>पैसों की पेड़ राजनीति

>

“कुछ था तो खुदा था कुछ होता तो खुदा होता, मुझको डुबोया मेरे होने ने मैं hota तो क्या होता ! “अभी झारखण्ड की राजनीति गरमा गई है .चुनाव कुछ हो चुके कुछ होने हैं पर जैसे जैसे यह दिन नजदीक रहा था . वैसे लोग एक दुसरे का छेछा लेदर करने मैं जुट गए थे .और कई बातो का खुलासा भी हुआ इसी बीच पता चला की झारखण्ड के पूर्व मुखमंत्री मधु कोड़ा साहब ने चार हजार करोड रुपीयों का घोटाला किया है .यह पहले नहीं जो कृतिमान गढ़ा है फेरहिस्त तो लम्बी है पर इसका उदभेदन चुनाव के करण हुआ .पर इसकी आज क्या जरुरत थी कुएँ सरकार नीद से जग गए .नींद मैं खलल किसने डाला ?पर यह बात तो कुछ और ही है .वह अपने आप को चुनाव मैं पाक साख दिखाना चाहते हैं.पर उन नेताओं पर असर ही नहीं पड़ता लगता है ये अपने लाज शर्म बाजार मे बेच मूंगफली खा गये हैं ,सब कुछ पता चलने के बावजूद ये जनता से मुखातिब होने पर कहते हैं की कुछ लोग उनकी लोकप्रियता से घबरा गए हैं और उन्हें बदनाम करने की कोशिस कर रहें हैं और उन्हें दलित होने के करण निसाना बनाया जा रहा है .पर इस भारतवर्ष मैं एक चौथाई जनता दलित और गरीब है पर निशाने पर आपही क्यूँ ?”बिना आग के धुऐं नहीं उठतेपर सोचने से माथे पर बल पड़ जाता है की कितनीं जल्दी ये अपना वक्तित्व बदल लेते हैं साप को भी कुछ समय लगता है अपना केचुल उतारने मे, ये उससे भी आगे है . पर बात जो भी हो लेकिन ये आएने की तरह साफ़ हैं की अगर रातों रात आमिर बनना है अगर आप धन कमाने पर आमादा हैं तो राजनीति के कुरुक्षेत्र मैं कूद पड़ो .इस कुरुक्षेत्र में जितने लोग हैं वो अपने आप को गणेश समझतें हैं उशे कोई बाधा छु नहीं सकती ,वह ख़ुद को विघ्न विनासक मानता है .और यह सस्वत सच भी है .जिसका प्रत्यक्ष हैं घोटालों की फाईलें जो कही कोने में पड़ी धुल खा रही हैं .यही वजह है की दिहाड़ी पर कम करने वाला आदमी इतनी हिम्मत करता है उसे सहस यही से मिलता है .खैर गलती इनकी नहीं झारखण्ड की बदकिस्मती है की पिछले नव दस सालों में कोई कुसल साशक नहीं मिला ,जो इन खनिजों से भरे राज्य का बोझ उठा कर कुछ कदम भी चल सके .जिसने देखा उसी के मुह में पानी गया .सबों का ईमान डोल गया .सब नें भर पेट लुटा आम आदमी के भरोसे और विश्वास का दिनों रात बलात्कार किया गया .इन सब को देख नेताओं से नफरत होने लगती है .वह माँ भी अपने कोख को कितना कोस रही होगी की मैंने ऐसी बेटे को जन्म दिया .यूं तो एक स्त्री के लिए बाँझ होना एक गली है ,पर ऐसे बच्चे होने से अच्छा है की कलंक की कालिख पोते गर्व से वो घूमे .जब इन सब का भंडाफोड़ होता है तो अंगुलियाँ कांग्रेस की तरफ़ भी उठती है .क्यूंकि उनकी सरकार इनकी सह पे ही चल रही थी ,तो क्या समझा जाए जो हुआ वो मिलीभगत थी या ये है .चुनाव के समय यह सब करना और अब लिब्रहान रिपोर्टे का लिक होना यह बताता है की उन्होंने पहले से ही सारे चल सोच रक्खी थी विपक्ष की मात के लिए ,यह सभी जानते है कि झारखण्ड भाजपा का अच्छा गढ़ रहा हैं तो शायद इसी किले में सेंध के लिए यह सब किया जा रहा है .इन को सोचना तो चाहिएअगर पतीला का ढक्कन खुला हो तो कमसे कम कुत्ते को तो शर्म आनी चाहिए

>भारत आर्थिक उपलब्धियों को लेकर उच्च विश्व रैंकिंग

>

जब भारत आर्थिक उपलब्धियों को लेकर उच्च विश्व रैंकिंग प्राप्त करने के लिए तैयार खड़ा है, घोर गरीबी हटाना एवं करोड़ों नागरिकों को जीवन-यापन का समुचित स्तर प्रदान करना उसकी सबसे बड़ी चुनौतियाँ बन रही हैं। निस्संदेह इस सत्य की पहचान करते हुए तथा उसे स्वीकार करते हुए इस तथ्य की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि हाल ही के दशकों में बड़ी संख्या में लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने में सफलता मिली है। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता का केवल एक निराशाजनक चित्र प्रस्तुत करना उचित नहीं है। वास्तव में, आर्थिक सुधार से कतिपय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक तीव्र गति से वृध्दि के कारण भारत समृध्दि के पथ पर अग्रसर है।

साथ-ही-साथ हमें वर्तमान भारतीय वस्तुस्थिति के नकारात्मक पक्ष की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हमारी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी गरीबी का शिकार है। समान रूप से अमीर और गरीब के बीच, शहरों तथा गाँवों के बीच तेजी से बढ़ती खाई भी चिंताजनक है। इसके कारण गाँवों को छोड़कर लोग शहरों की ओर भाग रहे हैं, जो प्रक्रिया वर्ष 1990 के दशक में आर्थिक सुधारों के बाद अधिक तीव्र हुई है। विकास की प्रक्रिया में क्षेत्रीय विषमताओं से समस्या और अधिक दुरूह हो गई है, जहाँ उत्तरी और पूर्वी राज्य दक्षिण और पश्चिम के राज्यों से काफी पीछे रह गए हैं।

मानव संसाधन भारत की बहुमूल्य संपदा है। तथापि मानव संसाधन तभी उपयोगी हो सकता है, जब रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार तथा उत्तम प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश जैसी बुनियादी जरूरतें सबके लिए पूरी हों। यदि देश में मानव संसाधन का बहुत बड़ा भाग गरीब है तो कोई भी देश समृध्द नहीं हो सकता। मुझे हमेशा इस बात पर आश्चर्य होता है, यदि भारत अपनी एक-तिहाई भली प्रकार से रह रही आबादी के बल पर इतनी उपलब्धि हासिल कर सकता है तो जब सभी मानव संसाधनों का पूरी तरह से उपयोग होगा, तब यह देश कहाँ पहुँच जाएगा? कितनी ऊँचाइयों को छू लेगा?

>ये आम लोगों की आम जिन्दगी का आम बजट है गुरु

>

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बजट भाषण से देश का कारोबारी जगत उदास है। इसकी झलक शेयर बाजारों में भी देखने को मिली। सोमवार को शेयर बाजार में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, आयकर की छूट सीमा में 10 हजार की वृद्धि करने को कई लोग अच्छा मान रहे हैं।
वित्त मंत्री ने सोमवार को लोकसभा में वर्ष 2009-10 का आम बजट पेश करते हुए आयकर छूट की सीमा बढ़ाने और कल्याणकारी व आधारभूत योजनाओं के लिए आवंटन में वृद्धि करने का प्रस्ताव किया है। अपने बजट भाषण में उन्होंने कहा कि चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाना बेहद जरूरी है। अतः इस व्यवस्था में सुधार लाने के उद्देश्य से चुनावी चंदे में पूरी तरह छूट का प्रस्ताव किया गया है।
कई लोगों का मानना है कि वित्त मंत्री टॉफी पकड़ाने का काम कर रहे हैं। ग्रामीण भारत में सड़कों के निर्माण के लिए वित्त मंत्री प्रणब ने वर्ष 2009-10 के बजट में 12 हजार करोड़ रुपये का प्रस्ताव किया है। इनमें 1,067 करोड़ रुपये केवल उत्तर-पूर्व राज्यों और सिक्किम के लिए रखे गए हैं।
ग्रामीण सड़कों का निर्माण कार्य के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वर्ष 2009 तक एक लाख 46 हजार 185 कि.मी. सड़कें बनाए जाने का प्रस्ताव है, जिससे देश के 59 हजार 564 गांवों को लाभ पहुंचेगा। वित्त मंत्री ने देश में गरीबी आधी करने और प्रत्येक वर्ष 1.2 करोड़ लोगों को रोजगार मुहैया कराने का वादा भी किया है। हालांकि, जानकार कहते हैं कि ये वादे हैं वादों का क्या?
अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने राष्ट्रीय नदी और झील संरक्षण योजना के लिए 562 करोड़ रुपए का प्रस्ताव किया है। गौरतलब है कि सरकार पहले ही राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन कर चुकी है। वर्ष 2008-09 में राष्ट्रीय नदी और झील संरक्षण के लिए 335 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। पर अब तक कुछ हाथ नहीं आया है।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने बजट में कृषि ऋण माफी और ऋण राहत योजना की भी बात की। यह योजना 2008 में शुरू की गई थी। इसके तहत 400 लाख किसानों को शामिल करते हुए लगभग 71,000 करोड़ रुपये की एक मुश्त बैंक ऋण माफी की गई थी।
लोकसभा में वर्ष 2009-10 का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम संबंधी कार्य शुरू किया गया है। यह सुनिश्चित करेगा कि ग्रामीण या शहरी क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाला प्रत्येक परिवार 3 रुपये प्रति किलो की दर से प्रति माह 25 किलो चावल या गेहूं के लिए कानूनी रूप से हकदार होगा।