>JANOKTI : जनोक्ति

> h1 a:hover {background-color:#888;color:#fff ! important;} div#emailbody table#itemcontentlist tr td div ul { list-style-type:square; padding-left:1em; } div#emailbody table#itemcontentlist tr td div blockquote { padding-left:6px; border-left: 6px solid #dadada; margin-left:1em; } div#emailbody table#itemcontentlist tr td div li { margin-bottom:1em; margin-left:1em; } table#itemcontentlist tr td a:link, table#itemcontentlist tr td a:visited, table#itemcontentlist tr td a:active, ul#summarylist li a { color:#000099; font-weight:bold; text-decoration:none; } img {border:none;}

JANOKTI : जनोक्ति


देस-परदेस

Posted: 01 Dec 2010 02:32 PM PST

पहचानता है यारो हमको जहाँ सारा
हिन्दोस्ताँ के हम है हिन्दोस्ताँ हमारा

कहने सुनने की बात नहीं महसूस करने की बात है, अपनाने की बात है. मान्यता रिश्तों की होती है, उनके निबाह से होती है, पर अगर परिस्थितियाँ आदमी को दो राहे पर खड़ा कर दे तो तर्क-वितर्क का कोई अंत नहीं. अपनी मिटटी से जुड़े, पनपते रहे, फले-फूले और फिर अचानक वक्त ने करवट बदली और स्थान की, परिवेश की, संस्कारों की अदली-बदली सी हो गई.
सच ही तो है! भारत में बसे बसाए घरों को छोड़ कर नई पीड़ी के पीछे यहाँ आते-जाते, कभी तो यहीं बस जाने का निर्णय लेना पड़ता है. कभी आने जाने की दुश्वारी को बर्दाश्त करना पड़त है. अमेरिका के परिवेश में रहकर, यहाँ के रहन-सहन,पहनावे को अपनाना पड़ता है. काम पर जाने के लिए जो अंग्रेजों की रिवायत है -चाल-चलन, उठन-बैठन, बातचीत, उनकी भाषा, उनकी शैली को अपनाना अनिवार्य हो जाता है. और जब काम से लौटकर घर आते हैं तो वापस अपनी निजी घरेलू व्यवस्था के साथ तालमेल रखना पड़ता है. अतः दोनों परिवेशों में संतुलन बनाये रखने का सिर्फ प्रयास ही नहीं गूढ़ परिश्रम भी करना पड़ता है.
इस कशमकश से गुज़रना पड़ता है हर एक गृह्णी को, एक माँ को जो अपने बच्चों में भारतीयता के विचार कूट कूट कर भरने के प्रयास में कहीं सफ़ल होती दिखाई देती है तो कहीं लगता है बढ़ती उम्र के बच्चों के साथ तालमेल बनाये रखने के संघर्ष में उसके हाथ से भारतीय संस्कारों व् संस्कारों का छोर छूटता चला जाता है.
इसी पेचीदा दौर से एक लेखक को भी गुज़रना पड़ता है जो साहित्य की भारतीय शैली में इस नए परवेश को, अपनी सोच की विचार धारा में लाता है. यहाँ के वातावरण के कई नए नवनीतम अक्स है जो कुछ नया लिखने पर मजबूर करते है. भाषा वही, शैली वही पर विचारों में समय की बहती धारा के साथ हलचल मचाते कुछ नए कोण हाइल हो जाते हैं, जो पुरानी सोच के साथ तालमेल नहीं खाते. आज़ादियाँ पाबंदियों के दायरे तोड़कर खुले आस्मां की ओर उड़ी जा रही है. आदमी और औरत में भी कोई ज़ियादा फर्क नहीं रहा है-दोनों कम करते हैं, दोनों कमाते हैं, और दोनों सतर्क भी रहते हैं कि एक दुसरे की परिधि में दख़ल न दे, इसी भय से की कल कहीं तकरार उनके जीवन की दिशायें न बदल दे. ज़माने की कशमकश में यह सब देख जाता है. मनमानियां अपने पांव पुख्तगी से हर क्षेत्र में रखती चली आ रही है.
यही सोच कुछ नया लिखने के लिए संचारित करती है. परिवारों के पारस्परिक संबंध, उनके मसाइल, उनकी दुश्वारियां, सोच का ढंग, चलन के तेवर, लिखने के लिए विषय वास्तु बन जाते हैं. यहाँ की युवा पीढ़ी का बेलगाम चलन, आज़ादियों की परिधियों को पार करके नयी विडम्बनाओं के गर्क में धंसता जा रहा है. लेखक को अपने आस पास के माहौल में, अपने अंदर और बहार की दुनियां में जो तब्दीलियाँ महसूस होती है, उस दयिरे में जीता है, और जो जीकर भोगता है उसे ही कभी लघुकथा, कभी कहानी या कभी उपन्यास की विषय वस्तु बना लेता है. और ऐसा हो भी क्यों न ? जो हम देखते हैं, जहाँ विचरते हैं, जो जीते है, वही तो काल्पनिक उड़ान वक़्त के यथार्थ के साथ तालमेल खाती है.
शायद यहीं आकर लेखक को इस परिवेश और भारत के परिवेश के बीच में तुलनात्मक संधि दिखाई देती है- समानताएं और असमानताएं जो वह अपनी रचनात्मक सृष्टि में पेश करता है. संतुलन बनाये रखने के कोशिश में उसके मन में अनेकों भाव उठते हैं, कहीं कहीं भावनाओं में भय भी प्रवेश पा लेता है की आगे क्या होगा? इस नए माहौल में जो बीज बोये जा रहे हैं उनसे अंकुरित पौधे कैसे होंगे? आने वाली पीढ़ी का नया निर्माण क्या रंग लायेगा? क्या भारतीय संस्कृति जिसका हम दावा करते हैं, बस बेहाल होकर देखती रह जाएगी नयी और पुराणी पीढ़ियों की दरपेश?

पिछले चालीस वर्षों में आकर बसे भारतीय परिवारों के घर बंट गए हैं, नयी पीढ़ी पूर्ण रूप से अमेरिकन संस्कृति में रंग चुकी है, बच्चे शादी से पहले ही अपने अपने घर अलग बसा लेते हैं. अक्सर अपना जीवन साथी खुद पसंद करते हैं. मतलब कई बातों की आज़ादी लेकर पुरानी पीढ़ी के हाथों से बागडोर छीन लेने की राहें खुली है. सेल्फ- सप्पोर्ट में समक्ष होने के कारण यह हक अपने हाथ में लेने में उन्हें कोई दिक्क़त नहीं होती. ऐसे परिवेश में तब्दीलियाँ आए पल आँखों के सामने रक्स करती हैं. इसी धरातल पर खड़ा होकर एल रचनात्मक मन शब्दों के जाल बुनकर अपने मन की पीढ़ाओं को अभिव्यक्त करता है. लिखता वह अपने देश की भाषा हिंदी में है, पर साहित्य वह प्रवासी बन जाता है!
साहित्य कोई भी हो, कहीं भी रचा गया हो, वो हिंदी भाषा का साहित्य ही है. जैसे देस से आकर हिन्दोस्तानी यहाँ परदेसी हो गया है, संभवतः उनके साथ साहित्य भी प्रवासी हो गया है. जिस तरह मन की पीढ़ा का, उसकी बेचैनी का, परिस्थितिओं से उसका जूझना किसी जात या वर्ण की और इशारा नहीं करता, तो उन जज़्बों को अभिव्यक्त करने वाली भाषा क्यों विविधता में आ जाती है? साहित्य की भी कोई जात पात नहीं होती चाहे वह हिंदी में हो या तेलुगु में, मराठी में हो या सिन्धी में, उसका होना तब तक सार्थक है जब तक उस भाषा को जानने वाले लोग उसको पढ़ पाते हैं. महत्त्व साहित्य का है, वो कहाँ रचा गया है, इतना महत्वपूर्ण नहीं है. हाँ! स्तर की बात और है जो यहाँ देस में भी लागू है और परदेस में भी. और अब तो सभी सीमाओं को पार करते हुए अनुवादित किया हुआ हर भाषा का साहित्य पठनीय हो रहा है. क्या हवाओं को क़ैद किया जा सकता है? या उनकी खुशबू को किसी परिधि में बंधा जा सकता है?
यहाँ अमरीका में बैठे स्थायी भारतीय लोगों को अपने घर में, अपने परिवार के परिवेश में वही सब कुछ हासिल होता है, जो भारत के किसी घर में उपलब्ध होता है. अब इन परिधियों की कौन बैठकर गिनती करे और यह तय करें कि कौन सा देस है और कौन सा परदेस?

देवी नागरानी

भ्रष्टाचार का भारतीय राजनीति में विकास यात्रा

Posted: 01 Dec 2010 03:09 AM PST

भारत देश भ्रष्टाचार के सडे़ तालाब में परिवर्तित हो चुका है ।भ्रष्टाचार आज जो सरकारी लोकसेवकों के,राजनैतिक व्यक्तियांे के, व्यापारियो के,बहुत हद तक नागरिकों के भी नस-नस में रक्त बन कर प्रवाहित हो रहा है,उसका सबसे बड़ा कारण भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् राजनेताओं द्वारा किये गये भ्रष्टाचार पर परदा डालते रहना है।आजादी मिलने के तुरन्त बाद महात्मा गाॅंधी ने उच्च पद पर आसीन व्यक्तियों के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में चेतावनी दी थी।महात्मा गाॅंधी ने 12जनवरी,1948 को प्रार्थना सभा में डी0के0 वेंकटपैया गुरू का पत्र उपस्थित जनों को सुनाया था।तत्कालीन विधायकों और मंत्रियों के भ्रष्टाचार के विषय में इस पत्र में लिखा था-डी0के0वेंकटपैया गुरू ने।इस दौर में कृष्णामेनन,चै0ब्रह्मप्रकाश,प्रताप सिंह कैरों,टी0टी0कृष्णमाचारी,बख्शी गुलाम मुहम्मद आदि राजनेताओं को भ्रष्टाचार में लिप्त रहने के बावजूद सरकारी संरक्षण मिला।साठ के दशक में डा0 राम मनोहर लोहिया और मधु लिमये संसद में भ्रष्टाचार के राक्षस को खत्म करने के लिए पूरी ताकत से लडते थे।मस्तराम कपूर जी ने अपने एक लेख में लिखा है कि,-”भ्रष्टाचार की गंगा का उद्गम गंगोत्री से हुआ अर्थात सर्वोच्च और पूज्य स्थान से।”इस समय पंड़ित जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री थे।’नेशनल हेराल्ड’ को दिल्ली लाने की योजना नेहरू जी ने बनाई और पाॅंच लाख की धनराशि का इन्तजाम करना तय हुआ।तत्कालीन विमानन मंत्री रफी अहमद किदवाई ने,हिमालयन एयरवे़ज के मालिक दो राणाओं से पच्चीस-पच्चीस हजार रूपये, अपने विभाग में ठेके देने के बदले में वसूल लिए।सरदार वल्लभ भाई पटेल के संज्ञान में यह बात आई तो उन्होनें जवाहर लाल नेहरू से इसकी शिकायत की तथा कड़ा प्रतिवाद किया।नेहरू के ‘नेशनल हेराल्ड’ को धर्मार्थ संस्था कहने पर पटेल ने आश्चर्य प्रकट किया।बाद में नेहरू ने पटेल को पत्र लिखकर रफी अहमद किदवाई द्वारा राणाओं से धनराशि लेने को उचित ठहराया।सरदार पटेल जैसे ईमानदार-दृढ़ संकल्पित व्यक्ति और पण्डित नेहरू जो कि पश्चिमी सभ्यता को तरक्की में सहयोगी मानते थे,के बीच उत्पन्न कटु सम्बन्धों का एक बडा कारण नेहरू जी द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपियों को संरक्षण देना था।मस्तराम कपूर के अनुसार,-”चंूकि इस घटना से नेहरू जैसी शख्सियत का सम्बन्ध था,समाचार पत्रों,बुद्धिजीवियों ने इसे रफ़ा-दफ़ा कर दिया।लेकिन भ्रष्टाचार के लिए उर्वरा मिट्टी में दबा यह बीज़ आगे चलकर कितना विशाल वृक्ष बन गया,यह बताने की जरूरत नहीं।”बताते चलें कि मुम्बई के प्रसिद्ध वकील एम0आर0जयकर ने असहयोग आन्दोलन के दिनों में महात्मा गॅंाधी के खादी प्रचार के लिए 25हजार रूपये दिये।अपनी आत्मकथा में जयकर ने लिखाः”कुछ दिन बाद मोतीलाल नेहरू मेरे घर आए और कहने लगे कि मुझे एतराज न हो तो वे गॅंाधी जी को दिये गये रूपयों का इस्तेमाल ”इंडिपेंडेण्ट” की वित्तीय कठिनाई दूर करने में कर लें।मोतीलाल की इस बात को सुनकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ।मैने कहा,मैने तो अपनी तरफ़ से दे ही दिये हैं,गॅंाधी जी जैसे चाहे। उनका इस्तेमाल कर सकते हैं।बाद में मुझे यह जानकर बहुत दुःख हुआ कि उस सारी रकम को ”इंडिपेंडेण्ट” अखबार- जो कि मोतीलाल नेहरू का था,हजम कर गया।लेकिन इसके बदले में मुझे मोतीलाल की दोस्ती अवश्य मिल गयी।”

मोतीलाल नेहरू,जवाहरलाल नेहरू से सम्बन्धित ये प्रसंग मनुष्य की स्वभावगत् कमजोरी के प्रतीक हैं।यह हजारों रूपयों का सिलसिला,उच्च पदासीन नेताओं के भ्रष्टाचार का सिलसिला,इंदिरा गॅंाधी-संजय गॅंाधी-राजीव गॅंाधी के समय तक पहॅंुचते-पहॅंुचते करोड़ों के खेल में बदल गया।बोफोर्स का जिन्न आज तक मंडरा रहा है।संजय गॅंाधी के प्रभाव काल में,आपातकाल के दौरान भ्रष्टाचार ने विराट रूप धारण किया। सरकारी ठेकों की कमीशनबाजी अफसरों के हाथ से छीनकर मंत्रियों ने अपने हाथ में ले लिया।तस्करों के साथ साझेदारी के रूप में एक नया अवैध धन का श्रोत इस समय खुला।जनता पार्टी की सरकार ने जब ईमानदारी पूर्वक आयोगों का गठन कर घोटालों का पर्दाफाश शुरू किया तो भ्रष्टाचार पर पोषित पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने ही इन आयोगों के खिलाफ़ आवाज उठायी और इसे बदले की कार्यवाही करार दे दिया।जब कंाग्रेस पुनः सत्ता में आई तो एक-एक करके सारे मामले वापस ले लिए गये तथा आयोगों को बन्द कर दिया गया।जनता पार्टी की सरकार में पहली बार सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की व्यापक वैधानिक कार्यवाही हो रही थी। महात्मा गॅंाधी ने 12जनवरी,1948 को प्रार्थना सभा में भ्रष्टाचार पर जो चिन्ता व्यक्त की थी,उसका विधिवत इलाज जनता पार्टी की सरकार कर रही थी,परन्तु राजनीति के अन्र्तविरोध की परिणति स्वरूप यह सरकार गिर गयी।

अवैध धनसंग्रहों के टुटपंुजिया तरीकों का स्थान योजनाबद्ध तरीकों से सरकारी सोैदो की दलाली से पैसा बनाना सन1980 के चुनावों से व्यापक रूप में प्रचलित हो गया।भ्रष्टाचार के आकण्ठ में डुबे,भ्रष्टाचार के प्रतीक अब्दुल रहमान अंतुले,जगन्नाथ मिश्र,भजनलाल, रामलाल गंुडुराव,जानकी वल्लभ पटनायक,भास्कर राव और निलंगेकर अपने कारनामों से प्रसिद्धि बटोरते रहे।भ्रष्ट नौकरशाही,कमजोर न्याय पालिका और दिशाहीन विपक्ष के कारण यह समय भ्रष्टाचारियों के लिए मुफ़ीद समय साबित हुआ।1980 का दशक वह दौर था जिसमें सरकारी कार्यालयों में विकास की योजनाओं में लूट तो जारी ही रही,प्राकृतिक सम्पदा के भण्ड़ारों,राजकीय उपक्रमों और जमीन आदि को पूॅंजीपतियों के नाम करने,ठेके पर देने,दोहन करने,लाइसेन्स देने,करों में रियायत देने आदि की दलाली में नौकरशाहों और राजनेताओं ने करोड़ों रूपया कमाना शुरू किया।स्विटजरलैण्ड की प्रसिद्ध पत्रिका स्वाइजर इलस्टायटी 1991 के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाॅंधी का स्विस बैंक खातों में 46अरब,25करोड़ रूपये जमा हैं।अर्थशास्त्री बी0एम0भाटिया द्वारा लिखित इण्डियाज मिड़िल क्लास के अनुसार स्विस बैंकों में भारतीयों का काला धन विश्व बैंक की 1986 की रिपोर्ट के अनुसार तब 13अरब रूपये था।स्विटजरलैण्ड के दिल्ली स्थित दूतावास के उपप्रमुख के बयान जो कि 26मार्च,1997 के आउटलुक में छपा था,के अनुसार-स्विस बैंकों में भारतीयों का कुल जमा धन लगभग दो खरब 80अरब रूपये था।स्विस बैंकिंग एसोसिएशन की 2006 की रपट के आधार पर 8-9मई,2007 को सी एन एन-आई बी एन न्यूज चैनल ने बताया कि स्विस बैंकों में भारतीयों की जमा राशि 1456अरब डालर है।यदि डाॅलर का मूल्य औसतन 40रूपये भी मान लिया जाये तो यह धनराशि 582खरब,40अरब रूपये होगी।आज के समय में भ्रष्ट भारतीयों का अथाह काला धन विदेशों में जमा होने व उसको वापस भारत लाने की बात जोर-शोर से उठायी जा रही है।

भारतीय लोकतंत्र की त्रासदी व दुःखद पहलू यह है कि राजनेता जो समाज के लिए श्रेष्ठ नैतिक आचरण के लिए आदर्श माने जाते थे,आजादी के बाद शनैःशनैः भ्रष्टाचार,अपराध के पर्याय बन गये हैं।चन्द राजनैतिज्ञों को छोड़कर सभी पूॅंजीवादी सोच व भ्रष्ट तंत्र के वाहक बन चुके हैं।जिस देश की आम जनता आज भी हाड़-तोड़ मेहनत के पश्चात् बुनियादी पारिवारिक जरूरतों को पूरा न कर पाने की समस्या से बेजार है,उसी देश के,उसी आम जनता के मतों से निर्वाचित नेताओं की ऐयाशी व जीवन शैली मानवता को शर्मसार करने वाली है।देश का न्यायालय तक इस भ्रष्टाचार से नही बचा है और सर्वोच्च न्यायालय भी इस विषय पर अब मुखरित हो चुका है।लगभग सभी सत्ता में रहे राजनेता भ्रष्टाचार के आरोपी हैं,इस नासूर बन चुके भ्रष्टाचार का उपचार कौन करेगा????

स्थितप्रज्ञ हुए मनमोहन

Posted: 01 Dec 2010 03:05 AM PST

देश के जाने माने अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह जब से प्रधानमंत्री बने हैं तभी से ‘स्थितप्रज्ञ’ गति को प्राप्त हो गए हैं। उन्होंने यूपीए-1 की सरकार का सफल नेतृत्व तो किया ही, यूपीए-2 की सरकार का भी नेतृत्व बड़े ही सहज और सफलता के साथ करते दिखाई दे रहे हैं। बड़े-बड़े ऋषि मुनियों को कठोर तपश्चर्या के बाद ही स्थितप्रज्ञता की अवस्था प्राप्त होती है; लेकिन मनमोहन ने बहुत ही आसानी से यह मुकाम हासिल कर लिया है। यह उनकी व्यक्तिनिष्ठा का प्रभाव ही कहा जाएगा कि वे ऐसी अवस्था को बिना कठोर तपश्चर्या के ही हासिल कर पाए हैं। जब उनके अंदर व्यक्ति-निष्ठा ने जन्म लेना आरम्भ किया तो उन्होंने अपने पराक्रम को ताक पर रख दिया और व्यक्ति की परिक्रमा शुरू कर दी। फलतः परिणाम आज सबके सामने है।

इस अवस्था में पहुंच जाने के कारण ही मनमोहन को कुछ भी दिखाई नहीं देता। जब किसी ऐसे विषम अथवा असामान्य स्थिति का आभास होता है तो वे अपनी आंख, कान और नाक बंद कर लेते हैं। यहां तक उनको किसी के संदर्भ में कुछ बुरा बोलना भी पसंद नहीं है। वे इस सृष्टि के सभी प्राणियों को अपने ही समान ईमानदार मानते हैं। देश-दुनिया में क्या हो रहा है और उनके मंत्रिपरिषद के सदस्य क्या कर रहे हैं, उनको इससे कुछ भी लेना-देना नहीं। ऐसा इसीलिए है क्योंकि उन्होंने अपनी आत्मा को स्वयं में ही संतुष्ट रखने की महारत हासिल कर ली है।

यह उनकी तपश्चर्या की सिद्धि ही कही जाएगी कि कई घोटाले उनकी नाक के नीचे हुए फिर भी वे महात्मा गांधी के तीनों बंदरों का अनुसरण करते रहे और अपने को इससे अलग रखने में कामयाब रहे। चाहे 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के रूप में देश का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला हो या फिर राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों व अन्य मदों में किए गए हजारों करोड़ के हेर-फेर का मामला हो, इन सभी स्थितियों में उनकी स्थितप्रज्ञता कमाल की रही।

दरअसल ‘स्थितप्रज्ञ’ शब्द की चर्चा श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में की गई है। गांडीवधारी अर्जुन लीलापुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि हे केशव, स्थितप्रज्ञ पुरुष के क्या लक्षण हैं ? श्रीकृष्ण कहते हैं- “हे पार्थ, जब व्यक्ति अपने मन में स्थित सभी कामनाओं को त्याग देता है और अपने आप में ही अपनी आत्मा को संतुष्ट रखता है, जो दुःख से विचलित नहीं होता और सुख से उसके मन में कोई उमंगे-तरंगें नहीं उठतीं, जो व्यक्ति इच्छा व तड़प, डर व गुस्से से मुक्त हो। अच्छा या बुरा कुछ भी पाने पर, जो ना उसकी कामना करता है और न उससे नफरत करता है, ऐसे व्यक्ति की बुद्धि ज्ञान में स्थित है। उदाहरण के तौर पर जैसे कछुआ अपने सारे अँगों को खुद में समेट लेता है, वैसे ही जिसने अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से निकाल कर खुद में समेट लेता है, ऐसे धीर मनुष्य को ही ‘स्थितप्रज्ञ’ कहा जाता है।” तो धन्य हैं मनमोहन सिंह। (व्यंग्य)

फिर आई दीवाली

Posted: 01 Dec 2010 03:02 AM PST

मार्गषीर्ष अमावस्या (5.12.2010) पर विशेष रोचक जानकारी

पूरे विश्व में कार्तिक अमावस्या को दीवाली मनायी जाती है। कहते हैं कि भगवान राम, लक्ष्मण और सीता जी 14 साल के वनवास के बाद इसी दिन अयोध्या लौटे थे। इस खुशी में प्रजा ने दीपमालिका सजाकर उनका स्वागत किया। न जाने कब से यह परम्परा चल रही है; पर भारत में कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं, जहां इसके एक महीने बाद, मार्गशीर्ष अमावस्या को दीवाली मनायी जाती है। उत्तरांचल के अनेक स्थानों, देहरादून के जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर तथा हिमाचल प्रदेश के सिरमौर, कुल्लू, शिमला, किन्नौर आदि में इस समय उत्साह देखते ही बनता है। इसे पहाड़ी, जौनसारी या बूढ़ी दीवाली कहते हैं। पटाखों और दीपकों से रहित यह दीवाली एक विशिष्ट स्वरूप लिये है।

कहते हैं कि भगवान राम द्वारा रावण वध के बाद अयोध्या पहंुचने की सूचना पर्वतीय क्षेत्र में देर से पहुंची। अतः यहां के लोगों ने हर्ष व्यक्त करने के लिए अगली अमावस्या को चुना। दूसरा व्यावहारिक कारण यह है कि पांच से सात हजार फुट की ऊंचाई वाला होने से यहां भयंकर सर्दी तथा बर्फ पड़ती है। सामान्य दीवाली के समय लोग मक्का की कटाई; अदरक व अरबी की खुदाई तथा बिक्री में व्यस्त रहते हैं। उन्हें सर्दी के लिए राशन व पशुओं का चारा भी एकत्र करना होता है। अतः त्योहार मनाने का समय नहीं मिलता। इस कमी को वे अब पूरा करते हैं। इस प्रकार यह भीषण शीत के स्वागत का पर्व भी बन जाता है। लोग नौकरी या शिक्षा के लिए बाहर होने पर भी तीन दिन के लिए अपने गांव अवश्य आते हैं।

पहली रात में खाना खाकर गांव के सब लोग पंचांगन (सार्वजनिक स्थान) में आ जाते हैं। रात भर गीत, कथा, कहानी कहने के बाद सब ‘भेमल’ के पौधों से बने ब्यांठे (मशाल) को जलाकर उसके प्रकाश में गांव के बाहर कुल देवता के मंदिर में जाते हैं। यहां लकड़ियों के ढेर (डिमसा) के बीच देवदार का लम्बा तना गड़ा होता है। डिमसा में आग लगते ही युवक तने पर चढ़ जाते हैं तथा हिला-हिलाकर उसे गिरा देते हैं। तने के गिरते ही लोग हर्ष से चिल्ला उठते हैं और ढोल की धुन पर एक दूसरे की कमर में हाथ डालकर थिरकने लगते हैं। नृत्य के साथ लोकगीत गाये जाते हैं।

सेवणी लाई तो पाशो दियाणी, सेवणी लाय तो पाशो ले

हमारे सेरुलिया दियाणी, ऐव खतु रो आशो ले।।

(भाभी ननद से पूछती है कि दूर मेरे गांव में यह कैसा प्रकाश दिख रहा है ? ननद कहती है कि वहां दीवाली मनायी जा रही है।)

लगभग एक घंटे तक सब नृत्य में डूबे रहते हैं। फिर बीड़ी, सिगरेट आदि पीकर तथा आग में हाथ, पांव सेककर थकान उतारते हैं। ढोल बजाने वाला बाजगी भी ढोल को आग में थोड़ा गर्म कर लेता है। उसकी थाप के साथ ही नृत्य का अगला दौर चल पड़ता है।

पुरवा दिशा दी रात ब्याणी, ऐ कौला रानिये भैरिले पानी

दिशारै लुमैरु रात न ब्याणी, ऐ कौला रानिये भैरिले पानी।।

(पूर्व दिशा में रात खुल रही है। प्रिये, पानी भर लाओ; पर अलसाई प्रिया कहती है कि अभी रात नहीं बीती, मैं नहीं जाऊंगी)

नाच-गान का यह क्रम कई किश्तों में चलता है। भेमल की मशाल तथा डिमसा में अग्नि का अर्थ अंधकार पर प्रकाश की विजय से है। तना गिराने के पीछे संभवतः कोई प्राचीन शौर्य गाथा है, जो समय के गर्भ में विस्मृत हो गयी है। अगला दिन एक-दूसरे के घर आने-जाने में बीतता है। हर घर में लोग अखरोट की गिरी, भुनी मक्का (मूड़ा) तथा धान से बने चिउड़े से स्वागत करते हैं। घर में ही बनी जौ की हल्की शराब या चाय भी उपलब्ध रहती है। बाहर से आये लोगों को सब आग्रह कर अपने घर ले जाते हंै।

रात होते ही मुन्दा, ढाक, ढोल, नगाड़े तथा डमरू के स्वर पर पंचांगन में फिर से नाच-गाने का दौर शुरू हो जाता है।

देव के डांडे जातुरु जाणों रे, धूप धुनियारो बिसरी आयो रेे

देवा बापुरिया छिता न मानिया रे, देव बापुरिया छिता न मानिया।।

(हम देवता के मंदिर में जा रहे हैं; पर भूलवश धूप, दीप आदि लाना भूल गये हैं। हे देवता, आप कृपया नाराज न हों।)

नृत्य दो समानान्तर वृत्तों में होता है। भीतर की ओर महिलाएं तथा लड़कियां हैं, जबकि बाहर पुरुष वर्ग। सब लोग स्वाभाविक रूप से अपने कद के अनुसार लगे हैं। सबके पैर आश्चर्यजनक रूप से एक साथ चलते हैं। ढोल का स्वर बदलते ही सब विपरीत दिशा में चल देते हैं। कभी अचानक सब एक कदम पीछे कूद जाते हैं; पर पदविन्यास में गड़बड़ नहीं होती। नृत्य के बीच खाली समय में कुछ लोग प्रहसन करते हैं।

तीसरे दिन शाम को ‘भिरूड़ी’ नामक कार्यक्रम होता है। इसमें गांव के कुछ बडे़ लोग पंचांगन में मचान पर बैठकर अखरोट लुटाते हैं। ये अखरोट गांव से ही एकत्र किये गये हैं। जिस घर में इस साल पुत्र का जन्म हुआ है, वहां से दुगने अखरोट लिये जाते हैं। अखरोट इस क्षेत्र में इतने अधिक होते हैं कि मैदानी क्षेत्र में कांच की गोलियों की तरह यहां बच्चे अखरोट से खेलते हैं।

तीसरी और अंतिम रात में ‘विदाकरी’ (विदाई) होती है। हर घर में जेठांगिये (बड़े भाई) और शेष भाई अलग दल बनाकर परम्परागत अस्त्र-शस्त्र तथा डंडे आदि लेकर दो विपरीत दिशाओं से आते हैं। दोनों दल मौंण (शिकार) पर निकले हैं। जहां दोनों मिलते हैं, वहां उनमें आगे निकलने के लिए प्रतीकात्मक संघर्ष होता है। फिर दोनों में सुलह हो जाती है। तभी दस-पन्द्रह लोग देवदार के लट्ठों से बने आठ-दस फुट ऊंचे सुसज्जित हाथी को कंधों पर उठाकर लाते हैं। हाथी पर बैठा ग्राम-प्रधान (स्याणा) तलवार चलाता रहता है। पूजन के बाद हाथी को उठाकर सब नाचते हैं। इसके पीछे भी कोई पुरानी शौर्य-कथा कही जाती है।

विदाकरी में गांव के बड़े लोग अपनी परम्परागत पोशाक पहनकर नाचते हैं। पुरुष कुर्ता, चूड़ीदार पाजामा, विशेष प्रकार का लम्बा कोट तथा गोल टोपी पहनते है। विवाहित महिलाएं गाढ़े रंग की कमीज तथा घाघरा, जबकि कन्याएं सलवार, कमीज ही पहनती हैं। यद्यपि आधुनिकता का प्रभाव युवाओं के वस्त्रों पर स्पष्ट दिखाई देने लगा है। अतः वे पैंट और जीन्स पहन कर भी नृत्य करते हैं। एक बुजुर्ग के अनुसार अब त्योहारों पर पहले सा उत्साह नहीं दिखता, इस कारण डिमसा पर बहुत कम लकड़ी एकत्र होती है तथा हाथी बनाने की प्रथा तो लगभग बंद ही हो गयी है।

यहां अनेक जातियों के लोग रहते हैं। नृत्य के समय यद्यपि भेदभाव नहीं होता; पर ऊंचनीच तथा खानपान में छुआछूत का विचार काफी लोग करते हैं। शिक्षा के प्रसार से युवाओं में यह भावना कम हो रही है। इस क्षेत्र में सर्वत्र महासू (महाशिव) देवता और उनके चार भाइयों (बाशिक, बोठा, पबासी और चालदा महासू) की पूजा होती है।

तीन दिन के इस हर्षोल्लास के बाद लोग अपने दैनिक काम में लग जाते हैं। लड़कियां अपनी ससुराल लौट जाती हैं। मेहमान तथा बाहर कार्यरत लोग भी अगली दीवाली पर मिलने के आश्वासन के साथ चल पड़ते हैं।

जानवर भी सोचते हैं …

Posted: 30 Nov 2010 11:31 PM PST

मई 1924 की बात है ! उस समय मेरे पिता जी साउथ इन्डिया कम्पनी में सर्वेयर के रुप में कार्यरत था ! यह कहानी उनकी जबानी ही सुनिए !

मैं रेलवे लाईन के साथ साथ सर्वे कर रहा था ! हमारी पार्टी में कुल दस आदमी थे ! दो सर्वेयर और आठ मजदूर ! हम लोग अपना कैम्प रेलवे लाईन के साथ किसी गांव के पास जहां अच्छा समझते थे, लगा लेते थे और अपना काम करते रह्ते थे !

हम लोगों ने सर्वे करते-करते एक नई जगह पर अपना कैम्प लगा दिया ! शाम का समय था ! हम लोग चाय आदि पीकर बैठे ही थे कि हमने देखा कि हमारे कैम्प की तरफ एक जंगली हाथियों का झुंड आ रहा है ! मैं बहुत परेशान हो गया क्योंकि जंगली हाथी बडे खतरनाक होते हैं  हमारी पार्टी में जो मज़दूर थे उन्होंने हमें कहा कि आप चिंता न करें ! हम इन हाथियों को खदेड देंगे ! लेकिन उनके इतना कहने पर भी मेरी चिंता कम नहीं हुई ! हाथी बडी ही मस्त चाल से चले आ रहे थे !

जब हाथियों का झुंड कुछ नज़दीक आया तो हमने जो दृश्य देखा उसे देख कर हमारे आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा !  हमने देखा कि सबसे आगे एक हथिनी आ रही थी और उसकी पीठ पर एक 14-15 साल की लडकी बिल्कुल नंगी बैठी थी ! उस झुंड में कुल मिला कर आठ-दस हाथी थे ! हमारे कैम्प के पास आकर वो सभी हाथी रुक गए ! जिस हथिनी पर वो लडकी सवार थी वह हथिनी नीचे बैठ गई ! और वो नंगी लडकी नीचे उतर कर हमारे कैम्प में आ गई ! बाकी सब हाथी उसी प्रकार से खडे रहे ! हमने उस लडकी को कुछ रोटियां और बिस्कुट जो हमारे पास थे, उसको दे दिए ! उस लडकी ने रोटी को सूंघा फिर बिस्कुट को सूंघा और तब उनको चखा ! फिर वह लडकी भी हाथियों कि तरह चिंघाडने लगी और वापिस हाथियों के चली गई ! उसने प्रत्येक हाथी को रोटी और बिस्कुट खिलाए और खुद भी खाए ! खाने के बाद उसी प्रकार से वह लडकी हाथिनी पर बैठ गई ! और सब हाथी चुपचाप वापिस चले गए ! तब हमारी जान में जान आई !

बाद में पता करने पर मालूम हुआ कि कुछ साल पहले इस हथिनी का एक बच्चा मर गया था ! हथिनी बच्चे को मरा पाकर पागल सी हो गई ! रात को पागलों की तरह घूमती हुई एक गांव की तरफ निकल पडी ! रास्ते में रेल की लाईन पर फाटक लगा हुआ था ! रात होने के कारण गेटकीपर ने फाटक बन्द कर रखा था ! उस पागल हथिनी ने गेट को तोड दिया ! गर्मी का मौसम था ! दूसरी ओर गेटकीपर अपनी पत्नी व एक साल की बच्ची के साथ अपने क्वार्टर के बाहर ही सो रहा था ! उसको रहने के लिए रेलवे के ओर से एक कवार्टर मिला हुआ था ! गेट के टूटने की आवाज़ सुन कर वह हडबडा कर उठ खडा हुआ ! उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया कि क्या हुआ है ! इतनी ही देर में वह हथिनी उसके सिर पर सवार हो गई ! बडी मुश्किल से गेटकीपर और उसकी पत्नी अपनी जान बचा कर अपने क्वार्टर में भाग गए ! परंतु उनकी एक साल की बच्ची वहीं बाहर ही रह गई ! बस उस बच्ची को वह हथिनी उठा लाई !

तब से अब तक वह लडकी इन्ही हाथियों के साथ रहती थी ! उसी हथिनी ने ही पाल पोस कर इस लडकी को इतना बडा किया था ! वह लडकी भाषा के नाम पर सिर्फ हाथियों की तरह चिन्घाड ही सकती थी ! इसके अलावा और कुछ नहीं जानती थी ! उस लडकी के मां-बाप उसे देखते थे और सब गांव वाले भी जानते थी कि यह उनकी लडकी है ! सभी उनको रोटियां और खाने की वस्तुएं देते थे परंतु कोई भी उस लडकी को हाथ भी नहीं लगा सकता था ! उनको हमेशा यह डर लगा रहता था कि यदि किसी ने जबरदस्ती उस लडकी को छीनने की कोशिश की तो यह हाथी सारे गांव को ही उजाड देंगें ! इसलिए सभी लोग उस लडकी को खुश रखने की कोशिश करते थे !

हमारा कैम्प वहां पर चार दिन तक रहा ! चार दिनों तक लगातार वो हाथियों का झुंड हमारे कैम्प के पास आता और हम हर रोज़ उन्हें कुछ न कुछ खाने को देते ! जिससे वे खुश होकर जांए ! हमें यह भी मालूम हुआ कि सभी हाथी उस लडकी की अध्यक्षता में रहते थे ! बिना उस लडकी की इज़ाज़त के न तो वे हाथी कोई चीज़ खाते थे और न ही किसी पर हमला करते थे !

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: