>मुझे गालियां देने वाले इस देश, समाज और मानवता का अहित ही कर रहे हैं Abusive language of Dr. Divya

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‘देश की अखंडता की रक्षा करने वाले
मुसलमानों के साथ अनवर जमाल श्रीनगर में’

कोई गाली ऐसी नहीं है जो इन सभ्य और हिन्दू कहे जाने वाले ब्लागर्स ने मुझे न दी हो। पढ़े लिखे लोगों ने, जवान प्रोफ़ैसर्स ने और बूढ़े इंजीनियर ने, हरेक ने मुझे अपने स्तर की स्तरीय और स्तरहीन गालियों से नवाज़ा। मुझे अश्लील गालियां तक दी गईं लेकिन मैंने हरेक को सहा और उन्हें बताया कि आप ग़लतफ़हमी और तास्सुब के शिकार हैं। उनकी दी हुईं गालियां मैंने आज तक अपने ब्लाग पर ऐसे सजा रखी हैं जैसे कोई ईनाम में मिले हुए मोमेन्टम्स को अपने ड्राइंग रूम में सजाता है।
आपमें से किसका दिल है इतना बड़ा ?
अगर आपका दिल इतना बड़ा नहीं है तो बंद कीजिए सुधार का ड्रामा।
‘सुधारक को पहले गालियां खानी होंगी, फिर वह जेल जाएगा और अंततः उसे ज़हर खिलाया जाएगा या उसे गोली मार दी जाएगी।‘
एक सुधारक की नियति यही होती है। जिसे यह नियति अपने लिए मंज़ूर नहीं है वह सुधारक नहीं बन सकता, हां सुधारक का अभिनय ज़रूर कर सकता है।
आप इस समय जिस अनवर जमाल को देख रही हैं। यह मौत के तजर्बे से गुज़रा हुआ अनवर जमाल है। देश की अखंडता की रक्षा के लिए मैं जम्मू कश्मीर गया और अकेला नहीं गया बल्कि अपने दोस्तों को लेकर गया। 325 लोगों का ग्रुप तो मेरे ही साथ था और दूसरे कई ग्रुप और भी थे और उनमें इक्का दुक्का हिन्दू कहलाने वालों के अलावा सभी लोग वे थे जिन्हें मुसलमान कहा जाता है।
जब मैं गया तो मुझे पता नहीं था कि मैं वापस लौटूंगा भी कि नहीं। मैंने अपने घर वालों को, अपने मां-बाप को तब ऐसे ही देखा था जैसे कि मरने वाला इनसान किसी को आख़िरी बार देखता है। अपनी बीवी से तब आख़िरी मुलाक़ात की और अपने बच्चों को यह सोचकर देखा कि अनाथ होने के बाद ये कैसे लगेंगे ?
अपनी बीवी से कहा कि तुम मेरी मौत के बाद ये ये करना और दोबारा शादी ज़रूर कर लेना। उस वक्त भी आपका यह भाई हंस रहा था और हंसा रहा था। सिर्फ़ आपका ही नहीं, जिसे कि बहन कहलाना भी गवारा नहीं है बल्कि चार सगी बहनों का भाई जिनमें से उसे अभी 2 बहनों की शादी भी करनी है। बूढ़े मां-बाप, मासूम बच्चे और जवान बहनें, आख़िर मुझे ज़रूरत क्या थी वहां जाने की ?
मैं मना भी तो कर सकता था।
… लेकिन अगर मैं मना करता तो फिर क्या मैं देशभक्त होता ?
जम्मू कश्मीर जाकर भी मैं केवल श्रीनगर में प्रेस वार्ता करके ही नहीं लौट आया जैसा कि राष्ट्रवादी नेता और उनके पिछलग्गू करके आ जाते हैं बल्कि हमारे ग्रुप ने कूपवाड़ा और सोपोर जैसे इलाक़ों में गन होल्डर्स की मौजूदगी के बावजूद आम लोगों के बीच काम किया, जहां किसी भी तरफ़ से गोलियां आ सकती थीं और हमारी जान जा सकती थी और पिछले टूर में जा भी चुकी थीं। हमला तो ग्रुप पर ही किया गया था लेकिन हमारे वीर सैनिक चपेट में आ गए और …
हरेक दास्तान बहुत लंबी है। यहां सिर्फ़ उनके बारे में इशारा ही किया जा सकता है। इतना करने के बाद भी न तो हमने कोई प्रेस वार्ता की और न मैंने उस घटना का चर्चा ही किया। मुझे मुसलमान होने की वजह से देश का ग़द्दार कहा गया और आज भी कहा जा रहा है।
एक झलक मैंने अपने फ़ोटो में दिखाई भी तो उसमें भी कश्मीरी भाईयों से एक अपील ही की कि वे ठंडे दिमाग़ से अपने भविष्य के बारे में सोचें।

… लेकिन अगर उत्तर प्रदेश के मुसलमान को भी आप ग़द्दार कहेंगे, अगर आप देश की अखंडता की रक्षा करने वाले मुसलमान को भी मज़हबी लंगूर और मज़हबी कौआ कहेंगे तो क्या वे लोग नेट पर मेरी दुर्दशा देखकर अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त हो पाएंगे ?

मुझे गालियां देने वाले इस देश, समाज और मानवता का अहित ही कर रहे हैं।
तब भी मैंने उनकी गालियां इस आशय से अपने ब्लाग पर व्यक्त होने दीं कि-
गाली देने वाले के मन का बोझ हल्का हो जाए जो कि शाखाओं में उनके मन पर मुसलमानों को ग़द्दार बता बता कर लाद दिया गया है। यह प्रौसेस ‘कैथार्सिस‘ कही जाती है। इसके बाद भड़ास निकल जाती है और आदमी ठीक ठीक सोचने की दशा में आ जाता है।
More more more ………

8 Comments

  1. January 5, 2011 at 5:58 pm

    >अनवर जमाल,पहले तो तुज़े गालिया न पडे तो आश्चर्य होगा।तुज़े क्या सूर्खाब के पर लगे है जो कमीनेपन पर गालीयां न खाए।तेरे जैसे बददिमाग को गालियां पडे तो देश,समाज और मानवता तक का अहित हो जायेगा? क्या गुमान है तेरा। जैसे मोहम्म्द हो गया?यह एकदम सच है तूं मज़हबी लंगूर, सामाजिक कोआ,फ़सादी है।

  2. January 5, 2011 at 6:04 pm

    >अनवर जमाल,दिव्या को तेरे द्वारा बहन कहने से इसलिये एतराज है कि पूरी दुनिया जानती है तुम लोग बहनो की क्या इज़्ज़त करते हो,मामा-फ़ूफ़ी की तो छोडते नहीं, फ़िर मुह बोली का क्या सम्मान करोगे?असलियत साबित भी हो चुकी, जब दिव्या ने बहन होने से इन्कार किया तो तुमने यह गंदी पोस्टें बनाई और अपनी औकात दिखा दी।

  3. January 5, 2011 at 6:08 pm

    >अनवर जमाल,फ़सादी हो तुम, तुम लोगों में कहते हो फ़साद करना कुफ़्र है।जब दिव्या ने खुद को तेरी बहन होना स्वीकार नहीं किया, तो तूने उसके पुराने विवाद ढूढे,और अम्रेन्द्र और दिव्या के बीच फ़िर फ़साद पैदा किया, उन्हें लडाता रहा अपने ब्लॉग पर, और बन्दर बन के तमाशा देखता रहा।

  4. January 5, 2011 at 6:10 pm

    >अनवर जमाल,तूं मेरे कमेंट तो अपने ब्लॉग से मीटा देता है, अन्य्था सारा झूट वही खोल के रख देता।

  5. January 5, 2011 at 6:18 pm

    >अनवर जमाल,तेरी नियत इतनी बुरी है कि तु समझता है मैं बातो बातों में किसी का भी अपमान कर दूं,हिन्दु तो सारे के सारे मूर्ख है,उन्हे थोडा पता चलता है। पकडे जाने पर कुतर्की से प्रश्न दागता है जैसे तूं चालाको का बाप है। पर समझ ले तू अन्त में तो शेख-चिल्ली ही साबित होगा।

  6. January 5, 2011 at 6:46 pm

    >अनवर जमाल,तेरी बदनीयत के कोफ़िन में मुझे मालूम है मेरे एक मित्र नें पहली कील ठोकी थी।अब तेरे फ़सादी के कोफ़िन में अन्तिम कील ठोकने का वक्त आ गया है।

  7. January 6, 2011 at 3:56 am

    >डॉ अनवर साहब,अपने विवाद गढने, और झगडे फ़ैलाने के लिये ब्लॉग संसद का उपयोग न करे तो बेहतर होगा।

  8. January 6, 2011 at 9:35 am

    >agar aap kisi se kuchh loge tabhi wah apake paas pahunchega , ap to kisi se kuchh lo hi mat jhamela khatm |jisaka mal hai uske paas chala jayega |


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