>सर्वशक्तिमान ईश्वर की झूठी अवधारणा को ध्वस्त करने के लिए खगोलशास्त्र एवं खगोलीय घटनाओं का वैज्ञानिक विष्लेषण आज की महती आवश्यकता है

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सहस्त्राब्दि का सबसे लम्बा सूर्यग्रहण सम्पन्न हुआ । एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना के हम प्रत्यक्षदर्शी बने मगर इसके साथ ही साथ बड़े पैमाने पर तर्कविहीन, रूढ़ीवादी, अवैज्ञानिक अंधविश्वास जनित कार्यव्यापार के भी मूक दर्शक बने, जैसे कि हमेशा ही ऐसी घटनाओं के समय बनते आएँ हैं। जब भी कोई इस प्रकार की घटना घटित होती है हमें भारतीय समाज की दुर्दशा का मार्मिक नज़ारा देखने को मिलता है, जब अनपढ़ तो अनपढ़, समाज को आगे ले जाने के लिए जिम्मेदार पढे़-लिखे लोग भी अपनी तर्कशक्ति को ताक पर रखकर बुद्धिहीनों की तरह आचरण करने लगते हैं। हज़ारों-लाखों लोगों के इस प्रकार कठपुतलियों की तरह व्यवहार करते देख उनकी तुलना उन पशु-पक्षियों से करने को मन करता है जो सूर्यग्रहण के अंधकार से भ्रमित होकर अपने नीड़ों को लौटने लगते हैं, या जिस प्रकार गाय-बकरियाँ शाम होने के भ्रम में वापस घर लौटने लगतीं हैं। ज्ञान-विज्ञान के अभाव में उनका यह आचरण आश्चर्य पैदा नहीं करता लेकिन पढ़े लिखे मनुष्यों के पास प्रकृति से संबंधित अंधिकांश ज्ञान उपलब्ध होने के बावजूद ऐसा व्यवहार आश्चर्य के साथ-साथ दुखी भी करता है।
हम उन लोगों की बात कर रहे हैं जिन्होंने ज्ञान-विज्ञान से लैस होने के लिए अपना मूल्यवान समय तो ज़ाया किया है परन्तु उसका उपयोग करने का जज़्बा उनमें पैदा ही नहीं हो सका। ऐसे लाखों लोग हमेशा की तरह सूर्यग्रहण का तथाकथित सूतक शुरू होते ही सारी मानवीय गतिविधियों पर रोक लगाकर घर में दुबक कर बैठ गए। सूर्यग्रहण शुरू होते ही खाना-पीना प्रतिबंधित कर व्रत सा धारण कर लिया और कुछ लोग सभी खाने-पीने के पदार्थों में तुलसी पत्ता डालकर उन्हें किसी अज्ञात दुष्प्रभाव से बचाने की कवायद में लग गए। सूर्यग्रहण समाप्त होने पर तथाकथित मोक्ष की बेला में बीमार कर देने वाले बर्फीले ठंडे नदियों-तालाबों के पानी में उतरकर पवित्र होने के विचित्र भाव से आल्हादित होने लगे। मंदिरों में एकत्रित हो मूर्तियों के सामने नतमस्तक होकर संकट से उबारने के लिए की गुहार लगाने वाले सीधे-साधे अशिक्षित ग्रामीणों की बात अलग है, परन्तु यहीं सब करते हुए जब पढ़े-लिखे लोगों की जमात को देखना पड़ता है तो हमारे समाज के एक दुखद पहलू का सामना करते हुए बरबस आँखों में आँसू आ जाते हैं। पढ़े-लिखों का दयनीय चेहरा तब और सामने आने लगता है जब वे अपने इन तमाम अंधविश्वासी कृत्यों को उचित ठहराने के लिए इस अंधाचरण पर स्वरचित अवैज्ञानिक अवधारणाओं का मुलम्मा चढ़ाने का प्रयास करने लगते हैं।
दरअसल यह पूरी तरह से राज्य का विषय है। ज्ञान-विज्ञान की प्रगति के इस दौर में किसी भी राज्य की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपने नागरिकों को अज्ञान के अंधकार से बाहर निकाले। रूढ़ीवाद, अंधविश्वास एवं अंधतापूर्ण आचरण पर अंकुश लगाए, उन्हें वैज्ञानिक विचारधारा से लैस करे, लेकिन देखने में आता है कि इन सब मसलों पर राज्य की भूमिका एकदम निराशाजनक होती है। निराशाजनक शब्द शायद ठीक नहीं है…….राज्य की बागडोर अगर अंधविश्वासी, कूपमंडूक लोगों के हाथों में हो तो क्या उम्मीद की जा सकती है। राज्य के वर्ग चरित्र को देखकर यह कहा जा सकता है कि राज्य जनमानस के बीच अंधविश्वासों, रूढ़ीवाद, अवैज्ञानिक चिंतन को पालने-पोसने बढ़ावा देने में लगा हुआ है, तभी सूर्यग्रहण जैसी महत्वपूर्ण खगोलीय घटना के बारे में ज्ञानवर्धन की कवायद करने की बजाय किसी अज्ञात भय संकट के वातावरण का सृजन करते हुए स्कूल-कालेजों के बच्चों को छुट्टी दे दी जाती है।
हमारा मानना है कि खगोल विज्ञान वह महत्वपूर्ण विज्ञान है जिसका समुचित और सही-सही ज्ञान मानव समाज को सत्य की खोज की भटकन से मुक्त कर सही दिशा सही रास्ते की ओर उन्मुख करता है जो कि बेहद जरूरी है। विषेशकर इस स्थिति में जब आज भी पृथ्वी को शेषनाग के फन पर रखी होने की गप्प पर विश्वास करने वालों और सूर्यग्रहण को ईश्वरीय प्रकोप मानने वालों की हमारे देश में कोई कमी नहीं है। पृथ्वी, ब्रम्हांड, एवं मानव समाज की समस्त गतिविधियों को संचालित करने वाले सर्वशक्तिमान ईश्वर की झूठी अवधारणा को ध्वस्त करने के लिए खगोलशास्त्र एवं खगोलीय घटनाओं का वैज्ञानिक विष्लेषण आज की महती आवश्यकता है, वर्ना सूर्यग्रहण-चन्द्रगहण पर उपवास कर संकट से मुक्ति की कामना करने वाले पढ़े-लिखों की संख्या बढ़ती ही रहेगी और भारतीय समाज कभी भी अज्ञान के अंधकार से मुक्त नहीं हो पाएगा।

>पूर्वजन्म की यादों के बहाने अंधविश्वास की बकवास

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आजकल टी.वी पर एक धारावाहिक के ज़रिए देश के एक सदियों पुराने अंधविश्वास को भुनाकर पैसा कमाने की जुगत चल रही है। पूर्वजन्म की यादों को वापस लाने के निहायत अवैज्ञानिक, झूठे और आडंबरपूर्ण प्रदर्शन के ज़रिए लोगों में इस बचकाने अंधविश्वास को और गहरे तक पैठाने की कोशिश की जा रही है। यह कहना तो बेहद मूर्खतापूर्ण होगा कि आम जनता में गहराई तक मार करने वाले एक महत्वपूर्ण मीडिया पर ऐसे अवैज्ञानिक कार्यक्रमों को प्रसारित करने की अनुमति आखिर कैसे दे दी जाती है ! यह मामला नियम-कानून, और सांस्कृतिक-सामाजिक नीतियाँ बनाने वालों की मूढ़ता का भी नहीं है। दरअसल यह तो एक सोचे-समझे ब्रेनड्रेन कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसमें षड़यंत्रपूर्वक आम जन साधारण में वैचारिक अंधता पैदा करने, समझदारी और तर्कशक्ति को कुंद कर देने की जनविरोधी कार्यवाही अंजाम दी जाती है, ताकि लोगों का ध्यान देश की मूल समस्याओं की ओर से हटाया जा सके।

पूर्वजन्म और इसके मनगढन्त किस्सों पर इन दिनों पढ़े-लिखे, विज्ञान की शिक्षा हासिल किए, समझदार लोग भी ना केवल आँख मूँदकर विश्वास करते हैं, बल्कि इस रहस्यपूर्ण मामले को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने की बजाय मूर्खतापूर्ण तरीके से यह समझाने की कोशिश करने लगते हैं कि ‘‘आजकल विज्ञान भी इसे मानता है’’। इसी से पता चलता है कि विज्ञान के प्रति भी लोगों में किस कदर गलत और भ्रामक समझकारी का बोल-बाला है, जो कि हमारे समुचित सामाजिक-सांस्कृतिक विकास के रास्ते में बहुत बड़ा रोड़ा है।

जीव विज्ञान के अनुसार ‘याददाश्त’ एक गूढ सरंचना वाले पदार्थ ‘मस्तिष्क’ का एक विशेष गुण होता है जो कि मानव शरीर के खात्मे के साथ ही समाप्त हो जाता है। दुनिया भर में मृत्यु के बाद मृत शरीर को भिन्न-भिन्न तरीकों से नष्ट कर दिया जाता है, इसके साथ ही मस्तिष्क नाम के उस ‘पदार्थ’ का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जब याददाश्त को संचित रखने वाला मूल पदार्थ ही नष्ट हो जाता है (हिन्दुओं में दाह-संस्कार में वह राख में तब्दील हो जाता है) तो फिर याददाश्त के वापस लौटने का प्रश्न ही कहाँ उठता है, जो तथाकथित रूप से पुनर्जन्म बाद वापस उमड़ आए।

हमें पता है, लोग कहेंगे ‘आत्मा’ अमर है और एक मनुष्य के शरीर से मुक्त होने के बाद जब वह किसी दूसरे शरीर में प्रवेश करती है तो अपने साथ वह पुरानी याददाश्त भी ले आती है। जबकि इसके लिए तो उस ‘सूक्ष्म आत्मा’ के पास वह मस्तिष्क नाम का पदार्थ भी होना चाहिए जो कि पूर्ण रूप से ‘स्थूल’ है। फिर, पुराणों में यह बताया गया है कि चौरासी लाख योनियों के बाद प्राणी को मनुष्य का जन्म मिलता है । इसका अर्थ यह है कि पूर्वजन्म की याद करने वालों को चौरासी योनियों के पूर्व की बातें याद आना चाहिए, लेकिन देखा ये जाता है कि इस तरह की आडंबरपूर्ण गतिविधियों में लोग बीस-पच्चीस वर्ष पूर्व की ऊलजुलूल बातें सुनाकर भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाते हैं।

देखा जाए तो पुनर्जन्म से बड़ा झूठ दुनिया में कोई नहीं। इंसान या किसी भी जीवित प्राणी के जैविक रूप से मृत होने के बाद ऐसा कुछ शेष नहीं रह जाता जिसे आत्मा कहा जाता है। ब्रम्हांड में ऐसी किसी चीज़ का अस्तित्व नहीं है जिसका कोई रंग, रूप, गुण, लक्षण, ना हो। जिसकी कोई लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई, गहराई ना हो, जिसे नापा, तौला, ना जा सकता हो। जिसे जाँचा, परखा, देखा, सूँघा, चखा ना जा सकता हो। गीता के तथाकथित ज्ञान ‘आत्मा अमर है’ का विज्ञान के धरातल पर कोई औचित्य नहीं है ना ही उसके चोला बदलने की कहानी में कोई सत्यता है। एक और बात महत्वपूर्ण है कि इन सब बातों का वैश्विक धरातल पर भी कोई पुष्टीकरण नहीं है। दुनिया की कई सभ्यताओं, संस्कृतियों, परम्पराओं में इन भ्रामक मान्यताओं का कोई स्थान नहीं है । यदि यह एक सार्वभौमिक सत्य है, तो इसका जिक्र दुनिया भर में समान रूप से होना चाहिए था, और विज्ञान।
आज के समय में जबकि मौजूदा जटिल सामाजिक परिस्थितियों में लोगों के अन्दर तर्कशक्ति का विकास करने की सख्त जरूरत है उन्हें पूर्वजन्म, पुनर्जन्म जैसी बकवास, अतार्किक बातों में उलझाकर उनकी चेतना के वैज्ञानिक विकास को अवरुद्ध करने की कोशिश की जा रही है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हिमायती लोगों को ऐसे कुत्सित प्रयासों के खिलाफ समवेत आवाज़ उठाना चाहिए।