>गाँधी के सेक्स जीवन पर नई किताब से हुआ बवाल

>क्या बापू अर्ध-दमित सेक्स मैनियॉक थे ?



जनोक्ति .कॉम पर पढ़िये के०पी० त्रिपाठी का यह लेख जिसमें ब्रिटिश लेखक द्वारा हाल ही में लिखी गयी एक किताब के हवाले से गाँधी के जीवन से जुड़ी उन बातों पर प्रकाश डाला गया है जो अब तक अनछुआ ही रहा है . पढ़िये और खुद फैसला करिए कि इसमें कितना हकीकत और कितना फ़साना है ?


>२६/११ की बरसी पर ! ……कुछ भी कर लो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता !

>* आज तो टीवी वाले खूब मोमबत्तियां जलवा रहे हैं , २६/११ की बरसी पर ! मोमबत्ती की रौशनी से आतंकी घबरा जायेंगे जैसे ड्राकुला    उजाले से डर कर भाग जाता है !

*कोई कॉल करवा रहे है राष्ट्र के नाम ……. और ये पैसा देंगे भारतीय पुलिस को ! लगता है सरकारी फंड कम पड़ गया है !
*जगह-जगह पर गीत-संगीत के कार्यक्रम प्रस्तुत किये जा रहे हैं ! यह बताने के लिए कि कुछ भी कर लो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता !
 
अच्छा धंधा बना दिया है सम्वेदना के नाम पर ! आतकवाद से लड़ेंगे जंतर मंतर ,इंडिया गेट, गेटवे ऑफ़ इंडिया जैसे जगहों पर मोमबत्तियां जला कर ! २६/११ की दुखद और शर्मनाक घटना को राष्ट्रीय शोक के बजाय राष्ट्रीय पर्व बना दिया है जैसे कोई गर्व का विषय हो ! २०२० में संसार की महाशक्ति बनने का सपना देखने वाले देश में घुसकर चंद आतंकी तीन दिनों तक कहर मचाते हैं …… हमले को पहले से रोकने की बात दूर , भारत द्वारा अमेरिका से मदद मांगने की खबर आती है ………….अंततः सुरक्षा एजेंसियां काफी मशक्कत के बाद उस पर काबू पाती है ……. संपत्ति तबाह होती है ………. लोगों की जानें जाती है ……. सेना के जवान और पुलिस कर्मी शहीद हो जाते हैं …………… नेताओं की राजनीत शुरू हो जाती है …….. सरकारी प्रतिष्ठान एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं ……… एक मंत्री कहता है बड़े देशों में ऐसी छोटी बातें होती रहती है …………… जनता की संवेदनाओं को मोमबत्तियों के मोम में पिघला कर सरकार अपने कर्तव्यों से छुट्टी पाती है ………………………..आज उस राष्ट्रीय शर्म की बरसी पर नेता , मीडिया , टेलीकोम कम्पनियाँ सब के सब अपनी -अपनी रोटी शेक रहे हैं ……………. हम ख़ामोशी  से सब बर्दाश्त करने पर अमादा  है …………….. एक दिन मोमबत्ती जलाकर ,एक विशेष कंपनी के नंबर से  कॉल करके , फ़िल्मी सितारों के कार्यक्रम में शामिल होकर हम आतंकवाद  से लड़ाई लड़ रहे हैं …..क्योंकि हम सहिष्णु लोग है  ……. महात्मा गाँधी के देश से हैं ………..जहाँ एक गाल पर मारने से लोग दूसरा गाल बढा देते हैं …………. हम पर फ़िर हमला करो कोई गम नहीं …………. हम उत्सवधर्मी लोग हैं …………… एक और उत्सव बढ़ जायेगा ……………… डरने की बात नहीं है ……….. सांसद पर हमला हुआ ……….हमने कुछ किया नहीं न ……………….. सजाप्राप्त आरोपी अब भी जिन्दा है जिसे आज नहीं तो कल माफ़ी मिल जाएगी ………… २६/११ हुआ हमने कुछ किया ……नहीं ना ………. आरोपी कसब हमारे यहाँ जेल में मज़े कर रहा है ……………. आगे भी हमला होगा हम कुछ खास नहीं करेंगे …………… फ़िर मोमबत्तियां लेकर सडकों पर निकल जायेंगे शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने …………….. अरे जब भय-भूख -भ्रष्टाचार जैसे आतंरिक  मामलों में हम कुछ नहीं करते तो तुम क्यों चिंता करते हो ……………. दुबारा आना और इससे बड़ा आतंकी काण्ड  करना ……….फ़िर भी हमारी एडजस्टमेंट से  जीने की कला को नहीं छीन पाओगे , इस कला में हम भारतवासी महारथी है …………………….

>अरब जैसे अन्धविश्वासी समाज में गाँधी दर्शन की सराहना

>

देश भर में पिछले एक पखवाड़े से गाँधी के सिद्धांतों और हिंद स्वराज को लेकर विमर्श चल रहा है . आज भारत हीं नहीं संसार के अनेक देशों के विद्वान गाँधी दर्शन में वैश्विक स्तर पर संघर्षों से उत्पन्न कुव्यवस्था  का समाधान बता रहे हैं .बीते दिनों गाँधी जयंती के दौरान काहिरा में आयोजित एक संगोष्ठी में अरब के गणमान्य नेताओं ने गाँधी के सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की.मिस्र में भारतीय राजदूत आर ० स्वामीनाथन ने अपने संबोधन में कहा कि बापू ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सत्य और अहिंसा के प्रयोग से विजय हासिल कर दुनिया को चौंका दिया था . और तब विश्व ने पहली बार अहिंसा की गूंज सुनी . अरब लीग के महासचिव उम्र मूसा ने गाँधी को दुनिया भर में उपेक्षितों की आवाज बताते हुए याद दिलाया कि वो गाँधी ही थे जिन्होंने सन ३१ में फिलिस्तीन का समर्थन किया था . मिस्र के पूर्व विदेशमंत्री अहमद माहिर ने अन्तराष्ट्रीय तंत्र में दोहरे मानदंड के चलन पर विशेष चिंता जाहिर की . अहमद माहिर ने कहा कि गाँधी के विचार हीं हैं जिनको अपना कर अरब और पश्चिम के बीच जारी मतभेद समाप्त जा सकते हैं . कार्यक्रम के दौरान एक प्रदर्शनी भी लगाई गयी जिसमें गाँधी के विचारों के जरिये वैश्विक समस्याओं के उत्तर ढूंढने की कोशिश की गयी थी . अरब जैसे अन्धविश्वासी समाज में गाँधी दर्शन की सराहना निश्चय ही दुनिया को बदलाव की ओर ले जायेगा .

>क्या गाँधी के विचारों के नाम पर निठारी के नर-पिशाचों को छोड़ने की भूल से हजारों कोहली और पंधेर को जन्म नही देंगे ??????

>

पिछले साल इसी दिन “गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता ” विषय पर एक गोष्ठी में गया था । चर्चा में मूल उद्येश्य से भटके वक्तागण वही पुरानी घिसी-पिटी बातें को लेकर गाँधी गुणगान में लगे थे । बात होनी चाहिए थी किआज २१ वीं सदी में गांधीवाद कितना प्रासंगिक है ? लेकिन पुरी चर्चा से ये मुद्दा ही गायब था । क्या कीजियेगा हमारे यहाँ शुरू से इस महिमामंडन कि परम्परा रही है! जीवन पर्यंत इश्वर में अविश्वास रखने वाले बुद्ध की प्रतिमा आज उतने ही आडम्बर के साथ पूजी जाती है! गाँधी जो ख़ुद जीवन भर ऐसी चीजों का विरोध करते रहे आज उनके चेले उनके विचारों पर गोबर डाल रहे हैं ! गाँधी जिस राम का नाम लेते-लेते जहाँ से चले गए आज उसी राम का नाम लेने से उनके चेले घबराते हैं! विडंबना ही है साहब !आजीवन गाँधी स्वदेशी – स्वदेशी रटते रहे आज उनके छद्म अनुयायी विदेशी कंपनियों को भारत को लुटने का लाइसेंस दोनों हाथों से बाँट रहे हैं! अब कितनी बात बताऊँ इन गांधीवादियों की सुन-सुन कर पक जायेंगे आप ।
तो अब वापस चलते हैं गोष्ठी में । गोष्ठी में ७-८ प्रतिभागी बोल कर जा चुके थे । लगभग बापू के हर सिद्धांत सत्य ,अहिंसा और भाईचारा वगैरह-वगैरह सभी पर लम्बी -लम्बी बातें फेंकी जा चुकी थी । आगे एक छात्रा ने बोलते हुए कहा कि आज बापू के सिद्धांत कई तरह से प्रासंगिक है । क्षमा ,दया ,प्रेम और अहिंसा के सहारे समाज को बदला जा सकता है। समाज में बढ़ते अमानवीय कृत्यों को बापू के रस्ते पर चल कर ही रोका जा सकता है । अपने गाँधी -दर्शन के प्रेम में या शायद श्रोताओं का ध्यान खींचने के लिए व्यावहारिकता को ताक पर रख कर अंत में कह गई कि अगर निठारी कांड के अभियुक्तों को छोड़ दिया जाए तो उनको सुधार जा सकता है । सुनते ही मेरे अन्दर खलबली सी मच गई ।{ मैं ठहरा, गाँधी नही गांधीवाद का विरोधी ।मेरी नजर में गाँधी एक सफल राजनेता अवश्य हैं लेकिन उनके विचारों ( उनके व्यक्तिगतachchhi aadaton को छोड़ कर) से मेरा कोई सरोकार नही है । }main भी आयोजक के पास पहुँचा और २ मिनट का समय माँगा , संयोग से मिल भी गई । मैंने कहा – में कोई शायर या विचारक नही जो शेरो-शायरी और बड़ी -बड़ी बातों /नारों सच को झूट और झूट को सच बता सकूँ । मैं तो केवल कुछ पूछना चाहता हूँ आप सब से । क्या गाँधी के विचारों के नाम पर निठारी के नर -पिशाचों को छोड़ने की भूल कर हम और हजारों सुरेन्द्र & मोनिदर सिंह पंधेर को जन्म नही देंगे ?क्या आप एक भी ऐसे देश का नाम बता सकते हैं जहाँ आज अहिंसा को राजकीय धर्म बनाया गया और वहां अपराध नही है ? नही बल्कि जिस देश में (चीन तथा अरब देशो
आदि में)जुर्म के खिलाफ कड़ी से कड़ी सज़ा का प्रावधान है अपराध भी वहीँ कम हैंहकीकत से जी मत चुराइए । एक सवाल और जानना चाहूँगा कि अगर किसी लड़की / महिला के साथ बलात्कार हो रहा हो अथवा कोशिश कि जा रही हो तब क्या वो गाँधी के तस्वीर को याद करेगी ? क्या वो एक बार बलात्कारहो जाने पर दोबारा उन दरिंदो के सामने अपने को पेश करेगी ?या फ़िर अपने बचाव में हिंसा का सहारा लेगी ? इस उदाहरण से मैंने यह साबित करना चाह कि दूसरा गाल बढ़ाने वाली गाँधी के सिद्धांत हर जगह लागु नही हो सकते । और कब तक हम गाँधी – गाँधी चिल्लाते रहेंगे ?आज देश को विश्व को नए गाँधी , नए मार्क्स की जरुरत है , नए विचारों को आगे लाना होगा ताकि हम भी आगे जा सकें ।