>"करवा चौथ" के सम्बन्ध में प्रचलित दंतकथाएं

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करवा चौथके सम्बन्ध में अनेकों कहानियाँ , दंतकथाएं ,मिथक आदि समाज में प्रचलित हैंक्षेत्रीय आधार पर हर स्थान पर अलगअलग कथा सुनने को मिल जाती हैउन्हीं में से कुछ को नीचे दिया जा रहा है : –

प्रथम कथा

बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी।
शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।
सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो।
इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।
वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है।
उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।
सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।
एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो’ ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।
इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है।
सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है।
अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

द्वितीय कथा

इस कथा का सार यह है कि शाकप्रस्थपुर वेदधर्मा ब्राह्मण की विवाहिता पुत्री वीरवती ने करवा चौथ का व्रत किया था। नियमानुसार उसे चंद्रोदय के बाद भोजन करना था, परंतु उससे भूख नहीं सही गई और वह व्याकुल हो उठी। उसके भाइयों से अपनी बहन की व्याकुलता देखी नहीं गई और उन्होंने पीपल की आड़ में आतिशबाजी का सुंदर प्रकाश फैलाकर चंद्रोदय दिखा दिया और वीरवती को भोजन करा दिया।
परिणाम यह हुआ कि उसका पति तत्काल अदृश्य हो गया। अधीर वीरवती ने बारह महीने तक प्रत्येक चतुर्थी को व्रत रखा और करवा चौथ के दिन उसकी तपस्या से उसका पति पुनः प्राप्त हो गया।

तृतीय कथा

एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गाँव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया। स्नान करते समय वहाँ एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा।
उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई और आकर मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया। मगर को बाँधकर यमराज के यहाँ पहुँची और यमराज से कहने लगी- हे भगवन! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। उस मगर को पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में ले जाओ।
यमराज बोले- अभी मगर की आयु शेष है, अतः मैं उसे नहीं मार सकता। इस पर करवा बोली, अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूँगी। सुनकर यमराज डर गए और उस पतिव्रता करवा के साथ आकर मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी। हे करवा माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।

एक अन्य कथा

एक बार पांडु पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी नामक पर्वत पर गए। इधर द्रोपदी बहुत परेशान थीं। उनकी कोई खबर न मिलने पर उन्होंने कृष्ण भगवान का ध्यान किया और अपनी चिंता व्यक्त की। कृष्ण भगवान ने कहा- बहना, इसी तरह का प्रश्न एक बार माता पार्वती ने शंकरजी से किया था। पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्‍य देकर फिर भोजन ग्रहण किया जाता है। सोने, चाँदी या मिट्टी के करवे का आपस में आदान-प्रदान किया जाता है, जो आपसी प्रेम-भाव को बढ़ाता है। पूजन करने के बाद महिलाएँ अपने सास-ससुर एवं बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेती हैं।

तब शंकरजी ने माता पार्वती को करवा चौथ का व्रत बतलाया। इस व्रत को करने से स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा हर आने वाले संकट से वैसे ही कर सकती हैं जैसे एक ब्राह्मण ने की थी। प्राचीनकाल में एक ब्राह्मण था। उसके चार लड़के एवं एक गुणवती लड़की थी।
एक बार लड़की मायके में थी, तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। कुछ खाया-पीया नहीं, पर उसके चारों भाई परेशान थे कि बहन को प्यास लगी होगी, भूख लगी होगी, पर बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी।
भाइयों से न रहा गया, उन्होंने शाम होते ही बहन को बनावटी चंद्रोदय दिखा दिया। एक भाई पीपल की पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर छलनी से रोशनी उत्पन्न कर दी। तभी दूसरे भाई ने नीचे से बहन को आवाज दी- देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहण करो। बहन ने भोजन ग्रहण किया।
भोजन ग्रहण करते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। अब वह दुःखी हो विलाप करने लगी, तभी वहाँ से रानी इंद्राणी निकल रही थीं। उनसे उसका दुःख न देखा गया। ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए और अपने दुःख का कारण पूछा, तब इंद्राणी ने बताया- तूने बिना चंद्र दर्शन किए करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया इसलिए यह कष्ट मिला।
अब तू वर्ष भर की चौथ का व्रत नियमपूर्वक करना तो तेरा पति जीवित हो जाएगा। उसने इंद्राणी के कहे अनुसार चौथ व्रत किया तो पुनः सौभाग्यवती हो गई। इसलिए प्रत्येक स्त्री को अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करना चाहिए। द्रोपदी ने यह व्रत किया और अर्जुन सकुशल मनोवांछित फल प्राप्त कर वापस लौट आए। तभी से हिन्दू महिलाएँ अपने अखंड सुहाग के लिए करवा चौथ व्रत करती हैं। (साभार : हिंदी विकिपीडिया )
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>भारतीय सिनेमा की लीक तोड़ते अनुराग

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दैनिक हिन्दुस्तान के सप्लीमेंट ‘रिमिक्स’ के अंदर छपे एक लेख ने मेरे मस्तिष्क को अच्छा खासा घुमाया। अब आप यह सोच रहे होंगे की ऐसा लेख क्या था? वह लेख था ‘अनुराग कैसे पहुंचे वेनिस’’ । इस शीर्षक से लेखक ने युवा निर्देशक अनुराग कश्यप की दो फिल्में ‘देव डी और ‘गुलाल ’ के वेनिस फिल्म महोत्सव में शामिल होने पर सवालिया निशान लगाया है। उनका मानना है कि मार्केटिंग की नीतियां अब रचनात्मकता पर भारी पड़ने लगी है। लेखक के इस कथन से मैं पूर्णतया सहमत हूँ कि आज सिनेमा जगत में भी मार्केटिंग काफी हद तक फिल्म की सफलता को प्रभावित करने लगा हैं। मगर यह कथन अनुराग कश्यप की फिल्मों के लिए सहीं नहीं कहा जा सकता हैं। अनुराग की फिल्मों के चर्चा का कारण सदैव उनका विषय रहा है। उन्होंने हमेशा ‘लीक’ से हटकर फिल्में बनाई है। और फिल्म की घिसीपिटी धारा के साथ प्रयोग किया है। मृणाल सेन ने ‘भुवन शोम’ के साथ भारतीय सिनेमा में जिस युग की शुरूआत की थी। इस युग की धारा को आगे ब़ाने में अनुराग कश्यप की फिल्मों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। राजकपूर, सत्यजीत रे, मृणाल सेन तथा गोविंद निहलानी जैसे निर्देशकों के सफलता के पीछे एक रहस्य था कि उन्होंने ज़मीन से जुड़ी फिल्में बनाई थी। उन्होंने एक आम आदमी के उस दर्द को सिनेमा के रंगीन पर्दे पर उतारा था। जिस दर्द को आम आदमी अपनी किस्मत का लिखा समझ कर चुपचाप सहता रहता था। उनकी फिल्मों के पात्र एक रिक्शा चालक से लेकर एक सर्कस का जोकर भी है। मगर अब हमारा समाज बदल चुका है। आज के युवाओं को अपने पिता का कर्ज़ चुकाने की ज़रूरत नहीं हैं। आज साहूकार हमारे समाज को लूट नहीं रहे हैं। आज हमारे देश को आतंकवाद जैसी बीमारी से बचाने की ज़रूरत है। आज का युवा दौलत, शोहरत और रूतबे की किसी भी काम को कर गुजरने की चाहत रखता है। उसके सोचने समझने की शक्ति पर इन तीन चीज़ों का असर पूर्णरूप से परिलक्षित हो रहा है। आज युवाओं के पश्चिमी सभ्यता के प्रति झुकाव ने उन्हें अपनी संस्कृति और सभ्यता से दूर ही नहीं किया हैं, बल्कि एक इनके बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है जिसे तोड़ना आज किसी के बस में नहीं है।
यह बात दीगर है कि सिनेमा समाज का दर्पण होता है। इसी तर्ज़ पर अनुराग कश्यप की फिल्में आज के इस बदलते समाज और युवाओं का चित्रण करती नज़र आती है। अनुराग ने अभी तक 7 फिल्मों का निर्देशन किया है। इन सभी फिल्मों में अनुराग ने आज के युवा और समाज की उस बदलती हुई तस्वीर को दिखाया। जिसे हम देखते तो रोज है मगर स्वीकार करने से हिचकते है। क्योंकि सच कड़वा होता है और कड़वी चीज़े आसानी से नहीं निगली जा सकती है। ॔देव डी’ की ॔पारो’ अब देव के लिए अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं करती है बल्कि वो अपने पति के साथ खुशी से रहती हैं। ये सिर्फ फिल्म की रंगीन दुनिया में ही नहीं बल्कि हमारे आसपास ही घटित होता हुआ दिखाई देता है। ॔गुलाल’ आज के युवाओं की राजनीति और राजनीति में तालमेल बिठाती हुई यह फिल्म हमारी राजनीति के उस परत को उधेड़ कर सामने लाती है। जो देखने में बहुत ही घटिया है मगर हक़ीकत है। और हक़ीकत भी ऐसी जिसे कबूलना हमारे इस सभ्य समाज के बस में नहीं है। क्योंकि यह सभ्य समाज बाहर से देखने पर जितना रंगीन और रौशनी से भरा है। उतना ही अंदर से खोखला है। अनुराग के कास्टिंग में बड़े सितारे नहीं होते है, उनके पास होता है सिर्फ एक अच्छा विषय और संगीत। इन्हीं के दम पर आज अनुराग बॉलीवुड़ में अपनी एक अलग पहचान कायम कर पाये हैं। आज सिनेमा के तरफ रूझान रखने वाले हर युवा का रॉल मॉडल राजकपूर, सत्यजीत रे, मृणाल सेन, बुद्वदेव दास गुप्ता के साथ अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज भी शामिल हैं। लेखक का मानना है कि अगर ॔ब्लैक फ्राइडे’ को हटा दिया जाए तो अनुराग की कोई भी फिल्म सत्यजीत रे, राजकपूर, मृणाल सेन, गोविंद निहालानी के फिल्मों के समकक्ष नहीं है। मेरा माना है कि अगर किसी निर्देशक की अच्छी और सफल फिल्मों को उसके कैरियर से हटा दिया जाता है तो वह भी एक असफल निर्देशक बन जाता हैं। अत : इस तरह की बाते अब नहीं की जानी चाहिए। क्योंकि अब हम इक्कीसवीं सदी में है और यहाँ कुछ भी हटाया नहीं जाता है बल्कि केवल जोड़ा जाता है। वो चाहे फिल्मों की संख्या हो नोटों की गड्डी। लिहाजा अनुराग कश्यप की फिल्में ‘वेनिस’ तो क्या विश्व के किसी भी फिल्म समारोह में हिस्सा ले सकती है।

>आधी आबादी का कड़वा सच

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एक जमाना हुआ करता था जब शिक्षा केवल लड़कों के लिए थी । विद्यालय जाना तो दूर घर की दहलीज के भीतर ही घुट-घुट कर जीना ही लड़कियों की नियति बन कर रह गई थी । घर पर रहकर गृहस्थी के तौर-तरीके सीखना ही उनकी शिक्षा थी । कुछ आधुनिक मानसिकता वाले परिवारों में लड़कियां पढ़ भी ले तो बस अक्षरों की पहचान के लिए ताकि चिट्ठी -पत्री का कम चल सके । आजादी के बाद आधुनिकता ने पाँव जमाये और रुढियों का चलन कम होता गया । कालांतर में शिक्षा को अनिवार्य समझ कर शैक्षिक विकास और उसमें स्त्रियों की भागीदारी के अनेक आयाम विकसित होने लगे । प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में आशातीत सफलता मिलने के साथ ही उच्च शिक्षा के द्वार भी आधी आबादी के लिए खुलते गए । शहरों की तुलना में कमोबेश शिक्षा का अलख गाँव में भी जागने लगा । शादी-विवाह की चिंता से सही पर ग्रामीण अभिवावक भी लड़कियों को पढने स्कुल भेजने लगे ताकि सुयोग्य वर मिलने में कोई कठिनाई न हो । पर इतना कुछ होने पर भी बहुतायत लड़कियों को पढ़ी-लिखी होने के बावजूद चूल्हा-चौका करने पर विवश होना पड़ता था । समाज में वो आत्मनिर्भर नही थी । असल में स्त्री की आर्थिक मजबूती पति के पौरुष की तौहीन समझी जाती थी । बीबी की कमाई खाने वाले पति को बड़ी हिकारत की निगाह से देखा जाता था । इसी मानसिकता के कारण कितनी ही योग्य और क्षमतावान महिलाएं घर की शोभा बढ़ने की वस्तु बन कर रह गई !

समय ने फ़िर करवट बदली , भूमंडलीकरण का दौर आया , समाज की अनेक वर्जनाएं टूटी । आधी आबादी का सच भी बदला । महिलाएं रसोई की दुनियाँ से निकल कर विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश करने लगी । मर्दों को हर उस क्षेत्र में टक्कर मिलने लगी है जो कभी परंपरागत रूप से उनके एकाधिकार में थे । आज महिलाएं तकनीकी , चिकित्सा ,मीडिया, सेना , विमानन, कॉल सेंटर , कारपोरेट आदि -आदि यत्र तत्र सर्वत्र विराजमान हैं । अपने निर्णय ख़ुद लेने लगी हैं जो उनकी सामाजिक स्थिति में अपेक्षित सुधर को इंगित करता है । आज सामाजिक आर्थिक और राजनीतिकरूप से नारी सशक्त हुई है । वैश्वीकरण के दौर महिलाओं ने आत्मनिर्भरता का पाठ तो सीखा पर अपनी नैतिक जिम्मेदारियों , मूल्यों व सरोकारों को भूल सी गई । बदलाव जरुरी ही नहीं अवश्यम्भावी होता है । लेकिन आँखें मूंद कर उनको स्वीकार कर लेना कौन सी बुद्धिमत्ता है ? नई चीजों को अपनाते समय हमेशा पुराने का ख्याल रखना चाहिए । नए -पुराने के मिलने से ठोस नतीजा सामने आता है दुष्परिणाम तो कदापि नहीं ।

सवाल यह उठता है कि यह किसकी संतान है ,उस माँ की जिसने गुडियों से खेलना सिखाया , नीरस संसार में पहचान बना आगे बढाया या फ़िर उस माँ की जिसने इस नवयुग संसार में कल्पनाएँ दी पंख फैला कर उड़ने की तो फ़िर क्यों भटक गई अपने दायित्व से !आधुनिक नारी ने अपने आप को अधिकार सम्पन्नं तो बना लिया है पर क्या अपने कर्तव्यों के प्रति भी वो उतनी सजग है ? सजगता का तात्पर्य यह है कि अपने आतंरिक और बाह्य जगत की सुन्दरता के साथ अपने पवित्र और पूज्य रूप का भी ख्याल भी जरुरी है ।

>पतंग और मन की डोर

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मानव मन की गहराइयों को थाह लेना सरल नहीं होता । नानाप्रकार की अभिलाषाओं से भरा मन जब अत्यन्त प्रफुल्लित होता है तब आदमी विविध कार्यकलापों से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करता है , अपनी उत्कंठाओं की प्यास बुझाता है । ऐसा हीं एक उद्यम है -पतंगबाजी । भारतवर्ष में पतंगबाजी का शौक लोगों में किस कदर छाया है , इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि विभिन्न प्रान्तों में अलग-अलग अवसरों पर पतंगबाजी का आयोजन एक प्रतिस्पर्धा के रूप में किया जाता है । इनमें से कई प्रतियोगिताएं तो विश्व स्तरपर ख्यातिप्राप्त हैं ।

जनवरी -फ़रवरी, अप्रैल -मई , जुलाई-अगस्त ये कुछ ऐसे महीने हैं जब त्योहारों की आड़ में देश का कोई न कोई हिस्सा पतंगबाजी में डूबा होता है । बरसात के इस मौसम में राजधानी दिल्ली के बाज़ार रंग-बिरंगे पतंगों से पटा पडा है । शाम होते हीं हर उम्र के लोग बच्चों से लेकर बूढे तक अपनी -अपनी छतों पर पतंगों से कलाबाजी करते नज़र आते हैं । नीला आसमान पतंगों से यूँ ढका होता है मानो बरसात से बचने के लिए हर किसी ने छतरी लगा रखी हो । दिल्ली जैसे व्यस्त शहर में लोगों को कुछ समय अपने आनंद के लिए बिताते देखना काफ़ी सुखद अहसास देता है । लाख उपभोक्तावाद आए अथवा भूमंडलीकरण हो जाए या पश्छिमी संस्कृति का बोलबाला हो हमारी जीवन शैली बिल्कुल ख़त्म नहीं होने वाली है । हम परिवर्तन से डरने वालों में से नहीं हैं बल्कि उसे स्वीकारने में विश्वास करते हैं । यहाँ कि विविधतापूर्ण संस्कृति की छाप पतंगों पर भी उकेरी होती है । एकरंगीय और बहुरंगीय कागजों से पतंग कई आकृतियों में बनाया जाता है । मसलन , चौकोर , मानवाकृति , पशु-पक्षी , चाँद -तारे , दैवीय चिन्हों आदि । लोगों के कौतुक क्रीडा के लिए प्रयुक्त होने वाला पतंग महज मस्ती का साधन नहीं रह गया है । आज पतंग एक समृद्ध कुटीर उद्योग के रूप में हजारों को रोजगार दे रहा है । बरेली , रूहेलखंड जैसे क्षेत्र पतंग और मांझे (डोर) बनाने के लिए देश भर में प्रख्यात है ।

>सपनों का भरपूर लुत्फ़ उठाइए

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काली स्याह अंधेरे में रात को मन के चित्रपटल पर चलने वाली विडियो यूँ हीं अनायास नहीं चलती । उसके गहरे अर्थ होते हैं । हर सपना अपने भीतर कुछ न कुछ छुपाये रहता है । बहुत कम लोग अपने सपनो में छुपे संकेतों और रहस्यों को समझ पाते हैं । स्वप्न महज दिमाग की रील पर छपा दिन भर का अवशेष नही होता । सपने में मृत्यु के संकेत मिलते हैं । सपने में आने वाली मुसीबतों का पता भी चलता है । सपने में जीवन साथी के संकेत भी मिलते हैं। जवां दिलों को तो आंखों में ख्वाब पलना बड़ा अच्छा लगता है । कुछ लोग जागते हुए भी सपना देखते हैं । रात हो या दिन बिस्तर पर तकिये को पकड़े अपने प्रियतम से मिलने के सपने देखना कितना प्यारा होता है ! जीवन की जटिल से जटिल समस्या का समाधान भी कभी -कभी सपने में मिल जाता है । सपने में कई चौकाने वाली खोजें और आविष्कार हुए हैं । यहाँ तक कि लोगों के भाग्य बदल गए हैं । हमें भी कई बार सपने में कोई संकेत मिलता है पर अक्सर हम समझ नही पाते हैं । तो आज से हीं अपने सपनो पर ध्यान रखिये , उनका भरपूर मज़ा लीजिये और अगर कुछ खास संकेत मिले तो अपना दिमाग खर्च कीजिये ।

>सपनों का भारत

>हमारे देश के अनेक सूत्र वाक्यों में से एक है – ‘चरैवैती-चरैवैती’ अर्थात बढ़ते चलो … बढ़ते चलो ॥ पिछले कुछ सालों में रुकावटें कमोबेश उतनी ही थी जितनी आज है लेकिन हम बढ़ते रहे रुकावटों का रूप बदलता जा रहा है और बदले रूप से बदला लेने का कोई इंतज़ाम नहीं ; ये ही फिक्र आज सभी को है फिर भी भरोसा है कि भविष्य हमारा है
सपने ए पी जे अब्दुल कलाम साहब ने भी देखे और जिद थी तो साकार भी किये उनका आभार कि उनसा स्वप्नदर्शी न होता तो हम घिसट रहे होते सपने देखना कायदे में तो उन्होंने ही सिखाया वरना नेहरू के स्वप्न नौकरशाहों ने कालांतर में छिन्न भिन्न कर दिए देश की औद्योगिक सम्पन्नता निस्संदेह कुछ और होती अगर हमारी बागड़ ही खेत न उजाड़ रही होती
आज पहली ज़रुरत सत्ताधीशों के शोधन की है इस शुद्धिकरण के हुए बगैर हमारे स्वप्न दुःस्वप्न से बेहतर नहीं हो सकते दलगत दलदल में बटे लोग देश के बटवारे से परे कुछ सोचते हुए नहीं दीखते उनके चश्में निजी भविष्य पर फोकस किये हुए हैं स्वार्थ-सिद्धि से फारिग हों तो देश दीखे ! और स्वार्थ-सिद्धि से भला कोई फारिग हो सका है आज तक ?
दूसरी जरूरत देश से भाग्यवादियों और कर्मकाण्डियों को प्रतिबंधित कर देने की है रत्न / कुण्डली / राशि / रेखाशास्त्री / अंकशास्त्री सभी वे केंकड़े हैं जो हमारी कर्मशील संभावना की टांग खींच कर पंगु बना रहे हैं देश आध्यात्म की ऊंचाइयां फिर से छू ले लेकिन पहले आडम्बर तो छूटे भांति भांति के विविध नाम और रूप वाले चैनल आडम्बर परोस कर आनंदित हैं क्योंकि उन्हें देशवासियों की मूर्खता पर भरोसा है और इसी से उनकी रोटी – रोजी चलती है
देश के बारे में सभी के सपने कमोबेश यकसां होंगे यही कि देश की विद्वता विश्व में पूजी जाए, समादृत हो हमारी वैज्ञानिक उपलब्धियां विश्व में सराही जाएँ ( बहुत भरोसा है हमे अपनी प्रतिभा पर ! क्षमता है , भरोसा है तो सफलता भी निश्चित है ! ) स्वप्न है कि यह देश आर्थिक क्रान्ति का अग्रदूत बने ; जहां व्यवस्थित तंत्र हो, भ्रष्टतंत्र को कोई स्थान न हो हर कोई अपने वतन के प्रति निष्ठा संपन्न हो वहीं दूसरी ओर, धर्म हमारा मार्ग प्रशस्त करे न कि हमें परास्त कर दे धर्म के प्रति किसी को कोई न तो आग्रह हो और न ही दुराव ही
अंत में, देश के प्रति हमारा स्वाभिमान हमारी सर्वोत्कृष्ट संपत्ति बन जाए इससे बड़ा स्वप्न और क्या ?

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RDS