"माँ" पर निबन्ध : माँ से पहचान

राहुल.. होमवर्क हो गया क्या ? चलो जल्दी करो.. स्कूल को देर हो रही है । हो गया मम्मी.. देखो स्कूल में मुझे “मेरी माँ” पर निबन्ध लिखकर ले जाना है, मैने लिखा है – “मेरी माँ मुझे जल्दी उठाती है, होमवर्क करवाती है, पढा़ती है, मुझे कहानियाँ सुनाती है, मुझे डॉक्टर के यहाँ ले जाती है…” चलो,चलो ठीक है, जल्दी से नाश्ता कर लो… बस आती ही होगी । माँ ने राहुल को मदद करके उसे स्कूल भेज दिया । लेकिन शाम को जब राहुल स्कूल से वापस आया तो गुमसुम सा था, निराश सा था । स्कूल में मैडम ने कहा कि जो तुम लोग लिखकर लाये हो, वह तो सभी बच्चों ने थोडे-बहुत फ़ेरबदल के साथ लिखा है, तुम लोगों ने निबन्ध में नया क्या लिखा ? माँ तुम्हारे लिये इतना कुछ करती है, इसलिये वह तुम्हें अच्छी लगती है, लेकिन अपनी माँ के बारे में तुम्हें क्या-क्या मालूम है, वह लिखो… तुम्हारी माँ को क्या पसन्द-नापसन्द है, उसके शौक क्या हैं, उसका जन्मदिन, उसकी मेहनत… इन सब के बारे में तुम्हारे पिताजी को, तुम्हारी दीदी और भैया को क्या लगता है, तुम लोग अपनी माँ के लिये क्या करते हो ? इन सब बातों को देखो, परखो और निरीक्षण करके नया निबन्ध लिखकर लाओ, चाहो तो अपने दीदी, भाई या पिताजी से मदद ले सकते हो… तुम लोग अब आठवीं के बच्चे हो, जरा अपना भी दिमाग लगाओ और फ़िर से निबन्ध लिख कर लाओ..
राहुल के निरीक्षण की शुरुआत हो गई…. माँ की पसन्द-नापसन्द… मैं तो सिर्फ़ आलू की सब्जी खाता हूँ, माँ तो सभी सब्जियाँ, चटनियाँ खाती है, हम सभी को ताजा परोसती है, और यदि किसी दिन कम पड़ जाये तो थोडा़ सा ही खाती है.. बचा हुआ खाना बेकार ना जाये इसलिये कई बार खामख्वाह एक रोटी ज्यादा भी खा लेती है । ताजा और गरम खाना हमें परोसती है, और सुबह का या कल का बासी खुद की थाली में लेती है…अरे.. मैने तो कभी माँ से नहीं कहा कि आज मुझे बासी खाना दे दो, ताजी रोटी तुम खा लो.. मैं ही क्यों, दीदी, भैया और पिताजी ने भी माँ से ऐसा नहीं कहा । मुझे टेबल टेनिस खेलना पसन्द है, इसलिये माँ ने मेरे बर्थ-डे पर बैट लाकर दिया । माँ के शौक क्या हैं ? … हाँ ठीक.. उसे पत्रिकायें पढना और हारमोनियम बजाना अच्छा लगता है, लेकिन बहुत सालों से हमारा हारमोनियम खराब हो गया है, माँ ने तो सभी से कहा था, लेकिन ना तो भैया, न पापा, किसी ने उस हारमोनियम को ठीक नहीं करवाया… थोडा़ सा समय मिलता है तो माँ कुछ पढने बैठ जाती है, लेकिन एकाध पुस्तक खरीदने की बात चलते ही पापा कहते हैं, पत्रिकायें बहुत महंगी हो गई हैं, इतने में तो दीदी की एक किताब आ जायेगी । अब.. रंग.. रंग.. रंग.. माँ को कौन सा रंग पसन्द है ? पता नहीं, क्योंकि माँ खुद के लिये बहुत ही कम साडियाँ खरीदती है, शादी-ब्याह में जो मिल जाती हैं उसी से काम चलाती है, हाँ, लेकिन बिस्तर की चादरें माँ ने हल्के नीले रंग की ली थीं… निबन्ध में नीला लिख लेता हूँ.. । माँ का जन्मदिन.. कब होता है.. मैडम ने कहा है कि कुछ भी माँ से नहीं पूछना है, दीदी ने बताया – ४ जनवरी… इस दिन हम लोग क्या करते हैं… छिः माँ का जन्मदिन तो हमने कभी ठीक से मनाया ही नहीं.. मेरे, दीदी और पापा के बर्थ-डे पर माँ लौकी का हलवा, गुलाब जामुन और पुरणपोली बनाती है । माँ को कौन सी मिठाई पसन्द है ? मालूम नहीं.. क्यों पापा, माँ को मीठे में क्या पसन्द है ? पापा… पापा… “अरे क्या चाहिये, मैं अखबार पढ रहा हूँ, दिखता नहीं क्या ? माँ से पूछो.. मुझे क्या मालूम !
पिछले हफ़्ते दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक गई थी.. माँ ने सुबह जल्दी उठकर उसके लिये आलू की सब्जी और पूडि़याँ बनाकर दी थीं, पापा ने जो पैसे दिये थे, उसके अलावा अपने पास से पचास रुपये भी दिये… माँ कब पिकनिक पर गई थी ? याद नहीं.. पिछले महीने माँ के महिला मंडल की पिकनिक थी, लेकिन पिताजी ने अपने दोस्तों को खाने पर बुला लिया था और माँ पिकनिक पर नहीं जा पाई । माँ की पढाई के बारे में…मुझे ऐसा याद आ रहा है कि माँ किसी को बता रही थी कि दो मामाओं की पढाई के लिये माँ को कॉलेज बीच में ही छोड़ना पडा़ और उसकी शादी कर दी गई थी । अखबार पढना भी माँ को बहुत पसन्द है, दोपहर में सारे काम निपटाकर माँ अखबार पढती थी, लेकिन दीदी कॉलेज जाने लगी और मैं आठवीं में आ गया तो पिताजी ने हमारी अंग्रेजी सुधारने के लिये हिन्दी अखबार बन्द करके इंग्लिश अखबार लगवा दिया । माँ को टीवी देखना भी अच्छा लगता है, लेकिन रात को पिताजी घर आते ही अंग्रेजी कार्यक्रम और न्यूज लगा देते हैं और मैं दोपहर में कार्टून देखता हूँ, इन सब के बीच माँ को टीवी भी देखने को नहीं मिलता । माँ की सहेलियाँ… एकाध ही हैं महिला मंडल को छोड़कर… मतलब इतने सारे काम करते-करते माँ को सहेलियों के यहाँ जाने का समय ही नहीं मिलता… दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक, फ़िल्में जाती है, मैं शाम को क्रिकेट खेलने जाता हूँ..पिताजी के दोस्त भी हर रविवार को ताश खेलने आ जाते हैं, माँ उनके लिये चाय-नाश्ता बनाती रहती है । माँ को शाम को घूमने जाना अच्छा लगता है, लेकिन पिताजी तो हमेशा रात को देर से घर आते हैं, मैं खेलने में मगन, दीदी और भैया अपने-अपने दोस्तों में, ऐसे में माँ अकेले ही सब्जी खरीदने के बहाने घूमकर आती है, लेकिन उसे वहाँ से भी जल्दी लौटना पडता है, क्योंकि यदि उसे देर हो जाये तो हम “भूख लगी..भूख लगी” करके उसे परेशान कर देते हैं । माँ कभी-कभी क्यों जरा-जरा सी बात पर चिढ जाती है, अब मुझे समझने लगा है ।
मैडम ने निबन्ध लिखने के लिये दस दिन का समय दिया था, राहुल का निरीक्षण जारी था… माँ के कामकाज, उसकी दिनचर्या और दूसरों के साथ उसकी तुलना करते-करते राहुल की धीरे-धीरे अपनी माँ से “पहचान” हो गई थी.. माँ पर निबन्ध लगभग पूरा हो चला था… और अचानक निबन्ध समाप्त करते-करते उसकी कॉपी पर दो बूँद आँसू टपक पडे़ ।
(एक मराठी रचना का अनुवाद, आंशिक फ़ेरबदल व सम्पादन के साथ)

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>"माँ" पर निबन्ध : माँ से पहचान

>राहुल.. होमवर्क हो गया क्या ? चलो जल्दी करो.. स्कूल को देर हो रही है । हो गया मम्मी.. देखो स्कूल में मुझे “मेरी माँ” पर निबन्ध लिखकर ले जाना है, मैने लिखा है – “मेरी माँ मुझे जल्दी उठाती है, होमवर्क करवाती है, पढा़ती है, मुझे कहानियाँ सुनाती है, मुझे डॉक्टर के यहाँ ले जाती है…” चलो,चलो ठीक है, जल्दी से नाश्ता कर लो… बस आती ही होगी । माँ ने राहुल को मदद करके उसे स्कूल भेज दिया । लेकिन शाम को जब राहुल स्कूल से वापस आया तो गुमसुम सा था, निराश सा था । स्कूल में मैडम ने कहा कि जो तुम लोग लिखकर लाये हो, वह तो सभी बच्चों ने थोडे-बहुत फ़ेरबदल के साथ लिखा है, तुम लोगों ने निबन्ध में नया क्या लिखा ? माँ तुम्हारे लिये इतना कुछ करती है, इसलिये वह तुम्हें अच्छी लगती है, लेकिन अपनी माँ के बारे में तुम्हें क्या-क्या मालूम है, वह लिखो… तुम्हारी माँ को क्या पसन्द-नापसन्द है, उसके शौक क्या हैं, उसका जन्मदिन, उसकी मेहनत… इन सब के बारे में तुम्हारे पिताजी को, तुम्हारी दीदी और भैया को क्या लगता है, तुम लोग अपनी माँ के लिये क्या करते हो ? इन सब बातों को देखो, परखो और निरीक्षण करके नया निबन्ध लिखकर लाओ, चाहो तो अपने दीदी, भाई या पिताजी से मदद ले सकते हो… तुम लोग अब आठवीं के बच्चे हो, जरा अपना भी दिमाग लगाओ और फ़िर से निबन्ध लिख कर लाओ..
राहुल के निरीक्षण की शुरुआत हो गई…. माँ की पसन्द-नापसन्द… मैं तो सिर्फ़ आलू की सब्जी खाता हूँ, माँ तो सभी सब्जियाँ, चटनियाँ खाती है, हम सभी को ताजा परोसती है, और यदि किसी दिन कम पड़ जाये तो थोडा़ सा ही खाती है.. बचा हुआ खाना बेकार ना जाये इसलिये कई बार खामख्वाह एक रोटी ज्यादा भी खा लेती है । ताजा और गरम खाना हमें परोसती है, और सुबह का या कल का बासी खुद की थाली में लेती है…अरे.. मैने तो कभी माँ से नहीं कहा कि आज मुझे बासी खाना दे दो, ताजी रोटी तुम खा लो.. मैं ही क्यों, दीदी, भैया और पिताजी ने भी माँ से ऐसा नहीं कहा । मुझे टेबल टेनिस खेलना पसन्द है, इसलिये माँ ने मेरे बर्थ-डे पर बैट लाकर दिया । माँ के शौक क्या हैं ? … हाँ ठीक.. उसे पत्रिकायें पढना और हारमोनियम बजाना अच्छा लगता है, लेकिन बहुत सालों से हमारा हारमोनियम खराब हो गया है, माँ ने तो सभी से कहा था, लेकिन ना तो भैया, न पापा, किसी ने उस हारमोनियम को ठीक नहीं करवाया… थोडा़ सा समय मिलता है तो माँ कुछ पढने बैठ जाती है, लेकिन एकाध पुस्तक खरीदने की बात चलते ही पापा कहते हैं, पत्रिकायें बहुत महंगी हो गई हैं, इतने में तो दीदी की एक किताब आ जायेगी । अब.. रंग.. रंग.. रंग.. माँ को कौन सा रंग पसन्द है ? पता नहीं, क्योंकि माँ खुद के लिये बहुत ही कम साडियाँ खरीदती है, शादी-ब्याह में जो मिल जाती हैं उसी से काम चलाती है, हाँ, लेकिन बिस्तर की चादरें माँ ने हल्के नीले रंग की ली थीं… निबन्ध में नीला लिख लेता हूँ.. । माँ का जन्मदिन.. कब होता है.. मैडम ने कहा है कि कुछ भी माँ से नहीं पूछना है, दीदी ने बताया – ४ जनवरी… इस दिन हम लोग क्या करते हैं… छिः माँ का जन्मदिन तो हमने कभी ठीक से मनाया ही नहीं.. मेरे, दीदी और पापा के बर्थ-डे पर माँ लौकी का हलवा, गुलाब जामुन और पुरणपोली बनाती है । माँ को कौन सी मिठाई पसन्द है ? मालूम नहीं.. क्यों पापा, माँ को मीठे में क्या पसन्द है ? पापा… पापा… “अरे क्या चाहिये, मैं अखबार पढ रहा हूँ, दिखता नहीं क्या ? माँ से पूछो.. मुझे क्या मालूम !
पिछले हफ़्ते दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक गई थी.. माँ ने सुबह जल्दी उठकर उसके लिये आलू की सब्जी और पूडि़याँ बनाकर दी थीं, पापा ने जो पैसे दिये थे, उसके अलावा अपने पास से पचास रुपये भी दिये… माँ कब पिकनिक पर गई थी ? याद नहीं.. पिछले महीने माँ के महिला मंडल की पिकनिक थी, लेकिन पिताजी ने अपने दोस्तों को खाने पर बुला लिया था और माँ पिकनिक पर नहीं जा पाई । माँ की पढाई के बारे में…मुझे ऐसा याद आ रहा है कि माँ किसी को बता रही थी कि दो मामाओं की पढाई के लिये माँ को कॉलेज बीच में ही छोड़ना पडा़ और उसकी शादी कर दी गई थी । अखबार पढना भी माँ को बहुत पसन्द है, दोपहर में सारे काम निपटाकर माँ अखबार पढती थी, लेकिन दीदी कॉलेज जाने लगी और मैं आठवीं में आ गया तो पिताजी ने हमारी अंग्रेजी सुधारने के लिये हिन्दी अखबार बन्द करके इंग्लिश अखबार लगवा दिया । माँ को टीवी देखना भी अच्छा लगता है, लेकिन रात को पिताजी घर आते ही अंग्रेजी कार्यक्रम और न्यूज लगा देते हैं और मैं दोपहर में कार्टून देखता हूँ, इन सब के बीच माँ को टीवी भी देखने को नहीं मिलता । माँ की सहेलियाँ… एकाध ही हैं महिला मंडल को छोड़कर… मतलब इतने सारे काम करते-करते माँ को सहेलियों के यहाँ जाने का समय ही नहीं मिलता… दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक, फ़िल्में जाती है, मैं शाम को क्रिकेट खेलने जाता हूँ..पिताजी के दोस्त भी हर रविवार को ताश खेलने आ जाते हैं, माँ उनके लिये चाय-नाश्ता बनाती रहती है । माँ को शाम को घूमने जाना अच्छा लगता है, लेकिन पिताजी तो हमेशा रात को देर से घर आते हैं, मैं खेलने में मगन, दीदी और भैया अपने-अपने दोस्तों में, ऐसे में माँ अकेले ही सब्जी खरीदने के बहाने घूमकर आती है, लेकिन उसे वहाँ से भी जल्दी लौटना पडता है, क्योंकि यदि उसे देर हो जाये तो हम “भूख लगी..भूख लगी” करके उसे परेशान कर देते हैं । माँ कभी-कभी क्यों जरा-जरा सी बात पर चिढ जाती है, अब मुझे समझने लगा है ।
मैडम ने निबन्ध लिखने के लिये दस दिन का समय दिया था, राहुल का निरीक्षण जारी था… माँ के कामकाज, उसकी दिनचर्या और दूसरों के साथ उसकी तुलना करते-करते राहुल की धीरे-धीरे अपनी माँ से “पहचान” हो गई थी.. माँ पर निबन्ध लगभग पूरा हो चला था… और अचानक निबन्ध समाप्त करते-करते उसकी कॉपी पर दो बूँद आँसू टपक पडे़ ।
(एक मराठी रचना का अनुवाद, आंशिक फ़ेरबदल व सम्पादन के साथ)