>टेलीविजन का बढ़ता दायरा और रियल्टी शो

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टेलीविजन की लोकप्रियता का दायरा बढ़ाने में धारावाहिकों का अहम् योगदान रहा है । चाहे ‘महाभारत’ हो या ‘क्योंकि सास भी कभी बहु थी ‘ इन टीवी सीरियल्स ने न केवल सफलता पाई बल्कि सम्बंधित चैनल को भी एक नई ऊंचाई दी । गौरतलब है किटीवी के दर्शकों में सबसे बड़ी तादाद महिलाओं और बच्चों की रही है । यही वजह रही है कि अब तक ऐतिहासिक , पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर ज्यादातर धारावाहिकों का निर्माण किया जाता रहा है । समय तेजी से बदला है और बदलते दौर में दर्शकों का मिजाज भी , तो भला धारावाहिक के विषय-वस्तु पर इस बदलाव का असर कैसे ना हो ? इसी बदलाव ने ‘रिअलिटी शो ‘नाम की एक नई विधा को जन्म दिया है । वैसे तो पश्चिम में इसका चलन बहुत पहले से रहा है फ़िर भी भारत में इसे नया ही कहा जाएगा । अमेरिका के लोकप्रिय रियल्टी शो ‘बिग ब्रदर’ की नक़ल करते हुए ‘बिग बॉस ‘ नाम से रियल्टी शो बनाया गया था जो दर्शकों के बीच खासा लोकप्रिय रहा । इसके बाद तो जैसे रियल्टी शो की बाढ़ सी आ गयी । नाच -गाने , स्टंट आदि को लेकर भी ढेरों कार्यक्रमों को रियल्टी के नाम पर बाज़ार में उतारा जा रहा है । जैसा कि नाम सुनकर लगता है ये रियल्टी शो सच्चाई दिखाते होंगे लेकिन होता उसका उल्टा है । रियल्टी /वास्तविकता के नाम पर जो कुछ भी परोसा जाता है उसमें हर जगह स्क्रिप्ट पर आधारित बनाबटीपन हीं नज़र आता है । साथ हीं इसमें जानबुझ कर विवाद खड़ा किया जाता है । वास्तव में इस तरह के कार्यक्रम महज टीआरपी के लिए भोंडेपन का प्रदर्शन करते हैं । उदाहरण के तौर पर ‘सच का सामना ‘ और ‘राखी का स्वयंवर ‘ अपनी प्रस्तुति के मामले में न केवल कृत्रिम हैं बल्कि अश्लील भी हैं । एमटीवी ने तो सारी सीमाएं तोड़ कर रख दी है । ‘roadies’ और ‘splittsvilla’ जैसे कार्यक्रमों में धड़ल्ले से गालियों और भद्दे शब्दों का खुलकर प्रयोग किया जा रहा है। बात यही ख़त्म नहीं होती हार -जीत के खेल में गली-गलौज से आगे बढ़कर मार-पीट के सीन देखे जा सकते हैं । इस तरह के टीवी कार्यक्रमों का सबसे बुरा असर बच्चों और किशोरों पर पड़ता है । महज लाभ और लोकप्रियता के लिए ऐसे हथकंडे अपनाना टीवी जैसे संचार माध्यमों के भविष्य के लिए और समाज के लिए भी घातक हैं ।

:- मेराज फातिमा (लेखिका जामिया में मीडिया की छात्रा हैं )

>सच है तो क्या नंगे होकर घूमा जाए?

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अभी हाल ही में टीवी पर एक कार्यक्रम शुरू हुआ ‘सच का सामना’। पहले लग रहा था कि कार्यक्रम में कुछ विशेष होगा किन्तु जब आये दिन इसके ट्रेलर दिखाये गये और बाद में इसकी पहली ही कड़ी के कुछ अंशों को देखा तो लगा कि हम भारतीय भी विकास की राह में कुछ ज्यादा ही आगे आ गये हैं।
21 सवाल और फिर सच और झूठ का निर्णय। अन्त में सब कुछ सच्चा तो एक करोड़ नहीं तो टाँय-टाँय फिस्स। सवाल कोई ऐसे नहीं जो आपकी मेधा का परीक्षण करें। सवाल ऐसे नहीं जो आपकी क्षमता को सिद्ध करें। सवाल वे भी नहीं जिनसे आपकी सामाजिक स्थिति का आकलन होता हो। इसके अलावा सवाल ऐसे भी नहीं जिनके माध्यम से कहा जा सके कि आपने सच का सामना करने की हिम्मत जुटाई।
सवाल ऐसे के परिवार टूट सकें। सवाल ऐसे कि परिवार बिखर सकें। सवाल इस दर्जे के कि आपस में अविश्वास पैदा हो सके। सवाल वो जो कलह मचवा दें। एक बानगी-
क्या आपने अपने पिता को चाँटा मारा?
क्या आप अपनी बेटी की उम्र की लड़की से शारीरिक सम्बन्ध बना चुके हैं?
क्या आप सार्वजनिक स्थल पर निर्वस्त्र हुए हैं?
आदि-आदि।
इस कार्यक्रम की पहली (शायद पहली ही थी) कड़ी में जब कार्यक्रम देखना शुरू किया तो सीट पर बैठी महिला पाँच लाख जीत चुकी थी। एक सवाल पूछा गया कि क्या आप किसी दूसरे आदमी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना सकतीं हैं, यदि आपके पति को इसका पता न लग सके? एक-दो क्षण के विचार करने के बाद उस महिला का जवाब था नहीं।
एक आवाज उभरी जिसने पालीग्राफ का परिणाम बताया और सभी ने सुना ‘आपका जवाब सही नहीं है।’ महिला सन्न रह गई, कहा नो…नो। पास में बैठे उसके पति ने अपने सिर पर हताशा से हाथ फेरा। चश्में को सिर पर चढ़ा कर अपनी आँखों को हाथों से ढँका।
एंकर ने महिला को सीट से उठाकर उसके पति और अन्य परिवारीजनों के पास तक पहुँचाया, साथ ही परिवार के सुखी रहने की बधाई दी। बधाई….सुखी परिवार की। जब वहाँ सवाल रहा हो शारीरिक सम्बन्ध का, बच्चों का साथ मिले इस कारण शादी को स्वीकारते रहने का तो सोचा जा सकता है कि परिवार कितना सुखी होगा?
आखिर ऐसे सवालों के द्वारा हम किस सच का और किस हिम्मत का सामना करने की बात कर रहे हैं?
अपने आपको नंगा दिखाने का प्रयास हमारी हिम्मत है?
अपनी बहू-बेटियों को, लड़को को सरेआम सबके सामने नंगा करवा देना क्या सच का सामना है?
ऐसे कार्यक्रमों में एक करोड़ जीतने के बाद किस तरह की बधाई देंगे? शाबास, अपनी बेटी की उम्र वाली लड़की से सेक्स करने की बधाई। अपने पिता को थप्पड़ मारने की बधाई। किसी के साथ भी कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत रखने की बधाई।
यही सब है जो हमें बताता है कि हम कहाँ जा रहे हैं। इस तरह के सवालों के बाद परिवार में पर्दे में रखने जैसा बचा ही क्या है? अब एक आराम तो है कि घर में नये दम्पत्ति के लिए किसी तरह के संकोच की जरूरत नहीं। सब जाने हैं कि बन्द कमरे में पति-पत्नी करते क्या हैं। जगह की कमी के कारण सब एकसाथ लेटो-बैठो। सब लोग सब जानते हैं, सबक सामने ही करने लगो। (यही तो कहते हैं ऐसे कार्यक्रमों का समर्थन करने वाले कि आजकल सभी को पता है कि सच क्या है)
चलिए सच के लिए अब नंगा होकर घूमा जाये क्योंकि सभी को मालूम है कि कपड़ों के भी इन्सान नंगा ही है।

>देश को अरुंधती की क्या जरुरत ??…………………..

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कल कनिष्क के पोस्ट ‘ जूते खाए अरुंधती ने ‘ पर काफी टिप्पणी की गई । कुछ ने “युवा “के कदम को सही बताया तो कुछ लोग इसे धर्म का चोला पहनाने पर जबरन उतारू दिखे । अरुंधती जैसी देश द्रोहिनी जो खुलेआम अफजल की वकालत और कश्मीर को पाकिस्तान को देने की बात कहती हो , उसका विरोध करना क्या ग़लत है ? आप लोगों के मुताबिक तो विरोध ही नही होना चाहिए । एक ने तो यहाँ तक कह डाला-” देश को अरुंधती जैसी हजारों विदुषी की जरुरत है”। अरे पाश्चात्य की दलाल की आवश्यकता इस देश को नही है । प्यार के नाम पर सेक्स की वकालत करने गई अरुंधती राय …………http://www।expressindia.com/latest-news/du-battleground-for-freedom-vs-culture/423424/ झारखण्ड के आदिवासियों के बीच जाती कुछ और बात थी । भारत को जरुरत है – दयामनी बरला की जो आदिवासियों के जन आन्दोलन को अपनी आवाज दे रही है , किशोर तिवारी की जो सालों से विदर्भ में किसानो की सेवा में लगे हैं, जी ० डी० अगरवाल की जो गंगा को बचाने के लिए प्राण त्यागने को तैयार हैं । शायद हममे से कुछ महानुभाव तो इनका नाम भी नही जानते होंगे

प्यार को संकीर्ण बनाकर सेक्स के ओछेपन में बांधने की कवायद के पीछे भी बाज़ार की ऊँगली लगती है । ये गुलाबी चड्डी और कंडोम भेजने वाले निश्चित रूप से कंडोम उत्पादक कंपनियों के दलाल हैं । प्रेम को एक दिवस की परिधि में जकड कर रखने का क्या औचित्य ? यहाँ भी बाज़ार का खेल साफ़ है । वहां प्रेम की खिलाफत नही थी बाज़ार का विरोध था । त्योहारों से परहेज नही और विरोध भी नही । मतभेद तो त्यौहार मनाने के तरीके से है । हमारे परंपरागत पर्व- त्यौहार का संचालन समाज करती है जबकि वैलेंटाइन डे बाज़ार प्रायोजित है । हमें इस अन्तर को समझना होगा । अगर इसे मनाना हीं है तो अपनी संस्कृति के अनुरूप परिवर्तित कर मनाईये । कुछ समय पूर्व कई पश्चिमी त्यौहार का नाम भी हमें पता नही था आज तो कुकुरमुत्ते की तरह फैलते जा रहें हैं । आज १ जनवरी गाँव-गाँव में नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है लेकिन देखना होगा कि उसका स्वरुप क्या है ? क्या वह ज्यों का त्यों हमने उठा लिया ? नहीं मुझे याद है आज भी जब मैं घर पर रहता था तो माँ कहती थी -‘ नहा-धो कर पूजा कर लो तब खाना मिलेगा । ‘ मंदिरों में उस दिन भी अन्य त्योहारों की भांति भजन -कीर्तन ,पूजा -अर्चना और हवन आदि होता है । आज एक पाश्चात्य पर्व हमारा हो चुका है । हमें खुशी है कोई कभी उसका विरोध तो नही करते हैं । वैलेंटाइन भी स्वीकार्य हो सकता है बशर्ते उसके चरित्र को बदलना होगा । प्यार को कमर के नीचे और घुटनों के ऊपर सीमित रखने की सोच को त्यागना होगा ।