>गाँधी के सेक्स जीवन पर नई किताब से हुआ बवाल

>क्या बापू अर्ध-दमित सेक्स मैनियॉक थे ?



जनोक्ति .कॉम पर पढ़िये के०पी० त्रिपाठी का यह लेख जिसमें ब्रिटिश लेखक द्वारा हाल ही में लिखी गयी एक किताब के हवाले से गाँधी के जीवन से जुड़ी उन बातों पर प्रकाश डाला गया है जो अब तक अनछुआ ही रहा है . पढ़िये और खुद फैसला करिए कि इसमें कितना हकीकत और कितना फ़साना है ?


>कोऊ नृप होए हमें का हानि, बेचो दूध मिला के पानी

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इसी दो अक्टूबर को महात्मा गाँधी को समर्पण प्रदर्शन के भाव से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के पूर्व महात्मा गाँधी जोड़कर उसे मनरेगा बना दिया गया है। अब लगता है कि काम कुछ तेजी से हो सकेगा। नरेगा के द्वारा किस हद तक भ्रष्टाचार फैल गया है इसको किसी आँकड़े के द्वारा दर्शाने की आवश्यकता नहीं है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कैसे काम हो रहा है और किस तरह का काम कागजों पर दिखा कर किन्हें भुगतान किया जा रहा है यह सभी को भली-भाँति ज्ञात है। यहाँ सवाल नरेगा के तहत काम और उसकी गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करना नहीं है। सवाल है कि क्या नाम बदलने मात्र से अब योजना कारगर ढंग से कार्य करने लगेगी?

महात्मा गाँधी का नाम ले-लेकर अभी तक राजनीति की जा रही है पर क्या उनके सिद्धांत कायम हैं? हर बार अक्टूबर से लेकर जनवरी तक (गाँधी जी के जन्म से मरण तक) सिवाय कोरी गप्प के कुछ भी नहीं होता है। जो लोग आज उनके विचारों की प्रासंगिकता को लेकर विमर्श करते देखे जाते हैं वे स्पष्ट रूप से यह जान लें कि अब उनके विचारों की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है। (यह वाक्य बहुत से कथित गाँधी भक्तों को चुभेगा)

सत्यता यही है, हमारा चिवार किसी तरह के विवाद को जन्म देना नहीं है पर आप सभी खुद इसका आकलन कीजिए और बताइये कि क्या वाकई गाँधी जी और उनके विचार आज प्रासंगिक हैं? यदि हैं तो फिर इस तरह की वैमनष्यता क्यों? नरेगा के नाम पर गरीबों से छल क्यों? मृत्योपरान्त भी व्यक्ति को कागजों पर जिन्दा दिखला कर उसके नाम से भुगतान करते-करवाते रहना किस मानवता का प्रतीक है?

गाँधी ने कभी यह नहीं कहा था कि किसी गरीब को भूखे पेट सोने दो और तुम खुद भरपेट सो जाओ। माना कि हम पूरी तरह से किसी का भला नहीं कर सकते पर जिस हद तक किसी का भला होता हो तो करने में क्या समस्या है? नरेगा के द्वारा हुआ यह है कि देश का भ्रष्टाचार देश की सबसे छोटी नागरिक इकाई (आम ग्रामीण) के पास भी पहुँच गया है। यह तो गाँधी जी का सिद्धान्त नहीं है? गरीबों, मजदूरों के साथ इस तरह की अमानवीय हरकत किसी भी रूप में महात्मा गाँधी के प्रति श्रद्धा नहीं दर्शाती है।

दलितों के नाम पर, अल्पसंख्यकों के नाम पर, जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर देश में राजनीति करने वाले किसी महान व्यक्तित्व का अनुकरण क्या करेंगे। वोट के लिए किसी भी हद तक कुछ भी कर गुजरने वालों से इसी बात की आशा की जा सकती है कि वे किसी महापुरुष के जन्म दिवस पर, जयन्ती पर उसको श्रद्धासुमन अर्पित करना न भूलें। हालांकि भागादौड़ी, आपाधापी, स्वार्थमय जीवन शैली के कारण लगता है कि कुछ महापुरुषों की तरह शेष भी विस्मृत कर दिये जायेंगे।
काम जैसे चल रहा था वैसे ही चलता रहेगा। आम आदमी यही कहता घूमेगा, भटकेगा-‘‘कोऊ नृप होये हमें का हानि, बेचो दूध मिला के पानी।’’

>अरब जैसे अन्धविश्वासी समाज में गाँधी दर्शन की सराहना

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देश भर में पिछले एक पखवाड़े से गाँधी के सिद्धांतों और हिंद स्वराज को लेकर विमर्श चल रहा है . आज भारत हीं नहीं संसार के अनेक देशों के विद्वान गाँधी दर्शन में वैश्विक स्तर पर संघर्षों से उत्पन्न कुव्यवस्था  का समाधान बता रहे हैं .बीते दिनों गाँधी जयंती के दौरान काहिरा में आयोजित एक संगोष्ठी में अरब के गणमान्य नेताओं ने गाँधी के सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की.मिस्र में भारतीय राजदूत आर ० स्वामीनाथन ने अपने संबोधन में कहा कि बापू ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सत्य और अहिंसा के प्रयोग से विजय हासिल कर दुनिया को चौंका दिया था . और तब विश्व ने पहली बार अहिंसा की गूंज सुनी . अरब लीग के महासचिव उम्र मूसा ने गाँधी को दुनिया भर में उपेक्षितों की आवाज बताते हुए याद दिलाया कि वो गाँधी ही थे जिन्होंने सन ३१ में फिलिस्तीन का समर्थन किया था . मिस्र के पूर्व विदेशमंत्री अहमद माहिर ने अन्तराष्ट्रीय तंत्र में दोहरे मानदंड के चलन पर विशेष चिंता जाहिर की . अहमद माहिर ने कहा कि गाँधी के विचार हीं हैं जिनको अपना कर अरब और पश्चिम के बीच जारी मतभेद समाप्त जा सकते हैं . कार्यक्रम के दौरान एक प्रदर्शनी भी लगाई गयी जिसमें गाँधी के विचारों के जरिये वैश्विक समस्याओं के उत्तर ढूंढने की कोशिश की गयी थी . अरब जैसे अन्धविश्वासी समाज में गाँधी दर्शन की सराहना निश्चय ही दुनिया को बदलाव की ओर ले जायेगा .

>कंधमाल दंगे, धर्म-परिवर्तन और गाँधी जी

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आज सुबह -सुबह जनसत्ता की सुर्खी पढ़ी – ” कंधमाल दंगों का बड़ा कारण था धर्म परिवर्तन -आयोग ” । ओडिसा दंगों की असलियत को मुख्यधारा की मीडिया ने छुपाया । तथाकथित सेकुलर लोगों ने इसे संघ की साजिश करार देने में कोई कसर नही छोड़ी । परन्तु स्थानीय परिस्थितियों को हमेशा नजर अंदाज किया गया । आज आयोग की रपट पढ़ी तो देखा उन्ही मुद्दों को दंगों की मुख्य वजह बताई गई है । किसी भी दंगे की पृष्ठभूमि में लंबे समय से चल रही किसी बात का होना जरुरी होता है । हाँ , दंगे भड़कते हैं तात्कालिक वजहों से । ओडिसा समेत देश के विभिन्न भागों में धर्म परिवर्तन के कारण हिंसा की घटनाये आम हैं । ये बात भी सच है कि इसमे राजनीति भी की जाती रहा है । लेकिन दंगे केवल भड़काने से नही होते । आख़िर वो कौन सी मानसिकता है जो दंगों को जन्म देती है दो समुदायों में नफरत बढाती है । इसी सिलसिले में गाँधी जी जो अपनी धर्मनिरपेक्षता के लिए जाने जाते हैं उनका एक उद्धरण देखिये :-

” मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यधपि आजकल ईसाई मित्र अपने मुंह से तो ऐसा नही कहते कि हिंदू – धर्म झूठा धर्म है , तो भी उनके दिल में अब भी यही भाव जड़ जमाये हुए है कि हिंदू धर्म सच्चा नही है और इसाई -धर्म ही – जैसा उन्होंने समझ रखा है – एक मात्र सच्चा धर्म है । उनकी यह मनोवृति उन उद्धरणों से प्रकट होती है जो मैंने कुछ समय पूर्व सी ० एम० एस ० की अपील में से ‘हरिजन’ में प्रकाशित किए थे । हिंदू समाज में घुसी हुई छुआछुत या ऐसी ही अन्य भूलों पर कोई प्रहार करे तो बात समझ में आ सकता है । अगर इन मानी हुई बुराइयों को दूर करने में और हमारे धर्म कि शुद्धि में हमारी सहायता करें तो यह एक रचनात्मक प्रयास होगा और उसे हम कृतज्ञता पूर्वक स्वीकार भी करेंगे । पर आज जो प्रयास हो रहा है उससे तो यही दिखाई पड़ता है कि यह तो हिंदू धर्म को जड़-मूल से उखाड़ फेंकने और उसके स्थान पर दूसरा धर्म कायम करने की तैयारी है । यह तो ऐसी बात है मानो किसी पुराने मकान को , जिसमे मरम्मत की बड़ी जरुरत हो , पर जो रहने को अच्छा और काम देने लायक प्रतीत होता हो , कोई जमीं में मिला देना चाहे । अगर कोई गृह स्वामी को जाकर बताये कि उसमे क्या -क्या सुधार और मरम्मत होना चाहिए , तो इसमें संदेह नही कि वह उनका स्वागत करेगा । पर अगर कोई उस मकान को ही गिराने लगे जिसमें उसके पूर्वज सदियों से रहते आए हो , तो वह जरुर उसका प्रतिकार करेगा ।

(१३। ०३। १९३७ , पृष्ठ १८५-४८६ , खंड -६४ , गाँधी वांग्मय )

गाँधी जी ने धार्मिक प्रतिस्पर्धा को चिन्हित किया है कि किस तरह से तब हिंदू -धर्म को झूठा बता कर आनी धर्मों को स्थापित किया जारहा था । आज भी स्थितियां वही हैं । तो ऐसी परिस्थिति में प्रतिकार की बात कही है । गाँधी जी अहिंसात्मक प्रतिकार की बात करते हैं पर प्रतिकार तो करना है । लेकिन जब लोगों को कोई रास्ता नही मिलता तब हिंसा ही एक मात्र सहारा बनती है । पर ये बात अनेक तथाकथित परगतिशील बुद्धिजीवियों को समझ में नही आएगी भले हीं वो नक्सली हिंसा को सही ठहराते हों ।