>साढ़े बारह बजे का किया इन्तेजार पर कसाब को फाँसी ना मिली

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आज सुबह से साढ़े बारह बजने का इन्तेजार कर रहा था . उत्सुकता और बेचैनी दिमाग पर काबिज थी . सुबह सात बजे उठ कर जामिया के लिए निकल गया . साढ़े नौ से साढ़े बारह तक परीक्षा थी और स्टार न्यूज़ के मुताबिक इसी समय तक भारत के सरकारी दामाद की सजा का ऐलान भी होना था . परीक्षा भवन में भी दिमाग का आधा हिस्सा इसी पर लगा हुआ था . जल्दी -जल्दी ऑटो से घर भागे . यहाँ आये तो पता चला कि साहब , कसाब को फाँसी देने में कई साल भी लग सकते हैं . अब हम जैसे कानून के अनपढ़ों को कौर्ट -कचहरी की भाषा भला कहाँ समझ आती है  ? लेकिन परेशानी यही नहीं है .  मामला तो तब बिगड़ता है जब कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका को हमारी ये बात समझ में नहीं आती ! क्यों , सही कहा ना ! अगर उनको ये बात समझ में आती तो अफजल गुरु अभी तक तिहाड़ में हमारे पैसों की रोटी नहीं तोड़ रहा होता . कसाब के लिए करोड़ों नहीं उडाये जाते वो भी उस देश में जहाँ लोग भूख से जान देते हो . पता नहीं इस देश का सिस्टम (कार्यपालिका , व्यवस्थापिका और न्यायपालिका) आखिर कौन सी मिसाल कायम करना चाहता है  ? अरे , मिसाल तो अमेरिका ने कायम किया बिलकुल लोकतान्त्रिक तरीके से सद्दाम को कम से कम समय में फाँसी लगवा कर .  लेकिन नहीं यह तो भारतवर्ष है … जहाँ हत्या करने पर दस और हत्या का लाइसेंस देती है ये सरकार !

>२६/११ की गौरवपूर्ण घटना और चूतिया नंद की कथा

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कल २६/११ की बरसी को भारतवर्ष के चुनिन्दा शहरों में चुनिन्दा टीवी चैनलों और टेलीकोम कंपनियों के माध्यम से सवेदनशील जुझारू देशभक्तों ने , जो राष्ट्र की रक्षा के लिए कर्मठता पूर्वक मोमबत्ती और मोबाइल थामे खड़े रहे , बड़े हीं धूमधाम और हर्षौल्लास के संग मनाया ! असीम गौरव के इस राष्ट्रीय गर्व के पर्व को हर साल मनाया जाएगा ऐसी उम्मीद करता हूँ ! २६/११ की गौरवपूर्ण घटना के दौरान प्रशांत प्रियदर्शी द्वारा लिखे गये एक पोस्ट को आप दुबारा पढ़िए जो नीचे पुनः पोस्ट कर रहा हूँ ………….

अथ चूतिया नंद कथा

ये कथा है एक ऐसे महानुभाव कि जिन्होंने एक ऐसे शहीद और कर्तव्यनिष्ठ जवान पर अंगुली उठाई है जिसका कर्जदार यह समूचा देश सदियों तक रहेगा.. मैं हमारे पूर्वजों को धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने चूतिया कह कर किसी प्राणी को पुकारा नहीं, नहीं तो यह उस जीव के अधिकारों का हनन होता.. कुत्ते अपने आप में वफादार होते हैं और सूअर भी गंदगी साफ करने में सहायता ही करते हैं.. इन्हें यह नाम देकर मैं इन जानवरों को गालियां नहीं देना चाहता हूं..

वैसे इस श्रेणी में कुछ पत्रकार नाम के ह्रिंस पशु भी हैं जो अभी भी लाल सलाम को सलामी देकर इसे प्रमुखता ना देकर इधर-उधर कि ज्यादा खबरें देकर अपना टीआरपी बटोरना चाह रहे हैं.. कारण साफ है, आखिर संत चुतिया नंद भी लाल सलामी देने वालों के अगुवा जो ठहरे.. ये तथाकथित बुद्धीजीवियों का बस चले तो लगे हाथों पूरे भारत को चीन के हवाले करके सलामी पे सलामी देते रहें..

जहां तक स्वर्गीय मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की बात है तो वो जब जीते थे तब भी भारत कि एकता के मिशाल थे और शहीद होने के बाद उनकी कहानी बच्चे-बच्चे तक पहूंच गई.. कारण साफ है.. वो रहने वाले थे केरल के.. पदस्थापित थे बिहार के दानापुर में बिहार रेजिमेंट में.. आतंकियों से मुकाबला करने को उड़ान भरी दिल्ली से.. शहीद हुये मुंबई में.. और अंत्येष्टी हुआ कर्नाटक में.. अब इससे बड़ी और क्या मिशाल दिया जाये उनकी और भारतीय एकता की?

मैं सलाम करता हूं उस मुसलिम भाई को भी जो परदे के पीछे रह कर नरीमन हाऊस मामले में हमारे जांबाज कमांडो कि मदद अपने जान पर खेल कर दी.. जिसने पूरे नरीमन हाऊस का नक्सा बना कर हमारे कमांडो को दिया और पूरे 59 घंटे तक कमांडो कार्यवाही में कमांडो के साथ रहा.. कुछ इस तरह गुमनामी में रहकर उन्होंने यह काम किया कि मुझे उनका नाम भी याद नहीं आ रहा है.. भला हो अगर कोई मुझे उनका नाम याद दिला दे, आगे से नहीं भूलूंगा.. मैं सलाम करता हूं उन मुल्लाओं को भी जिन्होंने मारे गये आतंकवादियों को भारत में दफनाने के लिये जगह ना देने कि घोषणा भी कि..

इधर एक और लाशों के खिलाड़ी चुनाव सामने देखकर केरल कि गलती के लिये माफी मांग रहे हैं, पता जो है उन्हें कि चुनाव सामने ही है.. जिस जगह से माफीनामा आया है आखिर आज वहां चुनाव प्रचार का आखिरी दिन जो है..

अंत में – मेरा अपना यह मानना है कि जहां तर्क कि सीमा खत्म होती है वहां से गालियों कि सीमा शुरू होती है॥ और मैं यह स्वीकार करता हूं कि मेरी नजर में ऐसे खूंखार नमक हरामों और आतंकवादियों को बिना किसी तर्क और सबूतों के गोली से उड़ा देना चाहिये.. मगर यह भी जानता हूं कि ऐसा नहीं होने वाला है.. फिलहाल तो मेरी तर्क कि सीमा खत्म होती है और मुझे अपने द्वारा किये गये इस तरह कि गंदी भाषा प्रयोग पर कोई दुख नहीं है..

साभार : मेरी छोटी सी दुनिया

>२६/११ की बरसी पर ! ……कुछ भी कर लो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता !

>* आज तो टीवी वाले खूब मोमबत्तियां जलवा रहे हैं , २६/११ की बरसी पर ! मोमबत्ती की रौशनी से आतंकी घबरा जायेंगे जैसे ड्राकुला    उजाले से डर कर भाग जाता है !

*कोई कॉल करवा रहे है राष्ट्र के नाम ……. और ये पैसा देंगे भारतीय पुलिस को ! लगता है सरकारी फंड कम पड़ गया है !
*जगह-जगह पर गीत-संगीत के कार्यक्रम प्रस्तुत किये जा रहे हैं ! यह बताने के लिए कि कुछ भी कर लो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता !
 
अच्छा धंधा बना दिया है सम्वेदना के नाम पर ! आतकवाद से लड़ेंगे जंतर मंतर ,इंडिया गेट, गेटवे ऑफ़ इंडिया जैसे जगहों पर मोमबत्तियां जला कर ! २६/११ की दुखद और शर्मनाक घटना को राष्ट्रीय शोक के बजाय राष्ट्रीय पर्व बना दिया है जैसे कोई गर्व का विषय हो ! २०२० में संसार की महाशक्ति बनने का सपना देखने वाले देश में घुसकर चंद आतंकी तीन दिनों तक कहर मचाते हैं …… हमले को पहले से रोकने की बात दूर , भारत द्वारा अमेरिका से मदद मांगने की खबर आती है ………….अंततः सुरक्षा एजेंसियां काफी मशक्कत के बाद उस पर काबू पाती है ……. संपत्ति तबाह होती है ………. लोगों की जानें जाती है ……. सेना के जवान और पुलिस कर्मी शहीद हो जाते हैं …………… नेताओं की राजनीत शुरू हो जाती है …….. सरकारी प्रतिष्ठान एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं ……… एक मंत्री कहता है बड़े देशों में ऐसी छोटी बातें होती रहती है …………… जनता की संवेदनाओं को मोमबत्तियों के मोम में पिघला कर सरकार अपने कर्तव्यों से छुट्टी पाती है ………………………..आज उस राष्ट्रीय शर्म की बरसी पर नेता , मीडिया , टेलीकोम कम्पनियाँ सब के सब अपनी -अपनी रोटी शेक रहे हैं ……………. हम ख़ामोशी  से सब बर्दाश्त करने पर अमादा  है …………….. एक दिन मोमबत्ती जलाकर ,एक विशेष कंपनी के नंबर से  कॉल करके , फ़िल्मी सितारों के कार्यक्रम में शामिल होकर हम आतंकवाद  से लड़ाई लड़ रहे हैं …..क्योंकि हम सहिष्णु लोग है  ……. महात्मा गाँधी के देश से हैं ………..जहाँ एक गाल पर मारने से लोग दूसरा गाल बढा देते हैं …………. हम पर फ़िर हमला करो कोई गम नहीं …………. हम उत्सवधर्मी लोग हैं …………… एक और उत्सव बढ़ जायेगा ……………… डरने की बात नहीं है ……….. सांसद पर हमला हुआ ……….हमने कुछ किया नहीं न ……………….. सजाप्राप्त आरोपी अब भी जिन्दा है जिसे आज नहीं तो कल माफ़ी मिल जाएगी ………… २६/११ हुआ हमने कुछ किया ……नहीं ना ………. आरोपी कसब हमारे यहाँ जेल में मज़े कर रहा है ……………. आगे भी हमला होगा हम कुछ खास नहीं करेंगे …………… फ़िर मोमबत्तियां लेकर सडकों पर निकल जायेंगे शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने …………….. अरे जब भय-भूख -भ्रष्टाचार जैसे आतंरिक  मामलों में हम कुछ नहीं करते तो तुम क्यों चिंता करते हो ……………. दुबारा आना और इससे बड़ा आतंकी काण्ड  करना ……….फ़िर भी हमारी एडजस्टमेंट से  जीने की कला को नहीं छीन पाओगे , इस कला में हम भारतवासी महारथी है …………………….

>बस्तर से आई आवाज

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राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बस्तर

नक्सलवाद को एक ऑर्गेनाईज्ड क्राईम की तरह से ही देखा जाना चाहिये। आंतरिक आवाजे ऐसी नहीं होती जिसका दावा नक्सलवाद के समर्थक पत्रकार और प्रचारक बुद्दिजीवी करते हैं। बुनियाद में देखें तो आप बस्तर में “आन्दोलन” के नाम पर “मनमानी” करते सुकारू और बुदरू को नहीं पायेंगे “राव” और “सेन” को पायेंगे। यह एक एंक्रोचमेंट है “सेफ प्लेस” पर। बस्तर के आदिवासियों को माओवाद का पाठ पढाते ये लोग घातक हैं वहाँ कि संस्कृति और उनकी अपनी स्वाभाविक व्यवस्था के लिये। हालात नक्सलियों द्वारा आतंक फैला कर पैदा किये गये हैं जिन्हे आदिमं के हर घर से लडने के लिये एक आदिम जवान चाहिये होता है…उसकी मर्जी हो तब भी और नहीं हो तब भी।

नक्सली आतंकवादियों के मानवाधिकार पर केवल इतना ही कहूँगा कि उनके तो मानवाधिकार हैं लेकिन रोज बारूदी सुरंगों के विस्फोट में मारे जा रहे जवान और हजारों निरीह आदिम हैं उनके अधिकारों की बात करते समय हमारे माननीय पत्रकारों को क्या साँप सूंघता है? जो बस्तर का इतिहास जानते हैं उन्हे पता है कि यहाँ का आदिम दस से अधिक बार (भूमकाल) स्वत: अपने अधिकारों के लिये खडा हुआ और उसने न केवल अपने “राजतंत्र” बल्कि “अंग्रेजों” की भी ईंट से ईंट बजा कर अपने अधिकार हासिल किये। (हो सकता है यह सलवा जुडुम भी एसा ही एक आन्दोलन हो जो उनका “स्वत: स्फूर्त” हो क्योंकि इसके पैरोकार आन्ध्र या बंगाल के भगोडे अपराधी नहीं हैं कमसकम वहीं के आदिम और आदिवासी नेता हैं) उसे अपनी लडाई के लिये किसी माओवादी संगठन की बैसाखी नहीं चाहिये।

असल में चश्मा बदल कर देखने की आवश्यकता है। बैसाखी आदिमो को नहीं दी गयी है बस्तर तो बिल है जिसमे छुपे माओवादी अपनी कायरता को लफ्फाजी से छुपाते रहे हैं….यह जान लीजिये कि वीरप्पन भी जंगलों में हुआ, फूलन भी बीहडों में हुई और नक्सल भी जंगलों में मिलेंगे क्योंकि ये उनके सहज पनाहगाह हैं। माओवादियों को जनसमर्थन होता तो ये मैदानों में भी पाये जाते – सहज स्वीकार्य? वहाँ क्या तथाकथित शोषण नहीं समाजवाद है?

यह सच है कि माओवादी विचारों के जरिये ही चीन की सत्ता बची है और वह दुनिया का ताकतवर देश है लेकिन एसा देश जिसके भीतर मानवाधिकारों की क्या स्थिति है यह भी दुनिया जानती है (माफ कीजियेगा कुछ पत्रकार और कुछ बुद्धिजीवी नहीं जानते)। उसी चीन नें तिब्बत का जो लाल सलाम किया है उस पर तो किसी माओवाद समर्थक पत्रकार और बुद्धिजीवी को अब आपत्ति नहीं होगी? और नेपाल पर इतराने जैसी भी कोई बात नजर नहीं आती…

>चीन की चाल को समझ ले सरकार

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किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता और समृद्धि के स्थायित्व में उसके पड़ोसियों का अप्रत्यक्ष ही सही लेकिन महत्वपूर्ण योगदान होता है . क्योंकि पड़ोसी देश का सहयोगात्मक रवैया एक राष्ट्र को निश्चित रूप से मजबूती प्रदान करता है .अगर वह उदासीन हो तो भी एक देश बगैर नफे -नुक्सान के अपना हित दूसरो के साथ साध सकता है .लेकिन वही पड़ोसी यदि विरोधपूर्ण रवैया अपनाए तो उस देश के समग्र विकास का रास्ता अवरुद्ध हो जाता है .और पड़ोसी देश खुद आतंरिक अशांति से जूझ रहा हो तो परेशानी और भी बढ़ जाती है .इन दिनों भारत को पड़ोसी देशों से उत्पन्न कुछ ऐसी हीं परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है .हमारे सामने एक ओर जहाँ चीन द्वारा पैदा की गयी परेशानियाँ है ,वहीँ दूसरी ओर खुद चरमपंथियों से जूझ पाकिस्तान द्वारा उत्पन्न हो रही दिक्कतें हैं .
                                                                          चीन की बात करें तो , हमारे संबंध हमेशा से अविश्वासपूर्ण और तक़रीबन उदासीन से रहे हैं .हाल के दिनों में चीन का रुख भारत के प्रति कटुता और धमकी से भरा हो चला है .मसलन, सीमा पर सेना का युद्धाभ्यास ,अरुणाचल और लद्दाख क्षेत्र को लगातार अपने नक्शे में दिखाना आदि .पिछले कुछ दिनों में चीन ने एक कूटनीतिक अस्त्र के रूप में ‘दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को क्षति पहुँचाना’ को प्रयुक्त करना शुरू किया है .नेपाल में उसने मुलभुत निर्माण कार्यों में ठेका हासिल करना और आर्थिक मदद करना आरम्भ किया है ,साथ हीं मंडेरिन भाषा सिखाने वाले कई केंद्र भी बनाये हैं ,जो निश्चित तौर पर नेपालियों के दिलों से भारत को विलग करने की दूरगामी पहल है .इसके अलावा उसने श्रीलंका में भी बड़े स्तर पर पाँव पसारने का काम किया है ,चीन ने हनबनोता बंदरगाह के विकास और नवीनीकरण का काम हासिल किया ,हथियारों से जुड़े समझौते किये ,जो सीधे -सीधे भारत की कूटनीतिक क्षति है .म्यांमार के सैन्य शासन को अप्रत्यक्ष सहयोग भी उसके भारत विरोधी नीति का एक आयाम है .पाक-चीन के संबंध को लेकर कुछ कहने की जरुरत नहीं है .इस पूरे प्रहसन की पटकथा हीं भारत विरोधी साजिश की भाव-भूमि पर लिखी गयी है . वस्तुतः यही कहा जा सकता है कि हमें अपनी आतंरिक सुरक्षा ,आर्थिक विकास और सामरिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत के समग्र विकास के लिए आँख-कान खुले रखने चाहिए .क्योंकि वैश्विक मंच पर हमारी सशक्त उपस्थिति पड़ोसियों से मजबूत और सुसंगत समीकरणों के बाद हीं संभव हो सकती है .
सुन्दरम आनंद {राजनीतिक विश्लेषक है }

>नक्सलवाद पर डॉ० मधु लोमेश के विचार

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नक्सल आतंकवाद ,माओवादी हिंसा की घटनाएँ जो कभी छिट-पुट रूप में दिखाई देती थी आज  तकरीबन देश के बीस राज्यों में पैर पसारे दिख रही है .राजनीतिक गलियारों में भले हीं इसे किसी आतंकवाद के सदृश घोषित कर दिया हो पर आम जनता  इस  सत्य   को  जान  चुकी  है  कि  वास्तव  में  ऐसी  घटनाएँ  सरकारी  तंत्र  की  विफलता ,अव्यवस्था , भ्रष्टाचार ,सरकारी  धन  के  दुरूपयोग , नीतियों  के  सही  क्रियान्वयन  ना  होने  से  उत्पन्न   आक्रोश ,असंतोष  की  ही  परिचायक  है  जिसे  हम  सब   जज्ब  किये  बैठे  हैं . उनके  हिंसक  प्रदर्शनों ,हमलों  पर  रोक -थाम  के  लिए  आवश्यक  है  कि  सरकार  अपनी  कथनी  और  करनी  के  अंतर  की समीक्षा  करे .नक्सल प्रभावित  संवेदनशील  इलाकों  में  अंतर्विरोधों  को  समाप्त  करने  की  पहल   करें . रोटी ,कपडा  ,मकान  ,रोजगार  समंधी  ठोस  कदम उठाये   ना  कि  बल  पूर्वक  नाक्साली  आन्दोलन  को  कुचलते  हुए  उन्हें  अधिक  उग्र  बनने  पर  विवश  करे .
हिंसा  किसी  समस्या  का  समाधान  नहीं  पर  विकास  के  नाम पर करोडों  के  घोटाले ,सरकार  की  उदासीनता , नेताओं  की  स्वार्थलोलुपता  , भुखमरी ,बेरोजगारी  से  जूझते  लोगों  के  नक्सालियों  के  रूप  में  परिवर्तित  होने  के  लिए  जिम्मेदार  कौन  है ? इस  की  समीक्षा  की  जानी  चाहिए …
डॉ० मधु लोमेश { अदिति महाविद्यालय में पत्रकारिता की शिक्षिका है }

>दो दशकों से चला आया रहा है यह वाम- आतंकवाद / लाल-आतंकवाद क्यों नहीं दिखता ?

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कमजोर राजनैतिक इच्छाशक्ति ने माओवादिओं के हौसले दिनोदिन बुलंद होते हीं जा रहे हैं . अभी -अभी टीवी पर खबर देखा तो दंग रह गया . अब तक रेल की पटरियां उड़ाने वाले माओवादिओं ने रेल को हीं बंधक बना लिया है . खबर में बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के झारग्राम में भुवनेश्वर राजधानी ट्रेन को पीसीपीए नाम के माओवादी संगठन ने रोक रखा है . माओवादियों की दलील है कि सरकार की ज्यादतियों के विरोध में ऐसा किया गया है और उन्होंने माओवादी सरगना छत्रधर  महतों की रिहाई की मांग की है  . अब कोई उनसे और दिल्ली में बैठे नक्सलियों -माओवादिओं को वैचारिक खुराक देने वालों से पूछेगा कि सरकार की कौन सी ज्यादती किसके खिलाफ है ? उन ज्यादतियों के जबाव इस तरह आम आदमी को बंधक बना कर देने का ठेका उन्हें किसने दिया है ? गरीबों ,मजदूरों ,किसानों को न्याय दिलाने के नाम पर आम जनता को निशाना बनाना क्या आतंकवाद नहीं  ? लोकतंत्र के चौथे खम्भों को अपने कन्धों पर ढ़ोने का दावा करने वाले दलाल बताएँगे कि उन्हें हिन्दू आतंकवाद दिखता है , इस्लामिक आतंकवाद दिखता है लेकिन  दो दशकों  से चला आया रहा है यह वाम- आतंकवाद / लाल-आतंकवाद क्यों नहीं दिखता ? क्यों माओवादियों /नक्सलवादिओं को समानता की लड़ाई का सिपाही बता कर उनके पक्ष में तमाम तरह की दलीलें दी जाती है ? अब , मीडिया को पक्षपातपूर्ण रवैया बंद करना होगा . क्या अब भी कुछ जानने को रह गया है ? कब तक  माओवादियों के नकली उद्देश्य के चक्कर में पड़ कर उनके कुकृत्यों को वैचारिक जामा पहनाते रहेंगे ये कलम के दलाल ?
 बाज़ार का  बिस्तर गर्म करने वाले  इन पत्र -अ -कारों  ,नेताओं ,सरगनाओं को बाज़ार से जंग की बातकरने का कोई हक़ नहीं बनता.

>अरब जैसे अन्धविश्वासी समाज में गाँधी दर्शन की सराहना

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देश भर में पिछले एक पखवाड़े से गाँधी के सिद्धांतों और हिंद स्वराज को लेकर विमर्श चल रहा है . आज भारत हीं नहीं संसार के अनेक देशों के विद्वान गाँधी दर्शन में वैश्विक स्तर पर संघर्षों से उत्पन्न कुव्यवस्था  का समाधान बता रहे हैं .बीते दिनों गाँधी जयंती के दौरान काहिरा में आयोजित एक संगोष्ठी में अरब के गणमान्य नेताओं ने गाँधी के सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की.मिस्र में भारतीय राजदूत आर ० स्वामीनाथन ने अपने संबोधन में कहा कि बापू ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सत्य और अहिंसा के प्रयोग से विजय हासिल कर दुनिया को चौंका दिया था . और तब विश्व ने पहली बार अहिंसा की गूंज सुनी . अरब लीग के महासचिव उम्र मूसा ने गाँधी को दुनिया भर में उपेक्षितों की आवाज बताते हुए याद दिलाया कि वो गाँधी ही थे जिन्होंने सन ३१ में फिलिस्तीन का समर्थन किया था . मिस्र के पूर्व विदेशमंत्री अहमद माहिर ने अन्तराष्ट्रीय तंत्र में दोहरे मानदंड के चलन पर विशेष चिंता जाहिर की . अहमद माहिर ने कहा कि गाँधी के विचार हीं हैं जिनको अपना कर अरब और पश्चिम के बीच जारी मतभेद समाप्त जा सकते हैं . कार्यक्रम के दौरान एक प्रदर्शनी भी लगाई गयी जिसमें गाँधी के विचारों के जरिये वैश्विक समस्याओं के उत्तर ढूंढने की कोशिश की गयी थी . अरब जैसे अन्धविश्वासी समाज में गाँधी दर्शन की सराहना निश्चय ही दुनिया को बदलाव की ओर ले जायेगा .

>नक्सलियों के समर्थन में आये बौद्धिक चिट्ठाकार को जबाव जब बन्दूक थाम ली तब याचना कैसी ?

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वाह री बौद्धिकता ! जब से नक्सलियों / माओवादियों के सफाए के लिए वायु सेना की तैयारी से जुड़ी रपट और चिदंबरम का बयान मीडिया में उछाला गया है तभी से कुछ हिंदी चिट्ठों के स्वनामधन्य बौद्धिक लेखक  इसे  सत्ता का दमनकारी चरित्र  और वर्तमान हालात को आपातकाल से भी बदतर बता रहे हैं . हिंदी के लेखकों को माओवादियों /नक्सलवादी/ उग्रवादी (तथाकथित क्रांतिकारी ) के मानवाधिकारों की रक्षा में खड़े होने का आह्वान किया जा रहा है .यही वो लोग हैं जो अक्सर आतंकवादियों के पक्ष में भी चिल्लाने से नहीं चूकते और दिल्ली के बौद्धिक वेश्यावृत्ति के गलियारों में इन्हें सम्मानपूर्वक एक आदर्श पत्रकार ,  लेखक,आलोचक , बुद्धिजीवी ,समाजसेवी पुकारा जाता है . इसी टोली के कुछ लोग जो कल तक साहित्य की दुनिया के सामंतों के बिस्तर गर्म करने के लिए सारे इन्तजाम देखा करते थे ,आज बस्तर के जंगलों में समाजसेवा का स्वांग रचा रहे हैं ! मानवता की रक्षा के नाम पर पाशविक कृत्यों को अंजाम देने वाले इन वादियों ( नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद/ उग्रवाद …) के वाद को मानसिक खुराक पहुंचाने वाले ऐसे लोग सेकुलर ,प्रगतिशील , और ना जाने कितने उपाधियों से लैश होते हैं . जबकि प्रगति के बजाय इनके एक -एक काम विध्वंश के साक्षी होते हैं .
                                                                              मानवता के खिलाफ जारी तमाम हिंसक संघर्षों को राज्य की विफलता से जनता में उपजे असंतोष का नतीजा बताने की जिम्मेदारी लिए घूमने वाले इन बौद्धिक लोगों को भला कौन समझाए ? ये तो अपनी ही धुन में जिद्दी बने बैठे हैं ! क्या इन्हें नहीं पता कि जिस भारतीय लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं वहां की सरकार बहुमत ने चुनी है . पहले की तरह चुनावों में भ्रष्टाचार भी नहीं होता है . कुल मिला कर जनता की सरकार है . क्या सर्वहारा / धर्म /सम्प्रदाय /क्षेत्र  आदि के नाम पर हिंसक संघर्ष जायज है ? और जो लोग बौद्धिकता का दावा करते हुए हिंसा का समर्थन करते हैं अथवा उसे किसी घटना का पर्याय बताते हैं वो सही है ? अकसर आप सुनते होंगे , कभी कोई ब्लास्ट हुआ तो  दिल्ली में बैठे लोकतंत्र के नाजायज औलादों द्वारा कहा जाता है कि यह तो फलाने दंगे का , नरसंहार का , विवादित स्थल तोड़े जाने का नतीजा है . कहीं पर सामूहिक रूप से नक्सल हिंसा में आम जन की मौत हो जाए तब भी बचाव में आवाज आती है कि यह सरकार द्वारा उपेक्षित,पूंजीवादियों द्वारा सताए लोगों का विरोध है . लेकिन इस बात को नहीं देखते कि ऐसे हिंसक हमलों में कौन मारा जाता है ? क्या देश और समाज को चलाने वाले नीति निर्धारक या पूंजीवादी  मारे जाते हैं ? नहीं , यहाँ भी आम नागरिक ही शिकार होता है . क्या आम आदमी हीं तो माओवादी है कहने से काम चल जायेगा ?काम नहीं चलेगा , अब जबाव देना होगा इनको कि क्या बिहार के खगरिया में मारे गये सोलह निर्दोष किसान , झारखण्ड में मारा गया पुलिस अधिकारी , असाम में मारे गये लोग आम आदमी नहीं थे ? क्या हिंसक हमलों में मृत इन नागरिकों का कोई  मानव अधिकार / संवैधानिक अधिकार नहीं था ? परन्तु , अफजल और कोबाड़ जैसे नरभक्षियों के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन करने वाले इन कलम के दलालों को लाल ,पीले ,हरे, चश्मे से वास्तविकता नज़र नहीं आती है . 
                                                            नक्सली हिंसा को प्रत्युत्तर देने से खफा होकर मानसिक समर्थन करने वाले ऐसे ही एक ब्लॉग पर एक औसत बुद्धि वाले (क्योंकि साहब इनके कथन से इन्हें बौद्धिक तो नहीं माना जा सकता ! ) इंसान  khattu_mitthu ने कहा भारत जैसे लोकतंत्र में !!!  भारत कैसा लोकतंत्र है ? जिसमें चाहे जो बंदूक उठाले ! और जब बंदूक उठाली है तो याचना कैसी !होना तो यह चाहिये कि माओवादी, नक्सलवादी अपने बुद्धिजीवी समर्थकों को अधिकृत करें और वे बुद्धिजीवी सरकार के पास जायें कि हम रखेंगें माओवादी, नक्सलवादियों का पक्ष हमसे बात कीजिये, हम अदालतों में रखेंगे उनका पक्ष। साथ में माओवादियों, नक्सलवादियों को यह भी समझायेंगे कि जब गोली चलायें तो निशाना केवल उसी को बनायें जो वास्तव में उनकी हालत या दुखों के लिये जिम्मेदार है, उनको नहीं जो उन्हीं जैसे मजलूम हैं। जिन हाथों में नीति निर्माण नहीं है, बजट नहीं है, क्षमता नहीं है उन्हीं का लूट-काट करने से स्थितियां नहीं बदलेंगी। सरकार तो शायद इनसे बात कर भी ले लेकिन माओवादी, नक्सलवादी क्या इन्हें अधिकृत करते हैं?बुद्धिजीवी के लिये तो यह दुकान चलाने का स्कोप भर है।  आपको उनसे है वफ़ा की उम्मीद ,जो नहीं जानते वफ़ा क्या है !”
                                                                                फिलवक्त , बुद्धिजीवी लोगों के हाथों में लाल ,हरा, भगवा,नीला, झंडा न होकर सफ़ेद झंडे की आवश्यकता है क्योंकि सफ़ेद सच और अहिंसा का प्रतीक है  . और एक ऐसा रंग भी जिसपर जरुरत के हिसाब से विभिन्न रंगों को चढाया जा सकता है . नहीं तो सरकार की हुंकार साफ़ है . बहुत हो गयी याचना अब रण होगा . हर हिंसक वाद का जबाव देने की जरुरत आन पड़ी है . अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब श्रीलंका सरकार ने  संसार की सबसे सुगठित आतंकी संगठन लिट्टे को निबटाया था . 

>बटला हाउस मुठभेड़ और आईबीएन वाले आशुतोष की पोस्ट

> कल उन्नीस सितम्बर था .पिछले साल इसी दिन बटला हाउस मुठभेड़ हुआ था जिसमें जामिया के छात्र जिन पर आतंकी होने का आरोप है , मारे गये थे । उसी मुठभेड़ में मोहन चंद शर्मा की शहादत भी हुई थी । ( ध्यान रहे , अगर भविष्य में कभी मुठभेड़ को फर्जी साबित कर दिया जाए तब भी वो शहीद हीं कहलायेंगे क्योंकि वो तो घर से देश की रक्षा करने निकले थे ) उस चर्चित काण्ड की बरसी पर ३० सितम्बर ०८ को लिखे गये आईबीएन के पत्रकार आशुतोष की इस पोस्ट को फ़िर से प्रकाशित कर रहा हूँ । इस मुद्दे पर एक बार फ़िर से बहस की जरुरत हैं क्योंकि कल-परसों हीं राष्ट्रीय जेहाद पार्टी के एक विधायक इसी नाम पर जीत कर आए हैं । तो पढिये और आशुतोष के सवालों का जबाव खोजिये :-

” जामिया एनकाउंटर और मुस्लिम पहचान

मैंने अनवर से पूछातुम क्या कर रहे हो?

उसने पलटकर पूछाइसका क्या मतलब ?

मैंने कहाअबे जामिया में ये रैली करने की क्या जरूरत है? तुम क्यों नहीं समझते? इससे गलत संदेश जाएगा। भगवान के लिए ऐसा मत करो।

ये सुनते ही अनवर आपा खो बैठा और बोलातुम्हारा क्या मतलब है? कानूनी सहायता देना मूलभूत अधिकार है। मैं उस पर भला कैसे आपत्ति कर सकता हूं। मैंने कहादेखो, कोई भी भला आदमी इस बात पर उंगली नहीं उठाएगा पर यह वह समय नहीं है। ऐसे में जब कोई ये नहीं जानता कि कहां बम फटेगा और हम घर लौटेंगे भी या नहीं तब आप कैसे किसी से समझदारी की उम्मीद कर सकते हैं।

काफी देर गर्मागर्मी होती रही। एक बार तो ऐसा लगा कि दोस्ती खतरे में है। अनवर और मैं 1988-90 में जेएनयू में साथसाथ थे। तब से हम परिवार की तरह हैं। हमारे बीच कई बार काफी नोंकझोंक होती रही, और ढेरों मुद्दों पर हमारे विचार काफी अलगअलग भी रहे लेकिन कभी भी हमारी दोस्ती पर आंच नहीं आयी।

बहसाबहसी में मैंने महसूस किया कि हमारे गुस्से के कारण कुछ और है शायद हम एक दूसरे से जो कहना चाहते हैं वो कह नहीं पा रहे हैं। मैं शायद ये कहना चाहता था कि मुसलमानों के साथ कुछ गड़बड़ है। तुम लोग हमेशा बम फोड़ते हो और वह शायद यह कहना चाहता था कि सरकारी अमले और मीडिया में हिंदुओं का बोलबाला है, जो हमेशा ये सोचते हैं कि मुसलमान आतंकवादी होते हैं और उन्हें सबक सिखाना ही चाहिए इसलिए निर्दोष मुस्लिम आतंकवाद के नाम पर निशाना बनते हैं।

यह वास्तव में अजीब था क्योंकि कट्टरवाद और फिरकापरस्ती से लड़ने का हम दोनों का लंबा इतिहास रहा है। हम दोनों ऐसी ताकतों के खिलाफ जोरदार ढंग से आवाज उठाते रहे हैं। तो फिर ये गरमागर्मी क्यों? मुझे अगली सुबह इस बात का जवाब मिल गया जब मैंने वरिष्ठ पत्रकार और लेजेंडरी संपादक एम जे अकबर का लेख पढ़ा। अकबर ने बड़े दबे छुपे शब्दों में उस बात को लिख मारा जो अनवर नहीं कह पाया। मैं ये साफ कर दूं कि एम जे के प्रति हमेशा से मेरे मन में सम्मान रहा है, जो आज भी है। वे आधुनिक और बेहतर समझ वाले चुनिंदा संपादकों में से एक हैं। लेकिन टाइम्स आफ इंडिया में में रविवार को जो उन्होंने लिखा उसमें और शाह इमाम बुखारी के मुखर बयानों में काफी कुछ समानता मुझे दिखी।

मैं काफी निराश , उदास और परेशान था। मैं जवाब तलाश रहा था। क्या मेरी सोच में कहीं कुछ गड़बड़ है? क्या मैं बदल गया हूं? क्या मैं वही आदमी हूं जो अबतक हिंदू सांप्रदायिकता और उसकी मुस्लिम विरोधी विचारधारा का विरोध करता आया है? आखिर, क्यों मैं अनवर और एम जे की विश्वसनीयता पर शक कर रहा हूं।

सोचते वक्त मुझे जानेमाने पटकथा लेखक जावेद अख्तर का खयाल आया, जिन्होंने एक टीवी डिबेट के दौरान मेरे एक मंझे हुए एंकर संदीप चौधरी को यह कहकर झिड़क दिया था कि उनका सवाल सांप्रदायिक का है। मुझे ठीक से उनका वह सवाल याद नहीं लेकिन इतना याद है कि वह सवाल मुसलमानों और उनकी पहचान को लेकर था। तब मैंने गुस्से में एक हिंदी मैगजीन में एक तीखा लेख लिखा था और सवाल उठाया था कि क्यों आरिफ मोहम्मद खान को सैयद शहाबुद्दीन से 80 के दशक के अंत और 90 के दशक की शुरुआत में मात खानी पड़ी? आखिर क्यों ऐसा हुआ कि वी पी सिंह ने आरिफ मोहम्मद खान को इलाहाबाद जाने से रोक दिया जहां से वे 1988 में लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे लेकिन शहाबुद्दीन का स्वागत किया गया।

अचंभे की बात है कि मुझे इस मुद्दे पर जावेद अख्तर के कभी दोस्त रहे सलीम खान से जोरदार समर्थन मिला। उन्होंने दैनिक भास्कर में मेरे लिखे का हवाला देते हुए एक लेख लिखा था और मेरे कुछ तर्कों से सहमति जताई थी

मुझे यहां ये मानने में कोई संकोच नहीं है कि पिछले काफी समय से मेरे जेहन में ये सवाल रह रह कर गूंज रहा है कि अब मुस्लिम समुदाय के आत्ममंथन का वक्त गया है। समुदाय को खुद से ये सवाल पूछना होगा कि क्या अंदर कहीं कुछ गलत हो रहा है?

आखिर क्यों नैरोबी से दारसलाम, इंडोनेशिया से सूडान, मैड्रिड से मैनहटन, काबुल से कश्मीर, चेचेन्या से चीन तक उनकी पहचान एक ऐसे शख्स की बन रही है जो बम फोड़ता है , धमाका करता?

मुझे मालूम है कि ऐसा कह कर मैं क्या जोखिम मोल ले रहा हूं। मुझे मालूम है कि कुछ लोग यकायक कह उठेंगे कि देखा आशुतोष का चेहरा बेनकाब हो गया, धर्मनिरपेक्षता की आड़ में वो अबतक सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहा था। यही है उसका असली चेहरा। अब उसकी हकीकत सामने आई है। लेकिन मुझे आज इसकी परवाह नहीं।

आज सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर क्यों 20वीं सदी के बेहरतीन दिमागों में से एक सलमान रुश्दी खुली हवा में सांस नहीं ले सकते और क्यों तसलीमा नसरीन देश की सबसे धर्मनिरपेक्ष मानी जाने वाली लेफ्ट सरकार के साए में शांति से नहीं रह सकतीं? आखिर क्यों लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह सिमी पर से बैन हटाने को सही ठहराने की कोशिश करते हैं? ऐसा क्यों होता है कि देवबंद के मौलाना मदनी रामलीला मैदान में आतंकवादी विरोधी रैली का आयोजन करते हैं और आतंकवाद का विरोध करते हैं तो उर्दू प्रेस उनकी आलोचना पर उतर आती है?

कोई ये सवाल भी उठा सकता है कि कट्टरपंथ और फिरकापरस्ती तो हर धर्म में है तो ये हंगामा क्यों? मैं मानता हूं लेकिन थोड़ा फर्क है। हिंदू समाज में अगर भड़काने वाली कट्टरपंथी आवाज है तो वहीं इसके बराबर या कहें इससे भी अधिक मजूबत उदारपंथी आवाज भी है। ईसाईयत में ये जंग धार्मिक कट्टरपंथ काफी पहले हार चुका है। ईसाईयत में ये तय हो चुका है कि धर्म निजी आस्था का मामला है और राजनीति में मजहब के लिये कोई जगह नहीं है। हिंदुत्व और ईसाईयत में अबुल अल मौदूदी जैसे लोग नहीं दिखाई पड़ते जो धर्म और राजनीति का घालमेल करना चाहते हैं। मौदूदी दावा करते हैं कि इस्लाम एक क्रांतिकारी विचारधारा है और एक सिस्टम भी जो सरकारों को पलट देता है।

मेरी नजर में मुस्लिम समुदाय में रैडिकल इस्लाम या राजनीतिक इस्लाम है जो खुद अपने ही लोगों और दुनिया के लिए मुसीबत पैदा कर रहा है। लेकिन हैरानी वाली बात ये है कि इस तथाकथित रैडिकल इस्लाम के खिलाफ कोई पुरजोर आवाज बुलंद नहीं करता ही भारत में और ही दूसरी जगहों पर। उदारपंथियों का एक बड़ा तबका अकसर चुप रहता है या फिर वह इसका इतनी ताकत से विरोध नहीं करता कि पूरा समुदाय इसको सुने।

फरीद जकरिया ने अपनी किताबपोस्ट अमेरिकन वर्ल्डमें लिखा है कि मुस्लिम जगत भी बदल रहा है लेकिन बाकी की तुलना में काफी धीमे। इसमें भी कई ऐसे लोग हैं जो इस बदलाव के विरोध में खडे़ हो खुद को इस तबके का नेता मानने का अहसास पाले बैठे हैं। दूसरी संस्कृतियों की तुलना में इस्लाम के अंदर प्रतिक्रियावादी ज्यादा कट्टर हैंइनमें जड़ता व्याप्त है। हालांकि इनकी संख्या काफी कम है। काफी अल्पसंख्या में हैं।

मैं मानता हूं कि मौदूदी जैसे लोग कम संख्या में हैं। नहीं तो अनवर, साजिद और आर्फीन जैसे मेरे दोस्त नहीं होते लेकिन बदकिस्मती से वे ऐसे कुछ लोगों को बाकी लोगों पर राज करने का मौका देते हैं। मुस्लिम समुदाय के बहुसंख्यक तबके की ये चुप्पी तकलीफदेह है और अब यह चुप्पी काफी जटिल रूप अख्तियार करती जा रही है। यह इसीकांप्लेक्सका नतीजा है कि जामिया नगर कापुलिस एनकाउंटरमुस्लिम बौद्धिक वर्ग के लिये अपनी मुस्लिम पहचान बनाने का जरिया बन जाती है।

मेरा सवाल यह है कि आखिर क्यों एक एनकाउंटर को मुस्लिम समुदाय के ऊपर हमला माना जा रहा है? पुलिस एनकाउंटर कोई नया नहीं है। ये असली या फर्जी दोनों ही होते हैं। यह हर रोज होता है। लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जब कोई आतिफ अमीन मारा जाता है तो हंगामा हो जाता है, प्रदर्शन होते हैं। यहां कोई नंदू मारा जाता है तब जंतरमंतर और जामिया पर रैली क्यों नहीं होती?

मुझे एम जे अकबर को ये बताने की जरूरत नहीं कि एक नकली एनकाउंटर को असली बनाने के लिए पुलिसवाले अकसर खुद को गोली मारते हैं? राजबीर, दया नायक और प्रदीप शर्मा असली गोली चला कर हीरो नहीं बने बल्कि ये अकसर उन लोगों को मारकर हीरो बने है जिनकों इन्होंने पकड़ कर रखा था। मोहनचंद शर्मा भी कोई साधू नहीं था लेकिन एमजे को यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि जामिया नगर एनकाउंटर में एम सी शर्मा पुलिस की गोलियों का भी शिकार हो सकते हैं? मेरा सवाल ये है कि क्या वो एक आम मुसलमान की तरहरिऐक्टकर रहे हैं या फिर देश के एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर। यही सवाल मेरा अपने प्रिय मित्र अनवर से भी है।

ये मेरा अनुमान नहीं बल्कि यकीन है कि दोनों महानुभाव एक नागरिक की तरह व्यवहार नहीं कर रहे हैं और उनके शब्दों में वही कुछ झलक रहा है जो कि जमिया नगर, सराय मीर और आजमगढ़ की सड़कों पर आम मुसलमान की बातों में झलक रहा है। यहां खुले रूप से कहा जा रहा है किकाउंटर टेररिज्मके नाम पर मासूम मुस्लिमों को शिकार बनाया जा रहा है। पहले आम मुसलमान और पढ़ेलिखे मुसलमान में फर्क था। लेकिन अब ये तस्वीर कुछकुछ धुंधली होती दिख रही है। और ये बात परेशान करने वाली है।

भारतीय संदर्भ में क्या इसका ये मतलब है कि मुस्लिम समुदाय में उदारता कम होती जा रही है? मेरा जवाब हैबिग नो फिर ऐसी प्रतिक्रिया क्यों? मैं इसेलिटिल ब्वाय सिंड्रोमकहता हूं। एक ऐसा बच्चा जिसे बारबार उस शैतानी के लिए दोषी ठहराया जाता है जो उसने की ही नहीं। अवसाद के चलते वह जिद्दी और हठी हो जाता हैस्वीकारतावादी और वो चिढ़ कर , तंग आकर , परेशान हो कर कह उठता है – “हां मैंने ही किया है। आप क्या कर लोगे?”

तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा करने और अल कायदा और ओसामा बिन लादेन के उभरने के बाद से उदारपंथी मुसलमानों के दिक्कतें शुरू हो गयीं, उनकी पहचान को खतरा पैदा हो गया है। दुनिया के हर कोने में उन पर लगातार नजर रखी जा रही हैं। उनका नाम आते ही उन्हेअजीब सी नजरोंसे देखा जाता है मानो वो आम इंसान होकर आतंकवादी हों। न्यूयॉर्क हो या नई दिल्ली सब जगह यही हाल है। एक उदारपंथी मुसलमान जानता है कि उसका कट्टरपंथियों की सोच से कोई लेना देना नहीं है।

उसका बम फोड़ों आंतकवादी सोच से दूरदूर तक का कोई वास्ता नहीं है। ही वो ये मानता है कि हिंदूयहूदीईसाई या भारतइस्राइलअमेरिका इस्लाम को नेस्तनाबूद करने के लिये साजिश रच रहे हैं। लेकिन वो कर क्या सकता है। वो असहाय है। उसे मालूम है कि उसकी सुनने वाला कोई नहीं। वो अंदर भी टूट रहा है और बाहर भी उनपर कोई यकीन नहीं कर रहा है कि ये खतरनाक सोच उसकी जिंदगी का हिस्सा नहीं है। और यही असहायता उसके अंदर एक ऐसे कांप्लेक्स को जन्म देती है जिसे हम लिटिल ब्वाय सिंड्रोम कहते हैं।

अनवर मेरे दोस्त, तुम्हें इस सिंड्रोम से बाहर आना होगा क्योंकि अगर तुम मौदूदी और सैयद कुतुब और ओसामा और जवाहिरी जैसी सोच का शिकार हो गए तो इस धर्म का कोई भविष्य नहीं बचेगा जो शांति और क्षमा का पाठ पढ़ाता है। इस आततायी मानसिकता का जोरदार विराध करने का वक्त गया है। अगर अब ऐसा नहीं होगा तो मैं, तुम और एम जे जैसे लोग इतिहास में विलेन के रूप में देखे जाएंगे और हिंदू कट्टरपंथी जैसी ताकतें इस देश पर राज करेंगी।

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