>लीपा-पोती और मामला रफ़ा-दफ़ा, शर्म करो बीसीसीआई…

>BCCI, Sharad Pawar, Australia Cricket Board

एक बार फ़िर वही कहानी दोहराई गई, नेताओं ने हमेशा की तरह देश के आत्मसम्मान की जगह पैसे को तरजीह दी, कुर्सी को प्रमुखता दी| मैंने पिछले लेख में लिखा था कि “शरद पवार कम से कम अब तो मर्दानगी दिखाओ”…लेकिन नहीं समूचे देश के युवाओं ने जमकर विरोध प्रकट किया, मीडिया ने भी (अपने फ़ायदे के लिये ही सही) दिखावटी ही सही, देशभक्ति को दो दिन तक खूब भुनाया इतना सब होने के बावजूद नतीजा वही ढाक के तीन पात| शंका तो उसी समय हो गई थी जब NDTV ने कहा था कि “बीच का रास्ता निकालने की कोशिशें जारी हैं…”, तभी लगा था कि मामले को ठंडा करने के लिये और रफ़ा-दफ़ा करने के लिये परम्परागत भारतीय तरीका अपनाया जायेगा भारत की मूर्ख जनता के लिये यह तरीका एकदम कारगर है, मतलब एक समिति बना दो, जो अपनी रिपोर्ट देगी, फ़िर न्यायालय की दुहाई दो, फ़िर भी बात नहीं बने तो भारतीय संस्कृति और गांधीवाद की दुहाई दो… बस जनता का गुस्सा शान्त हो जायेगा, फ़िर ये लोग अपने “कारनामे” जारी रखने के लिये स्वतन्त्र !!!

आईसीसी के चुनाव होने ही वाले हैं, शरद पवार की निगाह उस कुर्सी पर लगी हुई है, दौरा रद्द करने से पवार के सम्बन्ध अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खराब हो जाते, क्योंकि जो लोग हमसे भीख लेते हैं (वेस्टइंडीज, बांग्लादेश आदि) उनका भी भरोसा नहीं था कि वे इस कदम का समर्थन करते, क्योंकि इन देशों के मानस पर भी तो अंग्रेजों की गुलामी हावी है, इसलिये टीम को वहीं अपमानजनक स्थिति में सिडनी में होटल में रुकने को कह दिया गया, ताकि “सौदेबाजी” का समय मिल जाये| दौरा रद्द करने की स्थिति में लगभग आठ करोड़ रुपये का हर्जाना ऑस्ट्रेलिया बोर्ड को देना पड़ता जो बोर्ड अपने चयनकर्ताओं के फ़ालतू दौरों और विभिन्न क्षेत्रीय बोर्डों में जमें चमचेनुमा नेताओं (जिन्हें क्रिकेट बैट कैसे पकड़ते हैं यह तक नहीं पता) के फ़ाइव स्टार होटलों मे रुकने पर करोड़ों रुपये खर्च कर सकता है, वह राष्ट्र के सम्मान के लिये आठ करोड़ रुपये देने में आगे-पीछे होता रहा फ़िर अगला डर था टीम के प्रायोजकों का, उन्हें जो नुकसान (?) होता उसकी भरपाई भी पवार, शुक्ला, बिन्द्रा एन्ड कम्पनी को अपनी जेब से करनी पड़ती? इन नेताओं को क्या मालूम कि वहाँ मैदान पर कितना पसीना बहाना पड़ता है, कैसी-कैसी गालियाँ सुननी पड़ती हैं, शरीर पर गेंदें झेलकर निशान पड़ जाते हैं, इन्हें तो अपने पिछवाड़े में गद्दीदार कुर्सी से मतलब होता है तारीफ़ करनी होगी अनिल कुम्बले की… जैसे तनावपूर्ण माहौल में उसने जैसा सन्तुलित बयान दिया उसने साबित कर दिया कि वे एक सफ़ल कूटनीतिज्ञ भी हैं|

इतना हो-हल्ला मचने के बावजूद बकनर को अभी सिर्फ़ अगले दो टेस्टों से हटाया गया है, हमेशा के लिये रिटायर नहीं किया गया है हरभजन पर जो घृणित आरोप लगे हैं, वे भी आज दिनांक तक नहीं हटे नहीं हैं| आईसीसी का एक और चमचा रंजन मदुगले (जो जाने कितने वर्षों से मैच रेफ़री बना हुआ है) अब बीच-बचाव मतलब मांडवाली (माफ़ करें यह एक मुम्बईया शब्द है) करने पहुँचाया गया है मतलब साफ़ है, बदतमीज और बेईमान पोंटिंग, क्लार्क, सायमंड्स, और घमंडी हेडन और ब्रेड हॉग बेदाग साफ़…(फ़िर से अगले मैच में गाली-गलौज करने को स्वतन्त्र), इन्हीं में से कुछ खिलाड़ी कुछ सालों बाद आईपीएल या आईसीएल में खेलकर हमारी जेबों से ही लाखों रुपये ले उड़ेंगे और हमारे क्रिकेट अधिकारी “क्रिकेट के महान खेल…”, “महान भारतीय संस्कृति” आदि की सनातन दुहाई देती रहेंगे|

सच कहा जाये तो इसीलिये इंजमाम-उल-हक और अर्जुन रणतुंगा को सलाम करने को जी चाहता है, जैसे ही उनके देश का अपमान होने की नौबत आई, उन्होंने मैदान छोड़ने में एक पल की देर नहीं की…| अब देखना है कि भारतीय खिलाड़ी “बगावत” करते हैं या “मैच फ़ीस” की लालच में आगे खेलते रहते हैं… इंतजार इस बात का है कि हरभजन के मामले में आईसीसी कौन सा “कूटनीतिक” पैंतरा बदलती है और यदि उसे दोषी करार दिया जाता है, तो खिलाड़ी और बीसीसीआई क्या करेंगे? इतिहास में तो सिडनी में हार दर्ज हो गई…कम से कम अब तो नया इतिहास लिखो…

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>शरद पवार जी कम से कम अब तो मर्दानगी दिखाओ…

>Sharad Pawar, ICC, Cricket Australia

अम्पायरों की मिलीभगत से पहले तो भारत को सिडनी टेस्ट में हराया गया और फ़िर अब हरभजन को “नस्लभेदी”(??) टिप्पणियों के चलते तीन टेस्ट का प्रतिबन्ध लगा दिया गया है, यानी “जले पर नमक छिड़कना”…शरद पवार जी सुन रहे हैं, या हमेशा की तरह बीसीसीआई के नोटों की गड्डियाँ गिनने में लगे हुए हैं पवार साहब, ये वही बेईमान, धूर्त और गिरा हुआ पोंटिंग है जिसने आपको दक्षिण अफ़्रीका में मंच पर “बडी” कहकर बुलाया था, और मंच से धकिया दिया था विश्वास नहीं होता कि एक “मर्द मराठा” कैसे इस प्रकार के व्यवहार पर चुप बैठ सकता है हरभजन पर नस्लभेदी टिप्पणी का आरोप लगाकर उन्होंने पूरे भारत के सम्मान को ललकारा है, जो लोग खुद ही गाली-गलौज की परम्परा लिये विचरते रहते हैं, उन्होंने एक “प्लान” के तहत हरभजन को बाहर किया है, बदतमीज पोंटिंग को लगातार हरभजन ने आऊट किया इसलिये… आईसीसी का अध्यक्ष भी गोरा, हरभजन की सुनवाई करने वाला भी गोरा… शंका तो पहले से ही थी (देखें सायमंड्स सम्बन्धी यह लेख) कि इस दौरे पर ऐसा कुछ होगा ही, लेकिन भारत से बदला लेने के लिये ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी इस स्तर तक गिर जायेंगे, सोचा नहीं था…

अब तो बात देश के अपमान की आ गई है, यदि अब भी “बिना रीढ़” के बने रहे और गाँधीवादियों(??) के प्रवचन (यानी… “जो हुआ सो हुआ जाने दो…” “खेल भावना से खेलते रहो…” “हमें बल्ले से उनका जवाब देना होगा…” “भारत की महान संस्कृति की दुहाईयाँ…” आदि-आदि) सुनकर कहीं ढीले न पड़ जाना, वरना आगे भी उजड्ड ऑस्ट्रेलियाई हमें आँखें दिखाते रहेंगे सबसे बड़ी बात तो यह है कि जब हमारा बोर्ड आईसीसी में सबसे अधिक अनुदान देता है, वेस्टईंडीज और बांग्लादेश जैसे भिखारी बोर्डों की मदद करता रहता है, तो हम किसी की क्यों सुनें और क्यों किसी से दबें…? कहा जा रहा है कि अम्पायरों को हटाकर मामला रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाये… जबकि भारत के करोड़ों लोगों की भावनाओं को देखते हुए हमारी निम्न माँगें हैं… जरा कमर सीधी करके आईसीसी के सामने रखिये…

(1) सिडनी टेस्ट को “ड्रॉ” घोषित किया जाये
(2) “ब” से बकनर, “ब” से बेंसन यानी “ब” से बेईमानी… को हमेशा के लिये “ब” से बैन किया जाये
(3) हरभजन पर लगे आरोपों को सिरे से खारिज किया जाये
(4) अन्तिम और सबसे महत्वपूर्ण यह कि टीम को तत्काल वापस बुलाया जाये…

ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? आईसीसी दौरा बीच में छोड़ने के लिये भारतीय बोर्ड पर जुर्माना कर देगा? क्या जुर्माना हम नहीं भर सकते, या जुर्माने की रकम खिलाड़ियों और देश के सम्मान से भी ज्यादा है? राष्ट्र के सम्मान के लिये बड़े कदम उठाने के मौके कभी-कभी ही मिलते हैं (जैसा कि कन्धार में मिला था और हमने गँवाया भी), आशंका इसलिये है कि पहले भी सोनिया गाँधी को विदेशी मूल का बताकर फ़िर भी आप उनके चरणों में पड़े हैं, कहीं ऐसी ही “पलटी” फ़िर न मार देना… अब देर न करिये साहब, टीम को वापस बुलाकर आप भी “हीरो” बन जायेंगे… अर्जुन रणतुंगा से कुछ तो सीखो… स्टीव वॉ ने अपने कॉलम में लिखा है कि “इस प्रकार का खेल तो ऑस्ट्रेलियाई संस्कृति है”, अब हमारी बारी है… हम भी दिखा दें कि भारत का युवा जाग रहा है, वह कुसंस्कारित गोरों से दबेगा नहीं, अरे जब हम अमेरिका के प्रतिबन्ध के आगे नहीं झुके तो आईसीसी क्या चीज है… तो पवार साहब बन रहे हैं न हीरो…? क्या कहा… मामला केन्द्र सरकार के पास भेज रहे हैं… फ़िर तो हो गया काम…

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>स्टीव बकनर पगला गये हैं और शरद पवार…???

>Bucknor Umpiring Sharad Pawar Indian Cricket

जिस किसी ने सिडनी का टेस्ट मैच देखा होगा, वह साफ़-साफ़ महसूस कर सकता है कि भारत की टीम को हराने के लिये ऑस्ट्रेलिया 13 खिलाड़ियों के साथ खेल रहा था दोनों अम्पायर जिनमें से स्टीव बकनर तो खासतौर पर “भारत विरोधी” रहे हैं, ने मिलकर भारत को हरा ही दिया पहली पारी में चार गलत निर्णय देकर पहले बकनर ने ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों को ज्यादा रन बनाने दिये, और आखिरी पारी में दो गलत निर्णय देकर भारत को ऑल-आऊट करवा दिया सबसे शर्मनाक तो वह क्षण था जब गांगुली के आऊट होने के बारे में बकनर ने पोंटिंग से पूछ कर निर्णय लिया वैसे ही बेईमानी के लिये कुख्यात ऑस्ट्रेलियाई कप्तान क्या सही बताते? ठीक यही बात हरभजन के नस्लभेदी टिप्पणी वाले मामले में है, साफ़ दिखाई दे रहा है कि यह आरोप “भज्जी” को दबाव में लाने और फ़िर भारतीय टीम को तोड़ने के लिये लगाया गया है खेल में ‘फ़िक्सिंग’ होती है, होती रहेगी, लेकिन खुद अम्पायर ही मैच फ़िक्स करें यह पहली बार हुआ है शंका तो पहले से ही थी (देखें सायमंड्स सम्बन्धी यह लेख) कि इस दौरे पर ऐसा कुछ होगा ही, लेकिन भारत से बदला लेने के लिये ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी इस स्तर तक गिर जायेंगे, सोचा नहीं था…

इस सबमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि “महान भारत की महान की परम्परा”(??) के अनुसार भारत के कंट्रोल बोर्ड ने अम्पायरिंग की कोई शिकायत नहीं करने का फ़ैसला किया है नपुंसकता की भी कोई हद होती है, और यह कोई पहली बार भी नहीं हो रहा है… याद कीजिये पाकिस्तान में हुए उस मैच को जिसमें संजय मांजरेकर को अम्पायरों ने लगभग अन्धेरे में खेलने के लिये मजबूर कर दिया था, लेकिन हमेशा ऐसे मौकों पर भारतीय बोर्ड “मेमना” बन जाता है जरा श्रीलंका के अर्जुन रणतुंगा से तो सीख लेते, कैसे उसने मुरली का साथ दिया, जब लगातार अम्पायर उसे चकर घोषित कर रहे थे और ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी उस पर नस्लभेदी टिप्पणी कर रहे थे रणतुंगा समूची टीम के साथ मैदान छोड़कर बाहर आ गये थे और फ़िर आईसीसी की हिम्मत नहीं हुई कि जिस मैच में श्रीलंका खेल रहा हो उसमें डेरेल हेयर को अम्पायर रखे

लेकिन कोई भी बड़ा और कठोर निर्णय लेने के लिये जो “रीढ़ की हड्डी” लगती है वह भारतीय नेताओं में कभी भी नहीं थी, ये लोग आज भी गोरों के गुलाम की तरह व्यवहार करते हैं… शर्म करो शरद पवार… यदि अब भी टीम का दौरा जारी रहता है तो लानत है तुम पर…तुम्हारे चयनकर्ताओं पर जो अब ऑस्ट्रेलिया घूमने जा रहे हैं… और दुनिया के सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड के अरबों रुपये पर…

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>“भद्रजनों के खेल” की कुछ प्रसिद्ध गालीगलौज (स्लेजिंग)

>Slazing, Cricket, Gentleman Game

विकीपीडिया के अनुसार “स्लेजिंग” का मतलब है “विपक्षी खिलाड़ी को शब्द-बाणों से मानसिक संताप देकर उसका स्वाभाविक खेल बिगाड़ना”… क्रिकेट को भद्रजनों का खेल माना जाता है, माना जाता है इसलिये लिख रहा हूँ कि जब आप यह लेख पूरा पढ़ लेंगे तब इसे भद्रजनों का खेल मानेंगे या नहीं, कहना मुश्किल है। क्रिकेट में “स्लेजिंग” कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस स्लेजिंग या शब्दों के आक्रामक आदान-प्रदान के दौरान कई बार मजेदार स्थितियाँ भी बन जाती हैं, कई बार दाँव उलटा भी पड़ जाता है। मैंने अपने पिछले क्रिकेट लेख में पाठकों से वादा किया था कि क्रिकेट इतिहास की कुछ प्रसिद्ध(?) स्लेजिंग के बारे में लिखूँगा, तो पेश हैं कुछ खट्टी-मीठी, कुछ तीखी स्लेजिंग, जिसमें कई प्रसिद्ध खिलाड़ी शामिल हैं (महिला पाठकों से मैं अग्रिम माफ़ी माँगता हूँ, कोई-कोई वाक्य अश्लील हैं, लेकिन मैं भी मजबूर हूँ, जो महान(?) खिलाड़ियों के उद्‌गार हैं वही पेश कर रहा हूँ), लेकिन एक बात तो तय है कि स्लेजिंग से यह खेल नीरस और ऊबाऊ नहीं रह जाता, बल्कि इसमें एक “तड़का” लग जाता है, भारत दौरे पर ऑस्ट्रेलिया के खिलाडियों के चिढ़ने का असली कारण यही था कि जिस स्लेजिंग के “खेल” में वे सबसे आगे रहते थे, उसी में भारतीय खिलाड़ी उनसे मुकाबला करने लगे।

स्लेजिंग की शुरुआत तो उसी समय हो गई थी, जब क्रिकेट के पितामह कहे जाने वाले इंग्लैंड के W.G.Grace ने एक बार अम्पायर द्वारा जल्दी आऊट दिये जाने पर उससे कहा था, “दर्शक यहाँ मेरी बल्लेबाजी देखने आये हैं, तुम्हारी उँगली नहीं”, समझे….और वे दोबारा बल्लेबाजी करने लगे। लेकिन एक बार जब गेंद से उनकी गिल्ली उड़ गई, तो ग्रेस महोदय सहजता से अम्पायर से बोले, “आज हवा काफ़ी तेज चल रही है, देखा गिल्लियाँ तक गिर गईं”, लेकिन अम्पायर साहब भी कहाँ कम थे, वे बोले, “हाँ वाकई हवा तेज है, और यह पेवेलियन जाते वक्त आपको जल्दी जाने में मदद करेगी”…।

डबल्यू जी ग्रेस को एक बार बहुत मजेदार “स्लेजिंग” झेलनी पड़ी थी, जब एक काऊंटी मैच में चार्ल्स कोर्टराईट नामक गेंदबाज की अपील चार-पाँच बार अम्पायर ने ठुकरा दी थी, और ग्रेस लगातार गेंदबाज को मुस्करा कर चिढ़ाये जा रहे थे, अन्ततः एक गेंद पर ग्रेस के दो स्टम्प उखड़ कर दूर जा गिरे, पेवेलियन जाते वक्त कोर्टराइट ने ताना मारा, “डॉक्टर..चाहो तो तुम अब भी खेल सकते हो, एक स्टम्प बाकी है…” और ग्रेस जल-भुनकर रह गये।

एक गेंद में हीरो से जीरो बनने का वाकया – वेंकटेश प्रसाद Vs आमिर सोहेल
विश्वकप में भारत ने पाकिस्तान को हमेशा हराया है। भारत में हुए विश्वकप के दौरान भारत के पहली पारी में बनाये गये 287/8 के स्कोर का पीछा करते हुए आमिर सोहेल और सईद अनवर ने 15 ओवर में 110 रन बना लिये थे, दोनो बल्लेबाज जहाँ चाहे वहाँ रन ठोक रहे थे, ऐसे में एक ओवर के दौरान वेंकटेश प्रसाद की गेंद पर आमिर सोहेल ने एक जोरदार चौका जड़ा, और प्रसाद को इशारा कर बताया कि तेरी अगली गेंद भी मैं वहीं पहुँचाऊँगा। वेंकटेश प्रसाद आमतौर पर शांत रहने वाले खिलाड़ी हैं। वे चुपचाप अगली गेंद डालने वापस गये, और भाग्य का खेल देखिये कि प्रसाद की अगली गेंद पर सोहेल बहादुरी दिखाने के चक्कर में बोल्ड हो गये, अब बारी प्रसाद की थी और उन्होंने पहली बार आपा खोते हुए चिल्लाकर आमिर को पेवेलियन की ओर जाने का इशारा किया, आमिर सोहेल का मुँह देखने लायक था। उस गेंद के बाद प्रसाद ने हजारों गेंदे फ़ेंकी होंगी, सैकड़ों विकेट लिये होंगे, लेकिन वह गेंद और उनका वह आक्रामक जवाब उन्हें (और हमें भी) आजीवन याद रहेगा। उस मैच में भी इतनी बेहतरीन शुरुआत के बावजूद पाकिस्तान भारत से हार गया था।

स्टीव वॉ और एम्ब्रोज प्रकरण-

यह वाकया दो महान खिलाडियों के बीच का है, त्रिनिदाद के एक टेस्ट मैच के दौरान जब कर्टली एम्ब्रोज अपनी आग उगलती गेंदों से स्टीव वॉ को परेशान किये हुए थे, अचानक स्टीव ने एम्ब्रोज को कहा – ” What the f*ck are you looking at? ” एम्ब्रोज भौंचक्के रह गये, क्योंकि आज तक उनसे किसी ने ऐसी भाषा में कोई बात नहीं की थी। एम्ब्रोज स्टीव की तरफ़ आक्रामक रूप से बढ़े और कहा, “Don’t cuss me, man”, लेकिन ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी किसी से हार नहीं मानते, स्टीव ने पलट कर फ़िर जवाब दिया-‘Why don’t you go and get f*cked.’ ” अब तो एम्ब्रोज लगभग स्टीव को मारने ही चले थे, वेस्टइंडीज के कप्तान रिची रिचर्डसन उन्हें बड़ी मुश्किल से संभाल पाये थे, वरना स्टीव वॉ एक घूँसा तो निश्चित खाते।

मैक्ग्राथ Vs एडो ब्रांडेस
एक बार जिम्बाब्वे की टीम के आखिरी बल्लेबाज एडो ब्रांडेस, मैक्ग्राथ के सामने खेल रहे थे, मैक्ग्राथ उन्हें आऊट करने की जी-तोड़ कोशिश करते रहे, ब्रांडेस ठहरे गेंदबाज, कभी गेंद चूक जाते, कभी कैच दूर से निकल जाता, कभी बल्ला कहीं लग जाता और गेंद कहीं और निकल जाती। जब आखिरी बल्लेबाज आऊट न हो रहा हो उस वक्त गेंदबाज सबसे ज्यादा निराश और गुस्से में होता है। मैक्ग्राथ चिढ़ कर ब्रांडेस से बोले- साले, तुम इतने मोटे क्यों हो?… हाजिरजवाबी की इन्तहा देखिये कि एक क्षण भी गँवाये बिना ब्रांडेस बोले, “क्योंकि जब-जब भी मैं तुम्हारी बीवी से प्यार करता हूँ, वह मुझे एक चॉकलेट देती है”… यह इतना तगड़ा झटका था कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी भी हँस पड़े थे।

विवियन रिचर्ड्स और ग्रेग थॉमस
यह वाकया काउंटी मैच के दौरान हुआ था, जब ग्लेमोर्गन और समरसेट के बीच मैच चल रहा था। ग्लेमोर्गन के तेज गेंदबाज ग्रेग थॉमस, महान रिचर्ड्स को दो-तीन बार “बीट” कर चुके थे, एक बाउंसर भी रिचर्ड्स की नाक के पास से गुजर चुका था, थॉमस ने कहा- “सुनो रिचर्ड्स, यह एक लाल गेंद है जो लगभग पाँच औंस की होती है, यदि तुम्हें पता न हो तो खेलना बन्द कर दो”, “किंग” के नाम से मशहूर रिचर्ड्स ने अगली दो गेंदों पर दो छक्के लगाये और ग्रेग से कहा- “ग्रेग जरा जाकर गेंद ढूँढो और मुझे बताओ कि वह कैसी लगती है”….

सचिन तेंडुलकर Vs अब्दुल कादिर
अमूमन भारतीय खिलाड़ी पहले के जमाने में किसी से उलझते नहीं थे, और तेंडुलकर तो शुरु से शांत खिलाड़ी रहे हैं और बल्ले से ही जवाब देत हैं। सन्‌की बात है, लिटिल मास्टर ने अपना पहला टेस्ट मैच पाकिस्तान में खेलना शुरु किया। उस वक्त उनकी उम्र ड्रायविंग लायसेंस प्राप्त करने लायक भी नहीं थी। पाकिस्तानी दर्शकों ने पोस्टर लगा रखे थे “दूध पीता बच्चा, घर जा के दूध पी”, सचिन ने लेग स्पिनर मुश्ताक अहमद के एक ओवर में दो छक्के लगाये। मुश्ताक के गुरु वरिष्ठ लेग स्पिनर अब्दुल कादिर से नहीं रहा गया, उसने कहा- “बच्चों को क्या मारता है बे, हमें भी मार कर दिखा”…. सचिन चुपचाप रहे, कादिर के अगले ओवर में सचिन सामने थे, बिना डरे उन्होंने 6, 0, 4, 6, 6, 6 का स्कोर उस ओवर में किया और दुनिया के सामने शंखनाद कर दिया कि एक महान खिलाड़ी मैदान में आ चुका है।

मैक्ग्राथ Vs रामनरेश सरवन
मई २००३ में एंटीगुआ टेस्ट के दौरान जब सरवन सभी ऑस्ट्रेलियन गेंदबाजों को धो रहे थे, उस वक्त मैक्ग्राथ का पारा गरम हो गया। वे लगातार सरवन को घूरते रहे, चिढ़ाते रहे, इशारे करते रहे, लेकिन सरवन आऊट नहीं हो रहे थे, मैक्ग्राथ ने एक भद्दी टिप्पणी की- “So what does Brian Lara’s d*ck taste like?” सरवन ने भी तड़ से जवाब दिया- “I don’t know. Ask your wife. ” अब तो मैक्ग्राथ पूरी तरह उखड़ गये (क्योंकि उस समय उनकी पत्नी का कैंसर का इलाज चल रहा था), लगभग घूँसा तानते हुए मैक्ग्राथ ने कहा- “If you ever F*&king mention my wife again, I’ll F*cking rip your F*fing throat out.” लेकिन इसमें सरवन की कोई गलती नहीं थी, उन्होंने तो सिर्फ़ जवाब दिया था।

मार्क वॉ Vs एडम परोरे
मार्क वॉ जो अक्सर दूसरी स्लिप में खड़े रहते थे, हमेशा वहाँ से कुछ न कुछ बोलते रहते थे, एक बार उन्होंने एडम परोरे से कहा- “Ohh, I remember you from a couple years ago in Australia. You were sh*t then, you’re fu*king useless now”. परोरे ने जवाब दिया – “Yeah, that’s me & when I was there you were going out with that old, ugly sl*t & now I hear you’ve married her. You dumb c*nt “.

रवि शास्त्री Vs माइकल व्हिटनी
भारत के एक और “कूल माइंडेड” खिलाड़ी रवि शास्त्री ने भी एक बार मजेदार जवाब दिया था। ऑस्ट्रेलिया में एक मैच के दौरान जब रवि शास्त्री एक बार रन लेने के लिये दौड़ने वाले थे, बारहवें खिलाड़ी माइकल व्हिटनी ने गेंद मारने के अन्दाज में कहा- “यदि तुमने एक कदम भी आगे बढ़ाया तो इस गेंद से मैं तुम्हारा सिर तोड़ दूँगा”, शास्त्री ने बगैर पलकें झपकाये जवाब दिया, “जितना तुम बोलने में अच्छे हो यदि उतना ही खेलने में अच्छे होते तो आज बारहवें खिलाड़ी ना होते”…

रॉबिन स्मिथ Vs मर्व ह्यूज
ऑस्ट्रेलिया के मर्व ह्यूज “स्लेजिंग” कला(?) के बड़े दीवाने थे, और लगातार कुछ ना कुछ बोलते ही रहते थे। एक बार लॉर्ड्स टेस्ट के दौरान जब एक-दो बार रॉबिन स्मिथ उनकी गेंद चूके तो ह्यूज बोले- “ए स्मिथ तुम्हें बल्लेबाजी नहीं आती”। अगली दो गेंदों पर दो चौके लगाने के बाद स्मिथ ने कहा-“ए मर्व, हम दोनों की जोड़ी सही रहेगी, मुझे बल्लेबाजी नहीं आती और तुम्हें गेंदबाजी…”

ऐसा नहीं है कि स्लेजिंग सिर्फ़ विपक्षी खिलाडियों में ही होती है, कई बार एक ही टीम के खिलाड़ी भी आपस में भिड़ लेते हैं (पाकिस्तान इस मामले में मशहूर है)। एक बार इंग्लैंड का पाकिस्तान दौरा चल रहा था, फ़्रैंक टायसन बहुत मेहनत से गेंदबाजी कर रहे थे, अचानक एक कैच स्लिप में रमन सुब्बाराव नामक खिलाड़ी की टाँगों के बीच से निकल गया। ओवर समाप्त होने के बाद रमन ने टायसन से माफ़ी माँगते हुए कहा, “सॉरी यार मुझे टाँगों के बीच गैप नहीं रखना था”… टायसन जो कि नस्लभेदी मानसिकता के थे, ने कहा- हरामी, तुम्हें नहीं बल्कि तुम्हारी माँ को टाँगों के बीच गैप नहीं रखना था”….

दो बदमजा वाकये –
ये दो वाकये हालांकि “स्लेजिंग” की श्रेणी में नहीं आते लेकिन यदि यह पूरी तौर से घटित हो जाते तो क्रिकेट इतिहास में काले धब्बों के नाम पर गिने जाते।

पहला वाकया है डेनिस लिली और जावेद मियाँदाद के बीच का- ऑस्ट्रेलिया में एक मैच के दौरान एक रन लेते समय मियाँदाद, लिली से टकरा गये। मियाँदाद के अनुसार लिली ने उन्हें जानबूझकर रन लेने से रोकने की कोशिश की थी। उस टक्कर के बाद अचानक, गुस्सैल लिली, मियाँदाद के पास पहुँचे और उनके पैड पर एक लात जड़ दी। मियाँदाद भी गुस्से से बैट लेकर आगे बढे और लिली के सिर पर प्रहार करने ही वाले थे, लेकिन अम्पायर ने किसी तरह बीच-बचाव किया और दोनों को शांत किया।

दूसरी घटना है गावसकर और लिली के बीच की, मेलबोर्न टेस्ट के दौरान जब गावस्कर 70 रनों पर खेल रहे थे, तब लिली ने एक एलबीडब्लयू की अपील की, गावसकर ने अम्पायर को अपना बल्ला दिखाते हुए कहा कि गेंद उनके बल्ले से लगने के बाद पैड पर लगी है, लेकिन लिली को धैर्य कहाँ, वे तेजी से आगे बढ़े और गावसकर के पैड पर इशारा करके बताया कि गेंद यहाँ लगी और पास आकर धीरे से एक गाली दी, अम्पायर के आऊट देने के बाद गावसकर जब पेवेलियन वापस जाने लगे तब लिली ने एक और गाली दी, बस तब गावसकर दिमाग खराब हो गया, वे चार कदम वापस लौटे और अपने साथी खिलाड़ी चेतन चौहान को साथ लेकर पेवेलियन जाने लगे। सभी हक्के-बक्के हो गये, क्योंकि इस तरह से किसी कप्तान और बल्लेबाज का मैदान छोड़कर जाना हैरानी भरा ही था। तत्काल मैनेजर और वरिष्ठ अधिकारियों ने बात को मैदान में आकर संभाला, वरना जो अर्जुन रणतुंगा और इंजमाम ने किया था, वह गावस्कर पहले ही कर चुके होते। हालांकि बाद में गावस्कर ने अपनी पुस्तक में इस घटना के बारे में लिखा था कि “वह निर्णय मेरे द्वारा लिया आवेश में गया एक बेहद मूर्खतापूर्ण कदम था”….

गावस्कर को ही एक बार रिचर्ड्स ने मजाक में ताना मारा था, हुआ यह था कि गावस्कर ने एक बार यह तय किया कि वह नम्बर चार पर बल्लेबाजी करने आयेंगे… और संयोग यह हुआ कि मैल्कम मार्शल ने पहली दो गेंदों पर ही अंशुमन गायकवाड़ और दिलीप वेंगसरकर को आऊट कर दिया था, गावस्कर जब बल्लेबाजी करने उतरे तो स्कोर था 0/2, रिचर्ड्स ने मजाक में कहा, “सनी तुम चाहे जो कर लो, तुम जब भी बल्लेबाजी के लिये उतरोगे, स्कोर 0 ही रहेगा”…..

स्टीव वॉ Vs पार्थिव पटेल
अपने आखिरी टेस्ट मैच में स्टीव बढिया बल्लेबाजी कर रहे थे, 19 वर्षीय पार्थिव विकेटकीपर थे, स्टीव वॉ स्वीप पर स्वीप किये जा रहे थे, पटेल से नहीं रहा गया, वह बोला- “कम ऑन क्रिकेट में आखिरी बार अपना स्वीप चला कर दिखा दो”… 38 वर्षीय स्टीव ने जवाब दिया, “कम से कम बड़ों के प्रति कुछ तो इज्जत दिखाओ, जब तुम लंगोट में थे तब मैं टेस्ट खेलना शुरु कर चुका था”…. उसके बाद पार्थिव पूरे मैच कुछ नहीं बोले….

1960 में जब इंग्लैंड के क्रिकेट मैदानों में पेवेलियन से आने के लिये एक लकड़ी का छोटा सा दरवाजा लगा होता था, एक नया बल्लेबाज क्रीज पर आने के लिये पेवेलियन से निकला और मैदान में आकर वह पीछे का लकडी का दरवाजा बन्द करने लगा, तब फ़्रेड ट्रूमैन तत्काल बोले, “रहने दो, खुला ही रहने दो बच्चे, तुम्हें जल्दी ही तो वापस आना है”….

1980 में इयान बॉथम का वह बयान बहुत चर्चित हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था, “पाकिस्तान नाम की जगह इतनी घटिया है कि हरेक व्यक्ति को अपनी सास को वहाँ भेजना चाहिये”, जाहिर है पाकिस्तानी इस बयान का बदला लेने के को बेताब थे। जब 1992 के विश्वकप में पाकिस्तान ने इंग्लैंड को हराया, तब आमिर सोहेल ने इयान बोथम से कहा, “क्यों नहीं तुम अपनी सास को पाकिस्तान भेजते, कम से कम वह तुम लोगों से तो अच्छा ही खेलेगी”…..

एक बार इंजमाम ने ब्रेट ली को खिजाते हुए कहा था, “यार स्पिन गेंदें फ़ेंकना बन्द करो”, और ऐसे ही भारत के पिछले पाक दौरे पर शाहिद अफ़रीदी ने पठान के बल्लेबाजी के लिये उतरने पर सीटी बजाते हुए कहा था, “ओय होय, मेरा शहजादा आ गया…”

तो पाठक बन्धुओं, स्लेजिंग तो क्रिकेट में सनातन चली आ रही है, और यह बढ़ती ही जायेगी, जब तक कि एकाध बार फ़ुटबॉल जैसी मारामारी (जिनेदिन झिडान जैसी) न हो जाये। एक बात तो तय है कि गोरे खिलाड़ी नस्लभेदी मानसिकता से ग्रस्त हैं, वे सोचते हैं कि सिर्फ़ हम ही स्लेजिंग कर सकते हैं, क्योंकि हम “श्रेष्ठ” हैं, साथ ही एक और निष्कर्ष निकलता है कि जिस प्रकार एशियाई खिलाड़ी अपनी माँ-बहन की गाली के प्रति संवेदनशील होते हैं, अंग्रेज खिलाड़ी अपनी पत्नी की गाली के प्रति होते हैं…. अस्तु। स्लेजिंग के और भी बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं, लेकिन ज्यादा लम्बा लेख हो जायेगा तो ठीक नहीं होगा…. और हाँ… भगवान के लिये क्रिकेट को “भद्रजनों का खेल” (Gentlemen Game) कहना बन्द कीजिये। आमीन….

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>“क्रिकेट” खेल को भारत ने क्या दिया?

>India, Cricket, Invention

आज 20-20 ओवर के विश्व-कप का यह नया रूप लोगों को लुभा रहा है, यह आकर्षक है, तेज गति वाला है, जोशीला है, युवाओं के लिये है, और निश्चित ही आने वाला समय इसी तरह के क्रिकेट का है। क्रिकेट को यदि विश्वव्यापी बनाना है तो इस “फ़ॉर्मेट” को ही आगे बढ़ाना होगा और इसी में कुछ नये-नये प्रयोग करने होंगे। इस जोरदार हंगामे और नवीन आविष्कार ने पुनः यह प्रश्न खड़ा किया है कि भारत नाम के देश, जहाँ क्रिकेट को लगभग एक धर्म समझा जाता है, खिलाड़ियों को पल में देवता और पल में शैतान निरूपित किया जाता है, क्रिकेट का उन्माद है, पागलपन है, अथाह पैसा है, करोड़ों टीवी दर्शक हैं, गरज कि काफ़ी कुछ है, लेकिन इस “भारत” ने क्रिकेट के खेल में क्या नया योगदान दिया है? क्या भारतीय क्रिकेट के कर्ताधर्ताओं ने यहाँ के महान क्रिकेट खिलाड़ियों ने आज तक इस खेल में कोई नया आविष्कार करके बताया है? कोई नवीन विचार लाकर दुनिया को चौंकाया है? या हम लोग सिर्फ़ “पिछलग्गू” हैं?

अब तो यह बात सभी जान गये हैं कि भारत के खिलाड़ी “भारत” के लिये नहीं खेलते हैं, भारतीय(?) खिलाड़ी एक निजी सोसायटी के कर्मचारी हैं, जो कि तमिलनाडु सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत पंजीकृत सोसायटी है। बीसीसीआई, जो अपने-आपको “क्रिकेट का खुदा” समझती है, असल में एक “लिमिटेड कम्पनी” है, जो कि ब्रिटिश वर्जिन द्वीप मे पंजीकृत एक संस्था जिसे आईसीसी कहा जाता है से सम्बद्ध है, और जिसे भारत सरकार ने देश में क्रिकेट मैच आयोजित करने की अनुमति दे रखी है, मतलब साफ़ है कि विश्व कप में शर्मनाक रूप से हार रही या पाकिस्तान को “मरने-मारने वाले खेल”(?) में हराने वाले खिलाड़ी सिर्फ़ भारत के “कहे जा सकते हैं” (हैं या नहीं यह आप तय करें), हकीकत में इनका देश के क्रिकेट ढाँचे से कोई लेना-देना नहीं होता है। ये खिलाड़ी इस “लिमिटेड कम्पनी” से पैसा पाते हैं और उसके लिये खेलते हैं। जैसे ही “आईसीएल” की घोषणा हुई और जब “प्रतिस्पर्धा” का खतरा मंडराने लगा, बीसीसीआई की कुम्भकर्णी नींद खुली और ताबड़तोड़ कई जवाबी घोषणायें की गईं और एक और पैसा कमाने की जुगाड़ “आईपीएल” के गठन और आयोजन की तैयारी होने लगी है। हालांकि यह विषयांतर हो गया है, जबकि मेरा असल मुद्दा है कि क्रिकेट खेल को इन महानुभावों ने अब तक क्या “नया” दिया है?

जिस जमाने में टेस्ट मैच लगभग निर्जीव हो चले थे, इंग्लैंड में साठ-साठ ओवरों वाले एक-दिवसीय मैच का प्रयोग किया गया, प्रयोग सफ़ल रहा, आगे चलकर वह पचास-पचास ओवरों का हुआ, उसके शुरुआती तीन विश्व कप इंग्लैंड में आयोजित हुए। ऑस्ट्रेलियन मीडिया मुगल कैरी पैकर ने क्रिकेट में रंगीन कपड़े, सफ़ेद गेंदें, काली साईट स्क्रीन, विज्ञापन, टीवी कवरेज आदि का आविष्कार किया। यहाँ तक कि इसी खेल में हमारे पड़ोसी श्रीलंका ने जयसूर्या-कालूवितरणा की सात-आठ नम्बर पर खेलने वाले खिलाड़ियों से ओपनिंग करवा कर सबको चौंका दिया और एक नई परम्परा का चलन प्रारम्भ किया, जिसमें पहले पन्द्रह ओवरों में एक सौ बीस रन तक बनने लगे। उससे पहले न्यूजीलैंड के मार्टिन क्रोव ने एक स्पिनर दीपक पटेल से मैच का पहला ओवर फ़िंकवा कर एक विशेष बात पैदा करने की कोशिश की और कुछ हद तक सफ़ल भी रहे। ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले दो विभिन्न टीमों (एक दिवसीय और टेस्ट की अलग-अलग) का प्रयोग किया, जिसे आज लगभग सभी टीमें अपना चुकी हैं। और पहले की बात करें, तो वेस्टइंडीज के कप्तान क्लाईव लॉयड ने अपनी अपमानजनक हार का बदला लेने के लिये स्पिन को पूरी तरह से दरकिनार करके पाँच तेज गेंदबाजों की फ़ौज खड़ी की, जिसने ऑस्ट्रेलिया को भी हिलाकर रख दिया था और लगभग एक दशक तक तेज गेंदबाजों ने विश्व क्रिकेट पर राज किया…और पीछे जायें तो इंग्लैंड के कप्तान डगलस जार्डिन ने डॉन ब्रेडमैन को रोकने के लिये लारवुड-ट्रूमैन से “बॉडीलाइन” गेंदबाजी करवाई थी, जिसकी आलोचना भी हुई, लेकिन था तो वह एक “नवोन्मेषी” विचार ही। कुछ “अलग”, “हटकर” करने की इस परम्परा में पाकिस्तान ने भी वकार-वसीम की मदद से “रिवर्स स्विंग” ईजाद किया, पहले सभी ने इसकी आलोचना की, लेकिन आज सभी सीम गेंदबाज एक तरफ़ से गेंद पर थूक लगा-लगाकर उसे असमान भारी बनाकर रिवर्स स्विंग का फ़ायदा उठाते हैं, इसे पाकिस्तान की देन कहा जा सकता है।

यदि खेल में वैज्ञानिकता, तकनीक और उपकरणों की बात की जाये तो यहाँ भी भारत का योगदान लगभग शून्य ही नजर आता है। “हॉक-आई” तकनीक जिसमें गेंद की सारी “मूवमेंट” का बारीकी से अध्ययन किया जा सकता है का आविष्कार “सीमेंस” के वैज्ञानिकों ने इंग्लैंड में किया, “स्पिन विजन”, “स्निकोमीटर”, “सुपर स्लो-मोशन” सारी तकनीकें पश्चिमी देशों से आईं, वूल्मर की लैपटॉप तकनीक हो या जोंटी रोड्स की अद्भुत फ़ील्डिंग तकनीक, हर मामले में भारतीयों को उनकी नकल करने पर ही निर्भर रहना पड़ता है। ऐसा क्यों? क्या भारत में पैसा नहीं है, या वैज्ञानिक नहीं हैं या सॉफ़्टवेयर इंजीनियर नहीं हैं? या बोर्ड के पास धन की कमी है? सब कुछ है, बस कमी है इच्छाशक्ति की और कुछ नया कर दिखाने में अलाली की।

ऑस्ट्रेलिया में घरेलू क्रिकेट की योजना बनाने, उसे प्रायोजक दिलवाने के लिये बाकायदा खिलाड़ियों की एक समिति है, जबकि यहाँ रणजी टीमों को ही प्रायोजक नहीं मिल पाते हैं। एक बार तो मुम्बई टीम को नाश्ते में अंडे सिर्फ़ इसलिये मिल सके थे, कि तेंडुलकर उस टीम में खेल रहे थे, वरना पहले तो सिर्फ़ चाय-बिस्किट पर ही रणजी मैच निपटा दिये जाते थे। आईसीएल के आने के बाद स्थिति बदली है और खिलाड़ियों का भत्ता बढ़ाया गया है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। भारत में स्टेडियम में जाकर मैच देखना एक त्रासदी से कम नहीं होता। जगह-जगह सुरक्षा जाँच के नाम पर बदतमीजी, स्टेडियम में पीने के पानी, टॉयलेट की असुविधायें, धूप की परेशानी, अस्सी प्रतिशत स्टेडियमों में बड़ी स्क्रीन ना होना आदि कई समस्यायें हैं। जबकि बोर्ड के पास इतना धन है कि वह सारे स्टेडियमों में मुलायम कृत्रिम घास बिछवा सकता है, लेकिन बोर्ड सुविधायें देता है पेवेलियन में बैठे नेताओं, अफ़सरों, उनके मुफ़्तखोर (पास-जुगाड़ू) चमचों और लगुए-भगुओं को जिन्हें अधिकतर समय खेल से कोई लेना-देना नहीं होता, बस “झाँकी” जमाने से वास्ता होता है। जबकि आम जनता जो वाकई क्रिकेटप्रेमी है, वह कष्ट भोगते हुए मैच देखती है। जिस खेल और जनता के बल पर बोर्ड आज अरबों में खेल रहा है, उस बोर्ड के अदना से अधिकारी भी पाँच सितारा होटल में ही ठहरते हैं, दो कौड़ी के राजनेता, जो क्षेत्रीय क्रिकेट बोर्डों में कब्जा जमाये बैठे रहते हैं, भी टीम मैनेजर बनकर घूमने-फ़िरने की फ़िराक में रहते हैं, लेकिन खेल को कुछ नया देने के नाम पर शून्य।

हाँ… एक बात है, क्रिकेट को भारत और पाकिस्तान (जो कम से कम इस मामले में उसका छोटा भाई शोभा देता है) ने दिया है, अकूत धन-सम्पदा, माफ़िया, सट्टेबाजी, मैच फ़िक्सिंग, राजनेता-अधिकारी का अनैतिक गठजोड़, चरण चूमते क्षेत्रीय बोर्ड के “सी” ग्रेड के खिलाड़ी, और कुल नतीजे के रूप में बॉब वूल्मर की हत्या। यह योगदान है भारत-पाक क्रिकेट बोर्ड का। इस सबमें दोषी वह सट्टेबाज और मूर्ख जनता भी है, जो “हीरो” को पूजती है, फ़िर उसी हीरो को टीवी पर आने के लिये कभी घटिया सा यज्ञ करवाती है, कभी उसी को जुतियाने के लिये कैमरा बुलवाकर तस्वीर पर चप्पलों की माला पहनाती है।

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>क्रिकेट का भविष्यवादी दुःस्वप्न

>दिनांक 10 मार्च 2010
भारत की टीम पाँच देशों के टूर्नामेण्ट में खेल रही है, अन्य चार देश हैं सूडान, लीबिया, फ़िजी और आईसलैंड । आज भारत की क्रिकेट टीम का बहुत ही महत्वपूर्ण मैच है, उसे सूडान को हर हालत में हराना है, यदि वह आज का मैच जीत जाती है तो उसे 2011 में होने वाले विश्व कप में 35 वीं रैंक मिल जायेगी..मैच की सुबह गुरु ग्रेग और राहुल ने मैच की रणनीति बनाने के लिये टीम मीटिंग बुलाई । बहुत महत्वपूर्ण मैच था इसलिये गम्भीरता से टीम मीटिंग शुरु हुई… कमरे के एक कोने में ग्रेग और राहुल बैठे थे, धोनी एक तरफ़ अपने बालों में कंघी कर रहा था, सहवाग अपने गंजे सिर पर हाथ फ़ेर रहा था… तेंडुलकर अपने नये विज्ञापन का कॉन्ट्रेक्ट पढने में मशगूल था, सौरव सोच रहा था कि मुझे आज मीडिया में क्या बयान देना है… मतलब यह कि बहुत ही महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी । गुरु ग्रेग सबसे पहले बोले – बॉयज.. आज हमारा एक खास मैच है, तो आओ हम बैटिंग लाइन-अप और गेंदबाजी के बारे में अपनी रणनीति बना लें… सौरव तुम ओपनिंग करोगे ?
सौरव – यह आप मुझे बता रहे हैं या मुझसे पूछ रहे हैं ? इसका जवाब मुझे पता नहीं है, लेकिन सूडान का एक गेंदबाज लगातार मेरी छाती और कमर को निशाना बना कर गेंदें फ़ेंकता है । अब इस उमर में मैं 50-60 मील प्रति घंटा की गेंदबाजी नहीं झेल सकता हूँ ।
ग्रेग – ठीक है कोई बात नहीं.. तुम हिट विकेट आऊट होकर आ जाना और बाद में मीडिया को कोई बयान दे देना, वैसे हमारी टीम की इमेज इतनी जोरदार है कि कोई भी बॉलर शॉर्टपिच गेंद नहीं फ़ेंकेगा… फ़िर भी..राहुल सौरव के साथ किसे भेजना चाहिये ओपनिंग के लिये ?
राहुल – मुझे लगता है सहवाग सही रहेगा, क्योंकि उसने बीस मैचों के बाद पिछले मैच में चार चौके लगाये थे, इससे लगता है कि वह अपने पुराने फ़ॉर्म में लौट आया है..क्यों सहवाग ?
सहवाग – जी सर
ग्रेग – चलो बढिया.. सचिन आप नम्बर चार पर जायेंगे ? मतलब आपकी जैसी मर्जी…
सचिन – मुझे 11 बजे शॉपिंग करने जाना है तो मैं दस ओवर के बाद ही जाऊँगा..
ग्रेग – ठीक है, सहवाग और सौरव छः ओवर तो निकाल ही लेंगे, फ़िर आप चले जाना..और अपना नैसर्गिक खेल खेलना..चलो धोनी तुम कीपिंग करोगे…
धोनी – मैं इस बार कीपिंग नहीं करूँगा, पिछले मैच में मैने चार घंटे कीपिंग की थी उसके कारण मेरे धूप से मेरे बाल खराब हो गये है और उसमें जूँए पड़ गई हैं.. मैं तो बल्लेबाज के तौर पर खेलूँगा..
ग्रेग – प्लीज एक बार आज के लिये कीपर बन जाओ.. यह हमारा बहुत महत्वपूर्ण मैच है..
धोनी – ठीक सिर्फ़ आज, लेकिन शाम को मुझे मॉडलिंग के लिये रैम्प पर भी उतरना है, इसलिये आगे से ध्यान रखना
इस बीच गुरु ग्रेग ने पिछले रिकॉर्ड के अनुसार देखा कि राहुल सबसे अधिक देर तक क्रीज पर टिका रहता है, तो ग्रेग चैपल ने कहा, राहुल तुम इन्हें बताओ कि कैसे तुम क्रीज पर टिके रहते हो…
राहुल – सच बात तो यह है कि मेरी बीबी बहुत ही बदसूरत है इसलिये मैं कोशिश करता हूँ कि अधिक से अधिक देर तक उससे दूर रह सकूँ और पिच ही वह जगह है जहाँ मैं सुकून से रह सकता हूँ, आपको याद होगा कि पिछले मैच में मैने ९३ गेंदों पर 4 रन बनाये थे और मैं बहुत खुश था… सभी खिलाडियों ने तालियाँ बजाईं..
ग्रेग ने कहा – चलो ठीक है.. गेंदबाजी की शुरुआत जहीर करेगा, क्योंकि वही सबसे कम वाईड फ़ेंकता है.. पिछले मैच में उसने सिर्फ़ 12 वाईड फ़ेंकी थीं । फ़िर गुरु ने कहा कि मैं देख रहा हूँ कि राहुल पर कप्तानी का बोझ कुछ ज्यादा ही पड़ रहा है, इसलिये मैने नया प्रयोग करने की सोची है, जिसके तहत टीम में अब तीन कप्तान होंगे, बैटिंग कप्तान, फ़ील्डिंग कप्तान और बॉलिंग कप्तान.. कैसा आईडिया है.. किसी ने कोई जवाब नहीं दिया..मैने देखा कि मुनाफ़ पटेल पिछले तीन मैचों से नॉट आऊट रहा है, इसलिये उसकी बैटिंग प्रतिभा को देखते हुए उसे मैं उसे बैटिंग कप्तान बनाता हूँ..सौरव लगभग १५० रन आऊट करवाने में शामिल रहा है, लेकिन खुद कभी रन आऊट नहीं हुआ, इसलिये मैं उसे फ़ील्डिंग कप्तान बनाता हूँ.. राहुल ने आपत्ति उठाई – लेकिन सौरव ने पिछले मैच में ही तीन कैच छोडे थे…गुरु ने कहा – लेकिन उसने बिलकुल सही दिशा में डाईव किया था, यही बहुत है । मैने देखा है कि पिछले तीन साल से अनिल कुम्बले लगातार टीम से बाहर रहा है, लेकिन उसने जम्हाई लेने के अलावा अपना मुँह कभी नहीं खोला, मैं उसकी खेल भावना की कद्र करते हुए उसे बॉलिंग कप्तान बनाता हूँ…
अन्त में गुरु ग्रेग ने टीम में जोश भरते हुए कहा – उठो लड़कों तुम्हें सूडान को हराना ही होगा.. बाहर लाखों लोग यज्ञ-हवन कर रहे हैं, बाल बढा रहे हैं, मन्दिरों में मत्था टेक रहे हैं.. चलो उठो..
वैसे मीडिया की जानकारी के लिये बता दूँ कि विश्व कप के बाद भारत के अगले चार अभ्यास मैच इस प्रकार से हैं –
12 अप्रैल – सरस्वती विद्या मन्दिर
15 अप्रैल – विक्रम हाई स्कूल
17 अप्रैल – स्टेन्फ़ोर्ड गर्ल्स कॉलेज
20 अप्रैल – सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल…
इस सम्बन्ध में राहुल का कहना है कि हमारी पहली प्राथमिकता सरस्वती विद्या मन्दिर को हराने की होगी, क्योंकि मैने सुना है कि उनके पास कुछ युवा और जोशीले खिलाडी है… तो आईये हम भी हू..हा..इंडिया के लिये प्रार्थना करें…

क्रिकेट का भविष्यवादी दुःस्वप्न

दिनांक 10 मार्च 2010
भारत की टीम पाँच देशों के टूर्नामेण्ट में खेल रही है, अन्य चार देश हैं सूडान, लीबिया, फ़िजी और आईसलैंड । आज भारत की क्रिकेट टीम का बहुत ही महत्वपूर्ण मैच है, उसे सूडान को हर हालत में हराना है, यदि वह आज का मैच जीत जाती है तो उसे 2011 में होने वाले विश्व कप में 35 वीं रैंक मिल जायेगी..मैच की सुबह गुरु ग्रेग और राहुल ने मैच की रणनीति बनाने के लिये टीम मीटिंग बुलाई । बहुत महत्वपूर्ण मैच था इसलिये गम्भीरता से टीम मीटिंग शुरु हुई… कमरे के एक कोने में ग्रेग और राहुल बैठे थे, धोनी एक तरफ़ अपने बालों में कंघी कर रहा था, सहवाग अपने गंजे सिर पर हाथ फ़ेर रहा था… तेंडुलकर अपने नये विज्ञापन का कॉन्ट्रेक्ट पढने में मशगूल था, सौरव सोच रहा था कि मुझे आज मीडिया में क्या बयान देना है… मतलब यह कि बहुत ही महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी । गुरु ग्रेग सबसे पहले बोले – बॉयज.. आज हमारा एक खास मैच है, तो आओ हम बैटिंग लाइन-अप और गेंदबाजी के बारे में अपनी रणनीति बना लें… सौरव तुम ओपनिंग करोगे ?
सौरव – यह आप मुझे बता रहे हैं या मुझसे पूछ रहे हैं ? इसका जवाब मुझे पता नहीं है, लेकिन सूडान का एक गेंदबाज लगातार मेरी छाती और कमर को निशाना बना कर गेंदें फ़ेंकता है । अब इस उमर में मैं 50-60 मील प्रति घंटा की गेंदबाजी नहीं झेल सकता हूँ ।
ग्रेग – ठीक है कोई बात नहीं.. तुम हिट विकेट आऊट होकर आ जाना और बाद में मीडिया को कोई बयान दे देना, वैसे हमारी टीम की इमेज इतनी जोरदार है कि कोई भी बॉलर शॉर्टपिच गेंद नहीं फ़ेंकेगा… फ़िर भी..राहुल सौरव के साथ किसे भेजना चाहिये ओपनिंग के लिये ?
राहुल – मुझे लगता है सहवाग सही रहेगा, क्योंकि उसने बीस मैचों के बाद पिछले मैच में चार चौके लगाये थे, इससे लगता है कि वह अपने पुराने फ़ॉर्म में लौट आया है..क्यों सहवाग ?
सहवाग – जी सर
ग्रेग – चलो बढिया.. सचिन आप नम्बर चार पर जायेंगे ? मतलब आपकी जैसी मर्जी…
सचिन – मुझे 11 बजे शॉपिंग करने जाना है तो मैं दस ओवर के बाद ही जाऊँगा..
ग्रेग – ठीक है, सहवाग और सौरव छः ओवर तो निकाल ही लेंगे, फ़िर आप चले जाना..और अपना नैसर्गिक खेल खेलना..चलो धोनी तुम कीपिंग करोगे…
धोनी – मैं इस बार कीपिंग नहीं करूँगा, पिछले मैच में मैने चार घंटे कीपिंग की थी उसके कारण मेरे धूप से मेरे बाल खराब हो गये है और उसमें जूँए पड़ गई हैं.. मैं तो बल्लेबाज के तौर पर खेलूँगा..
ग्रेग – प्लीज एक बार आज के लिये कीपर बन जाओ.. यह हमारा बहुत महत्वपूर्ण मैच है..
धोनी – ठीक सिर्फ़ आज, लेकिन शाम को मुझे मॉडलिंग के लिये रैम्प पर भी उतरना है, इसलिये आगे से ध्यान रखना
इस बीच गुरु ग्रेग ने पिछले रिकॉर्ड के अनुसार देखा कि राहुल सबसे अधिक देर तक क्रीज पर टिका रहता है, तो ग्रेग चैपल ने कहा, राहुल तुम इन्हें बताओ कि कैसे तुम क्रीज पर टिके रहते हो…
राहुल – सच बात तो यह है कि मेरी बीबी बहुत ही बदसूरत है इसलिये मैं कोशिश करता हूँ कि अधिक से अधिक देर तक उससे दूर रह सकूँ और पिच ही वह जगह है जहाँ मैं सुकून से रह सकता हूँ, आपको याद होगा कि पिछले मैच में मैने ९३ गेंदों पर 4 रन बनाये थे और मैं बहुत खुश था… सभी खिलाडियों ने तालियाँ बजाईं..
ग्रेग ने कहा – चलो ठीक है.. गेंदबाजी की शुरुआत जहीर करेगा, क्योंकि वही सबसे कम वाईड फ़ेंकता है.. पिछले मैच में उसने सिर्फ़ 12 वाईड फ़ेंकी थीं । फ़िर गुरु ने कहा कि मैं देख रहा हूँ कि राहुल पर कप्तानी का बोझ कुछ ज्यादा ही पड़ रहा है, इसलिये मैने नया प्रयोग करने की सोची है, जिसके तहत टीम में अब तीन कप्तान होंगे, बैटिंग कप्तान, फ़ील्डिंग कप्तान और बॉलिंग कप्तान.. कैसा आईडिया है.. किसी ने कोई जवाब नहीं दिया..मैने देखा कि मुनाफ़ पटेल पिछले तीन मैचों से नॉट आऊट रहा है, इसलिये उसकी बैटिंग प्रतिभा को देखते हुए उसे मैं उसे बैटिंग कप्तान बनाता हूँ..सौरव लगभग १५० रन आऊट करवाने में शामिल रहा है, लेकिन खुद कभी रन आऊट नहीं हुआ, इसलिये मैं उसे फ़ील्डिंग कप्तान बनाता हूँ.. राहुल ने आपत्ति उठाई – लेकिन सौरव ने पिछले मैच में ही तीन कैच छोडे थे…गुरु ने कहा – लेकिन उसने बिलकुल सही दिशा में डाईव किया था, यही बहुत है । मैने देखा है कि पिछले तीन साल से अनिल कुम्बले लगातार टीम से बाहर रहा है, लेकिन उसने जम्हाई लेने के अलावा अपना मुँह कभी नहीं खोला, मैं उसकी खेल भावना की कद्र करते हुए उसे बॉलिंग कप्तान बनाता हूँ…
अन्त में गुरु ग्रेग ने टीम में जोश भरते हुए कहा – उठो लड़कों तुम्हें सूडान को हराना ही होगा.. बाहर लाखों लोग यज्ञ-हवन कर रहे हैं, बाल बढा रहे हैं, मन्दिरों में मत्था टेक रहे हैं.. चलो उठो..
वैसे मीडिया की जानकारी के लिये बता दूँ कि विश्व कप के बाद भारत के अगले चार अभ्यास मैच इस प्रकार से हैं –
12 अप्रैल – सरस्वती विद्या मन्दिर
15 अप्रैल – विक्रम हाई स्कूल
17 अप्रैल – स्टेन्फ़ोर्ड गर्ल्स कॉलेज
20 अप्रैल – सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल…
इस सम्बन्ध में राहुल का कहना है कि हमारी पहली प्राथमिकता सरस्वती विद्या मन्दिर को हराने की होगी, क्योंकि मैने सुना है कि उनके पास कुछ युवा और जोशीले खिलाडी है… तो आईये हम भी हू..हा..इंडिया के लिये प्रार्थना करें…

>एण्ड नोबेल प्राईज गोज़ टू…इंडियन क्रिकेट टीम

>चौंकिये नहीं… नोबेल पुरस्कार क्रिकेट टीम को भी मिल सकता है… अब देखिये ना जब से हमारी क्रिकेट टीम यहाँ से विश्व कप खेलने गई थी… तो वह कोई कप जीतने-वीतने नहीं गई थी…वह तो निकली थी एक महान और पवित्र उद्देश्य…”विश्व बन्धुत्व” का प्रचार करने । जब प्रैक्टिस मैच हुए तो भारत की टीम ने दिखा दिया कि क्रिकेट कैसे खेला जाता है… लेकिन जब असली मैच शुरू हुए तो भारत की टीम पहला मैच बांग्लादेश से हार गई… बांग्लादेश से वैसे भी भारत के बहुत मधुर सम्बन्ध हैं…वहाँ से हमारे यहाँ आना-जाना लगा रहता है… वह तो हमारा छोटा भाई है… इसलिये वहाँ क्रिकेट को बढावा देने के लिये बडे भाई को तो कुर्बानी देनी ही थी, सो दे दी । फ़िर बात आई पाकिस्तान की… अब आप सोचेंगे कि वह तो हमारे ग्रुप में ही नहीं था… लेकिन भई है तो हमारा पडोसी ही ना… जैसे ही वे मैच हारे और बाहर हुए… भारत की टीम का हाजमा भी खराब हो गया… फ़िर एक बार पडोसी धर्म निभाने की बारी थी “बडे़ भाई” की… सो फ़िर निभा दिया… रह गया था तीसरा पडोसी श्रीलंका… उससे भी हमने मैच हार कर उसे भी दिलासा दिया कि तुम अपने-आप को अकेला मत समझना… “बडे़ भाई” सभी का खयाल रखते हैं… सो श्रीलंका से भी मैच हार गये । अब सोचिये एक ऐसे महान देश की महान टीम जो कि विश्व बन्धुत्व की भावना से ही मैच खेलती है, क्या उसे शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं मिलना चाहिये ? और यह तो मैने बताई सिर्फ़ एक बात जिससे नोबेल पुरस्कार मिल सकता है, मसलन…अर्थव्यवस्था की दृष्टि से भी इस महान टीम ने काम किया… अब ये लोग मैच जीतते रहते तो सट्टा चलता रहता, देशवासियों का करोडों रुपया बरबाद होने से इन वीरों ने बचाया… लोगबाग रात-बेरात जाग-जाग कर मैच देखते… अलसाये से ऑफ़िस जाते और काम-धाम नहीं करते… हमारी इस महान टीम ने अरबों घण्टों का मानव श्रम बचाया और लोगों को टीवी से दूर करने में सफ़लता हासिल की, इतना महान कार्य आज तक किसी ने किया है ? और रही बात कप की… तो ऐसे कप तो हमारे जयपुर में ही बनते हैं कभी भी जाकर ले आयेंगे… उसके लिये इतनी सारी टीमों से बुराई मोल लेना उचित नहीं है…क्या पता कल को उनमें से आडे़ वक्त पर कोई हमारे काम आ जाये… भाईचारा बनाये रखना चाहिये…
और भी ऐसी कई बातें हैं जो इसमें जोड़ दी जायें तो नोबेल पक्का… नोबेल वालों को घर पर आकर नोबेल देना पडे़गा… विश्व बन्धुत्व, अर्थव्यवस्था को एक बडा योगदान, करोडों मानव श्रम घण्टों की बचत, कोई भी एक टीम एक साथ इतने सारे क्षेत्रों में महान काम नहीं कर सकती… और तो और भारत की टीम से हमारे सदा नाराज रहने वाले वामपंथी भाई भी खुश होंगे, क्योंकि इन खिलाडियों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से पैसे तो पूरे ले लिये लेकिन जब उनका माल बिकवाने की बारी आई तो घर बैठ गये… इसे कहते हैं “चूना लगाना”….तो भाई लोगों यदि आप भी ऐसा ही समझते हैं कि नोबेल पुरस्कार भारत की क्रिकेट टीम को ही मिलना चाहिये… तो अपने मोबाईल के बॉक्स में जाकर “मू” “र” “ख” टाईप करें और 9-2-11 पर एसएमएस करें… सही जवाबों में से किसी एक विजेता को मिलेगी धोनी के बालों की एक लट, जो उन्होंने वापस आते वक्त हवाई जहाज में कटवाई थी, ताकि कहीं लोग उन्हें पहचान ना लें… तो रणबाँकुरों उठो…मोबाईल उठाओ और शुरू हो जाओ…

>बाजार की शक्तियों… जागो… भारत विश्व कप से बाहर हो जायेगा

>बरमूडा को तथाकथित रूप से रौंदकर भारतवासियों ने थोडी चैन की साँस ली है… लेकिन अभी तो असली रण्संग्राम बाकी है… लेकिन यदि मेरी टेढी नजर से देखा जाये तो भारत सुपर-८ में जगह बना लेगा… आप पूछेंगे, कैसे ? तो भैये मुझे बाजार की शक्तियों और सट्टा बाजार पर पूरा भरोसा है… वे निश्चित रूप से कुछ जुगाड़ लगा लेंगे… श्रीलंका को “सेट” करेंगे, या बांग्लादेश को, पर हमारी टीम को सुपर-८ तक धक्का मारकर पहुँचायेंगे जरूर… आप पूछेंगे फ़िर भारत बांग्लादेश से क्यों हारा ? तो भैया बांग्लादेश में क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने का समूचा ठेका भारत ने ले रखा है… हम पहले भी उनसे हार चुके हैं… डालमिया साहब ने आईसीसी वोट की खातिर उसे टेस्ट का दर्जा दिला दिया था.. अब हमें विश्व कप के बाद बांग्लादेश का दौरा करना है तो भाई वहाँ भी तो कुछ माहौल तैयार करना पडेगा ना…मुझे मालूम है आप फ़िर सोच रहे होंगे कि भारत कैसे सुपर-८ में पहुँचेगा ? तो हमारे रण-बाँकुरे सटोरिये वहाँ तमाम लैपटॉप और हथियारों के साथ पहुँच चुके हैं… वे श्रीलंका से कहेंगे कि तू तो बांग्लादेश को हराकर पहले ही आगे बढ गया है… हमने भी बांग्लादेश से हारकर पडोसी धर्म निभा दिया है… अब तू हमसे बडे अन्तर से हार जा फ़िर हम दोनों सुपर-८ में और बांग्लादेश विश्वकप जीतकर (भारत को हराने के बाद उनके कप्तान ने यही कहा था ना..) अपने घर… यदि श्रीलंकाई चीतों पर देशप्रेम कुछ ज्यादा ही चढ गया होगा तो फ़िर बांग्लादेश को “सेट” किया जायेगा… कि छोटे भाई तू तो पहले ही हमें हरा चुका है… बरमूडा से हार जा… फ़िर हम सुपर-८ में और तुम घर… रहा पैसा तो वह स्विस बैंकों में पहुँचाने का हमें बहुत अनुभव है… तुम लोगों के बांग्लादेश पहुँचने से पहले पैसा तुम्हारे अकाऊंट में होगा…
तो भाईयों… यदि श्रीलंका और बांग्लादेशी खिलाडियों पर “देशप्रेम” नाम का भूत सवार हो जाये तो और बात है वरना भारत का सुपर-८ में पहुँचना तय है, ऐसा मेरा दिल कहता है… जय सटोरिया नमः, जय बाजाराय नमः, जय विज्ञापनाय नमः…

बाजार की शक्तियों… जागो… भारत विश्व कप से बाहर हो जायेगा

बरमूडा को तथाकथित रूप से रौंदकर भारतवासियों ने थोडी चैन की साँस ली है… लेकिन अभी तो असली रण्संग्राम बाकी है… लेकिन यदि मेरी टेढी नजर से देखा जाये तो भारत सुपर-८ में जगह बना लेगा… आप पूछेंगे, कैसे ? तो भैये मुझे बाजार की शक्तियों और सट्टा बाजार पर पूरा भरोसा है… वे निश्चित रूप से कुछ जुगाड़ लगा लेंगे… श्रीलंका को “सेट” करेंगे, या बांग्लादेश को, पर हमारी टीम को सुपर-८ तक धक्का मारकर पहुँचायेंगे जरूर… आप पूछेंगे फ़िर भारत बांग्लादेश से क्यों हारा ? तो भैया बांग्लादेश में क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने का समूचा ठेका भारत ने ले रखा है… हम पहले भी उनसे हार चुके हैं… डालमिया साहब ने आईसीसी वोट की खातिर उसे टेस्ट का दर्जा दिला दिया था.. अब हमें विश्व कप के बाद बांग्लादेश का दौरा करना है तो भाई वहाँ भी तो कुछ माहौल तैयार करना पडेगा ना…मुझे मालूम है आप फ़िर सोच रहे होंगे कि भारत कैसे सुपर-८ में पहुँचेगा ? तो हमारे रण-बाँकुरे सटोरिये वहाँ तमाम लैपटॉप और हथियारों के साथ पहुँच चुके हैं… वे श्रीलंका से कहेंगे कि तू तो बांग्लादेश को हराकर पहले ही आगे बढ गया है… हमने भी बांग्लादेश से हारकर पडोसी धर्म निभा दिया है… अब तू हमसे बडे अन्तर से हार जा फ़िर हम दोनों सुपर-८ में और बांग्लादेश विश्वकप जीतकर (भारत को हराने के बाद उनके कप्तान ने यही कहा था ना..) अपने घर… यदि श्रीलंकाई चीतों पर देशप्रेम कुछ ज्यादा ही चढ गया होगा तो फ़िर बांग्लादेश को “सेट” किया जायेगा… कि छोटे भाई तू तो पहले ही हमें हरा चुका है… बरमूडा से हार जा… फ़िर हम सुपर-८ में और तुम घर… रहा पैसा तो वह स्विस बैंकों में पहुँचाने का हमें बहुत अनुभव है… तुम लोगों के बांग्लादेश पहुँचने से पहले पैसा तुम्हारे अकाऊंट में होगा…
तो भाईयों… यदि श्रीलंका और बांग्लादेशी खिलाडियों पर “देशप्रेम” नाम का भूत सवार हो जाये तो और बात है वरना भारत का सुपर-८ में पहुँचना तय है, ऐसा मेरा दिल कहता है… जय सटोरिया नमः, जय बाजाराय नमः, जय विज्ञापनाय नमः…