>फ़िर भी देश ,काल और लोक की इनकी अपनी समझ है

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बहुत दिनों बाद आज कई चिट्ठों को खंगाल कर कुछ पठनीय अंश यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ .कहते हैं न  “जिन खोजा तिन पाइयाँ ” . अक्सर गप्पबाजी में  सुनते है ,आजकल कुछ अच्छा और सार्थक लिखा नहीं जा रहा पर ऐसा नहीं है . खोजिये तो जनाब ! परन्तु यह भी है एक आम पाठक के पास इतना समय कहाँ है कि खोज सके . इसलिए ऐसी चर्चाओं का आना जरुरी है जो कुछ अच्छे पठनीय सामग्री का संकलन एक पोस्ट में पेश करे . अच्छा और सार्थक लिखने वाले बहुत हैं ऐसे लोग भले हीं महीने में तीन-चार पोस्ट करते हों , इनकी लेखनी किसी खास खांचे में फिट नहीं बैठती हो , लम्बा और बहुत खोजपूर्ण नहीं हो , फ़िर भी देश ,काल और  लोक की इनकी अपनी समझ है और तरह-तरह के लोगों को पढ़कर हर दिन एक नया नज़रिया मिलता है तो अब पढ़ते रहिये हमारे साथ ………
मुलायम की राजनीति और कल्याण के करवटों का भेद खोल रहे हैं  खरे साहब :
“आने वाले समय में भाजपा अगर उमाश्री भारती, कल्याण सिंह और राजवीर को गले लगा ले तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वर्तमान राजनीति को देखकर तो यही कहा जा सकता है, कि सब कुछ संभव है राजनीति में। आखिर राजनीति की एक लाईन की परिभाषा : “जिस नीति से राज हासिल हो, वही राजनीति है“ जो ठहरी। “

२०१२  के विध्वंश  के पीछे के अर्थशास्त्र  को  शैलेन्द्र से जानिये  बेहद कम शब्दों में   :
” 21 दिसंबर 2012 के दिन जो होगा वो होगा ..लेकिन इतना तय है की आज से कुछ सालों बाद किसी मैनेजमेंट संस्थान के छात्रों को फिल्म 2012 के शानदार प्रमोशन कैंपेन के बारे में पढ़ाया जा रहा होगा और उसमें उस अफवाह की भी जिक्र होगा जिसे सच साबित करने के लिए कुछ वैज्ञानिक भी जी जान से लगे हुए हैं ..और हो सकता है जल्द ही बालीवुड का कोई निर्माता बिल्कुल इसी कथानक की कोई फिल्म लेकर आए क्योंकि बाजार के महौल का फायदा हर चतुर व्यापारी उठाना चाहता है “
 धरती के स्वर्ग की यात्रा का मज़ा और सजा दोनों बता रहे हैं अय्यर जी :
रशीद ने मुझसे पूछा अच्छी कश्मीरी चाय कुछ आगे मिलेगी आप बोलो तो रुक सकते हैं” “हां-हां क्यों नहीं मैने कहा, कुछ ही आगे एक गाँव आया, सड़क किनारे एक छोटा सा ठीया था. गाड़ी से उतरते ही एक मीठी और भीनी भीनी सी खुशबू से सामना हुआ. चाय और टोस्ट वाकई बहुत अच्छे थे. हम मज़ा ले ही रहे थे,  तभी एक जीप के ब्रेकों के चीखने की आवाज़ आयी दो लोग तेजी से उतर कर आये और हम तक पहुंच कर कहा अनंतनाग के पास हमला हुआ हैं, आप लोग अगली खबर मिलते तक रुकेंगे तो ठीक रहेगा…..
अपनी जागरूकता और उसके परिणामों से कुछ सन्देश दे रही हैं कविता वर्मा  :

सभी के बच्चे घूम कर गिरते पड़ते जा रहे हैं सिर्फ़ मेरा ही नागरिकबोध जाग पड़ा पहुँच गयी एक दिन सरपंच के पास साड़ी समस्या सुनाने। बड़ा भला आदमी है सरपंच भी तुंरत मुझे कुर्सी दी चाय मंगवाई पुरी बात ध्यान से सुनी और तुंरत मुरम के डम्पर वाले को फ़ोन किया .कालोनी वाले को भी फ़ोन पर कहा भिया सड़क खोल दो लोगों को तकलीफ होती है .मैडम दो तीन दिन में आपका काम हो जाएगा यदि न हो तो मुझे बताना। दसियों बार धन्यवाद दिया उन्हें, कितना भला आदमी है अब तो रोड खुल ही जायेगी” 

गिरते सामाजिक मूल्यों  में  माँ-बाप की बढ़ती परेशानी  से रूबरू करवा रहे हैं  अनिल शर्मा  :
आजकल भारत देश में वर्द्धाआश्रमों की बाढ़  सी आई हुई है , जयादातर बच्चे अपने माता पिता को आश्रमों में छोड़ रहे है . जो बच्चे अपने माता पिता को अपनी निजता में दखल मानते है . उनकी बीमारी,नाकारापन  ,चिडचिडापन और हर बात में टोका टोकी को बर्दाश्त न कर पाने की सूरत में इनको आश्रमों में छोडा आना ही उचित समझते है , इससे उन माता पिताओं पर क्या गुजरती होगी जो अपने बच्चो से बड़ी बड़ी आशाये लगाये हुए होते है , मेरा भी एक मित्र अखलेश इसी तरह का है जिसने अपने माता पिता को आश्रम में भेज दिया है  और खुद  अपनी पत्नी और तीन बच्चो के साथ एक बढ़िया बंगले में रहता है , भगवान  का इतना बड़ा भगत है की जहा भी मंदिर दिखे वहा दर्शन करना और देवी देवताओ के कार्यो के लिए धन लुटा उसकी आदत में शुमार है ,यानि भगवान जहाँ है सब कुछ वहां है “ 
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>BLOGVANI के शीर्षक को देखिये वहां क्या लिखा है ?

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आज blogvani पर गया तो एक नई बात दिमाग में आई . आपने कभी इस बात पर गौर किया हो शायद ! यूँ तो हिंदी फॉन्ट के झमेले से वार्तानिक त्रुटियां हिंदी ब्लॉगजगत में सर्वत्र विराजमान हैं परन्तु वेबसाइट के शीर्षक में गलत लिखा जाना अथवा उसे लोगों द्वारा गलत पढ़ा जाना हास्यास्पद है . हिंदी -हिंदी का रट्टा मारने वाले हम लोग कब सुधरेंगे ? आप blogvani के शीर्षक को देखिये वहां लिखा है “ब्लागवाणी “ और हम बोलते हैं “ब्लॉगवाणी ” तो आखिर कौन गलत है ? हम बोलने में गलती करते हैं या वहां पर गलत लिखा गया है ? इस मसले पर आपकी राय क्या है ,इससे हमें अवगत कराएँ . और एक आग्रह है कि इसे किसी तरह का विरोध ना समझा जाए .

>ब्‍लॉगप्रहरी : नेक ब्‍लॉग को अनेक तक ले जाने वाला सारथि (एग्रीगेटर)

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जब विचारों को किसी वाद या विचारधारा का प्रश्रय लेकर ही समाज में स्वीकृति मिलने का प्रचलन बन जाए तब व्यक्तित्व का निर्माण संभव नही. आज यही कारण है कि भारत या तमाम विश्व में पिछले ५० वर्षो में कोई अनुकरणीय और प्रभावी हस्ताक्षर का उद्भव नही हुआ. वाद के तमगे में जकड़ी मानसिकता अपना स्वतंत्र विकास नही कर सकती और न ही सर्वसमाज का हित सोच सकती है.

मानवीय प्रकृति में मनुष्य की संवेदना तभी जागृत होती है जब पीड़ा का अहसास प्रत्यक्ष रूप से हो.जीभ को दाँतों के होने का अहसास तभी बेहतर होता है ,जब दांतो में दर्द हो. शायद यही वजह रही कि औपनिवेशिक समाज ने बड़े विचारको और क्रांति को जन्म दिया. आज के नियति और नीति निर्धारक इस बात को बखूबी समझते है . अब किसी भी पीड़ा का भान समाज को नही होने दिया जाता ताकि क्रांति न उपजे. क्रांति के बीज को परखने और दिग्भ्रमित करने के उद्देश्य से सत्‍ता प्रायोजित धरना प्रदर्शन का छद्म खेल द्वारा हमारे आक्रोश को खोखले नारों की गूंज में दबा देने की साजिश कारगर साबित हुई है. कई जंतर मंतर जैसे कई सेफ्टी-वाल्व को स्थापित कर बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के बीज समाज में बोया करते थे, उनको बाँझ बना दिया गया है.इतिहास साक्षी है कि कलम और क्रांति में चोली दामन का साथ है. अब कलम को बाज़ार का सारथि बना दिया गया. ऐसे में किसी क्रांति की भूमिका कौन लिखेगा? तथाकथित कलम के वाहक बाज़ार की महफिलों में राते रंगीन कर रहे है

 
.बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नही हो सकता.

तो अब जबकि बाज़ार के चंगुल से मुक्त अभिव्यक्ति का मंच ब्लॉगिंग के रूप में समानांतर विकल्प बन कर उभरा है तो हमारी जिम्मेदारी है कि छोटी लकीरों के बरक्स कई बड़ी रेखाए खींची जाएं. बाज़ारमुक्त और वादमुक्त हो समाजहित से राष्ट्रहित की ओर प्रवाहमान लेखन समय की मांग है.ब्लॉग जगत में जब प्रहार ज्यादा होने लगे और सृजन की प्रक्रिया धीमी हो जाने लगे, तब यह भान हो जाना चाहि‍ये कि वक्त एक बड़े बदलाव का है। वर्तमान समय में ब्लॉगिंग का गि‍रता स्तर, इसके शुभागमन के समय अनुमानित लक्ष्यों से बहुत दूर धकेलने वाला है। इस दिशा में एक सार्थक पहल हुई है, और उस प्रयास की संज्ञा ” ब्लॉगप्रहरी” देना सर्वथा प्रेरणात्मक है।
ब्लॉगप्रहरी का उद्देश्य ब्लॉग जगत के दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे विसंगतियों से अलग एक आदर्श ब्लॉग मंच मुहैया कराना है। स्वरूप से एक एग्रीगेटर होने के बावज़ूद इसकी कार्य-प्रणाली विस्तृत और नियंत्रित होगी।
(हमें ब्लॉगप्रहरी को एक एग्रीगेटर के रूप में नहीं बल्कि‍ विचार-विमर्श और ब्लॉगिंग के एक सार्थक प्लेटफार्म के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। आपसे निवेदन है कि आप इसका मूल्यांकन किसी एग्रीगेटर से तुलना कर के न करें!)
जैसा कि नाम मात्र से स्पष्ट है, इसका एकमात्र लक्ष्य ब्लॉग जगत में एक आदर्श ब्लागिंग के मापदंड की स्थापना करना और ब्लागिंग जैसे सशक्त, अभिव्यक्ति के हथियार को धारदार बनाये रखना है।

क्या है योजना!

(1) ब्लॉगप्रहरी एक अत्यन्त आधुनिक और नियंत्रित ब्लॉग एग्रीगेटर होगा। यहां पर चुनिन्दा ब्लॉग और लेखकों के लेख ही प्रकाशित होंगे, जिसका निर्धारण 15 सदस्यीय ब्लॉगप्रहरी की टीम करेगी। वह टीम आप ब्लॉगरों के सुझाव पर आधारित एक परिभाषित व्यवस्था होगी। सर्व-सामान्य के लिये यह केवल पठन और प्रतिक्रिया देने तक सीमित रहेगा। हां, हम लगातार नये ब्लॉग शामिल करते रहेंगे और अनुचित सामग्री के प्रकाशन और अमर्यादित भाषा प्रयोग जैसे अन्य निर्धारकों के आधार पर सदस्यता समाप्त करना, अस्थायी प्रतिबंध जैसे तमाम औजार मौजूद रहेंगे। यह एक नि:शुल्क जनहित योजना है, और इसका एकमात्र ध्येय
ब्लॉग को वैकल्पिक मीडिया के स्वरूप में स्थापित करना है।

ऐसे मापदंड रखने के कारण क्या थे ?

हमारे पास मौजूद अन्य एग्रीगेटर सभी प्रविष्टियों को एक जगह दिखाते हैं। अब एक पाठक को यह चुनना मुश्किल होता है कि क्या पठनीय है और क्या नहीं। आजकल अनावश्यक विषयों पर मतांध लेख, व्यक्तिगत आक्षेप, आरोप-प्रत्यारोप, अमर्यादित भाषाशैली का प्रयोग कर अपने पोस्ट पर पाठक बुलाने की परंपरा विद्यमान है। इस बीच कई बार सुसंस्कृत लेख भी नहीं पढ़े जाते और एग्रीगेटर के पहले पृष्ठ पर से उपस्थिति खत्म होते हीं उनका सार्वजनिक स्वरूप समाप्त हो जाता है।
क्यूं अलग है ब्लॉगप्रहरी: यहां प्रविष्टियों का संकलन और प्रकाशन वर्गीकृत होगा और एजेक्स (एजेक्स आधुनिकतम वेब डिजायनिंग तकनीक है, इसपर आधारित व्यव्स्था में वेबसाइट क हर हिस्सा इतना हल्का और जल्द खुलने वाला हो जाता है, कि युजर को किसी भी तरह इन्तजार नही करना पड़ता। एक सामान्य उदाहरण आप याहूटैब में पाते है। यह पूरी साइट एजेक्स पर बनी है। तमाम हिस्से अपने आप मे स्वतंत्र है और आप अपनी पसन्दानुसार साइट के सजा सकते है।) पर आधारित व्यवस्‍था उनको लम्बे समय तक दिखाने में सक्षम है। आपके सामने मुख्य पृष्ठ पर 400 से ज्यादा चिट्ठे दिखाए जा सकते हैं।
महत्वपूर्ण और विशेष चिट्ठों को फ़ीचर पोस्ट कैटेगरी के अंतर्गत दिखाया जायेगा, जिसकी संख्या नियंत्रित है। यह आटोमेटेड स्लाइड इन चिट्ठों को विशेष समय तक चला कर उनकी पठनीयता और प्रासंगिकता बनाए रखेगा। ब्लॉगप्रहरी ने मुख्य पृष्ठ पर किसी भी चिट्ठों के पसंद-नापसंद करने जैसा औजार उपलब्‍ध कराना उचित नही समझा है
ताकि आप पूर्वाग्रह से ग्रसित हो उनकी ओर न चले जायें और हालिया प्रकरण (ब्लॉगवाणी पर विवाद) इस पाठक-लेखक की इस मानसिकता को दर्शाता है) ब्लॉगवाणी की सेवा निश्चित तौर पर ब्लॉगजगत के लिए बड़ा ऋण है और अनैतिक तरीके अपनाकर कुछ लोग अपनी तुच्छता का उदाहरण छोड़ जाते हैं।
(2) ब्लॉगप्रहरी पर किसी भी प्रकाशित सामग्री को आप वहीं पढ़ सकते हैं ( या उस लेखक के निजी ब्लॉग पर जा सकते हैं)। शीर्षक पर क्लिक करते हीं, वह पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए वहीं खुल जायेगी और आप अपनी प्रतिक्रिया भी वहीं दर्ज कर सकते हैं। आपको लिंक फालो कर उस व्यक्ति विशेष की साइट पर जाने की आवश्यकता नहीं है।

इसके पीछे कारण क्या थे?

लिंक फालो कर आप लगभग 2-3 मिनट में उस लेख तक पहुचते हैं और आपका समय तब सार्थक होता है ,जब आपको कुछ अच्छा पढ़ने को मिले। पर बात जो ज्यादा घातक है कि जिस तरह टी.आर.पी. ने मुख्यधारा की मीडिया का बेड़ा गर्क कर रखा है, उसी तरह रैंकिग विजेट, ट्रैफिक स्टैट्स काउन्टरों ने ब्लॉगरों की मानसिकता पर गहरा और पथभ्रमित करने का प्रभाव डाला है। सामान्यत: सनसनीखेज शीर्षक देकर कुछ चिट्ठाकार अपनी पीठ स्टेट्स काउन्टर से थपथपा रहे हैं। सर्वविदित है कि ऐसे चोंचले अपनाकर आप अस्थायी लोकप्रियता तो हासिल कर सकते हैं, पर आपकी वास्‍तविक पहचान में आपकी कलम की धार और निष्पक्षता ही सर्वोपरि होनी चाहिए।

क्यूं अलग है ब्लॉगप्रहरी ?

ब्लॉगप्रहरी पर पोस्ट खुलने की सुविधा होने के कारण आप पोस्ट वहीं पढ़ पाएंगे, और कोई कलमतोड़ू
लेखक इस मंच का उपयोग पाठक बुलाने के लिए नहीं कर पायेगा।
(3) यहां पर प्रकाशित पोस्ट पर पर 15 ब्लॉगप्रहरियों की नज़र होगी। आप स्‍वयं अपनी पोस्ट के प्रति उत्‍तरदायी होंगे और किसी भी तथ्य या प्रसंग का उल्लेख करने पर आपको उसकी मौलिकता और सच्चाई का पता होना चाहिए। किसी प्रहरी द्वारा किसी पहलू पर संबधित तथ्य का स्त्रोत मांगे जाने पर आपको उसको सामने रखना होगा। अगर आप अपने तथ्य के प्रति ईमानदार नहीं पाए गये तो आपको सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ेगी।
साफ शब्दों में कहें तो वह शेर तो आपने सुना ही होगा :
आपका मंच है आपको रोका किसने, अपने पोखर को समन्दर कहिए…वाला फंडा नहीं चल पायेगा।
इससे आपकी और पूरे ब्लॉग जगत की विश्‍वसनीयता बढ़ेगी और आपकी लेखनी भी जवाबदेह होने के कारण अधिक पैनी होगी।
(4)विशेष प्रहरी के तौर पर कई गणमान्य और वरिष्ठतम साहित्यिक, पत्रकार और बुद्धिजीवी शामिल होंगे जो यदा-कदा अपने शामिल होने का अहसास आपको कराते रहेंगे और आपको अहसास नहीं होने देंगे कि‍ आपने उनकी प्रोफाइल लगा कर गलत फैसला लिया है। ऐसी अनेक नेक सहमति मिल चुकी हैं और मिल रही हैं। :)
इसके फायदे :—-इससे ब्लॉगजगत को हम वैकल्पिक मीडिया के रूप में स्थापित कर पाएंगे। यह स्पष्ट है कि
अगर कोई विशेष व्यक्तित्व शायद ही हम ब्लागरों को पढ़ने की हिम्मत जुटा पाता है, और अगर ब्लागर भी सामान्य कद का हो, तो उसके पास जाने का कोई विकल्प नहीं। अगर वह किसी एग्रीगेटर पर जाता है, तो जीवन में ब्लॉग पढ़ने की ग़लती वह दोबारा नहीं करना चाहेगा, क्योंकि संभवत: एक सौ पोस्ट के बाद एक पोस्ट पठनीय होती है। पर ब्लॉगप्रहरी विशिष्ट एग्रीगेटर है जो एक लेखक को पाठक के तौर पर Filtered posts,
monitered exposure and guaranteed readership देता है।
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हम खुद को ऐसे किसी भी तरह की परिभाषा स्थापित करने में नहीं उलझाना चाहेंगे कि अच्छा या बुरा ब्लॉगर कौन है या उसके क्या परिमाण हैं। पर यह तो तय है कि कुछ अच्छे ब्लॉगर हैं जो सर्वमान्य हैं। ऐसे ही ब्लॉगरों को साथ लेकर एक सुनहरे सपने को गति देने का यह प्रयास है।
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और क्या विशेष है ? ब्लॉगप्रहरी में—–

(1) प्रतिदिन एक प्रविष्टि या चर्चाघर का निष्कर्ष सभी राष्टीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों के पास स-नाम भेज दी जायेगी। और उनसे यह अपेक्षा होगी कि वह इनको विशेष स्थान दे कर प्रकाशित करें। इस सम्बन्ध में बड़ी सफलता मिली है और भविष्य में और पत्र- पत्रिकाएं हमसे जुड़ जायेंगी।
(2) ऑनलाईन रेडियो परिचर्चा का आयोजन पाक्षिक अन्तराल पर किया जायेगा। जिसके लिये स्टूडियो
का निर्माण हो गया है। भविष्य मे ब्लॉगप्रहरी हर रोज ब्लॉग समाचार वाचन की भी योजना पर अमल करेगा।
(3)एक परिवार की तरह ब्लॉगप्रहरी की टीम ब्लॉगजगत को वैकल्पिक मीडिया के रूप में स्थापित कर
दिशाहीन और दिग्‍भ्रमित मुख्यधारा के सामने एक आदर्श के रूप मे स्थापित करने के लिए वचनबद्ध हैं।

   ( 4) प्रत्येक ब्लॉग लेखक के  लिए एक अलग पन्ना उसके व्यकतित्व परिचय के लिए दिया जाएगा. जिससे बेनामी ब्लॉगर और छद्म नाम से
गलत बात करने वालो को दरकिनार किया जा सके .

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Mail us at:—————
admin@blogprahari.com
Or contact : +91-9313294888 ।
कृपया इस पोस्ट को अपने ब्लॉग पर लगाएं ।
अपने फ़ालोवर और लेखकों (अगर आपका ब्लॉग सामुदायिक है) तथा अन्य ब्लॉग मित्रों के मध्य इसी रूप में भेज दें। उनसे यह आग्रह करें कि वह अपने ब्लॉग पर यह पोस्ट लगाने के साथ इसे आगे भेज दें। यह क्रम बना रहे ताकि सब आगाह हो जाएं…”अब आ गया है…ब्लॉगप्रहरी’!!!!

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इस कोड को अपने ब्लाग/साईट पर लगा एक आदर्श ब्लागर बनने की ओर बढ़े:

http://blogprahari.com“>width=”180″ alt=”The VOice of Hindi Blogs” src=”http://www.blogprahari.com/wp-content/uploads/2009/10/logo42.pngheight=”80″/>

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लम्बाई और चौड़ाई का निर्धारण अपने सुविधानुसार स्वय कर सकते हैं। उपर लाल रंग से दिखाया गया है।
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सम्पादकीय समूह , ब्लॉगप्रहरी

>केवल पछतावे और निंदा से ब्लॉगजगत का कोई भला नहीं होगा

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आजकल वेबसाइट बनाने में व्यस्त हूँ जिस वजह से लिखने का मूड और समय दोनों का समन्वय नहीं हो पाता है . आज कुछ नए चिट्ठों की सूची प्राप्त हुई . उन चिट्ठों को पढ़कर लिखने का मन हुआ तो सोचा क्यों न नवागंतुकों की प्रशंसा हीं की जाए .अभी -अभी हिंदी दिवस का मातम ख़त्म हुआ है . ब्लॉग / चिट्ठा -जगत का विस्तार हो रहा है  ,उनका स्तर घट गया है  , बेकार के विवाद छाये हैं ,छपास रोग है ब्लॉग लेखन , चिट्ठा लेखन साहित्य नहीं है ,ये प्रचार माध्यम बन गये हैं , साहित्य चुराकर चेपा जा रहा है , इस्लाम हीं क्यों ? , मांसाहार जायज क्यों है ?, हमने पैसे कमाए , चिट्ठों को लोकप्रिय बनायें ,  ब्लॉग्गिंग के नियम -कायदे होने चाहिए , ब्लॉगजगत को पहरेदार की जरुरत है आदि तमाम मुद्दों पर पिछले दिनों खूब लिखा गया .लेखकों ने खूब टीआरपी बटोरी .अधिकाँश बेकार की चर्चा में कुछ जरुरत की चीजें भी परोसी गयी जिसे आप लोगों ने भी देखा और महसूस किया होगा . वो कुछ चीजें हमारे काम की और हमें प्रेरणा देती हैं .एक ब्लॉगर ने लिखा था कि सिमटते हिंदी ब्लॉग जगत का विस्तार हो रहा है . उनका “सिमटना ” कई अर्थों में था . मसलन, ब्लॉग तो खूब बढ़ रहे हैं परन्तु उनमें से बहुत कम लोग सक्रीय हो पाते हैं , हिंदी में लिखने वाले विदेशी लेखकों की संख्या उचित अनुपात में नहीं बढ़ रही है ,लोग उलजुलूल लिखते हैं स्तरीय और पठनीय सामग्री कम हो रही है  इत्यादि .लेकिन उन बंधुवर को एक पक्ष हीं दिखाई दे रहा है . केवल पछतावे और निंदा से ब्लॉगजगत का कोई भला नहीं होगा . हम आत्मविवेचना करें कि क्या सचमुच हम पूरे ब्लॉगजगत को पढ़ते हैं ? विभिन्न एग्रीगेटर पर जाकर रोज -रोज कुछेक ब्लॉग को पढ़कर फैसला सुनाना क्या उनके लिए ज्यादती नहीं जो मुख्यधारा की पत्रकारिता से व्यथित हो यहाँ पहुंचे हैं कि कुछ अच्छा होगा और वो ऐसा कर भी रहे हैं . लेकिन इस लोकमंच को भी आप-हम जैसे ठेकेदारों ने वैसा बनाने की कोशिश की है . एक बात को हमने देखा है  कि अच्छा लिखने वाले किसी ब्लॉग अथवा समाचारपत्र के मोहताज नहीं हैं .उनकी चर्चा किसी अखबार या ब्लॉग के कॉलम /स्तम्भ  में हो या न हो फर्क नहीं पड़ता .अगर ध्यान दिया जाए तो वो भी गलत हैं . मात्र आदर्शों को जीकर मकसद पूरा नहीं हो सकता ! व्यावहारिक तौर पर देखें तो बहुसंख्यक ब्लॉगर चिट्ठाचर्चा या समाचारपत्रों के स्तम्भ में खुद का नाम आने पर गर्वान्वित होते हैं . उन जगहो से प्रमाणित लोगों की प्रतिष्ठा मानी जाती है . फ़िर क्यों न ऐसा मंच भी हो जो बगैर पक्षपात के सही तथ्यों के आधार पर ऐसी सुविधा उपलब्ध करवाए ? हमें खुद से कोई न कोई मानक तय करना होगा अगर हम खुद को सामानांतर मीडिया मानते हैं . खैर , ये चर्चा आगे जारी रहेगी तब तक हमारे इस छोटे से मंच से कुछ नए ब्लॉग की आवाज आप तक पहुंचाई जा रही है : –

 योगेन्द्र बता रहे हैं विडियो को सीखने का माध्यम  बनाने से क्या फायदा है और उनका यह ब्लॉग प्रोग्रामिंग की भाषा सिखाने के लिए बनाया गया है .तो पढ़िये उनकी पहली पोस्ट : ” अभी तक हम-आप सभी किताबों से सीखते आये हैं| सही भी है, किताबों से अच्छा कोई सिखा भी नहीं सकता और किताबों जैसा कोई मित्र हो भी नहीं सकता| आज तक हमने-आपने जो कुछ भी सीखा किताबों से ही सीखा पर जब बात कंप्यूटर सीखने की हो तो सिर्फ किताबें काम नहीं आतीं क्यूंकि कंप्यूटर में आप कुछ सीखना चाहते हैं तो Practically ही सीख सकते हैं| उसके लिए कोचिंग का सहारा लिया जाता है जहाँ पर Teacher हमें कंप्यूटर पर काम कर के दिखता है और हम सीखते हैं| यानि की एक बात पूरी तरह साफ़ है की कंप्यूटर को हम लोग सिर्फ पढ़ कर नहीं सीख सकते बल्कि उसको देख कर सीख सकते हैं|  ”   

एक अन्य ब्लॉगर  बीबीसीBBC हिंदी के लेखों पर टिका टिप्पणियां करने में जुटे हैं . इस तरह के प्रयास होते रहे तो विश्लेषण पढने वालों को मज़े की सामग्री मिलती रहेगी .ऐसे लोगों की कमी नहीं जो ख़बरों-लेखों पर गहरे से विमर्श पसंद करते हैं . तो पढ़िये : ” कोई उन बातों पर ध्यान नहीं दे रहा है जो इन ख़बरों से उभर कर आती हैं और जो हमारे गणमान्य पत्रकार लिख नहीं रहे या लिखना नहीं चाहते | पहली बात : जो व्यक्ति अपने पैसों से तीन महीने तक पाँच सितारा होटल में रह सकता है वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है | वह उन ०.०१ % भारतियों में से है जिनके जन्मे अथवा अजन्मे पोतें-पोतियों को भरण-पोषण के लिए कभी काम करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी | जाहिर है कि वे विमान के पहले दर्जे से ही यात्रा करने के आदी है | उनके लिए विमान का साधारण दर्जा ‘मवेशी क्लास’ ही है | अगर उनके मुंह से गलती से यह सच निकल ही गया तो उसके लिए इतना बवाल मचाने की क्या आवश्यकता है |”

जेकेके नाम से एक बंधू सामाजिक मीडिया अनुकूलन (SMO) के फंडे बता रहे हैं .इस तरह नित्य नयी-नयी जानकारी देने वाले कई ब्लॉगर बंधू लेखन कर रहे हैं .आप भी खोजिये उन्हें पढ़िये और अपना ज्ञान बढाइये .हाँ संकोच न करियेगा कि बड़ा ब्लॉगर है या छोटा ? फिलहाल ये पढ़िये : ” सामाजिक मीडिया अनुकूलन कई वायरल विपणन के लिए एक तकनीक है जहाँ मुँह के शब्द दोस्तों या परिवार लेकिन सामाजिक बुकमार्क करने, वीडियो और फ़ोटो साझा वेबसाइट में नेटवर्किंग के प्रयोग के माध्यम से के माध्यम से नहीं बनाया है के रूप में जुड़े तरीकों में है. में ऐसे ही एक तरह से ब्लॉगों के साथ सगाई की blogosphere और विशेष ब्लॉग खोज इंजन में आरएसएस के प्रयोग के माध्यम से सामग्री बाँटने से ही प्राप्त होता है.”

आनंद सौरभ को देखिये नोटों पर छपे गाँधी की चाहत में परेशान हैं . बाकि  का माल तो उनकी पोस्ट पर जाने से हीं मिलेगा . देखिये तो अन्दर क्या है : ” गाँधी का जिन्न अब कहाँ से टपक पड़ा ……..जब बापू का सत्य , अहिंसा का कोई मतलब नहीं तो फिर सादगी क्यूँ ?सोनिया और राहुल बाबा आप गाँधी उपनाम छोड़ डालिए…बापू तो केमिकल लोचा की तरह गाहे बगाहे आ जाते है ……न आप के नाम में गाँधी होगा न आम लोगो को गाँधी की याद आएगी…..हमसे लोग कभी पूछते है क्या …..कभी शिकायत करते है क्या .”
  
                             आगे जब भी मौका मिलेगा नए चिट्ठों की चर्चा होगी . माफ़ करेंगे समयाभाव के कारण कोई स्थाई अंतराल पर नहीं लिख पा रहा हूँ परन्तु कोशिश होगी कि पाक्षिक चर्चा होती रहे . आशा है आप सभी का सहयोग मिलेगा .
                                                                        

>सुगंध फैलाने वालों की चर्चा भाग -3

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स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर आप सबों को हार्दिक बधाई ! आज फ़िर ब्लॉग जगत की भीड़ से नवागंतुकों को छांक कर संवाद के इस मंच पर ला रहा हूँ । ब्लॉग प्रशंसा के तीसरे भाग में उन लोगों को शामिल किया गया है जो देश के वर्तमान शासनतंत्र से निजात चाहते हैं । इनका सीधा सवाल हमसे , आपसे , नेताओं से , सरकार से , नौकरशाहों से यानी देश के हर नागरिक से है , क्या हम आजाद हैं ?
*हम आज़ाद है क्या सच में ?
“युवा क्रन्तिकारी शहीद सरदार भगत सिंह ने फांसी लगने से पहले कहा था की “भारत में न्याय के लिए आईपीसी यानि भारतीय दंड संहिता को समाप्त किया जाए !”*भारत के सबसे कम उम्र के फांसी पाने वाले क्रांतिकारी मदनलाल धींगरा ने लन्दन से लिखे अपने एक पत्र में इसकी समाप्ति की बात कही थी !*स्वतंत्रता के बाद अनेक नेताओ क्रांतिकारियों ने आईपीसी को हटाने को कहा लेकिन हमारे प्रधानमंत्री चाचा नेहरू ने कहा की “इसी के आधार पर तो हम शासन चलाएंगे ,यही तो व्यवस्था है !”हमारी आज़ाद गुलामी तो देखिये की जनाब, अपराध पाप अनाचार की परिभाषा भी हमने इस आईपीसी यानि आयरिश पीनल कोड यानि इंडियन पीनल कोड ली है !इसके बाद भी हम कहते है की हम आज़ाद है ।”
http://ramendralekhan.blogspot.com/2009/08/blog-post_12.html
** गरीबी रोकने की सबसे बड़ी उपलब्धि नरेगा और उसकी हकीकत
“बिहार के इस पिछडे इलाके में हर साल डैरिया से १०० से ज्यादा लोगों की मौत होती है । वजह सनिटेशन का घोर अभाव है । दूर से आती दुर्गंध हवा आपको किसी बस्ती का एहसास करा सकती है । गाँव से बाहर की सड़के मल-मूत्र से भरा पड़ा है । दिन में बच्चे की बारी होती है तो दोपहर के बाद इन सड़कों पर वयस्क मर्दों का कब्जा हो जाता है । जबकि शाम ढलते ही महिलयों की टोली यहाँ जम जाती । अपना कहने के लिए सिर्फ़ यह सड़क ही साझा शौचालय है ।
यूनिसेफ का मानना है कि गाँव में शौचालय बनाकर डैरिया की मौत से लोगों को बचाया जा सकता है । यूनिसेफ की रिपोर्ट को माने तो भारत के महज १५ फीसद गाँव में ही अबतक शौचालय लोकप्रिय हो पाया है । चौकाने वाली बात यह है कि भारत के ग्रामीण इलाके में सबसे ज्यादा मौत डैरिया से ही होती है । मुखिया पदम् सिंह इस सच को स्वीकार कर ते है लेकिन अपनी मजबूरी बताते है कि हमें सिर्फ़ मिटटी काटने को कहा गया है ।”
http://bakwasreport.blogspot.com/2009/08/blog-post.html
*** आईये हाथ उठायें हम..मिलके..!
“एक सवाल पूछती हूँ, आप सभीसे…जो बेहद सामायिक है…हमारी सुरक्षा से निगडित है॥हम सभी को इसका जवाब खोजना है.. इसका सामना करने की निहायत ज़रूरत है…वो आतंक वाद को लेके…!क्या आपलोग Indian Evidence Act २५/२७ के बारेमे जानते हैं? जानते हैं,कि, इसके क्या दुष्परिणाम हैं? के ये १५० साल पुराना, अंग्रेजों ने ख़ुद को बचाए रखने के लिए बनाया क़ानून आज पूरी दुनिया के लिए समस्या बन गया है? हमें निगल रहा है और हम हाथ पे हाथ धरे बैठे है? आख़िर क्यों? हमारी आज़ादी की सालगिरह हमें आतंक के साये में मनानी पड़ती है॥आख़िर कबतक?के, अर्न्तगत सुरक्षा यंत्रणा के हाथ मज़बूत करने के लिए दिए गए सुझाव,उच्च तम न्यायलय के आदेशों के बावजूद पिछले २९ सालों से लागू नही किए गए?के, जबतक इन क़ानूनों में तब्दीलियाँ नही आतीं, हम आतंक से महफूज़ नहीँ? के अफ़ीम- गाँजा की तस्करी भी जारी रहेगी और हम मुँह तकते रहेंगे?ये सभी सवाल,एक ही सवाल के तहत हैं…हम हमारे देशकी कानून व्यवस्था के बारेमे कितनी जानकारी रखते हैं? ख़ास कर जहाँ तस्करी से निपटने का प्रश्न आता है ???हम एक बारूद के ढेर पे बठे हुए हैं/रहेंगे…और निगले जायेंगे,जब तक जागरूक नही बनेंगे….एक लोक तंत्र में सबसे अधिक लोगों का जागरूक होना ज़रूरी है..आईये ! हम कुछ करें…मिलके..!”
http://shama-shamaneeraj-eksawalblogspotcom.blogspot.com/2009/08/blog-post_7005.html
उपरोक्त तीनों चिट्ठों में अलग-अलग सवाल उठाये गये हैं। सारे सवालों का सार यही है कि आज़ादी के ६२ सालों बाद भी हमारी स्थिति दयनीय है। जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के पूर्ति के लिए जद्दोजहद कर रहे एक आम भारतीय की वास्तविक हालत क्या एक स्वतंत्र मनुष्य की है ? हाँ , इतना जरुर है कि देश का एक तबका आर्थिक , सामाजिक , राजनितिक तमाम तरह की स्वतंत्रता का उपभोग कर रहा है । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जिस अधिकार को संविधान ने आम लोगों के हक में बने था । आज उसी अधिकार का नजायज फायदा उठकर तथाकथित बौद्धिक लोग अपनी जेबें भर रहे हैं । मीडिया अपने कर्तव्यों को विस्मृत कर बाज़ार की गोद में जा बैठा है । चाँदी के टुकडों की चमक में कलम की स्याही फीकी और कैमरे की रौशनी कम पड़ गई है। ऐसे संक्रमण काल में इन चिट्ठों की भूमिका सराहनीय है । निकट भविष्य में वैकल्पिक मीडिया होने जा रहे ब्लॉग जगत को अपने अन्दर बदलाव लाने की जरुरत है । अपनी छपास रोग से उत्पन्न कुंठा को शांत करने के हेतु लिखने के स्थान पर अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए विषय-वास्तु का चयन करना सीखना होगा । आगे भी ब्लॉग-प्रशंसा का यह प्रयास चलता रहेगा तब तक के लिए विदा !!

>सुगंध फैलाने वालों की चर्चा भाग -2

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गत रविवार को आरम्भ किए गए इस स्तम्भ के अर्न्तगत दूसरा पोस्ट में तीन नए चिट्ठाकारों को शामिल किया जा रहा है । समाज और देश से सरोकार रखने वाले मसले पर कहीं कुछ लिखा मिल जाता है तो यहाँ लाने का दुस्साहस कर बैठता हूँ । हिन्दी ब्लॉग्गिंग की दुनिया में इन नए महारथियों की लेखनी और इनकी पैनी नज़र को देख कर “ब्लॉग जगत ” के भी चौथे खम्भे में शामिल होने की बात प्रमाणित लगती है ।
*दक्षिणी राजस्थान का आदिवासी क्षेत्र या मजदूर पैदा करने का कारखाना!
दक्षिणी राजस्थान का आदिवासी क्षेत्र पीढ़ी-दर-पीढ़ी शोषण और बदहाली के दलदल में धँसा हुआ है। हालाँकि यह बदहाली बहुत पुरानी है परन्तु आजादी के पहले चूँकि पूरा क्षेत्र एक अन्यायपूर्ण अंगे्रजी हुकूमत के अधीन था इसलिये उस दौर के बारे में हम बहुत अधिक अपेक्षा नहीं रख सकते, पर आजादी के बाद आज बासठ साल गुजर जाने के बावजूद क्यों इस क्षेत्र के हालात नहीं बदले और क्यों यहाँ के लोगों की जिन्दगी बद से बदतर होती चली गयी, इस सवाल का जवाब आने वाला कल जरूर लेकर रहेगा। सोचने वाली बात है कि अगर इस बदहाली को समाप्त करने का कोई इरादा हमारी राजनीतिक पार्टियों या सरकारी व्यवस्था का होता तो क्या बासठ साल का समय इसके लिये बहुत कम था ? समानता और लोकतंत्र पर आधारित हमारे संविधान ने यह इन्तजाम किया था कि इस देश के किसी भी क्षेत्र में रहने वाले और किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय अथवा वर्ग के लोगों को एक नागरिक के तौर पर देश के संसाधनों एवं सुविधाओं में बराबर का साझीदार बनाया जाएगा तथा उनके लिये सम्मानपूर्वक जीने, अपनी संस्कृति या धर्म के अनुसार चलने और विकास करने की आजादी होगी। इसके पीछे यह सोच काम कर रही थी कि सदियों से जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर होते चले आ रहे शोषण को समाप्त कर एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की जा सकेगी। पर क्या इस देश के सभी क्षेत्र के लोगों को एक आजाद देश में रहने का सुख मिल सका ? हमने देखा कि देश के कुछ क्षेत्रों में तो अमीरी के बड़े-बड़े महल खड़े हो गये पर ज्यादातर क्षेत्र लगातार बदहाल और कंगाल होते चले गये। इसी देश के अन्दर मुट्ठी भर अमीरों ने बाकी लोगों से अलग अपने-अपने किले बना लिये और उनकी संपत्ति लाखों से करोड़ों और करोड़ों से अरबों में पहुँच गयी पर दूसरी तरफ देश के बहुसंख्यक वंचितों और गरीबों की न केवल संख्या ही बढ़ी बल्कि उनकी गरीबी का स्तर भी बढ़ा। कहने का मतलब यह कि आजादी के बाद उनका जीवन पहले से कहीं अधिक कठिन, अधिक लाचार और असुरक्षित हो गया। देश के कुछ क्षेत्र जो भौगोलिक और प्राकृतिक दृष्टि से बाकी क्षेत्रों से कटे हुए थे, उनकी मुश्किलें तो सारी हदों को पार कर गईं और उन्होंने इन्सान होने का एहसास तक खो दिया। दक्षिणी राजस्थान का यह आदिवासी क्षेत्र भी इसी दुश्चक्र में उलझ कर रह गया है। सरकार की तथाकथित कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के अन्तर्गत लाखों-करोड़ों की धनराशि अब तक खर्च की जा चुकी है पर इस क्षेत्र के लोगों के जीवन में, उनके रहन-सहन में कोई गुणात्मक परिवर्तन नजर नहीं आता।दक्षिणी राजस्थान का यह आदिवासी क्षेत्र आज भी जीवन की बुनियादी सुविधाओं तक के लिए तरस रहा है। यहाँ के खेत पानी के अभाव में सूख जाते हैं। न तो यहाँ रोजगार के पर्याप्त साधन हैं और न ही सड़क, पानी, बिजली, यातायात या चिकित्सा की मामूली सुविधाएँ भी लोगों को मिल पाई हैं। साल के कुछ महीनों में अपनी तथा अपने परिवार की जिन्दगी बचाने के लिए शहरों की तरफ पलायन करना तो जैसे इस क्षेत्र के लोगों की नियति बन चुकी है। क्षेत्र के गाँव-गाँव में स्कूलों का जाल तो बिछ गया है पर उन स्कूलों में एक ऐसी शिक्षा प्रणाली चलाई जा रही है, जिसमें यहाँ के बच्चों के पढ़ने, कुछ सीख पाने या आगे बढ़ने के मौके बिल्कुल नहीं हैं। इस शिक्षा प्रणाली से गुजरने के बाद भी यहाँ के बच्चे इस लायक नहीं बन पाते कि वे मजदूरी के अलावा कोई दूसरा काम कर सकें और इस तरह उन्हें जिन्दगी भर सुविधासम्पन्न तबके के लोगों के नीचे ही रहकर काम करना पडता है। यही कारण है कि आज दक्षिणी राजस्थान के स्कूलों को बडे पैमाने पर मजदूर तैयार करने का कारखाना कहा जा रहा है।
ब्लॉग का नाम :-समान बचपन अभियान http://samanbachpanabhiyan.blogspot.com/
** ‘जो कुछ बचा, मंहगाई मार गई’
गरीबों के मुंह से निवाला छीन लेने वाली मंहगाई ने आम लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। आख़िर क्यों बढ़ गई मंहगाई? कौन है इसके लिए जिम्मेवार? क्या congress party जिम्मेवार है? क्या BJP जिम्मेवार है? जनता सोच रही है अब किसे जिताया जाए? बीजेपी और कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, वाम दलों सहित सभी छोटी-बड़ी पार्टियों की सरकारों को देख लिया गया है। जहाँ तक आम मेहनतकश जनता और गरीब लोगों का सवाल है, उनमें रत्ती भर भी फर्क नहीं है। आज जब मंहगाई बढ़कर इतनी हो गई है कि खाते-पीते परिवारों के यहाँ से भी दाल और सब्जियां गायब होती जा रही हैं, तो पूंजीवादी पार्टियाँ भी मंहगाई पर चिंता जाहिर कर रही हैं। उन्हें डर है कि भूखी जनता सड़क पर न आ जाए, कहीं विधि -व्यवस्था न बिगड़ जाए और शासन पर जनता धावा न बोल दे! परंतु, जब वे स्वयं अपनी जाती हुई सत्ता को ” झपटने” के लिए विधि-व्यवस्था बिगाड़ते हैं तो उन्हें इसकी कोई फिक्र नहीं होती है!! सवाल यह भी है कि जनता स्वयं क्या सोचती है।
ब्लॉग का नाम :PEOPLE’S DISCOURSE /
http://proletarianalternative.blogspot.com/2009/08/blog-post_10.हटमल
*** माया की माया …
कई दिनों से एक ख़बर मीडिया में सुर्खियों में रहती है, फिर कहीं न कहीं दब कर रह जाती है, आज सुबह अखबार के पन्ने पलटते हुए मैंने असमान की तरफ़ देखा। बादलों की पतली लकीर सूरज की तेज़ किरणों को छुपाने की कोशिश कर रही थी। मैंने न जाने क्यों पर, ऊपर वाले से मन ही मन थोडी बारिश की प्रार्थना कर बैठा। शायद मैं उस धुप को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था, पर उन किसानो का क्या जो रोज़ इस आस में सोते हैं की कल बारिश होगी तोह कहती की गाड़ी आगे बढेगी। झूठा दिलासा ही है पर फिर भी वोह अपने आप को दिलासा देता जरूर है। आसमान से बारिश ना हो तोह क्या ? शायद इस साल भूखा रहना पड़े, किसी की बिटिया का ब्याह न होगा, किसी पर कर्जे का भार और बढ़ जाएगा, वोह छोटी खुशियाँ जो एक किअसं अपने परिवार के लिए देखता है, वोह उनसे वंचित रह जाएगा, पर इसकी पड़ी किसको है। कृषि प्रधान देश होने पर भी हमारी निर्भरता बारिश पर इतनी ज्यादा है, वोह हम सब जानते हैं, तब तोह खेती होगी ही राम भरोसे। एक तरफ़ तो यह पहलु है और दूसरा पहलु है, मायावती और उनकी माया। प्रदेश सूखे की मार झेल रहा है और माया जी को अपनी मूर्ती बनवाने से फुर्सत नहीं। किसान रोता है तोह रोये, मैं तोह अपने आपको अमर करके इस दुनिया से रुखसत होउंगी। भाई चुना है तोह भुगतो, मुलायम ने भी तोह ऐश की थी, अब मेरी और मेरे हान्थियों की बारी है। ज्यादा हो हल्ला हो तो सीधे केन्द्र की सरकार पर निशाना साधो, केन्द्र अपना पल्ला झड़ने के लिए कुछ करोड़ रुपये दे देता है और फिर वोह पैसे किसे उद्धार में जाते है वोह या तो माया को मालूम है या उसके अय्यियारों को। केन्द्र कुएक अनोखी परियोजना ले कर आ जाता है, सस्ते अनाज, चावल सिर्फ़ ३ रुपये किलो। मीडिया शांत, किसान कुछ बोले तोह सरकार का जवाब होता है चावल सस्ते कर दिए हैं आप लोग सूखे से निपट सकते हो अब। भाई कमाल है, कोई इनसे यह पूछे क्या साल भर केवल चावल खाते हो नेताजी। और यह सस्ते अनाज बाँट कर आप कोई उद्धार नहीं कर रहे हो, बल्कि आप एक इज्ज़तदार किसान को, जोह देश का पेट भरता है, एक भिखारी बना रहे हो, उसे सस्ते की आदत मत डालो, उसे अच्छी आदत डालो, उसे मेहनत करने से मत रोको, उसे उन्नति की राह दिखाओ। कृषि प्रधान इस देश में सिंचाई की सुद्रिड वेवस्था करो, की कुछ दिन बारिश ना हो तोह वोह भिखारी बनने पर मजबूर न हो। ब्लॉग का नाम :Turning Heads
http://pradeepsingh14.blogspot.com/2009/08/blog-post.हटमल
तीन ब्लॉग , तीन पोस्ट और तीन समसामयिक मुद्दे पर शानदार कलमघसीटी की गई है । महंगाई -मजदूरी -माया इन तीन चीजों को ढोना आज हमारी मजबूरी सी बन गई है । या यूँ कहिये बनी नहीं हमने बना दिया है । वर्तमान को ध्यान में रखकर और भविष्य को विचार कर लिखे गए इन आलेखों से ब्लॉग जगत की गंभीरता सामने आती है । आशा है ये नए लोग आगे और भी सार्थक विषयों पर लिखते रहेंगे । जय हिंद !

>गंध मचाने वालों के बाद सुगंध फैलाने वालों की चर्चा

>ब्लॉग्गिंग में गंध मचाने वालों की ख़बर ली तो सोचा कुछ सामाजिक सरोकार वाले नए लोगों की बात भी इस मंच से आपके सामने रखी जाएइसी सन्दर्भ में कुछ नए चिट्ठों को खंगाल कर ला रहा हूँदेखिये तो चिट्ठाजगत के नवागंतुकों के विचार :-

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MERI AWAJ SUNO एक राजनेता पाँच साल में कैसे करोड़ों का मालिक हो जाता है?

लोक सभा चुनाव बीते अभी महीने भर भी नही हुए है, इस लिए लोगों के जेहन में इन नेताओ के दिए हुए सम्पति सम्बन्धी शपथपत्र की यादें अभी ताजा है। जिन भी विधायकों और सांसदों ने पर्चा भरा उनमे से ज्यादातर की सम्पति करोणों में थी, जब यहियो राजनेता पाँच साल पहले चुनाव् लादे थे तब से इनकी सम्पतियों में ब्यापक इजाफा हुआ है। अतः यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है की इन पाँच सालो में कुबेर जी ने वह कोण सा करू का खजाना इनके लिए खोल दिया जो आम जनता के लिए हमेशा सपने जैसा और रहस्यमय होता है।
यदि एक सांसद के मासिक भत्ते और अन्य सुविधाओं परनजर डाली जाए तो वह लगभग एक लाख रूपये महीने आती है यानि एक साल में साथ लाख रूपये । इस हिसाब से पाँच सालों में कुल प्राप्ति लगभग तीन करोड़ रूपये की ही हुयी। फ़िर इन नेताओं के पास वो कौन सी जादू की छड़ी है कि पाँच साल बाद इनकी घोषित कमाई पांच करोड़ से उपर की हो जाती है। अघोषित की बात न ही करे तो ज्यादा अच्छा ।
नेताजी लोगों , क्या आम जनता को भी इस जादू के छडी का राज बताएँगे?

http://humkolikhen.blogspot.com/

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बच्चे.. जो बच्चे न रह पायेंगे
उस दिन टीवी पर प्रसारित होने वाले बच्चों के धारावाहिकों की सूची देख रहा था, तब यह जानकर आश्चर्य हुआ कि आजकल बच्चोें के लिए टीवी पर ऐसा कुछ भी देखने लायक नहीं है, जिससे उनके मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान भी बढ़े. आजकल जो कुछ भी बच्चों के नाम पर टीवी पर परोसा जा रहा है, उससे लगता है कि एक साजिश के तहत बच्चों को ‘ग्लोबल इंडियन ‘ बनाया जा रहा है. यह एक खतरनाक सच्चाई है, जिसे आज के पालक भले ही समझें, पर सच तो यह है कि आगे चलकर यह निश्चित रूप से समाज के लिए एक पीड़ादायी स्थिति का निर्माण होगा, जिसमें बच्चे केवल बच्चे बनकर नहीं रह पाएँगे, बल्कि उनका व्यवहार ऐसा होगा, जिससे लगेगा कि वे समय से पहले ही बड़े हो गए हैं, उनका बचपन तो पहले ही मारा जा चुका है. आगे पढ़ें ……… http://amar8weblog.blogspot.com

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रेल में आप ऐसा खाना खा रहे हैं !!!

ताब्दी एक्सप्रेस को बेहतरीन फूड क्वालिटी व कैटरिंग सर्विस के लिए दो साल पहले आईएसओ सर्टिफिकेट मिला था। लेकिन कालका से नई दिल्ली जाने वाली शताब्दी एक्सप्रेस के अंबाला स्थित बेस किचन की हालत देखकर लगता है कि यह सर्टिफिकेट छलावा भर है।

700 यात्रियों का खाना दो कमरों वाले इस किचन में रोजाना औसतन 700 यात्रियों के लिए खाना तैयार व पैक होता है। उल्लेखनीय है कि खाना बनाने की प्रक्रिया में तो साफ-सफाई का ख्याल नहीं रखा जाता, लेकिन पैकिंग में पूरी सावधानी बरती जाती है। शायद किचन का ठेकेदार मानता है कि अफसर और यात्री किचन देखने तो आते नहीं, वे तो केवल पैकिंग देखकर ही संतुष्ट हो जाते हैं। आईआरसीटीसी ने किचन का ठेका एक ठेकेदार को दे रखा है।

अक्सर रहती है यात्रियों को शिकायतशताब्दी एक्सप्रेस में सर्व किए जाने वाले फूड को लेकर यात्रियों को अक्सर शिकायतें रहती हैं। इस बात को अंबाला मंडल भी स्वीकार करता है, लेकिन इस मुद्दे को आईआरसीटीसी के अधिकारियों से बात कर सुलझाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। कुछ समय पहले डॉ। संदीप छत्रपाल के माता-पिता शताब्दी का खाना खाकर बीमार हो गए थे। यही नहीं बीते वर्ष चंडीगढ़ शहर के चीफ इंजीनियर रह चुके वीके भारद्वाज अपनी पत्नी के साथ शताब्दी में नई दिल्ली जा रहे थे, तो कटलेट में मौजूद लोहे की तार उनकी पत्नी के गले में फंस गई थी, जिसके चलते उन्हें अस्पताल में भी दाखिल होना पड़ा था |
किचन का जल्द ही रेनोवेशन कराया जाएगा। खाने की गुणवत्ता जांचने के लिए 20 से 25 दिन में एक बार पीएफए टेस्ट होता है। जहां तक गंदगी का सवाल है तो इसे चेक कराएंगे।
अनीत दुल्लत, ग्रुप जनरल मैनेजर, आईआरसीटीसी
आईएसो से ले चुके रेलवे के उस सर्टिफिकेट पर भी संदेह के सवालों ने घेर लिया है जो अब अपनी आंखों देखने के बाद कोई यकीं नहीं कर सकता , लेकिन अभी रेलवे के अधिकारी किचन की गंदगी की जांच की ही बात कह रहे हैं |
आईआरसीटीसी की इस लापरवाही के लिए आख़िर कौन जिम्मेवार है ? और कौन इस पर करवाई करेगा ? जो लोग रेलवे की इस किचन का खाना खाने के बाद आप बीती सुनाते हैं उन शिकायतों पर कौन अमल करेगा ?
http://khbarchikascandelpoint.blogspot.com/2009/08/hrefhttpads.html

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दौड़ता भारत – रेंगते लोग

गाँव हो या शहर, यहाँ पे चलना एक मुस्किल कला बनी हुई है ! बात चाहे पैदल चलने की हो या फ़िर सड़को पे चलने की, हर कोई मजबूर हताश ही दिखता है! चाहे लोग यहाँ कितना भी दौडे आखिर में सब रेंगते ही मिलते है !
आज बात सिर्फ शहरों की करते हैं अब गए वो दिन जब देश के विकास का रास्ता गाँव से होकर गुजरता था , अब तो जहाँ से हाईवे गुजरता है समझो वहीँ शहर बस जाता है! रेंगने की कला में शहर गाँव से कहीं आगे है आखिर गाँव और कसबे ने भी तो यह कला शहर से ही सीखी है !
घर से निकलते ही सर्कस की शुरुवात भी हो जाती है ,गलियों में बचते बचाते आगे बढना पड़ता है, जल्दी होती है तो जल्दी २ भागता है ख़ुद को बचाते,कभी दाएं कभी बाएँ , कभी इधर कभी उधर ! चोकन्ना होकर आगे बढते हुए, अचानक ही जाने अनजाने पड़ोसियों के कूड़े से भी झुझना पड़ता है, कई बार कूड़ा ताज़ा होता है तो कई बार बासी और बदबूदार ! कई बार तो मालूम ही नही होता की कूड़ा आखिर आया तो आया किस घर से ?ऐसी स्थिति में चुपचाप ही निकलना एक बेहतर उपाए समझा गया है, अगर किसी ग़लत घर पर आरोप लगा बैठे तो लेने के देने भी पड़ जाते है और पिटाई के साथ- घर के सामने से कूड़ा भी आरोप लगाने वाले को ही उठाना पड़ता है! आगे पढ़ें ………………. .http://ekbat.blogspot.com/2009/07/blog-post.html

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लड़किया चलाएंगी छुरियां

भारत का पुलिस महकमा कितना दुरूस्त है इसका नजारा आए दिन यहां की सड़कों पर देखने को मिलता है। अब तक तो यह सुनने में मिलता था कि पुलिस किसी दबे कुचले रिपोर्ट को लिखने में ही आनाकानी करते हैं लेकिन ठहरिए अब वह अपनी जिम्मेदारी से भी बचते नजर आएंगे। गुजरात पुलिस ने यह साफ किया है कि लड़कियां बाहर निकलें तो अपने साथ मिर्ची पाउडर और चाकू लेकर चलें। तो इसका सीधा सा अर्थ यह निकाला जाय कि हमारी पुलिस हाथ पर हाथ धर कर बैठी रहेगी।
कहीं कोई हादसा हो जाए तो पुलिस आराम से अपना बहाना खोज लेगी। समय से पहुंच जाएं ऐसा यहां होता नहीं क्योंकि शायद लेट से आना इनकी फितरत में शामिल है। एक नादान बच्ची, जिसे चोरी क्या है इसकी भी जानकारी नहीं है, को खुलेआम पुलिस घसीट कर पीटने से बाज नहीं आती है पर कोई तथाकथित समाज के ऊंचे लोग किसी महिला के साथ कोई बदसलूकी करें तो उसके खिलाफ कार्रवाई करने में कानूनी धारा पर शोध करना शुरु कर देते हैं।
दूसरों को शराब सबाब से दूर रहने की सालाह देने वाले ये लोग खुद ही सड़कों पर टल्ली होकर घूमते दिख जाते हैं। समाज को सुधारने के बजाय ये कई बार ऐसे ऐसे गुल खिलाते हैं की इंसानियत ही शर्मसार हो जाए।आजकल महिलाओं के साथ छेड़छाड़ बलात्कार जैसी घटनाओं में दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की हो रही है। इसके बावजूद पुलिस ने एक सर्कुलर जारी कर लड़कियों को अपने साथ छोटा चाकू और मिर्ची पॉडर रखने की सलाह दी है साथ ही देर रात घर से नहीं निकलने की भी सलाह दी है। आपको याद होगा कि यह तो पुलिस का सर्कुलर है लेकिन कुछ महीने पहले दिल्ली की महिला मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी यह कह डाला था कि महिलाओं को रात्रि में निकलने की क्या जरुरत है। यह तो मानसिकता है हमारे प्रशासन और गुजरात पुलिस इस तरह के सर्कुलर जारी अपने कर्तव्य से मुह फेरना चाहती है। इन्होने ये सलाह तो दे दी की लड़कियां अपने साथ चाकू रखे पर इसकी क्या गारंटी है कि इनका निशाना कोई मनचला ही होगा और निशाना लगाने के बाद इनपर कोई कार्रवाई नहीं होगी क्या इसका विश्वास भी ये दिला रहे हैं। अगर हर लड़की इस तरह से अपनी रक्षा खुद ही कर ले तो इन रखवालों का क्या काम है। http://deo4priya.blogspot.com/2009/08/blog-post.html

अब तक कई चिट्ठाकार इस प्रकार की पोस्ट को चिट्ठाचर्चा नाम से लगाते आए हैं। बाकायदा इस नाम से ब्लॉग भी चलाया जा रहा हैलेकिन इस कड़ी में हमारा यह प्रयास एक मामले में भिन्न हैवो इस प्रकार कि हमने उन्ही लोगों को चुना है जो बिल्कुल हीं नए हैंइनमें से अधिकांश चिट्ठों की पहली पोस्ट को उठाया गया हैआशा है इसे आप पसंद करेंगे और इन नवागंतुकों का उत्साह भी बढेगाजय हिंद !!