>“देश को कोसना मत”

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साथियों,
जय हिन्द.
अपनी पिछली रचना अन्धा कानून में मैंने एक स्थान पर लिख दिया था- ‘हमारे राष्ट्र की रीढ़ में हड्डी नहीं है’। लिखते वक्त भी मुझे खटका लगा था, पर आज दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ के रविवासरीय परिशिष्ट में स्वामी विवेकानन्द का एक कथन पढ़कर मेरा मन ग्लानि से भर उठा। अपने राष्ट्र के बारे में कभी अपशब्द नहीं कहना चाहिए। रचना में मैंने ‘हमारे राष्ट्र’ के स्थान पर ‘हमारी सरकारों’ लिखकर संशोधन कर दिया है।
स्वामी विवेकानन्द का वह कथन यहाँ उद्धृत है:
देश को कोसना मत
ऐ मेरे देशवासियों, मेरे मित्रों, मेरे बच्चों, राष्ट्रीय जीवनरुपी यह जहाज लाखों लोगों को जीवनरुपी समुद्र के पार करता रहा है। कई शताब्दियों से इसका यह कार्य चल रहा है और इसकी सहायता से लाखों आत्माएँ इस सागर से उस पार अमृतधाम में पहुँची है। पर आज शायद तुम्हारे ही दोष से इसमें कुछ खराबी आ गयी है, इसमें एक-दो छेद हो गये हैं, तो क्या तुम इसे कोसोगे? संसार में जिसने तुम्हारा सबसे अधिक उपकार किया है, उसके विरुद्ध खड़े होकर उस पर गाली बरसाना क्या तुम्हें उचित लगता है? यदि हमारे इस समाज में, इस राष्ट्रीय जीवनरुपी जहाज में छेद हैं, तो हम तो उसकी सन्तान हैं। आओ चलें, उन छेदों को बन्द कर दें… उसके लिए हँसते-हँसते अपने हृदय का रक्त बहा दें। और यदि हम ऐसा न कर सकें तो हमें मर जाना ही उचित है। हम अपना भेजा निकालकर उसकी डॉट बनायेंगे और जहाज के उन छेदों को भर देंगे। पर उसे कोसना? …नहीं-नहीं, कभी नहीं। इस समाज के विरुद्ध एक शब्द तक न निकालो। उसके अतीत की गौरव-गरिमा के लिए उस पर मेरा प्रेम है। मैं तुम सबको प्यार करता हूँ, क्योंकि तुम देवताओं की सन्तान हो, महिमाशाली पूर्वजों के वंशज हो। तब भला मैं तुम्हें कैसे कोस सकता हूँ? यह असम्भव है। तुम्हारा सब प्रकार से कल्याण हो! ऐ मेरे बच्चों, मैं तुम्हारे पास आया हूँ अपनी सारी योजनाएँ तुम्हारे सामने रखने के लिए। तुम उन्हें सुनो, तो मैं तुम्हारे साथ काम करने को तैयार हूँ। पर यदि न सुनो और मुझे ठुकराकर अपने देश के बाहर भी निकाल दो, तो भी मैं तुम्हारे पास वापस आकर यही कहूँगा, भाई, हम सब डूब रहे हैं! मैं आज तुम्हारे पास बैठने आया हूँ! और यदि हमें डूबना है, तो आओ, हम सब साथ ही डूबें, पर सावधान! एक भी कटु शब्द हमारे होंठों पर न आये!
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1 Comment

  1. January 9, 2011 at 2:38 pm

    >saty hai !


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