>२६/११ की बरसी पर ! ……कुछ भी कर लो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता !

>* आज तो टीवी वाले खूब मोमबत्तियां जलवा रहे हैं , २६/११ की बरसी पर ! मोमबत्ती की रौशनी से आतंकी घबरा जायेंगे जैसे ड्राकुला    उजाले से डर कर भाग जाता है !

*कोई कॉल करवा रहे है राष्ट्र के नाम ……. और ये पैसा देंगे भारतीय पुलिस को ! लगता है सरकारी फंड कम पड़ गया है !
*जगह-जगह पर गीत-संगीत के कार्यक्रम प्रस्तुत किये जा रहे हैं ! यह बताने के लिए कि कुछ भी कर लो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता !
 
अच्छा धंधा बना दिया है सम्वेदना के नाम पर ! आतकवाद से लड़ेंगे जंतर मंतर ,इंडिया गेट, गेटवे ऑफ़ इंडिया जैसे जगहों पर मोमबत्तियां जला कर ! २६/११ की दुखद और शर्मनाक घटना को राष्ट्रीय शोक के बजाय राष्ट्रीय पर्व बना दिया है जैसे कोई गर्व का विषय हो ! २०२० में संसार की महाशक्ति बनने का सपना देखने वाले देश में घुसकर चंद आतंकी तीन दिनों तक कहर मचाते हैं …… हमले को पहले से रोकने की बात दूर , भारत द्वारा अमेरिका से मदद मांगने की खबर आती है ………….अंततः सुरक्षा एजेंसियां काफी मशक्कत के बाद उस पर काबू पाती है ……. संपत्ति तबाह होती है ………. लोगों की जानें जाती है ……. सेना के जवान और पुलिस कर्मी शहीद हो जाते हैं …………… नेताओं की राजनीत शुरू हो जाती है …….. सरकारी प्रतिष्ठान एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं ……… एक मंत्री कहता है बड़े देशों में ऐसी छोटी बातें होती रहती है …………… जनता की संवेदनाओं को मोमबत्तियों के मोम में पिघला कर सरकार अपने कर्तव्यों से छुट्टी पाती है ………………………..आज उस राष्ट्रीय शर्म की बरसी पर नेता , मीडिया , टेलीकोम कम्पनियाँ सब के सब अपनी -अपनी रोटी शेक रहे हैं ……………. हम ख़ामोशी  से सब बर्दाश्त करने पर अमादा  है …………….. एक दिन मोमबत्ती जलाकर ,एक विशेष कंपनी के नंबर से  कॉल करके , फ़िल्मी सितारों के कार्यक्रम में शामिल होकर हम आतंकवाद  से लड़ाई लड़ रहे हैं …..क्योंकि हम सहिष्णु लोग है  ……. महात्मा गाँधी के देश से हैं ………..जहाँ एक गाल पर मारने से लोग दूसरा गाल बढा देते हैं …………. हम पर फ़िर हमला करो कोई गम नहीं …………. हम उत्सवधर्मी लोग हैं …………… एक और उत्सव बढ़ जायेगा ……………… डरने की बात नहीं है ……….. सांसद पर हमला हुआ ……….हमने कुछ किया नहीं न ……………….. सजाप्राप्त आरोपी अब भी जिन्दा है जिसे आज नहीं तो कल माफ़ी मिल जाएगी ………… २६/११ हुआ हमने कुछ किया ……नहीं ना ………. आरोपी कसब हमारे यहाँ जेल में मज़े कर रहा है ……………. आगे भी हमला होगा हम कुछ खास नहीं करेंगे …………… फ़िर मोमबत्तियां लेकर सडकों पर निकल जायेंगे शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने …………….. अरे जब भय-भूख -भ्रष्टाचार जैसे आतंरिक  मामलों में हम कुछ नहीं करते तो तुम क्यों चिंता करते हो ……………. दुबारा आना और इससे बड़ा आतंकी काण्ड  करना ……….फ़िर भी हमारी एडजस्टमेंट से  जीने की कला को नहीं छीन पाओगे , इस कला में हम भारतवासी महारथी है …………………….

>चीन की चाल को समझ ले सरकार

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किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता और समृद्धि के स्थायित्व में उसके पड़ोसियों का अप्रत्यक्ष ही सही लेकिन महत्वपूर्ण योगदान होता है . क्योंकि पड़ोसी देश का सहयोगात्मक रवैया एक राष्ट्र को निश्चित रूप से मजबूती प्रदान करता है .अगर वह उदासीन हो तो भी एक देश बगैर नफे -नुक्सान के अपना हित दूसरो के साथ साध सकता है .लेकिन वही पड़ोसी यदि विरोधपूर्ण रवैया अपनाए तो उस देश के समग्र विकास का रास्ता अवरुद्ध हो जाता है .और पड़ोसी देश खुद आतंरिक अशांति से जूझ रहा हो तो परेशानी और भी बढ़ जाती है .इन दिनों भारत को पड़ोसी देशों से उत्पन्न कुछ ऐसी हीं परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है .हमारे सामने एक ओर जहाँ चीन द्वारा पैदा की गयी परेशानियाँ है ,वहीँ दूसरी ओर खुद चरमपंथियों से जूझ पाकिस्तान द्वारा उत्पन्न हो रही दिक्कतें हैं .
                                                                          चीन की बात करें तो , हमारे संबंध हमेशा से अविश्वासपूर्ण और तक़रीबन उदासीन से रहे हैं .हाल के दिनों में चीन का रुख भारत के प्रति कटुता और धमकी से भरा हो चला है .मसलन, सीमा पर सेना का युद्धाभ्यास ,अरुणाचल और लद्दाख क्षेत्र को लगातार अपने नक्शे में दिखाना आदि .पिछले कुछ दिनों में चीन ने एक कूटनीतिक अस्त्र के रूप में ‘दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को क्षति पहुँचाना’ को प्रयुक्त करना शुरू किया है .नेपाल में उसने मुलभुत निर्माण कार्यों में ठेका हासिल करना और आर्थिक मदद करना आरम्भ किया है ,साथ हीं मंडेरिन भाषा सिखाने वाले कई केंद्र भी बनाये हैं ,जो निश्चित तौर पर नेपालियों के दिलों से भारत को विलग करने की दूरगामी पहल है .इसके अलावा उसने श्रीलंका में भी बड़े स्तर पर पाँव पसारने का काम किया है ,चीन ने हनबनोता बंदरगाह के विकास और नवीनीकरण का काम हासिल किया ,हथियारों से जुड़े समझौते किये ,जो सीधे -सीधे भारत की कूटनीतिक क्षति है .म्यांमार के सैन्य शासन को अप्रत्यक्ष सहयोग भी उसके भारत विरोधी नीति का एक आयाम है .पाक-चीन के संबंध को लेकर कुछ कहने की जरुरत नहीं है .इस पूरे प्रहसन की पटकथा हीं भारत विरोधी साजिश की भाव-भूमि पर लिखी गयी है . वस्तुतः यही कहा जा सकता है कि हमें अपनी आतंरिक सुरक्षा ,आर्थिक विकास और सामरिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत के समग्र विकास के लिए आँख-कान खुले रखने चाहिए .क्योंकि वैश्विक मंच पर हमारी सशक्त उपस्थिति पड़ोसियों से मजबूत और सुसंगत समीकरणों के बाद हीं संभव हो सकती है .
सुन्दरम आनंद {राजनीतिक विश्लेषक है }

>बलूचिस्तान पर मनमोहन का साझा बयान नीतिगत बचकानेपन की निशानी

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पिछले दिनों ‘शर्म अल शेख ‘ में मनमोहन सिंह इसी ऐतिहासिक भूल की पुनरावृत्ति करते नज़र आए । पाकिस्तान की प्रधानमंत्री युसूफ रज़ा गिलानी के साथ हुई शिखर वार्ता में उन्होंने ‘बलूचिस्तान के मामले ‘को शामिल कर ‘नीतिगत बचकानेपन’ का परिचय दिया । और २६/११ के बाद वैश्विक मंच पर भारत को प्राप्त सहानुभूति और समर्थन को एक झटके में तार-तार कर दिया । साथ ही भारत के शान्ति और सौहाद्र समर्थक राष्ट्र की छवि को भी धूमिल कर दिया । आगे इस आलेख को पढ़ें http://www.janokti.com पर ।

>माओवादियों के बरगलाये लोगों द्वारा अपनी जड़ों पर चोट

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नेपाल में हिन्दी विरोध कोई नई बात नहीं है। यह बात भी अब कोई छिपी बात नहीं रह गई है कि यहां हिन्दी विरोध का तात्पर्य भारत विरोध से है। नेपाल के उपराष्‍ट्रपति श्री परमानंद झा द्वारा हिन्दी में शपथ लेने का प्रसंग हो या फिर अभी-अभी नेपाल के शिक्षामंत्री द्वारा हिन्दी में भाषण का मामला हो। मौका मिलते ही माओवादियों द्वारा भारत विरोध को हवा देने में कोई कोताही नहीं बरती जाती। श्री पशुपतिनाथ मंदिर के परम्परागत पुजारियों का मामला हो या फिर नेपाल में प्रवेश करने वाले भारतीय वाहनों को रोकने, तोड़ने व आग लगाने का मामला हो, सभी के पीछे का निहितार्थ है – भारत विरोध। फिल्म अभिनेता ऋतिक रोशन की कोई सामान्य टिप्पणी हो या फिर चांदनी चौक से चायना तक फिल्म का मामला या फिर हिन्दी फिल्मों के विरोध का मामला हो। इन सब का विरोध यानि भारत विरोध है; और मजे की बात तो यह है कि जब भी नेपाल में हिन्दी का विरोध होता है, अधिकाशत: तथाकथित नेपाली बुद्धिजीवी, पश्चिमी संरक्षण प्राप्त मीडिया, माओवादी व अन्य दलों के कुछ नेतागण फुले नहीं समाते। इनकी वाणी और लेखनी हिन्दी विरोध की आग में घी डालने का बखुबी काम करती है।
माओवादियों द्वारा ‘कौआ कान ले गया’ चिल्लाते ही कुछ विशेष वर्ग के लोग अपने कान को नहीं टटोलते बल्कि कौए के पीछे कांव-कांव करते हुए अंधाधुंध भागते नजर आते हैं। अब अहम सवाल यह है कि क्या हिन्दी व भारत से नेपाली भाषा व नेपाल को सचमुच खतरा है? क्या, महज भारत विरोध की इन नीतियों से नेपाल का भला होगा?
जहां तक हिन्दी व नेपाली भाषाओं का सवाल है- दोनों की लिपि एक है, दोनों की जननी (संस्कृत) एक है। नेपाली साहित्य में संस्कृत व हिन्दी के शब्दों को अधिकारिक मान्यता है। हिन्दी, मैथिली, भोजपुरी, गुजराती, बंगाली, मारवाड़ी, कुमांऊनी, गढ़वाली आदि भाषाओं का नेपाली भाषा से बेहद मेल है। ऐसे अनेक शब्द हैं जो इन सभी भाषाओं में सामान्य रूप से प्रचलित हैं। टोन व उच्चारण में थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है । उदाहरण के लिए अगर किसी को पूछना है कि-”कैसे हो”, तो नेपाली में पूछेंगे-कस्तो छौ, गुजराती में – केम छो, मारवाड़ी में – कैंया छे, बंगाली में – केमन आछो, भोजपुरी में – कइसन वाड़, मैथिली में – केना छी आदि। वास्तव में इन भाषाओं में न तो कोई आपसी द्वेष है और न ही कोई क्लेश। हिन्दी के विकास व समृद्धि से नेपाली भाषा और फलेगी और फूलेगी। तथा नेपाली भाषा के फलने फूलने से देवनागरी की बगीया और सुगन्धित होगी। चूंकि भाषा से साहित्य की रचना होती है तथा साहित्य समाज का दर्पण होता है। अत: भाषाएं जितनी विकसित होगी उसका साहित्य भी उतना ही विकसित होगा। विकसित साहित्य से समाज को अच्छा दर्शन व दिशा प्राप्त होती है। जिस प्रकार पानी और चीनी समरस होकर षरबत बनता है। पानी में चीनी विलय होते ही चीनी अदृश्‍य प्रतीत होता है परंतु पानी को पीते ही उसमें चीनी का स्वाद व मिठास होता है अर्थात् दोनों का अस्तित्व सुरक्षित रहता है। लेकिन जिसको मधुमेह का रोग लगा हो उसके लिए तो यह परहेज ही है न। इसी प्रकार नेपाल के माओवादी, कथित बुद्धिजीवी, कुछ मीडिया व अन्य दलों के कुछ नेता या तो चीनी (चीन) मधुमेह, या पश्चिमी मधुमेह के रोग से ग्रसित हैं।
माओवादी नेता भली-भांति जानते हैं कि हिन्दी से नेपाली व नेपाली से हिन्दी की जड़े और मजबूत होंगी। इससे दोनों देशों के संबंध और मधुर व मजबूत होंगे। इससे नेपाल व भारत दोनों को बल मिलेगा। दोनों सशक्त व सुरक्षित होगें। परस्पर सहयोग से दोनों और अधिक विकसित होगें।
लेकिन वे इस सच्चाई को भी भली-भांति जानते है कि दोनों देशों के सामाजिक, सांस्कृतिक व भाषाइक रिश्‍ते जितने प्रखर व मजबूत होंगे, उतना ही माओवादियों के राजनैतिक अस्तित्व को खतरा होगा। इनके आका चीन केवल नाराज़ ही रही होगा बल्कि हुक्का पानी बंद कर देगा। फिर तो इनका बजूद ही समाप्त हो जाएगा। क्योंकि एक विकसित, समृद्धि और सशक्त नेपाल में माओवाद व कट्टर साम्यवाद के लिए कोई जगह नहीं रहेगा। विश्‍व में जहां-जहां गरीबी व पिछड़ापन है, वहां-वहां किसी न किसी रूप में माओवाद या कट्टर साम्यवाद जिंदा है। अन्यथा अपने जन्मभूमि पर ही कट्टर साम्यवाद दम तोड़ चुका है।
पिछले वर्ष नेपाल के प्रधानमंत्री श्री पुष्‍पकमल दाहाल (प्रचण्ड) भारत यात्रा पर आए थे। उस समय उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की थी कि ”भारत व नेपाल की सांस्कृतिक जड़ें मजबूत है, गहरी है व एक है। प्राचीन काल से दोनों की धर्म-संस्कृति समाज व पूर्वज एक हैं दोनों देशों के इन प्राचीन संबंधों को कोई मिटा नहीं सकता। हम (माओवादी) भी नहीं”। श्री प्रचण्ड ने खुद स्वीकार किया कि ”प्रत्येक पांच में से एक नेपाली नागरिक अपनी जीविका उपार्जन के लिए भारत में रहता है व काम करता है। इसका अर्थ हुआ नेपाल के 20 प्रतिशत आबादी अपनी रोजी-रोटी के लिए सीधे-सीधे भारत में रहती है। यह भी सत्य है कि भारत में रहने व रोजगार के लिए इनका हिन्दी में निपुण होना आवश्‍यक है। इसके उपरान्त शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, सैन्य सेवा व अन्य क्षेत्रों से संबंधित लाखों नेपाली नागरिक भारत पर निर्भर हैं। ऐसे में नेपाल में हिन्दी का विकास, हिन्दी में शिक्षा-दीक्षा आदि से सीधे तौर पर नेपाल को ही लाभ है। भारत ने 90 के दशक में बेहिचक नेपाली भाषा को भारतीय संविधान के आठवें अनुसूचि में ससम्मान शामिल किया। इससे भारत कमजोर नहीं हुआ है। बल्कि और मजबूत हुआ है। भारतीय व नेपाली दोनों मूल के नेपाली भाषियों को अधिकार व सम्मान प्राप्त हुआ है। वैसे भी किसी भी नेपाल के नागरिक को भारत में विदेशी नहीं माना जाता और न ही कोई भी भारतीय को नेपाल में विदेशी माना जाता है।
जहां तक हिन्दी विरोध का सवाल है, हिन्दी को भारत में भी अनेक स्थानों पर विरोध का सामना करना पड़ा है। जैसे तमिलनाडु, बंगाल, नागालैण्ड, मिजोरम इत्यादि। तमिलनाडु व नागालैण्ड-मिजोरम में तो देवनागरी लिपी तक को जलाने में कोई परहेज नहीं किया गया। परंतु आज सबसे अधिक, दूर शिक्षा के माध्यम से, हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या तमिलनाडु में है। इसी प्रकार आज नागलैण्ड सरकार ने राज्य में हिन्दी शिक्षा को अनिवार्य किया है। कारण हिन्दी विरोध के कारण यहां एक बड़ी संख्या को राष्‍ट्रीय स्तर पर रोजगार प्राप्ति में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था।
आश्‍चर्य है कि नेपाल में हिन्दी का विरोध तो खूब किया जाता है। परंतु अंग्रेजी व उर्दू के प्रति इन विरोधियों का प्रेम बढ़ते जा रहा है। हिन्दी से संस्कृति व परम्पराओं को कोई खतरा नहीं है जबकि अंग्रेजी व उर्दू से खतरा है। एक और आश्‍चर्य की बात है – चीन ने उत्तरी नेपाल के एक बढ़े भू-भाग पर कब्जा जमाए हुए हैं। आये दिन नेपाल तिब्बत बार्डर को सील कर देता है। नेपाल की दैनन्दिन राजनीति में चीन का सीधे हस्तक्षेप कर रहा है। फिर भी उसके विरूद्ध नेपाल में स्वर नहीं उठते क्यों?
नेपाल में अब तक केवल हिंदी विरोध का मामला दिखाई देता था परंतु अब नेपाली भाषा का भी विरोध शुरू हो गया है। इसके पीछे माओवादी नेताओं का हाथ है। आज नेपाल में नेपाली के समकक्ष उर्दू सहित 11 अन्य भाषा को मान्यता देने की मांग जोर-शोर से उठ रही है। इसके लिए आंदोलन खड़े किए जा रहे है। यह तर्क दिया जा रहा है कि नेपाल में नेपाली भाषा बोलने वालों की संख्या 48 प्रतिशत है। अत: अन्य 11 भाषाओं को राज्य स्तरीय भाषा का दर्जा देने की मांग जायज है। ये तत्व, नेपाल को भाषाई विवादों में डालकर अपने ही जड़ों पर प्रहार कर रहे है। भानुभक्त द्वारा स्थापित भाषाई एकता व पृथ्विनारायण शाह (राजस्थान के शिशोदिया बंग के राजा) द्वारा एकीकृत नेपाल कहीं बिखर न जाए। बिखरा हुआ नेपाल चीन के लिए हितकर व भारत-नेपाल के लिए अहितकर होगा।
:- अशोक चौरसिया-अखिल भारतीय सचिव, नेपाली संस्‍कृति परिषद्)