>अज़ीज़ बर्नी की अक्ल ठिकाने लगाने हेतु श्री विनय जोशी को बधाईयाँ… … Aziz Burney Apologized, Book 26/11 RSS Conspiracy

>मुम्बई हमले के बाद से लगातार पिछले 2 साल से राष्ट्रीय सहारा (उर्दू) के सम्पादक अज़ीज़ बर्नी ने 100 से अधिक लेख एवं एक पुस्तक “26/11, RSS Conspiracy” नाम की बेहूदा और देशद्रोही पुस्तक लिखकर न सिर्फ़ देश को अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति के स्तर पर शर्मिन्दा किया बल्कि RSS एवं हिन्दुओं के खिलाफ़ सतत जहर उगलते रहे। इनकी हाँ में हाँ मिलाने व पिछलग्गूपन को मात करते हुए दिग्विजय सिंह भी इसकी पुस्तकों के विमोचन समारोहों में जाते रहे, संघ को गरियाते रहे।

अब राष्ट्रीय सहारा ने अज़ीज़ बर्नी का खेद व माफ़ीनामा प्रकाशित किया है, जिसमें उसने कहा है कि “मेरा इरादा किसी को ठेस पहुँचाने का नहीं था, यदि मेरी बातों से किसी की भावनाओं को दुख पहुँचा हो तो मैं उसके लिये माफ़ी माँगता हूँ…”। देखा आपने, हद है मक्कारी की… यदि ठेस पहुँचाने का इरादा नहीं था तो इस पुस्तक को दो साल तक बाजा बजा-बजाकर क्यों बेच रहे थे? क्यों बार-बार हेमन्त करकरे की स्वर्गीय आत्मा को नोच रहे थे? संघ के बारे में जानते नहीं थे, तो क्यों अपना सड़ा हुआ मुँह फ़ाड़ रहे थे? और अब माफ़ी का ढोंग कर रहे हैं… जी हाँ ढोंग ही है, क्योंकि अभी भी अज़ीज़ बर्नी ने अपने बयान (माफ़ीनामे) में यह नहीं कहा कि 26/11 के लिये संघ पर आरोप लगाती हुई मेरी पुस्तक नम्बर एक की कूड़ा पुस्तक है…।

और ऐसा भी नहीं कि अज़ीज़ बर्नी की अक्ल अचानक ठिकाने आ गई हो, इसके पीछे नवी मुम्बई स्थित श्री विनय जोशी हैं जिन्होंने अपने वकील प्रशान्त मग्गू के जरिये, अज़ीज़ बर्नी और सहारा प्रकाशन, लखनऊ के खिलाफ़ दो साल पहले नवी मुम्बई की अदालत में देशद्रोह, भारत की सुरक्षा से खिलवाड़, मानहानि, भावनाएं भड़काने, भावनाओं को चोट पहुँचाने सम्बन्धी कोर्ट केस दायर किया था। इस कोर्ट केस की वजह से बर्नी को लगातार मुम्बई के चक्कर काटने पड़े, जिस वजह से उसे अपने अन्य अखबारी एवं व्यावसायिक काम करना मुश्किल हो गया था। अज़ीज़ बर्नी ने इस कथित माफ़ीनामे सम्बन्धी जो ई-मेल श्री विनय जोशी को भेजा है उसका मजमून इस प्रकार है–

———- Forwarded message ———-
From: Aziz Burney
Date: 28 January 2011 21:45
Subject: Letter for apology
To: Vinay Joshi

Dear Mr.Vinay Joshi,

Since last two years I am writing various articles regarding 26/11 Mumbai terror attack.You had filed court suit against me and Sahara Publications in Navi Mumbai court for my articles regarding Mumbai attack.I never wrote anything to deliberately hurt the feelings of anyone.But if you are disturbed or hurt due to any article or anything I quoted in my article,then I am extremely sorry for this.Hope you would accept my apology.

Also I am requesting you for the immediate withdrawal of court case filed against me in Navi Mumbai court,as it is creating professional difficulties for me and I cannot afford to bear cost of litigation.I never intended to target India’s security apparatus and any patriotic organisation working in India.but if there are any references made in my articles by mistake then I am really sorry for that.I assure you that I will not write anything in future that may hurt anyone and I will take utmost care for the same.Expecting quick withdrawal of court case once again.

Thanks & regards,

Aziz Burney,
Sahara India Complex,
C-2,3,4; Sector 11,Noida-201301
Phone:0120-2553921,2598419
Fax:0120-2545231,2537635

आपने ईमेल की भाषा का नमूना देखा? माफ़ी भी माँग रहा है और अकड़ भी दिखा रहा है…। यह बर्नी भी, दिग्विजय सिंह का ही भाई लगता है, जो सरेआम “26/11, संघ की साजिश” नामक इस पुस्तक के विमोचन में उपस्थित रहते थे लेकिन फ़िर भी कहते रहते थे कि मुम्बई हमलों में पाकिस्तान की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता, ऐसा दोमुँहापन कभीकभार ही देखने में आता है।

मैं सरकार से माँग करता हूँ कि इस पुस्तक को छापने और वितरित करने के पीछे क्या साजिश रही है इसकी विस्तार से जाँच होनी चाहिये, अज़ीज़ बर्नी को किसने यह पुस्तक लिखने के लिये पैसा दिया, बर्नी के खातों की भी जाँच होनी चाहिये, क्या इस पुस्तक के पीछे “कोई विदेशी हाथ” है, इस पुस्तक की कितनी प्रतियाँ अब तक बिकीं और कहाँ-कहाँ बिकीं? बिक्री की आय का क्या हुआ? इस प्रकार की जाँच शुरु किये जाने से भविष्य में देश की सुरक्षा एवं कूटनीति के खिलाफ़ किसी साजिश से बचा जा सकता है। भविष्य में ऐसी किसी पुस्तक के लेखक को सीधे जेल भेजने की व्यवस्था होनी चाहिये, सिर्फ़ फ़र्जी माफ़ीनामे से काम नहीं चलेगा।

श्री विनय जोशी को मेरी हार्दिक बधाईयाँ, आपके प्रयास स्तुत्य हैं। मैं आपसे अर्ज़ करता हूँ कि भले ही अज़ीज़ बर्नी ने “माफ़ी माँगने का नाटक” कर लिया हो, लेकिन इस केस को वापस नहीं लें, क्योंकि इसमें अभी कई रहस्य बरकरार हैं…। मकबूल हुसैन नामक फ़ूहड़ चित्रकार की तरह इसे भी तब तक जमकर रगड़ें, जब तक कि इसकी सारी हेकड़ी न निकल जाये…

और अज़ीज़ बर्नी में यदि ज़रा भी शर्म बची हो तो वे NDTV, तहलका और “टाइम्स नाऊ” के स्टूडियो (ये तीन सबसे बड़े हिन्दू विरोधी हैं) में अपने साथ दिग्विजय सिंह को ले जाएं और देश तथा संघ से खुलेआम माफ़ी माँगें, न कि इस तरह छिप-छिपाकर…। 

सन्दर्भ :- http://www.indianexpress.com/news/for-linking-rss-to-26-11-aziz-burney-says-sorry-on-front-page/743433/0

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>जो कुछ अक्सर नज़र आता है , हकीक़त उसके खिलाफ़ भी हुआ करती है The real situation

>

एक टी. वी. सीरियल के सैट पर
आपका भाई अनवर जमाल

@ भाई हरीश जी ! आप मेरी बात को देखिये और बताइए कि सलीम भाई को जो उपदेश मैंने दिया है , वह सच्चा है या नहीं ?
अगर वह झूठा होगा तो मैं उसे अभी छोड़ दूंगा .
किसी आदमी के सच्चे या झूठे होने का फैसला इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि लोग उसके बारे में क्या कहते हैं बल्कि उसका आधार यह है कि उसकी बात कितनी सच है ?
अब आप अपने कहे के मुताबिक़ मेरे शिष्य बन चुके हैं और मैंने आपको  ज्ञान देना भी शुरू कर दिया है .
अब आप मुझ पर आरोप लगाना छोड़ कर मुझ से कुछ सीखना शुरू करें वरना आपकी मर्ज़ी .
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/01/hungers-cry.html
खुद सलीम खान साहब से आप पूछियेगा कि मेरी सलाह उन्हें  ठीक लगी या ग़लत ?
आपमें संभावनाएं हैं , उन्हें काम में लायें .
मेरा एक मिशन है . मेरा प्यार , गुस्सा , झिड़की और धिक्कार , मेरा सोना-जागना , गर्ज़ यह कि एक एक गतिविधि सब कुछ  डिज़ाइण्ड है.
आप चाहे तो उसे सीख सकते हैं , मैंने आज तक किसी को उसे सिखाया नहीं है . मैंने आपसे कहा था कि जो कुछ अक्सर नज़र आता है , हकीक़त उसके खिलाफ़ भी हुआ करती  है , यह सच है .
ख़ैर जैसा आप चाहें .
बहस करनी है तो बहस करें .
सीखना है तो सीखें . हर तरह आपका स्वागत है .
अपने अहंकार के बारे में भी किसी दिन आपको ज्ञान दूंगा , तब आप जानेंगे कि भारत में ऐसे ज्ञानी भी हैं जो सांप के काटे की दवा सांप के ज़हर से ही बनाते हैं .  
http://hamarivani.com/blog_post.php?blog_id=173

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इस कमेन्ट की बैकग्राउंड जानने के लिए देखें –
http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2011/01/blog-post_29.html?showComment=1296316503459#c3042839187340538457

>ब्लॉगिंग के चार वर्ष पूर्ण हुए… सफ़र जारी है (एक माइक्रो-पोस्ट)…… Four years of Blogging, Hindi Blogs and Hindi Writing

>प्रिय पाठकों, मित्रों, शुभचिंतकों एवं जलने वालों… आपको सूचित करते हुए अत्यन्त हर्ष होता है कि इस ब्लॉग के 26 जनवरी 2011 को चार वर्ष पूर्ण हुए। जब ब्लॉगिंग शुरु की थी, तब सोचा नहीं था कि यह सिलसिला ज्यादा लम्बा चल सकेगा, लेकिन एक बार सफ़र चल पड़ा तो लोग साथ जुड़ते चले गये, मुझे भी अखबारों में लिखने के मुकाबले, ब्लॉगिंग में अधिक रस आने लगा (भले ही वहाँ के मुकाबले यहाँ पाठक बहुत कम हैं), और मैं इसी में रम गया…

चार वर्ष का यह सफ़र (कुछ) खट्टे – (अधिकतर) मीठे अनुभवों के साथ पूरा हुआ है, कई पाठकों से स्नेहिल, आत्मीय सम्बन्ध बने… कुछ से व्यक्तिगत मुलाकात भी हुई, जबकि कुछ से वर्चुअल “मुक्का-लात” भी हुई। कई हिन्दी-मराठी ब्लॉगर्स से काफ़ी कुछ सीखने को मिला, जोरदार बहस भी हुईं, लोकतांत्रिक वाद-विवाद भी हुए… लेकिन स्थाई मनमुटाव अब तक किसी से भी नहीं हुआ, मत-भेद कईयों से हैं, लेकिन मन-भेद किसी से भी नहीं।

गत एक वर्ष में पाठकों एवं सब्स्क्राइबर्स की संख्या में अचानक उछाल आया है, और ज़ाहिर है कि इससे उत्साह भी बढ़ता है। इस ब्लॉग को अब एक समाचार प्रधान, सूचना विश्लेषण एवं राजनैतिक-सांस्कृतिक विशाल इंटरनेट स्रोत के रूप में अर्थात एक वेबसाइट स्वरूप में विकसित करने की योजना है, इस दिशा में कई व्यक्तियों एवं संगठनों से आरम्भिक बातचीत हो चुकी है… मेरे कई पाठकों ने भी इसमें अपना योगदान देने की सहमति जताई है, सारे पहलुओं पर विचार-विमर्श जारी है, सही समय आने पर यह काम निश्चित रूप से हो ही जायेगा… मैं इस हेतु उन सभी का अग्रिम आभारी हूँ जिन्होंने आर्थिक अथवा तकनीकी समर्थन की प्रेमपूर्ण पावती दे दी है।

मैं फ़िल्मों, सुरीले गीतों, क्रिकेट एवं अन्य सामाजिक विषयों पर अधिकाधिक लिखना चाहता था (शुरुआती दो वर्ष तक इन विषयों पर काफ़ी-कुछ लिखा भी), परन्तु गत एक वर्ष से मैंने राष्ट्रवाद-हिन्दुत्व, छद्म-धर्मनिरपेक्षता सहित वामपंथियों एवं सेकुलरों के दोहरे मानदण्डों एवं जिहादियों तथा चर्च के षडयंत्रों से सम्बन्धित समाचारों व विश्लेषण पर अपना फ़ोकस स्थापित किया है… और बढ़ती पाठक संख्या से लगता है कि इसे पसन्द किया जा रहा है। सिर्फ़ गत एक वर्ष में ही सब्स्क्राइबर्स की संख्या दोगुनी हुई है एवं अब 26 जनवरी 2012 यानी अगले एक साल में 2000 से अधिक सब्स्क्राइबर्स बनाने का लक्ष्य है… इसे प्राप्त करने के लिये मुझे और कड़ी मेहनत, अधिक रिसर्च, अधिक तथ्य जुटाने होंगे…।

जनवरी में अपने व्यवसाय में अधिक व्यस्त रहने की वजह से इस माह अब तक सिर्फ़ पाँच पोस्ट ही लिख सका, परन्तु मुझे विश्वास है कि पाठकगण मेरी मजबूरियाँ समझेंगे एवं स्नेह बनाये रखेंगे।

इस अवसर पर मैं अपने उन मित्रों से भी माफ़ी चाहूँगा, जिनसे चैटिंग करते-करते अचानक मैं बिना किसी सूचना के गायब हो जाता हूँ। कभी पावर कट, कभी किसी ग्राहक के आने, किसी के फ़ोन पर व्यस्त हो जाने अथवा चैट करते-करते अचानक किसी महत्वपूर्ण जानकारी को पढ़ने में व्यस्त हो जाने की वजह से ऐसा होता है… कृपया मेरे इस “कृत्य” को मेरी गुस्ताखी न समझें…

बहरहाल… अधिक विस्तार में न जाते हुए अन्त में एक बार पुनः मैं उन सभी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ कि जिन्होंने मेरे सीधी-सादी आम बोलचाल वाली भाषा में लिखे गये, “लुहार स्टाइल” के लेखन को पसन्द किया… सभी का आशीर्वाद एवं शुभकामनाएं मेरे साथ बनी रहें, यह प्रार्थना है।

धन्यवाद एवं नमन…

>ताकि सनद रहे……… ‘निरामिष’ ब्लॉग पर……………

>

निरामिष ब्लॉग पर शाकाहार द्वारा मानवीय लाभार्थ, तर्कपूर्ण व तथ्यपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई जाएगी, ताकि लोग अपने आहार के चुनाव में जाग्रत रहें।
शाकाहार के गुणानुवाद में मांसाहार की आलोचना अवश्यंभावी है, इसे मांसाहारीयों (व्यक्तियों) की निंदा की तरह नहीं लिया जाना चाहिए। यह मांसाहार के दोषो की मात्र अभिव्यक्ति होती है।
शाकाहार की प्रसंशा करना शुद्धता या पवित्रता का दर्प नहीं, क्योंकि यह है ही अपने आप में स्वच्छ और सात्विक। इसलिये शुद्धता और पवित्रता सहज अभिव्यक्त हो सकती है।
कुविचार चाहे पारम्परिक हो या आधुनिक, अथवा साम्यता के चोले में, स्वीकार्य नहीं हो सकता।
मांसाहार की निंदा करना, किसी भी धर्म की निंदा नहीं है। क्योंकि कोई भी ऐसा धर्म नहीं है जो मात्र मांसाहार के सिद्धांत पर ही टिका हो, और यदि किसी धार्मिक संस्कृति का अस्तित्त्व हिंसाजन्य मांसाहार पर ही टिका हो तो वह धर्म हो ही नहीं सकता। इस प्रकार की विचारधारा की निंदा, धर्म-निंदा की श्रेणी में नहीं आती।
निरामिष पर ब्लॉग लेखक मण्डल समय समय पर तात्विक सार्थक लेख प्रस्तुत करते रहेंगे।
शाकाहार : सात्विक भोजन : निरामिष खाद्य पर लेखो के लिये अवश्य ‘निरामिष’ विजिट करें…

>अपने आप को क़ायदे क़ानून का पाबन्द बनाईये 26th january

> 26 जनवरी पर एक ख़ास अपील

कुदरत क़ानून की पाबंद है लेकिन इंसान क़ानून की पाबंदी को अपने लिए लाज़िम नहीं मानता। इंसान जिस चीज़ के बारे में अच्छी तरह जानता है कि वे चीज़ें उसे नुक्सान देंगी। वह उन्हें तब भी इस्तेमाल करता है। गुटखा, तंबाकू और शराब जैसी चीज़ों की गिनती ऐसी ही चीज़ों में होती है। दहेज लेने देने और ब्याज लेने देने को भी इंसान नुक्सानदेह मानता है लेकिन इन जैसी घृणित परंपराओं में भी कोई कमी नहीं आ रही है बल्कि ये रोज़ ब रोज़ बढ़ती ही जा रही हैं। हम अपनी सेहत और अपने समाज के प्रति किसी उसूल को सामूहिक रूप से नहीं अपना पाए हैं। यही ग़ैर ज़िम्मेदारी हमारी क़ानून और प्रशासन व्यवस्था को लेकर है। आये दिन हड़ताल करना, रोड जाम करना, जुलूस निकालना, भड़काऊ भाषण देकर समाज की शांति भंग कर देना और मौक़े पर हालात का जायज़ा लेने गए प्रशासनिक अधिकारियों से दुव्र्यवहार करना ऐसे काम हैं जो मुल्क के क़ानून के खि़लाफ़ भी हैं और इनसे आम आदमी बेहद परेशान हो जाता है और कई बार इनमें बेकसूरों की जान तक चली जाती है।
इस देश में क़ानून को क़ायम करने की ज़िम्मेदारी केवल सरकारी अफ़सरों की ही नहीं है बल्कि आम आदमी की भी है, हरेक नागरिक की है। 26 जनवरी के मौक़े पर इस बार हमें यही सोचना है और खुद को हरेक ऐसे काम से दूर रखना है जो कि मुल्क के क़ानून के खि़लाफ़ हो। मुल्क के हालात बनाने के लिए दूसरों के सुधरने की उम्मीद करने के बजाय आपको खुद के सुधार पर ध्यान देना होगा। इसी तरह अगर हरेक आदमी महज़ केवल एक आदमी को ही, यानि कि खुद अपने आप को ही सुधार ले तो हमारे पूरे मुल्क का सुधार हो जाएगा।

गुस्से को मिटाइये मत बल्कि उस पर क़ाबू पाना सीखिये
समाज में सबके साथ रहना है तो दूसरों की ग़लतियों को नज़रअंदाज़ भी करना पड़ता है और कभी कभी उन्हें ढकना भी पड़ता है। हरेक परिवार अपने सभी सदस्यों को इसी रीति से जोड़ता है। क़स्बे और कॉलोनी के लोग भी इसी उसूल के तहत एक दूसरे से जुड़े रह पाते हैं। ब्लाग जगत भी एक परिवार है और यहां भी इसी उसूल को अपनाया जाना चाहिए।
इस कोशिश के बावजूद कभी कभी मुझे गुस्सा आ जाता है और तब मैं यह सोचता हूं कि आखि़र मुझे गुस्सा आया क्यों ?
हमारे ऋषियों ने जिन पांच महाविकारों को इंसान के लिए सबसे ज़्यादा घातक माना है उनमें से क्रोध भी एक है। हज़रत मुहम्मद साहब स. ने भी उस शख्स को पहलवान बताया है जो कि गुस्से पर क़ाबू पा ले।
इसके बावजूद हम देखते हैं कि कुछ हालात में ऋषियों को भी क्रोध आया है, खुद अंतिम ऋषि हज़रत मुहम्मद साहब स. को भी क्रोधित होते हुए देखा गया है।
हिंदू साहित्य में ऋषियों के चरित्र आज में वैसे शेष नहीं हैं जैसे कि वास्तव में वे पवित्र थे। कल्पना और अतिरंजना का पहलू भी उनमें पाया जाता है लेकिन हदीसों में जहां पैग़म्बर साहब स. के क्रोधित होने का ज़िक्र आया है तो वे तमाम ऐसी घटनाएं हैं जबकि किसी कमज़ोर पर ज़ुल्म किया गया और उसका हक़ अदा करने के बारे में मालिक के हुक्म को भुला दिया गया। उन्होंने अपने लिए कभी क्रोध नहीं किया, खुद पर जुल्म करने वाले दुश्मनों को हमेशा माफ़ किया। अपनी प्यारी बेटी की मौत के ज़िम्मेदारों को भी माफ़ कर दिया। अपने प्यारे चाचा हमज़ा के क़ातिल ‘वहशी‘ को भी माफ़ कर दिया और उनका कलेजा चबाने वाली ‘हिन्दा‘ को भी माफ़ कर और मक्का के उन सभी सरदारों को भी माफ़ कर दिया जिन्होंने उन्हें लगभग ढाई साल के लिए पूरे क़बीले के साथ ‘इब्ने अबी तालिब की घाटी‘ में क़ैद कर दिया था और मक्का के सभी व्यापारियों को उन्हें कपड़ा, भोजन और दवा बेचने पर भी पाबंदी लगा दी थी। ऐसे तमाम जुल्म सहकर भी उन्होंने उनके लिए अपने रब से दुआ की और उन्हें माफ़ कर दिया। इसका मक़सद साफ़ है कि अस्ल उद्देश्य अपना और अपने आस-पास के लोगों का सुधार है। अगर यह मक़सद माफ़ी से हासिल हो तो उन्हें माफ़ किया जाए और अगर उनके जुर्म के प्रति अपना गुस्सा ज़ाहिर करके सुधार की उम्मीद हो तो फिर गुस्सा किया जाए।
जो भी किया जाए उसका अंजाम देख लिया जाए, अपनी नीयत देख ली जाए, संभावित परिस्थितियों का आकलन और पूर्वानुमान कर लिया जाए।
वे आदर्श हैं। उनका अमल एक मिसाल है। उनके अमल को सामने रखकर हम अपने अमल को जांच-परख सकते हैं, उसे सुधार सकते हैं।

मुझे गुस्सा कम आता है लेकिन आता है।
आखि़र आदमी को गुस्सा आता क्यों है ?
हार्वर्ड डिसीज़न लैबोरेट्री की जेनिफ़र लर्नर और उनकी टीम ने गुस्से पर रिसर्च की है। उसके मुताबिक़ हमारे भीतर का गुस्सा कहीं हमें भरोसा दिलाता है कि हम अपने हालात बदल सकते हैं। अपने आने वाले कल को तय सकते हैं। जेनिफ़र का यक़ीन है कि अगर हम अपने गुस्से को सही रास्ता दिखा दें तो ज़िंदगी बदल सकते हैं।
हम अपने गुस्से को लेकर परेशान रहते हैं। अक्सर सोचते हैं कि काश हमें गुस्सा नहीं आता। लेकिन गुस्सा है कि क़ाबू में ही नहीं रहता। गुस्सा आना कोई अनहोनी नहीं है। हमें गुस्सा आता ही तब है, जब ज़िंदगी हमारे मुताबिक़ नहीं चल रही होती। कहीं कोई अधूरापन है, जो हमें भीतर से गुस्सैल बनाता है। दरअस्ल, इसी अधूरेपन को ठीक से समझने की ज़रूरत होती है। अगर हम इसे क़ायदे से समझ लें, तो बात बन जाती है।
जब हमें अधूरेपन का एहसास होता है, तो हम उसे भरने की कोशिश करते हैं। और यही भरने की कोशिश हमें कहीं से कहीं ले जाती है। हम पूरे होकर कहीं नहीं पहुंचते। हम अधूरे होते हैं, तभी कहीं पहुंचने की कसमसाहट होती है। यही कसमसाहट हमें भीतर से गुस्से में भर देती है। उस गुस्से में हम कुछ कर गुज़रने को तैयार हो जाते हैं। हम जमकर अपने पर काम करते हैं। उसे होमवर्क भी कह सकते हैं और धीरे धीरे हम अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते चले जाते हैं।
असल में यह गुस्सा एक टॉनिक का काम करता है। हमें भीतर से कुछ करने को झकझोरता है। अगर हमारा गुस्सा हमें कुछ करने को मजबूर करता है, तो वह तो अच्छा है न।
                   (हिन्दुस्तान, 6 जनवरी 2011, पृष्ठ 10)

http://pyarimaan.blogspot.com/

>लेकिन फ़िर भी लाल चौक पर तिरंगा नहीं फ़हराया जा सकता…… Lal Chowk Srinagar, Tricolour Hoisting, Secularism and Separatists

>श्रीनगर के लाल चौक में तिरंगा न फ़हराने देने के लिये मनमोहन सिंह, चिदम्बरम और उमर अब्दुल्ला एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, भाजपा नेताओं को असंवैधानिक रुप से जबरन रोके रखा गया, कर्नाटक से भाजपा कार्यकर्ताओं को लेकर आने वाली ट्रेन को ममता बैनर्जी ने अपहरण करवाकर वापस भिजवा दिया (यहाँ देखें…) (इस ट्रेन को भाजपा ने 57 लाख रुपये देकर बुक करवाया था), “पाकिस्तान के पक्के मित्र” दिग्विजय सिंह भाजपा को घुड़कियाँ दे रहे हैं, लालूप्रसाद लाल-पीले हो रहे हैं (क्योंकि खुद भी राष्ट्रगान के वक्त बैठे रहते हैं – यहाँ देखें), मनमोहन सिंह “हमेशा की तरह” गिड़गिड़ा रहे हैं, कि कैसे भी हो, चाहे जो भी हो… कश्मीर में लाल चौक पर तिरंगा मत फ़हराओ, क्योंकि –

1) इससे राज्य में “कानून-व्यवस्था”(?) की स्थिति खराब होगी… (मानो पिछले 60 साल से वहाँ रामराज्य ही हो)

2) लोगों की भावनाएं(?) आहत होंगी… (लोगों की, यानी गिलानी-मलिक और अरूंधती जैसे “भाड़े के टट्टुओं” की)

3) तिरंगे का राजनैतिक फ़ायदा न उठाएं… (क्योंकि तिरंगे का राजनैतिक फ़ायदा लेने का कॉपीराइट सिर्फ़ कांग्रेस ने ले रखा है)

यदि भाजपा की इस पहल को “खान-ग्रेस” (Congress) पार्टी “राजनैतिक” मानती है, तो मनमोहन, सोनिया, चिदम्बरम, और उमर अब्दुल्ला एक साथ, एक मंच पर खड़े होकर लाल चौक पर तिरंगा क्यों नहीं फ़हराते? जब दो कौड़ी के कश्मीरी नेता दिल्ली में ऐन सरकार की नाक के नीचे भारत को “भूखों-नंगों का देश” कहते हैं, कश्मीर को अलग करने की माँग कर डालते हैं…तब सभी मिमियाते रह जाते हैं, लेकिन भाजपा लाल चौक में तिरंगा नहीं फ़हरा सकती? अलबत्ता “कांग्रेस के दामाद लोग” पाकिस्तान का झण्डा अवश्य फ़हरा सकते हैं… (देखें लाल चौक का एक चित्र)।

कहने का तात्पर्य यह है कि –

1) कश्मीर में गरीबी की दर है सिर्फ़ 3.4 प्रतिशत है जबकि भारत की गरीबी दर है अधिकतम 26 प्रतिशत (बिहार और उड़ीसा जैसे राज्यों में)

– फ़िर भी बिहार, उड़ीसा में तिरंगा फ़हराया जा सकता है, लाल चौक पर नहीं…

2) 1991 में कश्मीर को 1,244 करोड़ रुपये का अनुदान दिया गया जो कि सन् 2002 तक आते-आते बढ़कर 4,578 करोड़ रुपये हो गया था (सन्दर्भ-इंडिया टुडे 14 अक्टूबर 2002)।

– फ़िर भी हम लाल चौक में तिरंगा नहीं फ़हराएंगे…

3) 1991 से 2002 के बीच केन्द्र सरकार द्वारा कश्मीर को दी गई मदद कुल जीडीपी का 5 प्रतिशत से भी अधिक बैठता है। इसका मतलब है कि कश्मीर को देश के बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा हिस्सा दिया जाता है, किसी भी अनुपात से ज्यादा। यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी परिवार के “सबसे निकम्मे और उद्दण्ड लड़के” को पिता का सबसे अधिक पैसा मिले “मदद(?) के नाम पर”

– फ़िर भी हम अपना अलग संविधान, अलग झण्डा रखेंगे…

4) “वे” लोग हमारे पैसों पर पाले जा रहे हैं, और वे इसे कभी अपना “हक”(?) बताकर, कभी असंतोष बताकर, कभी “गुमराह युवकों”(?) के नाम पर… और-और-और ज्यादा हासिल करने की कोशिश में लगे रहते हैं। भारत के ईमानदार करदाताओं का पैसा इस तरह से नाली में बहाया जा रहा है…

– फ़िर भी बहादुर सिख कौम के प्रधानमंत्री कहते हैं, लाल चौक पर तिरंगा नहीं फ़हराना चाहिये…

5) जब नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि “गुजरात से कोई टैक्स न लो और न ही केन्द्र कोई मदद गुजरात को दे” तो कांग्रेस इसे तत्काल देशद्रोही बयान बताती है। अर्थात यदि देश का कोई पहला राज्य, जो हिम्मत करके कहता है कि “मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ…” तो उसे तारीफ़ की बजाय उलाहने और आलोचना दी जाती है, जबकि गत बीस वर्षों से भी अधिक समय से “जोंक” की तरह देश का खून चूसने वाला कश्मीर, “बेचारा है” और “धर्मनिरपेक्ष भी है”?

– फ़िर भी गाँधीनगर में तिरंगा फ़हरा सकते हैं, श्रीनगर में नहीं…

6) कश्मीर के प्रत्येक व्यक्ति पर केन्द्र सरकार 10,000 रुपये की सबसिडी देती है, जो कि अन्य राज्यों के मुकाबले लगभग 40% ज्यादा है (कोई भी सामान्य व्यक्ति आसानी से गणित लगा सकता है कि कश्मीरी नेताओं, हुर्रियत अल्गाववादियों, आतंकवादियों और अफ़सरों की जेब में कितना मोटा हिस्सा आता होगा, “ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल” की ताजा रिपोर्ट में कश्मीर को सबसे भ्रष्ट राज्य का दर्जा इसीलिये मिला हुआ है)

– फ़िर भी हम लाल चौक में तिरंगा नहीं फ़हरा सकते…

7) इसके अलावा रेल्वे की जम्मू-उधमपुर योजना 600 करोड़, उधमपुर-श्रीनगर-बारामुला योजना 5000 करोड़, विभिन्न पहाड़ी सड़कों पर 2000 करोड़, सलाई पावर प्रोजेक्ट 900 करोड़, दुलहस्ती हाइड्रो प्रोजेक्ट 6000 करोड़, डल झील सफ़ाई योजना 150 करोड़ आदि-आदि-आदि

– फ़िर भी लाल चौक पर तिरंगा फ़हराना “राजनीति” है…
(समस्त आँकड़े CAGR की रिपोर्ट के अनुसार)

8) कश्मीर घाटी से गैर-मुस्लिमों का पूरी तरह से सफ़ाया कर दिया गया है,
कश्मीरी सारे भारत में कहीं भी रह सकते हैं, कहीं भी जमीने खरीद सकते हैं, लेकिन कश्मीर में वे किसी को बर्दाश्त नहीं करते, अमरनाथ यात्रियों के लिये एक टेम्परेरी ज़मीन का टुकड़ा भी नहीं दे सकते…

– फ़िर भी भाजपा ही “शांति भंग”(?) करना चाहती है…

जम्मू में तिरंगा फ़हरा सकते हैं, लेह में फ़हरा सकते हैं, लद्दाख में शान से लहरा सकते हैं, द्रास-कारगिल में बर्फ़ की चोटियों पर गर्व से अड़ा सकते हैं… सिर्फ़ एक छोटे से टुकड़े कश्मीर” के लाल चौक में नहीं फ़हरा सकते… क्यों? इस क्यों का जवाब “कांग्रेस(I) – अर्थात कांग्रेस (Italy)” ही दे सकती है… लेकिन देगी नहीं, क्योंकि राष्ट्रीय स्वाभिमान, तिरंगे की आन-बान-शान, एकता-अखण्डता इत्यादि शब्द उसके लिये चिड़ियाघर में रखे ओरांग-उटांग की तरह हैं…

यदि कल को पश्चिम बंगाल के 16 जिलों में, अथवा असम के 5 जिलों में, या उत्तरी केरल के 3 जिलों में भी तिरंगा फ़हराने पर “किसी” की भावनाएं आहत होने लग जायें तो आश्चर्य न कीजियेगा… “सत्य-अहिंसा के पुजारियो” ने जो विरासत हमें सौंपी है, उसमें ऐसा बिलकुल हो सकता है…।

वाकई दुर्भाग्य है कि, “मैकाले की शिक्षा पद्धति” ने, खामख्वाह में “बच्चों के चाचा” बन बैठे एक व्यक्ति ने, और अलगाववादियों के सामने “सतत रेंगते रहने वाले” वाले गाँधी परिवार, नरसिंहराव, वीपी सिंह, अटलबिहारी वाजपेयी सभी ने मिलकर… देश को एक सड़े हुए टमाटर की तरह पिलपिला बनाकर रख दिया है…

>समय और संस्कृति

>माँ तो सदा माँ ही होती है, जननी होती है और जगत्प्रसूता होती है. एक मांस के टुकड़े को कैसे वह वाणी, विचार और संस्कार देकर मानव बनाती  है इसको कोई और नहीं कर सकता है. इसी लिए अगर मानव वाकई मानव है तो वह कहता है कि माँ के  ऋण से कोई मुक्त नहीं हो सकता है. लेकिन समय और संस्कृति के परिवर्तन ने उसका भी विकल्प खोज लिया है और संतान ने भी तो उस  विकल्प को  अंगीकार कर लिया है. ये अपवाद नहीं है बल्कि किसी न किसी रूप में ऐसे इंसान आज मिल रहे हैं कि माँ के त्याग और तपस्या को पैसों से तौल कर उनका कर्ज पैसे से अदा करने के लिए तैयार हैं. एक छोटी से कहानी – मेरी अपनी नहीं लेकिन बचपन में कहीं पढ़ी थी.
                         वो माँ जिसने बेटे और बेटियों को जन्म दिया और फिर क्षीण काया लिए कभी इस बेटे के घर और कभी उस बेटी के घर सहारा खोजने पर मजबूर होती है. ऐसी ही एक विधवा माँ अपने बेटे के आश्रय में अपने जीवन संध्या के क्षण गुजर रही थी. उसकी पत्नी से नहीं ये नहीं सुहाता था. ( सिर्फ पत्नी को दोष नहीं दे रही बल्कि हर इंसान की अपनी बुद्धि होती है और निर्णय लेने की क्षमता भी होती है. ) अपना तिरस्कार देखते देखते एक दिन माँ आजिज आ गयी और बेटे से बोली कि क्या इसी दिन के लिए मैंने तुम्हें जन्म दिया था?
” ठीक है, जन्म दिया था तो एक बार बता दो कि तुम्हें मैं कितना दे दूं कि आपके उस ऋण से मुक्त हो जाऊं. ” बेटे ने सपाट शब्दों में कहा.
” किस किस की कीमत दोगे बेटा ?” माँ ने बड़े निराशा भरे शब्दों में कहा.
“आप बतलाती जाइए मैं चैक काट देता हूँ. “
“सबसे पहले जो मैंने ९ महीने तुम्हें अपने गर्भ में पाला है , उसकी कोई कीमत है तेरे पास.”
“हाँ है, आप महंगे से महंगे फ्लैट के किराये के बराबर ९ महीने की जगह २ साल का किराया  ले लीजिये. “
“जो सीने से लगा कर तुम्हें ठण्ड , धूप और बारिश से बचा कर इतना बड़ा किया उसका कोई मोल है?”
“आप ही लगा दीजिये मैं देने को तैयार हूँ.”
               माँ समझ गयी कि बेटे का सिर फिर गया है और ये वास्तविकता  से बिल्कुल दूर हो गया है. पैसे के अहंकार ने इसको पागल बना दिया है और ये अहंकार कल को इसके लिए बहुत बड़ी मुसीबत का कारण बन सकती है और मैं इसकी आँखों पर पड़े इस परदे को जरूर हटा दूँगी. 

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>भ्रम न फैलाया जाए धर्म के नाम पर Open your eyes

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सभी धर्म न तो एक ईश्वर की पूजा करना बताते हैं और न ही वे सब के सब मानव जाति के लिए समान रूप से कल्याणकारी हैं ।

इस सम्बन्ध में पूरी जानकारी के लिए देखें –
http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2011/01/lba.html#comments

http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2011/01/blog-post_5530.html

>"तुम जाग गए तो जनता सो जाएगी"

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मत जागना मोहन प्यारे; बिलकुल मत जागनाक्योंकि;तुम जाग गए तो जनता सो जाएगी” । तुम्हारे पूर्वजों (पार्टी नेताओं ने) नेस्वयं जागकर ही तो जनता को सुलाए रखा थाकई दशकों बाद अब जनता जाग रही है उसे पता लग रहा है कि उसकेसोये रहनेपर कांग्रेस ने देश,संस्कृति,समाज,संस्कारधर्म, साहित्यइतिहास आदि को कितना नुकसान पहुँचाया है महँगाई और काले धन के बहाने ही सही, अब जनता परेशान होकरजाग तो रही है” ऐसे में तुम जाग गए तो ! तो देश का क्या होगा ? अब तो जनतासोचने को मजबूर” हो रही है; कि आखिर देश की और उसकी ऐसी दयनीय हालत क्यों हुयी ? और ऐसे में तुम जाग गए तो ! तो देश का क्या होगा ? तुम्हारे नेता और कार्यकर्त्ता तो इतनेशातिर” हैं कि तुम्हारे जरा सा जागते ही जनता को सुलाने के एक से एक ऐसे हथकंडे आविष्कृत कर लेंगे , किजहरखुरानीगिरोह के लोग भी उनसे पीछे रह जाते हैं इसलिए; हे मोहन प्यारे बिलकुल मत जागना ! सोये रहना; अगर जाग भी गए तो आँखें बंद करके पड़े रहनातभी उद्धार होगा, तुम्हारा भी देश का भी और तुम्हारे कुल(पार्टी) का भीजैसे रावण ने अपना और लंका का भला किया था उसे भी तो बहुतों ने जगाया था पर उसने अपना और अपने कुल का उद्धार करने के लिए अपनी आँखे बंद रखीं, ऐसे ही तुम भी करना पूर्ण परिवर्तन होने देना तभी तुम्हारे उन सब पूर्वजों (नेताओं) को भी मोक्ष मिलेगा जो आज तक कहीं नरक में पड़े होंगेवर्तमान के तुम्हारे बंधुओं को तो एक मौका अभी है ; वे अपने पापों का प्रायश्चित कर सकते हैंपर तुम जाग गए तो उनसे ये मौका छूट जायेगा इसलिए हे मोहन प्यारे बिलकुल मत जागना

>ग़लतफ़हमियां अच्छे-अच्छों को भ्रम में डाल देती हैं Be good

> स्वामी श्री लक्ष्मीशंकराचार्य जी को भी उस साहित्य ने गुमराह कर दिया था जो कि इंसानियत के दुश्मन हमारे देश में लंबे अर्से से फैलाते आ रहे हैं। आप उनकी लिखी किताब ‘इस्लाम : आतंक ? या आदर्श‘ पढ़िये, इस्लाम और कुरआन के बारे में आप जो ग़लतफ़हमियां जबरन पाले बैठे हैं, सब दूर हो जाएंगी।
मैं मानता हूं कि
मुसलमानों का चरम परम पतन हो चुका है
और

बेशक हिन्दू सद्-गुणों की खान हैं।

इस विषय में आप नीचे दिए गए दो लिंक्स पर जाकर मेरे विचार देख सकते हैं। मैं कभी पक्षपात नहीं करता। जो हालात मैं देखता हूं उसके आधार पर जो निष्कर्ष निकलता है, मैं वही कहता हूं। हरेक ब्लागर वही कहता है।
हिन्दू भाईयों के बारे में इतने अच्छे विचार रखने के बाद भी मुझे आप जैसे लोगों ने कभी थैंक्स नहीं कहा, ऐसा क्यों ?
अभी भाई खुशदीप जी ने अपनी पोस्ट में यह जानकारी दी है-

आपकी-हमारी गाढ़ी कमाई पर डाका (किस्त-1) 

चुनाव आयोग का कहना है कि देश में 1200 राजनीतिक पार्टियां पंजीकृत हैंण्ण्ण्इनमें से सिर्फ 16 फ़ीसदी ही यानि 200 पार्टियां ही राजनीतिक गतिविधियों में लगी हैं की ज्यादातर पार्टियां राजनीतिक चंदे के नाम पर काली कमाई को धो कर व्हाईट करने में लगी हैं…

..अब आप बताईये कि ये 1200 राजनीतिक पार्टियां और इसके समर्थक मुसलमान हैं या हिंदू ?
देश की बर्बादी का सारा इल्ज़ाम आप मुसलमानों पर डाल रहे हैं तो आप इन्हें क्या कहेंगे और कब कहेंगे ?
इसकी मैं इंतज़ार नहीं करूंगा क्योंकि पहले मुझे उस सवाल का जवाब चाहिए जो मैंने आप से ऊपर पूछा है।
आपको मैं अब भी कोई इल्ज़ाम नहीं दूंगा और आपको भी मैं अच्छा आदमी ही मानता हूं। ग़लतफ़हमियां अच्छे-अच्छों को भ्रम में डाल देती हैं। मेरी कोशिश होगी कि आपकी ग़लतफ़हमियां दूर कर दी जाएं।
आपने सवाल करके मेरी ज़िम्मेदारी को और भी बढ़ा दिया है।
Please see
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/01/organised-crime-against-india.html


समाज का सबसे बड़ा विनाशक कट्टरता

http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2011/01/blog-post_20.html?showComment=1295618043842#comment-c8896393922460845647

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