आरक्षण : आ….क थू

(१) गत वर्ष मेरे भतीजे को AIEEE में 142 अंक मिले जबकि उसके आरक्षित वर्ग के दोस्त को मात्र 48 अंक, लेकिन 142 अंक वाले को काऊंसिलिंग तक के लिये नहीं बुलाया गया, जबकि 48 अंक वाले को लगभग मनचाहे विषय में BE करने की पात्रता मिल गई…
(२) गत वर्ष के IIT Entrance के आँकडों के अनुसार जितने अंकों पर आरक्षित वर्ग को 10 वीं रैंक मिली है उतने ही अंक यदि सामान्य वर्ग के छात्र के हैं तो उसकी रैंक होगी 3800 वीं…इतना अन्तर सिर्फ़ आरक्षण के कारण है और यदि आरक्षण नहीं होता तो वह नालायक कभी इंजीनियरिंग कॉलेज में घुस भी नहीं पाता…
(३) सुमन गत बीस वर्षों से एक सरकारी ऑफ़िस में एलडीसी के पद पर कार्यरत है, जबकि मात्र पाँच वर्ष पहले नौकरी में लगी उसकी जूनियर चार प्रमोशन पाकर उसकी बॉस बन गई है, सिर्फ़ इसलिये कि वह आरक्षित वर्ग से है (ये और बात है कि उसे अंग्रेजी का एक पत्र ड्राफ़्ट करना नहीं आता)..प्रतिभा और विभागीय कार्य जाये भाड में…
ऐसे हजारों-लाखों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं.. लेकिन क्या किया जा सकता है ? जब २१ वीं सदी में सत्ता ही जन्म के आधार पर प्रतिभा को लतिया रही हो.. तब क्या रास्ता बचता है ? आरक्षण समर्थकों का एक तर्क यह होता है कि आरक्षण से सामाजिक समरसता बढेगी (?).. क्या ऐसे ही बढेगी ? यदि मैं मेरे भतीजे की जगह होता तो अपने दोस्त के प्रति मेरे मन में हमेशा के लिये एक विषमता जन्म ले लेती..कि मैं इससे ज्यादा प्रतिभाशाली हूँ फ़िर भी यह मुझसे आगे निकल गया तो फ़िर मैं क्यों इसके प्रति सदाशयता दिखाऊँ ? सुमन अपना कार्य ईमानदारी से क्यों करे, जबकि उसे मालूम है कि उसकी बॉस में इतनी भी अकल नहीं है कि वह उसके सामने सर उठाकर खडी हो सके, लेकिन वह मन मसोस कर उसके आदेश मानती है… और मसोसे हुए मन और कुचली हुई प्रतिभायें सामाजिक समरसता का निर्माण नहीं किया करतीं… लेकिन यह बात नेताओं और आरक्षण समर्थकों के कानों तक कौन पहुँचाये ? वे तो समाज को खण्ड-खण्ड कर देना चाहते हैं.. और नेताओं की बात छोड भी दें तो आरक्षण का एक्मात्र उद्देश्य लगता है… “बदला”…सवर्ण वर्ग के किसी छात्र के किसी पूर्वज ने कभी दलितों पर अत्याचार किया होगा उसका फ़ल उसे आज भुगतना पड़ रहा है..क्या इससे समरसता बढेगी ? दलितों पर अत्याचार हुए हैं यह एक कडवा सत्य है, लेकिन उसमें आज के प्रतिभाशाली युवा की क्या गलती है ? लेकिन वह अपने पूर्वजों की गलतियों को ढोने पर मजबूर है, ठीक वैसे ही जैसे कि वह भीषण जनसंख्या के दुष्परिणामों को भुगत रहा है, जाहिर है कि उसमें भी उसकी कोई गलती नहीं है । इस घृणित खेल में सबसे अधिक नुकसान हो रहा है गरीब.. या कहें मध्यमवर्गीय सामान्य वर्ग के छात्रों का…। मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं अपने बेटे को किसी महँगे (आजकल तो सभी महँगे हैं) कॉलेज में पैसे के बल पर एडमिशन दिलवाऊँ.. और प्रतिभा के बल पर तो वह कहीं स्थान पा ही नहीं सकता.. तो मेरे बेटे के लिये क्या रास्ता बचा ? लोगों ने Monster.com का विज्ञापन देखा होगा जिसकी “पंच लाईन” है “Caught in a wrong job” ठीक यही सामान्य वर्ग के गरीब छात्रों के साथ होने वाला है.. जबकि कोई प्रतिभाशाली इंजीनियर कहीं तेल बेच रहा होगा.. या कोई होनहार भविष्य का वैज्ञानिक किसी गाँव में सरपंच की चाकरी करते हुए मास्टरी करता होगा… या IIM की प्रतिभा रखने वाला कोई लडका कहीं मैकेनिकगिरी में लगा होगा… यही हो रहा है.. लेकिन सुनेगा कौन ? सबको तो अपनी-अपनी जाति की पडी है.. सब पिछडे़ होने के लिये मरे जा रहे हैं..और नेता मरे जा रहे हैं अपने वोटों के लिये और निजी क्षेत्र के दरवाजे भी हमारे मुँह पर बन्द करने में..। मेरे पास तीन “M” (Money, Muscle, Manipulation) में से एक भी नहीं है, तो मैं भी अपने बेटे से कहूँगा कि यदि उसके आरक्षित वर्ग के कई दोस्तॊं से ज्यादा अंक पाने के बावजूद उसे किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला नहीं मिलता.. तो दाऊद या बबलू गैंग का रुख कर.. कम से कम वहाँ “प्रतिभा” की कद्र तो होगी…

सुप्रीम कोर्ट से जूते खाने के बावजूद जैसा कि हमेशा होता आया है अब हमारे नेता (?) अध्यादेश के जरिये अपनी बात थोपने की कोशिश करेंगे, और सुप्रीम कोर्ट के हाथ बाँध दिये जायेंगे और सवर्णों.. विशेषकर गरीब सवर्णों की प्रतिभा की भ्रूण हत्या करके खुशी मनाई जायेगी । सुप्रीम कोर्ट इससे अधिक क्या कर सकता है… सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो दिल्ली में कभी CNG लागू नहीं होता, सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो दिल्ली के भ्रष्ट शासक और उतने ही बेईमान अतिक्रमणकर्ता बेशर्मी से कब्जा जमाये रहते और सीलिंग कभी नहीं होती.., सुप्रीम कोर्ट ना होता तो मायावती ताजमहल भी बेच खाती… ऐसे अनेकों उदाहरण हैं कि यदि सुप्रीम कोर्ट ना हो तो ये नेता समूचे देश को SEZ (Special Exploitation Zone) बना डालें.. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की भी एक सीमा है.. फ़िर हमारी नजर जाती है राष्ट्रपति पर..बात आती है अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने की तो हमारे यहाँ जैल सिंह को छोडकर कोई भी “मर्द” राष्ट्रपति नहीं हुआ जो सरकार के अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से मना कर दे, और यदि वह मना कर भी दे तो लोकसभा में बैठे 525 गधे (या शायद 540..क्या फ़र्क पडता है) उसे फ़िर पास करके वापस भेज देंगे और फ़िर राष्ट्रपति को उस पर दस्तखत करना ही होंगे । जबकि कम से कम राष्ट्रपति ऐसा तो कर ही सकता है कि वह विवादित अध्यादेश को अनिश्चितकाल के लिये विचाराधीन रख ले.. विचार करने की सीमा पर लोकसभा की कोई पाबन्दी नहीं है इसलिये राष्ट्रपति को चाहिये कि वे अपने कार्यकाल की समाप्ति तक उक्त अध्यादेश पर “विचार” करते ही रहें… करते ही रहें.. फ़िर उनका कार्यकाल समाप्त होने के पश्चात वह अध्यादेश स्वतः ही समाप्त हो जायेगा और नये राष्ट्रपति के चुने जाने और आने तक बात टल जायेगी, फ़िर से लोकसभा को उसे पास करके विचारार्थ और हस्ताक्षर करने राष्ट्रपति के पास भेजा जायेगा.. फ़िर चाहे तो अगला राष्ट्रपति उस अध्यादेश पर पाँच साल तक बैठ सकता है । जैसे वे इस वक्त वे अफ़जल के केस में उस पर कुंडली मारे बैठे हैं..उसी तरह हम गरीबों के हक के लिये वे क्यों नहीं सरकार के सामने अपनी कमर सीधी करते ?

लेकिन यदि आजादी के साठ वर्षों बाद भी जनसंख्या नियंत्रित नहीं हो पाई, प्राथमिक शाला के अभाव में चालीस प्रतिशत निरक्षर हैं, नेहरू के जमाने से पुष्पित-पल्लवित हुआ भ्रष्टाचार अब लोकाचार बन गया है.. तो इसमें आम आदमी की क्या गलती है ? सजा मिलनी किसे चाहिये और मिल किसे रही है… यही है हमारा आज का “शाईनिंग इंडिया”… यानी सो कॉल्ड “मेरा भारत महान”…

>आरक्षण : आ….क थू

>(१) गत वर्ष मेरे भतीजे को AIEEE में 142 अंक मिले जबकि उसके आरक्षित वर्ग के दोस्त को मात्र 48 अंक, लेकिन 142 अंक वाले को काऊंसिलिंग तक के लिये नहीं बुलाया गया, जबकि 48 अंक वाले को लगभग मनचाहे विषय में BE करने की पात्रता मिल गई…
(२) गत वर्ष के IIT Entrance के आँकडों के अनुसार जितने अंकों पर आरक्षित वर्ग को 10 वीं रैंक मिली है उतने ही अंक यदि सामान्य वर्ग के छात्र के हैं तो उसकी रैंक होगी 3800 वीं…इतना अन्तर सिर्फ़ आरक्षण के कारण है और यदि आरक्षण नहीं होता तो वह नालायक कभी इंजीनियरिंग कॉलेज में घुस भी नहीं पाता…
(३) सुमन गत बीस वर्षों से एक सरकारी ऑफ़िस में एलडीसी के पद पर कार्यरत है, जबकि मात्र पाँच वर्ष पहले नौकरी में लगी उसकी जूनियर चार प्रमोशन पाकर उसकी बॉस बन गई है, सिर्फ़ इसलिये कि वह आरक्षित वर्ग से है (ये और बात है कि उसे अंग्रेजी का एक पत्र ड्राफ़्ट करना नहीं आता)..प्रतिभा और विभागीय कार्य जाये भाड में…
ऐसे हजारों-लाखों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं.. लेकिन क्या किया जा सकता है ? जब २१ वीं सदी में सत्ता ही जन्म के आधार पर प्रतिभा को लतिया रही हो.. तब क्या रास्ता बचता है ? आरक्षण समर्थकों का एक तर्क यह होता है कि आरक्षण से सामाजिक समरसता बढेगी (?).. क्या ऐसे ही बढेगी ? यदि मैं मेरे भतीजे की जगह होता तो अपने दोस्त के प्रति मेरे मन में हमेशा के लिये एक विषमता जन्म ले लेती..कि मैं इससे ज्यादा प्रतिभाशाली हूँ फ़िर भी यह मुझसे आगे निकल गया तो फ़िर मैं क्यों इसके प्रति सदाशयता दिखाऊँ ? सुमन अपना कार्य ईमानदारी से क्यों करे, जबकि उसे मालूम है कि उसकी बॉस में इतनी भी अकल नहीं है कि वह उसके सामने सर उठाकर खडी हो सके, लेकिन वह मन मसोस कर उसके आदेश मानती है… और मसोसे हुए मन और कुचली हुई प्रतिभायें सामाजिक समरसता का निर्माण नहीं किया करतीं… लेकिन यह बात नेताओं और आरक्षण समर्थकों के कानों तक कौन पहुँचाये ? वे तो समाज को खण्ड-खण्ड कर देना चाहते हैं.. और नेताओं की बात छोड भी दें तो आरक्षण का एक्मात्र उद्देश्य लगता है… “बदला”…सवर्ण वर्ग के किसी छात्र के किसी पूर्वज ने कभी दलितों पर अत्याचार किया होगा उसका फ़ल उसे आज भुगतना पड़ रहा है..क्या इससे समरसता बढेगी ? दलितों पर अत्याचार हुए हैं यह एक कडवा सत्य है, लेकिन उसमें आज के प्रतिभाशाली युवा की क्या गलती है ? लेकिन वह अपने पूर्वजों की गलतियों को ढोने पर मजबूर है, ठीक वैसे ही जैसे कि वह भीषण जनसंख्या के दुष्परिणामों को भुगत रहा है, जाहिर है कि उसमें भी उसकी कोई गलती नहीं है । इस घृणित खेल में सबसे अधिक नुकसान हो रहा है गरीब.. या कहें मध्यमवर्गीय सामान्य वर्ग के छात्रों का…। मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं अपने बेटे को किसी महँगे (आजकल तो सभी महँगे हैं) कॉलेज में पैसे के बल पर एडमिशन दिलवाऊँ.. और प्रतिभा के बल पर तो वह कहीं स्थान पा ही नहीं सकता.. तो मेरे बेटे के लिये क्या रास्ता बचा ? लोगों ने Monster.com का विज्ञापन देखा होगा जिसकी “पंच लाईन” है “Caught in a wrong job” ठीक यही सामान्य वर्ग के गरीब छात्रों के साथ होने वाला है.. जबकि कोई प्रतिभाशाली इंजीनियर कहीं तेल बेच रहा होगा.. या कोई होनहार भविष्य का वैज्ञानिक किसी गाँव में सरपंच की चाकरी करते हुए मास्टरी करता होगा… या IIM की प्रतिभा रखने वाला कोई लडका कहीं मैकेनिकगिरी में लगा होगा… यही हो रहा है.. लेकिन सुनेगा कौन ? सबको तो अपनी-अपनी जाति की पडी है.. सब पिछडे़ होने के लिये मरे जा रहे हैं..और नेता मरे जा रहे हैं अपने वोटों के लिये और निजी क्षेत्र के दरवाजे भी हमारे मुँह पर बन्द करने में..। मेरे पास तीन “M” (Money, Muscle, Manipulation) में से एक भी नहीं है, तो मैं भी अपने बेटे से कहूँगा कि यदि उसके आरक्षित वर्ग के कई दोस्तॊं से ज्यादा अंक पाने के बावजूद उसे किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला नहीं मिलता.. तो दाऊद या बबलू गैंग का रुख कर.. कम से कम वहाँ “प्रतिभा” की कद्र तो होगी…

सुप्रीम कोर्ट से जूते खाने के बावजूद जैसा कि हमेशा होता आया है अब हमारे नेता (?) अध्यादेश के जरिये अपनी बात थोपने की कोशिश करेंगे, और सुप्रीम कोर्ट के हाथ बाँध दिये जायेंगे और सवर्णों.. विशेषकर गरीब सवर्णों की प्रतिभा की भ्रूण हत्या करके खुशी मनाई जायेगी । सुप्रीम कोर्ट इससे अधिक क्या कर सकता है… सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो दिल्ली में कभी CNG लागू नहीं होता, सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो दिल्ली के भ्रष्ट शासक और उतने ही बेईमान अतिक्रमणकर्ता बेशर्मी से कब्जा जमाये रहते और सीलिंग कभी नहीं होती.., सुप्रीम कोर्ट ना होता तो मायावती ताजमहल भी बेच खाती… ऐसे अनेकों उदाहरण हैं कि यदि सुप्रीम कोर्ट ना हो तो ये नेता समूचे देश को SEZ (Special Exploitation Zone) बना डालें.. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की भी एक सीमा है.. फ़िर हमारी नजर जाती है राष्ट्रपति पर..बात आती है अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने की तो हमारे यहाँ जैल सिंह को छोडकर कोई भी “मर्द” राष्ट्रपति नहीं हुआ जो सरकार के अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से मना कर दे, और यदि वह मना कर भी दे तो लोकसभा में बैठे 525 गधे (या शायद 540..क्या फ़र्क पडता है) उसे फ़िर पास करके वापस भेज देंगे और फ़िर राष्ट्रपति को उस पर दस्तखत करना ही होंगे । जबकि कम से कम राष्ट्रपति ऐसा तो कर ही सकता है कि वह विवादित अध्यादेश को अनिश्चितकाल के लिये विचाराधीन रख ले.. विचार करने की सीमा पर लोकसभा की कोई पाबन्दी नहीं है इसलिये राष्ट्रपति को चाहिये कि वे अपने कार्यकाल की समाप्ति तक उक्त अध्यादेश पर “विचार” करते ही रहें… करते ही रहें.. फ़िर उनका कार्यकाल समाप्त होने के पश्चात वह अध्यादेश स्वतः ही समाप्त हो जायेगा और नये राष्ट्रपति के चुने जाने और आने तक बात टल जायेगी, फ़िर से लोकसभा को उसे पास करके विचारार्थ और हस्ताक्षर करने राष्ट्रपति के पास भेजा जायेगा.. फ़िर चाहे तो अगला राष्ट्रपति उस अध्यादेश पर पाँच साल तक बैठ सकता है । जैसे वे इस वक्त वे अफ़जल के केस में उस पर कुंडली मारे बैठे हैं..उसी तरह हम गरीबों के हक के लिये वे क्यों नहीं सरकार के सामने अपनी कमर सीधी करते ?

लेकिन यदि आजादी के साठ वर्षों बाद भी जनसंख्या नियंत्रित नहीं हो पाई, प्राथमिक शाला के अभाव में चालीस प्रतिशत निरक्षर हैं, नेहरू के जमाने से पुष्पित-पल्लवित हुआ भ्रष्टाचार अब लोकाचार बन गया है.. तो इसमें आम आदमी की क्या गलती है ? सजा मिलनी किसे चाहिये और मिल किसे रही है… यही है हमारा आज का “शाईनिंग इंडिया”… यानी सो कॉल्ड “मेरा भारत महान”…