>बीबीसी संवाददाता सुहैल हलिम के ब्लॉग को पढ़कर एक चिट्ठी उनके और उस ब्लॉग पर टिप्पणी करने वालों के नाम

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सुहैल साहब ,नमस्कार !

शिवसेना के मुद्दे पर आपका ब्लॉग पढ़ा .आपने काफी साफगोई से सारी बात रखी पर, शायद कुछ भाइयों को इस व्यंग में शिवसेना की तरफदारी नज़र आई तो इस पर क्या कहा जाए . खैर एक अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से जुड़े आदमी का ब्लॉग मैं कैसे बातें कही जानी चाहिए आपने इसका खूब ख्याल रखा है . पर मुझे इस ब्लॉग के शीर्षक और पोस्ट में कोई तारतम्य नज़र नहीं आया . माफ़ कीजियेगा . ….. वैसे जब शिवसेना की बात हो रही है तो मराठी मानुष के नाम पर हो रहे तमाम कारनामों से सभी परिचित है . शिवसेना को ऐतराज जताने का पूरा हक़ है और शाहरुख़ को भी लेकिन उन्हें यह अधिकार नहीं कि किसी की फिल्म चलने से रोकें ……. इतने कमेन्ट आये पर किसी ने सोनिया ब्रिगेड का नाम तक नहीं लिया जिनके युवराज बिहार में भारतीयता का दंभ भरते हैं और महाराष्ट्र में उन्हीं की सरकार है , क्या यह उनका दोहरापन नहीं है ? वैसे दरभंगा में राहुल का जो हश्र हुआ वह उनके युवा राजनीति को जान्ने के लिए काफी है ………. शिवसेना या मनसे को बढ़ावा देने वाले हम और और हीं हैं जिन्होंने आज तक कांग्रेस की विभाजक नीतियों का विरोध नहीं किया . उलटे हमेशा वोट बैंक की तरह खुद को उपभोग होने दिया . पौव्वा पीकर ,ठेकेदारी लेकर ,पैसे खाकर , सिफारिश करवाकर आदि -आदि अपने हितों में दूर का नुकसान भूल गये . क्यों भूल जाते हैं हम पंजाब से लेकर अयोध्या तक की घटना जिन्हें आज मीडिया और प्रधानमंत्री तक राष्ट्रीय शर्म कह रहे हैं वह बहुत इसी कांग्रेस के वोट बैंक की राजनीति का परिणाम है . वैसे आज जनसत्ता में छपा पुन्य प्रसून वाजपेई का लेख पढियेगा जिसमें राहुल गाँधी के युवा अभियान की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी गयी है .राहुल गाँधी ब्यान दे रहे हैं कि मुंबई हमले में बिहारी सैनिकों ने अपना योगदान दिया . अरे ,शर्म आती है ऐसे युवा नेता पर जो भारतियों को बिहारी और मराठी के तराजू में तौल कर देश को बाँट रहे हैं . ऐसे छद्म लोगों को शिवसेना या मनसे का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है जिनकी सरकार खुद भाषा के आधार पर भेद-भाव वाला कानून पारित करती हो , जिनके शासनकाल में एक असहाय महिला को अधिकार इसलिए नहीं मिलता क्योंकि इससे वोट बैंक भड़क जाता है और उसी समय दूसरे समुदाय को खुश करने के लिए एक विवादित ढांचे का टला खोल दिया जाता है जो आज तक भारत की नाक का घाव बना हुआ है . क्या हम दोषी नहीं है जो उत्तर भारतीयों अथवा हिंदी भाषियों पर हो रहे अत्याचार और भेदभाव का रोना तो रोते हैं परन्तु राहुल गाँधी की पूंछ सहलाने से बाज नहीं आते ? जरा , सोचियेगा कभी आज सारी विघटनकारी शक्तियों के उभरने में किसकी अहम् भूमिका है ?


>२६/११ की गौरवपूर्ण घटना और चूतिया नंद की कथा

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कल २६/११ की बरसी को भारतवर्ष के चुनिन्दा शहरों में चुनिन्दा टीवी चैनलों और टेलीकोम कंपनियों के माध्यम से सवेदनशील जुझारू देशभक्तों ने , जो राष्ट्र की रक्षा के लिए कर्मठता पूर्वक मोमबत्ती और मोबाइल थामे खड़े रहे , बड़े हीं धूमधाम और हर्षौल्लास के संग मनाया ! असीम गौरव के इस राष्ट्रीय गर्व के पर्व को हर साल मनाया जाएगा ऐसी उम्मीद करता हूँ ! २६/११ की गौरवपूर्ण घटना के दौरान प्रशांत प्रियदर्शी द्वारा लिखे गये एक पोस्ट को आप दुबारा पढ़िए जो नीचे पुनः पोस्ट कर रहा हूँ ………….

अथ चूतिया नंद कथा

ये कथा है एक ऐसे महानुभाव कि जिन्होंने एक ऐसे शहीद और कर्तव्यनिष्ठ जवान पर अंगुली उठाई है जिसका कर्जदार यह समूचा देश सदियों तक रहेगा.. मैं हमारे पूर्वजों को धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने चूतिया कह कर किसी प्राणी को पुकारा नहीं, नहीं तो यह उस जीव के अधिकारों का हनन होता.. कुत्ते अपने आप में वफादार होते हैं और सूअर भी गंदगी साफ करने में सहायता ही करते हैं.. इन्हें यह नाम देकर मैं इन जानवरों को गालियां नहीं देना चाहता हूं..

वैसे इस श्रेणी में कुछ पत्रकार नाम के ह्रिंस पशु भी हैं जो अभी भी लाल सलाम को सलामी देकर इसे प्रमुखता ना देकर इधर-उधर कि ज्यादा खबरें देकर अपना टीआरपी बटोरना चाह रहे हैं.. कारण साफ है, आखिर संत चुतिया नंद भी लाल सलामी देने वालों के अगुवा जो ठहरे.. ये तथाकथित बुद्धीजीवियों का बस चले तो लगे हाथों पूरे भारत को चीन के हवाले करके सलामी पे सलामी देते रहें..

जहां तक स्वर्गीय मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की बात है तो वो जब जीते थे तब भी भारत कि एकता के मिशाल थे और शहीद होने के बाद उनकी कहानी बच्चे-बच्चे तक पहूंच गई.. कारण साफ है.. वो रहने वाले थे केरल के.. पदस्थापित थे बिहार के दानापुर में बिहार रेजिमेंट में.. आतंकियों से मुकाबला करने को उड़ान भरी दिल्ली से.. शहीद हुये मुंबई में.. और अंत्येष्टी हुआ कर्नाटक में.. अब इससे बड़ी और क्या मिशाल दिया जाये उनकी और भारतीय एकता की?

मैं सलाम करता हूं उस मुसलिम भाई को भी जो परदे के पीछे रह कर नरीमन हाऊस मामले में हमारे जांबाज कमांडो कि मदद अपने जान पर खेल कर दी.. जिसने पूरे नरीमन हाऊस का नक्सा बना कर हमारे कमांडो को दिया और पूरे 59 घंटे तक कमांडो कार्यवाही में कमांडो के साथ रहा.. कुछ इस तरह गुमनामी में रहकर उन्होंने यह काम किया कि मुझे उनका नाम भी याद नहीं आ रहा है.. भला हो अगर कोई मुझे उनका नाम याद दिला दे, आगे से नहीं भूलूंगा.. मैं सलाम करता हूं उन मुल्लाओं को भी जिन्होंने मारे गये आतंकवादियों को भारत में दफनाने के लिये जगह ना देने कि घोषणा भी कि..

इधर एक और लाशों के खिलाड़ी चुनाव सामने देखकर केरल कि गलती के लिये माफी मांग रहे हैं, पता जो है उन्हें कि चुनाव सामने ही है.. जिस जगह से माफीनामा आया है आखिर आज वहां चुनाव प्रचार का आखिरी दिन जो है..

अंत में – मेरा अपना यह मानना है कि जहां तर्क कि सीमा खत्म होती है वहां से गालियों कि सीमा शुरू होती है॥ और मैं यह स्वीकार करता हूं कि मेरी नजर में ऐसे खूंखार नमक हरामों और आतंकवादियों को बिना किसी तर्क और सबूतों के गोली से उड़ा देना चाहिये.. मगर यह भी जानता हूं कि ऐसा नहीं होने वाला है.. फिलहाल तो मेरी तर्क कि सीमा खत्म होती है और मुझे अपने द्वारा किये गये इस तरह कि गंदी भाषा प्रयोग पर कोई दुख नहीं है..

साभार : मेरी छोटी सी दुनिया

>"Hindi bhasha google group" में चल रहे विवाद से सबक लेना चाहिए ब्लॉग जगत को

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अंतरजाल पर आजकल विवादों का चलन बढ़ गया है . किसी भी बात को लेकर लोग टीका- टिप्पणी शुरू कर देते हैं फ़िर शुरू होता है आरोप -प्रत्यारोप का दौर . चिट्ठों पर तो दर्जनों पोस्ट व्यक्तिगत लड़ाई में लिखी जा रही है .और गौर करें तो अक्सर बहस हिन्दू -मुस्लिम की ओर , महिला-पुरुष , दलित-सवर्ण की ओर पहुँच जाती है भले ही मुद्दा कुछ भी हो .लेकिन कुछेक सार्थक बहस भी हो रही है  उदाहरण के लिए  ‘हिंदी भाषा’  पर चल रहे इस विवाद को हीं लीजिये :
                                                  एक सज्जन दिनेश सरोज ने शुभकामना क्या भेजी बबाल हो गया :
                                                       हर दुआ कुबूल हो आपकी,
हर तमन्ना साकार हो,
महफिलों सी रहे रोशन जिंदगी,
कभी न जीवन में वीरानी हो,
हमारे तरफ से आप सभी को
   “नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ”/“ईद मुबारक हो!!”

                                                      शुभकामना सन्देश को पढ़कर मोहन भैया ने ये कहा :
नवरात्र  की शुभकामनाये  तो  ठीक   है   पर  दूसरी ….?  क्यों ? जबकि 15 अगस्त  और  26 जनवरी को  उनकी  भीड़
इतनी  नहीं  होती  जितना  वो  लोग  ताजमहल   और  रोड्स  पर  करते  है ,,,,? इसका  क्या  मतलब  हुआ   यह  समझ  के  बाहर  है ? साथ  ही  वे  लोग  हमारे  किसी  त्यौहार  की  शुभकामनायें  पब्लिकली  नहीं  देते ….? सोचिये …..वर्ना  जो  लोग  पोलियो  ड्रोप्स / परिवार  निओजन  / नागरिकता  के  बारे  में  घम्भीर  नहीं  है  और  दिन  दूनी  रत  चौगुनी  अपनी  संख्या  बढा  रहे  हैं  और  यही  रफ्तार  रही  तो  बहुत  जल्दी  वो  ही  दिखेंगे  भारत  में  हम  नहीं  रहेंगे ….जैसा  कुछ  दिन  पहले  इंडियन  मुजाहिद्दीन  ने  हमारे  न्यूज़  पपेर्स  में  विगय्प्ती  प्रकाशित  करवाई  की  5 साल  में   भारत  से  हिंदूं  का  नाम  निशान  मिटा  देंगे ..? कहाँ  है  हमारी  भारतीयता  की  भावना ….नागरिकता  की  भावना ..? या  गुलामी  और  मस्का परस्त  ही  हमारी  पहचान  बन  गई  है ….?
-एक   भारतीय  नागरिक .
मोहन भैया ने परिवार नियोजन की बात तो सही कही है लेकिन ईद की शुभकामना पर सवाल उठाना उचित नहीं लगता . हमें कोई काम नहीं पसंद तो ना करें पर दूसरों को रोक नहीं सकते . 
                                                              
                                                    आगे चलिए रजिया मिर्जा अपनी प्रतिक्रिया में कहती हैं :

बेशक़!! जो भारतीय अपने आपको हिन्दुस्तानी कहलाना मंज़ूर नहिं करते उन्हें भारत में रहना ही नही चाहिये। बताईये कौन सा मज़हब-धर्म  वतन से नफरत सिखाता है? मैं उसे धर्म- मज़हब नहिं क्हुंगी। हम सब भारतीय ही हैं। और रहेंगे। ईस देश को तोडनेवाली ताक़्तों से नफरत है मुझे। मेरा हिन्दुस्तान “महान” है। जहां मेरा जन्म हुआ वो भारत को मेरा सलाम है।

                                       बहुत हीं सही बात कही रजिया ने परन्तु क्या लोग ऐसा समझते हैं ? 

                                 बहस में एक और जनाब मंसूर अली पधारे और शुभकामना दे चलते बने :

नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ…..तमाम  भारतवासियों  को  चाहे  वोह  किसी  भी  धर्म  अथवा  जाती  का  हो . धन्यवाद !

                                       चलो कुल मिलकर बहस सही दिशा में जाती दिख रही है .आपको क्या लगता है ?

                                     पुनः दिनेश जी, मोहन जी को संबोधित करते हुए आपने सधे शब्दों में बातें रखते हैं :

प्रिय मोहनजी,

आपकी वतनपरस्ती एवं उससे जुडी चिंता के लिये आपको सलाम!!!

आपकी चिंता एवं उसके उपलक्ष्य में आपने जो ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात कही है मैं भी उससे इत्तेफाक रखता हूँ| परन्तु १५ अगस्त एवं २६ जनवरी में इकठ्ठे भीड़ में से आप किसी हिन्दू, मुस्लिम या किसी ईसाई को पृथक कैसे कर पायेंगे? क्या ऐसा कोई चस्मा है? क्या कहीं भीड़ के आंकड़े निर्दिष्ट किये हुए है? या हम बस ऐसा मान लेते है और अपने मन में अवधारणा बना लेते है|

जब आप ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात करते हैं, तब शायद आप यह भूल जाते है या यूँ कहे की नजरअंदाज कर देते है की उससे कहीं कहीं ज्यादा भीड़ मुंबई एवं अन्य जगहों पर गणेश पंडालों में गणेश जी के दर्शन के लिए उमड़ती है तथा चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन करने आये श्रध्हलुओं की होती है, जिसे संभालना प्रशासन के लोगों के लिए सिरदर्द बन जाता है| मुंबई के जन्माष्टमी को भी शायद आप भूल गए जिसमे इस बार swine flu के संक्रमण के भय के बावजूद भी भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी| एसे और भी कई उधाहरण मैं प्रस्तुत कर सकता हूँ जैसे कुम्भ का मेला ईत्यादी| क्या आपने कभी क्रिकेट मैच में जुटे भीड़ को उनके जाती-धर्म के आधार पर आंकने की कोशिश की है?

आज भारत देश एक धर्म निरपेक्ष देश के रूप में अपनी संप्रभुता बना चुका है…. और भारतीय संविधान ने सभी धर्मों को उनकी संप्रभुता और स्वतंत्रता बनाये रखने का पुर-पूरा अधिकार दिया है|
और इसपर न ही आप ना ही मैं और ना ही कोई और प्रश्न उठा सकता है|

और रही “इंडियन मुजाहिद्दीन” के ५ सालों में हिन्दुओं का नामों निशां मिटाने की तो उसके लिए आप निश्चिंत रहें…. ऐसी कोशिशे सदियों से होती आ रही हैं पर सदा ही नाकाम भी होती रही हैं!!! भारतीय संस्कृति इतनी उदार और परिपक्कव है की यह सभी को अपने में समाहित कर लेती है!!!

कोई भी जागरूक माता-पिता अपने बच्चों को पोलियो टिका से वांच्छित नहीं रखेंगे …. और यदि कोई रखता है तो मैं समझता हूँ वे नासमझ हैं, उन्हें जागरुक बनाने की जरुरत है| इसे धर्म-जाती के  आधार से देखना मुझे तर्क सांगत लगता है| और यदि कोई धार्मिक गुरु पोलियो टिका न देने की सलाह या फतवा देता है तो  मैं इसे धर्मान्धता और अज्ञानता ही कहूँगा|

परिवारनियोजन एक गंभीर मुद्दा है, जिस तरह जनसँख्या विस्फोट हो रहा है यह निकट भविष्य के लिए बहुत ही बड़ी समस्या बनता जा रहा है| पर मैं फिर कहना चाहूँगा इस विषय को भी एक रंग के चश्मे से न देखें| आपको केवल मुस्लिम परिवार ही नहीं अपितु हर धर्म के परिवार मिल जायेंगे जो बच्चों को ईश्वर का रूप कहते हैं और परिवार नियोजन के नाम से कन्नी काटते हैं| मैंने एक हिन्दू धर्मगुरु (किसी का नाम नहीं लेना चाहूँगा) के पुस्तक में उन्हें यह सन्देश देते पाया है की भारत देश में हिन्दुओं की संख्या बढाइये सरकार के परिवार नियोजन को तवज्जो न दें? इसके बारे में आप क्या कहेंगे??? मैं तो इसे धर्मान्धता ही कहूँगा फिर चाहे कोई भी धर्म गुरु ऐसा क्यों न कहे|

रही भारतीय नागरिकता की बात, तो भाईजी, तो जो मुस्लिम खुद को भारतीय या हिन्दुस्तानी कहलाना पसंद नहीं करते थे (या जैसी भी परिस्थिति रही हो) १९४७ में ही भारत छोड़ चले गए थे| और जो देश छोड़ कर नहीं गए यहीं रह गए आप उन्हें देशप्रेमी कहने के बजाय उन्हें एक विशेष रंग के चश्में से देख रहे हैं!!! यह कहाँ तक तर्कसंगत है??? आप यह भूल जाते हैं की मुस्लिमों के आलावा  कुछ गैर मुस्लिम (हिन्दू, सिख एवं अन्य) १९४७ में भारत नहीं आये थे और जहां थे वहीँ बसे रहे, उन्हें अपनी जन्मभूमि से प्रेम था चाहे अब वह अखंड भारत देश का हिस्सा न रहा हो| उनका मैं सम्मान करता हूँ| और जो मुस्लिम यहाँ रह गए हैं उनका भी सम्मान करता हूँ|

कृपया हमारे राजनीतिज्ञों एवं तथाकथित कट्टरपंथीयों की तरह अखंड भारत देश को जाती-धर्म के चश्में से मत देखें| कम से कम मैं इतना कह ही सकता हुं की मेरे जितने भी गैर हिन्दू मित्र या जानने वाले लोग हैं वे मुझे हर हिंन्दु धार्मिक त्योहारों की शुभकामना के साथ साथ स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस की बधाई देते है| और मैं इसी पर विश्वास करता हुं| और तो और कुछ तो मेरे साथ मंदिरों में आकर प्रार्थना करने में जरा भी संकोच नहीं करते| और मैं स्वयं भी दरगाहों, मजारों, गिरिजाघरों में उसी श्रध्दा से जाता हूँ जैसे की मंदिरों में|

मैं सर्वधर्म समभाव में यकीन रखता हूँ, और हर धर्म को सामान रूप से आदर भी देता हूँ| और मेरा सभी महानुभावों से निवेदन है की मानव धर्म को सभी जाती-धर्मों से सर्वोपरि समझे| वैस हर इंसान अपनी विचारधारा के लिए स्वतंत्र है| सुनी-सुनाई बातों में कितना सत्य है या कितनी छलावा यह मैं नहीं कह सकता| hindibhasha Group पर भी गैर हिन्दू मित्र हिन्दू त्योहर्रों की बधाई देते रहे हैं यह तो आपने भी देखा होगा|

अंत में मैं यह भी कहना चाहूँगा की बिना आग के धुआं नहीं निकलता, कुछ चंद मुठ्ठी भर एसे लोग भी यकीनन हैं जो भारत देश की संप्रभुता को क्षति पहुँचाने में जुटे हुए हैं और लगातार प्रयास करते रह रहे हैं, जिस कारण हमें अक्सर कई आतंकवादी हमलों एवं सांप्रदायिक तनाव का सामना करना पड जाता है| परन्तु किसी परिवार के रसोई घर के चूल्हे में लगी आग से निकले धुएँ को किसी आतंकी हमले में हुए विस्फोटों का धुंआ समझ लेना कितना तर्कसंगत है???

मैं किसी के भावना को आघात पहुँचाना नहीं चाहता, और यदि जाने अनजाने ऐसा कुछ हुआ हो तो क्षमा प्रार्थी हुं!!!

रहीमन धागा प्रेम का,मत तोड़ो चटाकाई|टूटे से फिर ना जुड़े,जुड़े गाँठ परि जाई|| जय हिंद !!!

फिलहाल तो यह बहस जारी है ……………………… . क्या ब्लॉगजगत को इस बहस से कुछ सीख लेने की जरुरत है ? सवाल पर जरा मंथन कीजियेगा . 
अरे , साहब मैं बेकार की नसीहत नहीं दे रहा हूँ . आपने अपने ब्लॉगजगत की बहस को देखा है तो समझते होंगे . यहाँ ऐसे-ऐसे सूरमा हैं कि बस पूछो मत ! एक जनाब हर जगह धमकी देते हैं “:- फुरसत में आउंगा तेरी तरफ, रोंद डालूंगा तब तक मुंह बंद करले और विचार कर ”  पर फुर्सत में कब आयेंगे पता नहीं ? पोस्ट कुछ भी बात वहीँ करेंगे जो उनको बकना है . एक दुसरे के नाम से पोस्ट लिख -लिख कर लोकप्रियता की उचाइयों को छूना चाहते हैं ! अब हिंदी चिट्ठों  का भगवान् ही मालिक है .

>बटला हाउस मुठभेड़ और आईबीएन वाले आशुतोष की पोस्ट

> कल उन्नीस सितम्बर था .पिछले साल इसी दिन बटला हाउस मुठभेड़ हुआ था जिसमें जामिया के छात्र जिन पर आतंकी होने का आरोप है , मारे गये थे । उसी मुठभेड़ में मोहन चंद शर्मा की शहादत भी हुई थी । ( ध्यान रहे , अगर भविष्य में कभी मुठभेड़ को फर्जी साबित कर दिया जाए तब भी वो शहीद हीं कहलायेंगे क्योंकि वो तो घर से देश की रक्षा करने निकले थे ) उस चर्चित काण्ड की बरसी पर ३० सितम्बर ०८ को लिखे गये आईबीएन के पत्रकार आशुतोष की इस पोस्ट को फ़िर से प्रकाशित कर रहा हूँ । इस मुद्दे पर एक बार फ़िर से बहस की जरुरत हैं क्योंकि कल-परसों हीं राष्ट्रीय जेहाद पार्टी के एक विधायक इसी नाम पर जीत कर आए हैं । तो पढिये और आशुतोष के सवालों का जबाव खोजिये :-

” जामिया एनकाउंटर और मुस्लिम पहचान

मैंने अनवर से पूछातुम क्या कर रहे हो?

उसने पलटकर पूछाइसका क्या मतलब ?

मैंने कहाअबे जामिया में ये रैली करने की क्या जरूरत है? तुम क्यों नहीं समझते? इससे गलत संदेश जाएगा। भगवान के लिए ऐसा मत करो।

ये सुनते ही अनवर आपा खो बैठा और बोलातुम्हारा क्या मतलब है? कानूनी सहायता देना मूलभूत अधिकार है। मैं उस पर भला कैसे आपत्ति कर सकता हूं। मैंने कहादेखो, कोई भी भला आदमी इस बात पर उंगली नहीं उठाएगा पर यह वह समय नहीं है। ऐसे में जब कोई ये नहीं जानता कि कहां बम फटेगा और हम घर लौटेंगे भी या नहीं तब आप कैसे किसी से समझदारी की उम्मीद कर सकते हैं।

काफी देर गर्मागर्मी होती रही। एक बार तो ऐसा लगा कि दोस्ती खतरे में है। अनवर और मैं 1988-90 में जेएनयू में साथसाथ थे। तब से हम परिवार की तरह हैं। हमारे बीच कई बार काफी नोंकझोंक होती रही, और ढेरों मुद्दों पर हमारे विचार काफी अलगअलग भी रहे लेकिन कभी भी हमारी दोस्ती पर आंच नहीं आयी।

बहसाबहसी में मैंने महसूस किया कि हमारे गुस्से के कारण कुछ और है शायद हम एक दूसरे से जो कहना चाहते हैं वो कह नहीं पा रहे हैं। मैं शायद ये कहना चाहता था कि मुसलमानों के साथ कुछ गड़बड़ है। तुम लोग हमेशा बम फोड़ते हो और वह शायद यह कहना चाहता था कि सरकारी अमले और मीडिया में हिंदुओं का बोलबाला है, जो हमेशा ये सोचते हैं कि मुसलमान आतंकवादी होते हैं और उन्हें सबक सिखाना ही चाहिए इसलिए निर्दोष मुस्लिम आतंकवाद के नाम पर निशाना बनते हैं।

यह वास्तव में अजीब था क्योंकि कट्टरवाद और फिरकापरस्ती से लड़ने का हम दोनों का लंबा इतिहास रहा है। हम दोनों ऐसी ताकतों के खिलाफ जोरदार ढंग से आवाज उठाते रहे हैं। तो फिर ये गरमागर्मी क्यों? मुझे अगली सुबह इस बात का जवाब मिल गया जब मैंने वरिष्ठ पत्रकार और लेजेंडरी संपादक एम जे अकबर का लेख पढ़ा। अकबर ने बड़े दबे छुपे शब्दों में उस बात को लिख मारा जो अनवर नहीं कह पाया। मैं ये साफ कर दूं कि एम जे के प्रति हमेशा से मेरे मन में सम्मान रहा है, जो आज भी है। वे आधुनिक और बेहतर समझ वाले चुनिंदा संपादकों में से एक हैं। लेकिन टाइम्स आफ इंडिया में में रविवार को जो उन्होंने लिखा उसमें और शाह इमाम बुखारी के मुखर बयानों में काफी कुछ समानता मुझे दिखी।

मैं काफी निराश , उदास और परेशान था। मैं जवाब तलाश रहा था। क्या मेरी सोच में कहीं कुछ गड़बड़ है? क्या मैं बदल गया हूं? क्या मैं वही आदमी हूं जो अबतक हिंदू सांप्रदायिकता और उसकी मुस्लिम विरोधी विचारधारा का विरोध करता आया है? आखिर, क्यों मैं अनवर और एम जे की विश्वसनीयता पर शक कर रहा हूं।

सोचते वक्त मुझे जानेमाने पटकथा लेखक जावेद अख्तर का खयाल आया, जिन्होंने एक टीवी डिबेट के दौरान मेरे एक मंझे हुए एंकर संदीप चौधरी को यह कहकर झिड़क दिया था कि उनका सवाल सांप्रदायिक का है। मुझे ठीक से उनका वह सवाल याद नहीं लेकिन इतना याद है कि वह सवाल मुसलमानों और उनकी पहचान को लेकर था। तब मैंने गुस्से में एक हिंदी मैगजीन में एक तीखा लेख लिखा था और सवाल उठाया था कि क्यों आरिफ मोहम्मद खान को सैयद शहाबुद्दीन से 80 के दशक के अंत और 90 के दशक की शुरुआत में मात खानी पड़ी? आखिर क्यों ऐसा हुआ कि वी पी सिंह ने आरिफ मोहम्मद खान को इलाहाबाद जाने से रोक दिया जहां से वे 1988 में लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे लेकिन शहाबुद्दीन का स्वागत किया गया।

अचंभे की बात है कि मुझे इस मुद्दे पर जावेद अख्तर के कभी दोस्त रहे सलीम खान से जोरदार समर्थन मिला। उन्होंने दैनिक भास्कर में मेरे लिखे का हवाला देते हुए एक लेख लिखा था और मेरे कुछ तर्कों से सहमति जताई थी

मुझे यहां ये मानने में कोई संकोच नहीं है कि पिछले काफी समय से मेरे जेहन में ये सवाल रह रह कर गूंज रहा है कि अब मुस्लिम समुदाय के आत्ममंथन का वक्त गया है। समुदाय को खुद से ये सवाल पूछना होगा कि क्या अंदर कहीं कुछ गलत हो रहा है?

आखिर क्यों नैरोबी से दारसलाम, इंडोनेशिया से सूडान, मैड्रिड से मैनहटन, काबुल से कश्मीर, चेचेन्या से चीन तक उनकी पहचान एक ऐसे शख्स की बन रही है जो बम फोड़ता है , धमाका करता?

मुझे मालूम है कि ऐसा कह कर मैं क्या जोखिम मोल ले रहा हूं। मुझे मालूम है कि कुछ लोग यकायक कह उठेंगे कि देखा आशुतोष का चेहरा बेनकाब हो गया, धर्मनिरपेक्षता की आड़ में वो अबतक सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहा था। यही है उसका असली चेहरा। अब उसकी हकीकत सामने आई है। लेकिन मुझे आज इसकी परवाह नहीं।

आज सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर क्यों 20वीं सदी के बेहरतीन दिमागों में से एक सलमान रुश्दी खुली हवा में सांस नहीं ले सकते और क्यों तसलीमा नसरीन देश की सबसे धर्मनिरपेक्ष मानी जाने वाली लेफ्ट सरकार के साए में शांति से नहीं रह सकतीं? आखिर क्यों लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह सिमी पर से बैन हटाने को सही ठहराने की कोशिश करते हैं? ऐसा क्यों होता है कि देवबंद के मौलाना मदनी रामलीला मैदान में आतंकवादी विरोधी रैली का आयोजन करते हैं और आतंकवाद का विरोध करते हैं तो उर्दू प्रेस उनकी आलोचना पर उतर आती है?

कोई ये सवाल भी उठा सकता है कि कट्टरपंथ और फिरकापरस्ती तो हर धर्म में है तो ये हंगामा क्यों? मैं मानता हूं लेकिन थोड़ा फर्क है। हिंदू समाज में अगर भड़काने वाली कट्टरपंथी आवाज है तो वहीं इसके बराबर या कहें इससे भी अधिक मजूबत उदारपंथी आवाज भी है। ईसाईयत में ये जंग धार्मिक कट्टरपंथ काफी पहले हार चुका है। ईसाईयत में ये तय हो चुका है कि धर्म निजी आस्था का मामला है और राजनीति में मजहब के लिये कोई जगह नहीं है। हिंदुत्व और ईसाईयत में अबुल अल मौदूदी जैसे लोग नहीं दिखाई पड़ते जो धर्म और राजनीति का घालमेल करना चाहते हैं। मौदूदी दावा करते हैं कि इस्लाम एक क्रांतिकारी विचारधारा है और एक सिस्टम भी जो सरकारों को पलट देता है।

मेरी नजर में मुस्लिम समुदाय में रैडिकल इस्लाम या राजनीतिक इस्लाम है जो खुद अपने ही लोगों और दुनिया के लिए मुसीबत पैदा कर रहा है। लेकिन हैरानी वाली बात ये है कि इस तथाकथित रैडिकल इस्लाम के खिलाफ कोई पुरजोर आवाज बुलंद नहीं करता ही भारत में और ही दूसरी जगहों पर। उदारपंथियों का एक बड़ा तबका अकसर चुप रहता है या फिर वह इसका इतनी ताकत से विरोध नहीं करता कि पूरा समुदाय इसको सुने।

फरीद जकरिया ने अपनी किताबपोस्ट अमेरिकन वर्ल्डमें लिखा है कि मुस्लिम जगत भी बदल रहा है लेकिन बाकी की तुलना में काफी धीमे। इसमें भी कई ऐसे लोग हैं जो इस बदलाव के विरोध में खडे़ हो खुद को इस तबके का नेता मानने का अहसास पाले बैठे हैं। दूसरी संस्कृतियों की तुलना में इस्लाम के अंदर प्रतिक्रियावादी ज्यादा कट्टर हैंइनमें जड़ता व्याप्त है। हालांकि इनकी संख्या काफी कम है। काफी अल्पसंख्या में हैं।

मैं मानता हूं कि मौदूदी जैसे लोग कम संख्या में हैं। नहीं तो अनवर, साजिद और आर्फीन जैसे मेरे दोस्त नहीं होते लेकिन बदकिस्मती से वे ऐसे कुछ लोगों को बाकी लोगों पर राज करने का मौका देते हैं। मुस्लिम समुदाय के बहुसंख्यक तबके की ये चुप्पी तकलीफदेह है और अब यह चुप्पी काफी जटिल रूप अख्तियार करती जा रही है। यह इसीकांप्लेक्सका नतीजा है कि जामिया नगर कापुलिस एनकाउंटरमुस्लिम बौद्धिक वर्ग के लिये अपनी मुस्लिम पहचान बनाने का जरिया बन जाती है।

मेरा सवाल यह है कि आखिर क्यों एक एनकाउंटर को मुस्लिम समुदाय के ऊपर हमला माना जा रहा है? पुलिस एनकाउंटर कोई नया नहीं है। ये असली या फर्जी दोनों ही होते हैं। यह हर रोज होता है। लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जब कोई आतिफ अमीन मारा जाता है तो हंगामा हो जाता है, प्रदर्शन होते हैं। यहां कोई नंदू मारा जाता है तब जंतरमंतर और जामिया पर रैली क्यों नहीं होती?

मुझे एम जे अकबर को ये बताने की जरूरत नहीं कि एक नकली एनकाउंटर को असली बनाने के लिए पुलिसवाले अकसर खुद को गोली मारते हैं? राजबीर, दया नायक और प्रदीप शर्मा असली गोली चला कर हीरो नहीं बने बल्कि ये अकसर उन लोगों को मारकर हीरो बने है जिनकों इन्होंने पकड़ कर रखा था। मोहनचंद शर्मा भी कोई साधू नहीं था लेकिन एमजे को यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि जामिया नगर एनकाउंटर में एम सी शर्मा पुलिस की गोलियों का भी शिकार हो सकते हैं? मेरा सवाल ये है कि क्या वो एक आम मुसलमान की तरहरिऐक्टकर रहे हैं या फिर देश के एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर। यही सवाल मेरा अपने प्रिय मित्र अनवर से भी है।

ये मेरा अनुमान नहीं बल्कि यकीन है कि दोनों महानुभाव एक नागरिक की तरह व्यवहार नहीं कर रहे हैं और उनके शब्दों में वही कुछ झलक रहा है जो कि जमिया नगर, सराय मीर और आजमगढ़ की सड़कों पर आम मुसलमान की बातों में झलक रहा है। यहां खुले रूप से कहा जा रहा है किकाउंटर टेररिज्मके नाम पर मासूम मुस्लिमों को शिकार बनाया जा रहा है। पहले आम मुसलमान और पढ़ेलिखे मुसलमान में फर्क था। लेकिन अब ये तस्वीर कुछकुछ धुंधली होती दिख रही है। और ये बात परेशान करने वाली है।

भारतीय संदर्भ में क्या इसका ये मतलब है कि मुस्लिम समुदाय में उदारता कम होती जा रही है? मेरा जवाब हैबिग नो फिर ऐसी प्रतिक्रिया क्यों? मैं इसेलिटिल ब्वाय सिंड्रोमकहता हूं। एक ऐसा बच्चा जिसे बारबार उस शैतानी के लिए दोषी ठहराया जाता है जो उसने की ही नहीं। अवसाद के चलते वह जिद्दी और हठी हो जाता हैस्वीकारतावादी और वो चिढ़ कर , तंग आकर , परेशान हो कर कह उठता है – “हां मैंने ही किया है। आप क्या कर लोगे?”

तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा करने और अल कायदा और ओसामा बिन लादेन के उभरने के बाद से उदारपंथी मुसलमानों के दिक्कतें शुरू हो गयीं, उनकी पहचान को खतरा पैदा हो गया है। दुनिया के हर कोने में उन पर लगातार नजर रखी जा रही हैं। उनका नाम आते ही उन्हेअजीब सी नजरोंसे देखा जाता है मानो वो आम इंसान होकर आतंकवादी हों। न्यूयॉर्क हो या नई दिल्ली सब जगह यही हाल है। एक उदारपंथी मुसलमान जानता है कि उसका कट्टरपंथियों की सोच से कोई लेना देना नहीं है।

उसका बम फोड़ों आंतकवादी सोच से दूरदूर तक का कोई वास्ता नहीं है। ही वो ये मानता है कि हिंदूयहूदीईसाई या भारतइस्राइलअमेरिका इस्लाम को नेस्तनाबूद करने के लिये साजिश रच रहे हैं। लेकिन वो कर क्या सकता है। वो असहाय है। उसे मालूम है कि उसकी सुनने वाला कोई नहीं। वो अंदर भी टूट रहा है और बाहर भी उनपर कोई यकीन नहीं कर रहा है कि ये खतरनाक सोच उसकी जिंदगी का हिस्सा नहीं है। और यही असहायता उसके अंदर एक ऐसे कांप्लेक्स को जन्म देती है जिसे हम लिटिल ब्वाय सिंड्रोम कहते हैं।

अनवर मेरे दोस्त, तुम्हें इस सिंड्रोम से बाहर आना होगा क्योंकि अगर तुम मौदूदी और सैयद कुतुब और ओसामा और जवाहिरी जैसी सोच का शिकार हो गए तो इस धर्म का कोई भविष्य नहीं बचेगा जो शांति और क्षमा का पाठ पढ़ाता है। इस आततायी मानसिकता का जोरदार विराध करने का वक्त गया है। अगर अब ऐसा नहीं होगा तो मैं, तुम और एम जे जैसे लोग इतिहास में विलेन के रूप में देखे जाएंगे और हिंदू कट्टरपंथी जैसी ताकतें इस देश पर राज करेंगी।

>"लव जिहाद" सांप्रदायिक भड़ास निकलने का जरिया ….. जरुर पढिये

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अपने जीवन के 17 बसन्त देख चुकी श्रुति (काल्पनिक नाम) को यह नहीं मालूम था कि जो युवक विद्यालय जाते समय रास्ते में मिलता रहा और वे एक दूसरे के काफी नजदीक आ गये थे वह उससे प्रेम नहीं करता है बल्कि पूर्वांचल में चल रहे लव जिहाद का एक जेहादी है और वह उसे दलालों के जरियें खाडी देश के किसी शेख के हाथों बेच देगा। वह खुशकिश्मत थी कि बच गयी अन्यथा उसका भी वहीं हाल हुआ होता जो इस जेहाद की जद में फंस चुकी लड़कियों का हो रहा है।

आजमगढ़ जनपद के अहरौला कस्बे की रहने वाली श्रुति अग्रहरि पिछले एक माह से विद्यालय में पढ़ने जाती तो उसके पीछे एक युवक जो दिखने में स्मार्ट था वह लग जाता था। श्रुति और उसकी आंखे चार हो गयी। और वह उस युवक से प्रेम कर बैठी। वह युवक स्वंय को फूलपुर कस्बे के एक वैश्य परिवार का बताता था। बात शारीरिक सम्बन्धों तक नहीं पहुंची थी।इसी बीच 8 सितम्बर 2009 को श्रुति अचानक लापता हो गयी। परिजनों ने खोजबीन की इसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि उनकी लड़की जौनपुर जनपद खुटहन के शाहगंज थानान्तगर्त अरन्द गांव के निवासी राशिद पुत्र जकरिया व अब्दुल पुत्र सन्तार जो शाहगंज के पक्का पोखरा के पास रहता है उन दोनों के साथ 8 सितम्बर को देखी गयी। इस बात की जानकारी जब परिजनों ने 9 सितम्बर को अहरौला थाने को दी तो थानाध्यक्ष ने कोई कार्यवाही नहीं की। इसके बाद परिजनों और अहरौला के कुछ लोग खुद अब्दुल के घर पहुंच गये और वहां से उसे पकड़कर लाये तथा अहरौला पुलिस को साँप दिया। 9 सितम्बर को जब ग्रामीणों ने आरोपी को खुद ही पुलिस को सौप दिया फिर भी पुलिस 24 घण्टे तक मूकदर्शक बनी रही। इसके बाद जब ग्रामीणों ने 10 सितम्बर को अहरौला थाने में तोड़ फोड़ शुरू कर दी तो पुलिस सक्रिय हुई और आरोपी पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया तो उसने जो रहस्योदघाटन किया उसके बाद तो पुलिस के पैरों तले से जमीन ही खिसक गयी पुलिस बैकफुट पर नजर आने लगी। उसने बताया कि युवती को उसने आजमगढ़ के फूलपुर कस्बे में रहने वाले बसपा नेता और पिछला विधानसभा चुनाव लड़ चुके इमरान खान उर्फ हिटलर के घर में रखा है। पुलिस इमरान खां उर्फ हिटलर के घर पर छापेमारी को लेकर मौन बनी रही। इसके बाद तों अहरौला के निवासियों और युवती के परिजनों ने ही सम्प्रदाय विशेष के प्रबल विरोध के बावजूद हिटलर के घर में घुसकर युवती को बरामद कर लिया और फूलपुर कोतवाली पर लाये। पुलिस सिर्फ तमाशबीन की भूमिका में रही। इसके बाद जब युवती ने बताया कि उसके साथ 10-12 की संख्या में अन्य युवतियां भी उस मकान में थी तो पुलिस को मानों सांप ही सूंघ गया। थाने से मात्र 200 मीटर की दूरी पर स्थित बसपा नेता के उस मकान पर छापेमारी करने में उसने 4 घंटे का समय लगा दिया। इसके बाद जब पुलिस छापेमारी करने पहुंुची तो उस मकान में आदमी तो क्या कोई परिन्दा भी नहीं मिला। इस घटना में राशिद भी पुलिस की गिरफ्त में आया लेकिन पुलिसिया पूछताछ में उसने क्या बताया यह बताने से पुलिस कतराती रही। 17 वर्षीय श्रुति को पुलिस फूलपुर कोतवाली ले गयी। और पहले तो वह उसके चरित्र हनन का प्रयास करती रही लेकिन जब वह अपनी बात पर अड़ी रही तो पुलिस ने मुकदमा दर्ज लिया और आगे की कार्यवाही कर रही है लेकिन वह भी घटना की तह में जाने से कतरा रही है। कारण यह है मामला काफी हाइप्रोफाइल नजर आ रहा है।

श्रुति बताती है कि 8 सितम्बर को जब वह स्कूल से आ रही थी तो उसी समय तीन की संख्या में लोगों ने उसके मुंह पर रूमाल रखकर उसे दबोच लिया। इसके बाद वह बेहोश हो गयी। जब वह होश में आयी तो देखा कि वह एक कमरे में है। उसके शरीर पर बुर्के जैसा वस्त्र है। उसके नाखून काट दिये गये है तथा गले की माला और हाथ का रक्षासूत्र भी काट लिया गया था। कुल मिलाकर उसकी पहचान समाप्त करने की कोशिश की गयी थी। उसके बाद 9 सितम्बर की दोपहर में फिर उसे बेहोश कर दिया गया। इसके बाद वह दूसरे स्थान पर थी। उसके पास खान नामक एक आदमी था जो मोबाइल पर बात कर रहा था कि लड़की को कहा पहुंचायें सर किस रास्ते व कैसे ले जाय इसके बाद पुन:उसे बेहोश कर दिया गया। जब उसे होश आया तो उसने अपने आपकों दूसरे कमरे में पाया जहां 10-12 की संख्या में और भी लड़कियां थी। होश आने के बाद उसे दुसरे कमरे में बन्द कर दिया गया जिसमें एक और महिला थी जिसे खान की बीबी कहा जा रहा था। 10 सितम्बर की सुबह फिर खान ने बात की। सर लड़की को क्या करें बात समाप्त होने के बाद खान की बीबी ने कहा कि मुंह धुल लों। इसके बाद उसने उसे जबरिया नकब पहनाना शुरू कर दिया। इसी बीच हंगामा हुआ और किसी ने दरवाजा खटखटाया फिर शोर हुआ तो मैने खान की बीबी का प्रतिरोध करके दरवाजा खोल दिया। इसके बाद मेरे परिजन मुझे वहां से निकालकर ले गये। इस बात की जानकारी होने के बाद पुलिस ने दुबारा वहां पर छापेमारी करने में 4घण्टे लगा दिये। तब तक वहां कोई नहीं था। प्यार की आड़ में चल रहे इस धंधे को ही लब जिहाद का नाम दिया गया है जिसमें सम्प्रदाय विशेष के युवक येन-केन-प्रकारेण हिन्दु युवतियों को अपने माया जाल में फंसाते है। और अपने बॉस को सौप देते है। बॉस उन युवतियों का क्या करता है यह तो मुख्य सरगना की गिरफ्तारी के बाद ही पता चलेगा। अभी तक पुलिस न तो मुख्य सरगना को गिरफ्तार कर सकी है और न ही इस प्रयास में ही दिखाई दे रहीं है ताकि लब जिहाद के मुख्य सरगना को दबोचा जा सके।

-डॉ। ईश्वरचंद्र त्रिपाठी (साभार :प्रवक्ता डौट कॉम )

लेखक ने अप्रत्यक्ष तौर पर किस ओर इशारा किया है यह कहने की जरुरत नहीं है । क्या एक संप्रदाय विशेष सचमुच ऐसा कर रहा है ? क्या कोई ऐसा कर रहा है तो इसके पीछे कौन सी सामाजिक परिस्थिति है ? क्या ऐसा नहीं कि दो बड़े समुदायों के मध्य फैली तरह-तरह की भ्रांतियां इसे बढावा दे रही है ? अक्सर मुसलमान युवकों के बीच इस बात की चर्चा होती है कि हिंदू लड़की के साथ सेक्स करने पर जन्नत हासिल होगी और हिंदू युवक कहते हैं एक मुस्लिम लड़की के साथ सेक्स करने पर सौ यज्ञों का पुन्य मिलेगा । क्या इन दुष्प्रचारों से तो ऐसा नहीं हो रहा ? समाज को अपनी सोच बदलनी होगी नही तो ये लव के नाम पर हो रहा जिहाद हमें ले डूबेगा ।



>फतवा, फतवा, फतवा, फतवा

>बलात्कार की शिकार लड़की को 200 कोड़े मारने की सजा
जेद्दाह में एक सऊदी अदालत ने पिछले साल सामूहिक बलात्कार की शिकार लड़की को 90 कोड़े मारने की सजा दी थी। उसके वकील ने इस सजा के खिलाफ अपील की तो अदालत ने सजा बढ़ा दी और हुक्म दिया: ‘200 कोड़े मारे जाएं।’ लड़की को 6 महीने कैद की सजा भी सुना दी। अदालत का कहना है कि उसने अपनी बात मीडिया तक पहुंचाकर न्याय की प्रक्रिया पर असर डालने की कोशिश की। कोर्ट ने अभियुक्तों की सजा भी दुगनी कर दी। इस फैसले से वकील भी हैरान हैं। बहस छिड़ गई है कि 21वीं सदी में सऊदी अरब में औरतों का दर्जा क्या है? उस पर जुल्म तो करता है मर्द, लेकिन सबसे ज्यादा सजा भी औरत को ही दी जाती है।

बेटी से निकाह कर उसे गर्भवती किया
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में एक व्यक्ति ने सारी मर्यादाओं को तोड़ते हुए अपनी सगी बेटी से ही शादी कर ली और उसे गर्भवती भी कर दिया है। यही नहीं , वह इसे सही ठहराने के लिए कहा रहा है कि इस रिश्ते को खुदा की मंजूरी है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इस निकाह का गवाह कोई और नहीं खुद लड़की की मां और उस शख्स की बीवी थी। जलपाईगुड़ी के कसाईझोरा गांव के रहने वाले अफज़ुद्दीन अली ने गांव वालों से छिपाकर अपनी बेटी से निकाह किया था इसलिए उस समय किसी को इस बारे में पता नहीं चला। अब छह महीने बाद लड़की गर्भवती हो गई है ।

मस्जिद में नमाज अदा करने पर महिलाओं को मिला फतवा
असम के हाउली टाउन में कुछ महिलाओं के खिलाफ फतवा जारी किया गया क्योंकि उन्होंने एक मस्जिद के भीतर जाकर नमाज अदा की थी। असम के इस मुस्लिम बाहुल्य इलाके की शांति उस समय भंग हो गई , जब 29 जून शुक्रवार को यहां की एक मस्जिद में औरतों के एक समूह ने अलग से बनी एक जगह पर बैठकर जुमे की नमाज अदा की। राज्य भर से आई इन महिलाओं ने मॉडरेट्स के नेतृत्व में मस्जिद में प्रवेश किया। इस मामले में जमाते इस्लामी ने कहा कि कुरान में महिलाओं के मस्जिद में नमाज पढ़ने की मनाही नहीं है। जिले के दीनी तालीम बोर्ड ऑफ द कम्युनिटी ने इस कदम का विरोध करते हुए कहा कि इस तरीके की हरकत गैरइस्लामी है। बोर्ड ने मस्जिद में महिलाओं द्वारा नमाज करने को रोकने के लिए फतवा भी जारी किया।

कम कपड़े वाली महिलाएं लावारिस गोश्त की तरह
एक मौलवी के महिलाओं के लिबास पर दिए गए बयान से ऑस्ट्रेलिया में अच्छा खासा विवाद उठ खड़ा हुआ है। मौलवी ने कहा है कि कम कपड़े पहनने वाली महिलाएं लावारिस गोश्त की तरह होती हैं , जो ‘ भूखे जानवरों ‘ को अपनी ओर खींचता है। रमजान के महीने में सिडनी के शेख ताजदीन अल-हिलाली की तकरीर ने ऑस्ट्रेलिया में महिला लीडर्स का पारा चढ़ा दिया। शेख ने अपनी तकरीर में कहा कि सिडनी में होने वाले गैंग रेप की वारदातों के लिए के लिए पूरी तरह से रेप करने वालों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। 500 लोगों की धार्मिक सभा को संबोधित करते हुए शेख हिलाली ने कहा , ‘ अगर आप खुला हुआ गोश्त गली या पार्क या किसी और खुले हुए स्थान पर रख देते हैं और बिल्लियां आकर उसे खा जाएं तो गलती किसकी है , बिल्लियों की या खुले हुए गोश्त की ?’

कामकाजी महिलाएं पुरुषों को दूध पिलाएं
काहिरा : मिस्र में पिछले दिनों आए दो अजीबोगरीब फतवों ने अजीब सी स्थिति पैदा कर दी है। ये फतवे किसी ऐरे-गैरे की ओर से नहीं बल्कि देश के टॉप मौलवियों की ओर से जारी किए जा रहे हैं।
देश के बड़े मुफ्तियों में से एक इज्ज़ात आतियाह ने कुछ ही दिन पहले नौकरीपेशा महिलाओं द्वारा अपने कुंआरे पुरुष को-वर्करों को कम से कम 5 बार अपनी छाती का दूध पिलाने का फतवा जारी किया। तर्क यह दिया गया कि इससे उनमें मां-बेटों की रिलेशनशिप बनेगी और अकेलेपन के दौरान वे किसी भी इस्लामिक मान्यता को तोड़ने से बचेंगे।

गले लगाना बना फतवे का कारण
इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के धर्मगुरुओं ने पर्यटन मंत्री नीलोफर बख्तियार के खिलाफ तालिबानी शैली में एक फतवा जारी किया है और उन्हें तुरंत हटाने की मांग की है। बख्तियार पर आरोप है कि उन्होंने फ्रांस में पैराग्लाइडिंग के दौरान अपने इंस्ट्रक्टर को गले लगाया। इसकी वजह से इस्लाम बदनाम हुआ है।

ससुर को पति पति को बेटा
एक फतवा की शिकार मुजफरनगर की ईमराना भी हुई। जो अपने ससुर के हवश का शिकार होने के बाद उसे आपने ससुर को पति ओर पति को बेटा मानने को कहा ओर ऐसा ना करने पे उसे भी फतवा जारी करने की धमकी मिली।

फतवा क्या है
जो लोग फतवों के बारे में नहीं जानते, उन्‍हें लगेगा कि यह कैसा समुदाय है, जो ऐसे फतवों पर जीता है। फतवा अरबी का लफ्ज़ है। इसका मायने होता है- किसी मामले में आलिम ए दीन की शरीअत के मुताबिक दी गयी राय। ये राय जिंदगी से जुड़े किसी भी मामले पर दी जा सकती है। फतवा यूँ ही नहीं दे दिया जाता है। फतवा कोई मांगता है तो दिया जाता है, फतवा जारी नहीं होता है। हर उलमा जो भी कहता है, वह भी फतवा नहीं हो सकता है। फतवे के साथ एक और बात ध्‍यान देने वाली है कि हिन्‍दुस्‍तान में फतवा मानने की कोई बाध्‍यता नहीं है। फतवा महज़ एक राय है। मानना न मानना, मांगने वाले की नीयत पर निर्भर करता है।

>फिरकापरस्त भाजपा और मस्जिद की तामीर

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आज की एक सेकुलर ख़बर पर किसी ने शायद ही गौर फ़रमाया होगा ! जनाब , आप जरुर पूछेंगे , ख़बर भी सेकुलर होती है क्या ? तो साहब ! सेकुलर इस वज़ह से की ख़बर ही कुछ ऐसी है । उत्तराखंड सरकार ने मस्जिदों और सूफी संतों की मजार के सौन्दर्यीकरण की दिशा में कारगर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं । गौर तलब है कि यहाँ फिरकापरस्त पुकारे जाने वाले भाजपा का राज है । इस दिशा में राज्य सरकार की पहल पर हरिद्वार जिला प्रशासन ने मशहूर पाक दरगाह सबीर पाक स्थित सैकड़ों साल पुराने मस्जिद को नए सिरे से तामीर करने की योजना बने है । इस पाक काम में लगभग ७ करोड़ रूपये की लागत आने का अनुमान है । और इस काम के लिए स्थानीय लोगों की सलाह से ग्राम प्रधान हाजी इरफान खुरैशी ने एक २१ सदस्यों वाली कमिटी का गठन किया गया है । बहरहाल ,उत्तराखंड की भाजपा सरकार द्वारा भारत की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल इस दरगाह को विस्तार करने का कदम मुस्लिम समाज को भाजपा के करीब ला पायेगा जब मीडिया भाजपा को बार-बार मुसलमानों का दुश्मन बताती रही है ।

>भारत में स्थित "देवबंद" से मिलता है तालिबान को मानसिक खुराक

>इस्लाम के नाम पर अस्तित्व में आए ‘पाकिस्तान’ के हालत को देख कर भष्मासुर की कहानी याद आती है । वो कहानी आप सबने सुनी होगी । ‘एक बार भगवान शंकर ने भष्मासुर को वरदान दे डाला कि जिसके सर पर हाथ रखेगा वह भष्म हो जाएगा । बस फ़िर क्या था , भष्मासुर ने वरदान का सबसे पहला प्रयोग शिवजी के ऊपर ही कर डाला । वो तो भला हो विष्णु जी का जिन्होंने मोहिनी रूप के पाश में फांस कर भष्मासुर को उसी वरदान के माध्यम से जला डाला । ‘ चिंता मत कीजिये ! अति संछिप्त रूप से इस कथा को बताने का उद्देश्य पाक में वर्तमान स्थिति को समझाना था । कहते हैं इतिहास ख़ुद को दुहराता है । सदियों पुरानी ये कहानी पहले भी अमेरिका में अलकायदा द्वारा दुहराई जा चुकी है, हालाँकि तब अमेरिका जल्द ही संभल गया था । लेकिन पाकिस्तान के संभलने की कोई उम्मीद नही दिखती ।

पाकिस्तान के निर्माताओं ने तो इसकी नीव ही लाखों लोगों के लाश पर रखी थी । अपने जन्म से लेकर अब तक पकिस्तान ने कभी ख़ुद के विकास के बारे में शायद ही सोचा हो ! अरे ,सोचेंगे भी तो कैसे भारत का विनाश और दुनिया पर इस्लाम के एक छात्र राज कायम करने के अलावा इन्होने कुछ सोचा ही नहीं ! प्रकृति ने जब सब को एक नहीं बनाया फ़िर संसार में एकरूपता कैसे लायी जा सकती है ?विविधता ही तो संसार का नियम है पर ये बातें इनके पल्ले नही पड़ती । वैसे तालिबान के इतिहास को खंगाले तो इनका दोगलापन साफ़ दिखता है । तालिबान की यह विचारधारा, ७३ भागों(फिरकों) में बँट चुके इस्लाम की एक शाखा ‘वहाब’ से पैदा हुआ है । इतिहास में थोडी बहुत रूचि रखने वाले लोगों को वहाबी आन्दोलन के बारे में पता होगा । तालिबानी विचारधारा के केन्द्र में यही वहाबियों की सोच है जिसका वर्तमान में एक ही केन्द्र समस्त संसार में बचा है और वो है उत्तर प्रदेश का “देवबंद “। अब तालिबान के बारे में और विस्तार से समझने के लिए हमें वहाबियों के बारे में जान लेना चाहिए । वहाबी के अनुसार इस्लाम की अन्य धारा को मानने वाले भी काफिर हैं ।वो जो कहते हैं वही धर्म है ,वही शरियत है । अफ़गानिस्तान का तालिबान हो या पाकिस्तान का इनका कानून ‘शरियत’ कहीं से भी इस्लाम के अनुरूप नही है ।पकिस्तान में तालिबान का अस्तित्व में आना २००४ में संभव हुआ । अनेक राजनीतिकद्रष्टाओं का ऐसा मानना है कि इसकी गुन्जाईस शुरू से थी , वस्तुतः पकिस्तान में तालिबान का उदय और इतनी तेजी से फैलना कोई अनापेक्षित घटना नहीं कही जा सकती । अनेक बार यह सवाल आता है कि ऐसे में भारत की भूमिका क्या होनी चाहिए ? भारत को खुश होने की जरुरत है या दुखी होने की ? जवाब भी वही है , हमें निश्चित तौर पर चिंतित होना चाहिए । बात पाक में तालिबान की उपस्थिति की नहीं है बल्कि हमारी चिंता का विषय पाक का परमाणु संपन्न राष्ट्र होना है । इस्लामाबाद से महज ६०-७० मील की दूरी पर तालिबान का शासन होना इस बात का सबूत है कि पाक-परमाणु हथियारों पर कभी भी कब्जा हो सकता है । भारत और अमेरिका समेत सम्पूर्ण विश्व की चिंता का विषय यही है । इसके अतिरिक्त एक और खतरा जो साफ़ दिख रहा है भविष्य में भारतीय तालिबान के उदय का , परन्तु हम उससे मुंह फिराकर बैठे हैं । तालिबान को जन्म देने वाली संस्था “देवबंद ” का भारत में होना क्या इस संभावना को जन्म नहीं देती ? दरअसल कहीं भी ऐसी संभावनाएं तब तक रहेगी जब तक साधारण मुसलमान अपने दैनिक व्यवहार में हर समय कुरान , शरियत या मुल्लाओं की तस्दीक़ को न छोड़ दे । और ऐसा मैं नहीं कह रहा बल्कि वर्षों तक संघ को पानी पी-पी कर कोसने वाले , हिन्दू धर्म को गलियां उगलने वाले , सदैव सेक्युलर होने का दावा करने वाले , जामिया और अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में सम्माननीय श्रीमान राजेंद्र यादव जी कह रहे हैं । अब तो बात माननी पड़ेगी ! क्यों नहीं मानेंगे , कल तक तो इनकी हर एक बात ब्रह्म वाक्य थी अब क्या हुआ ?राजेंद्र यादव मई २००९ के हंस के सम्पादकीय में लिखते हैं कि ‘ मैंने २४ वर्ष हंस में जिस तरह हिन्दू धर्म कि बखिया उधेरी है ,क्या मुसलमान रहते हुए वह संभव था ? नहीं ,मेरा कलम किया हुआ सर कहीं ऊँचे बांस पर लटका ‘काफिरों’ में अंजाम का खौफ पैदा कर रहा होता ! ‘

‘राजेंद्र यादव’ उसी सम्पादकीय में कहते हैं , क्या कुरान और शरियत के यही व्याख्याएं हैं जो तालिबानों के दिशा -निर्देश बनते हैं ? क्या शरियत आज की समस्याओं को हल करने के बजाय हमें १४०० साल पीछे के बर्बर कबीलाई समाज में लौटने की मानसिकता नहीं है ? आगे इसी बात को बढाते हुए , कुरान पर सवाल खड़े करते हैं और कहते हैं कि यह कौन सा नियम है जो हम कुरान को लेकर सवाल नहीं उठा सकते , मुहम्मद साहब को लेकर प्रश्न नहीं पूछ सकते ……………. क्यूँ वो सवालों कि परिधि से बाहर हैं ? क्या १४०० वर्ष पूर्व दिए गए आदेश अपरिवर्तनीय और अटल सत्य है जो इस वैज्ञानिक युग में सवालो से परे हैं?

फिलवक्त , पाकिस्तानी तालिबान के बढ़ते प्रभाव और भारत में उदय की आशंकाओं के बीच इस्लाम व शरियत में परिवर्तन को लेकर आवाज बुलंद होनी शुरू हो गयी है । आगे इसका क्या हश्र होगा , क्या हमारे यहाँ के धर्मान्ध मुल्लाओं और वोट बैंक के पुजारिओं के पल्ले इस परिवर्तन की जरुरत समझ आएगी या नहीं ? यह तो भविष्य के गर्त में हैं । हम तो अच्छे की उम्मीद ही कर सकते है और नेताओं को सलाह दे सकते हैं कि कृपा कर इस मुद्दे पर ओबामा की ओर न देखें तथा कुछ कड़े कदम उठायें ! ध्यान रहे राजीव गाँधी की तरह मुस्लिम समाज के वोट का भय न सताए वरना जल्द ही निकट भविष्य में भारतीय तालिबान का अस्तित्व में आना तय है ।