>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


Rumi-A Spiritual Treasury

Posted: 04 Dec 2010 08:58 AM PST

1.
पानी ने गंदगी से कहा-
“मेरे पास आओ”
गंदगी ने कहा-
“मुझे बहुत शर्म आ रही है”

पानी ने जवाब दिया-
“मेरे सिवा
तुम्हारी शर्म कैसे धुल सकती है?”
2.
दुनिया एक क़ैदखाना है
और हम क़ैदी !
क़ैद ख़ाने की दीवारों में छेडद करके
ख़ुद को आज़ाद कर लो.

अनुवाद: देवी नागरानी

हिंदी चिट्ठों की नई सूची

Posted: 04 Dec 2010 08:40 AM PST

हिंदी चिट्ठों की नई सूची लेकर हम फ़िर हाजिर हैं |  इन नये चिट्ठों की सूची में जो भी पसंद आये उस लिंक को अपने बुकमार्क में सुरक्षित करें  या चाहें तो गूगल फ्रेंड कनेक्ट के जरिये भी चिट्ठों की प्रविष्टियों को सीधे अपने ब्लोगर डेशबोर्ड पर प्राप्त कर सकते हैं | तो पढ़िये और इनका हिंदी वेब-जगत में अपनी प्रतिक्रिया से स्वागत करिए |

1. जीवन की तलाश में (http://jitendravidyarthi.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: जितेन्द्र देव पाण्डेय ‘विद्यार्थी’

2. ‘क्षितिज’ The Horizon (http://balijagdish.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: JAGDISH BALI

3. Rajesh Lecturer (http://rajeshlecturer.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Rajesh Kumar Nagar

4. सत्य वचन (http://satyavachan0.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Tata

5. ओशो …… 7 (http://oshoonetwo6.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: xyz

6. ओशो …… ओशो (http://oshoonetwo7.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: xyz

7. A Lost Diary . . . (http://pspworld321.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Pushpendr@

8. रसबतिया (http://rasbatiya.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: -सर्जना शर्मा-

9. RAJENDER29 (http://rkbishnoi.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: rajender

10. नेपथ्य में (http://nepathyame.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Brijesh Upadhyay

11. अज़ब राम कहिन (http://rjduniya.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: RANJEET

12. Fursat Ke Raat-Din (http://fursatkeraatdin.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Amit Gupta

13. सच्ची बाते (http://sachhibattein.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Tata

14. बचा-खुचा (http://bachakhucha.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: manoj vyas

15. हमारीवाणी.कॉम (http://www.blog.hamarivani.com/)
चिट्ठाकार: हमारीवाणी.कॉम

16. Seervi Bandhu – सीरवी बन्धु (http://seervibandhu.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: सीरवी बन्धु

17. चौहान कि बातें (http://chauhanview.blogspot.com/) समाज
चिट्ठाकार: चौहान

18. ओशो अमृत वचन सच्ची बाते (http://sachhibattein12.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: xyz

19. PREETY SETHIA (http://preetysethia.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: PREETY SETHIA

20. Krishana (http://livekrishana.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: krishan kumar

21. फालतू लोगो का ब्लॉग (http://riteshthakur2010.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: ritesh thakur

22. मंगलायतन (http://mangalaayatan.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: मनोज पाण्डेय

1. Suryadeep Says (http://suryadeepjaipur.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Suryadeep Ankit

2. ज्योतिष & Kundli (http://rajjyotish2009.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: D.Prabhakar

3. ni:shabd (http://chupkiawaz.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: ni:shabd

4. कानपुर ब्लोगर्स असोसिएसन(Kanpur Bloggers Association) (http://kanpurbloggers.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: DR. PAWAN K MISHRA

5. ∮Dialect Update of Classic∮ (http://newsupdate-c.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: ∮Update of Classic∮Protestant is Christianity †††基督教新教

6. THE FEARLESS MIND (http://abhay9211.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: ABHAY TIWARI

7. Dainik Bhaskar (http://bhaskar-news.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Yadvendra Sharma

8. थोड़ी ज़मीन थोड़ा आसमान (http://akshaybafila.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Akshay Bafila

9. सुभाष मलिक (http://maliksubhash.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Subhash Malik

विकिलीक्स के खुलासे और भारत की भावी विदेश नीति

Posted: 04 Dec 2010 06:08 AM PST

विकिलीक्स के खुलासों ने दुनिया के सामने अमेरिकी कूटनीति को उघाड़ कर रख दिया है.विकिलीक्स द्वारा सार्वजनिक की गई २.५ लाख सूचनाओं में से ३ हजार का सम्बन्ध भारत से है जिनसे अमेरिका के साथ-साथ पाकिस्तान और चीन की भारत के प्रति सोंच का भी पता चलता है.एक तरफ तो अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा भारत की धरती से भारत के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का सदस्य बनाने का समर्थन कर रहे हैं वहीँ दूसरी ओर उनका शासन भारत को इसकी सदस्यता का स्वघोषित उम्मीदवार मानता है.वाह क्या दोस्ती निभाई जा रही है!मुंह में राम बगल में छूरी.इतना ही नहीं अमेरिका ने २६-११ के बाद भारत की ख़ुफ़िया नाकामियों की आलोचना करने में भी सिर्फ इसलिए संकोच बरता क्योंकि उसे इस बात का डर था कि ऐसा करने से भारत को पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उकसावा मिल सकता है.एक तरफ तो वह अफगानिस्तान में भारत से हजारों करोड़ रूपये का निवेश करवाता है तो दूसरी ओर पाकिस्तान को खुश करने के लिए अफगानिस्तान पर होने वाली अंतर्राष्ट्रीय बैठकों से भारत को अलग भी रखता है.जब अफगानिस्तान से भविष्य में भारत को कुछ नहीं मिलनेवाला फ़िर भारत सरकार क्यों वहां पैसा लगा रही है,यह तो वही जाने.अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि पाकिस्तानी सेना और पाक ख़ुफ़िया एजेंसियां एक साथ अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान और भारत में आतंक फैला रहे लश्करे तैयबा जैसे संगठनों को सहायता प्रदान कर रही हैं फ़िर भी वह उस पर सिर्फ तालिबान को काबू में करने के लिए दबाव डालता रहा है.भारत की चिंता पर उसने सिर्फ जुबानी जमा खर्च किया है,पाकिस्तान पर दबाव डालने का प्रयास नहीं किया है.इतना ही नहीं पिछले ७० सालों से पाकिस्तान को जब-जब अमेरिका ने सैन्य और वित्तीय सहायता दी है उसने इसका इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ भारत के खिलाफ किया है.विकिलीक्स द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों के अनुसार वर्तमान अमेरिकी शासन भी इस तथ्य से अवगत है फ़िर भी वह लगातार पाकिस्तान को सैनिक साजो-सामान और अरबों डॉलर की सहायता इस नाम पर देता जा रहा है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिका का सहायक है.दस्तावेजों में अमेरिका ने साफ़ तौर पर माना है कि पाकिस्तान में शासन की वास्तविक बागडोर सेना के हाथों में है और जरदारी सिर्फ कठपुतली हैं.अमेरिका यह भी मानता है कि पाकिस्तान कभी भी तालिबान का पूरा खात्मा नहीं होने देगा फ़िर भी वह भारत के बदले उसे आतंकवाद के विरुद्ध चल रहे युद्ध में साथ रखे हुए है.हमें समझ लेना चाहिए कि भारत सिर्फ अमेरिका की आर्थिक मजबूरी है जबकि पाकिस्तान उसका पुराना प्यार है.अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका आज भी उसके साथ जाना ज्यादा पसंद करता है न कि भारत के साथ.दस्तावेजों से स्पष्ट है कि भारत अगर पाकिस्तान स्थित आतंकवादी शिविरों को नष्ट करने के लिए हमले करता है तो भारत को निश्चित रूप से पाकिस्तान के परमाणु हमले का सामना करना पड़ेगा.इसलिए हमारे लिए आवश्यक हो जाता है कि हम मिसाईलों को हवा में ही नष्ट करने वाले प्रक्षेपास्त्रों का शीघ्रातिशीघ्र विकास करें.दस्तावेजों के अनुसार हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार चीन भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता के मुद्दे पर भारत का ऊपर-ऊपर से तो समर्थन कर रहा है जबकि वास्तव में वह सुरक्षा परिषद् के विस्तार के ही पक्ष में नहीं है.अमेरिका यह भी मानता है कि पाकिस्तान दुनिया में व्यापक संहार वाले हथियार सबसे तेज गति से बनाने की क्षमता रखता है.उसे यह भी पता है कि पाकिस्तान चीन का भी निकट मित्र है और चीन अपने सभी बांकी पड़ोसियों के प्रति शत्रुता का भाव रखता है.साथ ही वह इस बात से भी अनभिज्ञ नहीं है कि चीन पाकिस्तान का भारत के विरुद्ध इस्तेमाल करता रहा है.इन खुलासों के बाद भी अगर भारत सरकार अपनी विदेश नीति की समीक्षा नहीं करती है तो यह उसका शुतुरमुर्गी व्यवहार माना जाएगा जो संकट आने पर बालू में इस उम्मीद में मुंह छिपा लेता है कि ऐसा करने से संकट टल जाएगा.अमेरिका को पाकिस्तान के भारत विरोधी आतंकवाद को समर्थन देने से कोई ऐतराज नहीं है.उसे सिर्फ इस बात से मतलब है कि अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई में पाकिस्तान सच्चे मन से मदद दे.जबकि सच्चाई तो यह है कि आतंकवादी एक हैं और उनके बीच अमेरिका विरोधी या भारत विरोधी होने के आधार पर विभाजन की रेखा नहीं खिंची जा सकती है.अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा जब हाल ही में भारत से मदद मांगने आए तो हमने दिल खोलकर उनकी मदद की जबकि हम आज भी दुनिया के सबसे गरीब और कुपोषित देशों में से हैं.लेकिन यह उतना ही दुखद है कि अमेरिका हमें मूर्ख मानता है और हमारी मित्रतापूर्ण भावनाओं की उसे तनिक भी क़द्र नहीं है.विकिलीक्स के खुलासों ने दुनिया के कूटनीतिक इतिहास को विकिलीक्स से पहले और विकिलीक्स के बाद, दो भागों में बाँट दिया है.अब बदले हुए हालात में भारत को भी अपनी कूटनीति की समीक्षा करनी चाहिए जिससे कोई भी देश हमसे एकतरफा लाभ न उठा सके.साथ ही सरकार को यह समझ लेना होगा कि चाहे वह संयुक्त राष्ट्र में अधिकारों की लड़ाई हो या पाक समर्थित आतंकवाद से संघर्ष का मसला हो हमारी लड़ाई अमेरिका सहित कोई भी दूसरा देश नहीं लड़ने वाला.हमें अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी.वर्तमान विश्व में अगर हमें अग्रणी भूमिका निभानी है तो हमें यथासंभव व्यावहारिक नीतियाँ अपनानी होगी.किसी को कुछ भी देने से पहले यह देखना होगा कि बदले में हमें क्या प्राप्त होने जा रहा है.कहीं मित्रता प्रदर्शित करने वाला राष्ट्राध्यक्ष मीठी-मीठी बातें बोलकर हमें धोखा तो नहीं दे रहा है.चीन के प्रति भी हमें सावधानी रखनी पड़ेगी क्योंकि संबंधों में कथित सुधार से उसे ही ज्यादा लाभ हुआ है.दूसरी ओर उसके साथ हमारे सिर्फ आर्थिक सम्बन्ध सुधरे हैं सीमा विवादों पर उसका रवैया आज भी उतना ही कठोर और शत्रुतापूर्ण है.जहाँ तक पाकिस्तान का प्रश्न है तो अब यह आईने की तरह हमारे सामने है कि वहां वास्तविक शासन आज भी सेना के हाथों में है इसलिए उसके साथ सम्बन्ध सुधरने की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है.हमें उसे दुनिया में अलग-थलग करने का प्रयास करना चाहिए और इसमें सबसे बड़ी बाधा बनेगा हमारा नया मित्र अमेरिका.

निर्वाण प्राप्त कराने का धंधा

Posted: 04 Dec 2010 05:33 AM PST

हमारा सनातन धर्म जीवों के संसार में आवागमन में विश्वास करता है और हम सभी सनातनी इस आवागमन के चक्कर से मुक्ति चाहते हैं.इस मुक्ति को ही शास्त्रों में मोक्ष कहा गया है.विदेशों में चर्चों ने पैसे लेकर स्वर्ग के टिकट बेचे.लेकिन वहां तो यह मध्यकाल में हुआ.हमारे देश में प्राचीन काल में ही सबसे पहले बोधिसत्वों ने धन लेकर निर्वाण प्राप्त कराने का धंधा शुरू किया जबकि मोक्ष के लिए प्रयास करना नितांत वैयक्तिक कर्म है.कालांतर में यह धंधा इतना गन्दा हो गया कि लोगों का बौद्ध धर्म से विश्वास ही उठ गया और भारत की धरती यानी बौद्ध धर्म की जन्मभूमि पर ही इसका कोई नामलेवा नहीं रहा.बाद में अद्वैत और फ़िर भक्ति आन्दोलन दोनों में ही ज्ञानी और ज्ञेय तथा भक्त और भगवान के बीच मध्यस्थ की भूमिका समाप्त हो गई.फ़िर इस २१वीं सदी में लोग कैसे स्वामी नित्यानंद जैसे मक्कारों की बातों में आ जा रहे है,आश्चर्य है.इसका सीधा मतलब है कि इस आधुनिक युग में भी मूर्खों की कोई कमी नहीं है.जहाँ तक नैतिकता का प्रश्न है तो इस दिशा में यह युग तुलसीदास द्वारा वर्णित कलिकाल से भी दो कदम आगे निकल चुका है और गोपी फिल्म के प्रसिद्ध भजन ‘रामचंद्र कह गए सिया से’ को चरितार्थ करने लगा है.संन्यास तो सब कुछ को सब कुछ के चरणों में अर्पित कर देने का नाम है,निरा त्याग का मार्ग है.किसी भी भगवा वस्त्रधारी को धन,संपत्ति या स्त्री यानी किसी भी प्रकार की माया की ईच्छा रखने या प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है.वैसे संन्यासियों का वर्जित कर्मों में लिप्त होना कोई नई बात नहीं है.हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार अमृत लाल नागर ने अपने उपन्यास मानस का हंस जो संत तुलसीदास की जीवनी है,में मध्यकाल में मठों-मंदिरों में व्याप्त अवैध यौनाचार का विस्तार से वर्णन किया है.कबीर ने भी माया को महाठगनी बताते हुए संन्यासियों को भी इससे मुक्त नहीं बताया है-माया महाठगनी हम जानी,तिरगुन कास लिए कर तोले बोले मधुरी बानी.इससे और पहले के काल में जाएँ तो बौद्ध संघों में भी स्त्रियों को प्रवेश बुद्ध ने यह कहते हुए दिया था कि अब संघ ज्यादा समय तक नहीं चल पाएगा.मैं यह नहीं कह रहा कि स्त्रियम नरकस्य द्वारं.उन्हें तो किसी भी तरह से दोषी ठहराया ही नहीं जा सकता क्योंकि समाज का निर्णयन,नियमन और संचालन हमेशा पुरुषों ने ही किया है.बल्कि मेरी नजर में दोषी कामेच्छा रखने वाले स्वामी नित्यानंद जैसे संन्यासी हैं.मोक्ष और काम का ३६ का सम्बन्ध है और यह व्यभिचारी काम द्वारा मोक्ष प्राप्ति की बातें करता है.मिट्टी तेल डालकर आग को बुझाने की बात कर रहा है यह,हद हो गई.उस पर हद यह है कई महिलाऐं उसके बहकावे में आ गईं और अपना सर्वस्व गँवा बैठीं.दक्षिण भारत में पहले से भी मंदिरों में देवदासी प्रथा के नाम पर यौनाचार की परोक्ष रूप से स्वीकृति रही है.शायद इसलिए नित्यानंद ने दक्षिण भारत को अपना कुकर्म क्षेत्र बनाया.धर्म समाज का अहम् हिस्सा है,नियामक है.इसलिए धार्मिक क्रियाकलापों में लगे लोगों का स्वच्छ चरित्र का होना अतिआवश्यक है.विवेकानंद का तो सीधा फार्मूला था कि जो कर्म हमें ईश्वर के निकट ले जाए वे कर्त्तव्य कर्म हैं और जो दूर ले जाए वे अकर्तव्य.अगर सम्भोगेच्छा इतनी ही प्रबल है तो गृहस्थाश्रम अपना लो और खूब भोग करो.दो नावों की सवारी का परिणाम सर्वविदित है.पहले भी ऐसे उदाहरण रहे हैं जब लोगों ने संन्यास लेने के बाद फ़िर से गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया है.महान संत ज्ञानेश्वर के पिता ने भी ऐसा किया था.संन्यासी जाति के लोगों के पूर्वज भी कभी संन्यासी थे.इसलिए ऐसा करना पाप कर्म नहीं होगा बल्कि पाप तो पवित्र गेरुआ वस्त्र को कलंकित करना है.मेरा मानना है कि जो भी संन्यासी इस प्रकार के वर्जित क्रियाकलापों में लिप्त पाए जाते हैं उन्हें निश्चित रूप से कठोर से कठोर दंड दिया जाना चाहिए और यही उनका प्रायश्चित भी होगा.यह आधुनिक युग विज्ञान और तर्क का युग है और इस युग में किसी को भी अंधविश्वासों द्वारा जनता को बरगलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.इसलिए मैं पूरे भारत के मंदिरों से देवदासी या उस तरह की किसी भी प्रचलित प्रथा की समाप्ति का आह्वान करता हूँ क्योंकि यह कुछ और नहीं निरी मूर्खता है.ईश्वर या देवताओं के साथ कन्याओं के विवाह की कल्पना करना भी इस युग में पागलपन है.क्या इसके समर्थक जनसमुदाय को देवता या ईश्वर का साक्षात्कार करा सकते हैं?नहीं!!!तब फ़िर इस अमानवीय प्रथा का अंत क्यों न कर दिया जाए जिससे सैंकड़ों ललनाओं का जीवन सुगम और पवित्र बन सके और वे अपनी अन्य हमउम्र लड़कियों की तरह सामान्य जीवन व्यतीत कर सकें?

अर्थिक आतंकवाद है भ्रष्टाचार

Posted: 04 Dec 2010 05:24 AM PST

क्या भ्रष्टाचार एक तरह का अर्थिक आतंकवाद नही है? ऐसा आतंकवाद जो देश की तरक्की में सबसे बड़ा बाधक है। जिसे देश में गरीबी का यह आलम है कि 77 फीसदी आबादी एक दिन में 20 रूपये से ज्यादा खर्च करने की हैसियत नही रखती है, वहां अरबों खरबों की लूट का लाइसेंस किसी को कैसे दिया जा सकता है ? जहां तन ढंकने के लिए कपड़ा, सर छुपाने के लिए छत और पेट भर रोटी के लिए करोड़ों लोग रोजाना जददोजेहद कर रहे हों वहां कलमाड़ी और ए राजा जैसे लोगों का बोझ कैसे उठाया जा सकता है ? दुर्भाग्य इस देश का यह है कि आज यहां आवाज उठाने वाला कोई नही है। मानो सबने भ्रष्टाचार को सच्चाई मानकर स्वीकार कर लिया हो। किसी भी ने प्रतिरोध करने की जहमत नही उठाई। जो कर रहे है उनके दामन खुद दागदार है। बड़ी पीडा़ होती है तब जब भूख से अकुलाते बालक को देखता हूं। दुख होता है जब विश्व भुखमरी सूचकांक के आंकड़ों की ओट में भारत का स्थान देखता हूं। गुस्सा आता है जब बड़ी मछलियां अपने रसूख के चलते कानून को ढेंगा दिखाकर बच निकलते हैं। खून खौलने लगता है जब नेता अपने फायदे या नुकसान को ध्यान में रखकर इन मुददों को उठाते है और भूल जाते हैं। भले ही नेताओं को यह मुददा वोट पाने का औजार लगता हो, मगर हमारे जैसे नौजवानों के लिए यह जीवन मरण का प्रश्न है। जिसे देश में किसान आत्महत्या कर रहें हों, बच्चों की एक बड़ी आबादी कुपोषण का शिकार हो, महिलाओं में खून की कमी हो, अवसंरचना विकास के लिए धन की कमी एक बड़ा रोड़ा हो, पुलिस जज और शिक्षकों के लाखों पद खाली पड़े हों, गांव में पीने का पानी, स्वच्छता और बिजली का अभाव हो वहां भ्रष्टाचार को एक साधारण घटना मान लेना या भ्रष्टाचारियों को प्रश्रय देना आत्मघाती साबित होगा। आज यह बात पूरा देश जानता है कि स्विस बैंकों में सबसे ज्यादा काला धन भारतीयों का है। यह इतना है कि भारत का कर्ज और गरीबी दोनों मिट सकती है। मगर इस आग में हाथ डालने की हिम्मत किसी की भी नही। उनकी भी नही जो आम आदमी के साथ अपना हाथ होने का पाखण्ड करते है या वो जो पार्टी विद द डिफरेन्स होने का स्वांग रचते हैं। सच तो यह है कि यह उस भूखे भेड़िये की तरह हैं जो मौका मिलने पर मांस को लोथड़ों को नोचने के लिए तैयार रहते है। आजाद भारत को सपना जो बलिदानियों ने देखा था वह टूटता प्रतीत हो रहा है। आज जरूरत है इस सपने को टूटने से बचाने की, मिलकर एक आवाज उठाने की जो इस भ्रष्टतन्त्र की नीव को हिला सके। मगर इसके लिए जरूरी है कि समय रहते कुछ बड़े कदम उठाने की। पहला भ्रष्टाचार एक तरह का आतंकवाद है जिसकी सजा भी वही होनी चाहिए जो आतंक के खिलाफ बनाये गए काननू में लिखी है। दूसरा भ्रष्टाचार के मामलों के निपटारे के लिए विशेष अदालतों का गठन हो जिसकी समय सीमा प्रति मुकदमा 6 महिना हो। तीसरा लोगों को इस मुददे को गम्भीरता से लेते हुए सोचना होगा की कौन सा ऐसा राजनीतिक दल है जो इस कैंसर से निपटने में अपनी कथनी और करनी में फर्क न करे जो मैं मानता हूं कि मुश्किल काम है।

करदाताओं से एक सवाल ?

Posted: 04 Dec 2010 03:50 AM PST

ईसवी सन १९६४ में – कलकत्ता में – ९ वीं कक्षा में पढ़ते समय कॉलेज स्ट्रीट एवं निकट के स्थानों में अपनी आँखों के सामने कलकत्ता ट्रामवे कंपनी की ५ ट्राम कार जलीं हुई देखीं | कलकत्ता में अन्य स्थानों पर भी ८ ट्राम कार जला दी गयीं थीं | कुल मिला कर १३ ट्राम कार जला कर पूर्णरूप से नष्ट कर दी गयीं थीं |

कलकत्ता ट्रामवे कंपनी का अपराध यह था कि मंहगाई बढ़ने के कारण बहुत डरते डरते उन्होंने केवल १ पैसा भाड़ा बढाया था – अर्थात १२ पैसे की टिकट का भाव बढ़ा कार १३ पैसे किया गया था | अतः १३ पैसे के सांकेतिक रूप में १३ ट्राम कार जला कर कलकत्ता ट्रामवे कंपनी को दण्डित किया गया |

जब मुझ समेत अन्य यात्रियों को धमका कर ट्राम से बाहर निकाला जा रहा था एवं ट्राम कर के अन्दर केरोसिन तेल छिड़का जा रहा था – तब मैंने ध्यान पूर्वक देखा कि आग लगाने वाले उन समाज कंटकों में से एक भी – आचरण से – पहनावे से – शकल सूरत से – वाणी के प्रयोग से – किसी शिक्षित अथवा करदाता माता पिता की संतान नहीं लग रहा था |

ऐसा भी नहीं लग रहा था कि वे लोग कहीं नौकरी कर रहें हो – और यदि कर भी रहें हों तो एक दिन का आने जाने का मिला कर कुल २ पैसा इतना भारी पड़ रहा हो कि उस समय की कीमत की लाखों रुपयों की ट्राम जला दी जाय |

कार्यालयों में काम करने वालों को – कारखानों में काम करने वालों को – विद्यार्थियों को अथवा यदा कदा यात्रा करने वाले नागरिक को १ पैसा भाड़ा बढ़ जाने से विचलित होने की अथवा क्षुब्ध होने की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई क्योंकि उस घटना के बाद सभी सभान्त नागरिकों ने समाज कंटकों के इस दुष्कर्म की घोर निंदा की | निंदा करने के अलावा सभ्रांत नागरिक कर भी क्या सकते हैं ?

उस घटना ने मेरे मन पर अमित छाप छोड़ी | १९६४ से अभी २०१० तक के इन ४६ वर्षों में मैंने कई स्थानों पर समाज कंटकों द्वारा कर दाताओं के पैसे से खरीदी गयी सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत सम्पत्ति को सर्वथा अकारण नष्ट करते हुए देखा है |

यदि किसी प्रकार का विरोध प्रकट करना हो सम्बंधित व्यक्ति अथवा कार्यालय में जा कर विरोध व्यक्त करना उचित है – न कि कर दाताओं के धन से खरीदी गयी सार्वजनिक सुविधाओं की वस्तुओं पर |

समाचारों में प्रायः यह कहा जाता है कि अमुक अमुक सरकारी सम्पत्ति नष्ट की गयी | देश में सार्वजनिक सुविधाओं की वस्तुओं को सरकारी सम्पत्ति कहना मूर्खता की पराकाष्ठा है – क्योंकि सरकार कर दाताओं के पैसे पर चलती है एवं जो व्यक्ति सरकार चलाते हैं एवं सरकार कहलाते हैं – वे तो अपना एक पैसा भी सरकारी सम्पत्ति के क्रय में नहीं देते हैं | वास्तव में सरकारी सम्पत्ति कहलाने वाली समस्त वस्तुएं – कर दाताओं की सम्पत्ति हैं | सरकार वोटों पर नहीं चलती है – सरकार कर दाताओं के धन पर चलती है – क्या कर दाताओं को इस सत्य का ज्ञान है ?

भारत के समस्त कर दाताओं को यह विचार गंभीरता पूर्वक करना है कि क्या उनके पैसों से खरीदी गयी सार्वजनिक सुविधाओं की वस्तुओं को नष्ट करने का अधिकार समाज कंटकों को देना उचित है ?

आनंद जी.शर्मा

भ्रष्टाचार – दूर होने की संभावनायें दूर दूर तक नहीं

Posted: 04 Dec 2010 01:28 AM PST

किसी ने कहानी सुनाई थी. सच्ची या झूठी, पता नहीं. बताया कि एक यूरोपियन देश में ट्रेन चलना प्रारम्भ हुई. लोगों ने यात्रा करना प्रारम्भ किया. हमारे यहां की ही तरह वहां भी बिन टिकट चलने वालों की कमी न थी. नतीजा हुआ रेल को नुकसान. मन्त्रियों में चर्चा हुई. एक ने सुझाव दिया कि दस लोगों को फांसी देना पड़ेगी और बेटिकट चलना खत्म हो जायेगा. सुझाव नहीं माना गया. लोग बेटिकट चलते रहे, पकड़े जाते रहे, जुर्माना देते रहे, छूटते रहे. समय बीता, घाटा बढ़ता रहा. अन्त में दस लोगों को फांसी का सुझाव माना गया. उस मन्त्री ने सघन जांच कराई और एक माह में जो व्यक्ति सबसे अधिक बार बेटिकट पकड़ा गया, उसे फांसी देने की घोषणा हर जगह कराई गई. पूरे एक माह तक. अन्त में उसे एक सार्वजनिक स्थान पर फांसी दे दी गयी. इसी प्रकार यह कार्यक्रम दस माह तक चालू रहा. अन्तिम परिणाम रहा कि लोग टिकट लेकर चलने लगे.

कई जगह पढ़ा है कि भ्रष्टाचारियों को फांसी होना चाहिये. अच्छी बात है. लेकिन इसके लिये खुफिया तन्त्र, न्यायतन्त्र मजबूत हो, तवरित हो, अच्छा हो, सच्चा हो. लेकिन जो भ्रष्टाचार कृत्रिम मंहगाई के रूप में है, उस पर कैसे काबू आयेगा. समाज/मार्क्स/पूंजी वादों की अपनी अपनी अच्छाइयां-बुराइयां हैं. ताना/राज शाही कोई स्वागत करने योग्य व्यवस्था नहीं है. तन्त्र वही होता है, लेकिन मालिक के इशारे भर से उसकी चाल बदल जाती है. पुलिस वालों की लाठियां कभी रुकती नहीं, बस पीठें बदल जाती हैं. लोग कहते हैं संविधान फेल हो गया, साठ साल में सैकड़ों संशोधन करना पड़ गये. मैं कहता हूं संविधान फेल नहीं हुआ, फेल हुई उन लोगों की  नीयत जिनके हाथों में संविधान दिया गया था. जिस तरह के लोग राजनीति और सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं, उनके रहते भ्रष्टाचार पर काबू पाना सम्भव है ही नहीं. अब इलाज क्या है?  कुछ नहीं. क्यों? अपना सुख त्यागे कौन. हराम की मिले तो छोड़े कौन. किसे मलाई नहीं चाटनी भ्रष्टाचार की. जिस लड़के को कुर्सी पाने से पहले हर चौराहे पर होती खुलेआम वसूली दिखाई देती है, कुर्सी पाने के बाद उसकी आंखों पर हरे नोटों की पट्टी बंध जाती है. जो थोड़े से ईमानदार ऐसे तन्त्र में भी बच जाते हैं, उन्हें उनके  करप्ट अधिकारी तोड़ देते हैं. या तो उस निजाम का हिस्सा बनो और अपना हिस्सा निकाल लो या फिर अपना मत लो पूरा हिस्सा लेने को वह तैयार बैठा है, लेकिन गलत काम तो करवायेगा ही. और उस बचे खुचे ईमानदार को करना पड़ता है. आप कहेंगे कि वह मना कर सकता है, बेशक, लेकिन ऐसे में उसे नौकरी करना दूभर हो जायेगा. ऊपर बैठे हुये भ्रष्ट भेड़िये सब एक हो जाते हैं और उस शख्स को जीना तक मुहाल कर देते हैं. कारण क्या है? भ्रष्टों की मशीनरी का हर पुर्जा बड़ी ईमानदारी से चलता है. भ्रष्ट एक दूसरे को बचाने के लिये एक हो जाते हैं, अपने गलत काम को भी सही करा लेते हैं, लेकिन ईमानदार एक नहीं होते. उनकी मशीनरी भी उतनी कामयाबी से नहीं चलती. वे अपने सही काम को भी नहीं करा पाते. और सबसे बड़ी बात यह है कि अब यह अनुपात शायद हजार के मुकाबले एक ही रह गया है. अंधेरा ही है चारों तरफ. प्रकाश की संभावनायें धूमिल हैं.

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