>प्रधानमंत्री जी, "भोजन करने", "खाने" और "भकोसने" में अन्तर करना सीखिये… Indians eating more, Manmohan Singh, Sharad Pawar

>कुछ दिनों पहले ही भारतवासियों ने हमारे लाचार और मजबूर प्रधानमंत्री के मुखारविन्द से यह बयान सुना है कि “भारतीय लोग ज्यादा खाने लगे हैं इसलिये महंगाई बढ़ी है…”, लगभग यही बयान कुछ समय पहले शरद पवार और मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी दे चुके हैं। तात्पर्य यह कि अब देश का उच्च नेतृत्व हमारे “खाने” पर निगाह रखने की कवायद कर रहा है।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता में आमतौर पर माना जाता है कि किसी व्यक्ति को किसी के “भोजन” पर नज़र नहीं रखनी चाहिये। अक्सर सभी ने देखा होगा कि या तो व्यक्ति एकान्त में भोजन करना पसन्द करता है अथवा यदि समूह में भोजन कर रहा हो तो उस स्थल पर उपस्थित सभी को उसमें शामिल होने का निमन्त्रण दिया जाता है… यह एक सामान्य शिष्टाचार और सभ्यता है। प्रधानमंत्री, कृषिमंत्री और योजना आयोग के मोंटेक सिंह ने “भारतीय लोग ज्यादा खाने लगे हैं…” जैसा गरीबों को “चिढ़ाने और जलाने” वाला निष्कर्ष पता नहीं किस आधार पर निकाला है…। जब इन्हें बोलने का हक प्राप्त है तो हमें भी इनके वक्तव्य की धज्जियाँ उड़ाने का पूरा हक है… आईये देखते हैं कि भारतीयों द्वारा “ज्यादा खाने” सम्बन्धी इनका दावा कितना खोखला है…

व्यक्ति का मोटापा मापने का एक वैज्ञानिक तरीका है BMI Index (Body Mass Index)। साबित तथ्य यह है कि जिस देश की जनता को अच्छा और पौष्टिक भोजन सतत उचित मात्रा में प्राप्त होता है उस देश की जनता का BMI सूचकांक बढ़ता है, हालांकि यह सूचकांक या कहें कि वैज्ञानिक गणना व्यक्तिगत आधार पर की जाती है, लेकिन पूरी जनसंख्या का सामान्य औसत निकालकर उस देश का BMI Index निकाला जाता है। आम जनता को समझ में आने वाली सादी भाषा में कहें तो BMI Index व्यक्ति की ऊँचाई और वज़न के अनुपात के गणित से निकाला जाता है, इससे पता चलता है कि व्यक्ति “दुबला” है, “सही वज़न” वाला है, “मोटा” है अथवा “अत्यधिक मोटा” है। फ़िर एक बड़े सर्वे के आँकड़ों के आधार पर गणना करके सिद्ध होता है कि वह देश “मोटा” है या “दुबला” है… ज़ाहिर है कि यदि मोटा है मतलब उस देश के निवासियों को पौष्टिक, वसायुक्त एवं शुद्ध भोजन लगातार उपलब्ध है, जबकि देश दुबला है इसका अर्थ यह है कि उस देश के निवासियों को सही मात्रा में, उचित पौष्टिकता वाला एवं गुणवत्तापूर्ण भोजन नहीं मिल रहा है… यह तो हुई BMI सूचकांक की मूल बात… अब एक चार्ट देखते हैं जिसके अनुसार वैज्ञानिक रुप से कितने “BMI के अंक” पर व्यक्ति को “दुबला”, “मोटा” और “अत्यधिक मोटा” माना जाता है… (Know About BMI)

इस चार्ट से साबित होता है कि पैमाने के अनुसार 16 से 20 अंक BMI वालों को “दुबला” माना जाता है एवं 30 से 35 BMI अंक वालों को “बेहद मोटा” माना जाता है। आमतौर पर देखा जाये तो देश में मोटे व्यक्तियों की संख्या का बढ़ना जहाँ एक तरफ़ स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव के रूप में भी देखा जाता है वहीं दूसरी तरफ़ देश की आर्थिक उन्नति और खुशहाली से भी इसे जोड़ा जाता है। यह एक स्वाभाविक बात है कि जिस देश में आर्थिक सुरक्षा एवं कमाई अधिक होगी वहाँ के व्यक्ति अधिक खाएंगे और मोटे होंगे… कम से कम BMI सूचकांक के ग्राफ़ तो यही प्रदर्शित करते हैं (जो आप आगे देखेंगे)। मनमोहन सिंह और अहलूवालिया ने यहीं पर आकर भारतीयों से भद्दा मजाक कर डाला… उन्होंने महंगाई को “अधिक खाने-पीने” से जोड़ दिया।

हाल ही में इम्पीरियल कॉलेज लन्दन के प्रोफ़ेसर माजिद एज़्ज़ाती ने विज्ञान पत्रिका “लेन्सेट” में एक शोधपत्र प्रकाशित किया है। जिसमें उन्होंने सन 1980 से 2008 तक के समय में विश्व के सभी देशों के व्यक्तियों के वज़न और ऊँचाई के अनुपात को मिलाकर उन देशों के BMI इंडेक्स निकाले हैं। शोध के परिणामों के अनुसार 1980 में जो देश गरीब देशों की श्रेणी में आते थे उनमें से सिर्फ़ ब्राजील और दक्षिण अफ़्रीका ही ऐसे देश रहे जिनकी जनसंख्या के BMI इंडेक्स में उल्लेखनीय वृद्धि हुई (अर्थात जहाँ के निवासी दुबले से मोटे की ओर अग्रसर हुए)… जबकि 1980 से 2008 के दौरान 28 साल में भी भारत के लोगों का BMI नहीं बढ़ा (सुन रहे हैं प्रधानमंत्री जी…)। 1991 से देश में आर्थिक सुधार लागू हुए, ढोल पीटा गया कि गरीबी कम हो रही है… लेकिन कोई सा भी आँकड़ा उठाकर देख लीजिये महंगाई की वजह से खाना-पीना करके मोटा होना तो दूर, गरीबों की संख्या में बढ़ोतरी ही हुई है (ये और बात है कि विश्व बैंक की चर्बी आँखों पर होने की वजह से आपको वह दिखाई नहीं दे रही)। BMI में सर्वाधिक बढ़ोतरी अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया एवं चीन में हुई (ज़ाहिर है कि यह देश और वहाँ के निवासी अधिक सम्पन्न हुए हैं…)। शोध के अनुसार सबसे दुबला और कमजोर देश है कांगो, जबकि सबसे मोटा देश है नौरू। इसी से मिलता-जुलता शोध अमेरिका में भी 1994 में हुआ था जिसका निष्कर्ष यह है कि 59% अमेरिकी पुरुष एवं 49% अमेरिकी महिलाएं “मोटापे” की शिकार हैं। (BMI Index Survey The Economist) 

हमारे “खाने पर निगाह रखने वालों” के लिये पेश है एक छोटा सा BMI आँकड़ा-

1990 में भारत का BMI था 20.70,
अमेरिका का 26.71,
कनाडा का 26.12 तथा
चीन का 21.90…

अब बीस साल के आर्थिक उदारीकरण के बाद स्थिति यह है –

2009 में भारत का BMI है 20.99,
अमेरिका का 28.46,
कनाडा का 27.50 और
चीन का 23.00…

ग्राफ़िक्स क्रमांक 1 – सन 1980 की स्थिति

ग्राफ़िक्स क्रमांक 2 – सन 2008 की स्थिति

(पहले और दूसरे ग्राफ़िक्स में हरे और गहरे हरे रंग वाले देशों, यानी अधिक BMI की बढ़ोतरी साफ़ देखी जा सकती है…हल्के पीले रंग में जो देश दिखाये गये हैं वहाँ BMI में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई…) इस लिंक पर जाकर विस्तार में देखा जा सकता है… (Countrywise BMI Global Chart) 

शरद पवार और मोंटेक सिंह जी, अब बताईये, कौन ज्यादा खा रहा है? भारत के लोग या अमेरिका?

प्रधानमंत्री जी (आपके) सौभाग्य से “फ़िलहाल” अभी भी देश के अधिकांश लोग आपको ईमानदार “मानते हैं”, प्रेस कान्फ़्रेंस में आपने भले ही स्वीकार कर लिया हो कि आप लाचार हैं, मजबूर हैं, हुक्म के गुलाम हैं… लेकिन फ़िर भी देश का गरीब आपसे यही कहेगा कि “हमारे खाने-पीने” पर निगाह रखने की बजाय, आप टेलीकॉम में राजा के “भकोसने”, गेम्स में कलमाडी के “भकोसने”, लवासा और शक्कर में शरद पवार के “भकोसने”, हाईवे निर्माण में कमलनाथ के “भकोसने”, आदर्श सोसायटी में देशमुख-चव्हाण के “भकोसने” पर निगाह रखते… तो आज हमें यह दुर्दिन न देखना पड़ते…

यदि आप इतने ही कार्यकुशल होते तो निर्यात कम करते, सेंसेक्स और कमोडिटी बाज़ार में चल रही सट्टेबाजी को रोकने के कदम उठाते, कालाबाज़ारियों पर लगाम लगाते, बड़े स्टॉकिस्टों और होलसेलरों की नकेल कसते, शरद पवार को बेवकूफ़ी भरी बयानबाजियों से रोकते… तब तो हम जैसे आम आदमी कुछ “खाने-पीने” की औकात में आते… लेकिन यह तो आपसे हुआ नहीं, बस बैठेबिठाए बयान झाड़ दिया कि “लोग ज्यादा खाने लगे हैं…”।

दिल्ली के एसी कमरों में बैठकर आपको क्या पता कि दाल कितने रुपये किलो है, दूध कितने रुपये लीटर है और सब्जी क्या भाव मिल रही है? फ़िल्म दूल्हे राजा में प्रेम चोपड़ा का प्रसिद्ध संवाद है… “नंगा नहायेगा क्या और निचोड़ेगा क्या…”… यही हालत आम जनता की है जनाब…। अपनी आँखें गरीबों के “खाने” पर लगाने की बजाय, दिल्ली के सत्ता गलियारों में बैठे “भकोसने वालों” पर रखिये… इसी में आपका भी भला है और देश का भी…
=============

(“खाने” और “भकोसने” के बीच का अन्तर तो आपको पता ही होगा या वह भी मुझे ही बताना पड़ेगा? चलिये बता ही देता हूं… येद्दियुरप्पा ने अपने बेटों को 10-12 एकड़ जमीन बाँटी उसे कहते हैं “खाना”, तथा देवेगौड़ा और एसएम कृष्णा ने अपने बेटों को 470 एकड़ जमीन बाँटी, इसे कहते हैं “भकोसना”…। बंगारू लक्ष्मण ने कैमरे पर जो रुपया लिया उसे कहते हैं “खाना”, और हरियाणा में जो “सत्कर्म” भजनलाल-हुड्डा करते हैं, उसे कहते हैं “भकोसना”)…

ना ना ना ना ना ना…प्रधानमंत्री जी,  इस गणित में सिर मत खपाईये कि 60 साल में कांग्रेस ने कितना “भकोसा” और भाजपा ने कितना “खाया”… सिर्फ़ इतना जान लीजिये कि भारत में अभी भी 30% से अधिक आबादी को कड़े संघर्ष के बाद सिर्फ़ एक टाइम की रोटी ही मिल पाती है… “खाना और भकोसना” तो दूर की बात है… जनता की सहनशक्ति की परीक्षा मत लीजिये…

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25 Comments

  1. February 22, 2011 at 9:01 am

    >NETAON APNI KHURAK KA BHI SARVEY KARALO…….SALLON….SORRY ……. TERELOGON KA PET TO 'GONU JHA' KA BAKHARIKE TARAH SE HAI…..KITNA BHI KHAO…SALE…..KHALI HI RAHENGE…..PRANAM.

  2. February 22, 2011 at 9:28 am

    >अरे साहब यह सब के सब भकोसने वाले ही है … यह हमारे और आप के जैसे खाने वालों को क्या जाने !दरअसल इस तरह की बकवास करने के लिए मनु भईया को सोनिया आंटी जी से इज़ाज़त नहीं लेनी पड़ती … सो बोल दिया … कम से कम लोग इतना तो कहेंगे … अपने मन से बोला ! 😉

  3. February 22, 2011 at 9:54 am

    >जिस व्यक्ति को हराम की सुख सुविधा मिले,हराम की तनख्वाह मिले और साथ में देश और समाज का खून चूसने वालों से हजारों करोड़ की रकम दलाली में मिले उनके मुहं से ऐसे हरामखोरी भरे बयान ही निकलेंगे……ऐसे हरामखोरों और गद्दारों को सरे आम जूते मारकर इनका दिमाग ठीक करने की जरूरत है……

  4. Anonymous said,

    February 22, 2011 at 10:42 am

    >याद करे!करीब दो साल इसने अपनी प्रोस्ट्रेट (पोरुष)ग्रंथि, एक ओपरेशन द्वारा निकलवा दी थी।

  5. February 22, 2011 at 12:13 pm

    >सुरेश साहब… पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ और संयोग देखिये कि इसी विषय पर मैं खुद भी सोच रहा था.. मैं दिल्ली में हूँ और सरकारी ऍफ़ एम १०६.४ सुनता हूँ.. वहां एक तो सुबह सुबह रीमिक्स का शोर नहीं होता और दिन भर के लिए मोटे मोटे समाचार का डोज़ मिल जाता है.. सुबह आज चर्चा का विषय था "मोटापा"… आश्चर्य की बात है कि जिस देश में आधे से अधिक लोग आज भी एक समय भोजन करते हैं.. वहां मोटापा एक ज्वलंत विषय है…. और सूत्रधार बता रहे थे कि कम खाना चाहिए.. व्यायाम करना चाहिए.. आदि आदि… कितना हास्यास्पद है …दूसरी ओर हमारे प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री मानते हैं कि हम अधिक खाते हैं… देश की ९०% आबादी देश के २०-२५% संसाधनों का उपयोग नहीं करता…ऐसे ही… देश में आम चर्चा होती है बिजली बचने कि.. पानी बचने की… जबकि आज भी देश में २लाख से अधिक गाँव तक बिजली के खम्भे पहुँचने बाकी हैं… आपका वैज्ञानिक ढंग से समझाना अच्छा लगा… आपके ब्लॉग पर अब आना बना रहेगा.. शुभकामना..

  6. February 22, 2011 at 12:58 pm

    >सुरेश जी, अब ऐसे लोगों की बात का क्या बुरा मानना जो यह कहे कि गठबंधन की मजबूरी के चलते वह दोषी है लेकिन उतना नहीं जितना कि बताया जा रहा है….. बल्कि मेरा तो यह मानना है कि यही लोग सबसे ज्यादा दोषी हैं….ये लोग थोड़ी सी हिम्मत दिखाते थोड़ा सा कड़ाई से पेश आते तो भी स्थिति सुधर सकती थी लेकिन जब इच्छाशक्ति ही न हो तो क्या किया जा सकता है।

  7. February 22, 2011 at 2:24 pm

    >सुपर डुपर हिट लेख सुरेश भाई !!! आप के लेख ने खान्ग्रेस के मुह पर खूब जूते भाकोसवाये !!

  8. JanMit said,

    February 22, 2011 at 2:55 pm

    >मनमोहनसिंह का मन तो किसी के आदेश का गुलाम है ! सिंह अब वे रहे नहीं ! अर्थशास्त्री है और महंगाई का कारण जब खोजना हो तो किसी न किसी को जवाबदार बताना ही पड़ेगा ! देश की जनता से अच्छा और कौन हो सकता था , इस बेबस और लाचार सरदार के लिए ! जनता उनकी मजबूरी खूब समझती है ! समय आने पर अपना जवाब वह देगी ही !

  9. February 22, 2011 at 2:55 pm

    >प्रधानमंत्री पहले ईमानदार थे तो सौ खून माफ थे, अब मजबूर है तो सौ खून माफ है.

  10. INDIAN said,

    February 22, 2011 at 6:00 pm

    >अब बाबा रामदेव के आने से कांग्रेसियो को बहुत खुजली हो रही है कि कही उनका भकोसना न बंद हो जाये

  11. पवन said,

    February 22, 2011 at 6:58 pm

    >काँग्रेस को खतम करो ये गांधी की अभिलाषा थी।पूरी इच्छा होगी उनकी बेटों से ये आशा थी॥पर बेटों ने उनके नाम पे सेंकी रोटी वोटों की।राम छोड़ सुखराम बने शैया अपनाई नोटों की॥पहन लँगोटी त्याग भाव से जीवन जिसने बिता दिया,उसके नाम पे अब अरबों-खरबों के वारे न्यारे हैं।गांधी के बेटे ही गांधी के असली हत्यारे हैं॥

  12. February 22, 2011 at 8:08 pm

    >मेरे हिसाब से मोंटेक सिंह ने ठीक ही कहा है – “भारतीय लोग ज्यादा खाने लगे हैं इसलिये महंगाई बढ़ी है…”. हमारी-आपकी और कांग्रेसी नेताओं की समझ में ये अंतर जरुर है की हम-आप भारतीय का अर्थ आम लोगों को समझते हैं, कांग्रेसी नेता सिर्फ उच्च वर्ग को ही भारतीय मानते है. बाकी आम जनता को कीड़े-मकौड़े हैं.

  13. February 23, 2011 at 4:48 am

    >लगता है हम लोग प्रधानमंत्री और उनकी सलाहकार समिति के उच्च लोगो के उच्च विचारों वाले इस व्यक्तव्य को समझ नहीं पाए. इन लोगो ने कहाँ कि “भारतीय लोग ज्यादा खाने लगे हैं इसलिये महंगाई बढ़ी है…” इनकी नज़र में भारतीय लोग वो नेता और अधिकारी है जो इनके आस पास मंडराते रहते है | आम जनता तो मवेशी है. तो साहब अब आप देखो पहले ये नेता लोग लाखो या करोडो रूपये खाते थे, अब ये हरामखोर हज़ार करोड और लाख करोड भकोसते है. अब इन लोगो (इसे पंवार, राजा, कलमाड़ी, लल्लू, मुल्लू, माया, जया, कमलनाथ इत्यादि पढ़ा जाए) ने ज्यादा (रिश्वत) खाना शुरू कर दिया है, अब चूँकि सारा पैसा बाजार से निकल कर कुछ लोगो के पास जमा हो गया जिसकी वजह से डिमांड सप्लाई गेप बढ़ गया और इसलिए महंगाई भी. तो अगर महंगाई पर काबू पाना है तो इन मानसिक रूप से दिवालिया लोगो को पैसे से भी दिवालिया करना पड़ेगा. बस फिर सब कुछ स्वत ही ठीक हो जायेगा.

  14. P K Surya said,

    February 23, 2011 at 5:13 am

    >en kamini haramkhor congres or ushke pille sale kisi bhi had tak gir sakte hai hamare kamjor or maha murkh prada nmantri sorry (pra dhan mantri) ko yahi kahna baki rah gaya tha sale ko ye bhi nahi pata ye bhi Rahu'l kee tarah ut ptang bol raha he sala arthsastri????? ese ye bhi nahi pata desh kee adhi janta adhe met soti he par kamine sarye to sale 5 star hotlo me hote hen jo sahi he. garib janta se kya lena dena en haramkhoro ka, jai Bharat

  15. February 23, 2011 at 5:26 am

    >आपके अनुसन्धान का तो कुछ कहते नहीं आता सुरेशजी ……कहाँ कहाँ से ढूंढ़कर लाते है .

  16. Man said,

    February 23, 2011 at 7:10 am

    >वन्देमातरम सर ,अच्छा आइना दिखया आप ने "खेतो के अड्वो "' को |ये खानदानी गुलाम वो ही तो बोलेंगे जो इनके मालकिन ने चाह |साले अव्वल दर्जे तक गिर चुके हे ये तलवे चट्टू कुत्ते |बाबा रामदेव के जागरण से पागल हुवे कुत्ते काटने की भी कोशीश कर रहे हे |पागल कुत्तो के गोली मार देनी चाहिए ये ही एक मात्र इलाज हे |

  17. February 23, 2011 at 9:14 am

    >आप भारतीय संस्कृति और सभ्यता कि बात करते हैं, क्या आप नहीं जानते इन माईनो प्रेमियों को भारतीय संस्कृति और सभ्यता से कोई लेने देना नहीं है. येतो अपनी बहन बेटियों का रिश्ता भी अब इटली में ढूंढने लगे हैं, अपनी माईनो माता को खुश रखने का एक भी मौका हाथ से नहीं गवाएं गे. मैंने एक बार टी.वि पर १० जनपथ पर एक बहुत बड़े खान्ग्रेशी कमीने नेता को, जिश कि उम्र लग-भाग ८० से ऊपर होगी, उशे राहुल के पैर छुते देखा, आदमी कितना गिर सकता है उश्का एहसास मुझे उश दिन होगया. इश कमीने ने कभी अपने मां-बाप के पैर नही छुए होंगे, लेकिन अपने पोते कि उम्र के दो कौड़ी के बच्चे का पैर छु रहा था, ये सोनिया प्रेमी किश हद तक उशे खुश रखने के लिए गिर सकते हैं, इशके बारेमे हम सोच भी नहीं सकते, और मनमोहन कि बहुत प्रसंशा करने कि जरुरत नहीं है, बिना वजह प्रधान मंत्री नहीं बना है ये भी उशकी भक्ति काही इनाम है…

  18. February 23, 2011 at 9:31 am

    >हमारे महान अर्थशास्त्री जी का कहने का आशय आप शायद नहीं समझ पाए ! वो कह रहे है कि पिछले ७ सालों में उनकी, उनकी आंटी (राजमाता ) और देश भर में फैले आंटी के गुलामों की चमड़ी (BMI Index) इतनी मोटी हो गई है कि इतने बड़े-बड़े घोटालों के उजागर होने के बाबजूद भी उन्हें ज़रा भी शर्म नहीं आती ! तो वो कहाँ गलत है भला ?

  19. February 23, 2011 at 12:17 pm

    >VANDEMATARAM SIRKANGRESIYO KO CHAAHE KITNE BHI JUTE MAARE JAAY, YE SUDHARENE WAAL NHI HAI.INHE YE NHI SAMAJH ME AATA HAI KI BHOJAN KHANE AUR GHOTALE ME KITNA FARK HAI? GHOTALO KE RUPAYO SE KITNE VARSHO KA KHANA BHARATIY KHANA KHA SAKATE HAI.AAP NE JOR KA JUTA MARAA HAI, INN KAMINO KO……JAY JAY BHARAT….

  20. Thakur said,

    February 23, 2011 at 2:19 pm

    >चिपलूनकर जी साधुवादकांग्रेस हद्द से भी निचे गिर कर काम कर रही है इसका एक उदहारण संजय तिवारी नामक विस्फोट.कॉम के सम्पादक के लेख से मिल जाता है! स्वयं पढ़ें और निष्कर्ष निकालेंhttp://visfot.com/home/index.php/permalink/3776.html

  21. February 23, 2011 at 2:24 pm

    >बेशर्मों को आप क्या बताना चाह रहे हैं। जिनका न कोई ज़मीर है न कोई अस्मिता। इनके पेट का अनंत साइज़ सब का हिस्सा खा जाने के बाद भी नहीं भरने वाला है… मगर जनता खुद भी इसके लिए दोषी है जो चुनाव आते ही सब भूल जाती है और इनके मकडजाल मे फँसती रही है। अब तो घड़ा भरने का इंतज़ार करिए… देखते जाइए क्या होता है।

  22. Amit said,

    February 24, 2011 at 8:19 pm

    >सर प्रणाम, काफी दिनों के बाद कमैन्‍ट लिख रहा हूं वा भी पहली बार हिन्‍दी में इसलिए गलतियों के लिऐ माफ करेंआज कल विदेश में हू लेकिन आपके लेख हमेशा पढता हूंा मुझे तो पता ही नहीं था कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने ऐसा बयान दिया हैा पढते ही हंसी आ गयी इतना तो मै शायद ही किसी जोक पर हंसा होउंगा लगता है इनका प्‍लान गरीबों को ही हटाने का है तो गरीबी अपने आप हट जायेगीा और क्‍या पता इस बयान के लिऐ भी मैडम ने ही बोला हो या फिर ये पूरी तरह से ब‍रगला गये हैंा पहले बोल रहे थे कि लोगो की buying power बढ गयी है अब लोग ज्‍यादा खाने लगे हैंा शायद इनको समझ नही आ रहा कि क्‍या कहेंा अब ये कह ही सकते हैं कुछ करने कि उम्‍मीद र्कप्‍या इनसे ना करें आपने वैसे ही इतने सारे Analysis कर डाले

  23. vivek said,

    February 25, 2011 at 8:51 am

    >Hindu vote bank jab tak nahi banega is desh ka stayanash hota rahega jago hindu jago

  24. February 27, 2011 at 3:44 am

    >शानदार पोस्ट।

  25. March 1, 2011 at 5:52 am

    >काँग्रेस को खतम करो ये गांधी की अभिलाषा थी। पूरी इच्छा होगी उनकी बेटों से ये आशा थी॥ पर बेटों ने उनके नाम पे सेंकी रोटी वोटों की। राम छोड़ सुखराम बने शैया अपनाई नोटों की॥ पहन लँगोटी त्याग भाव से जीवन जिसने बिता दिया, उसके नाम पे अब अरबों-खरबों के वारे न्यारे हैं। गांधी के बेटे ही गांधी के असली हत्यारे हैं॥amazing thing !!


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