>अंग्रेजी मानसिकता का तिरस्कार ही सही मायने में आजादी के पर्व को मनाना है

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15 अगस्त 1947 का हमारे जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है, क्योंकि इस दिन हमारा देश आज़ाद हुआ था। इस दिन हमें अंग्रेजों से तो आज़ादी मिल गई लेकिन हम आज भी उनके मानसिक और भाषाई गुलाम हैं, उनकी भाषा और उनकी सोच आज तक हमारे ह्रदय में रची-बसी हुई है। उन्होंने जब तक हम पर राज किया “फूट डालो और शासन करो” को नीति को अपनाया और जाते-जाते भी दुश्मनी का बीज बोकर गए। एक तरफ हिन्दुस्तान आज़ाद हो रहा था और दूसरी तरफ हमारे देश का ही एक टुकड़ा हमसे जुदा हो रहा था, या यह कहा जाए कि जुदा किया जा रहा था। यह एक सोच-समझी साजिश के तहत हुआ था, ताकि कभी हमारा देश अंग्रेजों के मुकाबले खड़ा नहीं हो सके। कितनी अजीब बात है कि जिस देश को आज़ाद करवाने के लिए हर मज़हब और कौम के लोगों ने कंधे से कंधा मिलाकर जंग लड़ी और अपनी जान कुर्बान की, जब वह देश आज़ाद हो रहा था हमारे देश के लोग खुशियाँ मानाने की जगह एक-दुसरे की नफरत में लिप्त थे। अंग्रेज़ जाते-जाते भी हमें तबाह और बर्बाद करने की इरादे से नफरत के बीज हमारे अन्दर बो गए थे। इसी नीति पर अमल करते हुए हमें आज तक लडवाया जा रहा है. पाकिस्तान को उसकी उलटी-सीढ़ी हरकतों के बावजूद अमेरिका, इंग्लैण्ड जैसे देशों के द्वारा मदद उसकी मदद करना इसका जीता-जागता सबूत है। स्वयं हमारे देश में भी इनके एजेंटों के द्वारा हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाईयों को आपस में लड़वाने की कोशिशें जारी हैं।

इस विषय पर हिन्दुस्तान लाइव पर छपा यह लेख बहुत ही महत्त्व रखता है.

जब गांधीजी ने नहीं मनाया आजादी का जश्न…

पूरा देश 15 अगस्त 1947 को जब आजादी का जश्न मना रहा था उस समय एक शख्स ऐसा भी था, जो ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्ति के इस महोत्सव में शामिल नहीं था। वह बड़ी खामोशी के साथ राजधानी दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर कलकत्ता (अब कोलकाता) में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच शांति और सौहार्द कायम करने के काम में प्राणपण से लगा हुआ था।

वह शख्स कोई और नहीं बल्कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे, जिन्होंने आजादी के दिन को अनशन करके मनाने का फैसला किया। आजादी से कुछ सप्ताह पहले की बात है। पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल ने कलकत्ता में गांधी जी के पास अपना दूत भेजा, जो आधी रात को वहां पहुंचा। उसने गांधी जी से कहा कि वह पंडित नेहरू और सरदार पटेल का एक महत्वपूर्ण पत्र उनके लिए लाया है। गांधी जी ने उससे पूछा कि क्या उसने भोजन किया है। उसके नहीं कहने पर उन्होंने पहले उसे भोजन कराया और फिर पत्र खोलकर देखा। उसमें लिखा था- बापू, आप राष्ट्रपिता हैं। 15 अगस्त 1947 पहला स्वाधीनता दिवस होगा। हम चाहते हैं कि आप दिल्ली आकर हमें अपना आशीर्वाद दें।

पत्र पढने के बाद महात्मा गांधी ने कहा- कितनी मूर्खतापूर्ण बात है। जब बंगाल जल रहा है। हिन्दू और मुस्लिम एक-दूसरे की हत्याएं कर रहे हैं और मैं कलकत्ता के अंधकार में उनकी मर्मान्तक चीखें सुन रहा हूं तब मैं कैसे दिल में रोशनी लेकर दिल्ली जा सकता हूं। बंगाल में शांति कायम करने के लिए मुझे यहीं रहना होगा और यदि जरूरत पड़े तो सौहार्द और शांति सुनिश्चित करने के लिए अपनी जान भी देनी होगी।

गांधी जी उस दूत को विदा करने के लिए बाहर निकले। वह एक पेड़ के नीचे खडे थे तभी एक सूखा पत्ता शाख से टूटकर गिरा। गांधी जी ने उसे उठाया और अपनी हथेली पर रखकर कहा- मेरे मित्र, तुम दिल्ली लौट रहे हो। पंडित नेहरू और पटेल को गांधी क्या उपहार दे सकता है। मेरे पास न सत्ता है और न सम्पत्ति है। पहले स्वतंत्रता दिवस के मेरे उपहार के रूप में यह सूखा पत्ता नेहरू और पटेल को दे देना। जब वह यह बात कह रहे थे तब दूत की आंखें सजल हो गईं।

गांधी जी परिहास के साथ बोले- भगवान कितना दयालु है। वह नहीं चाहता कि गांधी सूखा पत्ता भेजे। इसलिए उसने इसे गीला कर दिया। यह खुशी से दमक रहा है। अपने आंसुओं से भीगे इस पत्ते को उपहार के रूप में ले जाओ।

आजादी के दिन गांधी जी का आशीर्वाद लेने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री भी उनसे मिलने गए थे। गांधी जी ने उनसे कहा- विनम्र बनो, सत्ता से सावधान रहो। सत्ता भ्रष्ट करती है। याद रखिए, आप भारत के गरीब गांवों की सेवा करने के लिए पदासीन हैं।

नोआखाली में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्द कायम करने के लिए गांधी जी गांव-गांव घूमे। उनके पास धार्मिक पुस्तकें ही थीं। उन्होंने सभी हिन्दुओं और मुसलमानों से शांति बनाए रखने की अपील की और उन्हें शपथ दिलाई कि वे एक-दूसरे की हत्याएं नहीं करेंगे। वह हर गांव में यह देखने के लिए कुछ दिन रुकते थे कि जो वचन उन्होंने दिलाया है, उसका पालन हो रहा है या नहीं।

उसी दौरान एक गांव में दिल को छू लेने वाली घटना हुई। गांधी जी ने उस गांव के हिन्दुओं और मुसलमानों से कहा कि वह सामूहिक प्रार्थना के लिए अपनी झोपड़ियों से बाहर निकल आएं और शांति के लिए सामूहिक शपथ लें लेकिन कोई भी बड़ा-बूढ़ा बाहर नहीं निकला। गांधी जी ने आंधे घंटे तक इंतजार किया लेकिन उसके बाद भी जब कोई हिन्दू या मुसलमान बाहर नहीं आया तो उन्होंने अपने साथ लाई गेंद दिखाकर गांव के बच्चों से कहा- बच्चों, आपके माता-पिता एक-दूसरे से डरते हैं लेकिन तुम्हें क्या डर है। हिन्दू और मुसलमान भले एक-दूसरे से डरते हों लेकिन बच्चे निर्दोष हैं। तुम भगवान के बच्चे हो। मैं तुम्हें गेंद खेलने के लिए बुला रहा हूं।

यह सुनकर बच्चे उस मंच की तरफ बढ़ने लगे जहां गांधी जी बैठे थे। गांधी जी ने गेंद उनकी तरफ फेंकी तो लड़के और लड़कियां भी उनकी तरफ गेंद वापस फेंकने लगे। आधे घंटे तक गेंद खेलने के बाद उन्होंने ग्रामीणों से कहा- तुममें साहस नहीं है। यदि तुम ऐसा साहस चाहते हो तो अपने बच्चों से प्रेरणा लो। मुस्लिम समुदाय से जुड़ा बच्चा हिन्दू समुदाय से जुड़े बच्चे से भयभीत नहीं है। इसी तरह हिन्दू बच्चा मुस्लिम बच्चे से नहीं डरता है। सब एक साथ आए और मेरे साथ आधे घंटे तक खेले। मेहरबानी करके उनसे कुछ सीखो। यदि तुममे आंतरिक साहस नहीं तो अपने बच्चों से कुछ सीखो।

गांधी जी के यह कहने पर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बड़े-बूढे धीरे-धीरे अपने घरों से निकलने लगे और देखते-देखते वहां बड़ी भीड़ इकट्ठा हो गई और उन्होंने उन्हें शपथ दिलाई कि वे एक-दूसरे की हत्या नहीं करेंगे।

नोआखाली में गांधी जी के साथ घटी एक घटना से उनकी निर्भयता, धैर्य, सहनशीलता और क्षमाभाव का पता चलता है। एक गांव में गांधी जी की प्रार्थना सभा चल रही थी उसी दौरान एक मुस्लिम व्यक्ति अचानक उन पर झपटा और उनका गला पकड़ लिया। इस हमले से वह नीचे गिर पड़े लेकिन गिरने से पहले उन्होंने कुरान की एक सुंदर उक्ति कही, जिसे सुनकर वह उनके पैरों पर गिर पड़ा और अपराध बोध से कहने लगा- मुझे खेद है। मैं गुनाह कर रहा था। मैं आपकी रक्षा करने के लिए आपके साथ रहने के लिए तैयार हूं। मुझे कोई भी काम दीजिए। बताइए कि मैं कौन सा काम करूं।

गांधी जी ने उससे कहा कि तुम सिर्फ एक काम करो। जब तुम घर वापस जाओ तो किसी से भी नहीं कहना कि तुमने मेरे साथ क्या किया। नहीं तो हिन्दू-मुस्लिम दंगा हो जाएगा। मुझे और खुद को भूल जाओ। यह सुनकर वह आदमी पश्चाताप करता हुआ चला गया।

महात्मा गांधी के भगीरथ प्रयासों से नोआखाली में शांति स्थापित हो गई। उनके शांति मिशन की कामयाबी पर लॉर्ड माउंटबेटन ने 26 अगस्त 1947 को उन्हें एक पत्र लिखा जिसमें उनकी सराहना करते हुए कहा गया – पंजाब में हमारे पास पचपन हजार सैनिक हैं लेकिन वहां बड़े पैमाने पर हिंसा हो रही है। बंगाल में हमारी फौज में केवल एक आदमी था और वहां कोई हिंसा नहीं हुई। एक सेवा अधिकारी और प्रशासक के रूप में मैं इस एक व्यक्ति की सेना को सलाम करना चाहूंगा।

नफरत की दीवारों को तोड़े बिना देश की वास्तविक आजादी असंभव है। अंग्रेजी मानसिकता का तिरस्कार ही सही मायने में आजादी के पर्व को मनाना है।

ब्लॉग संसद और मेरी ओर से सभी देशवासियों को स्वंतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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