>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


ये पल-वो पल

Posted: 02 Dec 2010 12:32 PM PST

जिंदगी एक आह होती है
मौत जिसकी पनाह होती है
जी हाँ! ज़िन्दगी इक सफ़र है सुहाना जिसकी राहों पर पथिक सफ़र के दरमियान कभी काँटों की चुभन तो कभी प्यार का सहलाव महसूस करता है. कभी धूप की चादर ओढ़ लेता है तो कभी शबनमी छाँव के तले अपनी तमाम थकान को आगोश में लिए सो जाता है. यही तो वे लोरियां हैं जो हमें अपने साथ गाते-गाते, रुलाते-रुलाते, अपने दामन में थपथपाती है, हमें अपनी हर धड़कन से वाकिफ़ कराती है.
बीता पल लौटकर नहीं आएगा. आज का पल सामने मुस्कराकर बाहें फैलाकर खड़ा है-कह रहा है “आओ, गले लग जाओ, मुझे जी भर के जियो कल आए न आए?” एक निश्चित सम्पूर्ण सवाल! अगर जीना यहाँ, मरना यहाँ है तो क्यों न जीकर मर जाएँ. आओ इस पल को गिरफ्त में ले लें और उसके आस पास मंडराकर विचरते रहे और ज़िन्दगी का यह पल जी लें जो सिर्फ व् सिर्फ हमारे लिए हैं

देवी नागरानी

समय के साथ कदमताल में असफल सोनपुर मेला

Posted: 02 Dec 2010 03:46 AM PST

मैं जब नन्हा-मुन्ना था तो मेरी दीदी मुझे सुलाने के लिए रोजाना एक लोरी गाती-’आ रे निंदिया निन्दरवन से,बौआ अलई नानी घर से,नानी घर बौआ कथी-कथी खाए,साठी के चूड़ा,पुरहिया गाय के दूध;खा ले रे बौआ जयबे बड़ी दूर’.लेकिन अब हमारे घर में न तो साठी धान का चूड़ा ही है न ही पूरहिया गाय का दूध.सरकार की गलत कृषि नीति ने हमें परपरागत बीजों के साथ-साथ शुद्ध दूध-दही से भी महरूम कर दिया है.ज्ञातव्य हो कि वेदों में मगध में उपजने वाले जिस उत्तम कोटि के ब्रीहि धान का जिक्र है वह कोई और नहीं यही साठी धान था.एक समय था कि खुद मेरे दरवाजे पर ही 2 जोड़ा बैलों के साथ-साथ कई-कई गायें और भैंसें बंधी होती थीं.लेकिन हमारी सरकार ने सर्वविनाशक वैज्ञानिक कृषि का ढिंढोरा पीट कर हमारी कृषि से पशुओं को अलग कर दिया.इसी कथित विकास का खामियाजा भुगत रहा है कभी दुनिया का सबसे बड़ा पशु मेला रहा सोनपुर पशु मेला.सोनपुर और हाजीपुर को नारायणी गंडक नदी अलग करती है.कल जब मैं मेले में गया तो पाया कि वहां पशुओं के नाम पर मात्र ४०-५० जर्सी गायें और २०-२५ घोड़े मौजूद हैं.लोगों से पता चला कि कुछ हाथी भी मेले में आए तो थे लेकिन अब जा चुके हैं क्योंकि अब मेला क्षेत्र में बरगद और पीपल के पेड़ रहे नहीं.इसलिए मालिकों के लिए उनका भोजन खरीदना काफी महंगा पड़ता है.कभी इस मेले में कितने पशु खरीद-बिक्री के लिए आते थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि १८५६ में बाबू कुंअर सिंह ने इसी सोनपुर मेले से एक साथ कई हजार घोड़े अपनी विद्रोही सेना के लिए ख़रीदे थे.आज तो स्थिति यह है कि नाम पशु मेला और भीड़ बिना पूंछ वाले दोपाया जानवरों यानी मानवों की.सारी भीड़ सिर्फ सड़कों पर और दुकानें खाली.शायद यह बाजार के पसरने और महंगाई का सम्मिलित प्रभाव है.पहले मेलों का ग्रामीण जनता के आर्थिक क्रियाकलापों में महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था.लोग साल में एक बार थका देनेवाले कृषि कार्यों से फ़ुरसत पाकर मेले में आते.मन भी बहल जाता और जरूरत की चीजों की खरीदारी भी हो जाती.खुद मेरे दरवाजे पर बिछी दरी,घर में मौजूद कम्बल,ऊनी कपडे सब के सब इसी मेले की देन होते थे.मेरे गाँव में जो भी बरतन सामूहिक भोज-भात में प्रयुक्त होते वे भी इसी सोनपुर मेले में ख़रीदे हुए होते थे.तब प्रत्येक ग्रामीण एक बार जरूर सोनपुर मेले में आता.तब यह मेला सगे-सम्बन्धियों से मिलने का भी सुनहरा अवसर हुआ करता था.अब तो मेले का क्षेत्रफल भी सिकुड़ता जा रहा है.तब मेले का क्षेत्रफल आज से कम-से-कम दस गुना हुआ करता था.मैं बात ज्यादा दिन पहले की नहीं,यही कोई ३० साल पहले तक की कर रहा हूँ.तब लोगों की भीड़ भी कई गुनी होती थी और उनमें से ज्यादा संख्या स्वाभाविक रूप से किसानों की हुआ करती थी.शायद इसलिए इस मेले को १९२९ में अखिल भारतीय किसान सभा की नीव पड़ते देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.तब स्थानीय बाजारों में न तो इतनी दुकाने होती थीं और न ही दुकानों में इतना सामान.तब नदियाँ आने-जाने का सबसे प्रमुख साधन हुआ करती थीं.सड़कों का महत्त्व कम था.इसलिए सारे मेले नदी किनारे लगा करते थे.आज तो पूरा देश ही एक बाज़ार का रूप ले चुका है और इस बाज़ार में हर कोई कुछ न कुछ खरीद और बेच रहा है.सबसे ज्यादा इस बाज़ार में जो चीज बिक रही है वह है ईमान.मेला घूमते समय सौभाग्यवश मुझे घुडबाजार में एक घोड़े का सौदा होते हुए देखने का अवसर भी मिला.चूंकि सारी बातचीत कूटभाषा में हो रही थी इसलिए मैं सब कुछ समझकर भी कुछ भी नहीं समझ पाया.आगे बढ़ा तो लाउडस्पीकरों के शोर से साबका हुआ.सड़कों पर पैरों में लाठी बांध कर १०-१० फीट लम्बे हो गए बच्चे घूमते नजर आए.लोगों की कौतुहलप्रियता पर गुस्सा भी आया जिसे शांत करने के लिए ये बच्चे हाथ-पैर टूटने का जोखिम उठा रहे थे.मेले में सबसे ज्यादा भीड़ दिखी कृषि प्रदर्शनी में.मैंने भी यहाँ भारतीय कृषि के विनाश के लिए दोषी यंत्रों को देखा.अब तो सरकार खुद भी मान रही है कि कृषि का हमारा परंपरागत तरीका ही सही था.वैज्ञानिक कृषि ने पेयजल को भी जहरीला कर दिया है,अनाज और सब्जियां तो जहरीली हुई ही है.पशु न सिर्फ हमारे सहायक थे बल्कि परिवार के सदस्य भी थे.मैंने बचपन में कई बार बिक चुके पशुओं को नए मालिकों के साथ जाने से इनकार करते देखा है.कई गुस्सैल पशुओं को मालिक के आगे सीधा-सपाटा होते देखा है.मैंने मेरे मित्र राजकुमार पासवान के परिवार को भैंस बेचने के बाद फूट-फूट कर रोते हुए देखा है.खुद अपने चचेरे मामा रामजी मामा के परिवार का बैल बेचने के बाद रोते-रोते हुए बुरा हाल होते देखा है.अब हमारी नकलची सरकार एक बार फ़िर पश्चिम की नक़ल करते हुए बेमन से ही सही जैविक और परंपरागत कृषि को फ़िर से प्रोत्साहित करना चाहती है.बेमन से इसलिए क्योंकि कृषि यंत्रो और उत्पादों के निर्माताओं के पास कुछ भी खरीदने के लिए जितना ज्यादा पैसा है,हमारे मंत्रियों-अफसरों के पास बेचने के लिए ईमान उतना ही सस्ता लेकिन मात्रा में कम.फ़िर भी अगर ऐसा हो ही गया तो क्या लोग फ़िर से वापस पशुआधारित कृषि को अपनाएँगे?मुझे तो इसकी सम्भावना कम ही लगती है.अब कौन एक बात आदत छूट जाने के बाद गोबर से हाथ गन्दा करेगा जब रासायनिक खाद का विकल्प उपलब्ध है.सरकार को पता होना चाहिए कि विकास की गाड़ी में सिर्फ आगे बढ़ाने वाले गियर होते हैं,रिवर्स गियर नहीं होता.इसलिए यह उम्मीद करना भी बेमानी होगी कि सोनपुर पशु मेले में फ़िर से पहले की तरह भारी संख्या में पशुओं का आना शुरू होगा और यह मेला फ़िर से दुनिया का सबसे बड़ा पशु मेला कहलाने का गौरव प्राप्त कर लेगा.काश मेरी बात गलत साबित हो जाए और मुझे वर्षों बाद अपनी गलती पर पछताना पड़े.

एड्स दिवस पर जान लिया कि एड्स से कैसे बचा जाए, आइये अब मौज मारें

Posted: 01 Dec 2010 08:17 PM PST

आज दो दिसम्बर है। कुछ खास तो नहीं है, विशेष तो कल था एक दिसम्बर को। कल एक दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस सभी ने मनाया। शासन-प्रशासन ने इस तरह से विश्व एड्स दिवस को मनाया जैसे कोई महान दिवस मनाया जा रहा हो।

सरकारी अमलों के अलावा गैर सरकारी संगठनों ने भी अपनी अनुदान राशि का उपयोग करते हुए कार्यक्रम करके अपने कागजातों को सुधार लिया। महाविद्यालयों में काम कर रही राष्ट्रीय सेवा योजना की इकाइयों ने भी अपनी औपचारिकता का निर्वाह कर लिया। सरकारी तन्त्र प्रसन्न हुआ, गैर सरकारी संगठन प्रसन्न हुए, तमाम सारी इकाइयां प्रसन्न हुईं और साथ में प्रसन्न हुए वे लोग जो अपनी जीभ और गले को तराशने के लिए किसी न किसी समारोह, गोष्ठी आदि के इन्तजार में बैठे रहते हैं।

कल के कार्यक्रमों को देखकर, टीवी पर दिखाई जा रही रिपोर्टों, इंटरनेट पर प्रसारित हो रहे विवरणों के बाद तो लग रहा था कि सभी के सभी जागरूक होकर एड्स को भगाने की कोशिश में हैं। कोशिशें भी इतनी तेज लगीं कि एहसास हुआ कि इसी वर्ष ही एड्स देश से समाप्त हो जायेगा। आज सुबह-सुबह समाचार-पत्रों की रंगावट देखकर इस एहसास को और बल मिला। लगा कि अब तो हमारा देश एड्स के चंगुल से निकल ही जायेगा।

हम कितनी खुशफहमी में जीने के आदी हो गये हैं और समस्याओं को देखकर भी, समझकर भी खुशफहमी का शिकार बने रहना चाहते हैं। हमें यह भली-भांति ज्ञात है कि एड्स को समाप्त करने के लिए गोष्ठी-समारोहों-रैलियों आदि से ज्यादा जरूरी है कि हम आत्मविश्वास कायम रखें। वर्तमान में विश्वास की समाप्ति लगभग पूर्णरूप से हो चुकी है, ऐसे में आत्मविश्वास की संकल्पना को पैदा करना मुश्किल ही दिखता है।

यह सभी को पता है कि एड्स की बीमारी किस कारण से होती है। इसके बाद भी हम संयमित जीवनशैली को व्यतीत करने के पक्ष में नहीं है। ‘दूसरे की थाली का चावल अपनी थाली के चावल से ज्यादा स्वादिष्ट होता है’ की धारणा बनाकर हर स्त्री-पुरुष विवाहेत्तर सम्बन्धों की ओर मुड़ जाता है। इसके अलावा जो युवक-युवती अभी शादी के सामाजिक बंधन में रह कर सेक्स जैसी स्थितियों से नहीं गुजरे होते हैं वे विवाहपूर्व सम्बन्धों को बुरा नहीं मानते हैं।

आज के जो हालात हैं उनमें इस तरह की रोकटोक को पुरातनपंथी धारणा, संकुचित मानसिकता का समझा जाता है। अब यदि इस संकुचन से बाहर आना ही है तो उसके साथ कुछ अच्छाइयां और कुछ बुराइयां भी सामने आयेंगीं। इन अच्छाइयों में आपको शारीरिक सुखों की प्राप्ति हो रही है तो बुराई के स्वरूप में एड्स की प्राप्ति तो होनी ही है।

सामाजिक रूप में जो प्रयास हुए हों वे तो अलग हैं स्वयं सरकार की ओर से भी उन्मुक्त सेक्स की अवधारणा को बल दिया गया है। किसी जमाने में परिवार नियन्त्रण का साधन बना ‘कंडोम’ आज एड्स नियन्त्रण के रूप में काम में लाया जा रहा है। अब कंडोम के प्रचार में परिवार नियोजन नहीं वरन् एड्स की रोकथाम की बात दिखलाई जाती है। ऐसे में कैसे सोचा जा सकता है कि हम एड्स को रोक पायेंगे।

चलिए कोई बात नहीं, एक दिसम्बर तो कल निकल ही चुका है। कल हम सभी ने विश्व एड्स दिवस मना भी लिया है। जो भिज्ञ हैं उनको तो ठीक ही है और जो अनभिज्ञ हैं उन्हें भी ज्ञात हो गया है कि एड्स से बचने का उपाय क्या है। हमने कल सभी को बताया भी है कि उन्मुक्त सेक्स के लिए किस प्रकार से एहतियात करती जाये। सेक्स किसी के साथ भी करें बस कंडोम का उपयोग करें।

हमने कतई यह नहीं समझाया है कि अविवाहित युवक-युवतियां सेक्स के प्रति अपनी चाहत को न बढ़ायें। हमने नहीं समझाया है कि पति-पत्नी आपस में प्रेमभाव से रहें और दूसरे जोड़ों की ओर शारीरिक आकर्षण का शिकार न हों। हमने बिलकुल भी नहीं बताया है कि शारीरिक संवेगों को नियन्त्रित करना प्रमुख होना चाहिए वरन् उन्हें समझाय है कि यदि शारीरिक संवेगों की शान्ति करें तो उपयुक्त सुरक्षा उपाय भी अपनायें रखें। हमने युवाओं को उन्मुक्त सेक्स के खतरों को नहीं समझाया है वरन् उन्मुक्त प्रेमालाप के रास्ते सुझाये हैं।

आइये हम इन तमाम सारे कदमों के बीच इस एहसास से गुजरें कि हमारा देश उन्मुक्त प्रेमालाप, उन्मुक्त शारीरिक सम्पर्कों के वातावरण में एड्स-विहीन होकर विकास करेगा। अभी एक दिसम्बर आने में पूरा एक वर्ष है। एड्स के प्रति लोगों को सचेत करने, असुरक्षित शारीरिक सम्बन्धों के बनाने के खतरों को समझाने के लिए भी पर्याप्त समय है, गोष्ठियों-समारोहों को पुनः करवाने में भी एक वर्ष का समय है तब तक तो स्वच्छन्द शारीरिकता की बात तो की ही जा सकती है। आइये देखें कि किसकी दाल कहां गलनी सम्भव होती है और किसकी थाली में हमारी थाली से ज्यादा स्वादिष्ट चावल है।

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