>बीबीसी संवाददाता सुहैल हलिम के ब्लॉग को पढ़कर एक चिट्ठी उनके और उस ब्लॉग पर टिप्पणी करने वालों के नाम

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सुहैल साहब ,नमस्कार !

शिवसेना के मुद्दे पर आपका ब्लॉग पढ़ा .आपने काफी साफगोई से सारी बात रखी पर, शायद कुछ भाइयों को इस व्यंग में शिवसेना की तरफदारी नज़र आई तो इस पर क्या कहा जाए . खैर एक अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से जुड़े आदमी का ब्लॉग मैं कैसे बातें कही जानी चाहिए आपने इसका खूब ख्याल रखा है . पर मुझे इस ब्लॉग के शीर्षक और पोस्ट में कोई तारतम्य नज़र नहीं आया . माफ़ कीजियेगा . ….. वैसे जब शिवसेना की बात हो रही है तो मराठी मानुष के नाम पर हो रहे तमाम कारनामों से सभी परिचित है . शिवसेना को ऐतराज जताने का पूरा हक़ है और शाहरुख़ को भी लेकिन उन्हें यह अधिकार नहीं कि किसी की फिल्म चलने से रोकें ……. इतने कमेन्ट आये पर किसी ने सोनिया ब्रिगेड का नाम तक नहीं लिया जिनके युवराज बिहार में भारतीयता का दंभ भरते हैं और महाराष्ट्र में उन्हीं की सरकार है , क्या यह उनका दोहरापन नहीं है ? वैसे दरभंगा में राहुल का जो हश्र हुआ वह उनके युवा राजनीति को जान्ने के लिए काफी है ………. शिवसेना या मनसे को बढ़ावा देने वाले हम और और हीं हैं जिन्होंने आज तक कांग्रेस की विभाजक नीतियों का विरोध नहीं किया . उलटे हमेशा वोट बैंक की तरह खुद को उपभोग होने दिया . पौव्वा पीकर ,ठेकेदारी लेकर ,पैसे खाकर , सिफारिश करवाकर आदि -आदि अपने हितों में दूर का नुकसान भूल गये . क्यों भूल जाते हैं हम पंजाब से लेकर अयोध्या तक की घटना जिन्हें आज मीडिया और प्रधानमंत्री तक राष्ट्रीय शर्म कह रहे हैं वह बहुत इसी कांग्रेस के वोट बैंक की राजनीति का परिणाम है . वैसे आज जनसत्ता में छपा पुन्य प्रसून वाजपेई का लेख पढियेगा जिसमें राहुल गाँधी के युवा अभियान की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी गयी है .राहुल गाँधी ब्यान दे रहे हैं कि मुंबई हमले में बिहारी सैनिकों ने अपना योगदान दिया . अरे ,शर्म आती है ऐसे युवा नेता पर जो भारतियों को बिहारी और मराठी के तराजू में तौल कर देश को बाँट रहे हैं . ऐसे छद्म लोगों को शिवसेना या मनसे का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है जिनकी सरकार खुद भाषा के आधार पर भेद-भाव वाला कानून पारित करती हो , जिनके शासनकाल में एक असहाय महिला को अधिकार इसलिए नहीं मिलता क्योंकि इससे वोट बैंक भड़क जाता है और उसी समय दूसरे समुदाय को खुश करने के लिए एक विवादित ढांचे का टला खोल दिया जाता है जो आज तक भारत की नाक का घाव बना हुआ है . क्या हम दोषी नहीं है जो उत्तर भारतीयों अथवा हिंदी भाषियों पर हो रहे अत्याचार और भेदभाव का रोना तो रोते हैं परन्तु राहुल गाँधी की पूंछ सहलाने से बाज नहीं आते ? जरा , सोचियेगा कभी आज सारी विघटनकारी शक्तियों के उभरने में किसकी अहम् भूमिका है ?


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>राजशेखर रेड्डी के गम में मरने लिए 5000-5000 रूपये बांटे कांग्रेस ने

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अभी पिछले दिनों आँध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की मौत विमान दुर्घटना में हो गई.सभी समाचार चैनल में कहा गया  कि  उनकी मौत के दुख में 462 लोगो ने आत्महत्या कर ली. आश्चर्य होता है न आज के समय में किसी नेता के लिए इतना प्यार देखकर!!! लेकिन बाद में मालूम पड़ा की ये प्यार नेता के लिए नहीं बल्कि पैसे के लिए था मतलब की कांग्रेस सरकार ने देश को जितने भी लोगो को खुदख़ुशी करने वालों में गिनाया था वो सभी खुदखुशी के कारण नहीं बल्कि अपनी स्वाभाविक मौत मरे थे.
जी हां एक सनसनीखेज़ खुलासे में ये बात सामने आई है की मरने वाले लोगो के घर वालो को सरकार ने 5000-5000 Rs. दिए थे और बदले में उनलोगों को ये बोलना था की “मरने वाला आदमी अपनी स्वाभाविक मौत नहीं मरा बल्कि उसने मुख्यमंत्री के गम में आत्महत्या की है.”
शर्म आती है ये बाते सुन-सुन कर की आज की कांग्रेस इतनी गिर चुकी है की लोगो की मौत पर भी राजनीति करने लगी
काश ये पैसा उन लोगो को मरने से पहले दिया जाता तो शायद वो दुनिया में होते .
 { ऑरकुट पर भाव्यांश के स्क्रेप का अंश  } 

>राष्ट्रपति के बेटे राजेंद्र शेखावत को टिकट देने का विरोध दर्ज कराएँ यहाँ

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राजशेखर रेड्डी का अंतिम संस्कार होने के पहले ही दिवंगत मुख्यमंत्री के बेटे जगनमोहन रेड्डी को सत्ता की कुर्सी पर बैठाने के लिए कांग्रेस की आकुलता को बीते अभी कुछ दिन हीं बीता कि आगामी विधानसभा चुनावों में  राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बेटे राजेंद्र शेखावत को टिकट मिलने की खबर मिली है . कांग्रेस में परिवारवाद / वंशवाद का यह वाइरस नया नहीं हैं . हाँ , जब भी कुछ नज़रों से होकर गुजरता है तो हमें इसकी याद आ जाती है और खीज में भर कर कीबोर्ड पर उंगलियाँ दौड़ाने लगते हैं  . मालूम है , अब यह रोग लगभग लाइलाज होने के कगार पर खड़ा है .लोकतंत्र की प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है . भारत में वंशवाद के विषबेलों की संख्या दिनों – दिन चौगुनी रफ़्तार में बढ़ रही है .
आइये एक नज़र डालें उन जहरीली झाड़ियों पर जिनका सम्बन्ध लोकतांत्रिक भारत के चुनिंदा ‘राजघरानों’ से हैं .  सोनिया गाँधी , राहुल गाँधी ,डॉ फारुक अब्दुल्ला ,उमर अब्दुल्ला ,दयानिधि मारन { तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के भांजे और कई बार मंत्री रह चुके स्वर्गीय मुरासोली मारन के बेटे हैं },एम के अड़ागिरी {करुणानिधि के सबसे बड़े बेटे },कनीमोड़ी {करुणानिधि की बेटी},जी के वासन {कांग्रेस के  नेता स्वर्गीय जी के मूपनार के बेटे},कुमारी शैलजा [ इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री चौधरी दलबीर सिंह की बेटी },मुकुल वासनिक {कांग्रेस के पूर्व सांसद बालकृष्ण वासनिक के बेटे},लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार{ स्वर्गीय जगजीवन राम की बेटी } ,सलमान खुर्शीद { कांग्रेसी नेता खुर्शीद आलम खां के बेटे और पूर्व राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन के नाती },पृथ्वीराज चव्हाण { माँ बाप दोनों कांग्रेसी सांसद रह चुके हैं },सिंधिया राजघराने के चिराग ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांग्रेस के दिग्गज नेता जितेंद्र प्रसाद के बेटे जितिन प्रसाद,  राजेश पायलट के बेटे और फारुख अब्दुल्ला के दामाद सचिन पायलट,  पीए संगमा की बेटी अगाथा संगमा, कांग्रेस नेता ललित माकन के भतीजे अजय माकन, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी के बेटे भरतसिंह सोलंकी, गुजरात के एक और पूर्व मुख्यमंत्री अमरसिंह चौधरी के बेटे तुषार चौधरी, मध्य प्रदेश के कांग्रेसी नेता पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव के बेटे अरुण यादव, पूर्व मंत्री सीपीएन सिंह के बेटे आरपीएन सिंह, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री वसंतदादा पाटिल के पोते और पूर्व सांसद प्रकाश पाटिल के बेटे प्रतीक पाटिल, मेनका गाँधी के पुत्र वरुण गाँधी  ,जसवंतसिंह के पुत्र मानवेन्द्रसिंह ,पटियाला की महारानी और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी प्रनीत कौर  आदि -आदि . अब ज्यादा नाम लिया तो आप चक्कर में आ सकते हैं . पोस्ट उबाऊ न हो इसका भी तो ख्याल रखना होता हैं न साहब !
                                                  लोकतान्त्रिक भारत के राजवंशी नेताओं के इतने सारे नाम एक साथ पढ़ कर कैसा लग रहा है आपको ? कोई बेचैनी हो रही है ? क्या वर्तमान राष्ट्रपति जी के बेटे को विधानसभा के टिकट मिलने पर आपको गुस्सा / जलन / कुंठा / घुटन  सा महसूस नहीं होता ? क्या भारत की गणतंत्रता के ६० साल पूरे होने से पहले हीं फ़िर से राजतंत्र की ओर बढ़ते कदम से खौफ नहीं होता ? अगर लगता है कि वंशवाद के इन बेलों की जड़ों को जमीन में ज्यादा गहरे तक जाने से पहले रोका जाना चाहिए तो क्यों न ब्लॉगजगत के सजग प्रहरी आप और हम आगामी किसी भी चुनाव में ऐसे किसी भी नेता की उम्मीदवारी का विरोध करें . और फिलहाल हमारे निशाने पर प्रतिभा ताई के सुपुत्र ” राजेन्द्र शेखावत “ ,पूनम महाजन , और जिनको भी अनुकम्पा के सहारे टिकट मिलता है  ब्लॉगजगत  को अब अपने ताकत का अहसास अपने जोरदार विरोध से करना होगा . लोकसभा चुनाव बीत गया तो क्या जब जगे तभी सवेरा ………………….. 

>लालू की बात लग गई , कलावती बनेगी विधायक

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लोकतंत्र के चाहने वालों के लिए एक और खुशखबरी है .आगामी महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव में कलावती चुनाव लड़ रही है .पिछले साल सुर्खियों में रहने वाली विदर्भ के किसान की विधवा और ७ बच्चों की माँ कलावती यवतमाल के वणी विधानसभा सीट से चुनावी समर में कूद पड़ी हैं . कलावती ने तमाम राजनितिक दलों के टिकट को ठुकराकरविदर्भ जनांदोलन समिति और शेतकरी संघर्ष समिति के बैनर तले चुनाव लड़ना स्वीकार किया है .

कलावती को आप कैसे भूल सकते हैं , राहुल गाँधी की राजनीति में विदर्भ की कलावती का नाम सांसद तक में गूंजा था .पूरा देश कलावतीमय हो गया था . राहुल के दलित,गरीब और किसान प्रेम से भारतवासी चकित थे . दलित नेताओं की कुर्सी उसी तरह हिलने लगी थी जैसा किसी तपस्वी के तप से इन्द्र का सिंघासन !

ऐसा नहीं है कि कलावती अचानक से राजनीति में आ गयी है .विगत एक वर्ष में कलावती ने विदर्भ के आंदोलनकारी किसान नेता किशोर तिवारी के साथ मिलकर किसानों को फसल ऋण और कर्जमाफी के लिए दर्जनों आन्दोलन और धरनों का प्रतिनिधित्व किया है . अपनी भूख और गरीबी से लड़ने के लिए कलावती ने खुद को किसी बड़े नेता के सहयोग की मोहताज समझा . आखिर पूरी दुनिया में उनका नाम जो हो गया है . इसीलिए किसी बड़े नेता की बाट जोहने के बजाय खुद को ही संघर्ष के लिए तैयार कर लिया.

महिला आरक्षण पर चर्चा के दौरान भी लालू प्रसाद यादव ने कलावती, भगवती की चर्चा कर डाली थी . लालू ने इस बिल पर बोलते हुए कहा कि इसमें ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे कलावती जैसी करीब महिलाएं भी संसद में आ सकें. आज कलावती विधानसभा में आने को कमर कस चुकी है . आगे -आगे देखिये होता है क्या ?

>प्रदेश कांग्रेस कार्यालय की कुर्की करने पहुंचे डीटीसी के अधिकारी

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दिल्ली प्रदेश कांग्रेस और शीला सरकार एक बार फ़िर आमने सामने है । बात इतनी बिगड़ गई है कि प्रदेश कार्यालय की कुर्की-जब्ती की नौबत आ गई । मामला डीटीसी का बकाया राशिः न चुकाए जाने का है । डीटीसी बसों के किराये को चल रहे विवाद में न्यायालय ने कुर्की का आदेश दिया । न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए डीटीसी अधिकारीगण दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित प्रदेश कार्यालय ‘राजीव भवन ‘ आ धमके । जमकर हंगामे के बाद कुर्की तो नहीं हो पाई परन्तु ,प्रदेश कांग्रेस की इज्जत जरुर नीलाम हो गई !

दरअसल २० साल पहले कांग्रेस ने एक रैली में डीटीसी बस का इस्तेमाल किया था जिसका २ लाख ६८ हज़ार रुपया उन्होंने नहीं चुकाया । वर्तमान में कर्ज बढ़कर ५ लाख से ज्यादा हो चुका है । यह कोई पहला मामला नहीं है जब राजनितिक दलों द्वारा सार्वजनिक उपक्रमों का निजी स्वार्थ में इस्तेमाल किया गया है । दूरसंचार निगम , नगर निगम ,जल बोर्ड , बिजली बोर्ड और भी न जाने कितने सरकारी साधनों का उपभोग बगैर शुल्क चुकाए होता रहा है । इस तरह के मामले में न्यायालय के आदेशों की धज्जियाँ खुले आम उडाई जाने पर भी कुछ नहीं हो पाता है । संगठित भ्रष्टाचार का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही कहीं मिले । जनप्रतिनिधि ही जब जनता की पूंजी खाने लगे तो देश का क्या होगा ? अभी-अभी संपन्न हुए आम चुनावों में स्विस बैंक के काले धन की वापसी को लेकर खूब उठापटक हुई थी ।विदेशी संस्थाओं में जमा काले धन की वापसी , हवाला के सहारे भ्रमण कर रहे पैसों पर लगाम लगाने की बात तो दूर की कौडी है , पहले अपने देश में चल रही अनियमितताओं का कुछ किया जाए ! सत्ताधारी दल अपनी जिम्मेवारी निभाने के बजाय ख़ुद भी इस दलदल में फंसी दिखती है । ऐसे में भ्रष्टाचार एक सामाजिक जरुरत बनता हुआ दिख पड़ता है ।

>मानसिक गुलामी (भाग-१)

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कांग्रेस और कांग्रेसी नेताओं का स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व व पश्चात् का अतीत यही प्रर्दशित करता है कि उनको भारतीय लोगों और भारतीय विरासत में विश्वास के अभाव का रोग है। उनकी आत्महीनता ने उन्हें समस्याओं के समाधान के लिए देश से बाहर तकते रहने की आदत डाल दी है । परिणामस्वरुप देश के इतिहास और परम्पराओं में से उद्धृत एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण के स्थान पर ये विदेशों से विचार , सिद्धांत और व्यक्तिओं को अपने प्रतिनिधित्व और अपनी सुरक्षा के लिए आयात करते हैं। खिलाफत को संचालित करने के लिए परामर्श हेतु ,वेरिओर एल्बिन , उद्योगों के लिए रुसी प्रारूप आदि-आदि कांग्रेस पार्टी का पर- राष्ट्रों से विचार ,नीति और नेताओ (सोनिया गाँधी ) के आयात का प्रमुख संदेश है ।

इन सब को देख कर यही निष्कर्ष निकलता है कि कांग्रेस पार्टी और उसके अनुयायिओं के पास अपना कोई राष्ट्रवादी दृष्टिकोण , कोई नजरिया नही है । वे आज भी भारत राष्ट्र को एक औपनिवेशिक शासन के रूप में समझते हैं जिसे यूरोप वालों की जगह भारतवासी चला रहे हैं। परन्तु जब भारत के लोगों ने एक स्वर से यूरोप द्वारा थोपी , इस व्यवस्था को नकार दिया है तो इन्होने , एक विदेशी को ले आना , तय कर लिया है ताकि उनके स्थान पर वह इनकी अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ तरीके में कम कर सके । यह बात दूसरी है कि मानसिक गुलामी की इस कांग्रेसी परम्परा ने सब कुछ बरबाद कर दिया है , और आगे भी यही होता रहेगा ।

स्पष्ट है किभारत जैसा विशाल राष्ट्र , उधार ली हुई नीव पर खड़ा नही हो सकता और न ही आयातित अन्न से अपने करोडों देशवासिओं का पेट नहीं भर सकता है. एक दल जो दावा करता है , जो कहता है, कि उसने राष्ट्रीय संघर्ष का नेतृत्व किया था वो दल औपनिवेशिक चिह्नों , मूल्यों और नीतियों को यहाँ तक कि यूरोपीय शासन की वापसी को भी इतनी चीपकाहट के साथ क्यूँ संभाले हुए है ? उत्तर बहुत आसान है – इसकी कोई ,कैसी भी राष्ट्रीय विचारधारा ही नहीं है . और जो है वो छद्म औपनिवेशिकता व छद्म धर्मनिरपेक्षता . अभी तक के लिए इतना ही आगे इस भूमिका को विस्तार से आपके समक्ष अनेक राजनितिक विशेषज्ञों का सन्दर्भ देते हुए प्रस्तुत करूँगा ……….