>राष्ट्रपति के बेटे राजेंद्र शेखावत को टिकट देने का विरोध दर्ज कराएँ यहाँ

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राजशेखर रेड्डी का अंतिम संस्कार होने के पहले ही दिवंगत मुख्यमंत्री के बेटे जगनमोहन रेड्डी को सत्ता की कुर्सी पर बैठाने के लिए कांग्रेस की आकुलता को बीते अभी कुछ दिन हीं बीता कि आगामी विधानसभा चुनावों में  राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बेटे राजेंद्र शेखावत को टिकट मिलने की खबर मिली है . कांग्रेस में परिवारवाद / वंशवाद का यह वाइरस नया नहीं हैं . हाँ , जब भी कुछ नज़रों से होकर गुजरता है तो हमें इसकी याद आ जाती है और खीज में भर कर कीबोर्ड पर उंगलियाँ दौड़ाने लगते हैं  . मालूम है , अब यह रोग लगभग लाइलाज होने के कगार पर खड़ा है .लोकतंत्र की प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है . भारत में वंशवाद के विषबेलों की संख्या दिनों – दिन चौगुनी रफ़्तार में बढ़ रही है .
आइये एक नज़र डालें उन जहरीली झाड़ियों पर जिनका सम्बन्ध लोकतांत्रिक भारत के चुनिंदा ‘राजघरानों’ से हैं .  सोनिया गाँधी , राहुल गाँधी ,डॉ फारुक अब्दुल्ला ,उमर अब्दुल्ला ,दयानिधि मारन { तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के भांजे और कई बार मंत्री रह चुके स्वर्गीय मुरासोली मारन के बेटे हैं },एम के अड़ागिरी {करुणानिधि के सबसे बड़े बेटे },कनीमोड़ी {करुणानिधि की बेटी},जी के वासन {कांग्रेस के  नेता स्वर्गीय जी के मूपनार के बेटे},कुमारी शैलजा [ इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री चौधरी दलबीर सिंह की बेटी },मुकुल वासनिक {कांग्रेस के पूर्व सांसद बालकृष्ण वासनिक के बेटे},लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार{ स्वर्गीय जगजीवन राम की बेटी } ,सलमान खुर्शीद { कांग्रेसी नेता खुर्शीद आलम खां के बेटे और पूर्व राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन के नाती },पृथ्वीराज चव्हाण { माँ बाप दोनों कांग्रेसी सांसद रह चुके हैं },सिंधिया राजघराने के चिराग ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांग्रेस के दिग्गज नेता जितेंद्र प्रसाद के बेटे जितिन प्रसाद,  राजेश पायलट के बेटे और फारुख अब्दुल्ला के दामाद सचिन पायलट,  पीए संगमा की बेटी अगाथा संगमा, कांग्रेस नेता ललित माकन के भतीजे अजय माकन, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी के बेटे भरतसिंह सोलंकी, गुजरात के एक और पूर्व मुख्यमंत्री अमरसिंह चौधरी के बेटे तुषार चौधरी, मध्य प्रदेश के कांग्रेसी नेता पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव के बेटे अरुण यादव, पूर्व मंत्री सीपीएन सिंह के बेटे आरपीएन सिंह, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री वसंतदादा पाटिल के पोते और पूर्व सांसद प्रकाश पाटिल के बेटे प्रतीक पाटिल, मेनका गाँधी के पुत्र वरुण गाँधी  ,जसवंतसिंह के पुत्र मानवेन्द्रसिंह ,पटियाला की महारानी और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी प्रनीत कौर  आदि -आदि . अब ज्यादा नाम लिया तो आप चक्कर में आ सकते हैं . पोस्ट उबाऊ न हो इसका भी तो ख्याल रखना होता हैं न साहब !
                                                  लोकतान्त्रिक भारत के राजवंशी नेताओं के इतने सारे नाम एक साथ पढ़ कर कैसा लग रहा है आपको ? कोई बेचैनी हो रही है ? क्या वर्तमान राष्ट्रपति जी के बेटे को विधानसभा के टिकट मिलने पर आपको गुस्सा / जलन / कुंठा / घुटन  सा महसूस नहीं होता ? क्या भारत की गणतंत्रता के ६० साल पूरे होने से पहले हीं फ़िर से राजतंत्र की ओर बढ़ते कदम से खौफ नहीं होता ? अगर लगता है कि वंशवाद के इन बेलों की जड़ों को जमीन में ज्यादा गहरे तक जाने से पहले रोका जाना चाहिए तो क्यों न ब्लॉगजगत के सजग प्रहरी आप और हम आगामी किसी भी चुनाव में ऐसे किसी भी नेता की उम्मीदवारी का विरोध करें . और फिलहाल हमारे निशाने पर प्रतिभा ताई के सुपुत्र ” राजेन्द्र शेखावत “ ,पूनम महाजन , और जिनको भी अनुकम्पा के सहारे टिकट मिलता है  ब्लॉगजगत  को अब अपने ताकत का अहसास अपने जोरदार विरोध से करना होगा . लोकसभा चुनाव बीत गया तो क्या जब जगे तभी सवेरा ………………….. 

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>बी. जे. पी.-चिंतन से चिंता तक……

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जी हाँ ,आख़िर बी जे पी में वह तूफ़ान आ ही गया जो लोकसभा चुनावों ऐ हार के बाद आना था!लेकिन उस समय पार्टी सदमे में थी सो सभी नेता अपना अपना चेहरा छुपाने में जुट गए!किसी ने हार के कारणों पर मनन या चिंतन करना उचित नहीं समझा!सब एक दूसरे पर दोषारोपण में व्यस्त हो गए!और देखिये एक बड़ी राष्ट्रीय ..पार्टी की क्या हालत हो गई!लेकिन बड़े नेताओं ने फ़िर भी कोई सबक नहीं लिया!सबसे पहले तो आडवानी जी जिन्हें पूरी तरह से नकार दिया गया,इस्तीफा देते!फ़िर नई टीम बने जाती जो युवा हो ,उर्जावान हो और सबसे बड़ी बात जिन पर जनता भरोसा कर सके!क्योंकि पुराने नेता तो अपना भरोसा खो ही चुकें है!जनता ने पार्टी को नहीं इसके आपस में लड़ते नेताओं को नकारा है,जो देश को ..स्थिर सरकार का विशवास नहीं दिला पाए…!ये नेताओं की असफलता थी,नेताओं की नहीं…!लेकिन देखिये हुआ क्या…….!जिन्ना मुद्दे पर .आडवानी जी इस्तीफा नहीं देते,लेकिन जसवंत सिंह से इस्तीफा माँगा जाता है..!हार पर आडवानी जी इस्तीफा नहीं देते ,लेकिन वसुंधरा से इस्तीफा माँगा जाता है..!कांग्रेस पर आरोप लगाने वाली पार्टी ख़ुद इतनी कमजोर हो गई की क्या कहें..!देश को कुशल .सरकार देने का .वादा करने वाली पार्टी ख़ुद कुशल सेनापति नहीं दे पाई…!सारे के सारे नेता जनता के प्रति अपने कर्तव्य को भूल आपस में लड़ते रहे!और अब जब चिंतन का समय आया तो चिंता में डूब गए….!जिन लोगों ने बी जे पी को वोट दिया वो उससे क्या अपेक्षा करे?हार जीत चलती रहती है लेकिन पार्टी ख़तम होने के कगार पर पहुँच जाए,ये चिंतनीय बात है!क्या बी जे पी का अंत निकट है ?क्या पार्टी आपसी कलह से उबार पायेगी?क्या पार्टी पुराने समय को फ़िर दोहरा पाएगी?इन्ही सवालों के जवाब में ही पार्टी का भविष्य टिका है….