>प्लीज उसे मेरा बाप मत कहो …………………..

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>इस सप्ताह के सर्वाधिक लोकप्रिय आलेख ,लेखक के नाम और लिंक दिए गये हैं

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जनोक्ति .कॉम पर इस सप्ताह के सर्वाधिक लोकप्रिय आलेख ,लेखक के नाम और लिंक दिए गये हैं  . आप भी पढ़िये और विमर्श में भाग लीजिये . 

>जनोक्ति.कॉम पर अपने लेख पोस्ट करने का आसान तरीका !

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प्रिय आत्मन .

आप का जनोक्ति परिवार में स्वागत है ! हमारे हिंदी वेब पोर्टल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करके पंजीयन करें .  आप निम्न विषयों पर अपनी जनोक्ति पर प्रकाशित कर सकते हैं

अंधेर नगरी( सरकारी नीति ) ,अध्यात्म, इतिहास ,कला-संस्कृति, कविता, कृषिजगत, खेल-कूद, गीत-ग़ज़ल,चौथा खंभा,जीवन,जीवन बीमा, तकनीक,दर्शन,दस्तावेज़, दिल्ली -एनसीआर, दीवान-ए-आम,नारी, पर्यटन,पर्व-त्यौहार, पाठक उवाच, प्रकृति,प्रेरक-कथा, बड़ी खबर, ब्लॉग-जगतो , भारतनामा, मीडिया-संसार, यूपी-बिहार, राष्ट्रीय , रोजी-रोटी, विविध,व्यंग,शिक्षा,संगीत-संसार, संसद मार्ग (राजनैतिक ),समाज ,सम्पादक उवाच , साक्षात्कार, साहित्य, सिनेमा-संसार, सुझाव,सेक्स और समाज ,स्मृति-लेख

कृपया पोस्ट करते समय निम्न बातों का ध्यान रखें :

  • यदि रचना पूर्व में किसी ब्लॉग या वेबसाइट पर प्रकाशित हो तो कृपया शीर्षक जरुर बदल दें और संभव हो तो अग्रांश भी बदलने की कोशिश करें .
  • पोस्ट करते समय डेशबोर्ड के दायें साइडबार में दिख रहे केटेगरी में से उपयुक्त का चयन कर उसमें टिक जरुर करें . और यथासंभव उपयुक्त फोटो भी डाल दें .
  • एक आग्रह और है कि अपनी किसी भी रचना को अपने ब्लॉग के अलावा जनोक्ति.कॉम पर पहले प्रकाशित करें , वैसे यह आपके ऊपर है , हमारी कोई बाध्यता नहीं है !

>जनोक्ति.कॉम पर समाचारों का प्रकाशन शुरू , आप भी आइये

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जनोक्ति परिवार के सभी सदस्यों और पाठकों के लिए एक और खुशी की खबर है . जनोक्ति.कॉम पर दिन भर के मुख्य समाचारों को अपने पाठकों के लिए परोसने का काम शुरू हो गया है . आप सभी जानते हैं अभी तक जनोक्ति.कॉम पर राजनीति , सरकार की नीति , सामाजिक मुद्दों , मीडिया , सिनेमा , साहित्य समेत विविध विषयों पर केवल आलेख , साक्षात्कार आदि प्रकाशित किये जाते रहे हैं . जनोक्ति परिवार के कई सदस्यों और पाठकों का सुझाव था कि यहाँ समाचार भी दिए जाएँ ताकि वेबसाइट पर आने वालों को किसी तरह की कमी का अहसास ना हो और वो एक जगह हर चीज पा सकें . वस्तुतः हमने उनके सुझाव पर अमल करते हुए साइडबार में ” बड़ी खबर पर एक नज़र ” नाम से एक नया कॉलम शुरू किया है जिसमें दिन भर की १० बड़ी खबर को प्रकाशित किया जायेगा . अभी जो खबर पोस्ट किये जा रहे हैं उनमें से अधिकांश  विभिन्न समाचार एजेंसियों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित हैं . जनोक्ति .कॉम के लिए दिल्ली- एनसीआर – पटना , लखनऊ , भोपाल , रायपुर और जयपुर में  संवाददाता नियुक्त करने के लिए काम जारी है . जल्द हीं एक अच्छी टीम के साथ हम उन ख़बरों को पाठकों के सामने लायेंगे जो मुख्यधारा की मीडिया में दबा दी जाती हैं या अत्यंत छोटे रूप में प्रस्तुत की जाती है .हमारे  निरंतर बढ़ते कदमों को आपके सहारे की जरुरत है . ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़ें और दूसरों को जोड़ें , इसी आशा के साथ जनोक्ति.कॉम पर आपका पुनः स्वागत है !
जनोक्ति परिवार 

>गाँधी के सेक्स जीवन पर नई किताब से हुआ बवाल

>क्या बापू अर्ध-दमित सेक्स मैनियॉक थे ?



जनोक्ति .कॉम पर पढ़िये के०पी० त्रिपाठी का यह लेख जिसमें ब्रिटिश लेखक द्वारा हाल ही में लिखी गयी एक किताब के हवाले से गाँधी के जीवन से जुड़ी उन बातों पर प्रकाश डाला गया है जो अब तक अनछुआ ही रहा है . पढ़िये और खुद फैसला करिए कि इसमें कितना हकीकत और कितना फ़साना है ?


>क्या यह कांग्रेसियों का स्वांग नहीं है ?

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राजनीति में श्रेय का बड़ा महत्व है . किसी भी काम का श्रेय  छीनने की होड़ में कभी-कभी कुछ अच्छा काम भी हो जाया करता है . दो दशकों से भी अधिक समय तक मुंबई में ठाकरे की घिनौनी राजनीति ने कहर मचा रखी है . बड़े ठाकरे के बाद अब छोटे ठाकरे अपनी अलग पार्टी बना कर उछल-कूद कर रहे हैं . पहले लुंगी वालों की पुंगी बजाई अब भाइयों की बारी आई . गैर मराठियों को जम कर मारा पीटा गया . राज्य से लेकर केंद्र तक कांग्रेस और राष्ट्रवादी कोंग्रेस चुप रही . आज अचानक क्या हो गया जो गृहमंत्री देश की एकता -अखंडता को लेकर चिंतित हो गये . मीडिया में उनका ब्यान आने लगा कि भारतीय संविधान किसी भी भारतीय को कहीं भी बसने और काम करने की स्वतंत्रता देता है और केंद्र सरकार इसे सुनिश्चित करेगी . आखिर क्या वजह है ? साफा है कि संघ का इस मुद्दे पर आया ब्यान सरकार में खलबली मचा गया है . सोनिया ब्रिगेड घबरा गयी कि कहीं इसका श्रेय संघ के पास ना चला जाए …………. यहाँ तक तो ठीक है पर जनता कैसे पचा पाएगी गृहमंत्री के बयान को जब हाल हीं में अशोक चाहवान सरकार ने भाषावाद से ओत-प्रोत होकर मुंबई में टेक्सी परमिट का नया कानून लागू किया है . क्या गृह मंत्री और महारष्ट्र के मुख्यमंत्री का कृत्य आपस में विरोधाभाषी नहीं है ? क्या यह कांग्रेसियों का स्वांग नहीं है ? 

>इनके हाथों में ये तलवार, ये भाले क्यूं हैं !

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आज सुबह मेल देखने बैठा तो एक शुभचिंतक  का पत्र  था…उनकी पीड़ा और चिंता बहुत ही जायज़ लगी….बात ब्लॉग्गिंग में बढ़ रही गुटबंदी की थी….हालांकि यह कोई नयी बात नहीं है..जब ब्लॉग नहीं थे उस समय भी यह गुट मौजूद थे…मैंने देखा बहुत से अच्छे लोगों की ऊर्जा इस गुटबंदी ने बर्बाद कर दी..बहुत से अच्छे   अच्छे  प्रोजेक्ट इसकी भेंट चढ़  गए….पर यह विकृति कभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुयी…जिन कलमकारों ने समाज के बटवारे को रोकना था,   फूट को समाप्त करना था…गुटबंदिओं  को उखाड़ फेंकना  था…वही आपस में बंट  गए..उनके ही अलग अलग गुट बन गए…अपनी अपनी पत्रिकाएँ  और अपने अपने अखबार बन गए…लेखकों  का संगठन बना तो उसके भी गुट बन गए…सरकार और समाज के साथ टक्कर लेने वाले लोग एक दुसरे के सामने खड़े होकर लगे एक दुसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने…इस हालत ने बहुत सी और बुरायीओं  को भी जन्म दिया… फिलहाल मुझे याद आ रही है विनय दुब्बे की एक नज़म…जिसे मैंने एक पंजाबी पत्रिका में पढ़ा था…प्रस्तुत है उस नज़म का एक  अंश…..
मैं जब भी कविता लिखता हूँ
तो भूख को भूख लिखता हूँ,
विचार या विचारधारा नहीं लिखता……
……..
विचार या विचारधारा के सम्बन्ध में 
मुख्य सचिव प्रगतिशील  लेखक  संघ,
मुख्य सचिव जनवादी लेखक  संघ से बात करो…
मैं तो कविता लिखता हूँ….  
मैंने उस समय भी यही कहा था कि विचारों से स्वतंत्र रहने का विचार भी अपने आप में बुरा नहीं….पर उलझन और दुविधा के समय विचारधारा ही काम देती है…दरअसल फूट डालो और राज करो की नीति अब बहुत पुरानी हो चुकी है….इस नीति को सभी  नहीं तो बहुत से लोग पहचान  भी गए  हैं…अब आ चुकी है….कन्फ़ूज़ एंड रूल की नयी नीति……उल्झायो  और राज करो…..दुःख की बात है कि बहुत से कलमकार भी इस का शिकार ही चुके हैं..और उलझते जा रहे हैं…उन्हें सब कुछ ठीक या सब कुछ गलत लगता है…..जबकि ऐसा होता नहीं पर फिर भीर  दुविधा और उलझन बढ़  गयी है. ऐसी हालत में विचार या विचारधारा ही मार्गदर्शन  करती है.  पर
देखना यह होगा कि वे लोग खुद सीधे-सीधे किसी विचार या विचारधारा से प्रभावित हो रहे हैं या फिर नारेबाजी करने वाले किसी दल या गुट के  प्रभाव  में आ रहे  हैं….अगर किसी दल का प्रभाव है तो कम से कम यह ज़रूर देख लें कि उस दल के नेताओं की  अपनी निजी जिंदगी भी उस विचारधारा के अनुरूप ही है या फिर  वे कहते कुछ और है करते  कुछ और…
साहित्य  में बंगाल का अपना  अलग ही स्थान रहा है.  उस भूमि पर विचारों की कमी तो कभी भी नहीं रही…न ही जोश, मेहनत, लगन और इमानदारी की पर कहानी बहुत दुखद है इस बंगाल की..आनदमार्ग  के संस्थापक श्री श्री आनंद मूर्ती उर्फ़ पी आर सरकार के मुताबक एक दिन जो बंगाली दो बंगालों को  एक करने के लिए सारी शक्ति जुटाकर लडाई में कूद पढ़े थे  उसी बंगाली ने बंगाल को फिर से दो टुकड़े करने के लिए १९४७ के साल में अंग्रेजों के यहाँ दरबार किया था.  साल 1912  में जब दोनों बंगाल एक हो गए तब भी बंगालिओं ने सोचा वह लडाई में जयी हुए और और जब 1947  में बंगाल फिर से दो टुकड़े हुआ तब भी बंगालिओं ने सोचा वह जयी हुआ. इतिहास का यह कैसा वियोगान्त  नाटक (ट्रेजेडी) है…गौरतलब है कि वर्ष 1912 में दोनों बंगाल जब एक हुए तब बंगालिस्तान के अनेक अंश बंगाल से बाहर रख लिए गए थे..क्यों..? …..यह इतिहास ही बोल सकेगा…..यह कहानी काफी लम्बी है…..हम बात कर रहे ब्लॉग्गिंग में भी दाखिल हो चुकी गुटबंदी इतियाद की…
……आखिर में मुझे याद आ रहे हैं जनाब जावेद अख्तर  और उनकी एक नज़म :
लोग इन मुर्दा खुदाओं को सम्भाले क्यूं हैं !
फ़िक्र पे जंग है क्यूं,  ज़हन पे ताले क्यूं हैं !
धर्म तो आया था दुनिया में मोहब्बत के लिए..!
इनके हाथों में ये तलवार, ये भाले क्यूं हैं !               
बांटते फिरते हैं नफ़रत जो ज़माने भर में,
ऐसे इंसान तेरे चाहने वाले क्यूं हैं !
आँख रोशन हुयी सूरज की किरण से लेकिन,
ज़हन में अब भी अँधेरे के ये जले क्यूं है !
    कुल मिलकर अब यह आशा की जानी चाहिए कि हालत में सुधार होगा…नहीं तो इसका फायदा कोई तीसरा ही उठाएगा……..                                                          –रैक्टर कथूरिया

>सामयिक विमर्श सम्मान के लिए आलेख 8 नवम्बर तक हमें मेल करें

>                                                                 सामयिक विमर्श सम्मान

                              जनोक्ति परिवार की ओर से हर महीने सम-सामयिक विषयों पर 
               मौलिक लेखन करने वालों को प्रोत्साहित करने हेतु सम्मान देने का निर्णय लिया गया है . 
   सामयिक विमर्श सम्मान के लिए अपने आलेख 8 नवम्बर तक हमें मेल  करें .सर्वोत्तम  तीन आलेखों 
                                               को सम्मान हेतु चयनित किया जायेगा . 
                                     सम्मान राशि : 250 रूपये , 200 रूपये , 125 रूपये
सौजन्य  : जनोक्ति परिवार
मेल : janokti@gmail.com
पता: एच -56 ,शकरपुर
        दिल्ली -110092

>खिसयाई बिल्ली खम्भा नोचे

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” हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम , वो क़त्ल भी करते है तो चर्चा नहीं होती. जो कुछ मुंबई मे हुआ वह पहली दफा नहीं हुआ जब मीडिया को प्रताड़ित किया गया . जब कभी मीडिया सच बोलता है तो उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ती है. आज बाला साहब हुंकार करके मीडिया की भर्त्सना कर रहे है लेकिन , जब राज उत्पात मचा रहे थे तब उन्होंने कुछ नहीं कहा .जब राज वहां क्षेत्रवाद का नंगा नाच कर रहे थे बल्कि यूं कहें अपना जनाधार तैयार कर रहे थे तब कोई गुस्सा कोई हमला नही !लेकिन अब ऐसा क्या हो गया जो उनके रगों मे बहता खून उबाल मारने लगा यह समझने के लिए महाराष्ट्र चुनाव की तरफ़ रुख करना होगा जहाँ शिव सेना औंधा मुह गिरा. उस चुनाव परिणाम में साफ़ देखा जा सकता था की बाला साहब की ढलती उम्र शिव सेना को अपनी चपेट में ले रही थी .इसी बनती छवि और मनसे की कामयाबी से वो तिलमिला उठे ,जरा सा बात यह है की उन्हें अब मनसे से खतरा लगता है .उन्हें लगता है की उनके पैरों के निचे से सियासत की जमीं खिसक रही है .वह अपना खोया जनाधार हासिल करना चाहते है .यह महज पोलिटिकल स्टंट है .और रही बात सचिन को भगवन मानने की तो यह भारतीय इतिहास की विडम्बना ही है की जिसके पास शास्त्र नहीं तो वह भगवन नहीं .तो किसके हाथ तीर तरकस से लैस और कौन निहत्था है यह बताने की जरुरत नहीं .

>फ़िर भी देश ,काल और लोक की इनकी अपनी समझ है

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बहुत दिनों बाद आज कई चिट्ठों को खंगाल कर कुछ पठनीय अंश यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ .कहते हैं न  “जिन खोजा तिन पाइयाँ ” . अक्सर गप्पबाजी में  सुनते है ,आजकल कुछ अच्छा और सार्थक लिखा नहीं जा रहा पर ऐसा नहीं है . खोजिये तो जनाब ! परन्तु यह भी है एक आम पाठक के पास इतना समय कहाँ है कि खोज सके . इसलिए ऐसी चर्चाओं का आना जरुरी है जो कुछ अच्छे पठनीय सामग्री का संकलन एक पोस्ट में पेश करे . अच्छा और सार्थक लिखने वाले बहुत हैं ऐसे लोग भले हीं महीने में तीन-चार पोस्ट करते हों , इनकी लेखनी किसी खास खांचे में फिट नहीं बैठती हो , लम्बा और बहुत खोजपूर्ण नहीं हो , फ़िर भी देश ,काल और  लोक की इनकी अपनी समझ है और तरह-तरह के लोगों को पढ़कर हर दिन एक नया नज़रिया मिलता है तो अब पढ़ते रहिये हमारे साथ ………
मुलायम की राजनीति और कल्याण के करवटों का भेद खोल रहे हैं  खरे साहब :
“आने वाले समय में भाजपा अगर उमाश्री भारती, कल्याण सिंह और राजवीर को गले लगा ले तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वर्तमान राजनीति को देखकर तो यही कहा जा सकता है, कि सब कुछ संभव है राजनीति में। आखिर राजनीति की एक लाईन की परिभाषा : “जिस नीति से राज हासिल हो, वही राजनीति है“ जो ठहरी। “

२०१२  के विध्वंश  के पीछे के अर्थशास्त्र  को  शैलेन्द्र से जानिये  बेहद कम शब्दों में   :
” 21 दिसंबर 2012 के दिन जो होगा वो होगा ..लेकिन इतना तय है की आज से कुछ सालों बाद किसी मैनेजमेंट संस्थान के छात्रों को फिल्म 2012 के शानदार प्रमोशन कैंपेन के बारे में पढ़ाया जा रहा होगा और उसमें उस अफवाह की भी जिक्र होगा जिसे सच साबित करने के लिए कुछ वैज्ञानिक भी जी जान से लगे हुए हैं ..और हो सकता है जल्द ही बालीवुड का कोई निर्माता बिल्कुल इसी कथानक की कोई फिल्म लेकर आए क्योंकि बाजार के महौल का फायदा हर चतुर व्यापारी उठाना चाहता है “
 धरती के स्वर्ग की यात्रा का मज़ा और सजा दोनों बता रहे हैं अय्यर जी :
रशीद ने मुझसे पूछा अच्छी कश्मीरी चाय कुछ आगे मिलेगी आप बोलो तो रुक सकते हैं” “हां-हां क्यों नहीं मैने कहा, कुछ ही आगे एक गाँव आया, सड़क किनारे एक छोटा सा ठीया था. गाड़ी से उतरते ही एक मीठी और भीनी भीनी सी खुशबू से सामना हुआ. चाय और टोस्ट वाकई बहुत अच्छे थे. हम मज़ा ले ही रहे थे,  तभी एक जीप के ब्रेकों के चीखने की आवाज़ आयी दो लोग तेजी से उतर कर आये और हम तक पहुंच कर कहा अनंतनाग के पास हमला हुआ हैं, आप लोग अगली खबर मिलते तक रुकेंगे तो ठीक रहेगा…..
अपनी जागरूकता और उसके परिणामों से कुछ सन्देश दे रही हैं कविता वर्मा  :

सभी के बच्चे घूम कर गिरते पड़ते जा रहे हैं सिर्फ़ मेरा ही नागरिकबोध जाग पड़ा पहुँच गयी एक दिन सरपंच के पास साड़ी समस्या सुनाने। बड़ा भला आदमी है सरपंच भी तुंरत मुझे कुर्सी दी चाय मंगवाई पुरी बात ध्यान से सुनी और तुंरत मुरम के डम्पर वाले को फ़ोन किया .कालोनी वाले को भी फ़ोन पर कहा भिया सड़क खोल दो लोगों को तकलीफ होती है .मैडम दो तीन दिन में आपका काम हो जाएगा यदि न हो तो मुझे बताना। दसियों बार धन्यवाद दिया उन्हें, कितना भला आदमी है अब तो रोड खुल ही जायेगी” 

गिरते सामाजिक मूल्यों  में  माँ-बाप की बढ़ती परेशानी  से रूबरू करवा रहे हैं  अनिल शर्मा  :
आजकल भारत देश में वर्द्धाआश्रमों की बाढ़  सी आई हुई है , जयादातर बच्चे अपने माता पिता को आश्रमों में छोड़ रहे है . जो बच्चे अपने माता पिता को अपनी निजता में दखल मानते है . उनकी बीमारी,नाकारापन  ,चिडचिडापन और हर बात में टोका टोकी को बर्दाश्त न कर पाने की सूरत में इनको आश्रमों में छोडा आना ही उचित समझते है , इससे उन माता पिताओं पर क्या गुजरती होगी जो अपने बच्चो से बड़ी बड़ी आशाये लगाये हुए होते है , मेरा भी एक मित्र अखलेश इसी तरह का है जिसने अपने माता पिता को आश्रम में भेज दिया है  और खुद  अपनी पत्नी और तीन बच्चो के साथ एक बढ़िया बंगले में रहता है , भगवान  का इतना बड़ा भगत है की जहा भी मंदिर दिखे वहा दर्शन करना और देवी देवताओ के कार्यो के लिए धन लुटा उसकी आदत में शुमार है ,यानि भगवान जहाँ है सब कुछ वहां है “ 

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