चॉंद का प्‍यार भी क्‍या प्‍यार है ?

आपका ही तो है जो हमें उकसा रहा है,
सोते जागते मुझे भरमा रहा है।
आप कोई खवाब नही तो भुला दिये जाओ,
वो एहसास हो जो सब कुछ भुला जाओं ।।

चॉंद का प्‍यार भी क्‍या प्‍यार है ?
वो प्‍यार भी चोरी चोरी करता है।
रात की सुगहरात के बाद,
सुबह अपने अग्रज सूरज से डरता है।।

प्‍यार का एहसास कोई चोरी नही है,
प्‍यार को स्‍वीकार करने में चॉद को हिचक कैसी ?
रात स्‍वप्‍नो को को परवान चढ़ा कर,
पूरे दिन प्रेयसी को प्रेम विरह में तड़पाते हो।।

है निवेदन आपनी तुलना,
उस निगोड़े चॉद से न करो।
जिसमें प्रेम को,
स्‍वीकार करने की हिम्‍मन न हो।।

माना कि तुम वो परवाने हो,
जो जलेगा किन्‍तु उफ़ तक न करेगा।
मग़र तेरे जलने की गर्मी से,
झुलसेगा मेरा तन।।

आवा़ज की कौंध गुजती कानो में,
लगता कुछ खोया-खोया सा है।
क्‍योकि मिटती नही कभी महोब्‍बत,
मिटते है तो सिर्फ मोहब्‍बत वाले।

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जेब ढीली हो ग ई क्या ?

आने वाली है दिवाली

उसके पहले ही होगी जेबें खाली

धनतेरस पर धन जाये

एक खरीदे कंगन अगूठी

मुफ्त पायें।

बीबी की जिंद

बच्चों के कपड़े करते हैं कंगाल

हाय ये मौसम और ये त्योहार

खुश हूँ मैं भी ये दिखता है सब को

अन्दर ही अन्दर दुखता दिल है

और चुप मैं हूँ

करता हूँ मैं अब यही कामना

जाये ये त्यौहार

छूटे जेब का भार

रात में हम और तुम

रात में हम और तुम, 
अकेले हो। 
साथ और कोई न हो, 
बस हम-तुम।।
********************
तुमने हमको, 
प्यार के तीन शब्दों में बांध लिया है।
सिर्फ 
आई लव यू कह कर।। 
********************
शिक्षा के बाजार में,
शिक्षा रही है बिक।
औने पौने दाम में, 
बेंच सको तो बेंच।।

दोस्‍ती

दिल के रिश्तों को करीब से देखो,
तो दोस्ती नज़र आती है।
दोस्तों की नज़र में दोस्ती,
मात्र कोई शब्द नही है।
जिधर चल दिये दो पग,
उधर चल दिया दोस्ती का कारवां।
बढ़ती जायेगी उम्र,
लेकिन ये कारवाँ न रूकेगा।

आसान नही है

राहों में चलते रहना,
आगे बढ़ना,
आसान नही है।

मन्जिल की मन्जिल,
पर चढ़ना,
आसान नही है।

असफलताओं से डर कर,
जिन्‍दगी जीना,
आसान नही है।

दिल पर लगे घावों के,
दर्द को सहना,
आसान नही है।

बीतों हुए लम्‍हों को,
दिल से निकानना,
आसान नही है।

कलेजे के टुकड़े से,
अलग हो कर जीना,
आसान नही है।

मॉं के ऑचल के,
प्‍यार को भूला
पाना आसान नही है।

उड़ते पंक्षी

उड़ते पंक्षी इस जीवन में
दुनियां की सैर करते हैं।
ध्यान लगाकर उड़ते जाते,
अपनी मंजिल पर पहुंचा करते है॥

धरा अभूषण देख-देखकर
वहीं रैन बसेरा करतें है।
निश्छल भाव से उड़ते जाते,
नभ से बाते करतें है॥

सूर्य की तपती किरणों से
केवल ऊर्जा पाते जाते है।
जहां रैन बसेरा करना हो,
सुख-चैन की सांसे लेते जाते है॥

प्रेरणा देते पक्षी मानव को
तुम कर्म सदा करते जाओ।
पवित्र भाव के वशीभूत हो,
मानव की सेवा करते जाओ॥

प्रेम से मिलकर तुम रहना
कर्तव्य खूब निभाते जाना।
परस्पर बैर भाव मिटाकर,
श्रध्दा से शीश झुकाते जाना॥

पक्षी गगन में उड़ते जाते
स्वछन्द विचरण करते हैं।
कर्म को उद्देश्य मानकर,
हिमगिरी भी पार करते है॥

प्रेरणा मानव तुम भी लो
आलस्य को दूर भगाना है।
निष्ठा भाव मन में जगाकर,
कर्तव्य निष्ठ बन जाना है॥

उड़ते पंक्षी इस जीवन में
नई अनुभूति सदा करतें है।
आशा की किरणें पाकर ही,
निज कर्म सदा करतें है॥

जब याद आयी घर की

जब याद आयी घर की,
घुट घुट कर रोने लगे।
गिरा कर कुछ बूँदे आसूँओं की,
हम चेहरा भिगोने लगे।
जब नींद टूटी सारी दुनियाँ की,
सिमट कर चादर में हम सोने लगे।
जब याद…………….
करके टुकड़े हजार दिल के,
बीती यादों को पिरोने लगे।
जब याद…………….
न छूटे दाग दिल के बारिस की बूँदों से,
लेकर आँसूओं का सहारा,हर दाग दिल का धोने लगे।
जब याद…………….
बिजलियों का खौफ़,
अब तो रहा ही नही।हो के तन्‍हा,
जिन्‍दगी हम ढ़ोने लगे।
जब याद…………….
ले लिया ग़म को,
अपने आगोश में,
जब कभी दूर अपनो से होने लगे।
जब याद…………….
खुल गई सारी जंजीरे,
बदन से हमारे,
जब धुये की तरह,ह
वा में खोने लगे।
जब याद…………….
Dated – 27 मार्च 2005 by प्रलयनाथ जालिम

बदस्‍तूर एक छोटी सी

बदस्‍तूर एक छोटी सी,

चिन्‍गारी को हवा दिया।

जो आग लगी सारे शहर में,

पानी से बुझा दिया।।

वो चिल्‍लाते रहे हमारी गली,

पर हमारी आवाज को।

सबने गुस्‍से में दबा दिया।।

बदस्‍तूर ……………

घुट-घुट कर जीना हमें भी आता है,

गर्मियों में पसीना हमें भी आता है।

पर क्‍या करें जब जब दी सलाह हमने,

अपने ही लोगों ने हर मर्तबा ठुकरा दिया।।

बदस्‍तूर ……………

हम शराब को पानी समझे,

हकीकत को कहानी समझे।

जो कोई परिन्‍दा लाया पैगाम,

उसको मुन्‍डेर से हमने ही उड़ा दिया।।

दिन भर जगाया महताब,

रात में सुला दिया।

बदस्‍तूर ……………

चिल्‍लाने से तकदीर नही बदलती,

हाथ कटने से तहरीर नही बदलती।

हमें याद थे सारे किस्से अतीत के,

एक एक करके सबको भुला दिया।।

हमने हर हक़ीकत के जाम में,

ज़हर मिला दिया।।

बदस्‍तूर ……………

Dated – 1 अप्रेल 2005 by प्रलयनाथ जालिम

अर्पित हूँ अर्पिता को

अर्पित हूँ अर्पिता को,

अर्चित हूँ अर्चिता का।

मंद हूँ मंदिता से,

नंद हूँ नंदिता का।।

स्‍नेह है स्‍नेहा से,

नेह हूँ नेहा का।

पूजा का पुजारी हूँ,

हुस्न का भिखरी हूँ।।

गर्व हूँ गर्विता का,

हर्ष हूँ हर्षिता का।

ऋतु का दीवाना हूँ,

नरगिस से बेगाना हूँ।।

राजा हूँ रानी का,

शिव हूँ शिवानी का।

अनुपम हूँ अनुपमा का।।

राम मै हूँ रमा का,

विद्वान हूँ विद्या से।

नित्‍य ही नित्या से,

प्रेम करता हूँ ख्‍वाब में।

गले लगा कर सबकी यादें,

जहर मिला लूँ शराब में।।


तुमने हमें भुला दिया

तुमने हमें भुला दिया,

हम भी तुम्‍हे भुला देगें।

जो आग लगी दिल में,

किसी रोज बुझा देगे।।

तुमने हमें ……….

तेरी हर अदा दिल में,

तेरी आँखो का नशा दिल में।

तेरे इस नशे को हम,

जाम में मिला देगे।।

तुमने हमें ……….

कितनी तन्‍हा है मेरे घर की तन्‍हारी,

कितनी जुदा है ये तेरी जुदाई।

तेरे निशान को हम

एक-एक करके मिटा देगे।

तुमने हमें ……….

हर शाम गुजारते हम यहाँ मयखाने में,

रोज डूब जाते है, छोटे से पैमाने में।

अब तो अपनी तन्हाई को,

हम साकी बना देंगे।।

तुमने हमें ……….

आज रात मेरे ज़ाम में ज़हर होगा,

कल सुबह के बाद जो दुपहर होगा।

ये लोग मुझको उठाकर,

शमशान तक पहुँचा देगे।।

तुमने हमें ……….

By ज़ालिम प्रलयनाथ, दिनाँक 2 अप्रेल 2005

चित्र सभार संग्रह

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