>क्या इंसा जो लेकर आया

>कितने सपने संजोये हमने
पर वो ख्वाब अधुरे है
सावन आये पल के लिए
पर पतझड़ अभी भी पूरे है

ये नदिया बहती सदियों से
पर सागर में मिल जाती है
अरे फूल खीले हो कितने भी
पर एक दिन वो मुरझाते/मिट जाते है

क्या इंसा जो लेकर आया
क्या लेकर वो जायेगा
खुषी मिले या गम कितने भी
सब छोड़ यहां चला जायेगा


जब अज्ञानी मैं जो था
ये तेरा ये मेरा था
जब जाना ये सबकुछ मैंने
सब माया का फेरा था

सोचा था मैंने कुछ हटके
जाउ जग से नया कुछ करके
वरना खुदा फिर कहेगा मुझसे
आया एक नया पशु फिर मर के

        कितने सपने संजोये हमने
        पर वो ख्वाब अधुरे है
        सावन आये पल के लिए
        पर पतझड़ अभी भी पूरे है

>ग़ज़ल

>उल्फत की तमन्ना का शायद यह सिला है,
हर शख्स ही दुनिया का अब हमसे खफा है.

गम और उदासी  का कुछ हॉल ही न पूछो,
हम कह न सकेंगे कि सब उनका दिया है.

अब छोड़ गए हो तो, मुड़ मुड के यूं न देखो;
इस ज़ख़्म पे खंजर तो पहले ही चला है.

क्या उनको बतायेंगे, क्या उनसे छुपायेंगे;
अब दिल का यह आलम तो बस में न रहा है.

कोई लम्हा भी न गुज़रा, जब याद न आये तुम;
हर वक्त ही इस दिल को, यादों ने डसा  है.

जिस पे भी भरोसा था कि साथ निभाएगा;
उसने ही साथ छोड़ा, बेगाना हुआ है.

क्या मैंने गंवाया है, क्या इश्क में पाया है?
पूछो न कि उल्फत में मैंने क्या लिया है ?
                              –रेक्टर कथूरिया
(आकाशवाणी जालंधर से १६ मार्च १९८५ को
प्रसारित कविता पाठ में से )