>रूठ के तुम तो चल दिये: राग हेमन्त में एक खूबसूरत गीत

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आईये आज आपको एक बहुत ही खूबसूरत गीत सुनवाते हैं, इस गीत को अनिलदा ने राग हेमन्त में ढ़ाला है, ताल है दादरा। लताजी जब इस गीत के पहले और दूसरे पैरा की पहली पंक्‍तिया गाती है तब वे लाईनें मन को छू सी जाती है।

आप ध्यान दीजिये इन दो लाईनों पर… हाल ना पूछ चारागर और रो दिया आसमान भी … को। कमर ज़लालाबादी के सुन्दर गीत और अनिल दा के संगीत निर्देशन के साथ लता जी ने किस खूबसूरती से न्याय किया है; गीत 1955 में बनी फिल्म जलती निशानी का है।

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http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=7949480-977

रूठ के तुम तो चल दिए, अब मैं दुआ तो क्या करूँ
जिसने हमें जुदा किया, ऐसे ख़ुदा को क्या करूँ
जीने की आरज़ू नहीं, हाल न पूछ चारागर
दर्द ही बन गया दवा, अब मैं दवा तो क्या करूँ
सुनके मेरी सदा-ए-ग़म, रो दिया आसमान भी-२
तुम तक न जो पहुँच सके, ऐसी सदा को क्या करूँ

http://www.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/note_player.swf
rooth ke tum to ch…

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>गरीबों का हिस्सा गरीबों को दे दो- लताजी का एक और अद्‍भुद गीत

>बहुत दिनों बाद आज लता जी और अनिल बिस्‍वास की जुगलबंदी में एक और दुर्लभ गीत, प्रस्तुत है। पता नहीं इतने मधुर गीत छुपे कैसे रह जाते हैं?
फिल्म: लाडली १९४९
संगीतकार: अनिल बिस्‍वास
गीतकार: सफ़दर’आह’ या प्रेम धवन संशय है। गीत की शैली को देखते हुए प्रेम धवन ही सही लगते हैं।

http://sagarnahar.googlepages.com/player.swf
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गरीबों का हिस्सा गरीबों को दे दो
गरीबों को दे दो – २
गरीबों का…
अमीरोंऽऽऽऽऽऽऽ
अमीरों हमें सूखी रोटी ही दे दो -२
गरीबों का हिस्सा…

जो पहले थी वही है हालत हमारी
थे पहले भी भूखे, है अब भी भिखारी
हमें सांसे है हाथ फैले हुए दो
गरीबों का हिस्सा…

ये ऊंची इमारत, ये रेशम के कपड़े
ना कुटिया ही हमको, ना खादी के टुकड़े
हमें भी तो अपना बदन ढ़ांकने दो-२
गरीबों का हिस्सा…

अगर रूखी सूखी ये खाकर बचेंगे
तो कल को ये गांधी जवाहिर बनेंगे
इन्हें सिर्फ जीने का मौका ही दे दो
गरीबों का हिस्सा…

http://hindi-films-songs.com से साभार

>अनिल दा की पुण्य तिथी पर उन्ही की आवाज में गाया हुआ एक गीत

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आज अनिल दा ( अनिल बिश्वास) को गये पाँच बरस पूरे हो गये। आपने हिन्दी फिल्मों  के गीत संगीत के लिये जो कुछ किया वह अविस्मरणीय है। आज अनिल दा  पुण्य तिथी पर मैं अपने पाठकों को आपका ही गाया हुआ आरजू फिल्म का गीत सुनवाकर आपको श्रद्धान्जलि अर्पित करता हूँ…

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अनिल दा की पुण्य तिथी पर उन्ही की आवाज में गाया हुआ एक गीत

 

आज अनिल दा ( अनिल बिश्वास) को गये पाँच बरस पूरे हो गये। आपने हिन्दी फिल्मों  के गीत संगीत के लिये जो कुछ किया वह अविस्मरणीय है। आज अनिल दा  पुण्य तिथी पर मैं अपने पाठकों को आपका ही गाया हुआ आरजू फिल्म का गीत सुनवाकर आपको श्रद्धान्जलि अर्पित करता हूँ…

>मिला दिल, मिल के टूटा जा रहा है

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स्व. अनिल दा संगीत का भी कमाल होता है कुछ गीत तो (बकौल यूनुस भाई) इतने संक्रामक है कि एक बार सुनना शुरु करने के बाद दस बीस बार सुनने पर भी चैन नहीं आता। लीजिये आज प्रस्तुत है लता जी की आवाज में एक ऐसा ही मधुर गीत, मिला कर टूटा जा रहा है। यह गीत सुनने के बाद हम अन्जाने में यह गीत गुनगुनाते रहते हैं, और हमें पता ही नहीं होता।

यह गीत फिल्म फ़रेब 1953 का है , इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं किशोर कुमार और शकुन्तला। गीतकार हैं मजरूह सुल्तानपुरी। फ़रेब फिल्म का; किशोर कुमार और लताजी का गाया हुआ एक गीत आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम….आप पहले सुन चुके हैं, और यह गीत भी आपको बहुत पसन्द आया था।

http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://mahaphil.lifelogger.com/media/audio0/737304_inugcweqlq_conv.flv&autoStart=false

मिला दिल मिलके टूटा जा रहा है
नसीबा बन के फूटा जा रहा है..
नसीबा बन के फूटा जा रहा है
दवा-ए-दर्द-ए-दिल मिलनी थी जिससे
वही अब हम से रूठा जा रहा है
अँधेरा हर तरफ़, तूफ़ान भारी
और उनका हाथ छूटा जा रहा है
दुहाई अहल-ए-मंज़िल की, दुहाई
मुसाफ़िर कोई लुटा जा रहा है

मिला दिल, मिल के टूटा जा रहा है

स्व. अनिल दा संगीत का भी कमाल होता है कुछ गीत तो (बकौल यूनुस भाई) इतने संक्रामक है कि एक बार सुनना शुरु करने के बाद दस बीस बार सुनने पर भी चैन नहीं आता। लीजिये आज प्रस्तुत है लता जी की आवाज में एक ऐसा ही मधुर गीत, मिला कर टूटा जा रहा है। यह गीत सुनने के बाद हम अन्जाने में यह गीत गुनगुनाते रहते हैं, और हमें पता ही नहीं होता।

यह गीत फिल्म फ़रेब 1953 का है , इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं किशोर कुमार और शकुन्तला। गीतकार हैं मजरूह सुल्तानपुरी। फ़रेब फिल्म का; किशोर कुमार और लताजी का गाया हुआ एक गीत आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम….आप पहले सुन चुके हैं, और यह गीत भी आपको बहुत पसन्द आया था।

मिला दिल मिलके टूटा जा रहा है
नसीबा बन के फूटा जा रहा है..
नसीबा बन के फूटा जा रहा है
दवा-ए-दर्द-ए-दिल मिलनी थी जिससे
वही अब हम से रूठा जा रहा है
अँधेरा हर तरफ़, तूफ़ान भारी
और उनका हाथ छूटा जा रहा है
दुहाई अहल-ए-मंज़िल की, दुहाई
मुसाफ़िर कोई लुटा जा रहा है

>ऋतु आये ऋतु जाये सखी री… चार रागों में ढ़ला एक शास्त्रीय गीत

>

मिर्जा गालिब की गज़ल मित्रों को बहुत पसंद आई और साइडबार के सी बॉक्स में एक मित्र प्रहलाद यादव ने आग्रह किया कि आप कुछ शास्त्रीय रचनायें भी हमें सुनायें। खुद मेरी भी कई दिनों से इच्छा हो रही थी कि कोई शास्त्रीय रचना महफिल पर सुनाऊं।

शास्त्रीय रचनायें इतनी सारी है कि उनमें से एक अनमोल को चुनना बड़ा मुश्किल है। परन्तु बड़ी मेहनत के बाद मैने एक गीत आपके लिये पसंद किया है जो लगभग बहुत दुर्लभ सा है। एक जमाने का यह बहुत प्रसिद्ध गीत अब कहीं भी सुनने को नहीं मिलता।

प्रेम धवन के लिखे और फिल्म हमदर्द (1953 ) के इस गीत की सबसे बड़ी खासियत है कि अनिल बिश्वास ने इस गीत को शास्त्रीय संगीत के चार रागों में ढ़ाला है। ये चार राग क्रमश: राग गौड़ सारंग, राग गौड़ मल्हार, जोगिया और बहार है।

यह चारों राग चार अलग -अलग ऋतुओं पर आधारित है, जैसे गर्मी (जेठ महीने) के लिये राग गौड़ सारंग, वर्षा/ बरखा के लिये गौड़ मल्हार, पत्तझड़ के लिये जोगिया और इसी तरह बंसत बहार ऋतु के लिये राग बहार।

लता जी के एक साक्षात्कार में एक बार सुना था कि अनिल दा ने इस गीत के लिये मन्नाडे और लता जी को लगातार १४ दिनों तक रियाज करवाया! परिणाम हम देख सकते हैं। इस जोड़ी ने ने एक अमर कृति की रचना करदी। यह गीत उस जमाने में बहुत ही लोकप्रिय हुआ। अब आपको ज्यादा बोर नहीं करना चाहूंगा बस आप इस बहुत ही सुंदर गीत को सुनिये। मेरा विश्वास है शास्त्रीय संगीत के प्रशंषक इस गीत को सुन कर झूम उठेंगे।

लेख लिखते समय जल्दबाजी में एक दो बातें कहनी रह गई थी और एक बात जो पता नहीं थी वह संजय भाई पटेल ने बताई और मैं यहाँ उन्हीं के शब्दों को पेस्ट कर रहा हूँ –

संजय पटेल: आई ऋतु में लता-मन्ना दा के साथ एक और गायक है…सारंगी जिसे बजाया है पं.रामनारायणजी ने देखिये तो किस कमाल के साथ तार स्वर बन गए हैं।

और दूसरी बात जो मुझसे लिखनी रह गई वह नीचे संजय भाई की टिप्पणी में है।

इस गीत का वीडियो देखिये। शेखर और श्यामा निम्मी गा रहे हैं और गीत में शायद नलिनी जयवंत यशोधरा कात्जु दिख रहे हैं। श्यामा निम्मी ने अपनी खूबसूरत आँखों से कितना सुंदर अभिनय कर गीत में जान डाल दी है।

राग गौड़ सारंग
ऋतु आए ऋतु जाए सखी री
मन के मीत न आए
जेठ महीना जिया घबराए
पल पल सूरज आग लगाए
दूजे बिरहा अगन लगाए
करूँ मैं कौन उपाय
ऋतु आए ऋतु जाए सखी री

राग गौड़ मल्हार
बरखा ऋतु बैरी हमार
जैसे सास ननदिया
पी दरसन को जियरा तरसे
अँखियन से नित सावन बरसे
रोवत है कजरा नैनन का
बिंदिया करे पुकार
बरखा ऋतु बैरी हमार

राग जोगिया
पी बिन सूना जी
पतझड़ जैसा जीवन मेरा
मन बिन तन ज्यूँ जल बिन नदिया
ज्यों मैं सूनी बिना साँवरिया
औरों की तो रैन अँधेरी
पर है मेरा दिन भी अँधेरा
पी बिन सूना जी

बहार
आई मधुर ऋतु बसंत बहार री
फूल फूल पर भ्रमर गूँजत
सखी आए नहीं भँवर हमार री
आई मधुर ऋतु बसंत बहार री
कब लग नैनन द्वार सजाऊँ
दीप जलाऊँ दीप बुझाऊँ
कब लग करूँ सिंगार रे
आई मधुर ऋतु बसंत बहार री
आई मधुर ऋतु बसंत बहार री, बहार री, बहार री

ऋतु आये ऋतु जाये सखी री… चार रागों में ढ़ला एक शास्त्रीय गीत

मिर्जा गालिब की गज़ल मित्रों को बहुत पसंद आई और साइडबार के सी बॉक्स में एक मित्र प्रहलाद यादव ने आग्रह किया कि आप कुछ शास्त्रीय रचनायें भी हमें सुनायें। खुद मेरी भी कई दिनों से इच्छा हो रही थी कि कोई शास्त्रीय रचना महफिल पर सुनाऊं।

शास्त्रीय रचनायें इतनी सारी है कि उनमें से एक अनमोल को चुनना बड़ा मुश्किल है। परन्तु बड़ी मेहनत के बाद मैने एक गीत आपके लिये पसंद किया है जो लगभग बहुत दुर्लभ सा है। एक जमाने का यह बहुत प्रसिद्ध गीत अब कहीं भी सुनने को नहीं मिलता।

प्रेम धवन के लिखे और फिल्म हमदर्द (1953 ) के इस गीत की सबसे बड़ी खासियत है कि अनिल बिश्वास ने इस गीत को शास्त्रीय संगीत के चार रागों में ढ़ाला है। ये चार राग क्रमश: राग गौड़ सारंग, राग गौड़ मल्हार, जोगिया और बहार है।

यह चारों राग चार अलग -अलग ऋतुओं पर आधारित है, जैसे गर्मी (जेठ महीने) के लिये राग गौड़ सारंग, वर्षा/ बरखा के लिये गौड़ मल्हार, पत्तझड़ के लिये जोगिया और इसी तरह बंसत बहार ऋतु के लिये राग बहार।

लता जी के एक साक्षात्कार में एक बार सुना था कि अनिल दा ने इस गीत के लिये मन्नाडे और लता जी को लगातार १४ दिनों तक रियाज करवाया! परिणाम हम देख सकते हैं। इस जोड़ी ने ने एक अमर कृति की रचना करदी। यह गीत उस जमाने में बहुत ही लोकप्रिय हुआ। अब आपको ज्यादा बोर नहीं करना चाहूंगा बस आप इस बहुत ही सुंदर गीत को सुनिये। मेरा विश्वास है शास्त्रीय संगीत के प्रशंषक इस गीत को सुन कर झूम उठेंगे।

लेख लिखते समय जल्दबाजी में एक दो बातें कहनी रह गई थी और एक बात जो पता नहीं थी वह संजय भाई पटेल ने बताई और मैं यहाँ उन्हीं के शब्दों को पेस्ट कर रहा हूँ –

संजय पटेल: आई ऋतु में लता-मन्ना दा के साथ एक और गायक है…सारंगी जिसे बजाया है पं.रामनारायणजी ने देखिये तो किस कमाल के साथ तार स्वर बन गए हैं।

और दूसरी बात जो मुझसे लिखनी रह गई वह नीचे संजय भाई की टिप्पणी में है।

इस गीत का वीडियो देखिये। शेखर और श्यामा निम्मी गा रहे हैं और गीत में शायद नलिनी जयवंत यशोधरा कात्जु दिख रहे हैं। श्यामा निम्मी ने अपनी खूबसूरत आँखों से कितना सुंदर अभिनय कर गीत में जान डाल दी है।

राग गौड़ सारंग
ऋतु आए ऋतु जाए सखी री
मन के मीत न आए
जेठ महीना जिया घबराए
पल पल सूरज आग लगाए
दूजे बिरहा अगन लगाए
करूँ मैं कौन उपाय
ऋतु आए ऋतु जाए सखी री

राग गौड़ मल्हार
बरखा ऋतु बैरी हमार
जैसे सास ननदिया
पी दरसन को जियरा तरसे
अँखियन से नित सावन बरसे
रोवत है कजरा नैनन का
बिंदिया करे पुकार
बरखा ऋतु बैरी हमार

राग जोगिया
पी बिन सूना जी
पतझड़ जैसा जीवन मेरा
मन बिन तन ज्यूँ जल बिन नदिया
ज्यों मैं सूनी बिना साँवरिया
औरों की तो रैन अँधेरी
पर है मेरा दिन भी अँधेरा
पी बिन सूना जी

बहार
आई मधुर ऋतु बसंत बहार री
फूल फूल पर भ्रमर गूँजत
सखी आए नहीं भँवर हमार री
आई मधुर ऋतु बसंत बहार री
कब लग नैनन द्वार सजाऊँ
दीप जलाऊँ दीप बुझाऊँ
कब लग करूँ सिंगार रे
आई मधुर ऋतु बसंत बहार री
आई मधुर ऋतु बसंत बहार री, बहार री, बहार री

आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम

किशोर कुमार और लता जी का गाये सबसे मधुर गीतों में से एक!

आज मैं आपको मेरे सबसे पसंदीदा गीतों में से एक सुनवा रहा हूँ। यह गाना है आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम. यह गीत फिल्म फरेब (1953) का है और फिल्म के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी और संगीतकार मेरे सबसे पसंदीदा संगीतकारों में से एक अनिल बिश्‍वास हैं। फिल्म के निर्देशक है शाहिद लतीफ और इस फिल्म की लेखिका है इस्मत आपा यानि इस्मत चुगताई।

इस गाने में किशोर दा का साथ दिया है लता जी ने।

किशोर कुमार:
आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम
इस ज़मीं से अलग, आसमानों से दूर
मुहब्ब्त की बस्ती

लता जी
मैं हूं धरती तू आकाश है ओ सनम
देख धरती से आकाश है कितनी दूर
तू कहाँ-मैं कहाँ, है यही मुझको गम
देख धरती

किशोर कुमार:
दूर दूनिया से कोई नहीं है जहाँ
मिल रहे हैं वहां पर ज़मीं-आसमां
छुप के दुनिया से फिर क्यूं ना मिल जायें हम
इस ज़मीं से अलग आसमानों से दूर
लताजी:
तेरे दामन तलक हम तो क्या आयेंगे
यूं ही हाथों को फैला के रह जायेंगे
कोई अपना नहीं बेसहारे हैं हम
देख धरती से आकाश है कितनी दूर

>आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम

>

किशोर कुमार और लता जी का गाये सबसे मधुर गीतों में से एक!

आज मैं आपको मेरे सबसे पसंदीदा गीतों में से एक सुनवा रहा हूँ। यह गाना है आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम. यह गीत फिल्म फरेब (1953) का है और फिल्म के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी और संगीतकार मेरे सबसे पसंदीदा संगीतकारों में से एक अनिल बिश्‍वास हैं। फिल्म के निर्देशक है शाहिद लतीफ और इस फिल्म की लेखिका है इस्मत आपा यानि इस्मत चुगताई।

इस गाने में किशोर दा का साथ दिया है लता जी ने।

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किशोर कुमार:
आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम
इस ज़मीं से अलग, आसमानों से दूर
मुहब्ब्त की बस्ती

लता जी
मैं हूं धरती तू आकाश है ओ सनम
देख धरती से आकाश है कितनी दूर
तू कहाँ-मैं कहाँ, है यही मुझको गम
देख धरती

किशोर कुमार:
दूर दूनिया से कोई नहीं है जहाँ
मिल रहे हैं वहां पर ज़मीं-आसमां
छुप के दुनिया से फिर क्यूं ना मिल जायें हम
इस ज़मीं से अलग आसमानों से दूर
लताजी:
तेरे दामन तलक हम तो क्या आयेंगे
यूं ही हाथों को फैला के रह जायेंगे
कोई अपना नहीं बेसहारे हैं हम
देख धरती से आकाश है कितनी दूर

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