>हम ही हैं वो लोग (साहिर लुधियानवी को समर्पित सत्या शिवरमन की कविता)

>हम ही हैं वो लोग

हम ही है वो लोग जिनका हमें था इन्तज़ार

हम ही है वो ख़्वाब जो हमने देखा था।

वो सुबह जो कभी आई नहीं उसका क्या ग़म

हमारे हाथों से जो बरसती हैं रोशनी

हमारे कदमों की तेजी से उठा है उजाला

हमारी ही मेहनत से जलते हैं चिराग

और ये सब किसी सूरज से कम तो नहीं ।

हम ही हैं वो लोग जिनका हमें था इन्तज़ार

हम ही है वो ख़्वाब जो हमने देखा था।

दलालों से कहो राह दिखाने की जुर्रत ना करें

राह बनाते है हम, तय करते खुद दिशा अपनी

आखें खुली हैं, ना रहा पहले का बहरापन

चलते भी हैं हम अपने ही पैरों पर

अब रोकना हमें कहीं मुमकिन नहीं।

हम ही हैं वो लोग जिनका हमें था इन्तज़ार

हम ही हैं वो ख़्वाब जो हमने देखा था।

जब धरती नग़में गाएगी, और अम्बर झूम के नाचेगा

जहाँ इन्सानों की कीमत सिक्कों से ना तोली जाएगी

वो दुनिया जिसमें ना होगी भूख, प्यास, ना कोई कमी

वो सुबह हम बनाएँगे, तो सुबह जरूर आएगी

वो सुबह हम बनाएँगे, ये हमको है पूरा यकीन।

हम ही हैं वो लोग जिनका हमें था इन्तज़ार

हम ही है वो ख़्वाब जो हमने देखा था।

सत्या शिवरमन

(साहिर लुधियानवी को समर्पित )

>क्या इंसा जो लेकर आया

>कितने सपने संजोये हमने
पर वो ख्वाब अधुरे है
सावन आये पल के लिए
पर पतझड़ अभी भी पूरे है

ये नदिया बहती सदियों से
पर सागर में मिल जाती है
अरे फूल खीले हो कितने भी
पर एक दिन वो मुरझाते/मिट जाते है

क्या इंसा जो लेकर आया
क्या लेकर वो जायेगा
खुषी मिले या गम कितने भी
सब छोड़ यहां चला जायेगा


जब अज्ञानी मैं जो था
ये तेरा ये मेरा था
जब जाना ये सबकुछ मैंने
सब माया का फेरा था

सोचा था मैंने कुछ हटके
जाउ जग से नया कुछ करके
वरना खुदा फिर कहेगा मुझसे
आया एक नया पशु फिर मर के

        कितने सपने संजोये हमने
        पर वो ख्वाब अधुरे है
        सावन आये पल के लिए
        पर पतझड़ अभी भी पूरे है

>जिन्दगी तो ऐसी है

>

ज़िन्दगी-जिन्दगी जिन्दगी तो ऐसी है (ऐसी है-२)
पूछो न पर कैसी है, (कैसी है-२)
कभी ये हसाएंकभी ये रुलाए-२
आंखों से न कहकर
ये आंसुओं से कहती है
ज़िन्दगी-जिन्दगी जिन्दगी तो ऐसी है (ऐसी है-२)
कोई है अकेलाकोई अलबेला है
कोई मस्तमौलाकही दुख का रेला है
ये हसेंवो रोयेंवो खोएं ये पाएं
ये तो दुनिया में 
हर घर झमेला है
ज़िन्दगी-जिन्दगी जिन्दगी तो ऐसी है (ऐसी है-२)
राजनेता लड़ाता धर्म के नाम पर,
सब कुछ वो बांट खाता,
मजहब के नाम पर
आम आदमी आम रह जाता है
मिल बांटकर वो कंकर ही खाता है
पर कौआ जो खाये मोती
अरे हंस चुगे दाना,
कलयुग में बन गया है,
देखो अब यही फसाना।
ज़िन्दगी-जिन्दगी जिन्दगी तो ऐसी है (ऐसी है-२)
🙂 नरेन्द्र निर्मल 


>एक अफगानी मित्र के प्रति संवेदना सहित: प्रशांत प्रेम

>

 
 हजारों टन बमों और
सैकड़ो क्रुज़ मिस्साइले गिरने का मतलब तुम्हे नहीं पता,
तुम्हे नहीं पता- भूख और बेवशी की पीड़ा,
तुम्हे मालुम भी नहीं
सर्दियों में सिर्फ तन ढकने के कपड़ो के बिना
ठिठुर कर मर जाना |
तुम्हे नहीं पता
गरीबी और गरीबों की बीमारियाँ,
तुम्हे नहीं पता
दवाओं के बिना बुखार में तप कर मरना |
तुम तो एन्थ्रेक्स से सिर्फ एक मौत पर
दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में तैयार करवाने लगे हो एन्टीडोट्स |

तुम्हारी मीनारों के जमीन छूने की एवज में
तुमने मिटा डाला है जमीन का ए़क टुकडा ही
जहां लाखों लोग तबाह है |

तुम स्वर्ग के बाशिंदों
तुम्हे क्या पता — भूख और ठंढ से मरने से बेहतर है
हमारे लिए
तुम्हारे बमों की आंच में मरना
जब मरना ही हो आख़िरी विकल्प |

चलो अच्छा है !
इस “इनफाएनाईट जस्टिस” की आड़ में
आजमा लो तुम भी अपने सारे नए ईजाद,
साफ़ कर लो अपने जंग लगते सारे हथियार |
ताकि फिर कोई दुसरा अफगानिस्तान न उजडे
और ना ही कोई मुनिया रोये
अपने काबुलीवाला को याद कर-कर |


Note :- कविता 5 साल पुरानी है…. पर कहानी नहीं| आप अफगानिस्तान की जगह ईराक रख ले नाईजिरिया या येरुशलम…..


>स्वच्छता का ढिंढोरा पीटने वाले धर्मभीरु को एक सच्चे भारतीय का जबाव

>
“स्वच्छ हिन्दुस्तान की नेम प्लेट ” शीर्षक नाम से यह कविता एक ब्लॉग पर मिली ।

स्वच्छता का दम भरते हो

ज़रा बताओ फिर क्यों

एक पिता की दो संतान

अगर दो माँ से हैं

तो आपस मे कैसे

और क्यों विवाह

करती हैं

मौन ना रहो

कहो की हम यहाँ

इस हिन्दुस्तान मे

इसीलिये रहते हैं

क्युकी हम यहाँ

सुरक्षित हैं

संरक्षित हैं

कानून यहाँ के

एक होते हुए भी

हमारी तरफ ही

झुके हुए हैं

कहीं और जायगे

तो कैसे इतना

प्रचार प्रसार कर पायेगे

बस हिन्दुस्तान मे ही ये होता हैं

सलीम को यहाँ सलीम भाई

नारज़गी मे भी कोई सुरेश कहता हैं

तुम भाई हो हमारे तो भाई बन कर रहो

हम रामायण पढे

तुम कुरान पढो

ताकि हम तुम कहीं ऊपर जाए

तो राम और अल्लाह से

नज़र तो मिला पाये

ऐसा ना हो की

पैगम्बर की बात फैलाते फैलाते

तुम उनकी शिक्षा ही भूल जाओ

हम को हमारी संस्कृति ने यही समझया हैं

जो घर आता हैं

चार दिन रहे तो मेहमान होता हैं

और रुक ही जाए

तो घर का ही कहलाता हैं

घर के हो तो घर के बन कर रहो

हम तुम से रामायण नहीं पढ़वाते हैं

तुम हम से कुरान मत पढ़वाओ

धार्मिक ग्रन्थ हैं दोनों

पर अगर किताब समझ कर पढ़ सके

कुछ तुम सीख सको

कुछ हम सीख सके

तो घर अपने आप साफ़ रहेगा

और स्वच्छ हिन्दुस्तान नेम प्लेट की

उस घर को कोई जरुरत नहीं होगी ।

>पर बांग्लादेश भी चिल्लाता , जो खुद औलाद नाजायज है !

>

मृतकों का पश्चात्ताप , दे रहा जिन्दों को दस्तक
दिल्ली हुई नेतृत्व विहीन ,  झुका राष्ट्र का मस्तक.
है पड़ोसी मुल्क से आ रही ड्रैगन की फुंफकार
कहाँ गये वो रक्षक अपने , क्यों गिरी उनकी तलवार ?
ड्रैगन की फुंफकार तो फ़िर भी कुछ हद तक जायज है
पर बांग्लादेश भी चिल्लाता , जो खुद औलाद नाजायज है !
सबका कारण एक ,नहीं है रीढ़ की हड्डी
वरना भारत नहीं किसी से कभी फिसड्डी .

>’किस पथ से जाऊँ?’

>हरिवंश जी के “मधुशाला” की कुछ पंक्तियाँ …..

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ –
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।’।।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
‘दूर अभी है’, पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।

>मेरे दिल की यही कवायद है

>

मेरे दिल की यही कवायद है
जो मेरा नहीं है क्यों उसकी चाहत है
भ्रम की दुनिया मे जीती हू
या भ्रम बुन रखा है अपने इर्द-गिर्द
जानती नहीं मै ये फिर भी क्यों उसकी हसरत है
कराह रहा है दिल मेरा या दिल की यही आदत है
भाग रही हू मै तुमसे या नियति की यही चाहत है
खामोश हू मै लेकिन गुफ्तगू है दिल मे कई
बोलू कैसे उसको मै टुकरो मे मिलती है मुझे ज़िन्दगी
रोज़ होती है खुद से कुछ खास बाते
ढूंडटी रहती हू हर रोज़ उनकी फ़रियादे
फरिस्तो की दुनिया मे रहते है वो
और हम तो ज़मीं के भी न लायक है
खौफ होती है मुझे अपनी ज़िन्दगी से
फिर कैसे उन्हें इस खौफ का हिस्सा बनाये
वो नहीं है हमारे फिर क्यों उनकी चाहत है
खुशियो की आदत नहीं है हमें
फिर क्यों आप हमें खुशियों मे नहलाते है
कुर्बत की चाहत नहीं है हमें
फिर क्यों हर रोज़ एक सपना दिखाते है
किश्तों-किश्ती मे मर रहे है हम
ज़िन्दगी भी नहीं है मेरे संग
फिर क्यों जीने की हसरत जगाते हो
तुम नहीं हो मेरे फिर क्यों तुम्हारी चाहत है
क्यों ज़माने मे ऐसा होता है
जो दिल के पास हो दिल से दूर वही होता है
खुशनसीब है वो जो तन्हाई के संग जीते है
हमारी बेबसी तो देखो हम तो भीर मे भी तनहा होते है
तसल्ली तो उनको भी होती है जो देते है
तसल्ली तो उनको भी होती है जो खोते है
और हम बेबस तो पाकर भी खोते है
रेतो का घरोंदा है मेरा
क्यों इसमें बसेरा ढूंडते हो
हम तो पानी मे बह जाएंगे
फिर से साए सा खो जाएंगे
क्यों दिल पर दस्तक दाते हो
तुम नहीं हो मेरे फिर क्यों तुम्हारी चाहत है
मेरे दिल की यही कवायद है

>ये ज़िन्दगी

>

क्या है ये ज़िन्दगी
क्या तलाश है कोई
या समझ रहे है सभी
क्यूँ हारी सी है वो खड़ी
वो हमारी ज़िन्दगी
भीड़ में है खड़ी !!!!!!!!
क्या है ये ज़िन्दगी
भीड़ होती है बड़ी
कोई सुनता न घड़ी घड़ी
वो अकेली सी खड़ी
वो हमारी ज़िन्दगी
भीर में है खड़ी!!!!!!!!
क्या है ये ज़िन्दगी
रंग होते हैं सभी
और खिलती है ये ज़िन्दगी
क्यूँ कोरी कोरी वो खड़ी
वो हमारी ज़िन्दगी
भीड़ में है खड़ी!!!!!!!!
क्या है ये ज़िन्दगी
खुश हाल है या खोखली
रोटी है कभी कभी
क्यों अकेली है खड़ी
वो हमारी ज़िन्दगी
भीड़ मेंहाई है खड़ी!!!!!!!!!!
क्या है ये ज़िन्दगी
भरम सा है भरी
या भरम थोद्ती है सभी
क्यों उलघ रही है खड़ी
वो हमारी ज़िन्दगी
भीड़ में है खड़ी!!!!!!!!!!
क्या है ये ज़िन्दगी
उत्सव देती है कभी
या छिनती है खुशी
क्यूँ खो रही है खड़ी
वो हमारी ज़िन्दगी
भीड़ में है खड़ी!!!!!!!!!!
क्या है ये जिन्गदी
ज़ख्म देती है कभी
या सुकून की है बंदगी
क्यूँ दर्द माँ है खड़ी
वो हमारी ज़िन्दगी
भीड़ में है खड़ी!!!!!!!!!!
क्या है ये ज़िन्दगी
कल्पना है कोई
या वास्तविकता की छवि
क्यूँ सपनों माँ खड़ी
वो हमारी ज़िन्दगी
भीड़ में है खड़ी
वो हमारी ज़िन्दगी!!!!!!!!

>जीवन की उलझी राहों में ………

>

ख़ुद से दूर रहना चाहता हूँ ,

अपने हीं अक्स से घबराता हूँ ,

प्यार किसी से करता हूँ ,

क्या प्यार उसी से करता हूँ ?

अपने अन्दर के विद्रूप से डरता हूँ ।

जीवन की उलझी राहों में ,

ख़ुद के सवालों से घिरता हूँ ,

अपनी सोच , अपने आदर्शों के

पालन से जी चुराता हूँ ,

अपने अन्दर के विद्रूप से डरता हूँ । ।

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