सारे शहर में खुशियाँ ही खुशियाँ

सारे शहर में खुशियाँ ही खुशियाँ,

मेरे घर में मातम है।

दिल मेरे दर्द भरा है,

आँखो में गम ही गम है।।

अपना जीवन कुछ भी नही,

ये नाटक का मंचन है।

सारे शहर में ………


कैसे कैसे किरदार जहॉ में,

कुछ है परेशां, कुछ मस्‍त फिजा में,

कैसे ये खुद को पहचाने

टूटे सारे दर्पण है।

सारे शहर में ………


कुछ है खफ़ा, कुछ नखरे में,

कुछ है आज़ाद खुद पिंजरे में,

कैसे सुनाए हाल-ए-दिल‍हम,

हर दृश्य विहंगम है।

सारे शहर में ………


बादल सारे बिखर गए है

कैसी से ‘प्रलय’ की दुनियाँ,

सुख-दुख का जो संगम है।

सारे शहर में ………

by प्रलयनाथ ज़ालिम, दिनाँक 2 अप्रेल 2005

ये गुलाबी होंठ , ये शराबी आँखें,

ये गुलाबी होंठ , ये शराबी आँखें,

हमको तेरा दीवाना बनाए।

क्‍यो छिपाए तुमसे कुछ?

हम क्‍यो कोई बहाना बनाए।।

ये गुलाबी ………..


जब से तेरी गली में दाखिल हुए है,

देखकर तेरा हुस्‍न पागल हुए है।

तेरी ये कातिल नजरे,

रोज हमें निशाना बनाए।।

ये गुलाबी ………..


इन जुल्‍फों में हम खो जाए,

तेरे आँचल में हम सो जाए।

तेरी इज़ाजत हो अग

इन आँखों को अपना ठिकाना बनाए।।

ये गुलाबी ………..


तेरे आगे ये शराब कुछ भी नही है

जन्‍नत की परियों का शबाब कुछ भी नही है।

आ जाओं तुम्‍हे हम साकी,

इन आँखों का पैमाना बनाए।।

ये गुलाबी ………..


तुम आकर मेरा हाथ थाम लो

जो खौफ हो, तुम मेरा नाम लो।

चलों कहीं दूर सनम,

हम अपना आशियाना बनाए।।

ये गुलाबी ………..

Written by प्रलायनाथ ज़ालिम,

दिनाँक- 3 अप्रेल 2004

प्रतिउत्तर एवं आभार अभिव्यक्ति,

आशिक़ की बद्दुआ वाले भाई साहब

सादर अभिवादन

विजयशंकर जीसादर प्रणाम मेरे अग्रज शरद बिल्लोरे की यादें ताज़ा कराने आपका आभार आप को मेरे ब्लॉग’स के बारे में जानकारी कम ही हैसिर्फ़ और सिर्फ़ आभास के कारण मैंने अन्तरज़ाल का प्रयोग आरंभ किया । आभास ने वो कर दिया जो मैं क्या कोई भी सहजता से नहीं करता. जब वो १६ वर्ष का था तब उसने मेरा एलबम ‘बावरे-फकीरा’गाया ये वही एलबम है जो पोलियो ग्रस्त बच्चों के लिए मदद जुटाएगा.अर्ध-सत्य ही उत्तेजना की वज़ह होते हैं….आप को विनम्र सलाह है की हाथी को पूरा देखने की आदत डालिए. आपको मालूम नहीं इस एलबम के सभी कलाकारों ने संस्कार वश नि:शुल्क सेवाएं दीं .

आप के उत्तेज़क विचारों ने मुझे झाखझोर दिया कविता के सृजक इतने तल्ख़ होतें हैं मुझे मालूम है किंतु वे हाथी को आंखों पे पट्टी बाँध के नहीं देखते गोया १८ बरस के बच्चे का कमाल,और उसकी तारीफ गले न उतरे मुझे नहीं लगता कविता ये सब सिखाती है। mahashakti जी का विचार मै आपकी भावनाओं की कर्द्र करता हूँ। हर व्‍यक्ति के नाम के साथ उस जगह का नाम जुड़ा होता है। आपकी बात पूरी तरह जायज है किन्‍तु मै इतना ही कहना चाहूँगा कि आज इलाहाबाद का नाम काफी हद तक लोग हरिवंश राय बच्‍चन और अमिताभ के कारण जानते है। और भी बहुत सी महानतम हस्‍ती हुई है उनके योगदान को नही नकारा जा सकता है। आज अभास उग रहा है तो कल और भी सूरज उगेगें। समझाने लायक है

मेरी आवाज़ सुनिए

"परगति के वीर….!!",

दधि मथ माखन काढ़ते,जे परगति के वीर,
बाक-बिलासी सब भए,लड़ें बिना शमशीर .
बांयें दाएं हाथ का , जुद्ध परस्पर होड़
पूंजी सन्मुख जे दिखें ,खड़े जुगल कर जोड़
अब तो गांधी आपको, आते हैं क्यों याद
क्या विचार की चुक गई परगति वीरो खाद.
धर्म पंथ मध्यम बरग,विषय परगति को भाय
उसी थाल को छेदते जिसमें भोजन खाय.

होली तो ससुराल

होली तो ससुराल की बाक़ी सब बेनूर
सरहज मिश्री की डली,साला पिंड खजूर
साला पिंड-खजूर,ससुर जी ऐंचकताने
साली के अंदाज़ फोन पे लगे लुभाने
कहें मुकुल कवि होली पे जनकपुर जाओ
जीवन में इक बार,स्वर्ग का तुम सुख पाओ..!!
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होली तो ससुराल की बाक़ी सब बेनूर
न्योता पा हम पहुंच गए मन संग लंगूर,
मन में संग लंगूर,लख साली की उमरिया
मन में उठे विचार,संग लें नयी बंदरिया .
कहत मुकुल कविराय नए कानून हैं आए
दो होली में झौन्क, सोच जो ऐसी आए …!!
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होली तो ससुराल की ,बाक़ी सब बेनूर
देवर रस के देवता, जेठ नशे में चूर ,
जेठ नशे में चूर जेठानी ठुमुक बंदरिया
ननदी उम्र छुपाए कहे मोरी बाली उमरिया .
कहें मुकुल कवि सास हमारी पहरेदारिन
ससुर देव के दूत जे उनकी हैं पनिहारिन..!!
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सुन प्रिय मन तो बावरा, कछु सोचे कछु गाए,
इक-दूजे के रंग में हम-तुम अब रंग जाएं .
हम-तुम अब रंग जाएं,फाग में साथ रहेंगे
प्रीत रंग में भीग अबीरी फाग कहेंगे ..!
कहें मुकुल कविराय होली घर में मनाओ
मंहगे हैं त्यौहार इधर-उधर न जाओ !!

मुकुल के दोहे

प्रिया बसी है सांस में मादक नयन कमान
छब मन भाई,आपकी रूप भयो बलवान।
सौतन से प्रिय मिल गए,बचन भूल के सात
बिरहन को बैरी लगे,क्या दिन अरु का रात
प्रेमिल मंद फुहार से, टूट गयो बैराग,
सात बचन भी बिसर गए,मदन दिलाए हार ।
एक गीत नित प्रीत का,रचे कवि मन रोज,
प्रेम आधारी विश्व की , करते जोगी खोज । ।
तन मै जागी बासना,मन जोगी समुझाए-
चरण राम के रत रहो , जनम सफल हों जाए । ।

दधि मथ माखन काढ़ते,जे परगति के वीर,
बाक-बिलासी सब भए,लड़ें बिना शमशीर .
बांयें दाएं हाथ का , जुद्ध परस्पर होड़
पूंजी पति के सामने,खड़े जुगल कर जोड़

रात की रानी की तरह महकती हूँ

रात की रानी की तरह महकती हूँ,
दिन के राज के लिये तरसती हूँ।
शाम होने पर वो चला जाता है,
सुबह होने पर मै चली जाती हूँ।

मिलने के लिये तरसते है दोनो,
वक्‍त के फेर में तड़पते है दोनो।
मिलन की की आस में दोनों,
दिन-रात में महकते है दोनों।

एक भोर,

एक भोर,
दूजी भोर,
तीजी भोर,
लगातार होती भोर…..
आज तक मेरे आँगन मी लगे बिही के पेड़ पर
बैठ कर कौए की
कोई कांव-कांव नहीं !
एक शाम
दूजी शाम,
तीजी शाम,
मैं कभी न खड़ी हो सकी
प्रिय की प्रतीक्षा में ,
घर की चौखट पे ….!!
एक-एक कर सारे तीज त्यौहार निकल गए,
मैं विधवा आज भी बेडियों से जकड़ी
आख़िरी दिन के इंतज़ार में हूँ,

अच्छाई और बुराई

जो अच्छाईयाँ हैं तुममें –
सर्वत्र बिखेर दो !
महका दो –
गुलाब की तरह!
जो पाये –
अपना ले !
महक मिले जिसे –
बहक जाए !
बस अच्छाईयाँ बिखराए।
.
जो बुराईयाँ हैं तुममें –
उन्हें समेट लो !
दबा दो –
कफन में !
सुला दो –
चिर निद्रा में !
न उठने पाएं,
न दिखने पाएं,
न दूसरों को बहका पाएं!
.
कवि कुलवंत सिंह

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