>सोचते किस भाषा में हैं?

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बहुत से फ़िल्मी सितारे लंदन आते रहते हैं. उनमें से बहुत कम हैं जो सहजता से हिंदी बोल पाते हों.
जो भाषा आपको रोज़ी-रोटी मुहैया करा रही है उससे ऐसी विमुखता?
लेकिन बात विदेश की ही क्यों क्या भारत में ऐसा नहीं है?
राजधानी या शताब्दी एक्सप्रेस से सफ़र करते हुए जब मैंने हिंदी अख़बार की मांग की तो अटेंडेंट को जाकर मेरे लिए अख़बार लाना पड़ा.
आज़ादी के साठ साल बाद आज भी अंग्रेज़ी बोलना गर्व और हिंदी बोलना शर्म की बात क्यों है?
क्या आने वाली पीढ़ी हिंदी के समृद्ध साहित्य से परिचित भी हो पाएगी? हम अपने बच्चों को इस विराट विरासत से महरूम क्यों कर रहे हैं ?  

>हिन्दी की शोकसभा में गये थे क्या ?

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आज तथाकथित  हिंदी दिवस है . ब्लॉग -जगत से लेकर जनसत्ता के सम्पादकीय पृष्ठ पर  भारत के माथे की बिंदी हिंदी की दुर्दशा का बयान किया गया . अचानक से सितम्बर जो कि खुद अंग्रेजी का महीना है , के इस पखवाड़े में हर तरफ लोग हिंदी के भविष्य को लेकर चिंतित हैं. सभी सरकारी उपक्रमों के दफ्तरों के  आगे बड़े-बड़े बैनर लगे पड़े हैं .विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित तरह -तरह  की शोकसभाओं में प्रखर वक्ताओं ने जाने क्या -क्या कहा होगा ! ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा . कई बड़े -बड़े हिंदी हितैषी लोग काफी कुछ लिख चुके हैं . लेकिन एक सवाल कि क्या किसी भी काम को करने का कोई खास दिन होता है ? कितने सजग हैं हम ! हिंदी की चिंता  साल में एक दिन करते आये  हैं, विश्व हिंदी सम्मलेन में कुछ चाटुकारों को विदेश यात्रा करवाते रहे हैं , करोडों रूपये हिंदी इस्तेमाल के लिए अपील करने वाले विज्ञापन पर खर्च करते आये हैं  और इन सब का नतीजा हमारे ही अनुसार सिफर है !
हिंदी को सर्वप्रचलित करने के ये तमाम प्रक्रम एक दिवस रूप में सिमटे हुए दम घोट रहे हैं . हिंदी खुद को एक दिन की भाषणबाजी में निपटाते देख कर आंसू बहा रही है . तो क्या आप सुधीजनों के पास इन आंसुओं का है कोई जबाव ?