>क्या पीड़ितों को न्याय मिलेगा

>भोपाल को लेकर कांग्रेस में घमासान मचा हुआ है। पच्चीस साल बाद एक निर्णय आने के बाद दोषी कौन की तर्ज पर बयानों का ढेर लग गया है। पच्चीस वर्षों से खामोश बैठे कई तथाकथित ईमानदार अधिकारियों में भी सहसा साहस का संचार हो गया। शायद सेवा निवृत्ति के बाद अब उन्हें किसी का डर नहीं रहा इसलिए अपने पुराने आकाओं के आदेश उन्हें याद आने लगे हैं। आज हर कोई एंडरसन को भारत से भगाने की सुनियोजित साजिश का सत्य देश के सामने रखने को उत्सुक नजर आ रहा है। कुछ पत्रकारों ने मिसेज एंडरसन को भी खोज निकाला है और उनसे भोपाल त्रासदी का हिसाब मांग रहे हैं।

लेकिन पच्चीस साल से ये लोग कहां थे। चंद लोगों को छोड़ कर किसी को भोपाल के लोगों की याद नहीं आई, बस उसके बारे में कतरनों में खबरें छपती रही और हम उन्हें पढ़कर रद्दी के ढेर में डालते रहे। आज एक निर्णय आता है दो साल की कैद और दो लाख का जुर्माना, फिर 25000 के मुचलके में रिहाई और देश में तूफान मच जाता है। फिर शुरू होता है भोपाल त्रासदी से संबंधित खबरों के आने का सिलसिला। एक के बाद एक सनसनीखेज खबरें। लगता ही नहीं कि आ रही खबरें इसी देश की है और पच्चीस साल से हम इन खबरों से महरूम थे। कोई भी न्यूज चैनल लगाइए भोपाल की खबर दे रहा है। कोई वारेन एंडरसन के आधे-अधूरे मुचलके की कापी दिखा रहा है…कोई बता रहा है कि वो धारा 304 में बुक था इसलिए उसे सेशन कोर्ट से ही जमानत मिल सकती थी। अर्जुनसिंह ने पैसा खाकर उन्हें अपने विशेष विमान से दिल्ली पहुँचा दिया ताकि वे आराम से भोपाल के झंझट से मुक्त होकर अमेरिका जा सकें। कलतक सभी कांग्रेसी एंडरसन के देश से भागने के मामले में अर्जुन सिंह पर अपना ठीकरा फोड़ रहे थे। तभी सीआईए की एक रिपोर्ट आ गई जिसके अनुसार राजीव गांधी ने एंडरसन को इसलिए देश से सुरक्षित निकलने दिया ताकि देश के औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए आने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आने में कोई बाधा न आए। इस खुलासे के बाद पूरी कांग्रेस पार्टी राजीव गांधी के बचाव में खड़ी हो गई सभी कह रहे हैं यह सही नहीं है!!! तो फिर सच क्या है? अर्जुनसिंह तो खामोश हैं, वे कुछ बोले तो शायद कुछ नए सच सामने आएं। बेटी कह रही है सही समय आने पर बोलेंगे, वो सही समय कब आएगा भगवान जाने या अर्जुनसिंह जाने।

पूरी स्थिति इतनी उलझी हुई है कि कुछ समझ नहीं आ रहा कि सच क्या है झूठ क्या। सहसा विपक्ष भी कांग्रेस पर हमला करने के लिए अपने अपने दड़बों से निकल आया है, अब इन नेताओं पर कौन और कैसे विश्वास करे क्योंकि पच्चीस साल तक छोटी-छोटी बात के लिए संसद में हंगामा करने वाले ये नेता इतने साल तक चुप क्यों रहे? क्या मजबूरी थी इनकी? कोई नहीं जानता। कांग्रेसी नेता सत्यव्रत का ये कहना और भी हास्यास्पद है कि यह राज्य का मामला था, पच्चीस हजार मौतें, छह लाख प्रभावित और मामला राज्य का, निर्णय राज्य के, केंद्र की कोई भूमिका ही नहीं। गोया भोपाल भारत का नहीं किसी और देश का हिस्सा हो, जहां पर हुई त्रासदी पर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर सब खामोश हो गए या अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लग गए?

जिस तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत आ रही है और केंद्र सरकार अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि दुर्घटना होने की स्थिति में उत्तरदायित्व किस पर आएगा। उल्टे समाचार तो ये आ रहे हैं कि यूनियन कार्बाइड के प्लांट को खरीदने वाले Dow Chemicals के अध्यक्ष को इस सरकार ने 2006 में ही यह आश्वासन दे दिया था कि भोपाल दुर्घटना के लिए उनकी कोई liability नहीं होगी। यहां तक की वो गैस लीक होने वाले स्थल पर फैले कचरे को साफ करने के लिए आवश्यक रु.100 करोड़ तक देने को भी राजी नहीं है। और इस विषय पर पक्ष-विपक्ष एक है। भाजपा के अरुण जेटली इस कंपनी के वकील हैं और भाजपा के रविशंकर उनका बचाव कर रहे हैं कि वे जो कुछ कर रहे हैं वो सही है राजनीति और व्यवसाय को जोड़ा नहीं जा सकता। यही बात सलमान खुर्शीद भी कह रहे है, मतलब इस मुद्दे पर नेताओं में मतभेद नहीं है।

आज सीबीआई अपनी गलती मान रही है कि इस केस में उससे गलती हुई और वो इसे सुधारेगी, पर विडम्बना देखिए कि सुप्रीम कोर्ट के जिस चीफ जस्टिस अहमदी ने यूनियन कार्बाइड पर गैर इरादतन हत्या के आरोप को हटा कर क्रिमिनल नेगलिजेन्स का आरोप कर दिया था जिसके तहत अधिकतम दो वर्ष की सजा ही हो सकती थी, आज यूनियन कार्बाइड द्वारा मिले फंड से बने भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट के प्रमुख हैं। क्या यह मात्र संयोग है या सोची-समझी नीति!!!!

हमारे देश के नेताओं ने भोपाल पीड़ितों के पक्ष में कभी आवाज नहीं उठाई, उल्टे मुआवजे को कम करते हुए कोर्ट के बाहर ही समझौता कर लिया और दुर्भाग्यपूर्ण बात तो ये हैं कि ये पैसा अभी तक पीड़ितों को नहीं मिल पाया है, एक बड़ी राशि अभी तक बैक में पड़ी है। जितनी दोषी यूनियन कार्बाइड है उससे ज्यादा दोषी कांग्रेस है जिसने पूरे मामले कमजोर बनाने अपनी कोशिश लगा दी।

भारत एक राजनीति प्रधान देश है। यहां हर चीज में राजनीति होती है। नेताओं में दृढ़ता का नितांत अभाव है। वे सुपर पावर बनने ख्वाब तो देखते हैं, पर दृढता से अपनी बात कहना नहीं जानते और कही अमेरिका जैसा देश इनके सामने हो तो इनकी तो बोलती ही बंद हो जाती है। ये घरेलू जोड़-तोड़ की कला में तो माहिर हैं, पर ओबामा की तरह कड़क कर अपने नागरिकों के पक्ष में बात नहीं कर सकते। ये नहीं कह सकते कि पांच सौ डॉलर की राशि गैस पीड़ितों के लिए कम है, हमें यूनियन कार्बाइड से उचित मुआवजा मिलना चाहिए।

इस केस में किसी एक व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हमारा सिस्टम ही दोषपूर्ण है। जिसे प्रत्येक राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए तोड़ता मरोड़ता है। जरूरत सिस्टम बदलने की है। किसी की मौत की कीमत अदा नहीं की जा सकती, पर उसके परिवार को भविष्य का सहारा तो दिया ही जा सकता है। कहां है वो नैतिकता, भारतीय संस्कृति जिसकी हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। ये कैसी संस्कृति है जिसमें सब कुछ होता है, बस पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता।

प्रतिभा.

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>क्या ये जनद्रोही नहीं हैं ??????????

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सभी चित्र दैनिक भास्कर से साभार

घड़ियाली आँसू

कौन लेकर रहेगा इंसाफ ?26 साल पहले ये सब कहाँ थे जब भोपाल के चंद कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, समाजसेवियों ने गैस पीड़ितों के कंधे से कंधा मिलाकर उनके लिए संघर्ष किया, पुलिस प्रशासन का अत्याचार सहा, लाठियाँ खाई, जेल तक गए। तब ये सारे घड़ियाली आँसू बहाने वाले लोग कहाँ थे ?
मध्यप्रदेश की सत्ताधारी पार्टी और उसके सांसद विधायक तत्कालीन कांग्रसी नेताओं को कटघरे में खड़ा कर उनके मज़े ले रहे हैं। सच्चाई यह है कि उनके दामन भी उतने ही दागदार हैं जितने कांग्रसियों के। इन 26 सालों में केन्द्र में और मध्यप्रदेश में भी भाजपा की सरकार लम्बे समय तक रहीं, उन्होंने इस मुदृदे पर क्या किया यह भी जगजाहिर है।  हर बार चुनाव आने पर उन्होंने पूरे भोपाल को मुवावज़ा बटवाने का सपना दिखाकर वोट हासिल किए।
अब जब कि सारी बातों का खुलासा हो गया है क्या शिवराज सरकार में नैतिक साहस है कि वे सरकारी मशीनरी के उन तमाम  अफसरों और राजनीतिज्ञो के ऊपर शिकंजा कसे जिन्होने भोपाल की जनता के साध विश्वासघात किया ?
 
 और भी ना जाने कौन कौन ? 

क्या ये जनद्रोही नहीं हैं ??????????
इन सब को सज़ा कौन देगा ???

>ये हैं नाइन्साफी के जवाबदेह

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भोपाल के गैस पीड़ितों ने उनके साथ हुई नाइन्साफी के लिए इन लोगों को जिम्मेदार ठहराया है
(फोटो दैनिक भास्कर से साभार)
क्या क्या हुआः-
-घनी आबादी के बीच में अमानक स्तर का कारखाना चलाने देने, और खतरनाक, पाबंदी वाले उत्पादनों का कारोबार बेराकटोक चलते रहने देने के लिए आज तक किसी को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास राज्य और केन्द्र सरकार की तरफ से नहीं हुआ।जबकि इस मामले में दोषी औ?ोगिक इन्सपेक्टर से लेकर तत्काली मुख्यमंत्री तक सबको कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।
-हादसे के बाद गैस पीड़ितों की किसी भी प्रकार की कानूनी लड़ाई को लड़ने का अधिकार अपने हाथ में लेकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने गैस पीड़ितों के हाथ काट दिए।

– गैस त्रासदी  की विभिषिका को वास्तविकता से बेहद कम आंका जाकर अदालत के सामने प्रस्तुत किया गया।ताकि यूनीयन कार्बाइड सस्ते में छूटे।

-मरने वालों और प्रभावितों की संख्या को काफी कम दिखाया गया।ताकि यूनीयन कार्बाइड को कम से कम आर्थिक नुकसान हो।

-गैस के ज़रिए फैले ज़हर के बारे में जानकारियाँ छुपा कर रखी गई, कारण गैसपीड़ितों के शरीर पर पडने वाले दूरगामी परिणामों संबंधी समस्त शोधों को छुपाकर रखा गया ताकि यूनीयन कार्बाइड को लाभ पहुँचे।

-हादसे के बाद दोषियों को बचाने की भरपूर कोशिश की गई।जिसमें एंडरसन को बचाने का अपराध तो जगजाहिर हो गया है।
भोपाल की आम जनता को मुआवज़ा और राहत के जंजाल में फंसाकर वास्तविक समस्याओं से उनका ध्यान हटाया गया और इसमें दलाल किस्म के संगठनों ने विदेशी पैसों के दम पर अपनी  भूमिका निभाई।
-अब भी जब बेहद कम सज़ा पाने के कारण देश-दुनिया में नाराज़गी है चारों ओर घड़ियाली आँसू बहाए जा रहे है, समितियाँ बन रहीं है।इसमें मीड़िया और प्रेस भी शामिल है जिसने 26 सालों तक इस मामलें को जनता की स्मृति से धोने का काम किया।
-आगे और लम्बे समय तक एक और मुकदमें में मामले को ले जाने के कोशिशें हो रहीं हैं, ताकि तब तक तमाम दोषी मर-खप जाएँ और मामला शांत हो जाए।
यह सब कुछ नहीं होता अगर गैस पीड़ितों को एक सशक्त आंदोलन अस्तित्व में होता। भोपाल की गैस पीड़ित आम जनता को यदि सही तरह से संगठित किया जाता तो ना गैस पीड़ितों में दलाल संगठन पनप पाते, ना राजनैतिक दलों द्वारा मामले को दबाने के प्रयास हो पाते, ना सरकारी मशीनरी को मनमानी करने की छूट मिल पाती और ना ही शासन-प्रशासन के स्तर पर देशदोह श्रेणी का अपराध करने की हिम्मत होती।

>भोपाल गैस त्रासदी-कानून का रास्ता पकड़ने वाले जन आंदोलनों के लिए महत्वपूर्ण सबक

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26 साल के लम्बे इन्तज़ार के बाद आखिर भोपाल गैस त्रासदी के अपराधियों पर चल रहे मुकदमें का अपेक्षित फैसला आ गया। जिस गंभीर आपराधिक मामले में राज्य और केन्द्र सरकार की एजेंसियाँ शुरु से ही अपने पूँजीवादी वर्ग चरित्र के अनुरूप अपने साम्राज्यवादी आंकाओं को बचाने में लगी थी, उसका हश्र इससे कुछ जुदा होता तो ज़्यादा आश्चर्य की बात होती।

भोपाल गैस त्रासदी उन्ही दिनों की बात है जब भूमंडलीकरण के साम्राज्यवादी षड़यंत्र के रास्ते अमरीका और दीगर मुल्क दुनिया के गरीब मुल्कों में पांव पसारने पर आमादा हो गए और इससे हमारे देश के पूँजीपतियों को भी दुनिया के दूसरे देशों में अपने पांव पसारने का मौका मिला। ऐसे में हज़ारों लोगों की बलि लेने वाली और लाखों लोगों को जीवन भर के लिए बीमार बना देने वाली अमरीकी कम्पनी यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन और उसकी भारतीय ब्रांच यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड को नाराज़ करके तत्कालीन राजीव गांधी सरकार भारतीय पूँजीपतियों की विश्वव्यापी कमाई को बट्टा कैसे लगा सकती थी ? लिहाज़ा भोपाल की आम जनता को निशाना बनाया गया। गैस त्रासदी के भयानक अपराध से संबंधित किसी भी तरह की न्यायिक कार्यवाही को बाकायदा  कानून पास करके केन्द्र सरकार ने अपने हाथ में ले लिया और भोपाल की आम जनता की आवाज को कुंद कर दिया। फिर शुरू हुआ अपने ही देश के नागरिकों के साथ दगाबाजी का लम्बा कार्यक्रम जिसका प्रथम पटाक्षेप कल भोपाल की अदालत में हुआ। एक दो पटाक्षेप हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में और होंगे और भोपाल की जनता की आवाज़ को पूरी तौर पर दमित कर दिया जायगा। यही पूँजीवादी व्यवस्था का चरित्र है।
    मगर आज यह सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या पूँजीवादी व्यवस्था के इस चरित्र को भोपाल की आम जनता और उनका आंदोलन चलाने वाले जन संगठन समझ नहीं पाए ? क्या आज से 26 साल पहले कानून और प्रशासन का चरित्र कुछ अलग था ? क्या उस समय सरकार, प्रशासन, कानून में बैठे लोग आम जनता के हितैशी हुआ करते थे ? जवाब है नहीं । फिर क्यों जनसंगठनों ने न्यायिक लड़ाई पर भरोसा करके एक उभरते सशक्त जनआंदोलन को कानून और अदालत में ले जाकर कुंद कर दिया ?
क्या कल के इस ऐतिहासिक जनविरोध फैसले से यह स्पष्ट नहीं है कि इस देश की व्यवस्था की मशीनरी के किसी भी कलपुर्जे को, देश की आम जनता की ना तो कोई फिक्र है और ना ही उसके प्रति किसी प्रकार की प्रतिबद्धता की चिंता। देश के कानून, शासन, प्रशासन, और किसी भी संस्थान को आम जनता के गुस्से से कोई डर नहीं लगता, क्योंकि आम जनता को सही मायने में संगठित करने का काम अब इस देश कोई नहीं करता,  और जब आम जनता संगठित ना हो, सही राजनैतिक चेतना से लैस ना हो तो उसके बीच ऐसे जनविरोधी संगठन भी पनपते हैं जो जन आंदोलनों को जनतांत्रिक आंदोलन का नाम देकर  अदालतों में ले जाकर फंसा देते हैं ताकि मुकदमा खिचते खिचते इतना समय ले लें कि किसी को ध्यान ही ना रहे कि हम लड़ क्यों रहे थे।
भोपाल में भी कमज़ोर जन आन्दोलन का नतीजा 26 साल के लम्बे इन्तज़ार के बाद महज़ कुछ सालों की सज़ा पाकर, जमानत पा गए उन अपराधियों और भोपाल के ठगे गए गैस पीडितों के चेहरों से पढ़ा जा सकता है।
उम्मीद है अब भी कोर्ट-कचहरी, प्रेस-मीडिया, और छद्म आंदोलन के छाया से निकलकर गैस पीड़ित और उनके संगठन कोई ताकतवर जन आन्दोलन खड़ा करने की तैयारी करेंगे, ताकी आगे होने वाले फैसलों को जनता के हित में प्रभावित किया जा सके।  

और भी पढ़े- भोपाल  गैस पीड़ितो के साथ विश्वासघात

>भोपाल गैस त्रासदी-गैस पीड़ितों के साथ विश्वासघात

>2-3 दिसम्बर 2009 को विश्व के भीषणतम औद्योगिक नरसंहार भोपाल गैस कांड की पच्चीसवी बरसी मनाई जा रही है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि पिछले पच्चीस सालों में गैस पीड़ितों की समस्याएँ जस की तस होने के कारण हर साल की तरह इस साल भी भोपाल के लाखों गैस पीड़ितों के ज़ख्म ही ताज़ा होंगे, फर्क सिर्फ यह होगा कि इस साल मौत के उस तांडव का रजत वर्ष होने के कारण देश विदेश के सैकड़ों लोग गैस पीड़ितों के ज़ख्मों पर मरहम लगाने भोपाल आएँगे, उनमें से कुछ ऐसे भी होंगे जो उनके ज़ख्मों पर नमक छिड़कने के अलावा कुछ भी नहीं करेंगे।

जन-साधारण के साथ सरकारों के विश्वासघात के हज़ारों उदाहरण देश-दुनिया में देखने को मिलते रहते हैं परन्तु भोपाल गैस कांड को लेकर जिस तरह का विश्वासघात देश की केन्द्र सरकारों और मध्यप्रदेश की राज्य सरकारों ने, (चाहे वे किसी भी पार्टी की रहीं हों) गैस पीड़ितों के साथ किया है, वैसा उदाहरण दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलता।

भोपाल गैस त्रासदी तो फिर भी विश्व की अन्यतम औद्योगिक दुर्घटनाओं में शामिल है, जिससे हुए शारीरिक आर्थिक नुकसान का दूर बैठकर अन्दाज़ा लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है। अमरीका अथवा पश्चिम के किसी भी देश में किसी छोटी-मोटी औद्योगिक दुर्घटना तक में लापरवाही बरतने एवं श्रमिकों, जनसाधारण के हताहत होने पर सज़ा एवं मुआवजे़ के जो कठोर प्रावधान हैं उनके आधार पर भोपाल गैस पीड़ितों के मामले में जिम्मेदार लोगों को सख़्त सज़ा के साथ-साथ कंपनी को जो आर्थिक मुआवज़ा भुगतना पड़ता उससे यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन को अपने आपको दिवालिया घोषित करना पड़ सकता। परन्तु गैस कांड के तुरंत बाद तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने गैस पीड़ितों के हितों के नाम पर समस्त कानूनी कार्यवाही का अधिकार अपने हाथ में लेकर गैस पीड़ितों के हाथ तो काट ही दिए बल्कि गैस पीड़ितों की लड़ाई को इतने कमज़ोर तरीके से लड़ा कि ना इस नरंसहार के लिए यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन की जिम्मेदारी तय हो पाई और ना ही पश्चिमी कानूनों मुताबिक भोपाल गैस पीड़ितों को पर्याप्त मुआवज़ा ही मिल पाया। बड़े शर्म की बात है कि आज जब मामूली सी दुघर्टनाओं में हताहतों को इफरात मुआवज़ा मिल जाता है, भोपाल गैस पीड़ितों को इतना कम मुआवज़ा मिला है कि उसे भीख़ कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है। दिल्ली में हुए उपहार अग्निकांड तक में पीड़ितों को लाखों रूपए मुआवज़ा मिला है जबकि भोपाल के गैस प्रभावितों को जिनकी पीढ़ियाँ तक विषैली गैस से विकृति की शिकार पाई जाने का अंदेशा है, नाम मात्र का मुआवज़ा देकर, (जिसमें से काफी कुछ दलाल और सरकारी मशीनरी खा गई) मरने के लिए छोड़ दिया गया है।

दरअसल देखा जाए तो इस दुर्घटना के राजनैतिक सिग्नीफिकेन्स को दरकिनार रखकर गैस पीड़ितों की पूरी जद्दोजहद मुआवज़े के इर्द-गिर्द ही केन्द्रित रही है जिसे लेकर केन्द्र एवं राज्य सरकार के अलावा गैस पीड़ित संगठनों की भूमिका भी बेहद निराषाजनक रही है। मुआवज़े के नाम पर जो भी रकम सरकार के खाते में आई है उसके युक्तिसंगत प्रबंधन की जगह उसे फुटकर रूप से गैस पीड़ितों में बाँटकर अप्रत्यक्ष रूप से बाज़ार की मुनाफाखोर शक्तियों की जेब में पहुँचा दिया गया है। गैस पीड़ितों ने अपनी शारीरिक हालत की गंभीरता के प्रति अन्जान रहकर मुआवज़े के रूप में मिले उस पैसे को अपने इलाज पर खर्चने की जगह टी.वी. फ्रिज, मोटरसाइकिल और दीगर लक्ज़री आयटम्स की खरीदारी पर खर्च दिया। कुछ शारीरिक ताकत खोकर घर बैठने को मजबूर लोगों ने ज़रूर उस मुआवजे़ से कुछ दिन अपने जीवन की गाड़ी धकाई मगर अब उनके सामने अपने आप को मरते हुए देखने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। गैस पीड़ितों को पहुँचे गंभीर शारीरिक नुकसान के मद्देनज़र उसका बेहतर से बेहतर इलाज कराया जाना सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा जाना चाहिए था और इसके लिए मुआवजे़ की राशि को इस तरह न बाँटकर गैस पीड़ितों के लिए सर्व सुविधा युक्त आधुनिक अस्पतालों का जाल बिछाने के लिए इसका उपयोग किया जाना चाहिए था ताकि उन्हें वैज्ञानिक पद्धति से उपयुक्त एवं सस्ता इलाज मुहैया हो पाता और वे डॉक्टरों की लूटमार से भी बच जाते । मगर अफसोस सरकारों ने इस दिशा में कुछ नहीं किया।

दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा रोज़गार का है। अपनी शारीरिक क्षमता खो चुके गैस पीड़ितों के लिए उपयुक्त रोज़गार और इलाज के साथ-साथ सुचारू जीवन यापन के लिए ऐसे बड़े-बडे़ औद्योगिक संस्थानों की स्थापना किये जाने की आवश्यकता थी जहाँ शारीरिक क्षमता के अनुसार दीर्घकालीन रोज़गार उपलब्ध हो सके। इसी तरह पुनर्वास के मुद्दे पर कुछ बड़े सामुदायिक संस्थान खड़े किये जाने आवश्यक थे। इस तरह के कार्यक्रमों के ज़रिए गैस पीड़ितों के लिए मिले मुआवज़े का समुचित उपयोग संभव होता जिसका लाभ लम्बे समय तक गैस पीड़ितों को मिल सकता था। परन्तु भोपाल में इसके उलट गैस पीड़ितों को सीधे मुआवजे़ की राशि मुहैया कर कज्यूमर प्रोडक्ट कम्पनियों के वारे-न्यारे कर दिए गए। गैस पीड़ितों के पैसों को सरकारी स्तर पर सौंदर्यीकरण इत्यादि दीगर कामों पर भी बड़े पैमाने पर खर्च किया गया जिसका सीधा लाभ गैस पीड़ितों को नहीं मिल पाया। गैस पीड़ितों के लिए काम करने वाले कई संगठनों ने भी अपने तमाम नेक इरादों के बावजूद इस मामले में बिल्कुल भी दूरअंदेशी का परिचय नहीं दिया।

बहरहाल, एक भयानक पूँजीवादी साम्राज्यवादी षड़यंत्र के तहत भारत जैसे गरीब देश में मचाए गए मौत के इस तांडव के विरुद्ध एक सचेत राजनैतिक आन्दोलन के अभाव में गैस पीड़ितों का जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई की जाना तो आज पच्चीस साल बाद संभव नहीं है लेकिन फिर भी मिथाइल आइसो साइनाइड और अन्य कई रसायनों के दूरगामी परिणामों के कारण गैस पीड़ितों के ऊपर भविष्य में आने वाले संकटों के मद्देनज़र तमाम गैस पीड़ितों एवं उनके लिए काम कर रहे संगठनों को एकजुट होकर एक प्रभावशाली आन्दोलन का निर्माण करना चाहिए, यही 2-3 दिसम्बर 1984 की रात मारे गए बेकसूरों को सम्मानजनक श्रद्धांजलि हो सकती है।