>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


खुशियाँ

Posted: 06 Dec 2010 07:29 AM PST

जिँदगी एक हीरा है जिसको तराशना इन्सान का काम है, कैसे और किस तरह वो यह करता है यह उसकी अपनी अकल व शकल का आईना होता है. हर एक को अपने इसी अक्स के साथ जीना पडता है.
जिँदगी इतनी अनमोल है फिर भी हम अपनी नादान सोच से उसको नापते तोलते रहते है, रिश्तों के जाल में उलझे रहते हैं, अपने ऊपर ध्यान कम, औरों पर ज्यादा देते हैं और इसी दौरान हम आहिस्ता आहिस्ता जीवन में अपनी राहों में आने वाली छोटी छोटी खुशियों को रौंदते रहते हैं, अफसोस इस बात का रहता है कि वह आकर चली जाती है और हमें मालूम ही नहीं पड़ता क्योंकि हमने दिल के दरवाजे इस कदर बँद कर दिये है कि वहाँ उनकी दस्तक भी नहीं पहुंचती.
ये खुशियाँ कुछ और नहीं अपने मन से उपजी हुई किरणों की रौशनी है जो अहसास बनकर हमें महसूस कराती है कि ग़म के अँधेरों को कैसे चीरकर एक किरण खुशी की राह रौशन कर सकती है. खुशी कोई बाज़ार में बिकने वाली चीज नहीं, जिसे हम पा लें, यह तो दुख के बीज बोकर, सब्र का खाधंय पाकर जब आंसूओं का पानी पाकर पनपती रहती है जब तक उसके नन्हें नन्हें अँकुर इन्सान के मन को सुखद वरदान की तरह मिलते हैं. जिँदगी को जीने का मतलब तब आम सोच वाला आदमी बहुत गहराई तक समझने लगता है. यह खुशियों रूपी नन्हीं कलियाँ, जिनको पाने के लिये हम मारे मारे फिरते हैं, छूने की कोशिश करते हैं हाथ नहीं आती, ये जिँदगी के साथ आँख मिचोली खेलती हैं, पास आकर कभी दूर चली जाती है, कभी तरसाती है, कभी तडपाती है, कभी हमारी खाइशों के साथ खेलकर उनका अस्तित्व हिलाकर रख देती है. पर कभी यूँ भी होता है कि खुशियाँ हमारी तलाश में मारी मारी फिरती है, ये हमारे करीब आने की जितनी कोशिश करती है, हम उतना ही उनसे दूर भागने की कोशिश करते हैं. वो हमारी तलाश में दिवानी, हम पागलों की तरह उनसे दूर भागने के प्रयास में मदहोश. उनके दाइरे में हम उस वक्त कदम रखते हैं जब यह खुशियाँ हम से कोसों मील दूर जा चुकी होती है. यही आँखमिचौली है, यही खेल है, यही जिँदगी है.
दायमी खुशी हर इन्सान के अँदर उसके लिये ही पनपती है, जिसको पाने के लिये उसे कई बार अपने आप से जूझना पडता है. किसी ने सच कहा हैः

“वफा में ऐसे जान दे कि दिल की अदालत में सजा ढूँढता फिरे”

दिलों में गर गुंजाइश हो तो खुशियों को हासिल करना कोई मुशकिल काम नहीं. सोच बदलने की देर है बाकी सब कुछ अपने आप बदलता रहेगा. यह बदलाव भी महसूस करने वाली एक खुशी है, खामोशी जिसकी जुबान है, यह तो सीप में मोती की तरह पनपती है और मन रूपी समुँद्र की गहराइयों में बसती है. पाने के लिये डुबकी गहरी लगानी पडती है, जो माहिर है वही मालिक है.

“कायल हूँ मैं रौशनी का
मेरे आस पास सवेरा है.”

यही खुशी की महक है, यही उसका अहसास है.

देवी नागरानी, २० फरवरी, २००१

राडिया के हम्माम में सभी नंगे हैं

Posted: 06 Dec 2010 01:24 AM PST

कहते हैं कि हम्माम में सभी नंगे होते हैं.दूसरों की क्या कहूं मैं खुद भी कपड़े पहन कर नहाना पसंद नहीं करता.कुछ बंधन जैसा लगता है या फ़िर लगता है कि नहाया ही नहीं.बचपन में सातवीं कक्षा में पढने तक मैं सार्वजनिक जगहों पर भी नंगा होकर निस्संकोच नहा लेता था.भारतीय नंगे होकर नहाने का महत्त्व हमेशा से समझते रहे हैं.यही कारण है कि सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेष स्थल मोहनजोदड़ो से कई विशालकाय हम्माम प्राप्त हुए हैं.सोंचिए अगर गोपियाँ नंगी होकर नहीं नहातीं तो कृष्ण को वस्त्रहरण की मधुर-लीला करने का महान व ऐतिहासिक अवसर कैसे प्राप्त होता और कृष्ण की इस लफुअई पर कैसे भागवतपुराण के प्रवचक-व्याख्याकार वारी-वारी जाते.खैर हम्माम में सभी नंगे होते हैं और ऐसा होने में कुछ बुरा भी नहीं है यह सभी मानते हैं.लेकिन आज के संचार क्रांति के युग में लोगों के नंगा होने के तरीके में भी हाईटेकपन आ गया है.पहले जब टी.वी. का महत्व ज्यादा था तब कई सांसद और अधिकारी टी.वी. पर नंगा होते दिखने लगे.कोई सीधे भौतिक रूप से नंगा होते हुए देखा गया तो कोई चारित्रिक रूप से और सगर्व यह कहता हुआ कि बाखुदा पैसा खुदा तो नहीं है लेकिन खुदा कसम यह खुदा से कम भी नहीं है.लेकिन तेजी से बदलती दुनिया में जल्दी ही टी.वी. से ज्यादा महत्वपूर्ण और अपरिहार्य हो गया मोबाईल फोन.तब लोगों ने फोन पर नंगा होना ज्यादा प्रतिष्ठापूर्ण समझा.अचानक साइबर अन्तरिक्ष में एम.एम.एस. के माध्यम से सेक्स क्लिपों की बाढ़ आ गई.लेकिन शारीरिक रूप से नंगा होते और नंगे होते लोगों को देखते-देखते लोग जल्दी ही उबने लगे और तब उनकी सहायता के लिए आगे आई नीरा राडिया जैसी पी.आर..राजनेता,व्यापारी और पत्रकार बारी-बारी नीरा राडिया के फोन पर पूरे मान-सम्मान के साथ नंगे होने लगे.सबका देशद्रोही और लालची रूप सामने आने लगा.अब तक श्रद्धा के पत्र रहे लोग अचानक मानव पद से नीचे गिरते देखे गए.राडिया की बदनाम दुनिया में कोई पैसों के बल पर सत्ता को नचाता पाया गया तो कोई पैसों के घूँघरू पहनकर नाचता हुआ-ता ता थई,तिक्ता तिक्ता थई.नीरा की कृपा से यह भी पता चला कि भारत सच्चे अर्थों में बहुत बड़ा और विविधतापूर्ण बाजार बन चुका है.ऐसा बाजार जहाँ सबकुछ बिकता है.सिर्फ खरीदने के लिए पैसा चाहिए.भाजपा से लेकर कांग्रेसी नेता तक,टाटा से लेकर नरेश गोयल और बरखा दत्ता से लेकर वीर सांघवी तक सब देश को धोखा देते और लूटते पाए गए.इतना नंगा तो कोई हम्माम में भी नहीं होता.वहां तो सिर्फ तन अनावृत रहता है लेकिन राडिया के फोनरूपी हम्माम में तो सबका मन ही नंगा हो गया और फ़िर लोगों का ऐसा विकृत रूप खुलकर सामने आया जो मन में केवल दो ही रसों की उत्पत्ति कर सकता था और वे रस थे या तो वीभत्स रस या फ़िर जुगुप्सा रस.

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