>काश, मनमोहन सिंह ने भारत-पाक मैच, पान की दुकान पर देखा होता… India-Pakistan Cricket Match, Nationalism and Politics

>भारत और पाकिस्तान के बीच बहुप्रतीक्षित मैच अन्ततः 30 मार्च को सुखद अन्त के साथ सम्पन्न हो गया। 26/11 के मुम्बई हमले के बाद पाकिस्तान के साथ भारत का यह पहला ही मुकाबला था, इसलिये स्वाभाविक तौर पर भावनाएं उफ़ान पर थीं। रही-सही कसर भारत के अधकचरे इलेक्ट्रानिक मीडिया (जो कि परम्परागत रूप से मूर्खों, बेईमानों, चमचों से भरा है) ने इस मैच को लेकर जिस तरह अपना “ज्ञान”(?) बघारा तथा बाज़ार की ताकतों (जो कि परम्परागत रूप से लालची, मुनाफ़ाखोर और देशद्रोही होने की हद तक कमीनी हैं) ने इस मौके का उपयोग अपनी तिजोरी भरने में किया… उस वजह से इस मैच के बारे में आम जनता की उत्सुकता बढ़ गई थी।

इस माहौल का लगे हाथों फ़ायदा उठाने में कांग्रेस सरकार, मनमोहन सिंह, विदेश मंत्रालय के अफ़सरों (Foreign Ministry of India) और सोनिया-राहुल ने कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। मीडिया भी 7-8 दिनों के लिये इस ओर व्यस्त कर दिया गया, आगामी 5 राज्यों के चुनाव (Assembly elections in India) को देखते हुए पाकिस्तान को पुचकारने (प्रकारान्तर से खुद के मुँह पर जूता पड़वाने) का इससे बढ़िया मौका कौन सा मिल सकता था। यह कांग्रेस की घटिया और नीच सोच ही है कि उसे लगता है कि पाकिस्तान से मधुर सम्बन्ध बनाने पर भारत के मुसलमान खुश होंगे, यह घातक विचारधारा है, लेकिन मीडिया इसकी परवाह नहीं करता और कांग्रेस की “अखण्ड चमचागिरी” में व्यस्त रहता है।

सो, पाकिस्तान से दोस्ती (India-Pakistan Relations) की कसमें खाते, कुछ “नॉस्टैल्जिक” किस्म के अमन की आशा वाले “दलालों” की सलाह पर, मौके का फ़ायदा(?) उठाने के लिये मनमोहन सिंह ने उस व्यक्ति को मैच देखने भारत आने का निमंत्रण दे दिया, जो लगातार पिछले दो साल से पाकिस्तान में छिपे बैठे 26/11 के मुख्य अपराधियों और षडयंत्रकारियों को बचाने में लगा हुआ है, भारत की कूटनीतिक कोशिशों पर पानी फ़ेरने में लगा हुआ है, अमेरिका से हथियार और पैसा डकारकर भारत के ही खिलाफ़ उपयोग करने में लगा है। अफ़ज़ल खान की तरह शिवाजी की पीठ में छुरा घोंपने की मानसिकता बनाये बैठे यूसुफ़ रज़ा गिलानी (Yousuf Raza Gilani) के साथ बुलेटप्रूफ़ काँच के बॉक्स में मैच देखने में मनमोहन सिंह को ज़रा भी संकोच अथवा शर्म नहीं आई। (26/11 Mumbai Attacks)

यह एक सामान्य सिद्धांत है कि जो नेता अपनी जनता की भावनाओं को समझ नहीं सकता, उसे नेता बनकर कुर्सी से चिपके रहने का कोई हक नहीं है। आम जनता की भावना क्या है, यह 30 मार्च की रात को समूचे भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी और गुवाहाटी से राजकोट तक साफ़ देखी जा सकती थी, और जो इस जनभावना के ज्वार को नहीं पढ़ पा रहे हैं, ऐसे नेता पक्ष और विपक्ष में अपनी राजनैतिक गोटियाँ बैठाने में लगे हुए हैं। पाकिस्तान का हर विकेट गिरने पर पटाखे छोड़ने वाले, मैच जीतने के बाद आतिशबाजी करने वाले, अपनी-अपनी गाड़ियों पर तिरंगा लहराते, “हिन्दुस्तान जिंदाबाद” (सेकुलरों का मुँह भले यह सुनकर कड़वा हो, लेकिन हकीकत यही है कि “इंडिया-इंडिया” की बजाय “भारत माता की जय” तथा “हिन्दुस्तान जिन्दाबाद” का ही जयघोष चहुँओर हुआ) नारे लगाते बड़े-बूढ़े, हिन्दू-मुस्लिम, नर-नारियाँ जिस “भावना” का प्रदर्शन कर रहे थे, उसे कोई बच्चा भी समझ सकता था। यदि मनमोहन सिंह ने गली-नुक्कड़ की पान की दुकानों पर खड़े होकर मैच देखा होता तो वे जान जाते कि आम आदमी उनके बारे में, पाकिस्तान के बारे में, पाकिस्तान के खिलाड़ियों के बारे में, तथाकथित गंगा-जमनी वाले फ़र्जियों के बारे में… किस भाषा में बात करता है और क्या सोच रखता है।

उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग जानते हैं कि होली (Holi Festival in India) खेलने के दौरान कैसी गालियों से युक्त भाषा का उपयोग किया जाता है, सोनिया-राहुल अपना एसी बॉक्स छोड़कर ग्रामीण कस्बे के किसी चौराहे पर मैच देखते तो जान जाते कि लोगों ने दीपावली तो मैच जीतने के बाद मनाई थी, होली पहले मनाई… अर्थात “होली के माहौल वाली भाषा” पूरे मैच के दौरान जारी थी। कामरान अकमल का विकेट गिरने से लेकर मिस्बाह का विकेट गिरने तक हर बार तथा स्क्रीन पर कभीकभार दिखाये जाने वाले यूसुफ़ रज़ा गिलानी का दृश्य देखते ही पान की दुकान पर जिस प्रकार की गालियों की बौछार होती थी, उन सभी गालियों को उनके अलंकार सहित यहाँ लिखना नैतिकता के तकाजे की वजह से असम्भव है। परन्तु 30 मार्च को जिसने भी “आम जनता” के साथ मैच देखा और धारा 144 तथा बड़ी स्क्रीन नहीं, डीजे नहीं, अधिक शोर नहीं… जैसे विभिन्न सरकारी प्रतिबन्धों को सरेआम धता बताकर जैसा जश्न मनाया… उसका संदेश साफ़ था कि पाकिस्तान नाम के “खुजली वाले कुत्ते” से अब हर कोई परेशान है और उसे लतियाना चाहता है, दबाना और रगेदना चाहता है… परन्तु इस भावना को न तो अटल जी समझने को तैयार थे, न मनमोहन सिंह समझने को तैयार हैं, और न ही आडवाणी।

यदि मोहाली में मैच शुरु होने से पहले दोनों प्रधानमंत्री हमारे शहीद जवानों के सम्मान में दो मिनट का मौन रखते, अथवा मुम्बई हमले में मारे गये शहीदों की याद में दीपक प्रज्जवलित किये जाते, अथवा पाकिस्तान से विरोध प्रदर्शित करने के लिये कम से कम 20-25 हजार दर्शक और सोनिया-राहुल स्वयं काली पट्टी बाँधकर आते… परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ… इसी से साबित होता है कि हमारे देश के नेताओं की “कथित देशभक्ति” कितनी संदिग्ध है… और उनमें पाकिस्तान के समक्ष कोई “कठोर”  तो छोड़िये, हल्का-पतला प्रतीकात्मक प्रतिरोध करने लायक “सीधी रीढ़ की हड्डी” भी नहीं बची है।

ड्राइंगरूमों में बैठकर चैनलों की स्क्रिप्ट लिखने वाले तथाकथित “अंग्रेजीदां बुद्धिजीवी” भी कभी इस भावना को नहीं समझ सकते। हमने पाकिस्तान को 4-4 बार युद्ध में हराया है और विश्वकप के मुकाबलों में भी 5 बार हराया है, हमने पाकिस्तान के दो टुकड़े किये हैं (चार टुकड़े और भी करने की क्षमता है), परन्तु कश्मीर के जिस नासूर को पाकिस्तान ने लगातार 60 साल से लहूलुहान रखा है, कभी दाऊद इब्राहीम, टाइगर मेमन तो कभी अफ़ज़ल गुरुओं-कसाबों के जरिये जिस तरह लगातार कीलें-काँटे चुभाता रहा है… अब उससे “आम जनता” आज़िज़ आ चुकी है…। पान की दुकान पर रखे टीवी पर चलते मैच के दौरान होने वाली “देसी गालियों से लैस” अभिव्यक्तियों के स्वर यदि समय रहते देश के कर्णधारों के “तेल डले कानों” तक पहुँच जाये तो ज्यादा अच्छा रहेगा…

अब अन्त में एक कड़वी बात 30 मार्च की रात को जश्न मनाने वाले “वीरों” से भी –

पाकिस्तान को हराने पर आपने जश्न मनाया, पटाखे फ़ोड़े, मिठाईयाँ बाँटी, रैली निकाली, हॉर्न बजाये, तिरंगे लहराये… कोई शिकायत नहीं है। कुछ लोगों ने इस उन्मादी क्रिकेट प्रेम पर यह कहकर नाक-भौंह सिकोड़ी कि ये सब बकवास है, देश जिन समस्याओं से जूझ रहा है उसे देखते हुए ऐसा भौण्डा जश्न मनाना उचित नहीं है… परन्तु ऐसे शुद्धतावादियों से मैं सिर्फ़ इतना ही कहना चाहता हूँ कि आम जनता के जीवन में इतने संघर्ष हैं, इतने दुःख हैं, इतनी गैर-बराबरी है कि उसे खुशी मनाने के मौके कम ही मिलते हैं, इसलिये भारत-पाक क्रिकेट मैच के जरिये थोड़ी देर की “आभासी” ही सही, खुशी मनाने का मौका उन्हें मिलता है। अपना गुस्सा व्यक्त करने की कोई संधि या कोई मौका-अवसर इन आम लोगों के पास नहीं है, इसलिये वह गुस्सा पाकिस्तान के खिलाफ़ मैच के दौरान निकल जाता है… इसलिये मैं कहना चाहता हूँ कि देशभक्ति का यह प्रदर्शन, खुशियाँ, नारेबाजियाँ इत्यादि सब कुछ, सब कुछ माफ़ किया जा सकता है, बशर्ते यह भावना “पेशाब के झाग” की तरह तात्कालिक ना हो, कि ‘बुलबुले की तरह उठा और फ़ुस्स करके बैठ गया”।

दुर्भाग्य से हकीकत यही है कि हमारी राष्ट्रवाद और देशप्रेम की भावना, पेशाब के झाग की तरह ही है… मैच जीतने का जश्न खत्म हुआ, पाकिस्तान और ज़रदारी-गिलानी को गालियाँ देने का दौर थमा और अगले दिन से आम आदमी वापस अपनी “असली औकात” पर आ जाता है, उसे देश को लूटने वालों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, उसे उसका जीवन दूभर करने वाले नेताओं से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, उसके बच्चों का जीवन अंधकारमय बनाने वाले भ्रष्टाचार से कोई फ़र्क नहीं पड़ता… तो फ़िर ऐसी देशभक्ति(?) का क्या फ़ायदा जो घण्टे-दो घण्टे हंगामा करके “बासी कढ़ी के उबाल” की तरह बैठ जाये?

भारत-पाकिस्तान के मैच ने दोनों वर्गों (शासकों और शासितों) को साफ़ संदेश दिया है –

शासकों :- जनभावना को समझो, उसका सम्मान करो और तदनुसार आचरण करो…

जबकि ऐ शासितों और शोषितों :- देशभक्ति और राष्ट्रवाद कोई हॉट डॉग या इंस्टेंट फ़ूड नहीं है कि खाया और भूल गये… यह भावना तो “अचार-मुरब्बे” की तरह धीरे-धीरे पकती है, “असली स्वाद के साथ अन्दर तक उतरती है” और गहरे असर करती है। यदि भ्रष्टाचार, महंगाई, अनैतिकता, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, अत्याचार, देश की खुली लूट देखकर भी आपका खून नहीं खौलता, तो मान लीजिये कि 30 मार्च की रात जो आपने दर्शाया वह फ़र्जी देशप्रेम ही था… और पेशाब के झाग की तरह वापस चुपचाप अपने घर बैठ जाईये, काम पर लग जाईये…। यदि घोटालों, घपलों, स्विस बैंक, हसन अली, सत्ता के नंगे नाच, कांग्रेस-वामपंथियों के आत्मघाती सेकुलरिज़्म, को यदि आप भूल जाते हैं तो “देशभक्ति के बारे में सोचने” के लिये अगले भारत-पाक मैच का इन्तज़ार कीजिये…

40 Comments

  1. P K Surya said,

    April 1, 2011 at 8:09 am

    >wah bhai wah ek bat to ap likhna bhul gaye kee soia gadhi stadium se uth uth k kahan kahan baithi thi pata nahi kya sabita krna chahti thi ,, soniya ka mohan bhi bare pyar se dar dar k aise has raha tha jaise pakis tani pm kahin kuchh dant wat na de, are jeet rahen ho to khul k haso mohan chhup chhup k nahi,,

  2. rajiv said,

    April 1, 2011 at 8:14 am

    >लेकिन मनमोहन को पथरी की अलग प्रकार की गंभीर बीमारी है जो गुर्दे से इसके भेजे में उतर गई है…..

  3. April 1, 2011 at 9:26 am

    >सुरेश जी, पाकिस्तान को हम कितना भी गरिया ले, कितनी भी गालिया दे दे ! हमारे मन में उसके लिए कितनी भी नफरत क्यों ना हो, कड़वी सच्चाई यह है कि वह हमारा पड़ोसी है ! आज के हालात में भूगोल नहीं बदला जा सकता है(चाहे आप उसके कितने भी टूकडे कर ले, बांगलादेश आज हमारा एहसान नहीं मानता है ). नेताओ को कितना भी गरिया ले, हमें भारत और पाकिस्तान को सह-आस्तित्व मानना होगा और साथ रहना होगा!

  4. April 1, 2011 at 9:34 am

    >आशीष जी आपकी बात सही है।हमारा यही तो दुर्भाग्य है कि पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है, लेकिन पड़ोसी तो इज़राइल के भी तुलनात्मक रूप से बहुत नीच हैं… मेरे कहने का आशय सिर्फ़ यही है कि कम से कम हमारे नेता और जनता "सीधे तनकर" खड़े होना तो सीखें। एक बात बताईये – यदि पाकिस्तान से हम सभी सम्बन्ध तोड़ लें… (सभी यानी सभी – हवा, पानी, आवागमन, आयात-निर्यात, बातचीत सब कुछ बन्द) तो हमारा नुकसान ज्यादा है या उसका? शुरुआत के तौर पर इतना सरल सा कदम तक उठाते नहीं बनता हमारे नपुंसक नेताओं से… तो जनता क्या करेगी… गालियाँ ही देगी ना? सह-अस्तित्व उससे बनाया जा सकता है, जो उस लायक हो। सदाचारी और कमीने साथ-साथ कब तक रहेंगे?

  5. April 1, 2011 at 9:46 am

    >जन भावना को समझो उसका सम्मान करो और तदनुसार आचरण करो आप किससे आचरण की बात करते हैं… रबर स्टैम्प को आचरण करते देखा है कभी?? रही बात देश प्रेम की… तो आजकल के तथाकथित देश भक्त हैं जो गंगा जमनी तहजीब की मिसाल रखते हैं और इंडो पाक मैच में पाकिस्तान के हारने पर मातम मनाते हैं, पाकिस्तान के जीतने पर मिठाइयाँ बांटते हैं, कहीं देखी है ऐसी मिसाल? ये हिन्सुस्तान ही है जहाँ का एक बाहुत बड़ी जनसंख्या पाकिस्तान के समर्थन में मैच देखती है,

  6. rohit said,

    April 1, 2011 at 9:49 am

    >बंधू पाकिस्तान का अस्तित्व हमें स्वीकारना होगा दोस्त बदल सकते है लेकिन पडोसी नहीं . रही बात भारत -पाक मैच के बाद उठे उन्माद की तो भाई यह लोगो का एक इन्स्टेंट प्रतिक्रिया थी इसमे देशभक्ति को शामिल ना करो . दोनों में जमीं आसमान का अंतर है. रही बात सोनिया या राहुल के मैच का लुत्फ़ उठाने की तो भाई साहब कम से कम उनमे इतना तो है ही की जाके मैदान में मैच देखे और टीम का मनोबल बढ़ाये ना की घर के कमरे में बैठ के सास बहु का सीरियल देखे. एक भी भा ज पा का राष्ट्रीय स्तर का नेता नहीं दिखा वहां. कम से कम शक्ल दिखने तो चले जाते. रही बात मनमोहन सिंह के हँसाने की तो भाई तहजीब भी कोई चीज़ होती है हम अपने घर आये मेहमान की हसी नहीं उड़ाते अतिथि देवो भव् हमें विरासत में मिला है जिसे आप शायद भूल गए है.

  7. rohit said,

    April 1, 2011 at 9:59 am

    >आखिर नेता को नेता बनता कोन है हम और आप ही ना ओह क्षमा करे इस देश में सरकार तो ग्रामीण क्षेत्र के लोग , अवैध विदेशी शरणार्थी बनाते है . एक मत की कीमत तुम क्या जानो सुरेश बाबू इसकी कीमत एक शराब का पाउच और एक रोटी का पेकेट है. अरे फिर से माफ़ी तमिलनाडु में तो सोना और लैपटॉप तक दिए जारहे है इस चुनाब में रंगीन टी वि तो पुराना हो गया है तमिलनाडु के चुनावों के लिए इस बार सोना और लैपटॉप मिलेंगे . जो आदमी इतना पैसा दे कर आपके मत को खरीद रहा है यदि आप उससे देशभक्ति की अपेक्षा रखते है तो यह सरासर मुर्खता होगी . आखिर वो आपके मत की कीमत चुकाकर ही तो मंत्री बना है फिर काहे को आपकी सुनेगा

  8. April 1, 2011 at 10:01 am

    >भूगोल वाली बात "गंगा-जमना" वाली संस्कृति जैसी ही फालतु बात है. पड़ोसी है तो उसकी तरह प्रेम से रहे. नहीं तो बोलचाल बन्द करे. अपना अपना रास्ता पकड़े और शांति से रहे. यह तो कोई बात नहीं हुई पड़ोसी मेरे बच्चों को मारता रहे और मैं उसके घर मिठाई पहूँचाता रहूँ. समझ से बाहर की बात यह भी है कि कुछ हरामखोर लोगों से भारत की जीत का जश्न हजम नहीं हुआ और जूलुस पर पत्थर फेंके या तलवारें भाँजी, मगर गंगा-जमना वाले उस पर चूप है. आखीर "एक कौम" को ही तकलीफ क्यों हुई?

  9. April 1, 2011 at 10:03 am

    >30 को जो था वह हमारा फर्जी देशप्रेम हो सकता है मगर पाकिस्तान के प्रति हमारी क्या सोच है उसकी खरी अभिव्यक्ति थी. कह दो गलत है?

  10. April 1, 2011 at 10:36 am

    >सुरेश बंधू सब बात बहुत सही हैं, बल्कि मैंने आचार्य धर्मेन्द्र जी महाराज से बात की मेच के बाद तो बिलकुल यही बातें महाराज ने कहीं थी, उसे बाद में पोस्ट करूँगा उनके पेज पर. पर एक चीज पहली बार कांच की तरह चुभ रही है इस लेख में . देशभक्ति एक अत्यंत ही शुद्ध और पवित्रतम भावना है, अपने लेख को सनसनी देने के लिए जिस गंदे शब्द का प्रयोग बार बार किया गया है वो मन को बहोत चोट पंहुचा रहा है, मैंने ये देखा है बल्कि प्रत्यक्ष देखता हूँ बार बार आई लव माय इंडिया" कल्चर के लोगों में देशभक्ति १५ अगस्त और पाकिस्तान से मेच के समय ही उत्तपन होती है, पर आपका तीर बिलकुल गलत निशाने पर लगा उन्हें शर्म आने से रही, ,, हमारी आस्था अवश्य अपमानित हुई.

  11. April 1, 2011 at 11:08 am

    >आपके विचार जोशीले हैं। लेकिन जरा होश की भी जरूरत है। पड़ोसी कितने भी खराब क्यों न हों, आखिर रहते तो पड़ोसी ही हैं। यदि कोई बम एक के घर में गिरेगा तो दूसरे पर भी फर्क तो पड़ेगा ही ना।मैं आपसे सहमत हूं कि पाकिस्तान कुत्ते की दुम की तरह है, जो कभी सीधी नहीं हो सकती। पर, सभी पाकिस्तानी या मुस्लिम कुत्ते की दुम नहीं हैं। यह तो हमारे और उनके नेता ही हैं, जो दोनों देशों के जख्मों को रह-रहकर कुरेदते रहते हैं। हम थोड़ा उदार हैं।यह तो सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में जिसे भी अपनी राजनीति चमकानी है या चलानी है, उसे कश्मीर मुद्दा साथ लेकर चलना पड़ता है। आम लोगों को एक जोशीला भाषण भड़का देता है और वे उसी हक में वोट डाल देते हैं। अगर कोई नेता या पार्टी भारत के साथ अच्छे संबंध बनाने की कोशिश भी करे तो उसका तख्ता पलट दिया जाता है। कुल मिलाकर कुछ गंदे और नीच सोच के लोगों की वजह से पूरा पाकिस्तान बदनाम है।जो भी पाकिस्तानी भारत आया और यहां रहकर हमें जाना, वह कभी भारत को बुरा नहीं कहता। और तो और अब पाकिस्तान के क्रिकेट कप्तान शाहिद अफरीदी ने भी बोर्ड से कहा है कि ‘भारत और हमारी संस्कृति काफी समान है, फिर उससे इतनी नफरत क्यों?’ यह एक बड़ा सवाल है। जो पाकिस्तान के सत्ताधारियों की समझ से बाहर है। दुनाली

  12. April 1, 2011 at 12:00 pm

    >बात पाकिस्तान से ज्यादा अब अमेरिका की हो गयी है, सुरेश जी! ये अमेरिका के टट्टू हैं,विदेशी मामलों में स्क्रिप्ट वहीं से आती है, और घरेलू मामलों में यह अब ये उसी तरह से शातिर हो गये हैं। रही बात देश की जनता की तो वह चुनाव के द्वारा ही बोल सकती है, पर जब लोकतंत्र का ही अपहरण कर लिया गया हो तो वह भी क्या कर सकती है। क्रांति के बीजों पर तो "ग्रीड पर आधारित इस अर्थव्यवस्था" ने तेजाब झिडकने का काम कर ही दिया है।

  13. April 1, 2011 at 12:19 pm

    >* तेजाब छिड़कने का

  14. April 1, 2011 at 1:22 pm

    >सुरेश जी मैंने नपुन्सको की इससे बड़ी जमात नहीं देखी जो हर बार पाकिस्तान के हाथों अपने बेकसूर भाई बहिनों को खो देते है और अमन और प्यार की बात ऐसे करते है जैसे जिंदगी में कभी किसी को बुरा कहा ही न हो इनके खुद के पड़ोसियों से भले ही इनके सम्बन्ध अच्छे न हो मगर ये सरहद पार के दहशतगर्दो की वकालत खूब करना जानते है ! सच को भी बड़ी आसानी से झुठला देते है यंहा के लोग ! आखिर कब तक हाथो में ९० % आतंकियों के मुल्क से दोस्ती की डुगडुगी बजाते रहेगे ये विक्षिप्त मानसिकता वाले लोग ! आतंक का कोई मजहब नहीं होता मगर लादेन का मजहब है और वो खुले आम कहता है इस्लाम कायम करना उसका मकसद है ! हाफ़िज़ सहीद का मजहब है अजमल कसाब का मजहब है और अफज़ल गुरु का मजहब है और वो खुले आम इसका एलान भी करते है की इस्लाम पर कुर्बान होना है ! और जिनको ये नहीं दीखता वो उस पार से अमन की कामना में अपना घर भी लुटवाने जा रहे है और उनके इसी मकसद को ध्यान में रखकर हमारे यंहा की सरकार स्विस बैंक में अपनी पूंजी को बढ़ाने में लगी है क्योकि वो जानते है हम अभी भी अंग्रेजो की मानसिक गुलामी से आजाद नहीं हुए है !!

  15. April 1, 2011 at 1:24 pm

    >आदरणीय सुरेश जी,क्या आप जैसे स्वघोषित देशभक्तों को पाकिस्तान पैसा देता है, देश में गंदगी फैलाने के लिए। मैं जब भी देखता हूं आप लिखते हैं, तो हमेशा पाकिस्तान-पाकिस्तान करते रहते हैं। अरे मारिये पाकिस्तान को। देश को तोड़नेवाली बातें क्यों करते रहते हैं। आपको क्या लगता है कि देश के मुसलमानों को गरियाएंगे या फिर उलटा-सीधा बकने लगेंगे, तो मुसलमान इस देश को अपना समझना छोड़कर कहीं और चले जाएंगे क्या। अरे कुछ ऐसा काम कीजिए, जिससे देश का नाम हो और जो 121 में से 120 करोड़ लोग गरीब-मध्यम वर्ग के हैं, उनके कल्याण के बारे में सोचिये। खाद्य पदार्थों की महंगाई ने लोगों की मां-बहेन एक कर दी है, पेट्रोल महंगा होता जा रहा है। इन पर कैसे लगाम लगे, इसका कोई उपाय सोचिए और लोगों को बताइये। पाकिस्तान-पाकिस्तान करके उसका विज्ञापन ही कर रहे हैं आप जैसे लोग। और पाकिस्तान से इतना ही नफरत है, तो वास्तव में कुछ करते क्यों नहीं। लिख-लिख के की-बोर्ड टूट जाएगा, लेकिन पाकिस्तान का कुछ नहीं उखड़ेगा। अगर कुछ करना ही है, तो राजनीति में आइये। राहुल-सोनिया जैसों और उनके तथाकथित रबर स्टांप मनमोहन से ऊपर उठिये और आप ही फैसला लीजिए देश के लिए। और अगर इतना करने की औकात नहीं है, तो कृपया पाकिस्तान का प्रचार बंद कीजिए।जय हिंद।

  16. Anonymous said,

    April 1, 2011 at 1:25 pm

    >सुरेश जी मैंने नपुन्सको की इससे बड़ी जमात नहीं देखी जो हर बार पाकिस्तान के हाथों अपने बेकसूर भाई बहिनों को खो देते है और अमन और प्यार की बात ऐसे करते है जैसे जिंदगी में कभी किसी को बुरा कहा ही न हो इनके खुद के पड़ोसियों से भले ही इनके सम्बन्ध अच्छे न हो मगर ये सरहद पार के दहशतगर्दो की वकालत खूब करना जानते है ! सच को भी बड़ी आसानी से झुठला देते है यंहा के लोग ! आखिर कब तक हाथो में ९० % आतंकियों के मुल्क से दोस्ती की डुगडुगी बजाते रहेगे ये विक्षिप्त मानसिकता वाले लोग ! आतंक का कोई मजहब नहीं होता मगर लादेन का मजहब है और वो खुले आम कहता है इस्लाम कायम करना उसका मकसद है ! हाफ़िज़ सहीद का मजहब है अजमल कसाब का मजहब है और अफज़ल गुरु का मजहब है और वो खुले आम इसका एलान भी करते है की इस्लाम पर कुर्बान होना है ! और जिनको ये नहीं दीखता वो उस पार से अमन की कामना में अपना घर भी लुटवाने जा रहे है और उनके इसी मकसद को ध्यान में रखकर हमारे यंहा की सरकार स्विस बैंक में अपनी पूंजी को बढ़ाने में लगी है क्योकि वो जानते है हम अभी भी अंग्रेजो की मानसिक गुलामी से आजाद नहीं हुए है !!

  17. April 1, 2011 at 1:38 pm

    >पाकिस्तान को बुलाकर मैच दिखाना सिर्फ भारतीय मुसलमान को रिझाने के अलावा और कोई काम नही किया है प्रधानमंत्री ने |क्या इससे पाकिस्तान अपना घिनौना कार्य करना छोड़ देगा ? ऐसा नामुमकिन है |

  18. April 1, 2011 at 1:59 pm

    >@ मेरे शुभचिंतक जी – इस लेख में आपको मुसलमान विरोध कहाँ से दिख गया? कमाल है… आप सच में मेरे ही शुभचिंतक हैं या……? महंगाई बढ़ रही है, पेट्रोल बढ़ रहा है, लोग गरीब हो रहे हैं, तो यह तो आपको सोचना है कि क्यों कोई एक पार्टी 50 साल शासन करने के बावजूद एक भी समस्या ठीक से सुलझा नहीं पाई… 🙂 उलटे बढ़ा दीं। पाकिस्तान से नफ़रत अकेले मुझे नहीं है, 30 मार्च की रात को जो करोड़ों लोग जश्न मना रहे थे, सभी को है, अन्तर सिर्फ़ इतना है कि उनके पास इसे व्यक्त करने के लिये मौका कभी-कभार ही आता है, जबकि मेरे पास ब्लॉग है… 🙂 शुभचिंतक भाई, कम से कम मैं कहीं पर छोटी सी तूती की तरह आवाज़ तो उठा रहा हूं, कोई सुने या ना सुने… लेकिन आप क्या कर रहे हैं? आपने अफ़ज़ल गुरु और कसाब की जल्द से जल्द फ़ाँसी के लिये कहाँ-कहाँ और कितनी बार आवाज़ उठाई है? खुद का नाम और पहचान तक बताने में आपको सोचना पड़ रहा है… अब इससे मैं क्या समझूं?

  19. Anonymous said,

    April 1, 2011 at 2:05 pm

    >मूर्ख हिँदुओ तुम लोग कभी मत जागना. चुल्लु भर पानी मे डूब मरो. चाटते रहो इस भाईचारे की थूक को. ये भाई चारे की थूक चाटने का नतीजा है कि पश्चिम बंगाल अब हाथ से निकल गया. जो बात सुरेश जी कहते थे . वही बात आज अखबारो मे निकली है कि "अब पश्चिम बंगाल का भविष्य बांग्लादेशी तय करेँगे." उसमे लिखा है कि पिछले दस सालो मे वहाँ बांग्लादेशी घुसपैठ से मुसलमानो की जनसंख्या मे 35 % की जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुयी है. और उन सभी बांग्लादेशियो को वहा रह रहे मुसलमानो ने मिल कर वहाँ की नागरिकता प्रदान करवा दी है. और अब वहाँ हिँदुओ की कोई औकात नही. हिँदुओ को अपना त्यौहार मनाना तक दूभर हो गया है. आने वाले चुनावो मे वहाँ की सत्ता की चाबी केवल मुसलमानो के हाथ मे है. और सभी पार्टियाँ इनके पीछे पीछे भाग रही तो हिँदुओ अब बजाते रहो ढोल. अब कश्मीर के बाद पश्चिम बंगाल भी हाथ से निकल गया. और ये बांग्लादेशी पाकिस्तानी अब बंगाल फतह करने के बाद एक रणनीति के तहत अन्य प्रदेशो मे फैल रहे है. जैसे कल अभी आकड़े आये है कि उत्तर प्रदेश की आबादी 16 करोड़ से बीस करोड़ हो गयी है. तो भाई अब यूपी की बारी है. लेकिन अपने हिँदुओ को क्या फर्क पड़ता है वो तो भाईचारे की थूक चाटने मे बिजी है.

  20. April 1, 2011 at 2:17 pm

    >हम सोनिया, मनमोहन या कोंग्रेश कि चाप्लुश टीम से अब हिन्दुत्व और राष्ट्र भक्ति कि उम्मीद ही क्यूँ करे, उन लोगोंनें तो अपना एजेंडा हमें साफ दिखा दिया है, ""हम जियें गे और मरेंगे ऐ पकिश्तान तेरे लिए "" !!!! लेकिन हमारे अडवानी जी शे भी अब हमें ज्यादा उम्मीद रखने कि जरुरत नहीं है, उनके अन्दर भी लगता है अपनी जन्भूमि (???????) के प्रति प्यार होने लगा है, अबतो लगता है हिन्दुओं और हिन्दुश्तान को बचाना है तो नरेन्द्र मोदी को आगे आना ही पड़ेगा… नहीं तो ""अब पछतावे होवत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत "" ..!!!

  21. April 1, 2011 at 4:04 pm

    >एक बात बताओ सौरभ कालिया के मां-बाप के जख्म किस "अमन की आशा" से भरेंगे. ऐसा न हो कि लोग देश के लिये कुर्बान होना छोड़ दें, शुभचिन्तक जी …

  22. April 1, 2011 at 4:41 pm

    >आदरणीय सुरेश जी, उन्मादी जश्न में कहीं देश के गद्दारों को पहचानना न भुला बैठें, इस दृष्टि से एक अच्छा जागृति सन्देश है यह लेख. जिन भावों को आपने स्वर और शब्द दे दिये वे हमारे अतीत के जख्मों की कराह ही है. भ्रष्ट सरकारी तंत्र के मंसूबों को पहचानने की आँखें मिल चुकी हैं देश के अधिकांश लोगों को… बस, उन्हें जागृति संदेशों की ऎसी ही खुराक देने की ज़रुरत है. यहाँ गंभीर से गंभीर मुद्दे ठंडे बस्ते में जाते देर नहीं लगाते. जानता हूँ कि आप जख्म को हरा किसलिये रखे हैं.. केवल इसलिये ना … कि जब तक गुनाहगारों को सही मुकाम हासिल न हो जाये तब तक चैन नहीं लेना.

  23. April 1, 2011 at 9:11 pm

    >एक गाल पे चाटा पड़ने पर दूसरा गाल आगे करने वाले ये गांधीवादी कांग्रेसियो से हम और कोई उम्मीद नही कर सकते है.आक्रामकता और आत्मसम्मान नाम का शब्द इनके शब्दकोश मे है ही नही.

  24. abhishek said,

    April 1, 2011 at 9:49 pm

    >ek kavita thi hariom panvar ki usame ek line hai "hame apane khattte mithe bol badalana ata hai hame ab bhi duniya ka bhugol badalana ata hai"bujdil lo hi bhugol bhugol rote hai……………..jinki bhujao me dam hota hai vo apana bhugol khud banate hai…………bharat ki bhujao me dam nahi raha hai tab hi ham bhugol ka rona rona liye baithe hai……..

  25. April 1, 2011 at 11:50 pm

    >माननीय सुरेश जी बहुत दिनो बाद आपके ब्ळॉग पर आना हुआ मेरा, अतः इस मध्य अनेक महत्वपूर्ण खबरें समय पर नही देख पाया। आपके मुम्बई प्रवास मे आपसे मिलने का सुअवसर भी खो दिया, काश मैने आपके ब्लॉग लगातार पढे होते। आनन्द शर्मा जी क्या आप भी मुम्बई मे ही रहते हैं?रही बात इस देश के आम आदमी की असली औकात की तो आपकी बात बहुत हद तक सही है कि आम आदमी बहुत जल्दी ही अपने उत्साह को खो कर नून तेल लकडी के चक्कर मे पड जाता है पर आप उसकी मज़बूरियों को समझें, वैसे भी आम आदमी आप जैसा बुद्धिजीवी नही है, अतः उसको बार बार कोंचना पड़ता है जो काम आप बखूबी कर रहे हैं। प्रतुल जी ने एकदम सही कहा है – आप इन जख्मों को हरा रख कर एक बहुत ही बड़ा कार्य कर रहे हैं, निश्चित ही यह एक दिन फलदायी सिद्ध होगा।रही बात अमन की आशा" वालों की तो वो तो देश को बेचने के लिए ही बैठे हैं, आटो वाले से एक रुपये के लिए झगड लेंगे पर देश का एक बडा हिस्सा अगर इन्हे दुश्मन देश को देना पड़े तो आराम से उसे देकर यह बड़प्पन का दिखावा करेंगें, जैसे देश इनके बाप की ज़ागीर है।आशीष श्रीवास्तव, रोहित, एम सिंह – सही कहा हम पडोसी नही बदल सकते, पर क्या हमारे पडोसी को यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि वो अपना पडोसी बदल सकता है? वो क्यों हमारे साथ ऐसा बर्ताव कर रहा है कभी समझने का प्रयास किया है? और वैसे भी पडोसी को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देना क्या कोइ संवैधानिक मज़बूरी है, और अगर है तो यह मज़बूरी porkistan के साथ क्यों नही है? आशीष तुमने सही बात पकड़ी – आज बांग्लादेश भी हमारा एहसान नही मानता है, पर इसका क्या अर्थ निकलता है समझने मे चूक गए, इसको समझने के लिए एक पुरानी कहावत ठीक रहेगी – गरीब की लुगाई, गांव की भौजाई। जब तक हम गरीब मज़बूर की भांति व्यवहार करते रहेंगे, हमारे साथ यही होगा, और अगर हमने अपना कठोर रूप ठीक से दिखाया पडोसियों को तो जिस प्रकार इज़रायल से उसके पडोसी डरते हैं (भले ही नफरत करते हों पर हमला नही करते) वैसे ही हमसे भी सब डरेंगे।एम सिंह porkistaan कुछ लोगो की वजह से नही अहिकतम लोगो की वजह से बदनाम है, अगर मुझे तुलना करनी हो तो मैं इसकी तुलना स्वर्णनगरी लंका से करूंगा जहां त्रिजटा या विभीषण तो उंगलियों पर गिने जाने लायक थे पर राक्षस बहुतेरे, अगर आप सहमत नहीं हैं तो कृपया मुझे समझाएं कि तासीर (पंजाब का राज्यपाल) और शाहबाज़ भट्टी (अल्पसंख्यक मंत्री) के हत्यारों के समर्थन मे जो विशाल जनसमुदाय जूलूस निकाल रहा था, उसकी विवेचना मैं कैसे करूं?सुरेश जी के स्वघोषित शुभचिंतक – सुरेश जी को तो -porkistan पैसा क्यों देगा उसकी मां बहन करने के लिए, पर हां जिस प्रकार तुम्हे कष्ट हुआ, प्रतीत होता है कि तुम ज़रूर porkistan से आर्थिक लाभ पाते हो। और अगर सुरेश जी हमेशा porkistan का बलात्कार करते हैं तो तुम्हे कष्ट क्यों होता है? तुम्हारा अर्थशास्त्र का ज्ञान तो ज़ोरदार है, लिखते हो "121 में से 120 करोड़ लोग गरीब-मध्यम वर्ग के हैं" यह आंकडे क्या porkistaan से लेकर आए हो? और porkistan से नफरत ही है जो हमे यह सब करने की प्रेरणा दे रहा है, न कि तुम्हारी तरह हमे porkistaan से प्यार जो कि इन बातों से दिल ज़ले।

  26. April 2, 2011 at 3:54 am

    >देशभक्ति की जो भावना भारत-पाक मैच के समय देखने को मिली , ईश्वर करे हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की ऐशी भावना चिर स्थायी बनी रहे.

  27. April 2, 2011 at 7:02 am

    >Suresh Ji Ke Shubhchintak Ji. Agar Apme Aukat Hia To Apne Bare Me Jankari Den. Log Asha Karte Hain Ki Bhagat Singh Unke Ghar Me Janm Na Lekar Dusre Ke Yahan Janm Le. Desh Ke Bare Me Karne Ya Sochne Ke Liye PM Banna Jaruri Nahi. Apke Negative Likhne Se Surejh Ji Ka Kuch Nahi Ukhrega. Suresh Ji Ne Kam se kam itna to Kar Diya Ki Apko Bhi Key Board Par La diya.Parosh Men Agar Kachnra Ho To Use Jalakar Khatm KAr Dena Chayie, Nahi To Sure Gandh Deta HAi bad Me Bimari KA Kran Ban Jata Hai. Shubhchintak Ji Main Pakistan Se Nafrat Karta Hun. Apse Jyada Mere Muslim Dost Hian. Shubhchintak Ji Apke Pas Kuch Upay Hai To Mere Mail Pa Bheje :- prabhatkumarrajan@yahoo.co.in

  28. सुलभ said,

    April 2, 2011 at 12:05 pm

    >Chaliye, hamlog apna kaam karte rahen.Aur kya kahun, filhaal.

  29. Anonymous said,

    April 2, 2011 at 1:35 pm

    >इस हरामी का मुंह बंद कीजिये सुरेश जी …http://swachchhsandesh.blogspot.com/2011/04/suresh-chiplinkar.htmlइस कमीन को पाकिस्तान के हारने का बड़ा गम है . कल तक साला हिंदुस्तान को सलाम का लेख http://swachchhsandesh.blogspot.com/2011/04/suresh-chiplinkar.html लिख रहा था और आज हिंदुस्तान के जितने की खुशी में दों लाइन नहीं लिख पा रहा और तो और फोटो भी तो देखो इसने अपने बाप जिन्ना का लगाया. ये सलीम सूअर के सड़े हुए गोश्त में से निकला हुआ कीड़ा है.ये साला PORKISTANI पिट्ठु हैं.

  30. Amna said,

    April 2, 2011 at 2:37 pm

    >Ek Muslim Mahila Burka Pahne Ja Rahi Thi. Hindu Ne Pucha Bahan Burka Kyon Pahni Ho. Mahila Ne Jawab Diya. Kya Karun Jisko 20 Sal Tak Bhaia-Bhaya Kaha. Use Ab Saina-Saina (Husband) Kahna Parta Hai. Isliye Laj Ke Mare Main Burka Pahnti Hun.

  31. April 3, 2011 at 6:40 am

    >Anonymous भाई, सलीम को ज़वाब दे दिया गया, और इन छोटी बातों के लिए सुरेश जी को तंग न करें, मेरे ब्लॉग पर बोलें सुरेश जी बड़े उद्देश्य के लिए हैं।

  32. Anonymous said,

    April 3, 2011 at 7:23 am

    >आ.सुरेश जी.आपने सु.. सलीम को जो मुह तोड़ जवाब दिया है उसके लिए ह्रदय से आभारी हूँ .

  33. Amna said,

    April 3, 2011 at 4:23 pm

    >Kuchh Sal Pahle JAb Amerika Me Bhayanak Toofan Aya Tha tab Ek Muslim Dharmik Neta Ne BAyan Diya Tha ki Khuda Ne Amerika Kisabak Sikhaya. Tin Din BAd Hi Bharat Ke KAsmir Aur PAkistan Ke KAi Ilankon Men JAbardast Bhukamp Aya tha. LAkho Log MAre GAye The. Salim Ji Soch Samajh Ka r Bole Kahin Bhi Kuchh Bhi Ho Sakta HAi. Allah = 786 Ka Jod 7+8+6=21 Ka mul 3 Hai. Matlab Brahma, Vishnu, Mahesh.

  34. Rajesh said,

    April 4, 2011 at 9:46 am

    >Excellent Suresh Ji. Bahut Hi Gajab ka Lekh likha hai. Yahi hai is desh ke nagrik ki deshbhakti jo jhag ke tarah bahut hi jaldi phurrr ho jati hai. bahaut bahaut dhanaywad

  35. April 4, 2011 at 10:51 am

    >आदरणीय सुरेश जी, अभी तक जो हुआ मान लेते हैं की अच्छा हुआ लेकिन २ अप्रैल की रात के बाद जो हो रहा है उस से वाकई में इतना कष्ट हुआ जितना कभी पहले महसूस नहीं किया! किसी भी टूटे पूंजे चेनल को लगा कर देख लीजिये वोही वर्ल्ड कप – वर्ल्ड कप चिल्ला रहा है कल रात को मैं डीडी न्यूज़ देख रहा था और ये देख कर हैरान था की रात लगभग ८:३० से १०:३० तक दो घंटे में उन्होंने ने मुश्किल से १० से १५ मिनट दूसरी ख़बरों पर ध्यान दिया! बार बार हमारी माननीय राष्ट्रपति जी के दृश्य क्रिकेटर के साथ दिखा रहे थे! ये बात मन में बार बार उठ रही थी की देश की सीमा पर खड़ा सैनिक इस वक़्त किन भावनाओं के दौर से गुजर रहा होगा? क्या एक नवयुवा सेना में भर्ती होने के बारे में सोचेगा या किसी क्रिकेट अकादमी का रास्ता नापेगा? राष्ट्रपति जी के पास क्रिकेट देखने का और क्रिकेटर के साथ चाय पीने के लिए वक्त है लेकिन अपने सैनिकों की होंसला अफजाही का वक्त नहीं है! और हाँ उनके पास अफजल गुरु की फांसी के लिए तो बिलकुल भी वक्त नहीं है (अगले राष्ट्रपति खुद देख लेंगे शायद, ये उनका मानना है) जिस मंत्री को जो मन में आ रहा है वोही घोषणा किये जा रहा है इनाम देना बुरी बात नहीं है लेकिन रजे हुए बन्दों को इतने भारी भरकम उपहार देना कहाँ तक उचित है! शहीदों को दिए जाने वाली राशि तो ये नेता लोग सही तरीके से दे नहीं पाते और इसी कारण से शहीद उन्नीकृष्ण जैसे हजारों शूरवीरों के परिवार वालों को दर दर की ठोकरें खाने पर मजबूर होना पड़ता है क्या ये सब चीजें विद्रोह पैदा नहीं कर रही या करेंगी? क्या कल को कोई सेना में जाने पर गौरव का अनुभव करेगा?

  36. Anonymous said,

    April 4, 2011 at 11:46 am

    >BHARAT MATA KI JAI>>>>>PAkistan beta tha beta hai aur beta hi rahega…..jo oleta hai padosi…..uski maa ka bho…..

  37. April 4, 2011 at 12:24 pm

    >suresh ji hindu navvarsh or navratre ki hardik shubhkamnayen aapki kalam yun hi dunia ko roshan kare aapke blog ki charcha panchjany patrika mein dekhi man bahut harshit hua .

  38. April 4, 2011 at 2:15 pm

    >लेख ज़रा देर से पढ़ पाया ……… मनमोहन ,सोनिया और युवराज शाहब (राहुल ) की सरकार ने एक क्रिकेट नाम की तीर से कई शिकार किया ………क्रिकेट के नाम पे मिडिया भी सठिया गई है ! इसके अलावा और किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा है ! कांग्रेस की सरकार को कुछ दिन की राहत मिल गई ……अभी कुछ दिन तक भ्रस्टाचार के मामलों से सबका ध्यान हटेगा …ताकि और किस किस तरीके से भ्रस्टाचार कर के स्विस बैंक में पैसा रखा जा सके ……….दूसरा बात ….. मैच में लोगो के बिच जा कर लोगो को मुर्ख बना लेंगे ताकि लोगो को ये पता लगे की हम देश के बारे में हम कितना भला सोच रहे है ….हम कितने देश भक्त है ..ये कमीने नेता हर ज़गह राजनीतिक फ़ायदा उठाने में लगे रहते है ! …….भारत ने ये मैच जित लिया चलो इसी बहाने …..हम लोगो ने अपने पैसों से खरीदी बम तो फोड़ी ………वरना ये सरकार तो हमारे पैसों से खरीदी बम हमारे ऊपर ही फोड़ रही है …..कभी महंगाई की बम तो कभी भ्रस्टाचार का बम …और न जाने क्या क्या …………और ये पाकिस्तानी भी कम नहीं है कमबख्त हमरा खाना खा कर गए और हमे ही आँख दिखा रहे है ..और अफरीदी शहब ने ये बयान पाकिस्तानी मिडिया को दिया की हिन्दुस्तान के लोग दिलदार नहीं होते …….इनसे अच्छे तो पाकिस्तानी लोग है ……हिन्दुस्तान से दोस्ती की बात करना बेकार है ……..(एक तरह से बात भी सही कही …..अरे …..हिदुस्तान के कमीने नेताओं अब तो सुधर जाओ ) अब क्या कहे अफरीदी साहब को लगता है हार का सदमा बर्दास्त नहीं हुआ होगा या फिर घर सही सलामत पहुच जाये इसलिए एसा बयान दिया होगा खैर …………खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे .जय हिंद

  39. April 4, 2011 at 3:28 pm

    >हम भी कभी युवराज की चालों पे मर गएकभी हम सब धोनी के बालों पे मर गएभगत सिंह कहते होंगे अरे राजगुरु , सुखदेवहम भी थे कभी इस देश के इंसानों के लिए मर गए ………..

  40. SANJEEV RANA said,

    April 5, 2011 at 3:52 am

    >देशभक्ति का यह प्रदर्शन, खुशियाँ, नारेबाजियाँ इत्यादि सब कुछ, सब कुछ माफ़ किया जा सकता है, बशर्ते यह भावना “पेशाब के झाग” की तरह तात्कालिक ना हो, कि ‘बुलबुले की तरह उठा और फ़ुस्स करके बैठ गया”।bahut khoob bhai ji


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