>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


और हमने कुछ नहीं सीखा

Posted: 03 Dec 2010 05:22 AM PST

३ दिसंबर जो १९८३ तक जाना जाता था,
केवल देशरत्न राजेंद्र प्रसाद के जन्मदिन के रूप में;
१९८४ से बन गया रातोंरात हजारों निर्दोषों की पुण्यतिथि भी.
गलतियाँ घूसखोर नेताओं और अफसरों की थी,
और खामियाजा भुगतना पड़ा बेवजह उनलोगों को;
जिनका इस मसले से नहीं था कुछ भी लेना-देना.
हमेशा न जाने क्यों भारत में खेत गदहे खाते हैं और
मार पड़ती है गरीब जुलाहों को;
क्यों जबरन चरितार्थ होती रहती है यह बदनाम कहावत?
दुर्घटना के बाद भी हमारे नेताओं ने नहीं छोड़ा अपना कमीनापन,
और भगा दिया हत्यारे एंडरसन को;
न जाने क्या ले-देकर गरीबों के कफ़न के सौदागरों ने.
पीड़ितों के परिवारों को है आज भी,
दोषियों को सजा दिए जाने का ईन्तजार;
उम्मीदें बुझने लगी हैं और आशाएं तोड़ने लगी हैं दम.
पीड़ित हो चुके हैं किशोर से जवान,
और जवान से बूढ़े भी,
और न जाने कितने बूढ़े कर गए हैं;
बिना न्याय पाए ही दुनिया से प्रयाण.
आज जबकि नेता और अफसर पहले से भी ज्यादा हैं भ्रष्ट,
और भी आसान हो गया है खरीदना उनके ईमान को;
ऐसे में कभी भी,कहीं भी हो सकती है;
फ़िर से भोपाल जैसी दुर्घटना.
आज भी उद्योग नहीं कर रहे सुरक्षा नियमों का पालन,
आज भी मंत्री-अफसर पैसे लेकर दे रहे हैं;
असुरक्षित औद्योगिक इकाईयों को नो ऑब्जेक्शन का सर्टिफिकेट.
आज भी हम नहीं सुधरे हैं और न ही सुधरनेवाले हैं,
हमारी यह आदत अब बन चुकी है लाईलाज बीमारी;
चाहे एक की जगह हजारों भोपाल क्यों न हो जाए,
हम उनसे कोई सीख नहीं लेनेवाले,क्योंकि हम भारतीय हैं.

डा. भीम राव अंबेडकर: व्यक्ति और विचार

Posted: 03 Dec 2010 12:40 AM PST

कभी-कभी समाज की प्राचीनता के साथ उत्पन्न रूढ़ियां उस समाज की गति को अवरूद्ध कर देती हैं। उसके तरूणों की धमनियों का रक्त जमा हुआ दिखता है। लोग निराशा और हतोत्साह में अपना जीवन जीते रहते हैं। किसी की आखों में कोई स्वप्न दिखलाई नहीं पड़ता। उस समय कोई व्यक्ति अपनी अकल्पनीय संघर्ष शक्ति से उस समाज को झकझोर कर उठाता है और आगे बढ़ने की सामर्थ्य उत्पन्न करता है। धीरे-धीरे समाज स्वयं अपने सामर्थ्य को पहचानता है और उस व्यक्ति के कृतित्व से प्रेरणा ग्रहण करता हुआ आगे बढ़ता चलता है। इसी व्यक्ति को महापुरूष कहते है।

बाबा साहब ऐसे ही महापुरूष थे, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन की सभी महत्वाकांक्षाओं को ठोकर मार कर आम-जन के जीवन में जागृति और प्रकाश लाने तथा जातिवाद की विसंगतियों के प्रति जागृत करने, उनमें उत्साह एवं स्फूर्ति लाने के लक्ष्य को अपने जीवन का ध्येय बना लिया तथा इस चिरंजीवी राष्ट्र के नवनिर्माण को ही अपना साध्य समझा।

आज कुछ लोग मात्र राजनीतिक स्वार्थों में कारण दलित और मुसलमानों के संगठन का प्रयत्न करते दिखलायी पड़ते हैं परंतु बाबा साहब ने राजनीतिक स्वार्थों के लिये इस प्रकार के गठजोड़ का विचार कभी नहीं किया। उन्होंने ”माई थाट्स ऑन पाकिस्तान” नामक पुस्तक में मुस्लिम विचारों से संबंधित तथ्यों का जो वर्णन किया है, वह विचारणीय है। यद्यपि उनके इन विचारों को प्रकाश में आने में पर्याप्त विलम्ब हुआ है। परन्तु वे विचार इस देश के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत की तरह हैं।

उनकी दृष्टि में राष्ट्रहित सर्वोपरि था। इसलिये वे मुस्लिम विघटनकारी शक्तियों से सहमत नहीं थे उनका मानना था कि उनमें हिन्दुओं के साथ सह-अस्तित्व की बुनियादी भावना का अभाव है। इसके बिना देश की उन्नति असंभव है, इसी परिप्रेक्ष में सन् 1940 में उन्होंने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग पर अपने जो विचार व्यक्त किये हैं वे पठनीय हैं। इसके लिये उन्होंने जनसंख्या की पूर्ण अदला-बदली को भी अनिवार्य बताया और स्पष्ट किया कि मुसलमानों द्वारा इस देश की उन्नति में सामान्यतया वांछित रूचि न लेना उनके रूढ़िवादी धार्मिक सोच के कारण ही है।

डा. साहब ने वैज्ञानिक तथा ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर अंग्रेजों के इस दुष्प्रचार का खण्डन किया कि आर्य इस देश में बाहर से आए थे। तथा वर्तमान के शूद्र लोग आर्य नहीं हैं। उन्होंने यह बात आग्रहपूर्वक कही कि आर्य कोई वंश नहीं है तथा आर्य कहीं बाहर से नहीं आए। उन्होंने यह सुस्थापित किया कि शूद्र भी आर्य है, तथा क्षत्रिय हैं। इस प्रकार आर्यों के बाहर से आने वाले सिद्धांत को उन्होंने मनगढंत और निराधार बताया।

डा. अम्बेडकर का जीवन राष्ट्र तथा दीन हीनों की सेवा के समर्थित था। एक ओर करोड़ों दुखी- पीड़ित लोगों के अधिकारों की रक्षा का प्रश्न, वहीं दूसरी ओर राश्ट्रहित का सतत स्मरण। हम जहां भी उनको देखते हैं राष्ट्रहितों के संरक्षण-संवर्धन करता हुआ पाते हैं। यद्यपि वे अपने ही धर्मानुयायियों के ब्यवहार के कारण दुखी थे परंतु कष्ट और अपमान उनके देशभक्ति के विचार तथा व्यवहार को विचलित नहीं कर पाये।

बाबासाहब का जीवन इस बात का उदाहरण है कि व्यक्ति का दृढ़ निश्चय ही उसका निर्माण करता है, उसकी जाति, पारिवारिक निर्धनता, असुविधायें और समाज का विरोध उसकी प्रगति को रोक नहीं सकता। बाबा साहब का संपूर्ण जीवन युवकों के लिये प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने देश की युवा शक्ति से परिश्रमी तथा गुण संपन्न बनने का आहवान किया। बाबा साहब कहते हैं-”सम्मान की आकांक्षा करना कोई पाप नहीं है परंतु कार्य करते-करते सम्मान प्राप्त नहीं होता है तो आप अपना संघर्ष निराश होकर मत छोड़िये और यदि दुर्भाग्य से आप उस सम्मान से वंचित कर दिये जाये जिसके वास्तविक अधिकारी आप ही है फिर भी आप धैर्य छोड़ें।”

जिस सामाजिक कुव्यवस्था ने एक मनुष्य को दुसरे मनुष्य का गुलाम बना दिया, शासक को शोषित, बलवान को बलहीन और बुद्धिमान को पददलित बनाकर रख दिया उस कुव्यवस्था को बदले बिना न तो मानव अधिकार ही प्राप्त होंगे न ही बाबा साहब का सपना पूरा होगा, सामाजिक परिवर्तन ही सभी प्रकार की समस्याओं का निवारण है इस के द्वारा न केवल सामाजिक रूप से हमारी हैसियत बढेगी बल्कि हम मानसिक रूप से भी ज्यादा प्रखर और गतिशील हो जायेंगे, डा. अंबेडकर के मिशन को आगे बढाने के लिए सामाजिक परिवर्तन के धम्म चक्र की आज सख्त आवश्यकता है।

अम्बेडकर की सामाजिक और राजनैतिक सुधारक की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। स्वतंत्रता के बाद के भारत मे उनकी सामाजिक और राजनीतिक सोच को सारे राजनीतिक हलके का सम्मान हासिल हुआ। उनकी इस पहल ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों मे आज के भारत की सोच को प्रभावित किया। उनकी यह सोच आज की सामाजिक, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, कानून और सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से प्रदर्शित होती है।

एक विद्वान के रूप में उनकी ख्याति उनकी नियुक्ति स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में कराने मे सहायक सिद्ध हुयी। उन्हें व्यक्ति की स्वतंत्रता में अटूट विश्वास था और उन्होने समान रूप से रूढ़िवादी और जातिवादी हिंदू समाज और इस्लाम की संकीर्ण और कट्टर नीतियों की आलोचना की है। उसकी हिंदू और इस्लाम की निंदा ने उसको विवादास्पद और अलोकप्रिय बनाया है, हालांकि उनके बौद्ध धर्म मे परिवर्तित होने के बाद भारत में बौद्ध दर्शन में लोगों की रुचि बढ़ी है

नरेन्द्र मोदी पाक-साफ़ , आ सकते हैं राष्ट्रीय राजनीति में

Posted: 03 Dec 2010 12:04 AM PST

लगता है कि भाजपा के केंद्र में वापसी होने वाली है | एक ओर घोटाले पे घोटाले में फाँसी हुई कांग्रेस , बढ़ती हुई महंगाई , वहीँ बिहार में भाजपा की अप्रत्याशित जीत और अब मोदी को गुजरात दंगों में क्लीन चिट | देशकाल में इन घटनाक्रमों को जोड़कर देखा जाए तो मोदी के दामन पर लगाये गये दागों से छुटकारे के बाद अब भाजपा यदि नरेन्द्र भाई मोदी को राष्ट्रीय नेतृत्व सौंपती है तो आने वाले दिनों में राहुल बाबा का सपना ध्वस्त होने का संकट खड़ा हो सकता है | वैसे भी मोदी , शिवराज , रमनसिंह और नीतीश कुमार आदि ने देश भर को भाजपा और भाजपा गठबंधन के प्रति जनता के विश्वास का आइना दिखा दिया है | खैर अभी तो आप नरेन्द्र मोदी को पाक-साफ़ बताने वाली ये खबर पढ़िये और विचार कीजिये :-

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित एसआईटी ने गुजरात दंगों में राज्य के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका को सही ठहराया है | एसआईटी ने अपनी रपट में नरेन्द्र मोदी को साल 2002 में हुए दंगों के दौरान अपने संवैधानिक कर्तव्यों को नहीं निभाने के आरोप से मुक्त कर दिया गया है |

ज्ञात हो कि एसआईटी ने 6 दिन पहले ही अपनी स्टेटस रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंपी है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 27 अप्रैल को गुजरात दंगों के दौरान मारे गए पूर्व कांग्रेसी सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी की शिकायत पर एसआईटी को मामले की जांच करने को कहा था।

जाकिया ने मोदी पर दंगाइयों को भड़काने का आरोप लगाया था । जाकिया का कहना था कि पुलिस ने दंगाइयों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने एस आई टी के सूत्रों के हवाले से बताया है कि एसआईटी को जांच में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कोई ठोस सबूत हाथ नहीं लगे हैं |

लोकतंत्र और भारतीय जनमानस

Posted: 02 Dec 2010 11:07 PM PST

राजसत्ता की अतुलनीय ताकत के विषय में एक बात एकदम सत्य कही गई है कि ‘पावर करप्ट्स एंड एब्सोल्यूट पावर करप्ट्स एबसोल्यूटली’ अर्थात ताकत भ्रष्ट किया करती है एवं निर्बाध ताकत पूर्णतः भ्रष्ट कर दिया करती है। बिहार के चुनाव में विपक्ष का सफाया हो गया और नीतिश कुमार को विधान सभा में अत्यंत प्रचंड बहुमत मिल गया, यह वस्तु स्थिति क्या वास्तव मे बिहार कि लिए और अंततः हमारे वतन के लिए श्रेयस्कर सिद्ध होगी ? देश के संविधान निमार्ताओं ने क्या वास्तव में यह विचार किया होगा कि एक ताकतवर विपक्ष के आभाव में लोकतंत्र किस तरह से भलीभांति संचालित हो सकेगा? पूरे 63 सालां आजादी के पश्चात भी एक दल अथवा एक एलांयस को एकतरफा बहुमत क्या भारतीय लोकतंत्र के लिए घातक साबित नहीं होगा। देश की आजादी के आरम्भिक काल में यह वस्तुस्थिति एकदम से समझ आती थी, क्योंकि देश जंग ए आजादी से निकलकर लोकतंत्र की ओर अग्रसर हो रहा था और जंगे ए आजादी की कयादत करने वाली पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस का पूरे ही देश मे जबरदस्त दबदबा कायम था। विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी थी, जिसके विपक्षी दलों के मध्य 29 सांसद 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में निर्वाचित हुए थे। भारतीय जनसंघ जोकि आज की बीजेपी का पूर्ववर्ती अनुरूप था, उसके तो मात्र दो सासंद लोकसभा में चुनकर आए थे। देश की प्रथम संसद में नेशनल कांग्रेस का संपूर्ण वर्चस्व कायम था। 1950 में कांग्रेस विलग होकर सोश्लिस्ट पार्टी का निमार्ण करने वाले जंग ए आज़ादी के दिग्गज नेताओं आचार्य नरेंद्र देव, आर्चाय कृपलानी, जयप्रकाश नारायण, डा. राममनोहर लोहिया, अशोक मेहता तक को 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में भारतीय जनमानस ने नक़ार दिया था। कम्युनिस्ट पार्टी अवश्य ही कांग्रेस के लिए कुछ चुनौती प्रस्तुत कर पाई थी, अन्यथा यह एक तरफा चुनाव साबित हुआ। भारतीय लोकतंत्र ने जो राजनीतिक टे्रंड 1952 के प्रथम आम चुनाव में कायम किया था, वस्तुतः तकरीबन वैसा ही आचरण भारतीय जनमानस तकरीबन बाद के कुछ आम चुनावों में करता आया। एक तरफा लहर के साथ किसी दल अथवा एलांयस को सत्तारूढ कर देना।

सन् 1967 का चुनाव इस मायने मे अत्यंत महत्वपूर्ण करार दिया जाएगा, क्योंकि प्रथम बार आजादी के दौर के चुनाव इतिहास में एक साथ आठ राज्यों में कांग्रेस पराजित हुई और संविद सरकारों का अत्यंत कामयाबी के साथ गठन किया गया। 1967 के चुनाव के बाद गठित लोकसभा में भी प्रथम बार विपक्ष ने अपनी अत्यंत सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। साम्यवादियों के साथ ही समाजवादी भी बहुत ताकतवर बनकर लोकसभा में उभरे! भारतीय जनसंघ को पहली बार जबरस्त कामयाबी हासिल हुई। ऐसा प्रतीत हुआ कि अब भारत का लोकतंत्र नेशनल कांग्रेस के तिलिस्म से बाहर आकर एक स्वाभविक परिपक्वता की ओर ग़ामजन हो चला है और पक्ष और विपक्ष के मध्य किसी कामयाब लोकतंत्र के बेहद आवश्यक संतुलन अब भारत में भी कायम हो चला है। किंतु 1971 में बंगलादेश की ऐतिहासिक विजय के तत्पचात आयोजित हुए चुनाव में देश की दुर्गा बनी इंदिरा गाँधी ने विपक्ष को बुरी तरह धराशाही करके संपूर्ण लोकतांत्रिक संतुलन को पुनः गड़बड़ा दिया। लोकसभा में कांग्रेस के प्रचंड बहमुत के सामने विपक्ष बहुत बौना हो गया।
1973 में अहमदाबाद, गुजरात से विद्यार्थी आंदोलन की लहर उठी, जिसको कि देश के मूर्धन्य नेता जयप्रकाश नारायण ने अपना समर्थन दे डाला। इसका परिणाम हुआ कि समस्त देश इंदिरा विरोधी लहर की चपेट में आ गया। सत्ता के मद में चूर कांग्रेस सरकार ने अहिंसक जन आंदोलन का जबरदस्त दमन किया। इसी दौर में इंदिरा गांधी के विरूद्ध दायर चुनाव याचिका पर यूपी हाईकोर्ट का फैसला आ गया। अपने निकट सहयोगियों की सलाह पर इंदिरा गांधी ने देश पर अपने निजी स्वार्थ में इमरजेंसी थोप दी! यदि देश की संसद में विपक्ष इस कदर अशक्त नहीं होता तो संभवतया इंदिरा गांधी के लिए यह मुमकिन ही न हो पाता कि वह देश पर मनमाने तौर पर इमरजैंसी आयद कर देती।
आपातकाल के समापन के पश्चात सन् 1977 का आम चुनाव पुनः एक तरफा सिद्ध हुआ और इस बार संपूर्ण उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया! अत्यंत प्रचंड बहुमत से चार दलों के विलय से गठित जनता पार्टी सत्तानशीन हो गई। कांग्रेस की तर्ज पर विपक्ष को एकतरफा बहुमत भारतीय जनमानस ने प्रदान कर दिया। इससे जनता पार्टी के बड़े नेताओं को अंहकार ने घेर लिया और जनता पार्टी मात्र ढाई साल के इतिहास में ही छिन्न भिन्न हो गई।
देश का लोकतांत्रिक इतिहास यही बताता है कि भारत में भावुकता से लबरेज लोकतंत्र कायम रहा है। इंदिरा गांधी के कत्ल के बाद आयोजित हुए आम चुनाव में तो कमाल हो गया, जबकि नौसिखिए राजनेता राजीव गांधी को इंदिरा जी के कल्ल से देश के ग़मज़दा जनमानस ने लोकसभा में 404 सीटों का प्रचंड बहुमत प्रदान करके सभी पुराने रिर्काड्स को ध्वस्त कर दिखाया। लुंजपुंज विपक्ष कारगर तौर पर सरकार की मनमानी का सामना कदाचित नहीं कर पाता। लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष लोकतंत्र को गरिमा प्रदान करने के साथ ही उसे ताकतवर बनाता है। अन्यथा एकछत्र सत्ता के नशे में मदहोश हुकूमत मनमाना गैरलोकतांत्रिक आचरण किया करती हैं।
विश्व के सभी ताकतवर लोकतंत्रों से यही सबक मिलता है कि विपक्ष का ताकतवर होना भी बेहद जरूरी है। विपक्ष दरअसल एक लगाम का काम करता जब सत्तानशीन दल मनमाने तौर गलत आचरण अंजाम दे तो सशक्त विपक्ष उसे पर कसकर लगाम कसे और संवैधानिक मार्ग से कदाचित उसे भटकने नहीं दे। भारतीय लोकतंत्र वस्तुतः अभी पूरी तरह परिपक्व होने में संलग्न है। जातिवाद, सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद, धनतंत्र और अपराधीकरण के जिन्न अभी इस पर सवार हैं और इससे बुरी तरह से चिपटे हुए हैं, जिनसे निज़ात पाने के लिए भारतीय लोकतंत्र छटपटा रहा है। जातिवाद और राजनीति के अपराधिकरण के लिए कुख्यात बिहार ने जैसे लोकतांत्रिक चमत्कार भी कर दिखाया है कि इनसे मुक्ति पाकर उसने आर्थिक तरक्की ओर सुशासन के लिए नीतिश कुमार को इतने विशाल बहुमत से पुनः सत्तानशीन कर दिया। आधे से अधिक भारतीय जनमानस अशिक्षित होकर भी लोकतंत्र का अत्यंत कामयाबी के साथ निर्वाह कर कर रहा है और उसे निरंतर ताकतवर भी बना रहा है। अभी तक केवल केरल जैसा सुशिक्षित राज्य ही इस अद्भुत लोकतांत्रिक संतुलन का परिचय दे पाया है, जिसकी संपूर्ण देश को सदैव दरक़ार रही है। यहां तक कि राजनीतिक तौर पर बंगाल जैसा परिपक्व राज्य भी सीपीएम को एक तरफा तौर पर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता सौंपता आया है, जिसका खराब नतीजा बंगाल को अंतराल में भुगतना ही पड़ा। बेहतर हो कि शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाए जाने के पश्चात देश अपनी जहालत को पूर्णतः खत्म कर डालेगा और वास्तव में विश्व का सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र बनकर उभरेगा।

प्रभात कुमार राय
पूर्व प्रशासनिक अधिकारी

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