रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गये

रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गये
धोये गये हम ऐसे कि बस पाक हो गये

आपने लता मंगेशकर निर्मित लेकिन फिल्म का गाना सुनियो जी एक अरज म्हारी सुना होगा यह फिल्म सन 1990 में बनी थी और पंडित हृदयनाथ मंगेशकर और लताजी की भाई बहन की जोड़ी ने संगीत के मामले में कमाल किया था।

अभी पिछले दिनों मैने मिर्जा गालिब की एक गज़ल रोने से और इश्क में बेबाक हो गये……सुनी जो सन 1969 में लताजी ने हृदयनाथजी के संगीत निर्देशन में गाई थी। खास बात यह थी कि इस गज़ल का संगीत बिल्कुल सुनियो जी एक अरज…जैसा था, यों या कहना चाहिये कि सुनियो जी का संगीत बिल्कुल रोने से इश्क में … जैसा है। हृदयनाथजी ने 21 साल बाद अपने ही संगीत को वापस अपनी फिल्म में दूसरे गीत के लिये कितनी खूबसूरती से उपयोग किया!

लीजिये सुनिये मिर्ज़ा असदुल्ला बेग खान مرزا اسد اللہ خان या मिर्ज़ा गालिब की यह सुन्दर गज़ल।

ghalib

>रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गये

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रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गये
धोये गये हम ऐसे कि बस पाक हो गये

आपने लता मंगेशकर निर्मित लेकिन फिल्म का गाना सुनियो जी एक अरज म्हारी सुना होगा यह फिल्म सन 1990 में बनी थी और पंडित हृदयनाथ मंगेशकर और लताजी की भाई बहन की जोड़ी ने संगीत के मामले में कमाल किया था।

अभी पिछले दिनों मैने मिर्जा गालिब की एक गज़ल रोने से और इश्क में बेबाक हो गये……सुनी जो सन 1969 में लताजी ने हृदयनाथजी के संगीत निर्देशन में गाई थी। खास बात यह थी कि इस गज़ल का संगीत बिल्कुल सुनियो जी एक अरज…जैसा था, यों या कहना चाहिये कि सुनियो जी का संगीत बिल्कुल रोने से इश्क में … जैसा है। हृदयनाथजी ने 21 साल बाद अपने ही संगीत को वापस अपनी फिल्म में दूसरे गीत के लिये कितनी खूबसूरती से उपयोग किया!

लीजिये सुनिये मिर्ज़ा असदुल्ला बेग खान مرزا اسد اللہ خان या मिर्ज़ा गालिब की यह सुन्दर गज़ल।

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ये ना थी हमारी किस्मत के विसाले यार होता : नूरजहाँ और सलीम रज़ा

मित्रों आज प्रस्तुत है आपके लिये मिरजा ग़ालिब की गज़ल ये ना थी हमारी किस्मत.. यह गज़ल आपने कई कलाकारों की आवाज में सुनी होगी। परन्तु मुझे सबसे ज्यादा बढ़िया लगती है स्व. तलत महमुद साहब के द्वारा गाई हुई भारत भूषण और सुरैया अभिनित फिल्म मिर्जा गालिब फिल्म की यही गज़ल.. ये ना थी।
कुछ दिनों पहले मैने सलीम रज़ा और मल्लिका-ए-तरन्नुम (मैडम) नूरजहां के द्वारा गाई हुई 1961 में बनी पाकिस्तानी फिल्म गालिब की यह गज़ल सुनी। सुनने के बाद इस गज़ल का संगीत भी बहुत पसन्द आया तो आज आपके लिये यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस फिल्म की एक खास बात और है, और वह ये कि यह फिल्म नूरजहाँ की आखिरी फिल्म है।

>ये ना थी हमारी किस्मत के विसाले यार होता : नूरजहाँ और सलीम रज़ा

>मित्रों आज प्रस्तुत है आपके लिये मिरजा ग़ालिब की गज़ल ये ना थी हमारी किस्मत.. यह गज़ल आपने कई कलाकारों की आवाज में सुनी होगी। परन्तु मुझे सबसे ज्यादा बढ़िया लगती है स्व. तलत महमुद साहब के द्वारा गाई हुई भारत भूषण और सुरैया अभिनित फिल्म मिर्जा गालिब फिल्म की यही गज़ल.. ये ना थी।
कुछ दिनों पहले मैने सलीम रज़ा और मल्लिका-ए-तरन्नुम (मैडम) नूरजहां के द्वारा गाई हुई 1961 में बनी पाकिस्तानी फिल्म गालिब की यह गज़ल सुनी। सुनने के बाद इस गज़ल का संगीत भी बहुत पसन्द आया तो आज आपके लिये यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस फिल्म की एक खास बात और है, और वह ये कि यह फिल्म नूरजहाँ की आखिरी फिल्म है।
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तेरी आँखों को जब देखा, कँवल कहने को जी चाहा

– मेहदी हसन की एक उम्दा गज़ल-

मेरा मानना है गज़लों के मामले में मेहदी हसन के मुकाबले शायद ही कोई गायक ठहरता होगा। एक से एक उम्दा गज़लें हसन साहब ने गाई है। किस का जिक्र करूं किस को छोड़ूं !!!! सूरज को आईना दिखाने का साहस मुझमें नहीं। मैं आज आपको मेहदी हसन साहब की सबसे बढ़िया गज़ल सुनवा रहा हूँ।

वैसे इसे गज़ल से ज्यादा प्रेम गीत कहना चाहिये, नायक ने नायिका के आँखो और होठों की किस सुन्दरता से तारीफ की है। बस आप गज़ल सुनकर ही आनंद लीजिये।

तेरी आँखो को जब देखा
कँवल कहने को जी चाहा
मैं शायर तो नहीं लेकिन
गज़ल कहने को जी चाहा

तेरा नाजुक बदन छूकर
हवाएं गीत गाती है
बहारें देखकर तुझको
नया जादू जगाती है
तेरे होठों को कलियों का
बदल कहने को जी चाहा

मैं शायर तो नहीं लेकिन
गज़ल कहने को जी चाहा

इजाजत हो तो आँखो में
छुपा लूं, ये हंसी जलवा
तेरे रुख़सार पे करले
मेरे लब़ प्यार का सज़दा
तुझे चाहत के ख्वाबों का
महल कहने को जी चाहा

मैं शायर तो नहीं लेकिन
गज़ल कहने को जी चाहा
तेरी आँखो में जब देखा..

>तेरी आँखों को जब देखा, कँवल कहने को जी चाहा

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– मेहदी हसन की एक उम्दा गज़ल-

मेरा मानना है गज़लों के मामले में मेहदी हसन के मुकाबले शायद ही कोई गायक ठहरता होगा। एक से एक उम्दा गज़लें हसन साहब ने गाई है। किस का जिक्र करूं किस को छोड़ूं !!!! सूरज को आईना दिखाने का साहस मुझमें नहीं। मैं आज आपको मेहदी हसन साहब की सबसे बढ़िया गज़ल सुनवा रहा हूँ।

वैसे इसे गज़ल से ज्यादा प्रेम गीत कहना चाहिये, नायक ने नायिका के आँखो और होठों की किस सुन्दरता से तारीफ की है। बस आप गज़ल सुनकर ही आनंद लीजिये।

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तेरी आँखो को जब देखा
कँवल कहने को जी चाहा
मैं शायर तो नहीं लेकिन
गज़ल कहने को जी चाहा

तेरा नाजुक बदन छूकर
हवाएं गीत गाती है
बहारें देखकर तुझको
नया जादू जगाती है
तेरे होठों को कलियों का
बदल कहने को जी चाहा

मैं शायर तो नहीं लेकिन
गज़ल कहने को जी चाहा

इजाजत हो तो आँखो में
छुपा लूं, ये हंसी जलवा
तेरे रुख़सार पे करले
मेरे लब़ प्यार का सज़दा
तुझे चाहत के ख्वाबों का
महल कहने को जी चाहा

मैं शायर तो नहीं लेकिन
गज़ल कहने को जी चाहा
तेरी आँखो में जब देखा..