकर बेढब कविताओं पर तो वाह वाह करते हैं, द्विअर्थी चुटकुलों पर तारीफ़ की बरसात कर देते हैं बल्कि इससे भी आगे बढ़कर नफ़रत का ज़हर फैलाने वाली पोस्ट्स पर भी उनका जमघटा लगा रहता है लेकिन मेरी पोस्ट पर आते हुए उनका वुजूद थर्राने लगता है, कुछ का डर से और कुछ का नफ़रत और गुस्से से।
ऐसा क्यों है ?
चलिए मैं यह भी मान लेता हूं कि जिस लेख को मैं ‘नफ़रत की आग पर पानी डालना‘ मानता हूं, उसे वे अपनी आस्थाओं पर प्रहार मानकर नाराज़ होते हैं।
ठीक है,
तब यह बताईये कि जब बिग ब्लागर जनाब अरविंद मिश्रा जी जैसे लोग कहते हैं कि
‘पुराण तो लिखे ही गधों के लिए गए हैं‘ या ‘हिंदू धर्म में नशा करने, व्यभिचार करने या जो मन चाहे करने की पूरी आज़ादी है‘ तब आपका आक्रोश कहां काफ़ूर हो जाता है ?
जब प्रिय प्रवीण शाह जी जैसे संशयवादी हिन्दू नास्तिक ‘भगवान को अनैतिक और बेईमान‘ बताते हैं तो उनसे केवल अनवर जमाल भिड़ता है, आपमें से किसी की ग़ैरत नहीं जागती।
क्यों ?
बल्कि आप उनकी पोस्ट पर नियमित रूप से कमेंट देने पहुंचते रहते हैं, नास्तिक भी और आस्तिक भी।
कैसे आस्तिक हैं आप ?
आपके भगवान को एक आदमी गालियां दे रहा है और आप वहां बैठे ‘ही ही‘ कर रहे हैं। आपके बस का ही नहीं है भगवान की पवि़त्रता में विश्वास करना और दूसरों को भी विश्वास की प्रेरणा देना। मैं पालनहार को एक ही मानता हूं और उसी का एक नाम हिंदी-संस्कृत में भगवान मानता हूं। प्रवीण जी को, उनकी न्यायप्रियता के कारण अपना प्रिय मानने के बावजूद, मैंने साफ़ सुथरे अंदाज़ में अच्छी तरह समझा दिया और कई पोस्ट भी पै दर पै भगवान की पवि़त्रता और महानता पर बनाईं हैं, जिन्हें आप आज भी देख सकते हैं। मैंने उनके विचार का विरोध किया और भरपूर किया लेकिन उन्होंने कोई आपत्ति नहीं जताई और न ही कभी मुझसे यह कहा कि आपने मुझे संबोधित करके जो पोस्ट्स बनाईं हैं, उन्हें हटा लीजिए बल्कि उल्टे उन्होंने मेरी पोस्ट का लिंक देकर लोगों को बताया कि मैंने सही कहा है।
एक ब्लागर का धर्म भी यही है। एक ब्लागर सार्वजनिक रूप से जो कुछ कहता है उससे सभी का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। दूसरे लोग असहमत भी हो सकते हैं और अपने ब्लाग्स पर उसके विचार का ज़िक्र करते हुए ऐतराज़ भी कर सकते हैं और उससे सवाल भी पूछ सकते हैं और एक आदर्श ब्लागर उनके ब्लाग पर जाकर उनके सवालों का जवाब देता है और कभी यह नहीं कहता कि आप यह पोस्ट हटा लीजिए। लेकिन आप कह रही हैं कि मैं अपने ब्लाग से वह पोस्ट हटा दूं जिसमें आपको संबोधित किया गया है।
आख़िर क्यों ?
इस मामले में पूरे ब्लागिस्तान में मुझ से बड़ा आदर्श ब्लागर कोई दूसरा नहीं है। हां अगर आप न मानें तो यह मुसलमानों के खि़लाफ़ आपके तास्सुब को ही बेनक़ाब करेगा।
आप तो माडरेशन लगाए बैठी हैं कि लोग गाली देते हैं।
बहन जी, लोगों को रास्ता दिखाना कोई गुड्डे गुड़ियों का खेल समझा था आपने। आपको गालियां ही मिलेंगी इस रास्ते में और फिर भी हंसना होगा और दिखावटी तौर पर नहीं बल्कि दिल से। लोग आपको ज़लील करेंगे लेकिन आपको उनके लिए अपने रब से तन्हाई में दुआ करनी होगी। तब उनके दिल बदलेंगे, तब वे आपकी मुहब्बत को समझेंगे। जो लोग गालियां देेते हैं, अस्ल में काम के वही हुआ करते हैं, इस बात को दानिश्वर लोग समझते हैं, नादान नहीं। जो आदमी नफ़रत से भरा हुआ है, जब वह मुहब्बबत करता है तो उसकी मुहब्बत में दिखावा नहीं होगा, कभी विश्वासघात नहीं होगा। किसी मिशन को आगे बढ़ाने के लिए यही लोग पिलर्स का काम करते हैं।
आपको लोग गालियां देते हैं और आप उन्हें छापती नहीं हैं ये क्या ब्लागिंग हुई ?
अश्लीलता भरी टिप्पणियों को आप एक नारी होने के तौर न छापना चाहें तो कोई बात नहीं लेकिन यह क्या कि ठीक ठाक गालियां भी न छापी जाएं, इस तरह तो विरोध के स्वर ही दब जाएंगे, फिर विचार विमर्श क्या ख़ाक होगा ?
तब तो तारीफ़ करने वालों की भीड़ ही लगेगी। कोई आपको ‘ब्यूटी क्वीन‘ कहेगा और कोई ‘ब्यूटी विद ब्रेन‘ और आप खुश होकर उनका आभार मानेंगी। लेकिन आभार भी आप केवल हिंदुओं का ही मानती हैं मुसलमान का नहीं। आख़िर जब आपकी तारीफ़ मैंने की और ठीक ठाक अंदाज़ में की तो आप उखड़ क्यों गईं ?
एक मुसलमान की आलोचना समीक्षा तो ब्लाग जगत को गवारा है ही नहीं, उसके द्वारा अपने ब्लाग पर  तारीफ़ भी आपको गवारा नहीं ?
हक़ीक़त यह है कि आपने ब्लागिंग का स्तर ही गिरा दिया है। आपने तो न सिर्फ़ ब्लागर्स को चापलूसों की जमात में बदलकर रख दिया है बल्कि खुद ब्लागिंग के मक़सद को भी ध्वस्त कर दिया है।
आप बेशक अपनी विचारधारा का प्रचार करें और पूरे राष्ट्र से उसे अपनाने का आग्रह भी करें लेकिन फिर उस पर उठने वाले सवालों का स्वागत भी तो कीजिए । होना तो यह चाहिए कि उस विचारधारा पर कहीं भी कोई ऐतराज़ करे तो आप वहीं पहुंच जाएं और उसके सामने उसके पक्ष की कमज़ोरी उजागर करें जैसे कि मैं करता हूं लेकिन आप तो उस पोस्ट को भी हटाने के लिए कह रही हैं जिसमें आपकी विचारधारा का तो कोई विरोध है ही नहीं बल्कि पूरी पोस्ट ही आपकी तारीफ़ से भरी हुई है।
यह ब्लागिंग का कौन सा स्तर है, आप खुद विचार कीजिएगा।
कोई गाली ऐसी नहीं है जो इन सभ्य और हिन्दू कहे जाने वाले ब्लागर्स ने मुझे न दी हो। पढ़े लिखे लोगों ने, जवान प्रोफ़ैसर्स ने और बूढ़े इंजीनियर ने, हरेक ने मुझे अपने स्तर की स्तरीय और स्तरहीन गालियों से नवाज़ा। मुझे अश्लील गालियां तक दी गईं लेकिन मैंने हरेक को सहा और उन्हें बताया कि आप ग़लतफ़हमी और तास्सुब के शिकार हैं। उनकी दी हुईं गालियां मैंने आज तक अपने ब्लाग पर ऐसे सजा रखी हैं जैसे कोई ईनाम में मिले हुए मोमेन्टम्स को अपने ड्राइंग रूम में सजाता है।
आपमें से किसका दिल है इतना बड़ा ?
अगर आपका दिल इतना बड़ा नहीं है तो बंद कीजिए सुधार का ड्रामा।
‘सुधारक को पहले गालियां खानी होंगी, फिर वह जेल जाएगा और अंततः उसे ज़हर खिलाया जाएगा या उसे गोली मार दी जाएगी।‘
एक सुधारक की नियति यही होती है। जिसे यह नियति अपने लिए मंज़ूर नहीं है वह सुधारक नहीं बन सकता, हां सुधारक का अभिनय ज़रूर कर सकता है।
आप इस समय जिस अनवर जमाल को देख रही हैं। यह मौत के तजर्बे से गुज़रा हुआ अनवर जमाल है। देश की अखंडता की रक्षा के लिए मैं जम्मू कश्मीर गया और अकेला नहीं गया बल्कि अपने दोस्तों को लेकर गया। 325 लोगों का ग्रुप तो मेरे ही साथ था और दूसरे कई ग्रुप और भी थे और उनमें इक्का दुक्का हिन्दू कहलाने वालों के अलावा सभी लोग वे थे जिन्हें मुसलमान कहा जाता है।
जब मैं गया तो मुझे पता नहीं था कि मैं वापस लौटूंगा भी कि नहीं। मैंने अपने घर वालों को, अपने मां-बाप को तब ऐसे ही देखा था जैसे कि मरने वाला इनसान किसी को आख़िरी बार देखता है। अपनी बीवी से तब आख़िरी मुलाक़ात की और अपने बच्चों को यह सोचकर देखा कि अनाथ होने के बाद ये कैसे लगेंगे ?
अपनी बीवी से कहा कि तुम मेरी मौत के बाद ये ये करना और दोबारा शादी ज़रूर कर लेना। उस वक्त भी आपका यह भाई हंस रहा था और हंसा रहा था। सिर्फ़ आपका ही नहीं, जिसे कि बहन कहलाना भी गवारा नहीं है बल्कि चार सगी बहनों का भाई जिनमें से उसे अभी 2 बहनों की शादी भी करनी है। बूढ़े मां-बाप, मासूम बच्चे और जवान बहनें, आख़िर मुझे ज़रूरत क्या थी वहां जाने की ?
मैं मना भी तो कर सकता था।
… लेकिन अगर मैं मना करता तो फिर क्या मैं देशभक्त होता ?
जम्मू कश्मीर जाकर भी मैं केवल श्रीनगर में प्रेस वार्ता करके ही नहीं लौट आया जैसा कि राष्ट्रवादी नेता और उनके पिछलग्गू करके आ जाते हैं बल्कि हमारे ग्रुप ने कूपवाड़ा और सोपोर जैसे इलाक़ों में गन होल्डर्स की मौजूदगी के बावजूद आम लोगों के बीच काम किया, जहां किसी भी तरफ़ से गोलियां आ सकती थीं और हमारी जान जा सकती थी और पिछले टूर में जा भी चुकी थीं। हमला तो ग्रुप पर ही किया गया था लेकिन हमारे वीर सैनिक चपेट में आ गए और …
हरेक दास्तान बहुत लंबी है। यहां सिर्फ़ उनके बारे में इशारा ही किया जा सकता है। इतना करने के बाद भी न तो हमने कोई प्रेस वार्ता की और न मैंने उस घटना का चर्चा ही किया। मुझे मुसलमान होने की वजह से देश का ग़द्दार कहा गया और आज भी कहा जा रहा है।
एक झलक मैंने अपने फ़ोटो में दिखाई भी तो उसमें भी कश्मीरी भाईयों से एक अपील ही की कि वे ठंडे दिमाग़ से अपने भविष्य के बारे में सोचें।
… लेकिन अगर उत्तर प्रदेश के मुसलमान को भी आप ग़द्दार कहेंगे, अगर आप देश की अखंडता की रक्षा करने वाले मुसलमान को भी मज़हबी लंगूर और मज़हबी कौआ कहेंगे तो क्या वे लोग नेट पर मेरी दुर्दशा देखकर अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त हो पाएंगे ?
मुझे गालियां देने वाले इस देश, समाज और मानवता का अहित ही कर रहे हैं।
तब भी मैंने उनकी गालियां इस आशय से अपने ब्लाग पर व्यक्त होने दीं कि-
1. गाली देने वाले के मन का बोझ हल्का हो जाए जो कि शाखाओं में उनके मन पर मुसलमानों को ग़द्दार बता बता कर लाद दिया गया है। यह प्रौसेस ‘कैथार्सिस‘ कही जाती है। इसके बाद भड़ास निकल जाती है और आदमी ठीक ठीक सोचने की दशा में आ जाता है।
2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तक़ाज़ा भी यही है।
3. आदर्श ब्लागिंग भी यही चाहती है।
4. टिप्पणीकार भी यही चाहता है।
5. गाली देने के बाद आदमी को उसका ज़मीर बताता है कि उसने आवेश में आकर ग़लत काम कर दिया है। तब उसका ज़मीर उसे सही रास्ता दिखाता है और पेंडुलम की तरह उसकी भावनाएं दूसरे छोर तक जाती हैं। तब उसके दिल में पहले पश्चात्ताप जागता है और फिर वही भाव प्रेम में बदल जाता है।
6. गालियां देने वाले लोगों में काम के आदमी भी होते हैं और उनमें से कुछ देर-सवेर बदलते भी हैं। इसकी एक मिसाल मेरे भाई ‘मान जी‘ हैं। पहले वे भी मुझे गालियां देते थे। दूसरों की तरह उन्होंने भी मुझे ही नहीं बल्कि मेरे खुदा, मेरे रसूल, मेरे दीन-ईमान और मेरे तीर्थ को हर चीज़ को गालियां दीं लेकिन बाद में उन्हें अपनी ग़लती का अहसास हुआ और न सिर्फ़ उनका व्यवहार बदल गया बल्कि उन्होंने अपनी ग़लती भी मानी और उसके लिए माफ़ी भी मांगी।
अपनी ग़लती मानकर सार्वजनिक मंच से माफ़ी मांगना हिम्मत का काम होता है। मैंने किया है इसलिए जानता हूं जिन्होंने नहीं किया है जानते वे भी हैं। मान जी में हिम्मत थी तो उन्होंने ऐसा कर लिया। जिनमें इतनी हिम्मत नहीं है वे ऐसा नहीं कर पाए लेकिन अपने दिलों में जानते वे भी हैं कि
‘सबका मालिक एक है और उसके हुक्म के सामने समर्पण कर दो, उसकी आज्ञाा का पालन करके अपना लोक परलोक सुधार लो‘
ऐसा कहकर मैं कुछ भी ग़लत नहीं कर रहा हूं। समाज के चारित्रिक परिवर्तन और विकास के बिना कोई भी राजनैति परिवर्तन हमारे देश और हमारी दुनिया का कल्याण नहीं कर सकता। यह मेरा स्पष्ट मानना है जिसका इंकार कोई कर ही नहीं सकता।
हां, कोई और भाई-बहन लोगों के व्यक्तिगत और सामूहिक चरित्र के विकास के लिए दूसरी कोई विधि ज़रूर सजेस्ट कर सकता है। इसमें कोई हरज नहीं है। संवाद इसी का नाम है और ब्लागिंग को मैं संवाद के लिए ही यूज़ करता हूं।
मैं एक यूनिक हिन्दू ही नहीं हूं बल्कि यूनिक ब्लागर भी हूं। दूसरा कोई मुझ जैसा मिल जाए, थोड़ा मुश्किल है। मैं देशभक्त भी हूं और इसीलिए मुझे देशभक्तों की पहचान भी है। देशभक्त वह होता है जो ज़रूरत पड़ने पर देश की रक्षा के लिए अपनी जान देने के लिए पहुंच जाए, जैसे कि मैं पहुंचा जम्मू-कश्मीर।
आपको ऐतराज़ है कि मैंने आपकी तुलना देशभक्तों से क्यों नहीं की ?
आपकी तुलना देशभक्तों से करने का क्या तुक है ?
देश के लिए जान देने आप कहां गईं हैं बताइये ?
आपने देश के शिक्षण तंत्र का लाभ उठाकर पहले तो योग्यता अर्जित की और जब सेवाएं देने का नंबर आया तो आप विदेश जा बैठीं। ख़र्च किया देश ने और सेवाएं दे रही हैं आप विदेश में ?
क्या इसी का नाम है देशभक्ति ?
जो नारी अपनी सेवाएं तक देश के लोगों को न दे सके और विदेश जा पहुंचे तो उसे तो कृतघ्न न माना जाए इतना ही पर्याप्त है। आपको देशभक्तों की श्रेणी में रखेंगे वे लोग जो कि खुद देशभक्त नहीं हैं और आपके चापलूस हैं।
मैं न आपका चापलूस हूं और न ही आपका विरोधी। जो गुण आपमें है ही नहीं, उसे मैं आपके लिए नहीं स्वीकारता और जो गुण आपमें है, उसे मैं ऐलानिया मानता हूं।
आपने कहा है कि ‘जिसकी आंख में कीचड़ नहीं होता उसे हरेक औरत  मेनका की तरह रूपवान और गार्गी की तरह विदुषी ही दिखाई देती है।‘
आपने सच कहा है। मैं आपसे सहमत हूं। मुझे हरेक औरत मेनका की तरह रूपवान और गार्गी की तरह विदुषी ही दिखाई देती है इसीलिए मैंने आपको ऐसा समझा और कहा भी। मेरा कहना साबित करता है कि मेरी आंख में कीचड़ नहीं है लेकिन आपके दिमाग़ में जरूर कुछ है कि जिस बात से आप मेरी पाक दिली का अहसास करतीं, उसे आप बचकानापन बता रहीं हैं।
अगर आपको ‘मेनका की तरह रूपवान और गार्गी की तरह विदुषी‘ बताना ग़लत है तो फिर आप खुद क्यों ब्लाग जगत से पूछती हैं कि क्या उनके पास श्री कृष्ण जैसा मित्र है ?
जहां आपने यह सवाल पूछा था वहीं मैंने आपको ‘गार्गी की तरह विदुषी बताते हुए कहा था कि हां मेरे पास श्री कृष्ण जैसा सारथि और सखा है।
तब तो आपने ख़ुद को ‘गार्गी‘ बताए जाने पर कोई आपत्ति नहीं की थी तो फिर आज क्यों ?
आप खुद कह रही हैं कि आपको मेनका कहे जाने पर कोई आपत्ति नहीं है लेकिन
आपका मानना है कि आप मेनका जितनी सुंदर नहीं है।
मैं मान लेता हूं लेकिन क्या आप सुंदर नहीं हैं ?
अगर आप सुंदर हैं तो उपमा हमेशा उस चीज़ से दी जाती है जो कि उससे बड़ी हुआ करती है।
मां-बाप और गुरू की उपमा तो ईश्वर से दी जाती है हिंदू साहित्य में। क्या मां-बाप और गुरू वास्तव में ही ईश्वर होते हैं ?
अलंकारों को उसी रूप में न समझा जाए जो कि वक्ता का अभिप्राय है , तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। लिहाज़ा आप अपनी सोच को दुरूस्त करें। मेरा कहा हुआ ठीक है।
मैं वही कहता हूं जो कि मैं मानता हूं। आप कहती हैं कि आप ‘गार्गी की तरह विदुषी‘ नहीं हैं। आप झूठ बोलती हैं।
गार्गी में ऐसा क्या ख़ास था जो कि आपमें नहीं है ?
आदि शंकराचार्य एक सन्यासी थे। उन्होंने गार्गी के पति को शास्त्रार्थ में हरा दिया, तब गार्गी ने शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया और उसने शंकराचार्य को घेर कर उस क्षेत्र में ले गई जिसका कोई अनुभव शंकराचार्य जी को न था। ‘काम अर्थात सैक्स‘ के बारे में एक ब्रह्मचारी को कोई अनुभव नहीं होता लिहाज़ा शंकराचार्य को उसके सामने चुप होना पड़ा। बस यही ख़ास था गार्गी में, बाक़ी विद्वान पति के संग रहने से दर्शन साहित्य की समझ उसमें थी और यह आज भी ऐसे पतियों की पत्नियों आ जाती है।
गार्गी एक गृहस्थ महिला थी, इसलिए काम विद्या में निपुण थी। आप भी एक विवाहित महिला हैं। ऐसी कौन सी बात है जो कि सैक्स के संबंध में गार्गी को तो पता थी लेकिन आप उससे अन्जान हैं ?
मैंने आपको गार्गी की तरह विदुषी कहा है तो ठीक ही कहा है।
अब मैं कहता हूं कि गार्गी का ज्ञान आपके सामने कम था।
सैक्स के बारे में गार्गी का ज्ञान केवल उसके व्यवहारिक पक्ष तक सीमित था जबकि आप उसके बायोलोजिकल पक्ष को भी जानती हैं और इतना अच्छा जानती हैं कि गार्गी के समय में कोई वैद्य भी इतना न जानता था जितना कि एक डाक्टर होने के कारण आप जानती हैं। तब भला बेचारी गार्गी तो क्या जानती ?
इस विषय में आपने जो लेख लिखे हैं, ऐसा कोई लाभकारी साहित्य भी गार्गी छोड़कर नहीं गई है, जबकि आपके लेख लंबे समय तक लोगों को लाभ पहुंचाते रहेंगे। गार्गी बस एक मामले में आपसे बढ़ी हुई है और वह यह है कि उसका शास्त्रार्थ आदि शंकराचार्य से हुआ और आपका महफ़ूज़ भाई जैसे लोगों से ही हो पाया। लेकिन उस नुक्सान की भरपाई किसी हद तक करने के लिए मैं हाज़िर हूं। मैं शंकराचार्य तो नहीं हूं लेकिन जिस धार्मिक-आध्यात्मिक क्षेत्र के वे विद्वान थे मैं भी उसी क्षेत्र का एक विद्यार्थी हूं। हैसियत तो ज़रूर उनसे कम है लेकिन हूं उसी क्षेत्र से और यह भी केवल दुनियावी शोहरत के ऐतबार से है वर्ना तो हो सकता है कि मेरी आत्मिक हैसियत उनसे ज़्यादा हो। इनसान की असली हैसियत तो उसका मालिक ही निर्धारित करता है। तब तक आपको और मुझे केवल इंतज़ार करना होगा, मरना होगा।
आपने अमरेंद्र का ज़िक्र किया।
उसके नाम में ‘इंद्र‘ शब्द जुड़ा हुआ है और इंद्र ‘मेनका‘ के बिना रह नहीं सकता। उसे भी आप मेनका दिखी होंगी तभी वह आपके पीछे लगा होगा और ‘अमर‘ होने के बावजूद वह आप पर ‘मर मिटा‘। इसमें ग़लती किसकी है और कितनी है ?
इस पर बहुत बातें हो चुकी हैं। उन्हें यहां दोहराना फ़िज़ूल है और मेरा उद्देश्य आपकी गरिमा पर चोट करना है भी नहीं। आपने ज़िक्र उठाया तो इसलिए याद दिलाना ज़रूरी है कि उस पचड़े में भी ‘ब्लाग संसद‘ पर हुई बहस में मैंने आपका ही साथ दिया था और उसी समय से मैंने आपको जाना भी था। आज भी मैं आपके साथ हूं, हरेक बहन के साथ हूं।
इसके बावजूद मैं अमरेंद्र को एक सीधा आदमी मानता हूं क्योंकि लोग कहते हैं कि वह इतना सीधा है कि सीधा शब्द भी उनके सामने टेढ़ा पड़ जाता है। उसकी प्रतिभा को भी आप स्वीकार कर चुकी हैं।
भाषा और साहित्य में निपुण होने का मतलब कभी चारित्रिक रूप से श्रेष्ठ होना हुआ ही नहीं करता। इसलिए आप उसकी कमज़ोरी को आधार बनाकर उसकी साहित्यिक प्रतिभा पर अनुचित रूप से प्रश्नचिन्ह मात्र अपनी रंजिश के कारण लगा रही हैं। बल्कि हिन्दी साहित्य या किसी भी भाषा का श्रृंगार प्रधान साहित्य अक्सर उसी काम की प्रेरणा देता है जो कि अमरेंद्र ने अपने सीधे होने के बावजूद किया। उसका आचरण एक सच्चे राजयोगी का चाहे न हो लेकिन एक सच्चे साहित्यकार का ज़रूर है। चोट खाए बिना कोई कालिदास बना हो तो बताइये। अमरेंद्र की वेदना को भी इसी नज़र से देखा जाना चाहिए।
जब मेनका को देखकर विश्वामित्र मोहित हो गए और आज तक किसी ने उन्हें लांछित नहीं किया तो फिर अमरेंद्र के चरित्र पर ही आपको क्यों शर्म आ रही है ?
वह बेचारा तो कोई तपस्वी भी नहीं है।
मैंने आज तक बेचारे अमरेंद्र का ब्लाग नहीं देखा है और न ही उससे कोई टिप्पणी ही पाई है। तब भी मैं वही कहूंगा जो कि न्याय की दृष्टि से कही जानी चाहिए।
वह पोस्ट लिख रहा है तो अपने अतीत को ही तो संजो रहा है और उसे इसका हक़ है। ब्लागिंग का मक़सद ही यही है। आपको कोई ऐतराज़ है तो आप उसे टिप्पणी देकर ज़ाहिर कर सकती हैं। आपको भी अपना नज़रिया रखने का पूरा हक़ है।
मैं नहीं समझता कि अमरेंद्र प्रचार पाने के मक़सद से यह सब कर रहा है। वह खुद ब्लाग जगत की एक ऐसी हस्ती है जिसे पढ़ना ही नहीं बल्कि उसका ज़िक्र करना भी स्थापित ब्लागर्स तक अपने लिए गौरव की बात समझते हैं। जनाब सतीश सक्सेना साहब की पोस्ट और उस पर आये बहुत से ब्लागर्स के कमेंट्स इसका सुबूत हैं। और न ही मुझे प्रचार के लिए आपके नाम का सहारा लेने की ज़रूरत है। मैं खुद ब्लाग जगत का एक ऐसा फ़र्द हूं जिसे हरेक पुराना हिंदी ब्लागर ज़रूर जानता है। अगर आप किसी ब्लागर के सामने मेरा नाम लें और वह मुझे नहीं जानता तो आप समझ लीजिए कि या तो यह नया है या फिर यह एक्टिव ब्लागर ही नहीं है। मेरे 4 ब्लाग्स पर मौजूद लगभग 6 हज़ार टिप्पणियां यह बताने के लिए काफ़ी हैं कि ब्लाग जगत मेरे नाम और मेरे ‘अमन के पैग़ाम‘ से ख़ूब वाक़िफ़ है। अब आप अपने डैडी की गोद में सू सू नहीं करतीं और मैंने तो ख़ैर कभी किया ही नहीं, यह बात ‘शेखर सुमन जी‘ से ज़्यादा ख़ुद आपको समझने की ज़रूरत है।
जब किसी की प्रेम नौका किनारे तक पहुंचने से पहले ही मंझधार में फंस जाती है तो फिर वह डूबकर मरता हुआ आशिक़ थोड़ी देर हाथ पैर भी मारता है और किनारे पर खड़े लोगों से फ़रियाद भी करता है। आपको जिस आदमी पर ‘शर्म‘ आ रही है, उसी आदमी पर मुझे तरस आ रहा है। अपना अपना नज़रिया है। आप यक़ीन कीजिए वक्त उसके ज़ख्म को न सिर्फ़ भर देगा बल्कि उसके ज़ख्म को एक ऐसा गुलाब बना देगा जो उसकी ज़िंदगी को हमेशा महकाता रहेगा।
नए साल के मौक़े पर उस बेचारे आशिक़ के लिए मैं यही दुआ करता हूं और यह एक ऐसी दुआ है जो कि स्वीकार कर ली गई है। यह ख़बर भी मैं आपको पेशगी दे रहा हूं।
मेरी शख्सियत के केवल उन्हीं पहलुओं को आप जानती हैं, जो कि खुद मैंने आपके सामने रखे हैं जबकि  मेरा हरेक पहलू अभी आपके सामने नहीं आया है।
आपने जनाब अरविंद मिश्रा जी का भी ज़िक्र किया है और कहा है कि मैंने आपसे उनके बारे में राय मांगी थी। इतना कहकर आपने उनकी बुराई शुरू कर दी। मैंने आपसे उनके कथन आदि के बारे में राय नहीं मांगी थी बल्कि उनके इस नज़रिये के बारे में राय मांगी थी कि वे मुझे अपने ज़हन की खिड़कियां खोलने की सलाह दे रहे हैं। तब मैंने ब्लागर्स से पूछा था कि क्या आपको लगता है कि मेरे ज़हन की खिड़कियां बंद हैं जबकि मैं दूसरे पहलुओं के साथ ग्लैमर की दुनिया का हिस्सा भी हूं ?
जो राय आपने यहां दी है। उसे भी आपने वहां न दिया और पूछे गए सवाल का उत्तर दिए बिना आप ‘नाइस पिक्चर्स‘ कहकर लौट आईं।
मिश्रा जी ने आपको क्या कहा ?
मैंने यह नहीं पूछा था और न ही श्री अरविंद मिश्रा जी के व्यक्तित्व की आलोचना ही मुझे दरकार थी। आप उनके नज़रिए की समीक्षा करतीं तो ज़्यादा बेहतर होता। इसी के लिए मैंने आपको पुनः आमंत्रित किया था कि हो सकता है कि आप वहां पहुंचकर अपनी क़ीमती राय मुझे दे सकें।
उनके नज़रिये की आलोचना के बावजूद मैं खुद को उनसे छोटा मानता हूं और उन्हें अपने लिए आदरणीय। उनके नज़रिये से असहमत होने के बावजूद उनका आदर सम्मान किया जा सकता है और किया जाना चाहिए। हमारा नज़रियाती इख़तेलाफ़ एक दूसरे को आदर देने में या किसी नेक काम की सराहना करने में कभी बाधक नहीं होना चाहिए।
मैं किसी भी आदमी से नाराज़ नहीं होता क्योंकि किसी भी आदमी की सारी बातें कभी ग़लत नहीं हो सकतीं। उसकी दो चार या दस बातें ग़लत हैं तो एक हज़ार बातें सही भी हो सकती हैं। आख़िर वह हमारा भाई है या हमारा बड़ा है और उसे प्यार देना, उसका सम्मान करना हमारा फ़र्ज़ है। अगर हमें उससे प्यार है तो हमें चाहिए कि हम उसे बता दें कि ये बात ग़लत है, आपके लिए शोभनीय नहीं है। वह आज छोड़े या कल छोड़े, यह उस पर छोड़ दीजिए लेकिन आप उसका सम्मान करना मत छोड़िए, खुद उस आदमी को मत छोड़िए। अगर आपने उसे छोड़ दिया तो फिर आपने उसके सुधार का दरवाज़ा ही बंद कर दिया। दरवाज़े बंद करना मेरा काम नहीं है, आपका भी नहीं होना चाहिए। जीते-जी ये लोग प्रेम को नहीं समझेंगे तो मेरी मौत के बाद तो समझ ही जाएंगे और यह लेख तब भी आज की तरह ही ताज़ा रहेगा बल्कि आज से ज़्यादा उपयोगी और सार्थक हो जाएगा। अंत में सत्य ज़रूर प्रकट होता है। बेवक़ूफ़ आज कोई भी नहीं है। हां, लोग अभिनय करते हैं ताकि दूसरे की हिम्मत तोड़कर उससे जान छुड़ा सकें। लेकिन दरअस्ल यही लोग तो ज़रिया बनते हैं निष्पक्ष लोगों के लिए सही फ़ैसले तक पहुंचने का। जो निष्पक्ष होगा वह सत्य को पा लेगा और जो एंटरटेनमेंट के जुगाड़ में है, उसका दिल बहल जाएगा।
मैं दोनों तरह तैयार हूं। मेरी मज़ाक़ उड़ाने वाले भी मेरे काम ही आते हैं। मेरे पाठकों का और ख़ुद मेरा भी मनोरंजन ही करते हैं। कभी मैं ज़ाहिर करता हूं कि वाक़ई मैं उनसे बहुत परेशान हूं और वे समझते हैं कि मेरी दुखती रग उनके हाथ आ गई है और तब वे मुझे परेशान देखने के लिए टिप्पणियों का ढेर लगा देते हैं। उन्हें ख़ुश देखना मेरा मक़सद है। मुझे बुरा कहकर वे ख़ुश हो सकते हैं तो मुझे अच्छा लगता है। जब ब्लागिंग शुरू की तब अच्छा नहीं लगता था लेकिन अब लगता है।
आपने भाई और भतीजों के ईमान एक टिप्पणी की ख़ातिर बिकते देखे हैं। इसलिए आप चाहती हैं कि मैं आप को बहन कहकर दिखावा न करूं।
लेकिन आपने तो बीवियों को और माशूक़ाओं को भी बेवफ़ाई करते देखा होगा। क्या आपके देखने भर से या ऐसी घटनाओं के घटित होने के बाद लोगों का ऐतबार विवाह के पवित्र बंधन से उठ गया है ?
क्या मर्दों ने अब औरतों से प्यार करने से मुंह फेर लिया है ?
क्या अब लोगों ने औरतों से कह दिया है कि मुझे ‘साजन‘ और ‘हसबैंड‘ कहने का दिखावा न करो , मैंने बहुत औरतों को बेवफ़ाई करते हुए देखा है।
समाज में तलाक़ की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं लेकिन फिर भी लोग विवाह करते हैं। बल्कि तलाक़ ही तब मुमकिन है जबकि पहले विवाह हुआ हो। विवाह से भी और तलाक़ से भी दोनों ही चीज़ों से पता चलता है कि लोगों का विश्वास किसी भी बेवफ़ाई से कभी नहीं टूटता। जो लोग अपनी आत्मा में सच्चे होते हैं वे दूसरों पर भी विश्वास करते हैं।
हां, इतना ज़रूर है कि दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक कर पीता है लेकिन पीता ज़रूर है। दूध से जलने के बाद भी कोई पीना नहीं छोड़ देता, सिर्फ़ अपनी लापरवाही छोड़कर सतर्क हो जाता है। ग़लतियां यही सिखाती भी हैं। किसी एक से धोखा खाने के बाद सारे संसार से ही अपना विश्वास उठा लेने वाले नर-नारी भावनात्मक असंतुलन का शिकार हुआ करते हैं।
ऐसी कोई कमी मैं आपके अंदर नहीं देखना चाहता। इसलिए कृप्या आप इस पर विचार-सुधार कीजिएगा।
अगर मैं आपको बहन कहता हूं तो आपको बहन मानता भी हूं। काफ़ी समय से आपके ब्लाग पर मेरी टिप्पणियां प्रकाशित हो रही हैं। माडरेशन के बाद भी वे ऐसे ही प्रकाशित हो रही हैं जैसे कि वे पहले प्रकाशित होती थीं। दूसरे ब्लागर भाई बहिनों के साथ आपको भी मैं अपने आर्टिकल्स का लिंक जब-तब भेजता रहा हूं और निमंत्रण पाकर आप आती भी रही हैं।
क्या कभी आपने मेरे सार्वजनिक या एकान्तिक व्यवहार में कोई दोष पाया है ?
क्या कभी आपने अपने प्रति सम्मान में कोई कमी पाई है ?
यदि नहीं पाई है तो फिर आप क्यों कह रही हैं कि मुझे बहनों का सम्मान करना सीखना चाहिए ?
ऐसा कहकर आप अपने रीडर्स पर यह ज़रूर ज़ाहिर कर रही हैं कि मुझे बहनों का सम्मान करना नहीं आता। आपका यह कथन अनुचित भी है और मुझपर एक तरह से आक्षेप भी। आप बताइये कि आपको एक बहन के तौर पर सम्मान देने में कब और कहां कमी रह गई है ताकि मैं अपनी ग़लती सुधार सकूं ?
अन्यथा प्रमाण के अभाव में आपका वक्तव्य केवल यह साबित करेगा कि आपको न तो आदमियों की पवित्र भावनाओं की पहचान है और न ही आपको उनकी क़द्र करना आता है।
मैं आपको बहन कहता हूं क्योंकि मैंने रामपुर के एक आचार्य मौलाना को ऐसा करते हुए देखा है। वे एक संत आदमी थे और उनके साथी भी एक अच्छे चरित्र के मालिक हैं। ‘बिंदास बोलने वाले‘ भाई रोहित भी उनसे मिल चुके हैं। वे भी इस तथ्य की पुष्टि कर सकते हैं। मैं उन जैसा तो नहीं बन सका लेकिन उनसे जो थोड़ी बहुत अच्छी बातें मैंने सीखी हैं, उनमें से एक यह भी है कि औरतों से बात करो तो बहन और बेटी कहकर बात करो। वे खुद भी ऐसा ही करते थे।
मैंने पाया है कि यह तरीक़ा अपनी भावनाओं को पवित्र रखने के लिए असरदार है। हम जो कुछ बोलते हैं वह हमारे दिमाग़ से निकलता है और कानों के ज़रिये फिर से दिमाग़ तक पहुंचता है। जब हम कोई पवित्र शब्द बोलते हैं तो बारम्बार दिमाग़ से पवित्रता के भाव निकलते हैं और वापस भी पवित्र विचार ही पहुंचते हैं। जो काम हम बारम्बार करते हैं वह हमारी आदत बन जाती है और जो विचार हम बारम्बार दोहराते रहते हैं, वह हमारे मन में रूढ़ हो जाता है। मेरे मन में पवित्रता का भाव स्थायी हो जाए। इसीलिए मैं अपनी भाव शुद्धि के लिए आपका नाम लेने से पहले बहन शब्द का इस्तेमाल करता हूं और केवल आपके लिए ही नहीं करता बल्कि हरेक महिला ब्लागर के लिए ऐसा ही करता हूं। आज तक किसी ने आपत्ति नहीं की कि मैं उन्हें बहन कहकर क्यों संबोधित करता हूं ?
आप पहली महिला ब्लागर हैं जो बहन कहे जाने पर आपत्ति कर रही हैं।
अमरेंद्र आपको बहन नहीं मानता, उस पर भी आपको ऐतराज़ है और मैं आपको बहन मानता हूं और कहता भी हूं, इस पर भी आपको ऐतराज़ है। दिमाग़ तो ठीक है आपका ?
आख़िर आप चाहती क्या हैं ?
जब आपको इस बात पर ऐतराज़ नहीं है कि मैं आपको बहन मानता हूं तो फिर आप मेरे द्वारा बहन कहे जाने पर ऐतराज़ क्यों कर रही हैं ?
अपनी विवाहित स्त्री के अलावा तमाम स्त्रियों को उनकी आयु के अनुसार माता और बहिन कहना तो हमारी भारतीय संस्कृति है जिसकी प्रेरणा हमारे पूर्वजों ने भी दी है और हमारे बड़े आज भी देते हैं। ‘बहिन‘ कहे जाने पर ऐतराज़ करके आप भारतीय संस्कृति पर ही चोट कर रही हैं। विदेश में रहने का मतलब यह तो नहीं होना चाहिए।
मैं आपको बहन कहता ही रहूंगा, आपके ऐतराज़ के बावजूद भी। आपको इस बात पर ऐतराज़ है तो मत छापिए मेरी टिप्पणी अपने ब्लाग पर। कह दीजिएगा कि आप मुझे बहन कह रहे थे लिहाज़ा मैंने नहीं छापी आपकी टिप्पणी।
अभी जनाब सतीश सक्सेना साहब ने एक हमउम्र बहन को मां कह दिया। जिसके संबंध में उन्होंने ‘मां‘ शब्द का इस्तेमाल किंया, उसे तो बुरा नहीं लगा लेकिन एक ‘बोल्ड‘ औरत खुद ही बोल्ड हो गई और लिख मारी एक पूरी पोस्ट इसी बात पर कि हमउम्र औरत को ‘मां‘ क्यों कहा ?
जी हां, रचना बहन जी की बात कर रहा हूं। ये इतनी बोल्ड हैं कि अपने मुंह से खुद सतीश जी के ब्लाग पर कह रही हैं कि कहने वाले तो यह भी कह सकते हैं कि रात में रचना सतीश के साथ देखी गई।
ये है इनकी मानसिकता। जो बात किसी ने कही नहीं, उस बात की कल्पना अपने मन में कर ली और सार्वजनिक रूप से कह भी दी। खुद अपने बारे में ऐसी बात भी कह देंगी जो कि कालगर्ल के बारे में कही जाती है और कोई दूसरा आदमी उन्हें नहीं बल्कि किसी अन्य औरत को ‘मां‘ कह दे तो उस पर ऐतराज़ जताएंगी। वे भी ख़ुद को राष्ट्रवादी शो करती हैं और आप भी। उन्हें ‘मां‘ कहे जाने पर आपत्ति है और आपको ‘बहन‘ कहे जाने पर। इस मामले में केवल आप दो राष्ट्रवादिनियां ही एक जैसी हैं या दीगर राष्ट्रवादिनियां भी आपसे सहमत हैं ?
मेरा ख़याल है कि आप दो से कोई तीसरा इस मामले में सहमत नहीं है। आप दोनों को ही विदेशी हवा लग गई है। तभी आप मां और बहन के पवित्र संबोधन पर भी आपत्ति जता रही हैं। रचना जी भी विदेशों में जाने क्या-क्या करके आई हैं और आप तो रहती ही विदेश में हैं ?
अपनी राष्ट्रीय संस्कृति की पवित्रता को तिलांजलि देकर भी आपका राष्ट्रवाद अक्षुण्ण बना रहता है।
वाह, बहुत ख़ूब।
दरअस्ल आप लोगों का कोई उसूल है ही नहीं। बस एक तास्सुबी गुट है आप लोगों का। आप यह नहीं देखते कि ‘क्या कहा जा रहा है ?
बल्कि आप यह देखते हैं कि कहने वाला अपने गुट का है या नहीं ?
अगर अपने गुट का है तो फिर वह कुछ भी कहता रहे, उसके राष्ट्रवाद पर आंच आने वाली नहीं है।
आप खुद देख लीजिए, किसी ने आपको टोका तक नहीं है।
सुधार, मूल्य और नैतिकता से जैसे आपको कोई वास्ता ही नहीं है।
जब आप मेरी बहन हैं तो आपको मेरे द्वारा बहन कहे जाने पर आख़िर आपत्ति क्यों है ?
आप खुद कह रही हैं कि
‘भारत में विश्व बंधुत्व है। इसलिए आप हों या कोई और हो वह भाई समान ही है।‘
जब आप मुझे अपना भाई स्वीकार कर रही हैं तो फिर आप क्यों चाहती हैं कि मैं अपनी बहन को बहन न कहूं ?
आपने कहा कि
‘मेरे नाम के आगे बहिन लगाकर किसी को मेरा रिश्तेदार बनने की ज़रूरत नहीं है।‘
मैं आपका रिश्तेदार नहीं बन रहा हूं और न ही मैं पहला आदमी हूं जिसने आपको बहन कहा है। मुझसे पहले बहुत लोग आपको बहन कह चुके हैं। आपने किसी से ऐसा नहीं कहा जैसा कि आप मुझसे कह रही हैं। बहुत लोगों ने आपकी सुंदरता और अक्लमंदी की तारीफ़ की है , आपकी हरेक पोस्ट पर ऐसी टिप्पणियां मौजूद हैं, आपने सभी का आभार माना लेकिन वही बात जब मैंने कही तो आप मेरा आभार तो क्या मानतीं, उल्टे आप नाराज़ हो गईं।
ऐसा क्यों ?
ये दो पैमाने क्यों ?
एक ही काम के लिए दूसरों का आभार मानना और मुझ पर ऐतराज़ धर देना।
आपकी पोस्ट पर मुझे आपसे एक सवाल पूछना था।
जिसके लिए मैंने आपसे अनुमति मांगी थी।
जब तक आपने अनुमति नहीं दी तब तक मैंने आपसे उसे अपने ब्लाग पर पूछा भी नहीं।
मुझ जैसी शिष्टता भी आपको कम ही मिलेगी।
अब चूंकि आपने सवाल पूछने की इजाज़त दे दी है तो कृपया यह बताइये कि
1. आपका कहना है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी देश के लिए ख़तरा हैं।
2. आप कहती हैं कि हिंदू होकर हिंदुओं का अपमान करना गुनाह है।
3. आप कहती हैं कि ‘हमारे देश की अंधी , गुलाम और चापलूस जनता क्या वोट दे देगी ग़द्दार कलियुगी विभीषणों को ?

क- आप खुद कह रही हैं कि हमारे देश की जनता अंधी, गुलाम और चापलूस है। अंधा आदमी तो अंधेपन के ही काम करेगा और अगर वह चापलूस और गुलाम भी है, तब तो सौ फ़ीसद वह ग़लत चुनाव ही करेगा। अगर आप देश की जनता को अंधा, गुलाम और चापलूस मानती हैं तो फिर आप किस आधार पर उम्मीद करती हैं कि आने वाले समय में देश की जनता केंद्र में सही नेता को देश की बागडोर सौंपे ?
ख- आप ख़ुद देश की जनता को अंधा, गुलाम और चापलूस कहकर हिंदुओं का अपमान कर रही हैं। क्या आप ख़ुद को गुनाहगार नहीं मानतीं ?
ग- गुनाहगारों को आप देश से निकाले जाने की बात कह रही हैं और निकली ख़ुद बैठी हैं। जिन्हें आप निकाले जाने के लायक़ मानती हैं, वे तो देश में हैं और आप खुद विदेश में जबकि आप खुद को देशभक्त मानती हैं ?
घ- जब हमारे देश से देशभक्त लोग करिअर के लिए विदेश भाग जाएंगे, तब देश स्वतः ही ऐसे लोगों को बोलबाला हो जाएगा, जिनका कि नहीं होना चाहिए। अगर आज देश ग़लत हाथों में है तो इसके लिए आप जैसे लोगों का विदेश पलायन भी एक बड़ा कारण है।
ड- आप जैसे लोग विदेश चले तो जाते हैं लेकिन उनका मन हमेशा भारत में ही पड़ा रहता है। आप कभी उस देश के हितों के बारे में उस तरह सोच ही नहीं पाते जैसे कि भारत के बारे में सोचते रहते हैं और भारत के लिए कर कुछ पाते नहीं , सिवाय ख़ाली-पीली की भड़काऊ भाषणबाज़ी के। आप न घर के रहते हैं और न ही कभी घाट के हो पाते हैं। भारत की चिंता हम पर छोड़ दीजिए और जिस देश का नमक-पानी खा पी रही हैं, जहां आप अपनी सेवाएं देकर माल समेट रही हैं, उसके लिए कुछ ऐसा कीजिए जैसा कि आप भारत के लिए करना चाहती हैं। जिस देश में आपका शरीर परवान चढ़ रहा है और आपका रूतबा बुलंद हो रहा है। उसे बुलंद करने के बारे में सोचिए और भारत के लिए अच्छा काम करने वालों को सपोर्ट दीजिए। इस तरह आप उस देश का भला करने के साथ भी उस देश का भला कर सकेंगी।
च- विदेशों के प्रति आस्थावान होने का जो इल्ज़ाम मुसलमानों के सर मढ़ा जाता है। उसी जुर्म के दोषी हिंदू कहलाने वाले आप सभी प्रवासी भारतीय भी हैं। आपका दिल क्यों उस देश में नहीं टिकता जो कि आपको खाना-कपड़ा ही नहीं दे रहा है, आपका रूतबा भी बुलंद कर रहा है।
छ- ऐसा करके आप जैसे प्रवासी उस देश से ग़द्दारी करते हैं जिसमें कि वे रहते हैं और भारत से पलायन करके तो पहले ही वे ग़द्दारी कर चुके होते हैं। ऐसे ग़द्दारों की एक पूरी फ़ौज विश्व भर में फैली हुई है और इस पर तुर्रा ये कि अपने देश पर मर मिटने वाले मुसलमानों पर ग़द्दारी का शक करके खुद को देशभक्त सा ज़ाहिर करते हैं। इनसे चंदे लेने के लिए देश के अंधे, गुलाम और चापलूस लोग इनकी हां में हां मिलाते हैं।
ज- मुझ जैसा साफ़ कहने वाला आदमी जब इनसे सवाल करने करने की अनुमति चाहता है तो कहते हैं कि हमारे ब्लाग पर ही सवाल कर लीजिए। सवाल छोटा सा हो तो टिप्पणी बाक्स में किया जा सकता है। लेकिन बात कुछ लंबी हो तो फिर अपने ही ब्लाग का आसरा लेना पड़ता है।
ण- इसके बावजूद भी इस देश का मुसलमान आपको कभी ग़द्दार नहीं कहेगा क्योंकि वह जानता है कि अपनी मिट्टी से जुड़ाव, अपने तीर्थ से जुड़ाव स्वाभाविक है। वह महसूस करेगा कि आप अपने वतन से दूर रहकर कितना भी अच्छा खा-कमा लें लेकिन फिर भी आपको जो संतुष्टि अपने देश की छाछ-रोटी में मिलेगा वह आपको पिज़्ज़ा-बर्गर में कभी नहीं मिलेगा। मुसलमान आपको कभी इल्ज़ाम नहीं देता और न ही कभी देगा। आप भी मुसलमानों को बिना बात इल्ज़ाम देने की आदत से बाज़ आईये।
त- आपका दावा है कि आप साफ़ साफ़ बात कहती हैं। आपको साफ़ साफ़ सुनने की आदत भी होगी और अगर नहीं है तो प्लीज़ डाल लीजिए। साफ़ साफ़ कहना हर वह आदमी जानता है जो कि अंधा, गुलाम और चापलूस नहीं है। आपके ब्लाग का स्क्रीन शाट महफ़ूज़ कर लिया गया है इसलिए कृपया अपने मज़मून में कोई एडिटिंग न करें और न ही कोई टिप्पणी डिलीट करने की बचकानी कोशिश करें।
थ- आपने देश की जनता को अंधा, गुलाम और चापलूस कहा है। देश की जनता में तो हिंदू भी हैं जो कि भगवा का सम्मान करते हैं और उनके आध्यात्मिक गुरू भी जो कि पवित्र भगवा रंग के लिबास में ही रहते हैं और उसी का प्रचार करते हैं। आपके कहे के मुताबिक़ तो वे सभी अंधे, गुलाम और चापलूस हैं।
क्या यह भगवा रंग का और उसे धारण करने वालों का अपमान नहीं माना जाएगा ?
द- कुछ हिंदू आध्यात्मिक गुरू और मठ तो खुलकर कांग्रेस का समर्थन करते हैं। क्या उन्हें मात्र इस कारण अंधा मान लिया जाए कि वे कांग्रेस समर्थक हैं ?
ध- आपकी बात के लपेटे में आकर भी भगवा रंग और भगवाधारियों का अपमान हो रहा है। हालांकि आपसे अन्जाने और आवेश में ऐसा हो रहा है। कृपया अपने कथन पर विचार करें। आप कांग्रेस का विरोध करना चाहती हैं तो ज़रूर करें। मैं कांग्रेस का दीवाना हरगिज़ नहीं हूं। इस संबंध में मेरे राजनैतिक विचार क्या हैं ? भाई मान जी को भी अवगत करा चुका हूं लेकिन आपसे यही चाहता हूं कि जिस गुनाह का इल्ज़ाम आप सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर धर रही हैं, कम से कम आप खुद तो उस गुनाह की गुनाहगार न बनें।
बातें तो अभी कुछ और भी हैं लेकिन इस लेख को पोस्ट करना ही अब मुनासिब होगा क्योंकि नया साल बिल्कुल क़रीब आ लगा है।
आइये आप हम सब अपने मालिक से दुआ करें कि

‘इहदिनस्सिरातल मुस्तक़ीम. सिरातल्-लज़ीना अनअमता अलैहिम, ग़ैरिल मग़ज़ूबि अलैहिम वलज़्ज़ाल्लीन‘
    -अलकुरआन, अलफ़ातिहा

‘दिखा हमको सीधा रास्ता. रास्ता उन लोगों का जिन पर तेरा ईनाम हुआ, जिन पर न तो तेरा कोप हुआ और न ही जो राह से भटके.‘
अब हम इसी भाव को वेद के पवित्र शब्दों में दोहराएंगे

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान विश्वानि देव वयुनानि विद्वान।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमऽउक्तिं विधेम ।।
                  -यजुर्वेद 40, 16

हे सुख के दाता स्वप्रकाशस्वरूप सब को जाननेहारे परमात्मन् ! आप हम को श्रेष्ठ मार्ग से संपूर्ण प्रज्ञानों को प्राप्त कराइये और जो हम में कुटिल पापाचरणरूप मार्ग है उस से पृथक कीजिए। इसीलिए हम लोग नम्रतापूर्वक आपकी बहुत सी स्तुति करते हैं कि हम को पवित्र करें।
‘वेद कुरआन के एकत्व‘ को जानकर हम सभी भाई-बहनों को एक हो जाना चाहिए और नफ़रत की हरेक बेबुनियाद दीवार को गिराकर सारे विश्व के लोगों को एक परिवार की तरह एक दूसरे के लिए परस्पर कल्याणकारी बन जाना चाहिए। तब न तो कोई राजनैतिक सीमा और न ही कोई दूसरी सीमा एक इंसान को दूसरे इंसान से दूर करेगी। दूरियों को मिटाने के उद्देश्य से ही यह संवाद आपसे किया जा रहा है
‘गार्गी जैसी विदुषी और मेनका जैसी संुदर मेरी प्यारी परदेसी बहना‘
दुआ और एक प्यार भरे संबोधन के साथ मैं पोस्ट का ‘द एंड‘ करता हूं। उम्मीद है कि थोड़ा झुंझलाने के बाद आप मुस्कुराकर मुझे क्षमा कर देंगी।
मालिक आपको हरेक ख़ुशी दे इस दुनिया में भी और उस दुनिया में भी और ऐसा ही मालिक मेरे साथ भी करे और हर उस आदमी के साथ करे जो मेरा और आपका ब्लाग ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ता है या कम पढ़ता है या सिरे से पढ़ता ही नहीं है।
वंदे श्वम्



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>इस बहादुर विधवा की दर्दनाक आपबीती से मनमोहन सिंह की नींद उचाट नहीं होती… Manmohan Singh, Hindu Widow, Haneef Case, Australian, Saudi Government

>आप सभी को याद होगा कि किस तरह से ऑस्ट्रेलिया में एक डॉक्टर हनीफ़ को वहाँ की सरकार ने जब गलती से आतंकवादी करार देकर गिरफ़्तार कर लिया था, उस समय हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने बयान दिया था कि “हनीफ़ पर हुए अत्याचार से उनकी नींद उड़ गई है…”  और उस की मदद के लिये सरकार हरसंभव प्रयास करेगी। डॉक्टर हनीफ़ के सौभाग्य कहिये कि वह ऑस्ट्रेलिया में कोर्ट केस भी जीत गया, ऑस्ट्रेलिया सरकार ने उससे लिखित में माफ़ी भी माँग ली है एवं उसे 10 लाख डॉलर की क्षतिपूर्ति राशि भी मिलेगी…

अब चलते हैं सऊदी अरब… डॉक्टर शालिनी चावला इस देश को कभी भूल नहीं सकतीं… यह बर्बर इस्लामिक देश, रह-रहकर उन्हें सपने में भी डराता रहेगा, भले ही मनमोहन जी चैन की नींद लेते रहें…

डॉक्टर शालिनी एवं डॉक्टर आशीष चावला की मुलाकात दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में हुई, दोनों में प्रेम हुआ और 10 साल पहले उनकी शादी भी हुई। आज से लगभग 4 वर्ष पहले दोनों को सऊदी अरब के किंग खालिद अस्पताल में नौकरी मिल गई और वे वहाँ चले गये। डॉ आशीष ने वहाँ कार्डियोलॉजिस्ट के रुप में तथा डॉ शालिनी ने अन्य मेडिकल विभाग में नौकरी ज्वाइन कर ली। सब कुछ अच्छा-खासा चल रहा था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था…

जनवरी 2010 (यानी लगभग एक साल पहले) में डॉक्टर आशीष चावला की मृत्यु हार्ट अटैक से हो गई, अस्पताल की प्रारम्भिक जाँच रिपोर्ट में इसे Myocardial Infraction बताया गया था अर्थात सीधा-सादा हार्ट अटैक, जो कि किसी को कभी भी आ सकता है। यह डॉ शालिनी पर पहला आघात था। शालिनी की एक बेटी है दो वर्ष की, एवं जिस समय आशीष की मौत हुई उस समय शालिनी गर्भवती थीं तथा डिलेवरी की दिनांक भी नज़दीक ही थी। बेटी का खयाल रखने व गर्भावस्था में आराम करने के लिये शालिनी ने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा पहले ही दे दिया था। इस भीषण शारीरिक एवं मानसिक अवस्था में डॉ शालिनी को अपने पति का शव भारत ले जाना था… जो कि स्थिति को देखते हुए तुरन्त ले जाना सम्भव भी नहीं था…।

फ़िर 10 फ़रवरी 2010 को शालिनी ने एक पुत्र “वेदांत” को जन्म दिया, चूंकि डिलेवरी ऑपरेशन (सिजेरियन) के जरिये हुई थी, इसलिये शालिनी को कुछ दिनों तक बिस्तर पर ही रहना पड़ा… ज़रा इस बहादुर स्त्री की परिस्थिति के बारे में सोचिये… उधर दूसरे अस्पताल में पति का शव पड़ा हुआ है, दो वर्ष की बेटी की देखभाल, नवजात शिशु की देखभाल, ऑपरेशन की दर्दनाक स्थिति से गुज़रना… कैसी भयानक मानसिक यातना सही होगी डॉ शालिनी ने… 

लेकिन रुकिये… अभी विपदाओं का और भी वीभत्स रुप सामने आना बाकी था…

1 मार्च 2010 को नज़रान (सऊदी अरब) की पुलिस ने डॉ शालिनी को अस्पताल में ही नोटिस भिजवाया कि ऐसी शिकायत मिली है कि “आपके पति ने मौत से पहले इस्लाम स्वीकार कर लिया था एवं शक है कि उसने अपने पति को ज़हर देकर मार दिया है”। इन बेतुके आरोपों और अपनी मानसिक स्थिति से बुरी तरह घबराई व टूटी शालिनी ने पुलिस के सामने तरह-तरह की दुहाई व तर्क रखे, लेकिन उसकी एक न सुनी गई। अन्ततः शालिनी को उसके मात्र 34 दिन के नवजात शिशु के साथ पुलिस कस्टडी में गिरफ़्तार कर लिया गया व उससे कहा गया कि जब तक उसके पति डॉ आशीष का दोबारा पोस्टमॉर्टम नहीं होता व डॉक्टर अपनी जाँच रिपोर्ट नहीं दे देते, वह देश नहीं छोड़ सकती। डॉ शालिनी को शुरु में 25 दिनों तक जेल में रहना पड़ा, ज़मानत पर रिहाई के बाद उसे अस्पताल कैम्पस में ही अघोषित रुप से नज़रबन्द कर दिया गया, उसकी प्रत्येक हरकत पर नज़र रखी जाती थी…। चूंकि नौकरी भी नहीं रही व स्थितियों के कारण आर्थिक हालत भी खराब हो चली थी इसलिये दिल्ली से परिवार वाले शालिनी को पैसा भेजते रहे, जिससे उसका काम चलता रहा… लेकिन उन दिनों उसने हालात का सामना बहुत बहादुरी से किया। जिस समय शालिनी जेल में थी तब यहाँ से गई हुईं उनकी माँ ने दो वर्षीय बच्ची की देखभाल की। शालिनी के पिता की दो साल पहले ही मौत हो चुकी है…

डॉ आशीष का शव अस्पताल में ही रखा रहा, न तो उसे भारत ले जाने की अनुमति दी गई, न ही अन्तिम संस्कार की। डॉक्टरों की एक विशेष टीम ने दूसरी बार पोस्टमॉर्टम किया तथा ज़हर दिये जाने के शक में “टॉक्सिकोलोजी व फ़ोरेंसिक विभाग” ने भी शव की गहन जाँच की। अन्त में डॉक्टरों ने अपनी फ़ाइनल रिपोर्ट में यह घोषित किया कि डॉ आशीष को ज़हर नहीं दिया गया है उनकी मौत सामान्य हार्ट अटैक से ही हुई, लेकिन इस बीच डॉ शालिनी का जीवन नर्क बन चुका था। इन बुरे और भीषण दुख के दिनों में भारत से शालिनी के रिश्तेदारों ने सऊदी अरब स्थित भारत के दूतावास से लगातार मदद की गुहार की, भारत स्थित सऊदी अरब के दूतावास में भी विभिन्न सम्पर्कों को तलाशा गया लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिली, यहाँ तक कि तत्कालीन विदेश राज्यमंत्री शशि थरुर से भी कहलवाया गया, लेकिन सऊदी अरब सरकार ने “कानूनों”(?) का हवाला देकर किसी की नहीं सुनी। मनमोहन सिंह की नींद तब भी खराब नहीं हुई…

शालिनी ने अपने बयान में कहा कि आशीष द्वारा इस्लाम स्वीकार करने का कोई सवाल ही नहीं उठता था, यदि ऐसा कोई कदम वे उठाते तो निश्चित ही परिवार की सहमति अवश्य लेते, लेकिन मुझे नहीं पता कि पति को ज़हर देकर मारने जैसा घिनौना आरोप मुझ पर क्यों लगाया जा रहा है।

इन सारी दुश्वारियों व मानसिक कष्टों के कारण शालिनी की दिमागी हालत बहुत दबाव में आ गई थी एवं वह गुमसुम सी रहने लगी थी, लेकिन उसने हार नहीं मानी और सऊदी प्रशासन से लगातार न्याय की गुहार लगाती रही। अन्ततः 3 दिसम्बर 2010 को सऊदी सरकार ने यह मानते हुए कि डॉ आशीष की मौत स्वाभाविक है, व उन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया था, शालिनी चावला को उनका शव भारत ले जाने की अनुमति दी। डॉ आशीष का अन्तिम संस्कार 8 दिसम्बर (बुधवार) को दिल्ली के निगमबोध घाट पर किया गया… आँखों में आँसू लिये यह बहादुर महिला तनकर खड़ी रही, डॉ शालिनी जैसी परिस्थितियाँ किसी सामान्य इंसान पर बीतती तो वह कब का टूट चुका होता…

यह घटनाक्रम इतना हृदयविदारक है कि मैं इसका कोई विश्लेषण नहीं करना चाहता, मैं सब कुछ पाठकों पर छोड़ना चाहता हूँ… वे ही सोचें…

1) डॉ हनीफ़ और डॉ शालिनी के मामले में कांग्रेस सरकार के दोहरे रवैये के बारे में सोचें…

2) ऑस्ट्रेलिया सरकार एवं सऊदी सरकार के बर्ताव के अन्तर के बारे में सोचें…

3) भारत में काम करने वाले, अरबों का चन्दा डकारने वाले, मानवाधिकार और महिला संगठनों ने इस मामले में क्या किया, यह सोचें…

4) डॉली बिन्द्रा, वीना मलिक जैसी छिछोरी महिलाओं के किस्से चटखारे ले-लेकर दिन-रात सुनाने वाले “जागरुक” व “सबसे तेज़” मीडिया ने इस महिला पर कभी स्टोरी चलाई? इस बारे में सोचें…

5) भारत की सरकार का विदेशों में दबदबा(?), भारतीय दूतावासों के रोल और शशि थरुर आदि की औकात के बारे में भी सोचें…

और हाँ… कभी पैसा कमाने से थोड़ा समय फ़्री मिले, तो इस बात पर भी विचार कीजियेगा कि फ़िजी, मलेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, सऊदी अरब और यहाँ तक कि कश्मीर, असम, बंगाल जैसी जगहों पर हिन्दू क्यों लगातार जूते खाते रहते हैं? कोई उन्हें पूछता तक नहीं…
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विषय से जुड़ा एक पुराना मामला –

जो लोग “सेकुलरिज़्म” के गुण गाते नहीं थकते, जो लोग “तथाकथित मॉडरेट इस्लाम”(?) की दुहाईयाँ देते रहते हैं, अब उन्हें डॉ शालिनी के साथ-साथ, मलेशिया के श्री एम मूर्ति के मामले (2006) को भी याद कर लेना चाहिये, जिसमें उसकी मौत के बाद मलेशिया की “शरीयत अदालत” ने कहा था कि उसने मौत से पहले इस्लाम स्वीकार कर लिया था। परिवार के विरोध और न्याय की गुहार के बावजूद उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दफ़नाया गया था। जी नहीं… एम मूर्ति, भारत से वहाँ नौकरी करने नहीं गये थे, मूर्ति साहब मलेशिया के ही नागरिक थे, और ऐसे-वैसे मामूली नागरिक भी नहीं… माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई की थी, मलेशिया की सेना में लेफ़्टिनेंट रहे, मलेशिया की सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया था… लेकिन क्या करें, दुर्भाग्य से वह “हिन्दू” थे…। विस्तार से यहाँ देखें… http://en.wikipedia.org/wiki/Maniam_Moorthy

भारत की सरकार जो “अपने नागरिकों” (वह भी एक विधवा महिला) के लिये ही कुछ नहीं कर पाती, तो मूर्ति जी के लिये क्या करती…? और फ़िर जब “ईमानदार लेकिन निकम्मे बाबू” कह चुके हैं कि “देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है…” तो फ़िर एक हिन्दू विधवा का दुख हो या मुम्बई के हमले में सैकड़ों मासूम मारे जायें… वे अपनी नींद क्यों खराब करने लगे?

बहरहाल, पहले मुगलों, फ़िर अंग्रेजों, और अब गाँधी परिवार की गुलामी में व्यस्त, “लतखोर” हिन्दुओं को अंग्रेजी नववर्ष की शुभकामनाएं… क्योंकि वे मूर्ख इसी में “खुश” भी हैं…। विश्वास न आता हो तो 31 तारीख की रात को देख लेना…।

डॉ शालिनी चावला, मैं आपको दिल की गहराईयों से सलाम करता हूँ और आपका सम्मान करता हूँ, जिस जीवटता से आपने विपरीत और कठोर हालात का सामना किया, उसकी तारीफ़ के लिये शब्द नहीं हैं मेरे पास…
(…समाप्त)
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सन्दर्भ :-
http://timesofindia.indiatimes.com/india/Falsely-accused-of-killing-spouse-doc-jailed-in-Saudi/articleshow/7154236.cms

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>यह महादान “सिर्फ़ सेवा” के लिये नहीं है… … Foreign Fundings to NGOs in India

>केन्द्र सरकार द्वारा हाल ही में जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में कार्यरत विभिन्न NGOs को सन् 2007-08 के दौरान लगभग 10,000 करोड़ का अनुदान विदेशों से प्राप्त हुआ है। इसमें दिमाग हिला देने वाला तथ्य यह है कि पैसा प्राप्त करने वाले टॉप 10 संगठनों में से 8 ईसाई संगठन हैं। अमेरिका, ब्रिटेन व जर्मनी दानदाताओं(?) की लिस्ट में टॉप तीन देश हैं, जबकि सबसे अधिक पैसा पाने वाले संगठन हैं वर्ल्ड विजन इंडिया, रुरल डेवलपमेण्ट ट्रस्ट अनन्तपुर एवं बिलीवर्स चर्च केरल।

राज्यवार सूची के अनुसार सबसे अधिक पैसा मिला है दिल्ली को (1716.57 करोड़), उसके बाद तमिलनाडु को (1670 करोड़) और तीसरे नम्बर पर आंध्रप्रदेश को (1167 करोड़)। जिलावार सूची के मुताबिक अकेले चेन्नै को मिला है 731 करोड़, बंगलोर को मिला 669 करोड़ एवं मुम्बई को 469 करोड़। सुना था कि अमेरिका में मंदी छाई थी, लेकिन “दान”(?) भेजने के मामले में उसने सबको पीछे छोड़ा है, अमेरिका से इन NGOs को कुल 2928 करोड़ रुपया आया, ब्रिटेन से 1268 करोड़ एवं जर्मनी से 971 करोड़… इनके पीछे हैं इटली (514 करोड़) व हॉलैण्ड (414 करोड़)।

दानदाताओं की लिस्ट में एकमात्र हिन्दू संस्था है ब्रह्मानन्द सरस्वती ट्रस्ट (चौथे क्रमांक पर 208 करोड़) इसी प्रकार दान लेने वालों की लिस्ट में भी एक ही हिन्दू संस्था दिखाई दी है, नाम है श्री गजानन महाराज ट्रस्ट महाराष्ट्र (70 करोड़)…एक नाम व्यक्तिगत है किसी डॉ विक्रम पंडित का… 

इस भारी-भरकम और अनाप-शनाप राशि के आँकड़ों को देखकर मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी समझ सकता है कि इतना पैसा “सिर्फ़ गरीबों-अनाथों की सेवा” के लिये नहीं आता। ऐसे में ईसाई संस्थाओं द्वारा समय-समय पर किये जाने वाले धर्मान्तरण के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वालों का पक्ष मजबूत होता है।

यहाँ सवाल उठता है कि गरीबी, बेरोज़गारी एवं अपर्याप्त संसाधन की समस्या दुनिया के प्रत्येक देश में होती है… सोमालिया, यमन, एथियोपिया, बांग्लादेश एवं पाकिस्तान जैसे इस्लामी देशों में भी भारी गरीबी है, लेकिन इन ईसाई संस्थाओं को वहाँ पर न काम करने में कोई रुचि है और न ही वहाँ की सरकारें मिशनरी को वहाँ घुसने देती हैं। मजे की बात यह है कि ढेर सारे ईसाई देशों जैसे पेरु, कोलम्बिया, मेक्सिको, ग्रेनाडा, सूरिनाम इत्यादि देशों में भी भीषण गरीबी है, लेकिन मिशनरी और मदर टेरेसा का विशेष प्रेम सिर्फ़ “भारत” पर ही बरसता है। इसी प्रकार चीन, जापान और इज़राइल भी न तो ईसाई देश हैं न मुस्लिम, लेकिन वहाँ धर्मान्तरण के खिलाफ़ सख्त कानून भी बने हैं, सरकारों की इच्छाशक्ति भी मजबूत है और सबसे बड़ी बात वहाँ के लोगों में अपने धर्म के प्रति सम्मान, गर्व की भावना के साथ-साथ मातृभूमि के प्रति स्वाभिमान की भावना तीव्र है, और यही बातें भारत में हिन्दुओं में कम पड़ती हैं… जिस वजह से अरबों रुपये विदेश से “सेवा” के नाम पर आता है और हिन्दू-विरोधी राजनैतिक कार्यों में लगता है। हिन्दुओं में इसी “स्वाभिमान की भावना की कमी” की वजह से एक कम पढ़ी-लिखी विदेशी महिला भी इस महान प्राचीन संस्कृति से समृद्ध देशवासियों पर आसानी से राज कर लेती है। भारत के अलावा और किसी और देश का उदाहरण बताईये, जहाँ ऐसा हुआ हो कि वहाँ का शासक उस देश में नहीं जन्मा हो, एवं जिसने 15 साल देश में बिताने और यहाँ विवाह करने के बावजूद हिचकिचाते हुए नागरिकता ग्रहण की हो।

बहरहाल… दान देने-लेने वालों की लिस्ट में हिन्दुओं की संस्थाओं का नदारद होना भी कोई आश्चर्य का विषय नहीं है, हिन्दुओं में दान-धर्म-परोपकार की परम्परा अक्सर मन्दिरों-मठों-धार्मिक अनुष्ठानों-भजन इत्यादि तक ही सीमित है। दान अथवा आर्थिक सहयोग का “राजनैतिक” अथवा “रणनीतिक” उपयोग करना हिन्दुओं को नहीं आता, न तो वे इस बात के लिये आसानी से राजी होते हैं और न ही उनमें वह “चेतना” विकसित हो पाई है। मूर्ख हिन्दुओं को तो यह भी नहीं पता कि जिन बड़े-बड़े और प्रसिद्ध मन्दिरों (सबरीमाला, तिरुपति, सिद्धिविनायक इत्यादि) में वे करोड़ों रुपये चढ़ावे के रुप में दे रहे हैं, उन मन्दिरों के ट्रस्टी, वहाँ की राज्य सरकारों के हाथों की कठपुतलियाँ हैं… मन्दिरों में आने वाले चढ़ावे का बड़ा हिस्सा हिन्दू-विरोधी कामों के लिये ही उपयोग किया जा रहा है। कभी सिद्धिविनायक मन्दिर में अब्दुल रहमान अन्तुले ट्रस्टी बन जाते हैं, तो कहीं सबरीमाला की प्रबंधन समिति में एक-दो वामपंथी (जो खुद को नास्तिक कहते हैं) घुसपैठ कर जाते हैं, इसी प्रकार तिरुपति देवस्थानम में भी “सेमुअल” राजशेखर रेड्डी ने अपने ईसाई बन्धु भर रखे हैं… जो गाहे-बगाहे यहाँ आने वाले चढ़ावे में हेरा-फ़ेरी करते रहते हैं… यानी सारा नियन्त्रण राज्य सरकारों का, सारे पैसों पर कब्जा हिन्दू-विरोधियों का… और फ़िर भी हिन्दू व्यक्ति मन्दिरों में लगातार पैसा झोंके जा रहे हैं…
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विषय से अपरोक्ष रुप से जुड़ी एक घटना –

संयोग देखिये कि कुछ ही दिनों पहले मैंने लिखा था कि “क्या हिन्दुत्व के प्रचार-प्रसार के लिये आर्थिक योगदान दे सकते हैं”, इसी सिलसिले में कुछ लोगों से बातचीत चल रही है, ऐसे ही मेरी एक “धन्ना सेठ” से बातचीत हुई। उक्त “धन्ना सेठ” बहुत पैसे वाले हैं, विभिन्न मन्दिरों में हजारों का चढ़ावा देते हैं, कई धार्मिक कार्यक्रम आयोजन समितियों के अध्यक्ष हैं, भण्डारे-कन्या भोज-सुन्दरकाण्ड इत्यादि कार्यक्रम तो इफ़रात में करते ही रहते हैं। मैंने उन्हें अपना ब्लॉग दिखाया, अपने पिछले चार साल के कामों का लेखा-जोखा बताया… सेठ जी बड़े प्रभावित हुए, बोले वाह… आप तो बहुत अच्छा काम कर रहे हैं… हिन्दुत्व जागरण के ऐसे प्रयास और भी होने चाहिये। मैंने मौका देखकर उनके सामने इस ब्लॉग को लगातार चलाने हेतु “चन्दा” देने का प्रस्ताव रख दिया…

बस फ़िर क्या था साहब, “धन्ना सेठ” अचानक इतने व्यस्त दिखाई देने लगे, जितने 73 समितियों के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी भी नहीं होंगे। इसके बावजूद मैं जब एक “बेशर्म लसूड़े” की तरह उनसे चिपक ही गया, तो मेरे हिन्दुत्व कार्य को लेकर चन्दा माँगने से पहले वे जितने प्रभावित दिख रहे थे, अब उतने ही बेज़ार नज़र आने लगे और सवाल-दर-सवाल दागने लगे… इससे क्या होगा? आखिर कैसे होगा? क्यों होगा? यदि हिन्दुत्व को फ़ायदा हुआ भी तो कितना प्रभावशाली होगा? इससे मेरा क्या फ़ायदा है? क्या आप भाजपा के लिये काम करते हैं? जो पैसा आप माँग रहे हैं उसका कैसा उपयोग करेंगे (अर्थात दबे शब्दों में वे पूछ रहे थे कि मैं इसमें से कितना पैसा खा जाउंगा) जैसे ढेरों प्रश्न उन्होंने मुझ पर दागे… मैं निरुत्तर था, क्या जवाब देता?

चन्दा माँगने के बाद अब तो शायद धन्ना सेठ जी मेरे ब्लॉग से दूर ही रहेंगे, परन्तु यदि कभी पढ़ें तो वे विदेशों से ईसाई संस्थाओं को आने वाली यह लिस्ट (और धन की मात्रा) अवश्य देख लें… और खुद विचार करें… कि हिन्दुओं में “बतौर हिन्दू”  कितनी राजनैतिक चेतना है? विदेश से जो लोग भारत में मिशनरीज़ को पैसा भेज रहे हैं क्या उन्होंने कभी इतने सवाल पूछे होंगे? जो लोग सेकुलरिज़्म के भजन गाते नहीं थकते, वे खुद ही सोचें कि क्या अरबों-खरबों की यह धनराशि “सिर्फ़ गरीबी दूर करने”(?)  के लिये भारत भेजी जाती है? यदि मुझ पर विश्वास नहीं है तो खुद ही केरल, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, उड़ीसा के दूरदराज इलाकों में जाकर देख लीजिये कैसे रातोंरात चर्च उग रहे हैं, “क्राइस्ट” की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ लगाई जा रही हैं। याद करें कि मुख्य मीडिया में आपने कितनी बार पादरियों के सेक्स स्कैण्डलों या चर्च के भूमि कब्जे के बारे में खबरें सुनी-पढ़ी हैं?

“राजनैतिक चेतना” किसे कहते हैं इसे समझना चाहते हों तो ग्राहम स्टेंस की हत्या, झाबुआ में नन के साथ कथित बलात्कार, डांग जिले में ईसाईयों पर कथित अत्याचार, कंधमाल में धर्मान्तरण विरोधी कथित हिंसा… जैसी इक्का-दुक्का घटनाओं को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मचे हल्ले को देखिये, सोचिये कि कैसे विश्व के तमाम ईसाई संगठन किसी भी घटना को लेकर तुरन्त एकजुट हो जाते हैं, यूएनओ से प्रतिनिधिमंडल भेज दिये जाते हैं, अखबारों-चैनलों को हिन्दू-विरोधी रंग से पोत दिया जाता है… भले बाद में उसमें से काफ़ी कुछ गलत या झूठ निकले… जबकि इधर कश्मीर में हिन्दुओं का “जातीय सफ़ाया” कर दिया गया है, लेकिन उसे लेकर विश्व स्तर पर कोई हलचल नहीं है… इसे कहते हैं “राजनैतिक चेतना”… मैं इसी “चेतना” को जगाने और एकजुट करने का छोटा सा एकल प्रयास कर रहा हूँ… “धन्ना सेठ” मुझे पैसा नहीं देंगे तब भी करता रहूंगा…

काश… कहीं टिम्बकटू, मिसीसिपी या झूमरीतलैया में मेरा कोई दूरदराज का निःस्संतान चाचा-मामा-ताऊ होता जो करोड़पति होता और मरते समय अपनी सारी सम्पत्ति मेरे नाम कर जाता कि, “जा बेटा, यह सब ले जा और हिन्दुत्व के काम में लगा दे…” तो कितना अच्छा होता!!!  🙂 🙂

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>तमिल टाइगर्स तथा फ़ादर गेस्पर की संदिग्ध भूमिका एवं 2G स्पेक्ट्रम घोटाला…… Father Gasper, 2G Spectrum CBI Raids and Tamil Tigers Connection

>चर्च द्वारा तमिल टाइगर्स को करोड़ों की फ़ण्डिंग करने के मामले में पहले भी कई बार विभिन्न अखबारों में लेख प्रकाशित हो चुके हैं, यह बात भी काफ़ी लोग जान चुके हैं कि प्रभाकरण असल में तमिल नहीं बल्कि धर्मान्तरित ईसाई था। श्रीलंका सरकार द्वारा तमिल चीतों की धुलाई और खात्मे के बावजूद तमिलनाडु में कई ऐसे लोग एवं संस्थाएं आज भी मौजूद हैं जो तमिल टाइगर्स से सहानुभूति रखती हैं, पृथक तमिल राज्य (तमिल ईलम) के लिये भीतर ही भीतर संघर्षरत हैं। द्रविड मुनेत्र कषघम (DMK) पार्टी अपनी राजनैतिक मजबूरियों की वजह से खुले तौर पर भले ही टाइगर्स के समर्थन में नहीं बोलती हो, लेकिन यह बात सभी जानते हैं कि प्रभाकरण के करुणानिधि से कितने “मधुर” सम्बन्ध थे।

हाल ही में 2G स्पेक्ट्रम घोटाले के सिलसिले में CBI द्वारा चेन्नै में मारे गये कई छापों में से एक नाम चौंकाने वाला रहा… ये साहब हैं फ़ादर जेगथ गेस्पर जो कि “तमिल मय्यम” नामक NGO(?) चलाते हैं। केन्द्र सरकार की हाल की रिपोर्ट के अनुसार विदेशी चर्चों द्वारा सबसे अधिक पैसा दिल्ली व तमिलनाडु में भेजा गया है तथा अरबों रुपये दान में पाने वाली टॉप 15 संस्थाओं में से 13 संस्थाएं ईसाई समूह, संस्थाएं अथवा NGO हैं। तमिल मय्यम नाम के इस NGO में फ़ादर गेस्पर सर्वेसर्वा की तरह काम करता है जबकि करुणानिधि की बेटी एवं केन्द्रीय मंत्री कनिमोझि इस NGO के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर में प्रमुख पद पर है। कनिमोझि के सरकारी और गैर-सरकारी कार्यक्रमों में अक्सर इस फ़ादर गेस्पर को कनिमोझि के पीछे-पीछे कान में फ़ुसफ़ुसाते देखा जाता था।

फ़िलीपीन्स स्थित कैथोलिक रेडियो वेरिटास तथा श्रीलंका के कैथोलिक चर्च की तमिल टाइगर्स के लिये पैसा उगाहने में प्रमुख भूमिका थी, यह फ़ादर गेस्पर भारत में तमिल टाइगर्स को पैसा मुहैया करवाने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी है। रेडियो वेरिटास, मंदारिन, सिंहली, तमिल, फ़िलीपोनो एवं उर्दू जैसी कई भाषाओं में रेडियो कार्यक्रम पेश करता है, इसी के जरिये संगीत, राजनीति और नेताओं से सम्बन्धों के चलते फ़ादर गेस्पर ने करोड़ों रुपये तमिल टाइगर्स की झोली में पहुँचाये।

जयललिता द्वारा संचालित “जया टीवी” ने एक संगीत कार्यक्रम के फ़ुटेज जारी किये जिसमें फ़ादर गेस्पर के साथ मंच पर तमिल टाइगर्स का प्रमुख धन उगाहीकर्ता नचिमुथु सोक्रेटीस नज़र आ रहा है। इस नचिमुथु को अमेरिका के जासूसों ने रंगे हाथों पकड़ा था, जब ये तमिल टाइगर्स को बेचने के लिये मिसाइल का सौदा करने हेतु अमेरिकी अधिकारियों को रिश्वत देने का प्रयास कर रहा था। फ़ादर गेस्पर ने कनिमोझि से चेन्नै में मरीना बीच पर आयोजित होने वाले विभिन्न “सांस्कृतिक कार्यक्रमों”(?) के लिये करोड़ों रुपये का सरकारी अनुदान भी लिया है, ज़ाहिर है कि इसमें से बड़ा हिस्सा तमिल टाइगर्स की जेब में गया। इस करोड़पति फ़ादर गेस्पर ने 1995 में 10,000 रुपये मासिक की तनख्वाह से रेडियो वेरिटास में नौकरी शुरु की थी, निम्न-मध्यम वर्गीय फ़ादर गेस्पर पहले-पहल कन्याकुमारी के सुदूर गाँवों के चर्च में पदस्थ रहा, लेकिन यह व्यक्ति आज न सिर्फ़ करोड़ों में खेल रहा है, बल्कि तमिलनाडु के सबसे भ्रष्ट करुणानिधि परिवार के नज़दीकी व्यक्तियों में से एक है… यह सब “चर्च” की महिमा है।

रेडियो वेरिटास के ईसाई धर्म प्रचार एवं इसके लिट्टे से सहानुभूति को देखते हुए श्रीलंका सरकार ने कई बार इस रेडियो स्टेशन पर आपत्ति जताई, लेकिन फ़िलीपींस से बज रहे रेडियो को वह रोकने में नाकाम रही व जफ़ना में तमिल उग्रवादी एवं भोले-भाले तमिल ग्रामीण इस रेडियो से किये गये दुष्प्रचार में आते रहे, यह फ़ादर जगथ गेस्पर इस रेडियो की नौकरी की वजह से तमिल गुरिल्लाओं में काफ़ी लोकप्रिय हुआ, व बाद में इसे तमिलनाडु में एक NGO खोलकर दे दिया गया ताकि वह वहाँ से पैसा एकत्रित कर सके। फ़र्जी NGO चलाने में “चर्च” को महारत हासिल है… इन्हीं NGO- चर्च और लिट्टे का नेटवर्क इतना जबरदस्त रहा कि फ़ादर गेस्पर ने तमिलनाडु से लिट्टे को करोड़ों रुपये का चन्दा दिलवाया। मनीला की पेरिस बैंक की शाखा से 6 लाख डॉलर का चन्दा इन्होंने श्रीलंकाई सेना के अत्याचारों की कहानियाँ सुना-सुनाकर एकत्रित किया। तमिल अनाथ बच्चों के नाम पर फ़ादर गेस्पर ने कितना पैसा एकत्रित किया है यह आज तक किसी को पता नहीं है, क्योंकि श्रीलंकाई सेना द्वारा सफ़ाया किये जाने के दौरान तमिल चीतों के कई प्रमुख नेता मारे गये थे और फ़ादर का यह राज़ उन्हीं के साथ दफ़न हो गया।

“तमिल मय्यम” नाम के इस NGO की स्थापना 2002 में हुई थी, NGO का लक्ष्य बताया गया “तमिलों की कला-संस्कृति एवं साहित्य को बढ़ावा देना”, इसे तत्काल धारा 80-G के अन्तर्गत टैक्स में छूट की सुविधा भी मिल गई। इसके ट्रस्टियों में खुद फ़ादर गेस्पर के साथ कनिमोझि, फ़ादर लोरदू, फ़ादर जेरार्ड, मिस्टर जोसफ़ ईनोक तथा फ़ादर विन्सेंट आदि शामिल हैं।

अब कुछ “संयोगवश”(?) घटित घटनाओं पर नज़र डालिये –

1) राजीव गाँधी की हत्या श्री पेरुम्बुदूर में हुई…

2) उस दिन राजीव गाँधी की सभा पेरुम्बुदूर में नहीं थी फ़िर भी अन्तिम समय में उन्हें जबरन वहाँ ले जाया गया…

3) तमिल टाइगर्स (जो कि राजीव गाँधी के हत्यारे हैं) से करुणानिधि और द्रमुक के रिश्ते सहानुभूतिपूर्ण हैं इसके बावजूद सोनिया गाँधी ने सत्ता की खातिर उनसे केन्द्र में गठबंधन बनाये रखा…

4) कनिमोझि चर्च पोषित संगठनों की करीबी हैं और ए राजा “दलित” कार्ड खेलते हुए चर्च के नज़दीकी बने हुए हैं… दोनों को ही गम्भीर आरोपों के बावजूद सोनिया गाँधी ने मंत्रिमण्डल में तब तक बनाये रखा… जब तक कि राडिया के टेप्स लीक नहीं हो गये…

5) सोनिया गाँधी की “चर्च” से नज़दीकी जगज़ाहिर है…

इन घटनाओं के “विशिष्ट संयोग”(?) को देखते हुए, मेरे दिमाग के एक कोने में “घण्टी” बज रही है… कहीं मेरे दिमाग में कोई खलल तो नहीं है? अब आगे मैं क्या कहूं…

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>देश का भला

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जिस देश के अधिकांश बुद्धिजीवी (आदर्श[सेलेब्रिटी] समझे जाने वाले व्यक्ति), लगभग मानसिक रोगी होने की सीमा तक भारतीयता को भुला बैठे हों।
जिस देश के अधिकांश राजनेता और अधिकारी, “बेशर्म, बेईमान, बेदर्द और मूर्खता की सीमा को आगे बढ़ाये जा रहे हों।
जिस देश के उद्योगपति, अपनी अय्याशियों के लिए किसी भी सीमा तक “अनैतिक तरीके” से धन अर्जित करने के लिए सरकारों तक को खरीद लें।
जिस देश का आम आदमी अपना और अपने परिवार के जीवन को चलाने में इतनाव्यस्त रहने को मजबूर हो कि उसे देश और समाज में क्या हो रहा है इसका पता ही न चले।

तो इस देश का भला कैसे होगा ?

पर ! होगा; भला होना निश्चित है। न जाने कितनी बार इससे पहले इससे भी बुरी स्थिति हुई है। फिर भी भला हुआ है। असुरता मिटी है देवत्व पुनर्प्रतिष्ठित हुआ है। ये प्रकृति का,श्रष्टि का नियम है। यहाँ सब कुछ एक चक्र में बंधा हुआ चल रहा है उससे कोई नहीं बच सकता।

स्थिति चाहे कितनी ही बुरी क्यों न हो इस देश में, पर “देवत्व का बीज” बचा रहता है इसीलिए जब-जब धर्म की हानि होती है तब-तब भगवान स्वयं जगत का कल्याण करने की इच्छा करने लगते हैं। और तब सब कुछ उनके अनुकूल होने लगता है।

जैसा इस समय हो रहा है;अगर बुराईयाँ चरम पर हैं तो अच्छाईयाँ भी बढ़ रही हैं। एक ओर ऐसे उद्योगपति हैं जो अपने तीन-चार जनों के परिवार के लिए सत्ताईस मंजिला भवन बनवा रहे हैं या जनता को लूटने के लिए सरकारों से साठगांठ करते है, तो दूसरी ओर ऐसे भी हैं जो अपना “सर्वस्व”समाज के लिए दान कर रहे है।

अपराध-भ्रष्टाचार में इतना अधिक बढ़ावा हो गया है कि कभी सही भी होगा ये विश्वास नहीं होता, पर दूसरी ओर इसके विरोध में उठने वाले स्वरों और हाथों को देख कर लगता है कि ये अधिक दिन का मेहमान नहीं है। एक ओर हमरे नवयुवा नशेड़ी और संस्कार हीन होकर इन राजनैतिक पार्टियों के सदस्य बनने को लालायित हैं; (क्योंकि इन्हें हराम की खाने का लालच है), और अभारतीयता के साथ-साथ पाश्चात्य संस्कृति की ओर दौड़ लगा रहे हैं; तो दूसरी ओर ऐसे युवा भी हैं जो सुबह-सुबह तीन बजे से “स्वामी रामदेव जी ” के योग शिविर में हजारों की संख्या में पहुँच कर भारत की सभ्यता-संस्कृति नशे-वासनाओं से दूर रहना और स्वच्छ राजनीति का पाठ पढ़ रहे हैं।

और अब तो अति हो भी गयी है जब से “विकिलीक्स” के द्वारा ये पता लगा है कि दुनिया के नेता हमारे देश और नेतओं के बारे में कैसे विचार रखते हैं। इसी लिए मैंने इन नेताओं को बेशर्म कहा है; क्योंकि इनके हास्यास्पद क्रियाकलापों से हमारे देश की, संसार के देशों में क्या स्थिति है; इसे देख-सुन कर देश के लोगों का खून खौल जाता है। जब समाचार पत्रों में पढने को मिलता है कि अमेरिका में हमारे राजनयिकों या नेताओं तक को जाँच के नाम पर अपने कपडे भी उतारने पड़ते हैं, तो खून खौल जाता है; सर शर्म से झुक जाता है।धिक्कार है उन नेताओं और अधिकारियों को और उन लोगों को जो फिर भी अपनी और देश की बेइज्जती नहीं समझते।

और धिक्कार है उन लोगों को, जो देश के इतना बुरा हाल बना देने वाली राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्त्ता बनने को आतुर दीखते हों । जो पढ़े लिखे होने के बाद भी गुलाम की तरह इनके खानदानी नेताओं के झंडे ढोने को और इनसे हाथ छू जाने को अपना सौभाग्य समझते हों, जो ये सोचने का प्रयास नहीं करते हैं;कि आखिर इस देश का ये हाल ऐसा ही रहा तो आने वाले समय में कोई भी सुखी नहीं रह पायेगा चाहे कितना ही बड़ा करोडपति क्यों न हो।

जो पढ़े लिखे होने के बावजूद भी ये सोचने का प्रयास नहीं करते कि ये इतना बुरा हाल ! हुआ क्यों । इसलिए धिक्कार है उनकी शिक्षा-दीक्षा को, धिक्कार है उनके उन शिक्षण संस्थानों को और उन शिक्षकों को, और धिक्कार है उन माताओं-पिताओं को, जिनके द्वारा “वो निर्लज्ज” “मूढ़ मति” इस संसार में आये।

उन्हें जो पढाया गया उसे ही आँख बंद कर सच मानने वाली जो शिक्षा इस देश में नहीं चलती थी, ये उसे ही लागू रखने का परिणाम है ।
आज भारत कि स्थिति ऐसी है जैसे “चौबे जी चले छब्बे जी बनने रह गए दूबे जी” ।

वास्तव में आजादी के नाम पर हुआ समझौता देश के लोगों के साथ धोखाधड़ी है। जिन लोगों ने ये किया वो पापी थे, और जिन्होंने उनका साथ दिया या उन्हें वोट दिया उन्होंने भी जाने-अनजाने पाप किया।
अब इन “पाप सने हाथों” को धोने का समय आ गया है और अवसर भी मिल रहा है जिनके पूर्वजों ने ये पाप किया था वो भी उनके पाप से अपने को उरिण कर सकते हैं।

नई आजादी नई व्यवस्था के लिए नया आन्दोलन चल रहा है “भारत स्वाभिमान” जिसके आगामी चुनावों में सफल होने के अब तो दो सौ प्रतिशत सम्भावनाये हैं जैसा कि बिहार में दिख गया है, और राष्ट्रीयता जो उफान पर है उसे देख कर तो लगता है कि इस बार न विदेशी तौर-तरीका(सिस्टम) बचेगा न विदेशी सोच और सोचने वाले बचेंगे।

>चोर की दाढ़ी में तिनका – वोटिंग मशीनों पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों को भारत में घुसने नहीं दिया… EVM Hacker Scientist Denied Entry in India

>हालांकि खबर पुरानी है (13 दिसम्बर की), फ़िर भी अधिकाधिक लोगों तक पहुँचे इसलिये इसे यहाँ भी प्रकाशित किया जा रहा है…। पाठकों ने इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की सम्भावित धांधली एवं उससे सम्बन्धित समस्त विस्तृत जानकारियों को मेरे ब्लॉग पर काफ़ी पहले पढ़ा है, दो अमेरिकी, एक डच वैज्ञानिक एवं भारत के श्री हरिप्रसाद ने इन मशीनों को सबके सामने “हैक” करके दिखाया था, वहीं दूसरी तरफ़ डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपनी पुस्तक में कानूनों की व्याख्या से यह साबित किया है कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल असंवैधानिक है…

13 दिसम्बर 2010 को इंदिरा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अमेरिका से आये हुए कम्प्यूटर विज्ञानी एलेक्स हेल्डरमैन को अधिकारियों ने भारत में प्रवेश देने से इंकार कर दिया और उन्हें वापस लौटती फ़्लाइट से जबरन अमेरिका भेज दिया गया, और कोई कारण भी नहीं बताया। प्रोफ़ेसर हेल्डरमैन वही व्यक्ति हैं जिन्होंने एक डच एवं भारतीय हरिप्रसाद के साथ मिलकर वोटिंग मशीनों के फ़र्जीवाड़े को उजागर किया था। एयरपोर्ट से हेल्डरमैन ने अखबारों को फ़ोन लगाया एवं उन्हें इस बात की जानकारी दी। उनके पास वैध वीज़ा एवं सारे वैधानिक कागजात होने के बावजूद अधिकारियों ने उन्हें वहाँ रोके रखा, भारत में घुसने नहीं दिया।

इस सम्बन्ध में अधिकारियों ने उन्हें कोई कारण भी नहीं बताया, सिर्फ़ कहा कि “ऐसे निर्देश”(?) हैं कि आपको भारत में प्रवेश न दिया जाये…। हेल्डरमैन गुजरात मे आयोजित होने वाली एक तकनीकी कान्फ़्रेंस में हिस्सा लेने आये थे…

हेल्डरमैन ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि – चुनाव आयोग को कई बार इन मशीनों की गड़बड़ियों के बारे में बताने और चेताने के बावजूद, आयोग ने कभी भी उनका पक्ष सुनना मंजूर नहीं किया, श्री हरिप्रसाद के साथ सभी लोग चुनाव आयोग से पूर्ण सहयोग करने एवं किसी उच्च स्तरीय तकनीकी समिति के समक्ष अपने प्रयोग करके दिखाना चाहते थे, लेकिन उसकी भी अनुमति नहीं दी गई, ऐसा क्यों?

सवाल उठता है कि चुनाव आयोग एवं सरकार को जब पूरा भरोसा(?) है कि वोटिंग मशीनें एकदम सुरक्षित हैं तब हरिप्रसाद को गिरफ़्तार करके मुम्बई ले जाने, प्रोफ़ेसर को जबरन वापस भेजने जैसी, “आपातकालीन” गिरी हुई हरकतें क्यों की जा रही हैं? यदि सरकार पाक-साफ़ है तो वह क्यों नहीं एक स्वतन्त्र पैनल का गठन करके दूध का दूध और पानी का पानी कर देती? इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के मतदान का “कागज़ी रिकॉर्ड भी” होना चाहिये – जैसी मामूली माँग भी सरकार क्यों नहीं मान रही?

कल चिदम्बरम साहब कह रहे थे कि कांग्रेस अगले दस साल और शासन करेगी, इस “विश्वास” के पीछे कहीं यही कारण तो नहीं? यही चिदम्बरम साहब बड़ी ही संदेहास्पद परिस्थियों में (यहाँ देखें…) अपनी लोकसभा सीट जीत पाये थे…। आप तैयार रहिये, 2G स्पेक्ट्रम घोटाले से भी बड़ा (अर्थात वोटिंग मशीनों के फ़र्जीवाड़े द्वारा समूची सरकार हथियाने जैसा) घोटाला कभी न कभी सामने आ सकता है… एक ईमानदार वैज्ञानिक वैधानिक तरीके से इस देश में नहीं घुस सकता, लेकिन डेविड हेडली जब चाहे तब यहाँ के “बिकाऊ” अधिकारियों को बोटियाँ चटाकर पूरे भारत में घूम-फ़िर सकता है… वामपंथियों की मेहरबानी से “बांग्लादेशी मासूम”, दिल्ली समेत पूरे देश में दनदना सकते हैं…। हे भारतवासियों तुम धन्य हो, धन्य हो…

इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी के लिये इस मुद्दे से जुड़े मेरे पुराने लेख अवश्य पढ़ें…

1) वोटिंग मशीनों का “चावलाई”करण (मई 2009)

2) वोटिंग मशीनों का फ़र्जीवाड़ा (जून 2009)

3) हरिप्रसाद की गिरफ़्तारी (अगस्त 2010)

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>क्या आप हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के प्रचार-प्रसार के लिये अपनी वार्षिक आय में से एक दिन की कमाई दे सकते हैं? (भाग-2)

>भाग-1 (यहाँ पढ़ें) से आगे जारी…

मेरा प्रस्ताव यह है कि कुछ लोग (शुरुआत में लगभग 500 व्यक्ति) आर्थिक सहयोग करें एवं एक वेबसाइट की शुरुआत की जाये जो कि पूरी तरह से हिन्दुत्व एवं राष्ट्रवादी विचारों के लिये प्रतिबद्ध हो… इस दिशा में मैंने मोटे तौर पर खर्चों का अनुमान लगाया है, जो कि निम्नानुसार है –

1) वेबसाइट को बनाने एवं स्पेस-सर्वर-डोमेन इत्यादि का खर्च एवं मेंटेनेंस
(मासिक खर्च लगभग 10000 रुपये)

चूंकि मैं तकनीकी जानकार नहीं हूं इसलिये मुझे बताया गया है कि वर्डप्रेस की बनीबनाई स्क्रिप्ट से शुरुआत करके एक अच्छी वेबसाइट बनाई जा सकती है जिसमें समय और श्रम भी कम लगेगा… यह बिन्दु मैं तकनीकी व्यक्तियों पर छोड़ दूंगा वे जैसे चाहें इस वेबसाइट का गठन कर सकते हैं। इस सम्बन्ध में मुझे दो ऐसे तकनीकी व्यक्तियों की आवश्यकता होगी जो इस वेबसाइट पर आने वाली किसी भी तकनीकी समस्या को तुरन्त हल करने में सक्षम हों (दो व्यक्ति इसलिये क्योंकि एक व्यक्ति यदि किसी काम में उलझा हुआ हो तो दूसरा यह काम करेगा), ज़ाहिर है कि मैं सतत इन दोनों तकनीकी व्यक्तियों के सम्पर्क में रहूंगा तथा वेबसाइट के “एडमिनिस्ट्रेटर” के रुप में हम तीनों मिलकर काम करेंगे… उचित फ़ण्ड एकत्रित होने पर इस कार्य हेतु उक्त दोनों व्यक्तियों को “मानदेय” का भुगतान भी किया जा सकेगा…।

2) चूंकि इस वेबसाइट का कार्यकारी मुख्यालय उज्जैन में ही होगा। समस्त डाटा अपडेट करने, सूचनाओं का संकलन करने, उन्हें हिन्दी में टाइप करके वेबसाइट पर चढ़ाने का कार्य यहीं मेरे निर्देशन में किया जायेगा… अतः स्थानीय स्तर पर मुझे दो हिन्दी टाइपिस्टों (जिसमें से एक अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद करने में भी सक्षम हो) की जरुरत होगी…। एक हिन्दी टाइपिस्ट – मासिक 6 से 8 हजार, एवं एक अनुवादक-सह-टाइपिस्ट, मासिक 12 से 15 हजार (दोनों खर्च अनुमानित) होगा… (कुल 20 से 25 हजार के बीच)

3) दो कमरों का छोटा सा ऑफ़िस – किराया 2000 रुपये (शुरुआती अनुमानित)

4) इंटरनेट – बेसिक टेलीफ़ोन खर्च – लगभग 1500 रुपये (शुरुआती अनुमानित)

5) मोबाइल खर्च – 1500 से 2000 रुपये मासिक (शुरुआती अनुमानित)

6) बिजली, स्थापना व्यय एवं अन्य खर्चे – मासिक 3000 रुपये

7) कम से कम दो अंग्रेजी व हिन्दी अखबार, कुछ प्रमुख पत्रिकाएं व अन्य हिन्दुत्ववादी साहित्य – मासिक खर्च लगभग 500-700 रुपये

8) इसके अलावा यात्रा इत्यादि सम्बन्धी अन्य छोटे-मोटे खर्च, पत्रकारों-लेखकों अथवा सूचना देने वालों को मानदेय का भुगतान वगैरह…

9) आये हुए पैसों से एक “आकस्मिक खर्च फ़ण्ड” भी स्थापित किया जायेगा, किसी कानूनी दांवपेंच अथवा नोटिस इत्यादि के जवाब देने हेतु वकील की फ़ीस, सूचना के अधिकार का उपयोग करके जानकारियाँ हासिल करने, वेबसाइट के कानूनी रजिस्ट्रेशन इत्यादि, तथा किसी भी आकस्मिक तकनीकी समाधान, उपकरण खराबी इत्यादि के लिये…

अर्थात यदि मोटे तौर पर देखा जाये तो एक सामान्य वेबसाइट चलाने के लिये अनुमानतः 50,000 रुपये मासिक खर्च आयेगा, अर्थात 6 लाख रुपए सालाना… मेरा प्रस्ताव यह है कि हिन्दुत्व के उत्थान एवं राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रसार के लिये यदि 500 व्यक्ति भी अपनी साल भर की कमाई में से एक दिन की कमाई इस कार्य के लिये देने का वादा करें (और निभायें भी) तो एक वेबसाइट शुरु की जा सकती है… दूसरा तरीका यह भी है कि 100 रुपये प्रतिमाह (अर्थात 1200 रुपये साल) भी यदि 500 लोग दें तब भी यह आँकड़ा 6 लाख प्रतिवर्ष हो जाता है। मुझे नहीं लगता कि 100 रुपये प्रतिमाह कोई बड़ी रकम है, बशर्ते इस काम के लिये शुरुआत में 500 लोग राजी हों। ज़ाहिर है कि उस वेबसाइट पर मैं उसी परिश्रम से काम करने के लिये मैं तैयार हूं जिस परिश्रम और जुनून से अपने पिछले चार साल से अपने ब्लॉग पर करता आ रहा हूं…।

इस वेबसाइट पर मेरा काम मुख्यतः “सामग्री” (Content) से सम्बन्धित होगा, खबरें एकत्रित करना, उन्हें संकलित करना, टाइपिस्टों से हिन्दी में टाइप करना और करवाना, उन लेखों-समाचारों को उनकी योग्यतानुसार वेबसाइट पर अपलोड करना, सूचनाएं देने वाले मित्रों-पत्रकारों-ब्लॉगरों से सतत सम्पर्क बनाये रखना… आदि-आदि। ऐसे कामों में कभी भी सारे अधिकार आपस में बाँटकर कार्य करना चाहिये, इसलिये इस काम में मेरा साथ देने के लिये दो अन्य एडमिनिस्ट्रेटर होंगे जिनके पास साइट के अधिकार व पासवर्ड इत्यादि होंगे, कारण – हम सभी घर, परिवार वाले सामान्य लोग हैं, किसी के पास कोई व्यक्तिगत कार्य, शादी-ब्याह में उपस्थिति, यात्रा हेतु शहर से बाहर जाना, बीमारी-दुर्घटना इत्यादि के समय वेबसाइट का काम बन्द नहीं होना चाहिए अतः एक से अधिक व्यक्ति के पास समाचारों के प्रकाशन का अधिकार होना चाहिये और यही सिद्धान्त इस वेबसाइट पर भी लागू होगा…। इसी प्रकार आर्थिक लेनदेन, विभिन्न भुगतानों, पत्रकारों-लेखकों अथवा सूचना देने वालों को मानदेय का भुगतान, उपकरण (मोबाइल-कम्प्यूटर-लेपटॉप) खरीदी हेतु भुगतान इत्यादि करने के लिये भी मेरे सहित एक अन्य व्यक्ति आधिकारिक होगा…

इस काम में सबसे अहम रोल होगा वेबसाइट बनाने और चलाने वाले दो तकनीकी व्यक्तियों का, हो सकता है कि मैंने जो 10,000 रुपये प्रतिमाह का अनुमान लगाया है वह कम या ज्यादा भी हो…। हालांकि एक तकनीकी मित्र इस प्रोजेक्ट में पूरी मदद निशुल्क करने के लिये तैयार हैं, परन्तु डाटा लॉस, वायरस आक्रमण, हैकिंग खतरों अथवा सर्वर बदलने की स्थिति में डाटा ट्रांसफ़र जैसे कार्यों के लिये इन्हें मानदेय भी दिया जायेगा… तात्पर्य यह कि मासिक 50,000 रुपये का अनुमान थोड़ा घट-बढ़ भी सकता है। तीन अलग-अलग समितियाँ (सिर्फ़ 2 या 3 व्यक्तियों की) बनाई जायेंगी… एक तकनीकी मामला देखेगी, दूसरी सामग्री प्रकाशन का व तीसरी आर्थिक मामला देखेगी।

तात्पर्य यह कि मैं चाहता हूं कि यह वेबसाइट पूरी तरह से आम हिन्दू की, आम जनता की आवाज़ बने, इसीलिये इसे अधिकतम लोगों के आर्थिक सहयोग से ही चलाना उचित होगा, हो सकता है कि कोशिश करने पर कोई उद्योगपति अथवा कोई संगठन इसे प्रायोजित करने को तैयार भी हो जाये, लेकिन फ़िर वे सामग्री के प्रकाशन के लिये “अपनी शर्तें” थोपेंगे, जो मुझे मंजूर नहीं होगा… यदि बिना शर्त कोई उद्योगपति अथवा संगठन इस वेबसाईट को अगले 5 साल तक आंशिक या पूर्ण रुप से प्रायोजित करने को तैयार हो तो उसका स्वागत है। इसलिये पहला लक्ष्य है 500 ऐसे व्यक्ति खोजना जो 100 रुपये प्रतिमाह देने के इच्छुक हों, इसके बाद ही तो बात आगे बढ़ेगी…। जो व्यक्ति थोड़ी अधिक आर्थिक सामर्थ्य रखते हैं, वे चाहें तो शुरुआत में “एकमुश्त राशि” का बन्दोबस्त कर सकते हैं, यह एकमुश्त राशि स्थापना के शुरुआती बड़े खर्चों, जैसे दो कम्प्यूटर अथवा एक कम्प्यूटर/एक लेपटाप, फ़ोन लाइन, फ़र्नीचर इत्यादि…खरीदने (फ़ैक्स-स्कैनर-फ़ोटोकॉपी मशीन मेरे पास पहले से ही है वह काम में आ जायेगी) में समाहित हो जायेगी।

अब बात आती है कि आखिर इस वेबसाइट का मुख्य कार्य एवं उद्देश्य क्या होंगे? ज़ाहिर है कि मीडिया से ब्लैक आउट कर दी गई ऐसी हिन्दू-विरोधी खबरों को प्रमुखता से स्थान देना जिन्हें छापने या साइट पर देने में सेकुलर चैनलों को शर्म आती है, कई पुरानी ऐतिहासिक पुस्तकों को PDF में संजोकर रखना, कई नए-पुराने अंग्रेजी लेखों का हिन्दी में अनुवाद करके हिन्दुत्व से सम्बन्धी सामग्री को अधिक से अधिक मात्रा में नेट पर चढ़ाना इत्यादि…। ज़ाहिर है कि यह कोई एक दिन या एक माह में होने वाला काम नहीं है… परन्तु आरम्भिक लक्ष्य यह है कि आगामी तीन वर्षों में इस वेबसाईट को ऐसे मुकाम पर पहुँचाना कि जब भी किसी को हिन्दुत्व-राष्ट्रवाद-हिन्दू धर्म-भारतीय संस्कृति इत्यादि के बारे में कुछ खोजना हो तो तत्काल सिर्फ़ इसी वेबसाइट का नाम ही याद आये… गूगल सर्च में यह वेबसाइट अधिक से अधिक ऊपर आये, ताकि हिन्दुत्व का प्रचार बेहतर तरीके से हो सके…।

जो लोग इंटरनेट पर लगातार बने रहते हैं, उन्हें पता है कि ईसाई धर्म, धर्म परिवर्तन, बाइबल अथवा इस्लामिक परम्पराएं, जेहाद, कुरान इत्यादि पर लाखों वेबसाइटें मौजूद हैं, परन्तु यदि हिन्दी सामग्री वाली हिन्दुत्व की साइट खोजने जायेंगे तो चुनिंदा ही मिलेंगी… अतः इस प्रस्तावित साइट का लक्ष्य “हिन्दुओं को हिन्दू बनाना” भी होगा…

अधिक लम्बा न खींचते हुए अन्त में इतना ही कहना चाहूंगा कि अभी यह प्रस्ताव आरम्भिक चरण में है, इस पर चर्चाएं हों, आपसी मीटिंग हों तथा गम्भीरतापूर्वक विचार-विमर्श करके इसे शुरु किया जाये तो निश्चित रुप से यह अपने उद्देश्य को प्राप्त करेगी। जो भी सज्जन इस प्रस्ताव से सहमत हों एवं आर्थिक सहयोग देना चाहते हों वे पहले निश्चित मन बना लें, आर्थिक आकलन करें और मुझे ई-मेल द्वारा अपनी स्वीकृति भेजें कि क्या वे अपनी वार्षिक कमाई में से एक दिन की कमाई (अथवा 1200 रुपये प्रतिवर्ष) इस कार्य के लिये दे सकते हैं? ऐसा न हो कि जोश-जोश में सहमति दे दी जाये और बाद में मुझे शर्मिन्दा होना पड़े…। इसीलिये मैं बगैर किसी जल्दबाजी के शान्ति से इस वेबसाइट को शुरु करना चाहता हूँ, यदि आपका उत्तर “हाँ” में हो तो मुझे अपना पूरा नाम, पता, फ़ोन नम्बर इत्यादि भेजें… जब भी यह प्रस्ताव ज़मीनी आकार लेगा, मैं उनसे सम्पर्क करूंगा…। जब कारवां चल पड़ेगा तो फ़िर इस वेबसाइट को भविष्य में प्रकाशन के क्षेत्र में भी उतारा जा सकता है, फ़िलहाल शुरुआती दो वर्षों का लक्ष्य इस वेबसाइट को “हिन्दी” सामग्री से लबालब भरना है, जिसमें छद्म धर्मनिरपेक्षता से सम्बन्धित समाचार, कांग्रेसियों-वामपंथियों के पुराने-नये पाप कर्मों की जानकारी, हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति से सम्बन्धित ढेर सारी सामग्री हो, ताकि हिन्दी क्षेत्र के जो लोग अंग्रेजी में कमजोर हैं वे भी पढ़ें और जानें कि हिन्दू धर्म और संस्कृति के खिलाफ़ “उच्च स्तर पर” कैसी-कैसी साजिशें चल रही हैं…

यदि यह वेबसाइट योजनानुरुप आकार लेती है तो यह आम जनता के सहयोग से चलने वाला छोटा ही सही, परन्तु पहला मीडिया उपक्रम होगा… प्रस्ताव पर गम्भीरतापूर्वक विचार करें… फ़िर भी यदि यह आकार नहीं लेती तब भी कोई बात नहीं, मेरा ब्लॉग जैसा चल रहा है वह तो चलता ही रहेगा… ध्यान रहे, इस सम्बन्ध में “सहमति” के जो भी पत्राचार हो वह ईमेल अथवा फ़ोन पर ही हो… टिप्पणी के माध्यम से नहीं…

मेरा ईमेल आईडी है suresh.chiplunkar @gmail.com
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>आलेख प्रतियोगिता और आप

>प्रिय मित्रो ,

ब्लॉग जगत में एक आलेख प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है । हमारा उद्देश्य पर्यावरण के प्रति चेतना जागृति करना है। आज पर्यावरण की हानि होने से ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या से पूरी दुनिया को जुझना पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान सामने आ रहे हैं। हम पर्यावरण की रक्षा करें एवं आने वाली पी्ढी के लिए स्वच्छ वातावरण का निर्माण करें। प्रतियोगिता में सम्मिलित होने के लिए सूचना एवं नियम इस प्रकार है।

विषय — “बचपन और हमारा पर्यावरण”

प्रथम पुरस्कार
11000/= (ग्यारह हजार रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र

द्वितीय पुरस्कार
5100/= (इक्यावन सौ रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र

तृती्य पुरस्कार
2100/= (इक्की्स सौ रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र

सांत्वना पुरस्कार (10)
501/=(पाँच सौ एक रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र


1. इस प्रतियोगिता में 1 नवम्बर 2010 से 14 जनवरी 2011 तक आलेख भेजे जा सकते है.

2. प्रतियोगिता में सिर्फ़ दिए गए विषय पर ही आलेख सम्मिलित किए जाएंगे।

3. एक रचनाकार अपने अधिकतम 3 अप्रकाशित मौलिक आलेख भेज सकता है पुरस्कृत होने की स्थिति में  वह केवल एक ही पुरस्कार का हकदार होगा.

4. स्व रचित आलेख  1 नवम्बर 2010 से 14 जनवरी 2011 तक lekhcontest@gmail.com  पर भेज सकते हैं. कृपया साथ में मौलिकता का प्रमाण-पत्र एवं अपना एक अधिकतम १०० शब्दों में परिचय तथा तस्वीर भी संलग्न करें। नियमावली की कंडिका 7 से संबंध नहीं होने का का भी उल्लेख प्रमाण-पत्र में करें। आलेख कम से कम 500 एवं अधिकतम 1000 शब्दों में होने चाहिए।

आपसे निवेदन है कि प्रत्येक रचना को अलग अलग इमेल से भेजने की कृपा करें. यानि एक इमेल से एक बार मे एक ही रचना भेजे.

5. हमें प्राप्त रचनाओं मे से जो भी रचना प्रतियोगिता में शामिल होने लायक पायी जायेगी उसे हमारे सहयोगी ब्लाग “हमारा पर्यावरण”

 

पर प्रकाशित कर दिया जायेगा, जो इस बात की सूचना होगी कि प्रकाशित रचना प्रतियोगिता में शामिल कर ली गई है।


6. 15 जनवरी 2011 से प्रतियोगिता में सम्मिलित आलेखों का प्रकाशन  “हमारा पर्यावरण”

 

पर प्रारंभ कर दिया जायेगा.


7. इस प्रतियोगिता में हमारा पर्यावरण, एसार्ड, एवं पर्यावरण मंत्रालय से संबंधित कोई भी व्यक्ति या उसका करीबी रिश्तेदार भाग लेने की पात्रता नहीं रखता।

8. इन रचनाओं पर  “हमारा पर्यावरण”

 

का कापीराईट रहेगा. और कहीं भी उपयोग और प्रकाशन का अधिकार हमें होगा.


9. रचनाओं को पुरस्कृत करने का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ “हमारा पर्यावरण”

 

के संचालकों के पास सुरक्षित रहेगा. इस विषय मे किसी प्रकार का कोई पत्र व्यवहार नही किया जायेगा और ना ही किसी को कोई जवाब दिया जायेगा.


10. इस प्रतियोगिता के समस्त अधिकार और निर्णय के अधिकार सिर्फ़  “हमारा पर्यावरण”

 

के पास सुरक्षित हैं. प्रतियोगिता के नियम किसी भी स्तर पर परिवर्तनीय है.


11.पुरस्कार  IASRD

 

द्वारा प्रायोजित हैं.


12. यह प्रतियोगिता पर्यावरण के प्रति जागरुकता लाने के लिए एवं हिंदी मे स्वस्थ लेखन को बढावा देने के उद्देश्य से आयोजित की गई है.

(नोट:-प्रतियोगिता में ब्लॉग जगत के अलावा अन्य भी भाग ले सकते हैं प्रतियोगी की आयु 18 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए)

आपको सूचित इस लिए कर रहा हूँ क्यों कि मैं चाहता हूँ आप इस प्रतियोगिता में भाग लें और अपने आलेख जरूर भेजें !  आशा है आप मेरी विनती पर जरूर गौर करेंगे !

सादर आपका

शिवम् मिश्रा button=”hori”; lang=”hi”; submit_url =”http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2010/12/blog-post_18.html”

>क्या आप हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के प्रचार-प्रसार के लिये अपनी वार्षिक आय में से एक दिन की कमाई दे सकते हैं? (भाग-1)

>कुछ दिनों पूर्व ही मेरे ब्लॉग के 1000 सब्स्क्राइबर्स हो गये, अर्थात पूरे भारत और विदेशों में कुल मिलाकर 1000 से अधिक लोग मेरा ब्लॉग सीधे अपने ई-मेल पर प्राप्त करेंगे… ज़ाहिर है कि जहाँ मेरे लिये पाठकों का यह स्नेह बल देने वाला है, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदारी बढ़ाने वाला भी है। इससे सम्बन्धित पोस्ट में मैंने ब्लॉगिंग को विराम देने अथवा एक अवकाश लेने सम्बन्धी बात कही थी, जिसके जवाब में मुझे कई ई-मेल एवं फ़ोन कॉल्स प्राप्त हुए, जिसमें कई मित्रों एवं स्नेहियों ने ब्लॉगिंग को जारी रखने सम्बन्धी अनुरोध किया। आगामी 26 जनवरी 2011 को इस ब्लॉग के चार वर्ष पूर्ण हो जायेंगे, इस अवसर पर मैं एक प्रोजेक्ट आपके सामने रखने का प्रयास कर रहा हूं…

मैंने उस पोस्ट में समय एवं धन सम्बन्धी कमी का ज़िक्र किया था, हालांकि मेरी भी तीव्र इच्छा यह थी कि इस राष्ट्रवादी कार्य को न सिर्फ़ जारी रखा जाये बल्कि और विस्तार किया जाये… परन्तु संकोचवश इस प्रस्ताव को मैंने किसी के समक्ष ज़ाहिर नहीं किया, लेकिन अवकाश लेने सम्बन्धी उस पोस्ट के बाद जिस प्रकार की प्रतिक्रिया मिली, उससे मुझे विश्वास हुआ कि यदि हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के प्रचार-प्रसार के लिये जनता के सहयोग से ही कोई बड़ा प्रोजेक्ट चलाया जाये तो वह निश्चित रुप से सफ़ल होगा… इस विचार ने ही मेरे उस प्रोजेक्ट को अमलीजामा पहनाने के लिये सभी पाठकों के समक्ष रखने की हिम्मत दी।

प्रस्तावना बहुत हुई… अब आते हैं उस प्रोजेक्ट के मूल बिन्दुओं पर –

सबसे पहले मैं उन सभी सहयोगकर्ताओं को धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने पिछले एक वर्ष में अपने आर्थिक सहयोग से मेरे इस ब्लॉग को चलाये रखने में मदद की। अब तक मैंने यह बात किसी को बताई नहीं थी, परन्तु अब खुलकर बिना झिझके यह बात बताने का समय आ गया है, कि दरअसल मैं पिछले साल ही इस ब्लॉग को बन्द करके अपने व्यवसाय में अधिक समय देने का मन बना चुका था, परन्तु मित्रों की सलाह पर मैंने अपने ब्लॉग में DONATE सम्बन्धी पे-पाल साइट का बटन एवं नेट बैंकिंग का खाता क्रमांक दिया (दायें साइड बार में सबसे ऊपर), ताकि कुछ आर्थिक सहयोग मिलता रहे और यह ब्लॉग चलता रहे। वह DONATE का बटन एवं बैंक का खाता क्रमांक लगाने का भी एक वर्ष पूर्ण होने को है और मुझे यह बताते हुए खुशी है कि इस एक वर्ष के दौरान मेरे चाहने वालों ने कुल 20,000 रुपये भेजे। मैं सहयोगकर्ताओं में से नाम किसी का भी नहीं लूंगा, परन्तु मैं सभी का आभारी हूं… (इसमें से भी एक सज्जन ने अकेले ही 5000 रुपये का चेक मेरे घर आकर दिया), एक अन्य सज्जन ने ब्लॉग को डॉट कॉम का स्वरूप दिया एवं इसका जो भी वार्षिक शुल्क लगता है वह चुका दिया, कुछ लोगों ने सीधे बैंक खाते में पैसा ट्रांसफ़र किया, जबकि कुछ अन्य ने अपना नाम गुप्त रखते हुए जितना सहयोग कर सकते थे, किया। इस आर्थिक सहयोग से मैं वाकई चकित भी हूं और अभिभूत भी…। प्राप्त हुए इन 20,000 रुपयों से मेरा वर्ष भर का इंटरनेट का खर्च भी निकला एवं मुझे कुछ पुस्तकें खरीदने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ (जो कि ज़ाहिर है कि यदि मुझे जेब से खर्च करके खरीदना होतीं तो नहीं ले पाता…)।

मैं जानता हूँ कि कुछ पाठक क्या सोच रहे होंगे, परन्तु आज इस बात को स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैंने आज तक संघ या भाजपा से किसी भी प्रकार की कोई आर्थिक मदद नहीं प्राप्त की है, लोग भले ही यह आरोप लगाते रहे हों कि मैं हिन्दुत्ववादी संगठनों से पैसा लेकर लेख लिखता हूं, लेकिन मेरी आत्मा गवाह है और मेरा क्षुद्र सा बैंक बैलेंस सबूत है, कि मैंने आज तक भाजपा या अन्य किसी संगठन से कोई पैसा नहीं लिया… पिछले चार वर्ष से सिर्फ़ और सिर्फ़ “विचारधारा के प्रसार” के लिये अपने श्रम और समय को स्वाहा किया है। जिस प्रकार किसी महिला से उसकी आयु नहीं पूछनी चाहिये उसी प्रकार किसी पुरुष से उसकी आय नहीं पूछनी चाहिये, इसीलिये मैं सिर्फ़ इतना बताना चाहूंगा कि मेरे “तथाकथित सायबर कैफ़े” के सिर्फ़ दो कम्प्यूटरों (जिसमें से एक पर तो मैं ही ब्लॉगिंग के लिये कब्जा किये रहता हूं) एवं एक फ़ोटोकॉपी मशीन पर एक अकेला व्यक्ति 10 घण्टे काम करके जितना कमा सकता है उतना ही मैं कमाता हूं, इस बात के गवाह कई ब्लॉगर्स एवं कई पाठक हैं जो मेरे कार्यस्थल पर आकर मुझसे रूबरु मिल चुके हैं।

इसलिये जब 1000 सब्स्क्राइबर्स होने के उपलक्ष्य में लिखी गई पोस्ट के दौरान यह विचार बना कि हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के प्रचार-प्रसार के लिये एक सक्रिय और समर्पित वेबसाइट हिन्दी में होना बेहद आवश्यक हो गया है। आज के दौर में जबकि हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद पर चौतरफ़ा हमले हो रहे हों, देश की स्थिति बद से बदतर होती जा रही हो, सेकुलर सूचनाओं का विस्फ़ोट हो रहा है, हिन्दू धर्म के खिलाफ़ साजिशें रची जा रही हैं… तब हिन्दुओं के लिये एक सतत चलने और जल्दी-जल्दी अपडेट होने वाली एक विस्तृत वेबसाईट की सख्त आवश्यकता है। जिस प्रकार से मीडिया 6M (मार्क्स, मुल्ला, मिशनरी, मैकाले, मार्केट और माइनों) के हाथों में खेल रहा है, तब इंटरनेट ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा इनके कुचक्र को तोड़ने का प्रयास किया जा सकता है।

विगत चार साल से मैंने अपने ब्लॉग के माध्यम से अपने स्तर और अपने सामर्थ्य के अनुसार हिन्दुत्व जागरण करने की छोटी सी कोशिश की है, परन्तु मेरी भी कुछ सीमाएं हैं, आर्थिक संसाधन-मानव संसाधनों की कमी की वजह से यह कार्य करना मेरे अकेले के बूते से बाहर है… अतः जो प्रस्ताव मैं पेश करने जा रहा हूं उस पर सभी पाठक गम्भीरतापूर्वक विचार करें और अपनी प्रतिक्रिया मुझे ईमेल पर दें, न कि यहाँ टिप्पणियों के माध्यम से…

एक “हिन्दू मीडिया समूह” (जिसका एकमात्र लक्ष्य हिन्दू जागरण एवं सेकुलरों-वामपंथियों को बेनकाब करना हो) का निर्माण करने की दिशा में इसे पहला कदम माना जा सकता है। हालांकि पूरे तौर पर हिन्दू हित की बात करने वाले चन्द ही अखबार बचे हैं जैसे पायोनियर, ऑर्गेनाइज़र, पांचजन्य, स्वदेश अथवा कभीकभार जागरण… लेकिन न तो इन अखबारों की पहुँच व्यापक जनसमूह तक है और न ही युवा पीढ़ी जो इंटरनेट की व्यसनी है उस वर्ग तक इनकी पहुँच है। इधर पिछले कुछ वर्षों में कुछेक वेबसाइटें इस दिशा में काम करने के लिये शुरु की गईं, परन्तु या तो वे धनाभाव के कारण जारी न रह सकीं, अथवा “पोलिटिकली करेक्ट” बनने को अभिशप्त हो गईं अथवा उनका “सामग्री” (कण्टेण्ट) का स्तर वैसा नहीं रहा जिसे हम “हिन्दूवादी” कह सकें…

(भाग-2 में जारी रहेगा…)
(भाग-2 में कार्ययोजना के बारे में विस्तार से…)

>मेरे देश को बचाओ ………!

>बचाओ……………….! बचाओ………………! मेरे देश को बचाओ…………………! इन पार्टियों से बचाओ………! इन नेताओं से बचाओ……… ! इन पार्टियों में भी, कांग्रेस से बचाओ……..! और कांग्रेस में भी गाँधी + इटली खानदा और उसके गुलामों ये बचाओ………!
ये कहीं हिन्दुओं को पूरे विश्व के लिए खतरा बना दें तब हमारे देश का क्या होगा …………?

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